रामचरितमानस · अध्याय 2
प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा न मम्ले वनवास दुःखतः।
मुखाम्बुजश्री रघुनन्दनस्य मे सदास्तु सा मज्जुलमङ्गल प्रदा॥२॥
नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्गं सीतासमारोपितवामभागम्।
पाणौ महासायकचारुचापं नमामि रामं रघुवंश नाथम्॥३॥
श्रीगुरु-चरन-सरोज-रज, निज-मन-मुकुर सुधारि।
बरनौँ रघुबर-बिमल जस, जो दायक फल-चारि॥१॥
जब तें राम ब्याहि घर आये। नित नव मङ्गल मोद बधाये॥
भुवन चारि-दस भूधर भारी। सुकृत मेघ बरषहिं सुख-बारी॥१॥
रिधि सिधि सम्पति नदी सुहाई। उमगि अवध-अम्बुधि कहँ आई॥
मनि-गन पुर-नर-नारि-सुजाती। सुचि अमोल सुन्दर सब भाँती॥२॥
कहि न जाइ कछु नगर बिभूती। जनु एतनिअ बिरञ्चि करतूती॥
सब विधि सब पुर-लोग सुखारी। रामचन्द मुख-चन्द निहारी॥३॥
मुदित मातु सब सखी सहेली। फलित बिलोकि मनोरथ बेली॥
राम-रूप-गुन-सील-सुभाऊ। प्रमुदित होइ देखि सुनि राऊ॥४॥
सब के उर अभिलाष अस, कहहिँ मनाइ महेस।
आपु अछत जुबराज-पद, रामहिँ देउ नरेस॥१॥
एक समय सबसहित समाजा। राजसभा रघुराज बिराजा॥
सकल सुकृत मूरति नरनाहू। राम-सुजस सुनि अतिहि उछाहू॥१॥
नृप सब रहहिँ कृपा अभिलाखे। लोकप करहिँ प्रीति रुख राखे॥
तिभुवन तीनि काल जग माहीँ। भूरि-भाग दसरथ सम नाहीँ॥२॥
मङ्गल-मूल राम सुत जासू। जो कछु कहिय थोर सब तासू॥
राय सुभाय मुकुर कर लीन्हा। बदन बिलोकि मुकुट सम कीन्हा॥३॥
स्रवन समीप भये सित केसा। मनहुँ जरठ-पन अस उपदेसा।
नृप जुबराज राम कहँ देहू। जीवन जनम लाहु किन लेहू॥४॥
यह बिचार उर आनि नृप, सुदिन सुअवसर पाइ।
प्रेम-पुलकि-तन मुदित मन, गुरुहिँ सुनायौ जाइ॥२॥
कहै भुआल सुनिय मुनिनायक। भये राम सब-बिधि सब-लायक॥
सेवक सचिव सकल पुरबासी। जे हमार अरि मित्र उदासी॥१॥
सबहिँ राम प्रिय जेहि बिधि मोही। प्रभु असीस जनु तनु धरि सोही॥
बिप्र सहित परिवार गोसाँई। करहिँ छोह सब रौरहि नाँई॥२॥
जे गुरु-चरन-रेनु सिर धरहीँ। ते जनु सकल बिभव बस करहीँ॥
मोहि सम यह अनुभयौ न दूजे। सब पायौँ रज-पावनि पूजे॥३॥
अब अभिलाष एक मन मोरे। पूजिहि नाथ अनुग्रह तोरे॥
मुनि प्रसन्न लखि सहज-सनेहू। कहेउ नरेस रजायसु देहू॥१॥
राजन राउर नाम जस, सब अभिमत-दातार।
अनुगामी महिप-मनि, मन-अभिलाष तुम्हार॥३॥
सबबिधिगुरु प्रसन्नजियजानी। घोलेउ राउ रहसि मृदु-बानी॥
नाथ राम करियहिजुबराजू। कहिय कृपा करि करिय समाजू॥१॥
मोहि अछत यह होइ उछाहू। लहहिँ लोग सब लोचन लाहू॥
प्रभु प्रसाद सिव सबै निबाहीँ। यह लालसा एक मन माहीं॥२॥
पुनि न सोच तनु रहौ कि जाऊ। जेहि न होइ पाछे पछिताऊ॥
सुनि मुनि दसरथ बचन सुहाये। मङ्गल-मोद-मूल मन भाये॥३॥
सुनु नृप जासु बिमुख पछिताहीँ। जासु भजन बिनु जरनि न जाहीं॥
भयौ तुम्हार तनय सोइ स्वामी। राम पुनीत प्रेम अनुगामी॥४॥
बेगि बिलम्ब न करिय नृप, साजिय सबै समाज।
सुदिन सुमङ्गल तबहिँ जब, राम होहिँ जुबराज॥४॥
मुदित महीपति मन्दिर आये। सेवक सचिव सुमन्त्र बोलाये॥
कहि जयजीव सीस तिन्ह नाये। भूप सुमङ्गल बचन सुनाये॥१॥
प्रमुदित भोहि कहेउ गुरु आजू। रामहिँ राय देहु जुबराजू॥
जौ पाँचहि मत लागै नीका। करहु हरषि हिय रामहिँ टीका॥२॥
मंत्री मुदित सुनत प्रिय बानी। अभिमत बिरव परेउ जनु पानी॥
बिनती सचिव करहिँ कर जोरी। जियहु जगत-पति परिस करोरी॥३॥
जग मङ्गल भल काज बिचारा। बेगिय नाथ न लाइय बारा॥
नृपहिँ मोद सुनि सचिव सुभाखा। बढत बौंड जनुलही सुसाखा॥४॥
कहेउ भूप मुनिराज कर, जोइ जोइ आयसु होइ।
राम-राज-अभिषेक हित, बेगि करहु सोइ सेआइ॥५॥
हरणि मुनीस कहेउ मृदु-बानी। आनहु सकल सुतीरथ पानी॥
औषध मूल फूल फल पानी। कहे नाम गनि मङ्गल नाना॥१॥
चामर चरम बसन बहु भाँती। रोम पाट पट अगनित जाती।
मनि-गन मङ्गल-बस्तु अनेका। जो जग जोग भूप अभिषेका॥२॥
बेद-बिदित कहि सकल बिधाना। कहेउ रचहु पुर बिबिध-बिताना॥
सफल रसाल पूगफल केरा। रोपहु बोथिन्ह पुर चहुँ फेरा॥३॥
रचहु मज्जु मनि चौकै चारू। कहहु बनावन बेगि बजारू॥
पूजहु गनपति-गुरु-कुलदेवा। सब विधि करहु भूमिसुर-सेवा॥४॥
ध्वज पताक तारन कलस, सजहु तुरग रथ नाग।
सिर धरि मुनिबर बचन सब, निज निज काजहि लाग॥६॥
जो मुनीस जेहि आयसु दीन्हा। सो तेहि काज प्रथम जनु कीन्हा॥
बिप्र साधु सुर पूजत राजा। करत राम हित मङ्गल-काजी॥१॥
सुनत राम अभिषेक सुहावा। बाज गहागह अवध बधावा॥
राम-सीय-तन सगुन जनाये। फरकहिँ मङ्गल अङ्ग सुहाये॥२॥
पुलकि सप्रेम परसपर कहहीँ। भरत आगमन सूचक अहहीँ॥
भये बहुत दिन अति अवसेरी। सगुन प्रतीति भेँट प्रिय केरी॥३॥
भरतसरिस प्रिय को जग माहीं। इहै सगुन-फल दूसर नाहीँ॥
रामहिँ बन्धु सोच दिन राती। अंडन्हि कमठ हृदय जेहि भाँती॥४॥
एहि अवसर मङ्गल परम, सुनि रहसेउ रनिवास।
भत लखि बिधु बढत जनु, बारिधि बीचि बिलास॥७॥
प्रथम जाइ जिन्ह बचन सुनाये। भूषन बसन भूरि तिन्ह पाये॥
प्रेम पुलकि तन मन अनुरागीँ। मङ्गलकलस सजन सब लागीँ॥१॥
कई चारु सुमित्रा पूरी। मनिमय विविध भाँति अति रूरी॥
आनँद-मगन राम-महँतारी। दिये दान बहु बिप्र हँकारी॥२॥
पूजी ग्रामदेबि-सुर-नागा। कहेउ बहारि देन बलि भागा॥
जेहि विधि होइ राम कल्यानू। देहु दया करि सो बरदानू॥३॥
गावहिँ मङ्गल कोकिल-बयनी। बिधु-बदनी मृग-सावक-नयनी॥४॥
राम राज-अभिषेक सुनि, हिय हरषे नर-नारि।
लगे सुमङ्गल सजन सब, बिधि अनुकूल बिचारि॥८॥
तब नरनाह बसिष्ठ बोलाये। राम-धाम सिख देन पठाये॥
गुरुआगमन सुनत्त रघुनाथा। द्वार आइ पद नायौ माथा॥१॥
सादर अरघ देइ घर आने। सोरह भाँति पूजि सनमाने॥
गहे चरन सिय-सहित बहोरी। बोले राम कमल-कर जोरी॥२॥
सेवक सदन स्वामि आगमनू। मङ्गल-मूल अमङ्गल-दमनू॥
तदपि उचित जन बोलि सप्रीती। पठैय काज नाथ असि नीती॥३॥
प्रभुता तजि प्रभु कीन्ह सनेहू। भयौ पुनीत आजु यह गेहू॥
आयसु होइ सो करौँ गोसाँई। सेवक लहै स्वामि सेवकाई॥४॥
सुनि सनेह साने बचन, मुनि रघुबरहि प्रसंस।
राम कस न तुम्ह कहहु अस, हंस-बंस-अवतंस॥९॥
बरनि राम गुन सील सुभाऊ। बोले प्रेम पुलकि मुनिराऊ॥
भूप सजेउ अभिषेक-समाजू। चाहत देन तुम्हहिँ जुबराजू॥१॥
राम करहु सब सञ्जम आजू। जौँ विधि कुसल निबाहै काजू॥
गुरु सिख देइ राय पहिँ गयऊ। राम हृदय अस बिसमय भयऊ॥२॥
जनमे एक सङ्ग सब भाई। भोजन सयन केलि-लरिकाई॥
करनबेध उपबीत बियाहा। सङ्ग सङ्ग सब भयौ उछाहा॥३॥
बिमल-बंस यह अनुचित एकू। बन्धु बिहाइ बडेहि अभिषेकू॥
प्रभु सप्रेम पछितानि सुहाई। हरौ भगत-मन कै कुटिलाई॥४॥
लेहि अवसर आये लखन, मगन प्रेम आनन्द।
सनमाने प्रिय बचन कहि, रघुकुल-कैरव-चन्द॥१०॥
माजहिँ बाजन बिबिध विधाना। पुर-प्रमोद नहिँ जाइ बखाना॥
भरत आगमन सकल मनावहिँ। आवहु बेगि नयन फल पावहिँ॥१॥
हाट बाट घर गली अथाई। कहहि परसपर लोग लोगाई॥
कालि लगन भलि केतिक बारा। पूजिहि बिधि अभिलाष हमारा॥२॥
कनक सिँघासन सीय समेता। बैठहिँ राम होइ चित चेता॥
सकल कहहिँ कब होइहि काली। बिघन मनावहिं देव कुचाली॥३॥
तिन्हहिँ सोहाइ न अवध बधावा। चारहि चन्दिनि-राति न भावा॥
सारद बोलि बिनय सुर करहीँ। बारहिँ बार पाँय ले परहीँ॥४॥
बिपत्ति हमारि बिलोकि बडि, मातु करिय सोइ आजु।
राम जाहिँ बन राज तजि, होइ सकल सुर काज॥११॥
सुनिसुर-बिनयठाढि पछिताती। भैउँ सरोज-बिपिन हिम-राती॥
देखि देव पुनिकहहिँ निहोरी। मातु तोहि नहिँ थोरिउ खोरी॥१॥
बिसमय हरष रहित रघुराऊ। तुम्ह जानहु सब राम प्रभाऊ॥
जीव करम-बस सुख-दुख-भागी। जाइय अवध देव-हित-लागी॥२॥
बार बार गहि चरन सकोची। चली बिचारि विबुध-मति-पोची॥
ऊँच निवास नीचि करतूती। देखि न सकहिँ पराइ बिभूती॥३॥
आगिल काज बिचारि बहोरी। करिहहिँ चाह कुसल-कबि मोरी॥
हरषि हृदय दसरथ-पुर आई। जनु ग्रह दसा दुसह दुखदाई॥४॥
नाम मन्थरा मन्द-मति, चेरी कैकै केरि।
अजस पेटारी ताहि करि, गई गिरा मति फेरि॥१२॥
दीख मन्थरा नगर बनावा। मज्जुल मङ्गल बाज बधावा॥
पूछेसि लेगन्ह काह उछाहू। राम-तिलक सुनि भा उर दाहू॥१॥
करै बिचार कुबुद्धि कुजाती। होइ अकाज कवनि बिधि राता॥
देखि लागि मधु कुटिल किराती। जिमि गवँ तकै लेउँ केहि भाँती॥२॥
भरत-मातु पहिँ गै बिलखानी। का अनमनि हसि कह हँसि रानी॥
उतरु देइ न लेइ उसासू। नारि चरित करि ढारै आँसू॥३॥
हँसि कह रानि गाल बड तारे। दीन्ह लखन सिख अस मन मोरे॥
तबहुँ न बोल चेरि बडि पापिनि। छाडै स्वास कारि जनु साँपिनि॥४॥
सभय रानि कह कहसि किन, कुसल राम महिपाल।
लखन भरत रिपुदमन सुनि, भा कुबरी उर साल॥१३॥
कत सिख देइ हमहिँ कोउ माई। गाल करब केहि कर बल पाई॥
रामहिँ छाडि कुसल केहि आजू। जिन्हहिँ जनेस देइ जुबराजू॥१॥
भयौ कौसिलहि बिधि अति दाहिन। देखत गरब रहत उर नाहिन॥
देखहु कस न जाइ सब सोभा। जो अवलोकि भोर मन छोभा॥२॥
पूत बिदेस न सोच तुम्हारे। जानति हहु बस नाह हमारे॥
नींद बहुत प्रिय सेज तुराई। लखहु न भूप कपट चतुराई॥३॥
सुनि प्रिय बच्चन मलिनसन जानी। झुकी रानि अब रहु अरगानी॥
पुनि अस कबहुँ कहसि घरफोरी। तल धरि जीभ कढावौँ तोरी॥४॥
काने खोरे कूबरे, कुटिल कुचाली जानि।
तिय बिसेष पुनि चेरि कहि, भरत-मातु मुसुकानि॥१४॥
प्रियबादिन सिख दीन्हिउँ तोही। सपनेहु तो पर कोप नमोही॥
सुदिन सुमङ्गल-दायक सोई। तोर कहा फुर जेहि दिन होई॥१॥
जेठ स्वामि सेवक लघु भाई। यह दिनकर-कुल-रीति सुहाई॥
राम-तिलक जौँ साँचेहुँ काली। देउँ माँगु मन-भावत आली॥२॥
कौसल्या सम सब महँतारी। रामहिँ सहज सुभाय पियारी॥
मो पर करहिँ सनेह बिसेखी। मैँ करि प्रीति परीछा देखी॥३॥
जौं बिधि जनम देइ करि छोहू। होहु राम-सिय पूत-पतोहू॥
प्रान तेँ अधिक राम प्रिय मोरे। तिन्ह के तिलक छोभ कस तोरे॥४॥
भरत सपथ ताहि साँच कहु, परिहरि कपट दुराउ।
हरष समय बिषमय करसि, कारन माहि सुनाउ॥१॥
एकहि बार आस सब पूजी। अब कछु कहब जीभ करि दूजी॥
फोरै जोग कपार अभागा। भलौ कहत दुख गैरेहि लागा॥१॥
कहहिँ झूठि फुरि बात बनाई। ते प्रिय तुम्हहिँ करुइ मैं माई॥
हमहुँ कहब अब ठकुरसोहाती। नाहिं त मौन रहब दिन राती॥२॥
करि कुरूप बिधि परबस कीन्हा। बवा सो लुनिय लहिय जो दीन्हा॥
कोउ नृप होउ हमहिँ का हानी। चेरि छाडि अब होब कि रानी॥३॥
जारै जोग सुभाउ हमारा। अनभल देखि न जाय तुम्हारा॥
ता तेँ कछुक बात अनुसारी। छमिय देबि बडि चूक हमारी॥४॥
गूढ-कपट प्रिय-बचन सुनि, तीय-अधर-बुधि रानि।
सुर-माया-बस बैरिनिहि, सुहृद जानि पतियानि॥१६॥
सादर पुनि पुनि पूछति ओही। सबरी गान मृगी जनु मोही॥
तसि मति फिरी अहै जसि भाबी। रहसी चेरि घात जनु फाबी॥१॥
तुम्ह पूछहु मैँ कहत डेराऊँ। धरेहु मोर घरफोरी नाऊँ॥
सजि प्रतीति बहु-बिधि गढि छोली। अवध साढसाती तब बोली॥२॥
प्रिय सिय राम कहा तुम्ह रानी। रामहिँ तुम्ह प्रिय सो फुरि बानी॥
रहा प्रथम अब ते दिन बीते। समौ फिरे रिपु होहिँ पिरीते॥३॥
भानु कमल-कुल पोषनिहारा। बिनु जल जारि करै सोइ छारा॥
जरि तुम्हारि चह सवति उखारी। रुँधहु करि उपाउ बर बारी ॥४॥
तुम्हहिँ न सोच सोहाग बल, निज बस जानहु राउ।
मन मलीन मुँह-मीठ नृप, राउर सरल सुभाउ॥१७॥
चतुर गँभीर राम-महँतारी। बीच पाइ निज बात सँवारी॥
पठये भरत भूप ननिऔरे। राम-मातु मत जानब रौरे॥१॥
सेवहिं सकल सवति मोहि नीके। गरबित भरत-मातु बल पी के।
साल तुम्हार कौसिलहि माई। कपट चतुर नहिँ परै लखाई॥२॥
राजहि तुम्ह पर प्रेम बिसेखी। सवति सुभाउ सकै नहिँ देखी॥
रचि प्रपञ्च भूपहि अपनाई। राम-तिमक-हित लगन धराई॥३॥
यह कुल उचित राम कहँ टीका। सबहि सोहाइ मोहि सुठि नीका॥
आगिल बोत समुझि डर मोही। देउ दैव फिरि सो फल ओही॥४॥
रचि पचि कोटिक कुटिल-पन, कीन्हेसि कपट प्रबोध।
कहेसि कथा सत सवति कै, जेहि विधि बाढ विरोध॥१८॥
भावी बस प्रतीति उर आई। पूछ रानि पुनि सपथ देवाई॥
का पूछहु तुम्ह अबहुँ न जाना। निजहित अनहित पसु पहिचाना॥१॥
भयौ पाख-दिन सजत समाजू। तुम्ह पाई सुधि मोहि सन आजू॥
खाइय पहिरिय राज तुम्हारे। सत्य कहे नहिँ दोष हमारे॥२॥
जौँ असत्य कछु कहब बनाई। तो बिधि देइहि हमहिँ सजाई॥
रामहिँ तिलक कालि जौं भयऊ। तुम्ह कहँ बिपत्ति-बीज बिधि बयऊ॥३॥
रेख खचाइ कहौँ बल भाखी। भामिनि भैहु दूध कै माखी॥
जौँ सुत सहित करहु सेवकाई। तौ घर रहहु न आन उपाई॥४॥
कद्रू बिनतहि दीन्ह दुख, तुम्हहिँ कौसिला देब।
भरत बन्दिगृह सेइहहिँ, लखन राम के नेब॥१९॥
कैकय-सुता सुनत कटु बानी। कहि न सकै कछु सहमि सुखानी॥
तन पसेउ कदली जिमि काँपी। कुबरी दसन जीभ तब चाँपी॥१॥
कहि कहि कोटिक कपट कहानी। धीरज धरहु प्रबोधिसि रानी॥
कीन्हेसि कठिन पढाइ कुपाठू। जिमि न नवै फिरि उकठि कुकाठू॥२॥
फिरा करम प्रिय लागि कुचाली। बकिहि सराहै मानि मराली॥
सुनु मन्थरा बात फुरि तोरी। दहिनि आँखि नित फरकै मोरी ॥३॥
दिन प्रति देखौँ राति कुसपने। कहौँ न तोहि मोह बस अपने॥
काह करौँ सखि सूध सुभाऊ। दाहिन बाम न जानौँ काऊ॥४॥
अपने चलत न आजु लगि, अनमल काहु क कीन्ह।
केहि अघ एकहि बार मोहि, दैय दुसह दुख दीन्ह॥२०॥
नैहर जनम भरब बरु जाई। जियत न करवि सवति सेवकाई॥
अरि बस दैव जियावत जाही। मरन नीक तेह जीव न चाही॥१॥
दीन बचन कह बहु बिधि रानी। सुनि कुबरी तिय-माया ठानी॥
अस कस कहहु मानि सन ऊना। सुख सोहाग तुम्ह कहँ दिन दूना॥२॥
जेहि राउर अति अनमल ताका। सोइ पाइहि यह फल परिपाका॥
जब तेँ कुमत सुना मैं स्वामिनि। भूख न बासर नींद न जामिनि॥३॥
पूछेउँ गुनिन्ह रेख तिन्ह खाँची। भरत भुआल होहिं यह साँची॥
भामिनि करहु त कहौँ उपाऊ। हैं तुम्हरी सेवा बस राऊ॥४॥
परौँ कूप तब बचन पर, सकौँ पूत पति त्यागि।
कहसि मोर दुख देखि बड, कस न करब हित लागि॥२१॥
कुबरी करि कबुली कैकेई। कपट-छुरी उर-पाहन टेई॥
लखै नरानि निकट दुख कैसे। चरै हरित त्रिन बलि-पसु जैसे॥१॥
सुनत बात मृदु अन्त कठोरी। देत मनहुँ मधु माहुर घोरी॥
कहै चेरि सुधि अहै कि नाहीँ। स्वामिनि कहिहु कथा मोहि पाहीँ॥२॥
दुइ बरदान भूप सन थाती। माँगहु आजु जुडावहु छाती॥
सुतहि राज रामहिँ बनबासू। देहु लेहु सब सवति हुलासू॥३॥
भूपति राम-सपथ जब करई। तब माँगेहु जेहि बचन न टरई॥
होइ अकाज आजु लिसि बीते। बचन मोर प्रिय मानेहु जी ते॥४॥
बड कुघात करि पातकिनि, कहेसि कोप-गृह जाहु।
काज सँवारेहु सजग सब, सहसा जनि पतियाहु॥२२॥
कुबरिहि रानि प्रान-प्रिय जानी। बार बार बडि बुद्धि बखानी॥
तोहि सम हित न मोर संसारा। बहे जात कै भैसि अधारा॥१॥
जौँ बिधि पुरब मनोरथ काली। करौँ तोहि चखपूतरि आली।
बहु बिधि चेरिहि आदर देई। कोपभवन गवनी कैकेई॥२॥
बिपति बीज बरषा-रितु चेरी। भुइँ भै कुमति कैकई केरी॥
पाइ कपट-जल अङ्कुर जामा। बर दोउ दल दुख-फल परिनामा॥३॥
कोप-समाज साजि सब सोई। राज करत निज कुमति बिगोई॥
राउर नगर कोलाहल होई। यह कुचालि कछु जान न कोई॥४॥
प्रमुदित पुर नर नारि सब, सजहिँ सुमङ्गलचार।
एक प्रबिसहिँ एक निर्गमहिँ, भीर भूप-दरबार॥२३॥
बालसखा सुनि हिय हरषाहीँ। मिलि दस पाँच राम पहिँ जाहीँ॥
प्रभुआदरहिँ प्रेम पहिचानी। पूछहिँ कुसल-षेम मृदु बानी॥१॥
फिरहिँ भवन प्रिय आयसु पाई। करत परसपर राम बडाई॥
को रघुबीर सरिस संसारा। सील सनेह निबाहनिहारा॥२॥
जेहि जेहि जोनि करम-बस भ्रमहीँ। तहँ तहँ ईस देहु यह हमहीँ॥
सेवक हम स्वामी सिय-नाहू। होउ नात एहि आर निबाहू॥३॥
अस अभिलाष नगर सब काहू। कैकय-सुता हृदय अति दाहू॥
को न कुसङ्गति पाइ नसाई। रहै न नीच-मते चतुराई॥४॥
साँझ समय सानन्द नृप, गयौ कैकई गेह।
गवन निठुरता निकट किय, जनु धरि देह सनेह॥२४॥
कोपभवन सुनि सकुचेउ राऊ। भय-बस अगहुँड परै न पाऊ॥
सुरपति बसै बाँह-चल जाके। नरपति सकल रहहिँ रुख ताके॥१॥
सुनि तिय रिस गयौ सुखाई। देखहु काम प्रताप बडाई॥
सूल कुलिस असि अंगवनिहारे। ते रतिनाथ सुमन-सर मारे॥२॥
समय नरेस प्रिया पहिँ गयऊ। देखि दसा दुख दारुन भयऊ॥
भूमि-सयन पट मोट पुराना। दिये डारि तन भूषन नाना॥३॥
कुमतिहि कसि कुबेषता फाबी। अन-अहिवात सूच जनु भाबी॥
जाइ निकट नृप कह मृदु बानी। प्रान-प्रिया केहि हेतु रिसानी॥४॥
केहि हेतु रानि रिसानि परसत, पानि पतिहि निवारई।
मानहुँ सरोष भुअङ्ग-भामिनि, बिषम भाँति निहारई॥
उ बासना-रसना दसन बर, मरम ठाहर देखई।
तुलसी नृपति भवितब्यता-बस, काम-कौतुक लेखई॥१॥
बार बार कह राउ, सुमुखि सुलोचनि पिक-बचनि।
कारन मोहि सुनाउ, गज-गामिनि निज कोप कर॥२५॥
अनहित तोर प्रिया केइ कीन्हा। केहि दुइ सिर केहिजम चह लान्हा॥
कहु केहि रङ्कहि करौँ नरेसू। कहु केहि नृपहि निकासौँ देसू॥१॥
सकौँ तोर अरि अमरौ मारी। काह कीट बपुरे नर नारी॥
जानसि मोर सुभाव बरोरू। मन तव आनन-चन्द चकोरू॥२॥
प्रिया प्रान-सुत-सरबस मोरे। परिजन-प्रजा-सकल बस तोरे॥
जौँ कछु कहौँ कपट करि तोही। भामिनि राम सपथ सत मोही॥३॥
बिहँसि माँगु भनभावति बाता। भूषन सजहि मनोहर गाता॥
घरी कुघरी समुझि जिय देखू। बेगि प्रिया परिहरहि कुबेखू॥४॥
यह सुनि मन गुनि सपथ बडि, बिहँसि उठी भति-मन्द।
भूषन सजति बिलोकि मृग, मनहुँ किरातिनि फन्द॥२६॥
पुनि कह राउ सुहृद जिय जानी। प्रेम पुलकि मृदु मञ्जुल बानी॥
भामिनि भयौ तोर मन भावा। घर घर नगर अनन्द-बधावा॥१॥
रामहिँ देउँ कालि जुबराजू। सजहि सुलोचनि मङ्गल-साजू॥
दलकि उठेउ सुनि हृदय कठोरू। जनु छुइ गयौ पाक बनतारू॥२॥
ऐसिउ पीर बिहँसि तेहिँ गोई। चार-नारि जिमि प्रगटिन रोई॥
लखी न भूप कपट चतुराई। कोटि कुटिल-मनि गुरू पढाई॥३॥
जद्यपि नीति-निपुन नर-नाहू। नारि-चरित जलनिधि अवगाहू॥
कपट सनेह बढाइ बहोरी। बोली बिहँसि नयन मुँह मेरी॥४॥
माँगु माँगु पै कहहु पिय, कबहुँ न देहु न लेहु।
देन कहेहु बरदान दुइ, तेउ पावत सन्देहु॥२७॥
जानेउँ मरम राउ हँसि कहई। तुम्हहिँ कोहाब परम प्रिय अहई॥
थाती राखि न माँगेहु काऊ। विसरिगयौ मोहि भोर सुभाऊ॥१॥
झूठेहु हमहिँ दोष जनि देहू। दुइ कै चारि माँगि मकु लेहू॥
रघुकुल-रीति सदा चलि आई। प्रान जाहु बरु बचन न जाई॥२॥
नहिँ असत्य सम पातक-पुञ्जा। गिरि सम होहिँ कि कोटिक गुञ्जा॥
सत्य-मूल सब सुकृत सुहाये। बेद पुरान बिदित मनु गाये॥३॥
तेहि पर राम-सपथ करि आई। सुकृत-सनेह-अवधि रघुराई॥
बात दृढाइ कुमति हँसि बोली। कुमत-कुबिहँग कुलह जनु खोली॥४॥
भूप मनोरथ सुभग बन, सुख सुबिहङ्ग समाज।
भिल्लिनि जिमि छाडन चहति, बचन भयङ्कर बाज॥२८॥
सुनहु प्रान-प्रिय भावत जी का। देहु एक बर भरतहि टीका॥
माँगौँ दूसर बर कर जोरी। पुरवहु नाथ मनोरथ मारी॥१॥
तापस-बेष बिसेष उदासी। चौदह बरिस राम बन-बासी॥
सुनि मृदु बचन भूप हिय साकू। ससि-कर छुअत बिकल जिमि कोकू॥२॥
गयौ सहमि नहिँ कछु कहि आवा। जनु सचान बन झपटेउ लावा॥
बिबरन भयौ निपट नरपालू। दामिनि हनेउ मनहुँ तरु तालू॥३॥
माथे हाथ मुंदि दोउ लोचन। तनु धरि सोच लाग जनु सोचन॥
मोर मनोरथ सुरतरु-फूला। फरत करिनि जिमि हतेउ समूला॥४॥
अवध उजारि कीन्हि कैकई। दीन्हेसि अचल बिपति के नेई॥५॥
कवने अवसर का भयौ, गयौँ नारि बिस्वास।
जोग-सिद्धि-फल समय जिमि, जतिहि अबिद्या नास॥२॥
एहिविधि राउ मनहि मन झाँखा। देखि कुभाँति कुमति मन माँखा॥
भरत कि राउर पूत न होहीँ। आनेहु मोल बेसाहि कि मोहीँ॥१॥
जो सुनि सर अस लाग तुम्हारे। काहे न बोलहु बचन सँभारे॥
देहु उत्तर अरू करहु कि नाहीँ। सत्य सन्ध तुम्ह रघुकुल माही॥२॥
देन कहेहु अब जनि बरु देहू। तजहु सत्य जग अपजस लेहू॥
सत्य सराहि कहेहु बर देना। जानेहु लेइहि माँगि चबेना॥३॥
सिबि दधीचि बलि जो कछु भाखा। तनु धन तजेउ बचन पन राखा॥
अति कटु-बचन कहति कैकेई। मानहुँ लोन जरे पर देई॥४॥
धरम-धुरन्धर धीर धरि, नयन उघारे राय।
सिर धुनि लीन्हि उसास असि, मारेसि मोहि कुठाय॥३०॥
आगे दीखि जरत रिस भारी। मनहुँ रोष तरवारि उघारी॥
मूठि कुबुद्धि धार निठुराई। धरी कूबरी सान बनाई॥१॥
लखी महीप कराल कठोरा। सत्य कि जीवन लेइहि मोरा॥
बोलेउ राउ कठिन करि छाती। बानी सबिनय तासु सोहाती॥२॥
प्रिया बचन कस कहसि कुभाँती। भीर प्रतीति प्रीति करि हाँती॥
मोरे भरत राम दुइ आँखी। सत्य कहौँ करि सङ्कर साखी॥३॥
अबसि दूत मैं पठैब प्राता। ऐहहिं बेगि सुनत दोउ भ्राता॥
सुदिन सोधि सब साज सजाई। देउँ भरत कहेँ राज बजाई॥४॥
लोभ न रामहिँ राज कर, बहुत भरत पर प्रीति॥
मैं बड छोट बिचारि जिय, करत रहेउँ नृप-नीति॥३१॥
राम सपथ सत कहौँ सुभाऊ। राम-मातु कछु कहेउ न काऊ॥
मैं सब कीन्ह तोहि बिनु पूछे। तेहि ते परेउ मनोरथ छूछे॥१॥
रिस परिहरु अब मङ्गल साजू। कछु दिन गये भरत जुबराजू॥
एकहि बात मोहि दुख लागा। बर दूसर असमञ्जस माँगा॥२॥
अजहूँ हृदय जरत तेहि आँचा। रिस परिहास कि साँचेहु साँचा॥
कहु तजि रोष राम अपराधू। सब कोउ कहै राम सुठि साधू॥३॥
तुहूँ सराहसि करसि सनेहू। अब सुनि मोहि अयौ सन्देहू॥
जासु सुभाउ अरिहि अनुकूला। सो किमि करिहि मातु प्रतिकूला॥४॥
प्रिया हास रिस परिहरहि, माँगु बिचारि बिबेक।
जेहि देखौँ अब नयन भरि, भरत राज-अभिषेक॥३२॥
जिऐ मीन बरु बारिबिहोना। मनिबिनुफनिकजिऐ दुख दीना॥
कहौँ सुभाउ न छलमनमाहीँ। जीवन मोर राम बिनु नाहीं॥१॥
समुझि देखु जिय प्रिया प्रबीना। जीवन राम-दरस आधीना॥
सुनि मृदु बचन कुमति अति जरई। मनहुँ अनल आहुति घृत परई॥२॥
कहै करहु किन कोटि उपाया। इहाँ न लागिहि राउरि माया॥
देहु कि लेहु अजस करि नाहौँ। मोहि न बहुत प्रपञ्च सोहाहीं॥३॥
राम-साधु तुम्ह साधु सयाने। राम-मातु भलि सब पहिचाने॥
जस कौसिला मोर भल ताका। तस फल उन्हहि देउँ करिसाका॥४॥
होत प्रात मुनि बेष धरि, जौँ न राम बन जाहिँ।
मोर मरन राउर अजस, नृप समुझिय मन माहिँ॥३३॥
अस कहि कुटिल भई उठि ठाढी। मानहुँ रोष-तरङ्गिनि बाढी॥
पाप-पहार प्रगट भै सोई। भरी क्रोध-जल जाइ न जाई॥१॥
उ बर कूल कठिन हठ धारा। भँवर कूबरी-बचन-प्रचारा॥
ढाहत सूप-रूप-तरु मूला। चली बिपति-बारिधि अनुकूला॥२॥
लखी नरेस बात सच साँची। तिय मिस मीच सीस पर नाँची॥
गहि पद विनय कोन्हि बैठारी। जनि दिनकर-कुल होसि कुठारी॥३॥
माँगु माथ अबहीं देउँ तोही। राम-बिरह जनि मारसि मोही॥
राखु राम कह जेहि तेहि भाँती। नाहि त जरिहि जनम भरि छाती॥४॥
देखी ब्याधि असाधि नृप, परेउ धरनि धुनि माथ।
कहत परम आरत बचन, राम राम रघुनाथ ॥३४॥
ब्याकुल राउ सिथिल सब गाता । करिनि कलपतरु मनहुँ निपाता।
कंठ सूख मुख आव न बानी । जनु पाठीन दीन बिनु पानी ॥१॥
भरत प्रान-प्रियपावहिँ राजू। बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजू॥
जौँ न जाउँ बन ऐसेहु काजा। प्रथम गनिय मोहि मूढ समाजा ॥१॥
सेवहिँ अरँडु कलपतरु त्यागी। परिहरि अमृत लेहिँ विष माँगी॥
तेउ न पाइ अस समौ चुकाहीँ। देखु बिचारि मातु मन माहीं ॥२॥
अम्ब एक दुख मोहि बिसेखी। निपट बिकल नर-नायकु देखी॥
थोरिहि बात पितहि दुख भारी। होति प्रतीति न मोहि महँतारी ॥३॥
राउ धीर गुन-उदधि अगाधू। भा मोहि तेँ कछु बड अपराधू।
जा तेँ मोहि न कहत कछु राऊ। मोरि सपथ तोहि कहु सतिभाऊ ॥४॥
सहज सरल रघुबर बचन, कुमति कुटिल करि जान।
चलै जोँक जल बक्र-गति, जद्यपि सलिल समान ॥४२॥
रहसी रानि राम रुख पाई। बोली कपद-सनेह जनाई ॥
सपथ तुम्हार भरत कै आना । हेतु न दूसर मैं कछु जाना ॥१॥
तुम्ह अपराध जोग नहिँ ताता । जननी जनक बन्धु सुख दाता ।
राम सत्य सब जो कछु कहहू । तुम्ह पितु-मातु बचन-रत अहहू ॥२॥
पितहि बुझाइ कहहु बलि साई। चौथे पन जेहि अजस न होई॥
तुम्ह सम सुअन सुकृत जेहि दीन्हे। उचित न तासु निरादर कीन्हे ॥३॥
लागहि कुमुख बचन सुभ कैसे । मगह गयादिक तीरथ जैसे ॥
रामहि मातु बचन सब भाये। जिमि सुरसरि-गत सलिल सुहाये॥४॥
गै सुरछा रामहि सुमिरि, नृप फिरि करवट लीन्ह।
सचिव राम आगमन कहि, बिनय सम यसम कीन्ह ॥४३॥
अवनिप अकनि रामपग धारे। धरि धीरज तब नयन उघारे॥
सचिव सँभारि राउ बैठारे । चरन परत नूप राम निहारे॥१॥
लिये सनेह निकल उर लाई । गङ् भनि मनहुँ फनिक फिरि पाई।
रामहिँ चितै रहेउ नर नाहू । चला बिलोचन वारि प्रधाहू ॥२॥
क बिवस कछु कहै न पारा । हृदय लगावत बारहिँ बारा ।
विधिहि अनाव राउ मन माहीं । जेहि रघुनाथ न. कानन जाहीं ॥३॥
सुमिरि महेसहि कहाइ बहोरी। बिनती सुनहु सदासिव मोरी।
आसुतोष तुम्ह अनढर-दानी । आरति हरहु दीन जन जानो॥४॥<।पोएम् >
शिवजी का स्मरण और निहोरा कर के कहते हैं कि हे सदाशिव ! मेरी विनती को
सुनिये ! आप तुरन्त प्रसन्न होनेवाले और औडर (जो शत्रु-मित्र पर वरावर दयालु हो) दानी
हैं, मुझे अपना दीन लेवक समझ कर मेरे दुःख को दूर कीजिये ॥४॥
<पोएम्>दो०-तुम्ह प्रेरक सब के हृदय, सो मति रामहि देहु ।
बचन मार तजि रहहिँ घर, परिहरि सील सनेहु ॥४४॥
अजस होउ जग सुजस नसाऊ। नरक परौँ बरु सुरपुर जाऊ॥
सब दुखदुसह सहावहु मोहीं । लोचन ओट राम जनि होहीं॥१॥
अस मन गुनह राउ नहिँ बोली । पीपर पात सरिस मन डोला ॥
रघुपति पितहि प्रेम-बस जानी। पुनि कछु कहिहि मातु अनुमाली॥२॥
देस काल अवसर अनुसारी । बाले बचन बिनीत बिचारी ॥
तात कहौँ कछु करौँ ढिठाई। अनुचित छमन जानि लसिकाई॥३॥
अति लघु बात लागि दुख पावा । काहु न मोहि कहि प्रथम जनावा॥
देखि गोसाँइहि पूछेउ माता । सुनि प्रसङ्ग भये तीतल गाता॥४॥
मङ्गल समय स्नेह-बल, सोच परिहरिय तात ।
आयसु देइय हरषि हिय, कहि पुलके प्रभु गात ॥४॥
धन्य जनम जगतीतल तासू । पितहि प्रमोद चरित सुनि जासू ॥
चारि पदारथ करतल ता के । प्रिय पितु-भातु प्रान सम जा के ॥१॥
आयसु पालि जनम-फल पाई। ऐहौँ बेगिहि, होउ रजाई॥
बिदा मातु सन आवौँ माँगी। चलिहौँ बनहिँ बहुरि पग लागी॥२॥
अस कहि राम गवन तब कीन्हा । भूप सोक-बस उत्तर न दीन्हा॥
नगर व्यापि गै बात सुतीछी । छुअत चढी जनु, सब तन बीछी॥३॥
सुनि भये बिकल सकल नर नारी। बेलि बिपट जिमि देखि दवारी ॥
जो जहँ सुनै धुनै सिर सोई। बड बिषाद नहिँ धीरज होई ॥४॥
सुख सुखाहिँ लोचन सवहि, सेक न हृदय समाइ।
मनहुँ करुन-रस-कटकई, उत्तरी अवध बजाइ ॥४६॥
मिलेहि माँझ विधिबात बिगारी । जहँ तह देहि कैकैहि गारी॥
एहि पापिनिहिँ बूझि का परेऊ। छाइ भवन परपावक धरेऊ॥१॥
निज कर नयन काढि चह दीखा । डारि सुधा विष चाहत सीखा॥
कुटिल कठोर कुबुद्धि अमागी। भै रघुबंस-बेनु बन आगी॥२॥
पालव बैठि पेड एहि काटा । सुख महँ सोक-ठाट धरि ठाटा।
सदा राम एहि प्रान सलाना। कारन कवन कुटिल-पल ठाना॥३॥
सत्य कहहिँ कवि नारि सुभाऊ। सब विधि अगह अगाध दुराज॥
निज प्रतिबिम्ब बरुक गहि जाई। जानि न जाइ नारि गति भाई॥४७॥
काह न पावक जारि सक,का न समुद्र समाइ।
का न करै अबला प्रबल, केहि जग काल न खाइ ॥४७॥
का सुनाइ विधिकाह सुनावा। का देखाइ वह काह देखावा ।
एक कहहिँ मल भूपन कीन्हा । बरशिक्षारि नहिँ कुमतिहि दीन्हा॥१॥
जो हठि थयौ सकल-दुख-भाजन। अबला-बिबस ज्ञान-गुन-माजन।
एक धरम-परमिति पहिचाने। नृपहि दोस नहिंँ देहिँ सयाने॥२॥
सिबि दघोचि हरिचन्द कहानी । एक एक सन कहहिँ बखानी ।
एक भरत कर सम्मत कहहीँ। एक उदास-भाय सुनि रहहीं ॥३॥
कान मूँदि कर रद गहि जीहा। एक कहहिं यह बात अलीहा॥
सुकृत जाहिँ अस कुहत तुम्हारे । राम भरत कहूँ प्रान-पियारे ॥४॥
चन्द चवै बरु अनल-कन, सुधा होइ बिष-तूल।
सपनेहुँ कबहुँ कि करहिं किछु, भरत राम-प्रतिकूल ॥४८॥
एक विधातहि दूषन देहाँ । सुधा देखाइ दीन्ह बिष जेहीं ।
खरमर नगर सोच सब काहू । दुखह दाह उर लिटा उछाहू ॥१॥
कुल-मान्य-जठेरी । जे प्रिय परम कैकई केरी ॥
लगी देन सिख सील सराही। बचन बान सम लागहिँ नाही ॥२॥
भरत न मोहि प्रिय राम समाना । सदा कहहु यह सब जग जाना॥
सहज सनेहू । केहि अपराध आजु बन देहू ॥३॥
कबहुँ न कियेहु सवतियारसू । प्रीति प्रतीति जान सब देसू ॥
कौसल्या अब काह बिगारा । तुम्ह जेहि लागि बज्न पुर पारा॥४॥
सीय कि पिय सँग परिहरिहि, लखन कि रहिहहिं धाम।
राज कि भूँजब भरत पुर, नृप कि जिइहि बिनु राम ॥४॥
अस विचारि उर छाढु कोहू । सोककलङ्क कोठि जनि होहू ॥
भरतहि अबलि देहु जुबराजू। कानन काह राम कर काजू ॥१॥
नाहिँ न राम राज के भूखे। घरम-धुरीन,विषय-रस रूखे।
गुरु गृह बसहुँ राम तजि गेहू। नुप सन अस बर दूसर लेहू॥२॥
जौँ नहिँ लगिहहु कहे हमारे। नहिँ लागिहि कछु हाथ तुम्हारे॥
जौँ परिहास कीन्हि कछु हाई। तो कहि प्रगट जनावहु सोई॥३॥
राम सरिस सुत कानन जोगू। काह कहिहि सुनि तुम्ह कहँ लोगू॥
उठहु बेगि सोइ करहु उपाई। जेहि बिधि सोक-कलंक नसाई॥१॥
जेहि माँति सोक कलङ्क जाइ,उपाय करि कुल पालही ।
हठि फेरु रामहिँ जात बन, जनि बात तृसरि चालही ॥
जिमिभानुबिनुदिन प्रानविनुतनु चन्द बिनु,जिमिजामिनी।
तिमि अवध तुलसीदास-प्रभु बिनु,समुझिआँजियमामिनी ॥२॥
सखिन्ह सिखावन दीन्ह, सुनत मधुर परिनाम हित।
तेइ कछु कान न कीन्ह, कुटिल प्रसोधी। कूबरी ॥५०॥
उतरु न देइ दुसह रिस रूखी। मुगिन्ह चितव जनु बाधिनि भूखी।
व्याधिअसाधिजानितिन्हत्यागी। चली कहत मंति-सन्द अभागीं॥१॥
करत यह दैव बिगाई। कीन्हेसि अस जस करै न कोई।
एहि बिधि बिलपहिँ पुर-नर-नारी। देहिँ कुचालिहि कोटिक गारी॥२॥
जरहिँ: विषम-जर लेहिँ उसासा। कवनि राम बिनु जीवन आसा ॥
बिपुल बियोग प्रजा। जनुजलचरगन सूखत पानी ॥३॥
अति विषाद-बस लोग लोगाई। गये मातु पहिँ राम गोसाँई।
मुख प्रसन्न चित-चौगुन चाऊ । मिटा सोच जनि राखैँराऊ॥<।पोएम्>
इस तरह पुरुष और स्त्रियाँ अत्यन्त विषाद के वश में हो रहे हैं, उधर स्वामी रामचन्द्रजी माता के पास गये। उनका सुख प्रलश है और मन में चौगुना उत्साह है, यह सोच मिट गया कि राजा रख न ले अर्थात् माता केकयी ने वर माँग लिया इससे माता पिता दोनों
की आज्ञा हो गई तो अब रुकावट नहीं पड सकती ॥४॥
<पोएम्>दो०-नव गयन्द रघुनीर अन, राज अलान समान।
ऊट जानि बन-गमन सुनि, उर अनन्द अधिकान ॥३१॥
रघुकुल-तिलक जारि दोउ हाथा। मुदित मातु-पद नायौमाथा॥
दीन्हि असीस लाइ उर लीन्हे। भूषन-बसननिछावरि कीन्हे॥१॥
बार बार मुख चुम्बति साता । नयन-नेह-जल पुलकित-गांता॥
गोद राखि पुनि हृदय लगाये। खवत प्रेम-रस पयद सुहाये ॥२॥
प्रेम प्रमोद न कछु कहि जाई । रङ्क धनद-पदवी जनु पाई ॥
सादर सुन्दर बदन निहारी । बोली मधुर वचन महँतारी ॥३॥
कहहु तात जननी बलिहारी। कहिँ लगन सुद-मङ्गलकारी॥
सुकृत-सोल सुख सीव सुहाई। जनम-लाम कै अवधि अघाई॥४॥
जेहि चाहत नर नारि सब, अति आरत एहि भाँति ।
जिमि चातक चातकि दृषित, वृष्टि सरद-रितु स्वाति ॥३२॥
ताल जाउँ बलि बेगि नहाहू । जो मन भाव मधुर कछु खाहू॥
पितु समीप तब जायहु भैया । म बाडि बार जाइ बलि भैया॥१॥
मातु बचन सुनि अति अनुकूला । जनु सनेह सुरतरु के फूला॥
सुख-मकरन्द भरे स्रिय-मूला। निरखि राम-मन-सँवर न भूला॥२॥
चलत राम लखि अवध अनाथा। बिकल लोग सब लागे साथा ॥
कृपासिन्धुबहु बिधि समुझावहिँ । फिरहि प्रेम-बसपुनि फिरि आवहिँ ॥२॥
जथाजोग सनमानि प्रभु, विदा किये मुनि-बृन्द।
करहिँ जोग जप जाग तप, निज आस्रमनि सुछन्द ॥१३४॥
यह सुधि कोल किरातन्ह पाई। हरषें जनु नव-निधि घर आई॥
कन्द मूल फल भरि भरि दोना। चले रङ्क जनु लूटन सोना ॥१॥
तिन्ह महँ जिन्ह देखे दोउ भ्राता। अपर तिन्हहिँ पूछहिँ मगजाता॥
कहत सुनत रघुबीर निकाई। आइ सबन्हि देखे रघुराई ॥२॥
करहिँ जोहार भेँट धरि आगे। प्रभुहि बिलोकहिँ अति अनुरागे॥
चित्र लिखे जनु जहँ तहँ ठाढे। पुलक-सरीर नयन जल बाढे ॥३॥
राम सनेह मगन सब जाने। कहि प्रिय बचन सकल सनमाने॥
प्रभुहि जोहारि बहोरि बहोरी। बचन बिनीत कहहिं करजोरी ॥४॥
अब हम नाथ सनाथ सब, भये देखि प्रभु पाय॥
भाग हमारे आगमन, राउर कोसलराय ॥१३५॥
धन्यभूमि बन पन्थ पहारा । जहँ जहँ नाथ पाउ तुम्ह धारा ॥
धन्य बिहग भृग काननचारी । सफल जनम अये तुम्हहिँ निहारी ॥१॥
हम सब धन्य सहित परिवारा । दीख दरस भरि नयन तुम्हारा ॥
। कीन्ह बास भल ठाउँ बिचारी । इहाँ सकल रितु रहब सुखारी ॥२॥
हम सब माँति करवि सेवकाई । करि-केहरि-अहि-बाध बराई ।
बन बेहड गिरि कन्दर खोहा । सब हमार प्रभु पग पग जोहा ॥३॥
जहँ तहँ तुम्हहि अहेर खेलाउब । सर निरझर भल ठाउँ देखोउब ॥
हम सेवक परिवार समेता। नाथ न सकुचन आयसु देता ॥४॥
बेद-बचन मुनि-मन-अगम, ते प्रभु करुना अयन ।
बचन किरातन्ह के सुनत, जिमि पितु बालक-बयन ॥१३६॥
रामहि केवल प्रेम पियारा। जानि लेउ जो जाननिहारा ।
राम सकल बनचर तब तोष। कहि मृदु बचन प्रेम परिपोषे ॥१॥
आँगरी पहिरि कूँडि सिरऽ धरहीं । फरसा बाँस सेल सम करहीं।
एक कुसल अति ओडन खांडे । कूदहिँ गगन मनहुँ छिति छाँडे ॥३॥
निज निज साज समाज बनाई । गुह राउतहिं जोहारे जाई ॥
देखि सुमट सब लायक जाने। लै लै नाम सकल सनमाने ॥४॥
भाइहु लावहु धोख जनि, आजु काज बड मोहि।
सुनि सरोष बोले सुमट , बीर अधीर न होहि ॥१६१॥
राम-प्रताप नाथ बल तोरे । करहिँ कटक बिनु भट बिनु घोरे॥
जीवत पाउं न पाछे घरहीं। रुड-मुंड-मय-मेदिनि करहीं ॥१॥
देखि निषाद-नाथ भल टोलू । कहेउ बजाउ जुझाऊ, ढोलू ॥
एतना कहत छौंक भै बाा़यं । कहेउ सगुनिअन्ह खेत सुहायें ॥२॥
बूढ एक कह सगुन बिचारी । भरतहि मिलिय न होइहि रारी ॥
रामहि भरत मनावन जाहीं । सगुन कहै अस विग्रह नाहीं ॥३॥
सुनि गुह कहै नीक कह बूढा। सहसा कर पछिताहिँ बिमूढा।
भरत सुभाउ सील बिनु बूझे । बडि हितहानि जानिबिनु जूझे ॥४
गहहु घाट घट समिटि सब, लेउँ मरम मिलि जाइ ।
बूझि मित्र अरि मध्य गति, तब तस करिहौँ आइ ॥१६२॥
लखब सनेह सुभाय सुहाये । वैर प्रीति नहिं दरै दुराये ॥
अस कहि भेंट सँजोवन लागे । कन्द मूल फल खगमृग माँगे ॥१॥
मीन पीन पाठीन पुराने । भरि भरि भार कहारन्ह आने ॥
मिलन साज सजि मिलन सिधाये । मङ्गल-मूल सगुन सुभ पाये ॥२॥
देखि दूरि ते कहि निज नाभू । कीन्ह मुनीसहि दंडप्रनामू ॥
जानि राम प्रिय दोन्हि असीसा । भरतहि कहेउ बुझाइ मुनीसा ॥३॥
रामसखा सुनि स्यन्दन त्यागा। चले उत्तरि उमगत अनुरागा
गाउँ जाति गुह नाउँ सुनाई । कीन्ह जोहार माथ महि लाई ॥४॥
करत दंडवत देखि तेहि, भरत लीन्ह उर लाइ।
मनहुँ लखन सन भेॅट भै, प्रेम न हृदय समाइ॥१३॥
भैंटत भरत ताहि अति प्रीती। लोग सिहाहिँ प्रेम के रीती।
धन्य धन्य धुनि मङ्गल-मूला । सुर सराहि तेहि बरिसहिॅ फूला ॥१॥
लोक वेद सब भाँतिहि नीच। । जासु छाँह छुइ लेइय सीॅचा ॥
तेहि भरि अङ्क राम लघु भ्राता। मिलत पुलक परिपूरित गाता ॥२॥
राम राम कहि जे जमुहाहीॅ । तिन्हहिँ न पाप-पुज समुहाहीॅ ।
एहि तो राम लाइ उर लीन्हा । कुल समेत जग पावन कीन्हा ॥३॥
करमनास जल सुरसरि परई । तेहि को कहहु सीस नहिॅ धरई ॥
उलटा नाम जपत जग जानो। बालमीकि भये ब्रह्म समाना॥।४॥
स्वपच सबर खस जमन जड, पाँवर कोल किरात ।
राम कहत पावन परम, होत भुवन विख्यात ॥ १४ ॥
नहिॅ अचरज जुग जुग चलि आई। केहि नदीन्हि रघुबीर बडाई।
राम-नाममहिमासुर कहहीॅ। सुनि सुनिअवध-लोग सुखलहहीॅ ॥१॥
रामसखहि मिलि भरत सप्रेमा। पूछी कुसल सुमङ्गल बेमा ।
देखि भरत कर सील-सनेहू । भा निषाद तेहि समय विदेहू ॥ २ ॥
सकुच सनेह माद मन बाढा । भरतहि चितवत एकटक ठाढा ॥
धरि धीरज पद बन्दि बहारी । बिनय सप्रेम करत कर जोरी ॥३॥
कुसल-मूल पद-पङ्कुजऽ पेखी । मैं तिहुँ-काल कुसल निज लेखी॥
अब प्रभु परम-अनुग्रह तोरे । सहित कोटि-कुल-मङ्गल मोरि ॥४॥
समुझि मोरि करतूति कुल, प्रभु महिमा जिय जोइ ।
जो न भजै रघुधीर-पद, जग बिधि बञ्चित सोइ ॥१९५॥
कपटी कायर कुमति कुजाती। लोक बेद बाहेर सब भाँती॥
राम कीन्ह आपन जबही तेॉ । भयौँ भुवन-भूषन तबही तेॅ ॥१॥
देखि प्रीति सुनि बिनय सुहाई । मिलेउ बहोरि लखन लघु भाई ॥
कहि निषाद निज नाम सुबानी। सादर सकल जोहारी रानी ॥२॥
जानि लखन सम देहिॅ असीसा । जियहु सुखी सय लाख बरीसा ॥
निरखि निषाद नगर-नर-नारी । भये सुखी जनु लखन निहारो॥३॥
कहहिॅ लहेउ एहि जीवन-लाहू। मैॅटेउ राम-भद्र भरि बाहू॥
सुनि निषाद निज-भाग बडाई। प्रमुदित मन लै चलेउ लेबाई ॥४॥
सनकारे सेवक सकल, चले स्वामि रुख. पाइ।
घर तरु-तर सर बाग बन, बास बनायन्हि जाइ ॥ १६ ॥
सङ्गबेर पुर भरत दीख जब । भे सनेह-बस अङ्ग सिथिल तब ॥
सहित दिये निषादहि लागू । जनु तनु धरे बिनय अनुरागू ॥१॥
एहि बिधि भरत सेन सब सङ्गा । दीख जाइ जग-पावनि गङ्गा ।
रामघाट कहॅ कीन्ह प्रनामू ।मा मन मगन मिले जनु रामू ॥२॥
करहिॅ प्रनाम नगर नर-नारी । मुदित ब्रह्म-मय बारि निहारी ॥
करि मञ्जन माँगहिॅ कर जोरी। रामचन्द्र-पद प्रीति न धोरी ॥३॥
भरत कहेउ सुरसरि तव रेनू । सकल सुखद सेवक सुरधेनू ॥
जोरि पानि बर माँगौँ एहू।सीय:राम-पद सहज सनेहू ॥४॥
एहि बिधि मज्जन अरत करि, गुरु अनुसासन पाइ ।
मातु नहानी जानि सब, डेरा चले लेवाइ ॥ १९७ ॥
जह तहॅ लोगन्ह डेरा कीन्हा। भरत सोध सब ही कर लीन्हा।
गुरु सेवा करि आयसु पाई। राम-मातु पहिँ गे दोउ भाई ॥१॥
चरन चाँपि कहि कहि मृदु बानी ।जननी सकल भरत सनमानी॥
भाइहि सैॅपि मातु-सेवकाई। आपु निषादहि लीन्ह बोलाई॥२॥
चले सखा कर सौँ कर जोरे । सिथिल सरीर सनेह न थोरे।
पूछत सखहि सेआ ठाउँ देखाऊ । नेकु नयन मन जरनि जुडाऊ ॥३॥
जहॅ सिय-राम-लखन निसि सोये । कहत अरे जन लोधन कोये ॥
भरत बचन सुनि भयौ बिषादू । तुरत तहाँ लेइ गयौ निषादू ॥४॥
जहँ सिंसुपा पुनीत तरु, रघुबर किय विश्राम ।
अति सनेह सादर अरत, कीन्हेउ दंड प्रनाम ॥१६८॥
कुस साथरी निहारि सुहाई। कीन्ह प्रनाम प्रदच्छिन जाई ।
चरन रेख रज आँखिन्ह लाई। बनै न कहत प्रीति अधिकाई ॥१॥
कनकबिन्दु दुइ ऽ चारिक देखे । राखे सीस सीय सम लेखे ॥
सजल बिलोचन हृदय गलानी। कहत सखा सन बचन सुबानी ॥२॥
श्रीहत सीय-बिरह दुति-हीना । जथा अवध नर-नारि मलीना ॥
पिता जनक देउँ पटतर केहो । करतल भाग जोग जग जैही ॥३॥
ससुर भानुकुल-भ्रानु झुआलू । जेहि सिहात अमरावति-पालू ।
प्राननाथ रघुनाथ गोसाँई । जो बड होत से राम बडाई ॥४॥
पतिदेवता सुलीय मुनि, सीय साथरी देखि।
बिहरत हृदय न हहरि हर, पबि तें कठिन बसेखि ॥१६६॥
लालन जोग लखन लघु लोने । भे न भाइ असॅ अहहिँ न होने ॥
पुरजन प्रिय पितु-मातु दुलारे । सिय-रघुबीरहि प्रान-पियारे ॥१॥
मृदु भूरति सुकुमार सुभाऊ। तात बाउ तन लाग न काऊ।
ते बन सहहिँ बिपति सब भाँती । निदरे कोटि कुलिस ऐहि छाती ॥२॥
राम जनमि जग कीन्ह उजागर । रूप-सील-सुख सब गुन सागर।
परिजन पुरजन गुरु पितु माता । राम सुमाउ सबहि सुख-दाता ॥३॥
बैरिउ राम बडाई करहीॅ। बोलनि मिलनि बिनय मन हरहीॅ।
सादर कोटि कोटि सत सेखा। करि न सकहिॅ प्रभु-गुन-गन लेखा ॥४॥
सख सरूप रघुबंस-मनि,मङ्गल-माद-निधान ।
ते सावत कुस डोसि महि, विधि गति अति बलवान ॥२००।
राम सुना दुख कान न काऊ । जीवन-तरु जिमि जोगवै राऊ॥
पलकनयनफनि-मनि जेहि माँती। जोगवहिँ जननि सकल दिन राती ॥१॥
ते अब फिरत बिपिन पद-चारी। कन्द-मूल-फल-फूल अहारी ॥
धिग कैकई अमङ्गल मूला । भैसि प्रान-प्रियतम प्रतिकूला ॥२॥
मैॅ धिगधिग अघ-उदधि अभागी । सब उतपात भयहु जेहि लागी॥
कुल-कलङ्क करि सृजेउ बिधाता । साँइ-दोह मेआहि कीन्ह कुमाता ॥३॥
मुनि सप्रेम समुझाव निषादू । नाथ · करिय कत्त बादि बिषादू ॥
राम तुम्हहिँ प्रियतुम्ह प्रिय रामहिॅ । यह निरजोसदोसबिधि बामहिॅ ॥४॥
बिधि बाम को करनी कठिन जेहि, मातु कोन्ही बावरी।
तुलसी न तुम्ह सेॅ राम प्रीतम, कहत हैॅ सैहैॅ किये ।
परिनाम मङ्गल जानि अपने, आनिये धीरज हिये ॥८॥
अन्तरजामी राम, सकुच सप्रेम कृपायतन।
चलिय करिय बिस्राम, यह विचार दृढ आनि मन ॥२०१॥
सखा बचन सुनि उर धरि धीरा । बास चले सुमिरत रघुबीरा ॥
यह सुधि पाइ नगर नर-नारी । चले बिलोकन आरत भारी ॥१॥
परदछिना करि करहिॉ प्रनामा । देहिॅ कैकाहि खोरि निकामा ।
भरि भरि बारि बिलोचन लेहौं । बाम विधातहि दूषन देहीॅ ॥२॥
एक सराहहिॅ भरत सनेहू । कोउ कह नृपति निबाहेउ नेहूं ॥
निन्दहिँ आपु सराहि निषादहि । को कहि सकै बिमाह बिषादहि ॥३॥
एहि बिधि राति लोग सब जागा । भा भिनुसार गुदारा लागा ॥
गुरुहि सुनाव चढाइ सुहाई । नई नाव सब मातु चढाई ॥४॥
प्रातक्रिया करि मातु-पद, बन्दि गुरुहि सिर नाइ॥
आगे किये निषाद-गन, दीन्हेउ कठक चलाइ ॥२०२॥
थ-कियेउ निषादनाथ अगुआई । मातु पालको सकल चलाई ॥
साथ बोलोइ भाइ लघु दीन्हा । बिप्रन्ह सहित गवन गुरु कीन्हा ॥१॥
आपु सुरसरिहि कीन्ह प्रनामू। सुमिरे लखन सहित सिय-रामू ॥
गवने भरत पयादेहि पाये । कोतल सङ्गजाहि डोरि आये ॥२॥
कहहिॅ सुसेवक बारहिँ बारा । होइय नाथ अस्व असवारा ॥
राम पयादेहि-पाय सिधाये । हम कहॅ रथ गज बाजि बनाये ॥३॥
सिर भर जाउँ उचित अस मोरा। सब तें सेवक-धरम कठोरा ॥
देखि भरत-गति सुनि मृदु बानी। सब सेवक-गन गरहिॅ गलानी ॥४॥
भरत तीसरे पहर कहॅ, कीन्ह प्रबेस प्रयाग।
कहत रामसिथ रामसिय, उमगि उमगि अनुराग ॥ २०३ ॥
झलका झलकत पायन्ह कैसे । पङ्कज-कोस ओस-कन जैसे।
भरस पयादेहि आये आजू । भयौ दुखित सुनि सकल समाजू ॥१॥
खबरि लीन्ह सब लोग नहाये । कीन्ह प्रनाम त्रिबेनिहि आये ।
सबिधि सितासित-नीर नहाने । दिये दान महिसुर सनमाने ॥२॥
देखत स्यामल-धवल हलोरे । पुलकि सरीर भरत करजोर।
सकल काम-प्रद तीरथराऊ । बेद-बिदित जग प्रगट प्रभाऊ॥३॥
माँगौँ भीख त्यागि निज-धरमू । आरत काह न करै कुकरमू
अस जिय जानि सुजान सुदानी।सफल करहिॅ जग जाचक बानी ॥४॥
अरथ न धरम न काम-रुचि, गति न चहौँ निरबान ।
जनम जनम रति राम-पद, यह बरदान न आन ॥ २०४ ॥
जानहु राम कुटिल करि मोही। लोग कहौ गुरु-साहिब-द्रोही ॥
सीता-राम-चरन रति मोरे । अनुदिन बढौ अनुग्रह तोरे ॥ १ ॥
जलद जनम-भरि सुरति बिसारौ । जाचत जल पबि पाहन डारौ ॥
चातक-रटानि घटे घटि जाई। बढे प्रेम संब भाॅति भलाई ॥२॥
कनकहि बान चढै जिमि दाहे । तिमि प्रियतम-पद नेम निबाहे ॥
भरत बचन सुनि माँझ त्रिबेनी । भै मृदु-बानि सुमङ्गल देनी ॥३॥
तात भरत तुम्ह सब बिधि साधू । रामचरन अनुराग अगाधू ॥
यादि गलानि करहु मन माहीॅ । तुम्ह सम रामहि कोउ प्रिय नाहीॅ॥४॥
तनु पुलकेउ हिय हरष सुनि, बेनि बचन अनुकूल ।
भरत धन्य कहि धन्य सुर, हरषित बरषहिँ फूल ॥२०५॥
प्रमुदित तीरथराज-निवासी। बैषानस बटु गृही उदासी ॥
कहहिॅ परस्पर मिलि दसपाँचा । भरत सनेहसील सुचि साँचा ॥१॥
सुनत राम गुनग्राम सुहाये। भरद्वाज मुनिबर पहिॅ आये ।
दंड प्रनाम करत मुनि देखे । मूरतिवन्त भाग्य निज लेखे ॥२॥
धाइ उठाइ लाइ उर लीन्हे । दोन्हि असीस कृतारथॅ कीन्हे ॥"
आसन दीन्ह नाइ सिर बैठे । चहत सकुच गृह जनु भजि पैठे ॥३॥
मुनि पूछब कछु यह बड साचू । बोले रिषि लखि सील सँकोचू ॥
सुनहु भरत हम सब सुधि पाई। विधि करतब पर किछु न बसाई ॥४॥
तुम्ह गलानि जिय जनि करहु, समुझि मातु करतूति ।
तात कैकैहि दोष नहि, गई गिरा मति धूति ॥२०६॥
यहौ कहत भल कहिहि न कोऊ । लोक-बेद बुध सम्मत दोऊ ।
तात तुम्हार बिमल-जस गाई । पाइहि लोकहु-बेद बडाई ॥१॥
लोक बेद सम्मत सब कहई । जेहि पितु देइ राज सो लहई ।
राउ सत्य-व्रत तुम्हहिँ बोलाई । देत राज-सुख धरम बडाई ॥२॥
राम-गंवन-बन अनरथ-मूला । जो सुनि सकल बिस्व भै सूला ।
भावी-बस. रानि अयानी । करि कुचाल अन्तहु पछित्तानो ॥३॥
तहौँ तुम्हार अलप अपराधू । कहै से अधम अयान असाधू ॥
करतेहु राज त तुम्हहिँ न दोसू । रामहिॅ होत सुनत सन्तोसू ॥४॥
अब अति कीन्हेहु मरत भल, तुम्हहिॅ उचित मत एहु ।
सकल सुमङ्गल-मूल जग, रघुबर चरन सनेहु ॥ २०७॥
से तुम्हार धन जीवन प्राना । भूरि-भाग को तुम्हहिँ समाना।
यह तुम्हार आंचरज न ताता। दसरथ-सूअन राम-प्रिय-भ्राता॥१॥
सुनहु भरत रघुबर मन माहीॅ। प्रेमपात्र तुम्ह सम कोउ नाहीॅ।
लखन राम सीतहि अति प्रीती। निसि सब तुम्हहिँ सराहत बीती ॥२॥
जाना मरम नहात प्रयागा। मगन होहिॅ तुम्हरे अनुरागा।
तुम्ह पर अस सनेह रघुबर के । सुखजीवन जग जस जडनर के ॥३॥
यह न अधिक रघुबीर बडाई । प्रनत-कुटुम्ब-पाल रघुराई।
तुम्ह तौ भरत भार मत एहू। धरे देह जनु राम-सनेहू ॥४॥
तुम्ह कहँ भरत कलङ्क यह, हम सब कहँ उपदेस ।
रामभगति-रस सिद्धि-हित, मा यह समौ गनेस ॥ २०८॥
नव-बिधु-बिमल तात जस तोरा । रघुबर-किङ्कर-कुमुद चकोरा ॥
उदित सदा अथैहि कबहूँ ना। घटिहि न जग नभ दिन दिन दूना॥१॥
कोक तिलोक प्रीति अति करिहीं । प्रभु प्रताप-रबिछबिहि न हरिहीॅ।
निसि दिन सुखद सदा सब काहू । ग्रसिहि न कैकै करतब राहू ॥२॥
पूरन राम सुप्रेम पियूषा । गुरु-अपमान दोष नहिँ दूषा ।
रामभगत अब अमिय अघाहू । कीन्हेहु सुलभ सुधा बसुधाहू ॥३॥
भूप भगीरथ सुरसरि आनी । सुमिरत सकल सुमङ्गल-खानी ॥
दसरथ-गुन-गन बरनि न जाहीॅ । अधिक कहा जेहि सम जगनाहीं ॥४॥
जासु सनेह सकोच बस, राम प्रगट भये आइ ।
जे हर-हिय-नयननि कबहुँ, निरखे नहीॅ अघाइ ॥२०६॥
कीरसि-बिधु तुम्ह कीन्हि अनूपा । जहँ वस राम-प्रेम मृग-रूपा।
तात गलानि करहु जिय जाये । डरहु दरिद्रहि पारस पाये ॥१॥
सुनहु भरत हम झूठ न कहहीॅ। उदासीन तापस बन रहहीॅ ॥
सब सोधन कर सुफल सुहावा । लखन राम सिय दरसन पावा ॥२॥
तेहि फल कर फल दरस तुम्हारा । सहित प्रयाग सुभोग हमारा॥
भरत धन्य तुम्ह जग जस जयऊ । कहि अस प्रेम मगन मुनि भयऊ ॥३॥
सुनि मुनि बचन सभासद हरषे । साधु सराहि सुमन सुर बरषे ।
धन्य धन्य धुनि गगन प्रयागा । सुनि सुनि भरत मगन अनुरागा ॥४॥
पुलक-गात हिय-रामसिय, सजल सरोरुह नयन ।
करि प्रनाम मुनि मंडलिहि, बोले गदगद बयन ॥२१०॥
मुनि समाज अरु तीरथराजू । साँचिहु सपथ अघाइ अकाजू ॥
एहि थल जैॉ किछु कहिय बनाई । एहि सम अधिक न अंघ अधमाई ॥१॥
तुम्ह सर्बज्ञ कहौँ सतिभाऊ । उर-अन्तरजामी रघुराऊ॥
मोहि न मातु करतब कर सोचू । नहिॅ दुख जिय जग जानहि पोचू ॥२॥
नाहि न डर बिगरिहि परलोकू । पितहु मरन कर मोहि न सेकू ।
सुकृत सुजस भरि भुवन सुहाये । लछिमन राम सरिस सुत पाये ॥३॥
राम-बिरह तजि तनु छनङ्ग । भूप सोच कर कवन प्रसङ्ग ॥
राम-लखन-सिय बिनु पग पनहीॅ । करि मुनि बेष फिरहिँ बन बनहीॅ॥४॥
अजिन-बसन फल-असन महि,-सयन डासि कुस पात ।
बसि तरु-तर नित सहत हिम, आतप बरषा बात ॥ २११ ॥
एहि दुख दाह दहै दिन छाती । भूख न बासर नीॅद न राती ॥
एहि कुरोग कर औषध नाहीॅ । सोधेउँ सकल विस्व मन माहीॅ॥१॥
मातु कुमत बढई अघ-मूला । तेहि हमार हित कीन्ह वसूला ॥
कलि-कुकाठ कर कीन्ह कुजन्त्रू । गाडि अवध पढि कठिन कुमन्त्रू ॥२॥
मोहि लगि यह कुठाट तेहि ठाटा । घालेसि सब जग बारहबाटा।
मिटै कुजोग राम फिरि आये। बसै अवध नहिॅ आन उपाये ॥३॥
भरत बचन सुन मुनि सुख पाई । सबहि कोन्हि बहु भाँति बडाई ।
तात करहु जनि सोच बिसेखी । सब दुख मिट्रिहि राम-पग देखी ॥४॥
करि प्रबोध मुनिबर कहेउ, अतिथि प्रेम-प्रिय हाहु ।
कन्द मूल फल फूल हम, देहिॅ लेहु करि छोहु ॥२१२॥
सुनि मुनि बधन भरत हिय सोचू । भयौ कुअवसर कठिन सँकोचू ॥
जानि गरुइ गुरु गिरा बहोरी । चरन-बन्दि बोले करजोरी ॥१॥
सिर धरि आयसु करिय तुम्हारा । परम धरम यह नाथ हमारा ॥
भरत बचन मुनिबर मन भाये । सुचि सेवक सिष निकट बोलाये ॥२॥
चाहिय कीन्हि भरत पहुनाई। कन्द मूल फलॅ आनहु जाई ।
भलेहि नाथ कहि तिन्ह सिर नाये। प्रमुदित निज निज काज सिधाये ॥३॥
मुनिहि सोच पाहुन बड नेवता । तसि पूजा चाहिय जस देवता ।
सुनि रिधि सिधि अनिमादिक आई। आयसु होइ सो करहिॅ गोसाई ॥४॥
राम-बिरह व्याकुल भरत, सानुज सहित समाज ।
पहुनाई करि हरहु बम, कहा मुदित मुनिराज ॥२१३॥
रिधि-सिधिसिर धरि मुनिबरबानी। बडलागिनि आपुहि अनुमानी॥
कहहि परसपर सिधि समुदाई । अतुलित अतिथि रामलघु भाई ॥१॥
मुनि-पद बन्दि करिय सोइ आजू । हाइ सुखी सब राज-समाजू ॥
अस कहि रचे रुचिर गृह नाना । जो बिलोकि बिलखाहिँ विमाना॥२॥
भोग-बिभूति भूरि भरि राखे । देखत जिन्हहिॅ अमर अभिलाखे ।
दासी दास साज सब लीन्हे । जोगवत रहहिँ मनहिॅ मन दीन्हे ॥३॥
सब समाज सजि सिधि पल माहीॅ । जे सुख सुरपुर सपनेहुँ नाही
प्रथमहिँ बास दिये सब केही । सुन्दर सुखद जथारचि जेही॥४॥
बहुरि सपरिजन भरत कहँ, रिषि अस आयसु दीन्ह ।
विधि-बिसमय-दायक बिभव, मुनिबर तप बल कीन्ह॥२१४॥
मुनि प्रभाव जब भरत बिलोका । सब लघु लगे लोकपति लोका ॥
सुख समाज नहि जाइ बखानी। देखत बिरति बिसारहिँ ज्ञानी॥१॥
आसन सयन सुबसन बिताना । बन बाटिका बिहग मृग नाना ॥
सुरभि-फूल फल-अमिय समाना । बिमल जलासय विविध विधाना॥२॥
असन पान सुचि अमिय अमी से । देखि लोग सकुचात जमी से ॥
सुर-सुरजी सुरतरु सबही के । लखि अभिलाष सुरेस सची के ॥३॥
रितु-बसन्त वह त्रिबिधि बयारी । सब कहँ सुलभ पदारथ चारी ॥
सक चन्दन बनितादिक भोगा । देखि हरष-बिसमय बस लोगा॥४॥
सम्पत्ति-चकई मरत-चक, मुनि-आयसु खेलवार ।
तेहि निसि आस्रम पिजरा, राखे भा भिनुसारः ॥२१५॥
कीन्ह निमज्जन तीरथराजा । नाइ मुनिहि सिर सहित समाजा॥
रिषिआयलु असीस सिर राखी । करि दंडवत बिनय बहुमाखी ॥१॥
पथ-गति-कुसल साथ सब लीन्हे । चले चित्रकूटहि चित दोन्हे ॥
राम-सखा दीन्हे लागू। चलत देह धरिजनु अनुरागू ॥२॥
नहिॅ पदत्रान सीस नहि छाया । प्रेम नेम ब्रत धरम अमाया ॥
लखन-राम-सिय पन्थ-कहानी। पूछत सखहि कहत मृदु बानी॥३॥
राम-बास-थल बिपट बिलोके । उर ऽअनुराग रहत नहिँ रोके ।
देखि दसो सुर बरिसहिँ फूला । भै मृदु महि मग मङ्गलमूला ४॥
किये जाहिॅ छाया जलद, सुखद बहै बर बात।
तस मग भयड न राम कहेॅ, जसॅ मा भरतहि जात ॥२१६॥
जड चेतन, मग जीव घनेरे। जे चितये प्रक्षु जिन्ह प्रभु हेरे ।
ते सब मये परम-पद-जोगू। भरत-दरस मेटा भव रोगू ॥१॥
यह बडि बात भरत कै नाही। सुमिरत जिन्हहिॅ राम मन माहीॅ ।
बारक राम कहत जग जेऊ । होत तरन तारन नर तेऊ ॥२॥
भरत राम प्रिय पुनि लघु भ्राता । कस न होइ मग मङ्गल-दाता ॥
सिद्ध साधु मुनिबर अस कहहीॅ । भरतहि निरखि हरष हिय लहहीॅ ॥३॥
देखि प्रभाव सुरेसहि सोचू । जग भल भलेहि पाच कहँ पोचू ॥
गुरु सन कहेउ करिय प्रभु सोई। रामहि भरतहि भैंट न होई ॥
राम सकोची प्रेम-बस, भरत सुप्रेम पयोधि ।
बनी बात बिगरन चहति, करिय यतन छल-सोधि ॥२१७॥
बचन सुनत सुरगुरु मुसुकाने । सहस-नयन बिनु लोचन जाने ॥
कह गुरु बादि छाम छल छाँडू । इहाँ कपट करि होइय भाँडू ॥१॥
मायापति-सेवक सन माया । करै त उलटि परै सुरराया ॥
तब किछु कीन्ह राम-रुख जानी । अब कुचालि करि होइहि हानी ॥२॥
सुनु सुरेस रघुनाथ सुभाऊ । निज अपराध रिसाहिँ न काऊ ॥
जो अपराध भगत कर करई। राम-रोष-पावक सो जरई ॥३॥
लोकहु बेद बिदित इतिहासा । यह महिमा जानहिॅ दुरबासा ।
भरत सरिस को राम-सनही। जग जप राम राम जप जेही ॥४॥
मनहुँ न आनिय अमरपति, रघुबर-भगत अकाज ।
अजस-लोक परलोक-दुख, दिन दिन सोक-समाज ॥२१८॥
सुनु सुरेस उपदेस हमारा । रामहि सेवक परम-पियारा ॥
मानत सुख सेवक सेवकाई । सेवक-बैर बैर-अधिकाई ॥१॥
जद्यपि सम नहिॅ राग न रोषू । गहहिँ न पाय पुन्य गुन दोषू ॥
करम-प्रधान बिस्व करि राखा । जो जस करै सेतस फल चाखा॥२॥
तदपि करहि सम विषम बिहारा । भगत अभगत हृदय अनुसारा ॥
अगुन अलेप अमान एकरस । राम सगुन भये भगत-प्रेम-बस ॥३॥
राम सदा सेवक रुचि राखी । बेद पुरान साधु सुर साखी।
अस जिय जानि तजहु कुटिलाई। करहु भरत-पद-प्रीति सुहाई ॥४॥
राम-भगत परहित-निरत, पर दुख दुखी दयाल ।
भगत-सिरोमनि भरत तँ, जनि डर पहु सुरपाल ॥२१८॥
चै०-सत्यसन्ध प्रभु-सुर-हितकारी । भरत राम-आयसु अनुसारी॥
स्वारथ-निबस बिकल तुम्ह हाहू। भरत दोष नहि राउर माहू ॥१॥
सुनि सुरबर सुरगुरु-बर-बानी । मा, प्रमोद मन मिटी गलानी॥ ।
बरषि प्रसुन्न् हरषि सुरराज । लगे सराहन भरत सुभाऊ ॥२॥
एहि बिधि भरत चले मग जाहीँ । दसा देखि मुनि सिद्ध सिहाही ।
जबहिँ राम कहि लेहि उसासा । उमगत प्रेम मनहुँ. चहुँ पासा ॥३॥
द्रवहिॅ बचन सुनि कुलिस पखाना । पुरजन प्रेम न जाइ बखाना ॥
बीच बास करि जमुनहिँ आये । निरखि नीर लोचन जल छाये ॥४॥
रघुबर-बरन बिलोकि बर, बारि समेत समाज ।
होत मगन बारिधि बिरह, चढे बिबेक जहाज ॥२२०॥
ओ-जमुन-तीर तेहि दिन करि बासू। भयुउ समय सम सन्नहि सुपासू॥
रात ही घाट घाट की तरनी। आई अगनित जाहिँ न बरनी॥१॥
प्रात पार भये एकहि खेवा । तोर्ष रामसखा की सेवा ॥
चले नहाइ नदिहि सिर नाई। साथ निषादनाथ दोउ भाई ॥२॥
आगे मुनिबर बाहन आछे । राज-समाज जाइ सब पाछे
तेहि पाछे दोउ बन्धु पयादि भूषन बसन बेष सुठि सादे ॥३॥
सेवक सुहृद सचिव-सुत साथा। सुमिरत लखन-सीय-रघुनाथा ॥
जहँ जहँ राम बास बिस्रामा। तहॅ तहॅ करहिँ सप्रेम प्रनामा ॥४॥
मग-बासी नर-नारि सुनि, धाम काम तजि धाइ।
देखि सरूप सनेह बस, मुदित जनम फल पाइ ॥२२१॥
कहहिॅ सप्रेम एक एक पाहीॅ । राम-लखन सखि होहिॅ कि नाही।
बय बपु बरन रूप सोइ आली। सील-सनेह-सरिस सम-चाली ॥१॥
बेष न सो सखि. सीय न सङ्गा । आगे अनी चली चतुरङ्गा ।
नहिँ प्रसन्न-मुख मानस-खेदा । सखि सन्देह होइ एहि भेदा ॥२॥
तासु तरक तिय-गन मन मानी । कहहिँ सकल तोहि समन सयांनी ॥
तेहि साहि बानी फुरि पूजी । बोली मधुर बचन तिय दूजी ॥३॥
कहि सप्रेम सब कथा-प्रसङ्ग । जेहि बिधि राम-राज-रस-भङ्गं ॥
भरतहि बहुरि सराहन लागी। सील सनेह सुभाय सुभागी ॥४॥
चलत पयादे खात फल, पिता-दीन्ह तजि राज।
जात मनावन रघुबरहि, भरत सरिस को आज ॥ २२२ ॥
ओ-आयप अगति भरत आचरनू । कहत सुनत दुख-दूषन-हरन् ।
जो किछु कहब थोर सखि साईरांम-बन्धु अस काहि न होई ॥१॥
हम सब सानुज भरतहि देखे । मैन्ह धन्य जुबती-जन लेखे ।
सुनि गुन देखि दसा पछित्ताहीॅ। कैकै जननि जोग सुत नाहीॅ ॥२॥
कोउ कह दूषन रानिहि नाहिन । बिधिसब कीन्ह हमाहिँ जो दाहिन।
कहँ हम लोक-बेद-विधि हीनी । लघु-तिय कुल-करतूतिमलीनी ॥३॥
बसहिँ कुदेस कुगाँव कुशामा । कहँ यह दरस पुन्य-परिनामा ॥
अस अनन्द अचरज प्रति-धामा। जनु मुरु-भूमि कलपतरु जामा ॥४॥
भरत दरस देखत खुलेउ, मग-लोगन्ह कर भाग ।
जनु सिंहल-बासिन्ह अयौ, बिधि-बस सुलभ प्रयाग ॥२२३॥
निजगुनसहित राम-गुन-गाथा । सुनत जाहिँ सुमिरत रघुनाया।
तीरथ मुनि-आस्त्रम सुर-धामा। निरखि निमज्जहिँ करहिॅ प्रनामा॥१॥
मनही मन माँगहिँ बर एहू । सीय-राम-पद-पदुम सनेहू ॥
मिलहिॅ किरात कोल बन-बासी । बैषानस बदु जती उदासी ॥२॥
करि प्रनाम पूछहिँ जेहि तेही। केहि बन लखन-राम-बैदेही ।
ते प्रभु समाचार सब कहहाँ । भरतहि देखि जनम-फल लहहीॅ ॥३॥
जे जन कहहिॅ कुसल हम देखे । ते प्रिय राम-लखन-सम लेखे ॥
एहि बिधि बूझत सबहि सुबानी । सुनत राम-बनबास कहानी ॥४॥
तेहि बासर बसि प्रातही, चले सुमिरि रघुनाथ ।
राम-दरस की लालसा, भरत सरिस सब साथ ॥२२४॥
मङ्गल सगुन होहिॅ सब काहू । फरकहि सुखद बिलोचन- बाहू ॥
भरतहि सहित समाज उछाहू। मिलिहहिँ राम मिटिहि दुख-दाह॥१॥
करत मनोरथ जस जिय जाके । जाहिँ सनेहः सुरा सब छाके ।
सिथिल-अङ्ग पग मर्ग डगि डोलहिँ। बिहबल बचन प्रेम-बस बोलहिँ॥२॥
राम-सखा तेहि समय देखावा । सैल-सिरोमनि सहज सुहावा ।
जासु समीप सरित-पय-तीरा । सीय समेत बसहिॅ दोउ बीरा ॥३॥
देखि करहिँ सब दंड-प्रनामा । कहि जय जानकिजीवन रामा ।
प्रेम मगन अस राज-समाजू। जनु फिरि अवध चले रघुराजू ॥४॥
भरत प्रेम तेहि समय जस, तस कहि सकै न सेषु ।
कबिहि अगम जिमि ब्रह्मसुख, अहमम मलिन जनेषु ॥२२५॥
सकल सनेह शिथिल रघुबर के । गये कोस दुइ दिनकर ढरके।
जल थल देखि बसे निसि बीते । कीन्ह गवन रघुनाथ पिरीते ॥१॥
उहाँ राम रजनी-अवसेखा ! जागे सीय सपन अस देखा।
सहित समाज भरत जनु आये । नाथ बियोग ताप तन ताये॥२॥
सकल मलिन मन दीन दुखारी । देखो सासु आन अनुहोरी ॥
सुनि सिय सपन भरे जल लोचन । भये सोच-बस सोच-विमोचन ॥३॥
लखन सपन यह नीक न हाई । कठिन कुचाह सुनाइहि कोई ।
अस कहि बन्धु समेत नहाने । पूजि पुरारि साधु सनमाने ॥४॥
सनमानि सुर मुनि-बुन्द बैठे, उतर दिसि देखत भये ।
नम धूरि खग मृग भूरि भागे, बिकल प्रभु आत्रम गये ॥
तुलसी उठे अवलोकि कारन, काह चित सचकित रहे ।
सब समाचार किरात कालन्हि, आइ तेहि अवसर कहे ॥८॥
सुनत सुमङ्गल बैन, मन-प्रमोद तन-पुलक-भर ।
सरद सरोरुह नैन, तुलसी भरे सनेह-जल ॥२२६॥
बहुरि सोच बस भे सिय-रवनू । कारन कवन भरत आगवनू ।
एक आइ अस कहा बहोरी । सेन सङ्ग चतुरङ्ग न थोरी ॥१॥
सुनि रामहि भा अति सोचू । इत पितु बच उत बन्धु सकोचू ॥
भरत सुमाउ समुझि मन माहीॅ। प्रभु-चित हित-थिति पावत नाहीॅ॥
समाधान तब भा यह जाने । भरत कहे महँ साधु सयाने ॥
लखन लखेउ प्रभु हृदय खमारू। कहत समय सम नीति-बिचारू ॥३॥
बिनु पूछे कछु कहौँ गोसाँई । सेवक समय न ढीठ ढिठाई।
तुम्ह सर्वज्ञ-सिरोमनि स्वामी । आपनि समुझि कहै अनुगामो ॥४॥
नाथ सुहृद सुठि सरल-चित्त, सील-सनेह-निधान ।
सब पर प्रीति प्रतीति जिय, जानिय आपु समान ॥२२७॥
विषयी जीव पाइ प्रभुताई । मूढ माह-बस होहिॅ जनाई ।
भरत नीति-रत साधु सुजाना । प्रभु-पद-प्रेम सकल जग जाना॥१॥
तेऊ आज राज-पद पाई। चले धरम-मरजाद मिटाई ॥
कुटिल कुबन्धु कुअवसर ताकी। जानि राम बन-बास एकाकी ॥२॥
करि कुमन्त्र मन साजि समाजू । आये करै अकंटक राजू ।
कोटि प्रकार कंलपि कुटिलाई । आये दल बटोरि दाउ भाई ॥३॥
जौँ जिय होति न कपट कुचाली । केहि सोहाति रथ-बाजि-गजाली ।
भरतहि दोष देइ को जाये । जग बौराइ राज-पद पाये ॥४॥
ससि गुरु-तिय-गामी नहुष, चढेउ भूमिसुर जान ।
लोक बेद तेॅ बिमुख भा, अधम न बेन समान ॥ २२८ ॥
सहसबाहु सुरनाथ त्रिसङ्घ । केहि न राजमद दीन्ह कलङ्क ॥
भरत कीन्ह यह उचित उपाऊ । रिपु रिन रञ्च न राखब काऊ ॥१॥
एक कीन्हि नहिॅ भरत भलाई। निदरे राम जानि असहाई ।
समुझि परिहि सोउ आजु बिसेखी । समर सरोष राम-मुख पेखी ॥२॥
एतना कहत नीति-रस भूला । रन-रस-बिटप पुलंक मिस फूला ॥
प्रभु-पद बन्दि सीस रज राखी । बोले सत्य सहज बल भाखी ॥३॥
अनुचित नाथ न मानब मोरा । भरत हमहिॅ उपचार न थोरा।
कह लगि सहिय रहिय मन मारे । नाथ साथ धनु हाथ हमारे ॥४॥
छत्रि-जाति रघुकुल-जनम, राम-अनुज जग जान ।
लातहु मारे चढति सिर, नीच को धूरि समान ॥२२८॥
उठि कर जोरि रजायसु माँगा । मनहुँ बीररस सेवित जागा ॥
बाँधि जटा सिर कसि कटि भाथा । साजि सरासन-सायक हाथा ॥१॥
आजु राम-सेवक जस, लेऊँ । भरतहि समर सिखावन देॐ॥
राम निरादर कर फल पाई । सेविहु समर-सेज दोउ भाई ॥२॥
आइ बना भल सकल समाजू । प्रगट करौँ रिस पाछिल आजू ।
जिमि करि निकर दलै मृगराजू । लेइ लपेटि लवो जिमि बाजू ॥३॥
तैसेहि भरतहि सेन समेता । सानुज निदरि निपातौँ खेता ॥
जौं सहाय कर सङ्कर आई । तौ मारौँ रन राम दोहाई ॥४॥
अति सरोष आंखे लखन, लखि सुनि सपथ प्रवान ।
सभय लोक सब लोकपति, चाहत मारि भगान ॥ २३० ॥
जगमयमगनगगनभैबानी। लखन बाहु-बल बिपुल बखानी ॥
तात प्रताप प्रभाउ तुम्हारा । को कहि सकै को जान निहारा ॥१॥
अनुचित उचित काज कछु होऊ । समुक्ति करियमल कह सब कोऊ ॥
सहसा करि पाछे पछिताही । कहहिँ बेद-बुध ते बुध नाहीॅ ॥२॥
सुनि सुर-बचन लखन सकुचाने । राम-सीय सादर सनमाने ।
कही तात तुम्ह नीति सुहाई । सब त कठिन राज मद भाई ॥३॥
जो अँचवत मांतहिॅ नृप तेई । नाहिँ न साधु-समा जेहि सेई ॥
सुनहु लखन मल मरत सरीसा । बिधि प्रपञ्चमहँ सुना न दीसा ॥४॥
भरतहि होइन राजमद, विधि हरि हर पद पाइ।
कबहुँ कि काँजी सोकरनि, छोर-सिन्धु बिनसाइ ॥२३१॥
तिमिरतरुनतरनिहिमकु गिलई। गगन मग न मकु मेघहि मिलई ।
गो-पद जल बूढहिँ घटाजोनी । सहज छमा बरु छाडै छोनी॥१॥
मसक फूंक मकु मेरु उडाई। होइ न नृप-मद भरतहि भाई ॥
लखन तुम्हार सपथ पितु आना । सुचि सुबन्धु नहिँ भरत समाना ॥२॥
सगुन-छीर अवगुन-जल ताता । मिलै रचै परपञ्च विधाता ।
भरत हंस रबि-बंस-तडागा । जनमि कीन्ह गुन-दोष-विभागा ॥३॥
गहि गुन-पय तजि अवगुन-बारी । निज जस जगत कीन्हि उँजियारी॥
कहत भरत गुन-सील-सुभाऊ । प्रेम-पयोधि मगन रघुराऊ ॥ ४ ॥
सुनि रघुवर-बानी बिबुध, देखि भरत पर हेतु ।
सकल सराहत राम सों, प्रभु को कृपानिकेतु ॥ २३२ ॥
जौं नहोत जग जनम भरत को । सकल धरम-धुर-धरनिधरत को ।
कबि-कुल-अगम भरत-गुनगाथा । को जानै तुम्ह बिनु रघुनाथा ॥१॥
लखन-राम-सिय सुनि सुर-बानी। अति सुख लहेउ न जाइ बखानी॥
इहाँ भरत सब सहित सहाये । मन्दाकिनी पुनीत नहाये ॥२॥
सरित समीप राखि सब लोगा। माँगि मातु गुरु सचिव नियोगा।
चले भरत जहँ सिय-रघुराई । साथं निषादनाथ लघु भाई ॥३॥
समुझि मातु करतब सकुचाहीं । करत कुतरक कोटि मन माहीं ॥
राम-लखन-सिय सुनि ममनाऊँ । उठि जनि अनत जाहिँ तजि ठाऊँ ॥४॥
मातु मते महँ मानि मेहि, जो कछु करहिँ सो थोर ।
अघ अवगुन छमि आदरहिं, समुझि आपनी ओर ॥२३॥
जौँ परिहरहि मलिन मन जानी। जौँ सन मोनहिँ सेवकमानी।
मोरे सरन सम की पनहीं । राम सुस्वामि दोष सब जनहीं ॥१॥
जग जस-भाजन चातक मीना। नेम प्रेम निज निपुन नबीना ॥
अस मन गुनत चले मग जाता । सकुच सनेह सिथिल सब गाता ॥२॥
फेरति मनहिँ मातु-कृत खोरी। चलत भगति-बल धीरज-धोरी॥
जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ । तब पथ परत उताइल पाऊ ॥३॥
भरत दसा तेहि अवसर कैसी । जलप्रवाह जल-अलि गति जैसी ॥
देखि भरत कर सोच सनेहू । मा निषाद तेहि समय विदेहू ॥४॥
लगे होन मङ्गल सगुन, सुनि गुनि कहत निषाद ।
मिटिहि सोच होइहि हरष, पनि परिनाम बिषाद ॥ २३४ ॥
सेवक बचन सत्य सब जाने । आश्रम निकट जाइ नियराने ॥
भरत दीख बन सैल समाजू । मुदित छुधित्त जनु पाइ सुनाजू ॥१॥
ईति भीति जनु प्रजा दुखारी । त्रिबिधि ताप पीडित ग्रह भारी ॥
जाइ सुराज सुदेस सुखारी । होहिं भरतगति तेहि अनुहारी ॥२॥
राम-बास बन सम्पति भ्राजा । सुखी प्रजा जनु पाइ सुराजा॥
सचिव बिराग बिधक नरेसू । विपिन सुहावन -पावन देसू ॥३॥
भट जम-नियम सैल-रजधानी । सान्ति सुमति सुचि सुन्दर रानी ॥
सकल अङ्ग. सम्पन्न सुराऊ. । राम चरन आखित चित चाऊ ॥४॥
जीति मोहि-महिपाल दल , सहित धिबेक भुआल ।
करत अकंटक राज्य पुर, सुख सम्पदा सुकाल ॥२३५॥
बन प्रदेस मुनि-बास घनेरे । जनु पुर नगर गाउँ-गन खेरे।
बिपुल बिचित्र बिहगमृगनाना प्रजा-समाज न जाइ अखाना ॥१॥
खगहा करि हरि बाघ बराहा । देखि महिष वृष साज सराहा ॥
बयर बिहाय चरहिं एक सङ्गा । जहूँ तहँ मनहुँ सेन चतुरङ्गा ॥२॥
झरना झरहिं मत्त गजगाजहिँ । मनहुँ निसान विविध विधि बाजहिं ।
चक चकोर चातक सुक पिकगन । कूजत मज्जु भराल मुदित मन ॥३॥
मलि-गन गावत नाचत मारा । जनु सुराज मङ्गल चहुँ ओरा।
बेलि बिटप तुन सफल सफूला । सब समाज मुद-मङ्गन-मूला ॥४॥
राम-सैल सोमा निरखि, भरत हृदय अति प्रेम ।
तापस तप-फल पाइ जिमि, सुखी सिराने नेम ॥ २३६ ॥
तब केवट ऊँचे चढि धाई। कहेउ भरत सन भुजा उठाई।
नाथ देखियहि बिटप बिसाला । पोकरि जम्बु रसाल तमाला ॥१॥
तिन्ह तरूबरन्ह मध्य बट साहो । मज्जु बिसाल देखि मन मोहा ॥
नील-सघन-पल्लव फल-लाला । अबिचलछाँह सुखद सब काला ॥२॥
मानहुँ तिमिर-अरुन-मय रासी । बिरची बिधि सकेलि सुखमा सी॥
ये तरु सरित समीप गोसाँई । रघुबर परन-कुटी जहँ छाई ॥३॥
तुलसी तरुबर बिबिध सुहाये। कहुँ कहुँ सिय कहुँ लखन लगाये ।
बट-छाया बेदिको बनाई। सिय निज-पानि-सरोज-सुहाई ॥४॥
जहाँ बैठि मुनि-गन सहित, नितं सिय राम सुजान ।
सुनहि कथा इतिहास सब,, आगम-निगम-पुरान ॥ २३७ ॥
सखा बचन सनि बिटप निहारी । उमगे भरत बिलोचन बारी॥
करत प्रनाम चले दोउ भाई। कहत प्रीतिसारद सकुचाई ॥११॥
हरषहिँ निरखि राम-पद-अङ्का । मानहुँ पारस पायेउ रङ्का ।
रज सिर धरि हिय नयनन्हि लावहिं । रघुबरमिलनसरिस सुखपावहिं ॥२॥
देखि भरत-गति अकथ अतीवा । प्रेम-मगन खग-मृग जड जीवा ।
सखहि सनेह-बिबस मग भूला । कहि सुपन्ध सुरबर पहिँ फूला ॥३॥
निरखि सिद्ध साधक अनुरागे। सहज सनेह सराहन लागे ।
होत न भूतल भाउ भरत को। अचर सचर चर अचरज्ञकरत को ॥४॥
प्रेम-अमिय मन्दर-बिरह, भरत-पयोधि गभीर ।
मथि प्रगटेउ सुह-साधु हित, कृपासिन्धु रघुबीर ॥२३८॥
सखा समेत मनोहर जोटा। लखेउ न लखन सघन बन ओटो ।
भरत दीख प्रभु आश्रम पावन । सकल सुमङ्गल-सदन सुहावन ॥१॥
करत प्रबेस मिटे दुख दावा । जनु जोगी परमारथ पावा ।
देखे भरत लखन प्रभु आगे। पूछे बचन कहत अनुरागे ॥२॥
सीस-जटा कटि-मुनि-पट बाँधे । तून कसे कर सर धनु-काँधे ।
बेदो पर मुनि-साधु-समाजू । सीय सहित राजत रघुराजू ॥३॥
बलकल-बसन जटिल तनु स्यामा । जनु मुनि बेष कीन्ह रति कामा ॥
कर कमलनि धनु सायक फेरत । जिय की जरनि हुरत हंसि हेरत ॥४॥
लसत मज्जु मुनि-मंडलो, मध्य सीय-रघुचन्द ।
ज्ञान-सभा जनु तनु धरे, भगति सच्चिदानन्द ॥ २३९ ॥
सानुज सखा समेत मगन मन । बिसरे हरष-सोक-सुख-दुख गन।
पाहि नाथ कहि पाहि गोसाँई । भूतल परे लकुट की नाँई ॥ १ ॥
बचन सप्रेम लखन पहिचाने । करत प्रनाम भरत जिय जाने ।
बन्धु सनेह सरस एहि ओरा । उत साहिब सेवा बरजोरा ॥२॥
मिलि न जाइ नहिँ गुदरत बनई । सुकवि लखन मन की गति भनई ।
रहे राखि सेवा पर भारू । चढी चङ्ग जनु खैंच खेलारू ॥३॥
कहत सप्रेम नाइ महि माथा । भरत प्रनाम करत रघुनाथा ॥
उठे राम सुनि प्रेम अधीरा । कहुँ पट कहुँ निषङ्ग धनु तीरा ॥४॥
बरबस लिये उठाइ उर, लाये कृपानिधान ।
भरत राम की मिलनि लखि, बिसरा सबहि अपान ॥२४०॥
मिलनिप्रीति किमि जाइ बखानी। कवि-कुल-अगम करम मन बानी॥
परम प्रेम पूरन दोउ भाई । मन बुधिचित अहमिति बिसराई ॥१॥
कहहु सुप्रेम प्रगट को करई । केहि छाया कबि मति अनुसरई ॥
कविहि अरथ आखर बल साँचा । अनुहरि ताल गतिहि नट नाँचा ॥२॥
अगम सनेह भरत रघुबर को । जहँ न जाइ मन विधि-हरि-हर को॥
मैं कुमति कहौँ केहि भाँती। बाज सुराग कि गाँडर ताँती ॥३॥
मिलनि बिलोकि भरत रघुवर की। सुर-गन सभय धकधकी घर की ॥
समुझाये सुरगुरु जड जागे । बरसि प्रसून प्रसंसन लागे ॥४॥
मिलि सप्रेम रिपुसूदनहिँ, केवट भेंटेउ राम ।
भूरि भाय भेंटे भरत, लछिमन करत प्रनाम ॥२४१॥
भेंटेउ लखन ललकि लघु भाई । बहुरि निषाद लोन्ह उर लाई ॥
पुनि मुनि-गन दुहुँ भाइन्ह बन्दे । अभिमत आसिष पाइ अनन्दे ॥१॥
सानुज भरत उमगि अनुरागा । सिर धरि सिय-पद-पदुम-परागा ।
पुनि पुनि करत प्रनाम उठाये। सिर कर-कमल-परसि बैठाये ॥२॥
सीय असीस दोन्हि मन माहीं। मगन सनेह देह सुधि नाहीं॥
सब विधि सानुकूल लखि सीता । थे निसाच उर अपडर बीता ॥३॥
कोउ किछु कहै न कोउ किछु पूछा। प्रेम भरा मन निज-गति छूछा ॥
तेहि अवसर केवट धीरज धरि । जोरि पानि बिनवत प्रनाम करि ॥४॥
नाथ साथ मुनिनाथ के, सातु सकल पुर लोग।
सेवक सेनप सचिव सब, आये बिकल बियोग॥२४२॥
सीलसिन्धु सुनि गुरु आगवनू । सिय समीप राखे रिपुदवनू ॥
चले सबेग राम तेहि काला । धीर धरम-धुर दीनदयाला ॥१॥
गुरुहि देखि सानुज अनुरागे । दंड-प्रनाम करन प्रनु लागे ।
मुनिबर धाइ लिये उर लाई । प्रेम उमगि भैंटे दोउ भाई ॥ २ ॥
प्रेम पुलकि केवट कहि नामू । कीन्ह दूरि तें दंड-प्रनामू ॥
राम-सखा रिषि भरबस भेंट । जनु महि लुटत सनेह समेटा ॥ ३ ॥
रघुपति-भगति सुमङ्गल-मूला । नभ सराहि सुर बरिषहिँ फूला ॥
एहि सम निपट नीच कोउ नाहीं । बड बसिष्ठ सम को जग माहीं ॥४॥
जेहि लखि लखनहुँ से अधिक, मिले मुदित मुनिराउ ।
सीतापति भजन को, प्रगट प्रताप प्रभाउ ॥२४३॥
आरत लोग राम सब जाना । करुनाकर सुजान भगवाना ॥
जो जेहि माय रहा अभिलाखी। तेहि तेहि कै तसि तसि रुख राखी॥१॥
सानुज मिलि पल महं सब काहू । कीन्हि दूरि दुख-दारुन-दाहू ॥
यह बडी बात राम के नाहीं । जिमि घट-कोटि एक रबि छाहीं ॥२॥
मिलि केवटहि उमगि अनुरागा । पुरजन सकल सराहहिँ भागा ॥
देखो राम दुखित महंतारी। जनु सुबेलि-अवली हिम मारी ॥३॥
प्रथम राम भेंटी कैकेई । सरल सुभाय भगति मत्ति भैई ।
पग परि कीन्ह प्रबोध बहोरी।काल करमबिधि सिर धरि खोरी ॥४॥
भेंटी रघुबर मातु सब, करि प्रबोध परितोष ।
अम्ब ईस आधीन जग, काहु न देइय दोष ॥२४४॥
गुरु तिय पद बन्दे दुहुँ भाई । सहित बिप्र लिय जे सँग आई।
गंग गौरि सम सब सनमानी । देहिँ असीस मुदित मृदु बानी ॥१॥
गहि पद लगे सुमित्रा अकां । अनु अँटी सम्पत्ति अति रकां ॥
पुनि जननी चरनन्हि दोउ भ्राता। परे प्रेम व्याकुल सब माता ॥२॥
अति अनुराग अम्ब उर लाये। नयन सनेह सलिल अन्हवाये ॥
तेहि अवसर कर हरष बिषादू । किमि कवि कहै मूक जिमि स्वादू ॥३॥
मिलि जननिहि सानुज रघुराऊ । गुरु सन कहेउ कि धारिय पाऊ ॥
पुरजन पाइ मुनीस नियोगू । जल थल तकि तकि उतरे लोगू ॥४॥
महिसुर मन्त्री मातु गुरु, गने लोग लिय साथ ।
पावन आश्रम गवन किय,भरत लखन रघुनाथ ॥२४५॥
सीय आइ मुनिबर पग लागी । उचित असीस लही मन माँगी।
गुरु-पतिनिहि मुनि-तियन्ह समेता। मिली प्रेम कहि जाइ न जेता॥१॥
बन्दि बन्दि पग सिय सबही के। आखिरबचन लहे प्रिय जी के ।
सासु सकल जब सीय निहारी । मूंदे नयन सहमि सुकुमारी ॥२॥
परी बधिक बस मनहुं मराली । काह कीन्ह करतार कुचाली ॥
तिन्ह सिय निरखि निपट दुख पावा। सो सब सहिय जो दैउ सहावा ॥३॥
जनक-सुता तब उर धरि धीरा । नील-नलिन-लोयन भरि नीरा ॥
मिली सकल सासुन्ह सिय जाई । तेहि अवसर करुना महि छाई ॥४॥
लागि लागि पग सबनि सिय, भेंटति अति अनुराग ।
हृदय असीसहिँ प्रेम-बस, रहिहहु भरी सोहाग ॥२४६॥
नृप कर सुरपुर-गवन सुनावा । सुनि रघुनाथ दुसह दुख पावा ।
मरन-हेतु निज-नेह बिचारी । भे अति बिकल धीर-धुर-धारी ॥२॥
कुलिस-कठोर सुनत कटु बानी। बिलपत लखन सीय सब रानी ॥
क बिकल अति सकल समाजू । मानहुँ राज अकाजेउ आजू ॥३॥
सुनिबर बहुरि राम समुझाये । सहित समाज सुसरित नहाये ॥
व्रत निरम्बु तेहि दिन प्रभु कीन्हा । मुनिहु कहे जल काहु न लीन्हा॥४॥
भोर भये रघुनन्दनहिं, जो मुनि आयसु दोन्ह ।
सध्दा भगति समेत प्रभु, सो सब सादर कीन्ह ॥ २४७ ॥
ओ-करि पितु क्रिया बेद जसि बरनी । भे पुनीत पातक-तम-तरनी।
जासु नाम-पानक अघ-तूला । सुमिरत सकल सुमगंल-मूला ॥१॥
सुद्ध सो भयौ साधु-सम्मत अस । तीरथ आवाहन सुरसरि जस ॥
सुद्ध भये दुइ बासर बीते । बाले गुरु सन राम पिरीते ॥२॥
नाथ लोग सब निपट दुखारी । कन्द मूल फल अम्बु अहारी ॥
सानुज भरत सचिव सब माता। देखि मोहि पल जिमि जुग जाता ॥३॥
सब समेत पुर धारिय पाऊ । आपु इहाँ अमरावति राऊ ॥
बहुत कहेउँ सब कियेउँ ढिठाई । उचित होइ तस करिय गोसाँई ॥४॥
धरम-सेतु करुनायतन, कल न कहहु अस राम ।
लोग दुखित दिन दुइ दरस, देखि लहहुँ बिश्राम ॥ २४८ ॥
राम बचन सुनि सभय समाजू। जनु जलनिधि महं बिकलजहाजू॥
सुनि गुरु गिरा सुमगंल-मूला । भयौ मनहुँ मारुत अनुकूला ॥१॥
पावन पय तिहुँ काल नहाहीं । जो बिलोकि अघ-ओघ नसाहीं ।
मगंल-मूरति लोचन भरि भरि । निरखहिं हरषि दंडवत करि करि ॥२॥
राम-सैल-बन देखन जाहीं । जहँ सुख सकल सकल दुख नाहीं ॥
झरना झरहिं सुधा सम बारी । त्रिबिधि ताप हर त्रिबिधि बयारी ॥३॥
बिटप बेलि तृन अगनित जाती । फल प्रसून पल्लव बहु भाँती ॥
सुन्दर सिला सुखद तरु छाहीं । जाइ बरनि बन छबि केहि पाहीं ॥४॥
सरनि-सरोरुह जल बिहग, कूजत गुञ्जत भृगं ।
बैर-बिगत बिहरत बिपिन, मृग बिहगं बहु रगं ॥२४९॥
कोल किरात भिल्ल बन बासी। मधु सुचि सुन्दर स्वाद सुधासी॥
भरि भरि परन-पुटी रचि रूरी। कन्द मूल फल अंगुर-जूरी ॥१॥
सबहि देहिं करि बिनय प्रनामा । कहि कहि स्वाद भेद गुन नामा ॥
देहिं लोग बहु माल न लेहीं । फेर राम दोहाई देहीं ॥२॥
कहहिँ सनेह मगन मृदु बानी । मानत साधु प्रेम पहिचानी ।
तुम्ह सुकृती हम नीच निषादा । पावा दरसन रामप्रसादा ॥३॥
हमहिँ अगम अति दरस तुम्हारा । जस मरु-धरनि देवधुनि-धारा ।
रोम-कृपाल गरीब नेवाजा। परिजन प्रजौ चहिय जस राजा ॥४॥
यह जिय जानि सकोच तजि, करिय छोह लखि नेहु ।
हमहिं कृतारथ करन लगि, फल-तृन-अकुंर लेहु ॥२५०॥
तुम्ह प्रिय पाहुन बन पग धारे। सेवा जोग न भाग हमारे ॥
देव काह हम तुम्हहिँ गोसाँई। ईधन पात किरात मिताई ॥१॥
यह हमारि अति बडि सेवकाई । लेहिं न बासन बसन चोराई ।
हम जड-जीव जीव-गन-घाती । कुटिल कुचाली कुमति कुजाती ॥२॥
पाप करत निसि-बासर जाहीँ । नहिँ पट कटि नहिँ पेट अघाहीं ॥
सपनेहुँ धरम-बुद्धि कस काऊ । यह रघुनन्दन-दरस प्रभाऊ ॥३॥
जब तें प्रभु-पद-पदुम निहारे । मिटे दुसह-दुख-दोष हमारे ॥
बचन सुनत पुरजन अनुरागे । तिन्ह के भाग सराहन लागे ॥४॥
लागे सराहन भाग सब अनुराग बचन सुनावहीँ ॥
बोलनि मिलनि सिय-राम-चरन सनेह लखि सुख पावहीँ।
नर-नारि निदरहिँ-नेह निज सुनि, कोल-भिल्लनि की गिरा।
तुलसी कृपा रघुबंस-मनि की, लोह लै लौका तिरा ॥१०॥
बिहरहिँ बन चहुँ ओर, प्रतिदिन प्रमुदित लोग सब ।
जल ज्योँ दादुर मोर, भये पीन पावस प्रथम ॥२५१॥
पुरजन नारि मगन अति प्रीती। बासर जाहिँ पलक सम बीती॥
सीय सासु प्रति बेष बनाई । सादर करै सरित सेवकाई ॥१॥
लखा न सरम राम बिनु काहूँ । माया सब सिय-माया माहूँ॥
सीय सासु सेवा बस कीन्ही । तिन्ह लहि सुख सिख आसिष दीन्ही॥२॥
लखि सिय सहित सरल दोउ भाई । कुटिल रानि पछितानि अघाई।
अवनि जमहि जाँचति कैकेई । महि न बीच बिधि मीच न देई ॥३॥
लोकहु बेद बिदित कबि कहहीं। राम-बिमुख थल नरक न लहहीं ।
यह संसौ सब के मन माहीं। राम गवन विधि अवध कि नाहीं ॥४॥
निसि न नींद नहिं भूख दिन, भरत बिकल सुठि सोच ।
नीच कीच बिच मगन जस, मीनहि सलिल सँकोच ॥२५२॥
कीन्ह मातु मिस काल कुचाली । ईतिमीति जस पाकत साली।
केहि बिधि होइ राम-अभिषेकू । मोहि अवकलत उपाउ न एकू॥१॥
अवसि फिरहिं गुरु आयसु मानी । मुनि पुनि कहब राम रुचिजानी ।
मातु कहेहु बहुदहिँ रघुराऊ । राम-जननि हठ करबि कि काऊ॥२॥
मोहि अनुचर कर केतिक बाता । तेहि अहँ कुसमौ बाम विधाता ।
जों हठ करौँ त निपट कुकरमू । हरगिरि तें गुरु सेवक धरमू ॥३॥
एकौ जुगुति न मन ठहरानी। सोचत भरतहि रैनि बिहानी ॥
मात नहाइ प्रभुहि सिर नाई। बैठत पठये रिषय बोलाई ॥४॥
गुरु-पद-पदुम प्रनाम करि, बैठे आयसु पाइ ।
बिम-महाजन सचिव सब, जुरे सभासद आइ ॥२५३॥
बोले मुनिबर समय समाना । सुनहु सभासद भरत सुजाना ॥
धरम धुरीन सानुकुल भानू । राजा राम स्वबस भगवानू॥१॥
सत्यसन्ध पालक-सु तिसेतू । राम-जनम जग मगंल हेतू ॥
गुरु पितु मातु बचन अनुसारी। खल दल-दलन देव हितकारी ॥२॥
नीति प्रीति परमारथ स्वारथ । कोउ न राम सम जान जथारथ ॥
बिधि हरि हर ससि रबि दिसिपाला । माया जीव करम कुलि काला ॥३॥
अहिप महिप जहं लगि प्रभुताई । जोग-सिद्धि निगमागम गाई ॥
करि बिचार जिय देखहु नीके । राम रजाइ सीस सबही के॥४॥
राखे राम-रजाइ रुख, हम सब कर हित होइ।
समुझि सयाने करहु अब, सब मिलि सम्मत सोइ ॥२५४॥
सब कह सुखद राम-अभिषेकू । मगंल-मोद-मूल भग एकू॥
केहि बिधि अवध चलहिं रघुराऊ । कहहु समुझिसोइ करिय उपाऊ॥१॥
सब सादर सुनि मुनिबर बानी। नय-परमारथ-स्वारथ सानी।
उत्तर न आव लोग भये भोरे । तब सिर नाइ भरत कर जोरे ॥२॥
मानु-बंस भये भूप घनेरे । अधिक एक तें एक बडेरे ॥
जनम हेतु सब कहं पितु-माता । करम सुभासुभ देइ बिधाता ॥३॥
दलि दुख सजै सकल कल्याना । असि असीस राउरि जग जाना ।
गोसाँइ बिधि-गति जेहि छेकी। सकै को ठारि टेक जो टेकी ॥४॥
बूक्षिय मोहि उपाउ अब, सो सब मोर अभाग ।
सुनि सनेह-भय बचन गुरू, उर उमगा अनुरागः ॥२५५॥
तात बात फुरि राम कृपाहीं । राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं।
सकुचौँ तात कहत एक बाता । अरध तजहिं बुध सरबस जाता ॥१॥
तुम्ह कानन गवनहु होउ भाई । फेरियहि लखन-सीय-रघुराई ।
सुनि सुबचन हरष दोउ भाता। भे प्रमोद परिपूरन गाता ॥२॥
मन प्रसन्न तनु तेज बिराजा । जनु जिय राउ राम भये राजा ।
बहुत लाभ लोगन्ह लघु हानी । सम दुख सुख सच रोवहिँ रानी ॥३॥
कहहिं भरत मुलि कहा सो कीन्हे । फल जग जीवन अभिमत दीन्हे॥
कानन करौँ जनम भरि बासू । एहि तें अधिक न मेओर सुपासू ॥१॥
अत्तजामी राम-सिया, तुम्ह सर्बज्ञ-सुजान ।
जों फुर कहहुं त नाथ निज, कीजिय बचन प्रवान ॥२५६॥
भरत बचन सुनि देखि सनेहू। सभा सहित मुनि भयौ बिदेहू ॥
भरत महा महिमा जलरासी । मुनिमति ठाढि तीर अबला सी ॥१॥
गा चह पार जतन हिय हेरा । पावति नाव न बोहित बेरा ॥
और करिहि को भरत बडाई। सरसी सीपि कि सिन्धु समाई ॥२॥
भरत मुनिहिँ मन भीतर भाये । सहित समाज राम पहिँ आये ॥
प्रभु प्रनाम करि दोन्ह सुआसन । बैठे सब सुनि सुनि अनुसासन ॥३॥
बोले मुनिवर बचन बिचारी। देस काल अवसर अनुहारी ॥
सुनहु राम, सरबज्ञ सुजाना। घरमा नीति-गुन-ज्ञान निधाना ॥४॥
सब के उरअन्तर बसहु, जानहु भाउ कुभाउ ।
पुरजन-जननी-भरत-हित, होइ सो कहिय उपाउ ॥२५७॥
आरत कहहिँ बिचारि न काऊ । सूझा जुआरिहि आपन दाऊ ॥
सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ । नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ ॥१॥
सब कर हित रुख राउरि राखे । आयसु किये मुदित फुर भाखे।
प्रथम जो आयसु मो कहं होई । माथे मानि करौँ सिख सोई ॥२॥
पुनि जेहि कहँ जस कहब गोसाँई । सो सब भाँति घटिहि सेवकाई ॥
कह मुनि राम सत्य तुम्ह भाखा । भरत सनेह बिचार न राखा ॥३॥
तेहि तें कहौँ बहोरि बहोरी । भरत-भगति-बस मै मति भोरी॥
मोरे जान भरत रुचि राखी । जो कीजिय सो सुभ सिव साखी ॥४॥
भरत बिनय सादर सुनिय, करिय बिचार बहोरि ।
करब साधु-मत लोक-मत, नृप-नय निगम निचोरि ॥२५८॥
गुरु अनुराग भरत पर देखी । राम-हृदय आनन्द बिसेखी ॥
भरतहि धरम-धुरन्धर जानी। निज-सेवक-तन-मानस बानी ॥१॥
बोले गुरु आयसु अनुकूला । बचन भजु मृदु मगंल-मूला ॥
नाथ सपथ पितु-चरन दोहाई । भयेउ न भुवन भरत सम भाई ॥२॥
जे गुरु-पद-अम्बुज अनुरागी । ते लोकहु बेदहु बड भागी॥
राउर जा पर अस अनुरागू । को कहि सका भरत कर भागू ॥३॥
लखि लघु-बन्धु बुद्धि सकुचाई। करत बदन पर भरत बडाई ॥
मरत कहहिं सोइ किये भलाई। अस कहि राम रहे अरगाई ॥४॥
तब मुनि बोले मरत सन, सब सकोच तजि तात।
कृपासिन्धु प्रियबन्धु सन, कहहु हृदय कै बात ॥२५९॥
सुनि मुनि बचन राम रूख पाई। गुरु साहिब अनुकूल अघाई ॥
लखि अपने सिर सब छरभारू । कहिनसकहि कछुकरहिँ बिचारू॥१॥
पुलकि सरीर समा भये ठाढै। नीरज-नयन नेह-जल बाढे ॥
कहब मोर मुनिनाथ निबाहा । एहि तें अधिक कहौँ मैं काहा ॥२॥
मैं जानौँ निज-नाथ सुभाऊ । अपराधिहु पर कोह न काऊ ॥
मो पर कृपा सनेह बिसेखी । खेलत खुनिस न कबहूँ देखी ॥३॥
सिसुपन तँ परिहरेउ न सगं । कबहुँ न कीन्ह मोर मन भगं ॥
मैं प्रभु कृपा-रीति जिय जोही। हारेहू खेल जितावहिं मोही ॥४॥
महूँ सनेह-सकोच-बस, सनमुख कहे न बयन ।
दरसन तृपित न आजु लगि, प्रेम पियासे नयन ॥२६०॥
बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा । नीच बीच जननी मिस पारा ॥
यहौ कहत मोहिआजु न सोमा। अपनी समुझि साधुसुचिकोभा ॥१॥
मातु मन्द मैं साधु सुचाली । उर अस आनत कोटि कुचाली ॥
फरै कि कोदव बालि सुसाली । मुकता-प्रसव कि सम्बुक काली ॥२॥
सपनेहुँ दोस कलेस न काहू । मोर अभाग उदधि अवगाहू ॥
बिनु समुझे निज अघ परिपाकू । जारिउँ जाय जननि कहि काकू ॥३॥
हृदय हेरि हारेउं सब ओरा । एकहि भाँति भलेहि भल मोरा ।
गुरु-गेसाइँ साहिब सिय रामू । लागत मोहि नीक परिनामू ॥४॥
साधुसभा गुरु प्रभु निकट, कहौँ सुथल सतिभाउ ।
प्रेम प्रवचं कि झूठ फुर, जानहिँ मुनि रघुराउ ॥२६१॥
भूपति-भरन प्रेमपन राखी । जननी कुमति जगत सब साखी ॥
देखि न जाहिँ बिकल महंतारी। जरहिं दुसह जर पुर-नए-नारी ॥१॥
महीं सकल अनरथ कर मूला । सो सुनि समुझि सहेउँ सब सूला ॥
सुनि बन-गवन कीन्ह रघुनाथा । करि मुनि बेष लखन-सिय साथा ॥२॥
बिनु पानहिन्ह पयादेहि पाये । संकर साखि रहेउँ एहि घाये।
बहुरि निहारि निषाद सनेहू । कुलिस कठिन उर भयौ न बेहू ॥३॥
अब सब आँखिन्ह देखेउं आई। जियस जीव जड सबै सहाई ॥
जिन्हहिँनिरखिमगसाँपिनिबीछी । तजहिं विषम बिषतामसतीछो॥४॥
तेइ रघुनन्दन-लखन-सिय, अनहित लागे जाहि।
तासु तनय तजि दुसह दुख, दैउ सहावै काहि ॥२६२॥
सुनिअतिषिकलभरतबरबानी । आरति-प्रीति-बिनय-नय सानी।
क मगन सब सभा खभारू । मनहुँ कमल-बन परेउ तुसारू ॥१॥
कहि अनेक बिधि कथा पुरानी । भरत प्रबोध. कीन्ह, मुनि-ज्ञानी ॥
बोले उचित बचन रघुनन्दू । दिनकर-कुल-कैरव-बन-चन्दू ॥२॥
तात जाय जिय करहु गलानी । ईस अधीन जीव गति जानी ॥
तीनि-काल तिभुवन मत मोरे । पुन्यसिलोक तात तर तोरे ॥३॥
उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई । जाइ लोक-परलोक नसाई ॥
स देहि जननिहि जड तेई । जिन्ह गुरु-साधु सभा नहिॅं सेई ॥४॥
मिटिहहिॅं पाप प्रपचं सब, अखिल अमगंल भार ।
लोक सुजस परलोक सुख, सुमिरत नाम तुम्हार ॥ २६३ ॥
कहौँ सुभाउ सत्य सिव साखी । भरत भूमि रह राउरि राखी ॥
तात कुतरक करहु जनि जाये। बैर प्रेम नहिँ दुरै दुराये ॥१॥
मुनि गन निकट बिहग मृग जाहीँ । बाधक बधिक बिलोकि पराहीॅं ॥
हित अनहित पसु पच्छिउ जाना । मानुष तनु गुन ज्ञान निधाना ॥२॥
तात तुम्हहिँ मैं जानौँ नीके । करौँ काह असमंजस जी के ॥
राखेउ राय सत्य बोहि त्यागी । तनु परिहरेउ प्रेम-पन-लागी ॥३॥
तासु बचन सेटत बड सोचू । तेहि तेॅं अधिक तुम्हार सॅंकोचू ॥
ता पर गुरु मोहिआयसु दीन्हा। अवसि जो कहहु चहौँ सोइ कीन्हा ॥४॥
मन प्रसन्न कर सकुच तजि, कहहु करौँ सोइ आज ।
सत्यसन्ध रघुबर बचन, सुनि भा सुखी समाज ॥२६४॥
सुर-गन सहित सभय सुरराजू । सोचहिॅं चाहत होन अकाजू ॥
बनत उपाउ करत कछु नाहीॅं । राम-सरन सब गे मन माहीॅं ॥१॥
बहुरि बिचारि परसपर कहहीँ । रघुपति भगत-भगति बस अहहीॅं ।
सुधि करि अम्बरीष दुरबासा । भे सुर-सुरपति निपट निरासा ॥२॥
सहे सुरन्ह बहु काल बिषादा । नरहरि किये प्रगट प्रहलादा ॥
लगि लगि कानकहहिँ धुनि माथा । अब सुर-काज भरत के हाथा॥३॥
आन उपाठ न देखिय देवा । मानत राम सुसेवक सेवा ॥
हिय सप्रेम सुमिरहु सम भरतहि । निज गुन सील राम बस करतहि ॥४॥
सुनि सुर-मत सुरगुरु कहेउ, भल तुम्हार बड भाग ।
सकल सुमगंल मूल जग, लरत चरन अनुराग ॥२६५॥
सीतापति सेवक सेवकाई । कामधेनु सय-सरिस सुहाई ॥
भरत भगति तुम्हरे मन आई । तजहु सोच बिधि बात बनाई ॥१॥
देखु देवपति भरत प्रभाऊ । सहज सुभाय बिबस रघुराऊ ॥
मन थिर करहु देव डर नाहीॅं । भरतहि जानि राम परिछाहीॅं ॥२॥
सुनि सुरगुरु सुर सम्मत सोचू । अन्तरजामी प्रभुहि सकोचू ॥
निज सिर भार भरत जिय जाना । करत कोटि बिधि मन अनुमाना ॥३॥
करि बिचार मन दीन्ही ठीका । राम-रजायसु आपन नीका ॥
निज पन तजि राखेउ पन मोरा । छोह सनेह कीन्ह नहिँ थोरा ॥४॥
कीन्ह अनुग्रह अमित अति, सब बिधि सीतानाथ ।
करि प्रनाम बोले भरत, जोरि जलज जुग हाथ ॥२६६॥
कहौँ कहावौँ का अब स्वामी । कृपा-अम्बुनिधि अन्तरजामी ॥
गुरु-प्रसन्न साहिब अनुकूला । मिटी मलिन मन कलपित सूला ॥१॥
अपडर डरेउँ न सोच समूले । बिहि न दोस देव दिसि भूले ॥
मोर अभाग मातु कुटिलाई । बिधि-गति-विषम काल-कठिनाई ॥२॥
पाउँ रोपि सब मिलि मोहि घाला । प्रनतपाल पन आपन पाला ॥
यह नै रीति न राउरि होई । लोकहु बेद बिदित नहिँ गोई ॥३॥
जग अनमल भल एक गोसाँई । कहिय होइ भल कासु भलाई ॥
देव देवतरु सरिस सुभाऊ । सनमुख बिमुख न काहुहि काऊ ॥४॥
जाइ निकट पहिचानि तरु, छाँह समनि सब सोच ।
भाॅंगत अभिमत पाव जग, राउ रकं भल पोच ॥२६७॥
लखि सब बिधि गुर स्वामि सनेहू। मिटेउ छोभ नहिॅं मन सन्देहू ॥
अब करूनाकर कीजिय सोई । जनहित प्रभुवित छोभ न होई ॥१॥
जो सेवक साहिबहि सँकोची। निज हित चहै तासु मति पोची ।
सेवक-हित साहिब सेवकाई । करै सकल मुख लोम बिहाई ॥२॥
रुवारथ नाथ फिरे सबही का। किये रजाइ कोटि बिधि नीका ॥
यह स्वारथ परमारथ-सारू । सकल सुकृत-फल सुगति-सिँगारू ॥३॥
देव एक बिनती सुनि मोरी। उचित होइ तस करब बहोरी ॥
तिलक समाज साजि सब आना। करिय सुफल प्रभु जौॅं मन माना ॥४॥
सानुज पठैय मोहि बन, कीजिय सबहि सनाथ ।
नतरु फेरियहि बन्धु दोउ, नाथ चलौँ मैॅं साथ ॥२६८॥
नतरु जाहिॅं बन तीनिउँ भाई । बहुरिय सीय सहित रघुराई ।
जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई । करुनासागर कीजिय सोई ॥१॥
देव दीन्ह सब मोहि अभारू । मोरे नीति न धरम बिचारू ॥
कहौँ बचन सब स्वारथ हेतू । रहत न आरत के चित चेतू ॥२॥
उत्तर देइ सुनि स्वामि रजाई । सो सेवक लखि लाज लजाई ॥
अस मैं अवगुन-उदधि-अगाधू। स्वामि-सनेह सराहत साधू ॥३॥
अब कृपाल मोहि सो मत भावा । सकुच स्वामि मन जाइ न पावा ॥
प्रभु-पद-सपथ कहौँ सतिभाऊ । जग-मंगल-हित एक उपाऊ ॥४॥
प्रभु प्रसन्न मन सकुच् तजि, जो जेहि आयसु देब ।
सिर धरि धरि करिहि सब, मिटिहि अनट अवरेब ॥२६९॥
भरत बचन सुचि सुनि सुर हरषे । साधु सराहि सुमन सुर बरषे ।
असमंजस-बस अवध-निवासी । प्रभुदित मन तापस बन-बासी ॥१॥
चुपहि रहे रघुनाथ सॅंकोची । प्रभु गति देखि सभा सब सोची ॥
जनक-दूत तेहि अवसर आये । मुनि बसिष्ट सुनि निकट बोलाये ॥२॥
करि प्रनाम तिन्ह राम निहारे । बेष देखि भये निपट दुखारे ॥
दूतन्ह मुनिबर बूझी बाता । कहहु बिदेह भूप कुसलाता ॥३॥
सुनि सकुचाइ नाइ महि माथा । बाले चर-बर जोरे हाथा ॥
बूझब राउर सादर साँई । कुसल-हेतु सो भयौ गोसाँई ॥४॥
नाहिॅंत कोसलनाथ के, साथ कुसल गै नाथ ।
मिथिला अवध बिसेष तेॅं, जग सब भयौ अनाथ ॥२७०॥
कोसलपति गति सुनि जनकौरा । मे सब लोग सोक-बस बौरा ।
जेहि देखे तेहि समय विदेहू । नाम सत्य अस लाग न केहू ॥१॥
रानि कुचालि सुनत नरपालहि । सूभ न कछु जस मनि बिनु ब्यालहि ॥
भरत-राज रघुबर-बनबासू । मा मिथिलेसहि हृदय हरासू ॥२॥
नृप बूझे बुध-सचिव-समाजू । कहहु बिचारि उचित का आजू ॥
समुझि अवध असमंजस दोऊ । चलिय कि रहिय न कह कछु कोऊ ॥३॥
नृपहि धीर धरि हृदय बिचारी । पठये अवध चतुर चर चारी ॥
बूझि भरत सतिभाउ कुभाऊ । आयेहु बेगि न होइ लखाऊ ॥४॥
गये अवध चर भरत-गति, बूझि देखि करतूति ।
चले चित्रकूटहि भरत, चार चले तिरहूति ॥२७१॥
दूतन्ह आइ भरत कै करनी । जनक-समाज जथामति बरनी ॥
सुनि गुरु परिजन सचिव महीपति । भे सब सोच-सनेह बिकल अति ॥१॥
धरि धीरज करि भरत बडाई। लिये सुमट साहनी बोलाई ॥
घर-पुर-देस राखि रखवारे । हय गय रथ बहु जान सँवारे ॥२॥
दुघरी साधि चले ततकाला । किय बिश्राम न मग महिपाला ॥
भोरहिँ आजु नहाइ प्रयागा । चले जमुन उतरन सब लागा ॥३॥
खबरि लेन हम पठये नाथा । तिन्ह कहि अस महि नायौ माथा ॥
साथ किरात छ सातक दीन्हे । मुनिबर तुरत बिदा चर कीन्हे ॥४॥
सुनत जनक आगवन सब, हरषेउ अवध-समाज ।
रघुनन्दनहिँ सकोच बड, सोच बिबस सुर-राज ॥२७२॥
गरै गलानि कुटिल कैकेई । काहि कहै केहि दूषन देई ।
अस मन आनि मुदित नर-नारी । भयौ बहोरि रहब दिन चारी ॥१॥
एहि प्रकार गत बासर सोऊ ! प्रात नहान लाग सब कोऊ ॥
करि मज्जन पूजहिँ नर-नारी । गनप गौरि तिपुरारि तमारी ॥२॥
रमा-रमन पद बन्दि बहोरी । बिनवहिँ अंजलि अंचल जोरी ॥
राजा राम जानकी रानी। आनॅंद-अवधि अवध रजधानी ॥३॥
सुबस बसौ फिरि सहित समाजा। भरतहि राम करहु जुबराजा ॥
एहि सुख-सुधा सीॅंचि सब काहू । देव देहु जग-जीवन लाहू ॥४॥
गुरु समाज भाइन्ह सहित, राम राज पुर होउ ।
अछत राम राजा अवध, मरिय माँग सब कोउ ॥२७३॥
सुनि सनेह-भय पुरजन बानी । निन्दहिँ जोग बिरति मुनिज्ञानी ॥
एहि विधि नित्य-फरस करि पुरजन । रामहिँ करहिं प्रनाम पुलकितन ॥१॥
ऊँच नीच मध्यम नर-नारी । लहहिॅं दरस निज निज अनुहारी ॥
सावधान सबही सनमानहिँ । सकल सराहत कृपानिधानहिँ ॥२॥
लरिकाइहिँ तेॅं रघुबर बानी । पालस नीति प्रीति पहिचानी ॥
सील-सकोच-सिन्धु रघुराऊ । सुमुख सुलोचन सरल सुभाऊ ॥३॥
कहत राम गुन-गन अनुरागे । सब निज भाग सराहन लागे ॥
हम सम पुन्य- पुत्र जग थोरे । जिन्हहिॅं राम जानत करि मेआरे ॥४॥
प्रेम मगन तेहि समय सब, सुनि आवत मिथिलेस ॥
सहित सभा सम्भ्रम उठेउ, रषिकुल-कमल-दिनेस ॥ २७४ ॥
भाइ सचिव गुरु पुरजन साधा। आगे गवन कोन्ह रघुनाथा ॥
गिरिवर, दीख जनक पति जबहीॅं । करि प्रनाम रथ त्यागेउ तबहीॅं ॥१॥
राम-दरस लालसा उछाहू । पथ - सम लेस कलेस न काहू ॥
मन तहँ जहँ रघुबर बैदेही । बिनु मन तन दुख-सुख सुधि केही ॥२॥
आवत जनक चले एहि भाँती । सहित समाज प्रेम-मति माँती ॥
आये निकट देखि अनुरागे । सादर मिलन परसपर लागे ॥३॥
लगे जनक मुनिजन-पद बन्दन । रिषिन्ह प्रनाम कीन्ह रघुनन्दन ।
भाइन्ड सहित राम मिलि राजहि । चले लेवाइ समेत समाजहि ॥४॥
आस्रम-सागर सान्तरस, पूरन पावन पाथ ।
सेन मनहुँ कहना - सरित, लिये जाहिँ रघुनाथ ॥ २७५॥
बोरति ज्ञान-बिराम करारे । बच्चन ससेओक मिलत नद नारे ॥
च उसास समीर तरङ्गा । धीरज सट तरुबर कर भङ्गा ॥ १ ॥
बिषम विषाद तोरावति धारा । भयं भ्रम भॅंवर अवर्त अपारा ।
केवट-बुध बिद्वान बडि नावा । सकहिॅं न खेइ ऐक नहिॅं आवा ॥२॥
बनचर कोल किरात बिचारे । थके बिलोकि पथिक हिय हारे ॥
आस्रम-उदधि मिली जब जाई । मनहुँ उठेउ अम्बुधि अकुलाई ॥३॥
क बिकल दोउ राज-समाजा । रहा न ज्ञान न धीरज लाजा ॥
भूप-रूप-गुन-सील सराही । रोवहिॅं सक-सिन्धु अवगाही ॥४॥
अवगाहि सोक-समुद्र सोचहिॅं,नारि नर व्याकुल महा ।
दै दोष सकल सरोष बोलहिॅं, बाम बिधि कीन्हो कहा ।
सुर सिह तापस जोगि जन मुनि, देखि दता बिदेह की ।
तुलसी न समरथ को जो तरि, सकै सरित सनेह की ॥ ११ ॥
किये अमित उपदेश, जहाँ तहँ लोगन्ह मुनिवरन्ह ।
धीरज ऽघरिय नरेस, कहेउ बसिष्ठ विदेह सन ॥ २७६ ॥
जासु ज्ञान रवि भव-निसि नासा । बचन किरन मुनि कमल बिकासा ॥
तेहि कि मोह ममता नियराई । यह सिय-रामसनेह बढाई ॥१॥
विषयी साधक सिद्ध सयाने । त्रिविधि जीव जग वेद बखाने ॥
रास-संनेह-सरस मन जासू । साधु सभा बड आदर तासू ॥२॥
ह न राम-प्रेम बिनु ज्ञानू । करनधार बिनु जिमि जलयानू ॥
मुनि बहु बिधि बिदेह समुझाये । रामघाट सब लोग नहायें ॥३॥<।पोएम्>
रामचन्द्रजी के प्रेम के बिना ज्ञान नहीं सोहता, जैसे बिना मल्लाह के जहाज । मुनि
वशिष्ठजी ने राजा जनक को बहुत तरह समझाया, तब सब लोग रामघाट में स्नान किये ॥३॥
<पोएम्>सकल सोक-सङ्कुल नर नारी । सेआ बासर बीतेउ बिनु बारी ॥
पसु-खग-मृगन्हन कीन्ह अहारू । प्रिय परिजन कर कवन बिचारू ॥४॥
दोउ समाज निमिराज रघु-राज नहाने प्रात ।.
बैठे सब बट बिटप तर, मन मलीन क्रस गात ॥२७७॥
जे महिसुर दसरथ पुर बासी । जे मिथिलापति नगर निवासी ॥
हंसबंस गुरु जनक पुरोधा । जिन्ह जग मग परमारथ साधा ॥१॥
लगे कहन उपदेस अनेका । सहित धरम नय बिरति बिबेका ॥
कासिक कहि कहि कथा पुरानी । समुझाई सब सभा सुबानी ॥२॥
तब रघुनाथ कौसिकहि कहेऊ । नाथ कालि जल बिनु सब रहेऊ ॥
मुनि कह उचित कहत रघुराई। गयौ बीति दिन पहर अढाई ॥३॥
रिषि रुख लखि कह तिरहुति राजू । इहाँ उचित नहिँ असन अनाजू ॥
कहा भूप भल सबहि सुहाना । पाइ रजायसु चले नहाना ॥४॥
तेहि अवसर फल फूल दल, मूल अनेक प्रकार ।
लै आये बनचर बिपुल, भरि भरि काँवरि मार ॥२७८॥
कामद से गिरि रामप्रसादा । अवलोकत अपहरत बिषादा ॥
सर सरिता वन भूमि विभागा । जनु उमगत आनंद अनुरागा ॥१॥
बेलि बिटप सब सफल सफूला । बोलत खग मृगं अलि अनुकूला ॥
तेहि अवसर बन अधिक उछाहू । त्रिबिधि समीर सुखद सब काहू ॥२॥
जाइ न बरनि मनोहरताई । जनु महि करति जनक पहुनाई ॥
तब सब लोग नहाइ नहाई । राम- जनक- मुनि आयसु पाई ॥३॥
देखि देखि तरुबर अनुरागे । जहाँ तहाँ पुरजन उतरन लागे ॥
दल फल मूल कन्द बिधि नाना । पावन सुन्दर सुधा समाना ॥४॥
सादर सब कहँ राम-गुरु, पठये भरि भरि भार ।
पूजि पितर सुर अतिथि गुरु, लगे करन फलहार ॥ २७९ ॥
बो०-एहिबिधि बासर बीते चारी । राम निरखि नर नारि सुखारी ॥
दुहुॅं समाज असि रुचि मन माहीं । बिनु सिय-नाम फिरब मलनाहीॅं ॥१॥
सीताराम सङ्घ बन-बासू । कोटि अमरपुर सरिस सुपासू ॥
परिहरि लखन-राम-वैदेही । जेहि घर भाव बाम बिधि तेही ॥२॥
दाहिन दैउ होइ जब सबहीं। राम समीप बसिय बन तबहीॅं ॥
मन्दाकिनि मज्जन तिहुँ काला। रामदरस मुदमङ्गलमाला ॥३॥
अटनरासगिरिन तापस थल । असन अमिय सम कन्द मूल फल ॥
सुख समेत सम्बत दुइ साता । पल सम होहिॅं न जनियहि जाता ॥४॥
एहि सुख जोग न लोग सब, कहहिँ कहाँ अस भाग ।
सहज सुभाय समाज दुहुँ, राम-चरन अनुराग ॥२८०॥
एहि बिधि सकल मनोरथ करहीॅं । बचन सप्रेम सुनत मनहरहीॅं ॥.
सीमा मातु तेहि समय पठाई । दासी देखि सुअवसर आई ॥१॥
सावकास सुनि सब सियसासू । आयड जनकराज रनिवासू ॥
कौसल्या सादर सनमानी । आसन दिये समय सम आनी ॥२॥
सील सनेह सकल दुहुँ ओर । द्रवहिँ देखि सुनि कुलिस कठोरा ।
पुलक सिथिल तनुबारि बिलोचन । महि नखलिखन लगीॅं सब सोचन ॥३॥
सब सिय-शम प्रेम कि सि मूरति । जनु करुना बहु बेष बिसूरति ॥
सी-मातु कह बिधि बुधि बाँकी । जो पय-फेन फोर पबि टाँकी ॥४॥
सुनिय सुधा देखिय गरल सब करतूति कराल।
जहँ तहँ काक उलूक बक, मानस सकृत मराल ॥२८१॥
सुनि ससोच कह देबि सुमित्रा । बिधिगिति बडि बिपरीत विचित्रा॥
जो सृजि पालै हरै बहोरी। बालकेलि सम बिधि मति भोरी ॥१॥
कौसल्या कह दोस न काहू । करम-बिबस दुख-सुख छति लहू ॥
कठिन करम-गति जान विधाता । जो सुभ असुभ सकल फल दाता ॥२॥
ईस रजाइ सीस सही के । उतपति थिति लय बिषहु अमी के ॥
देबि माह बस सोचिय बादी । विधि प्रपञ्च अस अचल अनादी ॥३॥
भूपति जियब मरच उर आनी । सोचिय सखि लखि निजहित हानी
सीयमातु कह सत्य सुबानी । सुकृती-अवधि अवधपति-रानी ॥४॥
लखन-राम-सिय जाहु बन, भल परिनाम न पोच ।
गहबरि हि कह कौसिला, मोहि भरत कर, सोच ॥२८२॥
इस प्रसाद असीस तुम्हारी । सुत सुतबधू देवसरि-बारी ॥
राम सपथ मैं कीन्ह न काऊ । सो करि कहौँ सखी सतिभाऊ ॥१॥
भरत सील गुन बिनय बडाई । भायप भगति भरोस भलाई ॥
कहत सारदहु कर मति हीचे । सागर सीपि कि जाहिँ उलीचे॥२॥
जानौँ सदा भरत कुल दीपा । बार बार मोहि कहेउ महीपा ॥
कसे कनक सनि पारिख पाये । पुरुष परिखियहि समय सुभाये ॥३॥
अनुचित आजु कहब अस मोरा । लोक सनेह सयानप थोरा ॥
सुनि सुरसरि सम पावनि बानी । भई सनेह बिकल सब रानी ॥४॥
कौसल्या कह धीर धरि, सुनहु देबि मिथिलेसि ।
को बिबेक-निधि बलमहि, तुम्हहिँ सकै उपदेसि ॥ २८३ ॥
रानि राय सन सवसर पाई । अपनी माँति कहब समुझाई ॥
रखियहि लखन भरत गवनहिॅं बन । जैआँ यह मतमानै महीप मन ॥१ ॥
तौ मल जतन करब सुबिचारी। मेरे सोच भरत कर भारी ॥
गूढ सनेह भरत मन माहीॅं। रहे नीक मोहि लागत नाहीॅं ॥२॥
लखि सुभाउ सुनि सरल सुबानी । सब भैँ मगन करुनरस सानी ॥
नम प्रसून भरि धन्य धन्य धुनि । सिथिल सनेह सिद्ध जोगी मुनि ॥३॥
सब रनिवास बिथकि लखि रहेऊ । तब घरि धीर सुमित्रा कहेऊ ॥
देषि दंड जुग जामिनि बीती । राम-मातु सुनि उठी सप्रीती ॥४॥
दे०- बेगि पाउ घारिय थलहि, कह सनेह सतिभाय ।
हमरे तौ अब ईस-गति, कै मिथिलेस सहाय ॥२८४॥
लखि सनेह सुनि बचन विनीता । जनक- प्रिया गहि पाय पुनीता ॥
देबि उचित असि बिनय तुम्हारी । दसरथ-घरनि राम-मॅंहतारी ॥१॥
प्रभु अपने नीचहु आदरहीॅं । अगिनि धूम गिरि-सिर-तृन धरहीॅं ॥
सेवक राउ करम-मन-बानी । सदा सहाय महेस भवानी ॥२॥
रौरे अङ्ग जोग जग को है । दीप सहाय कि दिनकर सोहै ॥
राम जाइ बन करि सुरकाजू । अचल अवधपुर करिहहिॅं राजू ॥३॥
अमर नाग नर राम-बाहु-बल । सुख बसिहहिॅं अपने अपने थल ॥
यह सब जागबलिक कहि राखा । देबि न होइ मुधा मुनि भाखा ॥४॥
अस कहि पग परि प्रेम अति, सिय हित विनय सुनाइ ।
सिय समेत सिय-मातु तब, चली सुआयसु पाई ॥२८५॥
प्रिय परिजनहि मिली बैदेही । जो जेहि जोग भाँति तेहि तेही ॥
तापस बेष जानकी देखी । सा सब बिकल विषाद बिसेखी ॥१॥
जनक राम-गुरु आयसु पाई । चले थलहि सिय देखी आई ।
लीन्ह लाइ उर जनक जानकी । पाहुनि पावन प्रेम प्रान की ॥२॥
उर उमगेउ अम्बुधि अनुरागू । भयौ भूप मन मनहुँ पयागू ॥
सिय-सनेह बट बाढल जोहा । ता पर राम-प्रेम-सिसु सोहा ॥३॥
चिरजीवी मुनि ज्ञान विकल जनु । बूडत लहेंउ बाल-अवलम्बनु ॥
मोह मगन मति नहिँ बिंदेह की । महिमा सिय-रघुबर-सनेह की ॥४॥
सिय पितु मातु सनेह बस, बिकल न सको सँभारि ।
धरनि-सुता धीरज घरेउ, समौ सुधरम बिचारि ॥ २८६॥
तापस बेष जनक सिय देखी । मयौ प्रेम परितोष बिसेखी ॥
पुत्रि पवित्र किये कुल दोऊ । सुजस चबल जग कह सब कोऊ॥१॥
जिति सुरसरि कीरति-सरि तोरी। गवन कीन्ह बिधि अंड करोरी ॥
गंग अवनि थल तीनि बडेरे । एहि किय साधु समाज घनेरे ॥२॥
पितु कह सत्य सनेह सुबानी। सीय ऽसकुच महँ मनहुँ समानी ॥
पुनि पितु मातु लीन्हि उर लाई । सिख आसिष हित दीन्हि सुहाई ॥३॥
कहति न सीय सकुचि मन माहीॅं । इहाँ बसब रजनी मल नाहीॅं ॥
लखि रुख रानि जनायेउ राऊ । हृदय सराहत सील सुभाऊ ॥४॥
बार बार मिलि भेॅंटि सिय, बिदा कीन्हि ऽसनमानि ।
कही समय सिर भरत-गति, रानि सुबानि सथानि ॥२८७॥
सुनि भूपाल भरल व्यवहारू । सोन सुगन्ध सुधा ससि-सारू ।
मूँदे सजल नयन पुलके तन । सुजस सराहन लगे मुदित मन ॥१॥
सावधान सुनु सुमुखि सुलोचनि । भरत कथा भव-बन्ध बिमोचनि ॥
धरम राज-नय ब्रह्म- बिचारू । इहाँ जथामति मार प्रचारू ॥२॥
मति मोरि भरत महिमाहौॅं । कहै काह छलि छुअति न छाहीॅं ॥
बिधि गनपति अहिपति सिव सारद । कबि कोबिद बुध बुद्धि- बिसारद ॥ ३॥
भरत चरित कीरति करतूती । धरम सोल गुन बिमल बिभूती ॥
समुझत सुनत सुखद सब काहू । सुचि सुरसरि रुचि निदरि सुधाहू ॥४॥
निरवधि-गुन निरुपम-पुरुष, भरत भरत सम जानि।
कहिय सुमेरु कि सेर सम, कबि-कुल-मति सकुचानि ॥२८८॥
अगम सबहि बरनत बर बरनी। जिमि जल-हीन मीन गम घरनी॥
भरत अमित महिमा सुनु रानी। जानहिँ राम न सकहिँ बखानी ॥१॥
बरनि सप्रेम भरत अनुभाऊ। तिय जिय की रुचि लखि कह राऊ॥
बहुरहिँ लखन भरत बन जाहीँ। सब कर भल सब के मन माहीँ ॥२॥
देबि परन्तु भरत रघुबर की। प्रीति प्रतीति जाइ नहिँ तर की॥
भरत अवधि सनेह ममता की। जद्यपि राम सीम समता की ॥३॥
परमारथ स्वारथ सुख सारे। भरत न सपनेहुँ मनहुँ निहारे॥
साधन सिद्धि राम-पग-नेहू। मोहि लखि परत भरत मत एहू ॥४॥
मूल पाठ: rāmacaritamānasa · Hindi Wikisource contributors · Sanskrit Wikisource · CC BY-SA 4.0