ग्रंथ पाठ
रामचरितमानस · अध्याय 4
4.147
जामवन्त के बचन सुहाये । सुनि हनुमन्त हृदय अति भाये ॥
तब लगि मोहि परिखहु तुम्ह भाई। सहि दुख कन्दमूल फलखाई १॥
जब लगि आवौँ सीतहि देखी। होइ काज मोहि हरष बिसेखी ॥
अस कहि नाइ सबन्हि कहूँ माथा ।चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा ॥२॥
4.148
सिन्धु तीर एक भूधर सुन्दर।कौतुक कूदि चढेउ ता ऊपर ॥
बार बार रघुबीर सँभारी । तरकेउ पवन-तनय बल भारी ॥३॥
4.149
जेहि गिरि चरन देइ हनुमन्ता । चलेउ सो गा पाताल तुरन्ता ॥
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना । तेही भाँति चला हनुमाना ॥४॥
मूल पाठ: rāmacaritamānasa · Hindi Wikisource contributors · Sanskrit Wikisource · CC BY-SA 4.0