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रामचरितमानस · अध्याय 3

3.82

धर्म तेँ बिरति जोग तेँ ज्ञाना । ज्ञान मोच्छ-प्रद बेद बखाना ॥
जा तेँ बेगि द्रवौँ मैँ भाई । सो मम भगति भगत-सुखदाई ॥१॥

3.83

सुतन्त्र अवलम्ब न आना । तेहि आधीन ज्ञान बिज्ञाना ॥
भगति तात अनुपम सुखमूला । मिलै जो सन्त होहिँ अनुकूला ॥२॥

3.84

भगति क साधन कहौँ बखानी । सुगम-पन्थ मोहि पावहिँ प्रानी ॥
प्रथमहिँ बिप्र चरन अति प्रीती । निज निज धरम निरत स्रुति रीती॥३॥

3.85

एहि कर फल मन बिषय बिरागा । तब मम धरम उपज अनुरागा॥
स्रवनादिक नव भगति दृढाहींँ। मम लीला रति अति मन माहीँ ॥४॥

3.86

सन्त-चरन-पङ्कज अति प्रेमा । मन क्रम बचन भजन दृढनेमा ।
गुरु पितु मातु बन्धु पति देवा । सब मेआहि कह जानै दृढ सेवा ॥५॥

3.87

मम गुन-गावत पुलक सरीरा । गदगद-गिरा नयन बह नीरा ॥
काम आदि मद दम्भ न जाकें । तात निरन्तर बस मैं ताकें ॥६॥

3.88

बचन करम मन मोरि गति, भजन करहिं नि:काम !
तिन्ह के हृदय-कमल महँ, करौँ सदा बिश्राम ॥१६॥

3.89

भगति-जोग सुनि अति सुख पावा। लछिमन प्रभु चरनन्हि सिरु नावा ॥
एहि बिधि गये कछुक दिन बीती । कहत बिराग ज्ञान गुन नीती॥१॥

3.90

सूपनखा रावन के बहिनी । दुष्ट हृदय दारुन जसि अहिनी॥
पंचवटी सो गै एक बारा । देखि बिकल भै जुगल कुमारा ॥२॥

3.91

भ्राता पिता पुत्र उरगारी । पुरुष मनोहर निरखत नारी।
होइबिकल सक मनहिं न रोकी। जिमि रवि-मनि द्रव रचिहि बिलोकी॥३॥

3.92

रुचिर रूप धरि प्रभु पहिँ जाई । बोली बचन बहुत मुसुकाई ॥
तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी । यह संजोग विधि रचो बिचारो॥४॥

3.93

मम अनुरूप पुरुष जग माहीँ । देखेउँ खोजि लोक तिहुँ नाहीँ ॥
ता तेँ अब लगि रहिउँ कुमारी। मन माना कछु तुम्हहिँ निहारी ॥३॥

3.94

सीतहि चितै कही प्रभु बाता। अहै कुमार मोर लघु भ्राता ।
गै लछिमन रिपु भगिनी जानी । प्रभु बिलोकि बोले मृदु बानी ॥६॥

3.95

सुन्दरि सुनु मैं उन्ह कर दासा । पराधीन नहिँ तोर सुपासा।
प्रभु समरथ कोसलपुर राजा ।जो कुछ करहिँ उन्हहिँ सब छाजा ॥७॥

3.96

सेवक सुख चह मान भिखारी । व्यसनी धन सुभ-गति बिभिचारी॥
लोभी जस चह चार गुमानी। नम दुहि दूध चहत ये प्रानी
पुनि फिरि राम निकट सो आई । प्रभु लछिमन पहिं बहुरि पठाई ॥
लछिमन कहा तोहि सो बरई । जो तृन तोरि लाज परिहरई ॥६॥

3.97

तब खिसिआनि राम पहिँ गई । रूप भयङ्कर प्रगटत भई ॥
सीतहि समय देखि रघुराई । कहा अनुज सन सैन बुझाई ॥१०॥

3.98

लछिमन अतिलाघव सोँ, नाक कान बिनु कीन्हि ।
ता के कर रावन कहँ, मनहुँ चुनौती दीन्हि ॥१७॥

3.99

नाक कान बिनु भै बिकरारा । जनु स्रव सैल गेरु कै धारा ॥
खर दूषन पहिँ गै बिलपाता। धिग धिग तव पौरुष बल भ्राता ॥१॥

3.100

तेहि पूछा सब कहेसि बुझाई। जातुधान सुनि सेन बनाई ॥
धाये निसिचर-निकर बरूथा । जनु सपच्छ कज्जल-गिरि जूथा ॥२॥

3.101

नाना बाहन नानाकारा। नानायुध-धर घोर अपारा ॥
सूपनखा आगें करि लीनी । असुभ-रूप श्रुति नासा हीनी ॥३॥

3.102

असगुन अमित होहिँ भयकारी। गनहिँ न मृत्यु बिबस सब झारी॥
गहिँ तर्जहि गगन उडाही। देखि बिकट पर अति हरषाहीं॥३॥

3.103

कोउ कह जियत घरहु दोउ भाई । घरि मारहु तिय लेहु छुडाई ॥
धूरि पूरि लम-मंडल रहा । राम बोलाइ अनुज सन कहा ॥५॥

3.104

लेइ जानकिहि जाहु गिरि-कन्दर । आवा निसिचर कटक ऽभयङ्कर ।
रहेहु सजग सुनि प्रभु कै बानी । चले सहित श्री सर धनु पानी ॥६॥

3.105

देखि राम रिपु-दल चढि आवा । बिहँसि कठिन कोदंड चढावा ॥
कोदंड कठिन चढाइ सिर जटजूट बाँधत सोह क्यों।
मरकत सैल पर लरत दामिनि कोटि सोँ जुग भुजग ज्योँ ॥
कटि कसि निषङ्ग बिसाल भुज गहि, चाप बिसिख सुधारि कै।
चितवत मनहुँ मृगराज प्रभु गजराज-घटा निहारि कै ॥२॥

3.106

आइ गये बगमेल, धरहु धरहु धावत सुभट ।
जथा बिलोकि अकेल, बाल रबिहि घेरत दनुज ॥१८॥

3.107

प्रभु बिलोकि सर सकहिँ न डारी। थकित भई रजनीचर-धारी ॥
सचिव बोलि बोले खर दूषन । यह कोउ नृपबालक नर-भूषन॥१॥

3.108

नाग असुर सुर नर मुनि जेते । देखे जिते हत हम केते ॥
हम मरि जनम सुनहु सब भाई । देखी नहिँ असि सुन्दरताई ॥२॥

3.109

जदपि भगिनी कीन्हि कुरूपा । बध लायक नहिँ पुरुष अनूपा ।
देहु तुरत निज नारि दुराई । जीवत भवन जाहु दोउ भाई ॥३॥

3.110

मोर कहा तुम्ह ताहि सुनावहु। तासु बचन सुनि आतुर आवहु ॥
दूतन्ह कहा राम सन जाई। सुनत राम बोले मुसुकाई ॥४॥

3.111

हम छत्री मृगया बन करहीं। तुम्ह से खल-मृग खोजत-फिरहीं।
रिपु बलवन्त देखि नहिँ डरहीँ। एक बार कालहु सन लरहीं ॥५॥

3.112

जद्यपि मनुज दनुज-कुल-घालक । मुनि-पालक खल-सालक बालक ।
जौँ न होइ बल घर फिरि जाहू । समर बिमुख मैं हतौँ न काहू ४६॥
रन चढि करिय कपट चतुराई । रिपु पर कृपा परम कदराई ।
दूतन्ह जाइ तुरत सब कहेऊ । सुनि खर-दूषन उर अति दहेऊ ॥
उर दहेउ कहेउ कि धरहु धाये, बिकट भट रजनीचरा ।
सर चाप तोमर सक्ति सूल कृपान परिघ परसु धरा ॥
प्रभु कीन्ह धनुष टकोर प्रथम कठोर घोर भयावहा ।
भये बधिर ब्याकुल जातुधान न ज्ञान तेहि अवसर रहा ॥३॥

3.113

सावधान होइ धाये, जानि सबल आराति ।
लागे बरषन राम पर, अस्त्र सस्त्र बहुभाँत्ति
तिन्ह के आयुध तिल सम, करि काटे रघुबीर।
तानि सरासन स्रवन लगि, पुनि छाडे निज तीर ॥१९॥

3.114

तब चले बान कराल । फुङ्करत जनु बहु ब्याल ।
कोपेउ समर श्रीराम । चले बिसिख निसित निकाम ॥१॥

3.115

अवलोकि खर तर तीर । मुरि चले निसिचर बीर ।
भये क्रुद्ध तीनिउँ भाइ । जो भागि उन त जाइ ॥२॥

3.116

तेहि बधब हम निज पानि। फिरे मरन मन महुँ ठानि ।
आयुध अनेक प्रकार । सनमुख ते करहिं प्रहार ॥३॥

3.117

रिपु परम कोपे जानि । प्रभु धनुष सर सन्धानि ।
आँडे बिपुल नाराच । लगे कटन बिकट पिसाच ॥
उर सीस भुज कर चरन । जहँ तहँ लगे महि परन ॥
चिक्करत लागत बान । घर परत कुधर समान ॥५॥

3.118

भट कटत तन सत-खंड । पुनि उठत करि पाखंड ।
नभ उडत बहु भुज मुंड । बिनु मौलि धावत रुंड ॥६॥

3.119

खग कङ्क काक श्रृगाल । कटकटहिँ कठिन कराल ॥७॥

3.120

कटकटहिँ जम्बुक भूत प्रेत पिसाच खप्पर सञ्चहीँ ।
बेताल बीर कपाल ताल बजाइ जोगिनि नञ्चहीँ।
रघुबीर बान प्रचंड खंडहिँ, भटन्ह के उर भुज सिरा ।
जहँ तह परहिँ उठि लरहिँ धरु धरू-धरु करहिँ भयकर गिरा ॥४॥

3.121

अन्तावरी गहि उडत गीध पिसाच कर गहि धावहीं।
संग्राम-पुर-बासी मनहुँ बहु, बाल गुडी उडावहीँ ।
मारे पछारे उर बिदारे, बिपुल भट कहरत परे ।
अवलोकि निज दल बिकल भट त्रिसिरादि खरदूषन फिरे ॥5॥

3.122

सर सक्ति तोमर परसु सूल कृपान एकहि बारहीँ।
करि कोप श्रीरघुबीर पर अगनित निसाचर डारहीँ ।
प्रभु निमिष महुँ रिपु सर निवारि पचारि डारे सायका ।
दस दस बिसिख उर माँझ मारे सकल निसिचर-नायका ॥६॥

3.123

महि परत उठि भट भिरत मरत न, करत माया अति घनी।
सुर डरत चौदह सहस प्रेत विलोकि एक अवध-धनी ॥
सुर मुनि समय प्रभु देखि मायानाथ, अति कौतुक कर्यो।
देखहिं परस्पर राम करि संग्राम रिपु-दल लरि मर्यो ॥७॥

3.124

राम राम कहि तनु तजहिँ । पावहिँ पद निर्बान ।
करि उपाय रिपु मारे, छन महुँ कृपानिधान ।
हरषित बरषहिँ सुमन सुर, बाजहिँ गगन निसान ।
अस्तुति करि करि सब चले, सोभित विविध बिमान ॥२०॥

3.125

ओ-जब रघुनाथ समर रिपु जीते । सुर नर मुनि सब के भय बीते॥
तब लछिमन सीतहि लेइ आये। प्रभु पद परत हरषि उर लाये ॥१॥

3.126

सीता चितव स्याम मृदु गाता। परम प्रेम लोचन न अघाता।
पंचबटी बसि श्रीरघुनायक । करत चरित सुर-मुनि सुखदायक ॥२॥

3.127

धुआँ देखि खरदूषन केरा। जाइ सुपनखाँ रावन प्रेरा
बोली बचन क्रोध करि भारी । देस कोस के सुरति बिसारी ॥३॥

3.128

करसि पान सोवसि दिन राती । सुधि नहिं तव सिर पर आराती ।
राजनीति बिनु धन बिनु धर्मा । हरिहि समर्पे बिनु संत-कर्मा ॥४॥

3.129

विद्या बिनु विबेक उपजाये । स्त्रम-फल पढे किये अरु पायें ।
सङ्ग तेँ जती कुमन्त्र ते राजा। मान तेँ ज्ञान पान तेँ लाजा ॥५॥

3.130

प्रीति प्ननय बिनु मद ते गुनी । नासहिं बेगि नीति अस सुनी ॥६॥

3.131

रिपु रुज पावक पाप, प्रभु अहि गनिय न छोट करि ।
अस कहि बिबिध बिलाप, करि लागी रोदन करन ।
सभा माँझ परि व्याकुल, बहु प्रकार कह रोइ ।
तोहि जियत दसकन्धर, मोरि कि असि गति होइ ॥२१॥

3.132

सुनत सभासद उठे अकुलाई । समुझाई गहि बाँह उठाई ॥
कह लङ्केस कहसि किन बाता। केइ तब नासा कान निपाता ॥१॥

3.133

अवध-नृपति-दसरथ के जाये । पुरुषसिंह बन खेलन आये ॥
समुझि परी मोहि उन्ह कै करनी । रहित निसाचर करिहहिँ धरनी॥२॥

3.134

जिन्ह कर भुज-बल पाइ दसानन । अभय भये विचरत मुनि कानन ॥
देखत बालक काल समाना । परम धीर धन्वी गुन नाना ॥३॥

3.135

अतुलित बलप्रताप दोउ भ्राता । खल-बध रत सुर-मुनि-सुख-दाता ।
भा-धाम राम अस नामा । तिन्ह के संग नारि एक स्यामा ॥४॥

3.136

रूप-रासि बिधि नारि सँवारी । रति सतकोटि तासु बलिहारी॥
तासु अनुज काटे श्रुति नासा । सुनि तव भगिनि करहि परिहासा ॥५॥

3.137

खर-दूषन सुनि लगे पुकारा । छन महँ सकल कटक, उन्ह मारा ।
खर-दूषन-त्रिसिरा कर घाता। सुनि दससीस जरे सब गाता ॥६॥

3.138

सूपनखहि समुझाइ करि, अल बालेसि बहु भाँति ।
गयौ भवन अति सोच बस, नींद परै नहिँ राति ॥२२॥

3.139

सुर नर असुर नाग खग माहीं। मोरे अनुचर कहँ कोउ नाहीँ ।
खर दूषन मोहि समबलवन्ता। तिन्हहिँ कोमारैबिनु भगवन्ता
सुर- रंजन भंजन-महि भारा । जौँ भगवन्त लीन्ह अवतारा ॥
तौँ मैं जाइ बैरु हठि करऊँ । प्रभु सर प्रान तजें भव तरऊँ ॥२॥

3.140

होइहि भजन न तासस-देहा । मन क्रम बचन मन्त्र दृढ एहा ॥
जौँ नर-रूप भूप- सुत कोऊ । हरिहौँ नारि जीति रन दोऊ ॥३॥
चला अकेल जान चढि तहवाँ । बस मारीच सिन्धु-तट जहवाँ ॥
इहाँ राम जसि जुगुति बनाई। सुनहु उमा सो कथा सुहाई ॥४॥

3.141

लछिमन गये बनहिं जब,लेन-मूल-फल- कंन्द ।
जनक- सुता सन बोले, बिहँसि कृपा-सुख-वृन्दं ॥ २३ ॥

3.142

सुनहु प्रिया व्रत रुचिर सुसीला । मैं कछु करब ललित नर लीला॥
तुम्ह पावक महँ करहु निवासा । जौँ लगि करौँ निसाचर नासा॥ १ ॥

3.143

जबहिँ राम सब कहा बखानी । प्रभु पद धरि हिय अनल समानी ॥
निज प्रतिबिम्ब राखि तहँ सीता । तैसै सील रूप सुबिनीता ॥२॥

3.144

लछिमनहूँ यह मरम न जाना । जो कछु चरित रचेउ भगवाना ॥
दसमुख गयौ जहाँ मारीचा । नाइ माथ स्वारथ रत नीचा ॥३॥

3.145

नवनि नीच के अति दुखदाई । जिमि अङ्कुस धनु उरग बिलाई ॥
भय-दायक खल के प्रिय बानी । जिमि अकाल के कुसुम भवानी ॥४॥

3.146

करि पूजा मारीच तब, सादर पूछी बात ।
कवन हेतु मन व्यग्न अति, अकसर आयहु तात ॥२४॥

3.147

दसमुख सकल कथा तेहि आगे। कही सहित अभिमान अभागे ।
होहु कपट-मृग तुम्ह छलकारी । जेहि बिधि हरि आनौँ नृप नारी॥१॥

3.148

तेहि पुनि कहा सुनहु दससीसा । ते चराचर-ईसा॥
ता सोँ तात बयर नहिँ कीजै । मारे मरिय जिआये जीजै ॥२॥

3.149

मुनि मख राखन गयौ कुमारा। बिनु फर सर रघुपति मोहि मारा ॥
सत जोजन आयौँ छन माहीं । तिन्ह सन बयर किये भल नाहीँ ॥३॥

3.150

भै मम कीट भृङ्ग की नाई। जहँ तहँ मैँ देखौँ दोउ मोई॥
जौँ नर तात तदपि अति सूरा। तिन्हहिँ बिरोधि न आइहि पूरा ॥४॥

3.151

जेहि ताडका सुबाहु हति, खंडेउ हर-को दंड।
खर-दूषन-त्रिसिरा-बधेउ, मनुज कि अस बरिवंड ॥२५॥

3.152

जाहु भवन कुलकुसल बिचारी। सुनत जरा दीन्हेसि बहु गारी।
गुरु जिमि मूढ करसि मम बोधा। कहु जग मोहि समान को जोधा ॥१॥

3.153

तब मारीच हृदय अनुमाना। नवहि बिरोधे नहिँ कल्याना॥
सस्त्री मर्मी प्रभु सठ धनी। बैद बन्दि कवि मानख-गुनी ॥२॥

3.154

उभय भाँति देखा निज मरना। तब ताकेसि रघुनायक सरना।
उत्तर देत मोहि वघब अभागे। कस न सरौँ रघुपति-सर लागे ॥३॥

मूल पाठ: rāmacaritamānasa · Hindi Wikisource contributors · Sanskrit Wikisource · CC BY-SA 4.0

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