अहोई अष्टमी: संतान की लंबी आयु का व्रत और वन की मिट्टी की कथा
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अहोई अष्टमी की प्रामाणिक कथा, स्याहू माता की पूजा का विधान और तारों को अर्घ्य देने का शास्त्रीय अर्थ जानिए। धर्मसिंधु और पुराणों पर आधारित शोध।
इस लेख में
- खुरपी की चोट और स्याहू के सात बच्चों की कथा
- कथा से जुड़े मुख्य संस्कृत शब्द और उनका अर्थ
- शास्त्रों और टीकाकारों की दृष्टि में अहोई माता का स्वरूप
- प्राणियों के प्रति अपराध और वंश की रक्षा के अन्य शास्त्रीय प्रसंग
- आंगन के अनुष्ठानों और प्रतीकों का गहरा अर्थ
- पशु-पक्षियों का मातृत्व और आधुनिक पर्यावरण दृष्टि
- नीति और आधुनिक विज्ञान की स्पष्ट सीमा रेखा
- अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- प्रामाणिक ग्रंथ और स्रोत
यदि आप उत्तर भारत के किसी पारंपरिक परिवार में पले-बढ़े हैं, तो आपने दिवाली से कुछ दिन पहले अपनी मां या दादी को आंगन की दीवार पर गेरू और पिसे हुए चावल के घोल से पूजा का चित्र बनाते अवश्य देखा होगा। उस दीवार पर सूर्य, चंद्रमा, पालने और गाय-बछड़े के चित्रों के ठीक बीच में एक विचित्र आकृति बनाई जाती है। वह किसी शेर पर सवार देवी की तस्वीर नहीं होती। वह साही या सेही की तस्वीर होती है, जिसे लोकभाषा में स्याहू कहा जाता है, और उसके साथ उसके सात छोटे-छोटे बच्चे बनाए जाते हैं।
एक मां अपनी संतान की लंबी आयु, आरोग्य और सुख के लिए दिन भर निर्जला उपवास रखती है। ऐसे में पूजा के केंद्र में एक जंगली, बिल में रहने वाले कांटेदार जीव और उसके बच्चों को स्थान क्यों दिया गया?
आजकल बाजार में मिलने वाले छपे हुए कैलेंडरों में इस साही की जगह मुकुट पहने एक मुस्कुराती हुई देवी की तस्वीर लगा दी जाती है। वह देखने में भले ही सरल लगे, लेकिन जब हम धर्मसिंधु, निर्णयसिंधु और भविष्योत्तर पुराण से जुड़े व्रत-संग्रहों के पन्ने पलटते हैं, तब सामने आने वाली कथा कहीं अधिक गंभीर और विचारणीय है। यह केवल कोई वरदान मांगने की कथा नहीं है। यह अनजाने में हुई हिंसा, एक पशु मां के असहनीय विलाप और उस भूल को सुधारने के नैतिक संकल्प का आख्यान है।
खुरपी की चोट और स्याहू के सात बच्चों की कथा
अहोई अष्टमी की मूल कथा भविष्योत्तर पुराण से संबद्ध व्रत-कथा संग्रहों में सुरक्षित है। सत्रहवीं सदी के विद्वान कमलाकर भट्ट ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ निर्णयसिंधु में और अठारहवीं सदी के काशीनाथ उपाध्याय ने धर्मसिंधु में इस व्रत के नियमों और महत्व को विस्तार से लिखा है। इसी प्रकार विश्वनाथ शर्मा के व्रतराज में भी इसका शास्त्रीय विधान मिलता है।
कथा एक संपन्न और धर्मनिष्ठ परिवार की स्त्री से शुरू होती है, जिसके सात पुत्र थे। दिवाली की तैयारियां चल रही थीं। उस जमाने में घरों की लिपाई-पुताई के लिए मिट्टी का उपयोग होता था। वह स्त्री घर के चूल्हे और दीवारों को लीपने के लिए पीली मिट्टी लेने जंगल की ओर गई।
उसने वन के किनारे एक टीले के पास साफ मिट्टी देखी और खुरपी से जमीन खोदने लगी। उसे इस बात का तनिक भी आभास नहीं था कि ठीक उसी मिट्टी के नीचे स्याहू यानी साही का एक बिल था। उस बिल में स्याहू के सात नवजात बच्चे सो रहे थे, जिनकी आंखें भी अभी ठीक से नहीं खुली थीं।
जैसे ही उस स्त्री ने मिट्टी में खुरपी धंसाई, लोहे की धार सीधे बिल में जा लगी। एक ही क्षण में सातों नवजात बच्चे कटकर मर गए। जब उसने मिट्टी हटाई, तो खुरपी पर खून लगा देखा। घबराकर उसने देखा कि नीचे मासूम जीव लहूलुहान पड़े हैं। भय और अपराधबोध से कांपती हुई वह चुपचाप खुरपी छोड़कर घर लौट आई और किसी को कुछ नहीं बताया।
कुछ देर बाद जब स्याहू अपने बिल में लौटी, तो उसने अपने सातों बच्चों को खून से लथपथ और निष्प्राण पाया।
ग्रंथ उस पशु मां के विलाप को किसी साधारण जानवर की प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक मां के हृदयविदारक शोक के रूप में चित्रित करते हैं। अपनी संतानों के शवों पर सिर पटकते हुए उस आहत मां ने श्राप दिया:
"जिस प्रकार तुमने बिना किसी दया के मेरी कोख उजाड़ दी और मेरे सात दुधमुंहे बच्चों को एक पल में मार डाला, उसी प्रकार तुम्हारी कोख भी सूनी हो जाएगी और तुम्हारे सातों बेटे तुम्हारी आंखों के सामने काल के गाल में समा जाएंगे।"
उस श्राप का प्रभाव धीरे-धीरे प्रकट होने लगा। एक वर्ष के भीतर उस स्त्री के सातों पुत्र किसी न किसी अकाल व्याधि या दुर्घटना के शिकार होकर असमय मृत्यु को प्राप्त हो गए।
अपनी सभी संतानों को खोकर वह स्त्री और उसका पति गहरे शोक और असहनीय ग्लानि में डूब गए। जीवन से निराश होकर दोनों ने वन की ओर प्रस्थान किया ताकि अन्न-जल त्यागकर अपने प्राण समाप्त कर सकें।
मार्ग में उन्हें एक वृद्ध तपस्वी मुनि मिले। जब उस रोती हुई मां ने अपनी पूरी व्यथा सुनाई और आत्महत्या करने का विचार बताया, तो मुनि ने उन्हें रोक दिया। मुनि का यह उपदेश इस पूरे पर्व का आध्यात्मिक आधार है।
मुनि ने समझाया कि अपने शरीर का नाश कर लेना कभी धर्म नहीं हो सकता। आत्महत्या से कोई प्रारब्ध नहीं कटता, बल्कि आत्मा और अधिक अंधकार में घिर जाती है। भागने से कर्मों का हिसाब समाप्त नहीं होता। यदि अनजाने में किसी प्राणी को आघात पहुंचा है, तो उस घाव को शरीर त्यागकर नहीं, बल्कि सच्चे पश्चात्ताप, सेवा, प्रायश्चित्त और जगदंबा की शरण में जाकर ही भरा जा सकता है।
मुनि ने उस स्त्री को वापस घर लौटने का निर्देश दिया। उन्होंने कहा कि वह कामधेनु स्वरूपा गौमाता की सेवा करे, सभी जीवों के प्रति करुणा का भाव रखे और कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को निर्जला व्रत रखे।
इसके साथ ही मुनि ने एक विशेष विधान बताया। उन्होंने कहा कि वह केवल आंखें मूंदकर देवी की आराधना न करे, बल्कि आंगन की दीवार पर गेरू से उसी पीड़ित स्याहू माता और उसके सातों मृत बच्चों का चित्र बनाए। वह उस पशु मां की पूजा करे, हाथ जोड़कर उससे अपनी भूल के लिए क्षमा मांगे, और सायंकाल आकाश में तारों के दर्शन करके उन्हें अर्घ्य देकर अपना व्रत पूरा करे।
उस स्त्री ने घर लौटकर पूर्ण श्रद्धा और आंसुओं के साथ इस प्रायश्चित्त को निभाया। उसने उस प्राणी के दुख को पूरी तरह महसूस किया जिसे उसने अनजाने में मारा था। उसके सच्चे पश्चात्ताप और कठोर नियम से मां पार्वती संतुष्ट हुईं। स्याहू माता का क्रोध शांत होकर आशीर्वाद में बदल गया और उस स्त्री के सातों पुत्रों को नवजीवन प्राप्त हुआ।
यह व्रत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को किया जाता है। उत्तर भारत की पूर्णिमांत गणना में यह कार्तिक मास में आता है, जबकि पश्चिमी और दक्षिणी भारत की अमान्त गणना में यही दिन आश्विन कृष्ण अष्टमी कहलाता है। यह पर्व करवा चौथ के चार दिन बाद और दिवाली से ठीक आठ दिन पहले पड़ता है।
अष्टमी तिथि का सनातन परंपरा में विशेष महत्व है। इस दिन चंद्रमा आधा घट चुका होता है। यह प्रकाश और अंधकार के मिलन की संधि-वेला है। स्मृति और तंत्र शास्त्रों में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि देवी के रक्षक रूपों और भगवान शिव के भैरव स्वरूप की उपासना के लिए समर्पित मानी गई है। यह तिथि जीवन में आने वाले अचानक संकटों और अकाल कष्टों को शांत करने के लिए मानी जाती है।
इसी दिन वैष्णव परंपरा में बहुलाष्टमी भी मनाई जाती है, जिसका वर्णन पद्म पुराण और हरि भक्ति विलास में मिलता है। यह वही तिथि है जिस दिन बहुला नामक गाय ने अपनी सत्यनिष्ठा से सिंह का हृदय पिघला दिया था। इसी दिन मथुरा के गोवर्धन क्षेत्र में राधा कुंड का प्राकट्य दिवस भी मनाया जाता है, जहां आज भी संतान प्राप्ति की कामना से हजारों दंपती आधी रात को पवित्र जल में स्नान करते हैं। अहोई अष्टमी और बहुलाष्टमी, दोनों का मूल संदेश एक ही है कि मानव जीवन और पशु-जगत का मातृत्व एक ही परम तत्व से बंधा हुआ है।
कथा से जुड़े मुख्य संस्कृत शब्द और उनका अर्थ
इस व्रत के अंतर्निहित संदेश को समझने के लिए शास्त्रों में प्रयुक्त कुछ पारिभाषिक शब्दों को जानना आवश्यक है।
पहला शब्द है मातृत्व-तत्व। पुराणों के अनुसार मातृत्व केवल मनुष्य जाति की शारीरिक बनावट तक सीमित नहीं है। यह संपूर्ण सृष्टि में प्रवाहित होने वाली एक दिव्य शक्ति है, जिसमें पोषण, त्याग और रक्षा का भाव समाहित है। देवी महात्म्य में स्पष्ट कहा गया है:
या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
"जो देवी सभी प्राणियों में माता के रूप में स्थित हैं, उन्हें बारंबार नमस्कार है।"
जब यह शक्ति साही के भीतर भी उतनी ही सत्य है जितनी किसी मानव मां के भीतर, तो एक पशु मां की चीख भी पूरे ब्रह्मांड में उतनी ही गूंज पैदा करती है।
दूसरा महत्वपूर्ण शब्द है प्रमाद-हिंसा, जिसका अर्थ है असावधानी, लापरवाही या होश खो देने के कारण हुई हिंसा। इसे अनिच्छा-पाप भी कहा जाता है। हमारे धर्मशास्त्रों में जानबूझकर किए गए अपराध और भूलवश हुई चूक में अंतर किया गया है। यदि आप किसी को दुर्भावना से मारते हैं, तो आपका मन दूषित होता है। लेकिन यदि आपसे अनजाने में भी कोई जीव मरता है, तब भी प्रकृति की व्यवस्था में एक भौतिक क्षति तो हुई ही है। आप यह कहकर पल्ला नहीं झाड़ सकते कि मेरा इरादा नहीं था। धरती का सीना फटा और निर्दोष बच्चों की जान गई, इसलिए उसका संतुलन साधना आवश्यक है।
तीसरा शब्द है पश्चात्ताप। यह शब्द दो भागों से बना है: पश्चात् यानी बाद में, और ताप यानी तपन या अग्नि। इसका अर्थ केवल ऊपरी दुख जताना नहीं है। यह मन की वह भीतरी तपन है जिसमें मनुष्य अपने सभी झूठे तर्कों और अहंकार को जला देता है। यह वह अवस्था है जहां मनुष्य उस पीड़ा को अपने भीतर महसूस करता है जो उसने किसी दूसरे को पहुंचाई है।
इसके बाद आता है प्रायश्चित्त। मनुस्मृति के ग्यारहवें अध्याय में और मीमांसा दर्शन में प्रायश्चित्त की सटीक व्याख्या दी गई है। प्राय का अर्थ है पूर्व में किए गए पापों का क्षय, और चित्त का अर्थ है अंतःकरण की स्थिरता। प्रायश्चित्त कोई कानूनी सजा नहीं है। यह वह चेतन और अनुशासित कर्म है जिसके माध्यम से व्यक्ति अपने कर्मों का शोधन करके पुनः धर्म की मर्यादा में प्रतिष्ठित होता है।
इस व्रत का एक प्रमुख फल अपमृत्यु-हरण माना गया है। आयुर्वेद और ज्योतिष शास्त्र में मनुष्य की स्वाभाविक पूर्ण आयु सौ वर्ष मानी गई है। जब किसी गंभीर अनिष्ट, ग्रह-दोष या भारी कर्म-विपाक के कारण किसी की अकाल मृत्यु होती है, तो उसे अपमृत्यु कहते हैं। अहोई अष्टमी का विधान मूलतः इसी अकाल मृत्यु के भय को मिटाने वाला व्रत है।
इस व्रत की पूरी कार्यप्रणाली स्त्री-आचार और लोक-परंपरा पर आधारित है। धर्मशास्त्र के न्याय-विधान में केवल लिखे हुए ग्रंथ ही प्रमाण नहीं होते। पीढ़ियों से माताओं द्वारा संजोई गई और आचरण में लाई गई परंपराएं भी धर्म का जीवित स्रोत मानी जाती हैं। इन परंपराओं में अक्सर औपचारिक पोथियों से अधिक गहरी पर्यावरणीय समझ देखने को मिलती है।
अंत में आता है तारका-अर्घ्य, यानी सांझ के समय तारों को जल देना। संस्कृत की तृ धातु से तारक शब्द बना है, जिसका अर्थ है पार लगाने वाला, संकट से उबारने वाला या मार्गदर्शक। आकाश के तारे अंधेरी रात में भटके हुए नाविक को दिशा दिखाते हैं। तारों को अर्घ्य देना इस बात की प्रार्थना है कि जैसे ध्रुव तारा और नक्षत्र आकाश में अटल रहते हैं, वैसे ही संतान का जीवन भी संसार के थपेड़ों से सुरक्षित पार उतर जाए।
शास्त्रों और टीकाकारों की दृष्टि में अहोई माता का स्वरूप
जब मध्यकाल के स्मृति-टीकाकारों ने इस व्रत के नियम निर्धारित किए, तो उन्होंने इसे बड़े सूक्ष्म नियमों के आधार पर परखा।
निर्णयसिंधु में कमलाकर भट्ट और धर्मसिंधु में काशीनाथ उपाध्याय ने पूर्वविद्धा और परविद्धा अष्टमी के भेद पर विचार किया है। उनका स्पष्ट निर्णय है कि चूंकि इस व्रत का पारण और पूजन सायंकाल प्रदोष काल में तारों के दर्शन के साथ होता है, इसलिए जिस दिन अष्टमी तिथि सायंकाल यानी प्रदोष काल में व्याप्त हो, उसी दिन यह व्रत किया जाना चाहिए।
टीकाकार इस व्रत को आरंभ में काम्य-व्रत की श्रेणी में रखते हैं। काम्य व्रत वह होता है जो किसी विशेष फल की कामना से, जैसे संतान की दीर्घायु के लिए किया जाए। परंतु वे यह भी जोड़ते हैं कि जो स्त्री इस व्रत को एक बार आरंभ कर देती है, उसके लिए यह जीवन पर्यंत नित्य-व्रत के समान अनिवार्य बन जाता है।
अब यह प्रश्न उठता है कि अहोई माता का मूल शास्त्रीय स्वरूप क्या है। वेदों की संहिताओं में अहोई नाम की कोई स्वतंत्र देवी नहीं मिलती। पौराणिक टीकाकारों के अनुसार अहोई माता वास्तव में भगवती उमा या पार्वती का ही लोक-प्रकट रूप हैं।
पुराणों में इनका सीधा संबंध षष्ठी देवी से जुड़ता है, जिन्हें देवसेना भी कहा जाता है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृति खंड के 43वें अध्याय में और देवी भागवत पुराण के नवें स्कंध में राजा प्रियव्रत की कथा आती है। राजा के पहले पुत्र का जन्म मृत हुआ था। राजा अत्यंत दुखी होकर श्मशान में अपने प्राण त्यागने जा रहे थे। तभी दिव्य रथ पर आरूढ़ होकर षष्ठी देवी प्रकट हुईं। उन्होंने उस मृत बालक को स्पर्श करके जीवित कर दिया और यह वचन दिया:
अपुत्रो लभते पुत्रं दारो लभते प्रियाम्।
मृतवत्सा जीववत्सा भवेद्धर्मिष्ठपूजनात्॥
"जो धर्मपूर्वक मेरी पूजा करता है, उसे संतान की प्राप्ति होती है, पति-पत्नी में प्रेम बढ़ता है, और जिस मां की संतानें बार-बार काल का ग्रास बन जाती हैं, उसकी संतान दीर्घायु होती है।"
उत्तर भारत के लोक-जीवन में षष्ठी देवी की यही कृपा अष्टमी तिथि के साथ मिलकर अहोई माता के रूप में पूजी जाने लगी।
भाषाविदों के अनुसार अहोई शब्द संस्कृत के अक्षयिणी से बना है, जिसका अर्थ है कभी क्षय न होने वाली रक्षा करने वाली देवी। कुछ विद्वान इसे आहत न होने वाली देवी यानी अहता से जोड़ते हैं। यह स्वरूप मां पार्वती के स्कंदमाता रूप का ही विस्तार है, जिन्होंने देवताओं के सेनापति बालक कार्तिकेय की रक्षा की थी।
निर्णयसिंधु में यह स्पष्ट व्यवस्था दी गई है कि जहां लिखित शास्त्र मौन हों, वहां देशाचार और स्त्री-आचार को प्रमाण माना जाए, बशर्ते वे सत्य, अहिंसा और भगवद्-भक्ति के सिद्धांतों के अनुकूल हों। अहोई अष्टमी का पर्व स्त्रियों द्वारा अपनी परंपरा में सहेजी गई इसी वैदिक करुणा का जीवंत उदाहरण है।
प्राणियों के प्रति अपराध और वंश की रक्षा के अन्य शास्त्रीय प्रसंग
सनातन परंपरा में यह विचार नया नहीं है कि किसी मूक पशु को कष्ट देने से मनुष्य के वंश और संतान पर संकट आ सकता है। हमारे प्राचीन साहित्य में इसके अनेक उदाहरण मिलते हैं।
अथर्ववेद का प्रसिद्ध भूमि सूक्त हमें धरती के साथ अपने संबंध का स्मरण कराता है:
माता भूमिः पुत्रो ऽहं पृथिव्याः।
"धरती मेरी माता है और मैं इस भूमि का पुत्र हूं।"
यदि धरती माता है, तो उसके गर्भ में बिल बनाकर रहने वाले छोटे-छोटे जीव भी हमारे सहोदर हैं। वे कोई अवांछित बाधा नहीं हैं।
मनुस्मृति के तीसरे अध्याय में पंच-सूना का उल्लेख मिलता है। ये घर के वे पांच स्थान हैं जहां प्रतिदिन गृहस्थ से अनजाने में सूक्ष्म जीवों की हिंसा होती है: ओखली-मूसल, चक्की, चूल्हा, पानी का घड़ा और झाड़ू। इन दैनिक साधनों के उपयोग से हजारों छोटे कीड़े-मकोड़े मरते हैं। इस पाप के शमन के लिए शास्त्रों ने पंच-महायज्ञ का नियम बनाया, जिसमें पशु-पक्षियों के लिए अन्न-जल निकालना अनिवार्य किया गया। अहोई अष्टमी इसी सिद्धांत को घर की वार्षिक सफाई तक ले जाती है। उस मां का उद्देश्य केवल त्यौहार के लिए घर सजाना था, लेकिन उसकी असावधानी से जमीन के नीचे का जीवन नष्ट हुआ।
कालिदास के रघुवंश महाकाव्य के पहले और दूसरे सर्ग में ऐसा ही एक प्रसिद्ध आख्यान आता है। भगवान राम के पूर्वज राजा दिलीप संतानहीन थे। जब वे महर्षि वशिष्ठ के आश्रम गए, तो महर्षि ने उन्हें बताया कि एक बार देवलोक से लौटते समय उन्होंने कामधेनु सुरभि की उपेक्षा कर दी थी और उन्हें प्रणाम नहीं किया था। एक पशु माता के अनादर के कारण ही उनका वंश रुक गया था।
वशिष्ठ जी ने राजा दिलीप से कहा कि कोई बड़ा यज्ञ या दान इस दोष को नहीं मिटा सकता। इसका एक ही उपाय है कि वे सुरभि की पुत्री नंदिनी गाय की प्रत्यक्ष शारीरिक सेवा करें। राजा दिलीप ने इक्कीस दिनों तक वन में नंदिनी के पीछे-पीछे चलकर उसकी छाया की तरह सेवा की। वे तब बैठते जब गाय बैठती, तब खाते जब गाय चर चुकी होती। यहां तक कि जब एक सिंह ने गाय पर आक्रमण किया, तो राजा ने गाय की रक्षा के लिए अपना शरीर सिंह के आगे रख दिया। जब उस पशु मां का हृदय राजा के त्याग से द्रवित हुआ, तभी उसने रघु जैसे प्रतापी पुत्र का वरदान दिया।
महाभारत के वन पर्व में सावित्री और यमराज का संवाद भी इसी आत्मबल को दिखाता है। जब यमराज सत्यवान के प्राण लेने आए, तो सावित्री ने उनसे कोई युद्ध नहीं किया। वह केवल अपने तपोबल और सत्यनिष्ठा के सहारे यमराज के पीछे चलती रही। धर्मराज भी एक सती के सत्य और संयम के आगे विवश हो गए और उन्होंने सत्यवान को जीवनदान दिया। अहोई अष्टमी पर भी मां अपने बच्चे और अकाल मृत्यु के बीच में अपने तप और उपवास की ढाल लेकर खड़ी हो जाती है।
पूर्वी भारत में, विशेषकर बिहार और झारखंड में, माताएं आश्विन कृष्ण अष्टमी को जितिया या जीवित्पुत्रिका व्रत रखती हैं। वहां की कथा राजा जीमूतवाहन की है, जिन्होंने नाग माता के विलाप को देखकर गरुड़ के सामने अपने शरीर का बलिदान कर दिया था ताकि सांप के बच्चे की रक्षा हो सके। चाहे उत्तर भारत की सेही हो, रघुवंश की गाय हो या जितिया का नाग, भारतीय संस्कृति का एक ही स्वर है: मनुष्य की संतान तभी सुरक्षित रह सकती है जब मनुष्य प्रकृति की संतानों के प्रति दयालु रहे।
आंगन के अनुष्ठानों और प्रतीकों का गहरा अर्थ
अहोई अष्टमी के दिन किए जाने वाले हर पारंपरिक कार्य के पीछे एक स्पष्ट आध्यात्मिक और नैतिक कारण जुड़ा हुआ है।
| पारंपरिक अनुष्ठान | सामान्य जनधारणा | शास्त्रीय और आध्यात्मिक यथार्थ |
|---|---|---|
| दीवार पर स्याहू और बच्चों का अंकन | पूजा स्थल की सामान्य लोक-सज्जा | प्रत्यक्ष प्रायश्चित्त: जिस जीव को अनजाने में कष्ट पहुंचाया, उसे पूजा में देवी के समकक्ष स्थान देकर अपनी भूल को स्वीकार करना। |
| चांदी की स्याहू और मनकों की माला | त्यौहार पर पहना जाने वाला आभूषण | संतान का रक्षक सूत्र: प्रत्येक संतान के जन्म पर दो-दो चांदी के दाने जोड़ना, जो जीवन की नश्वरता और संरक्षण का स्मरण कराते हैं। |
| तारों को अर्घ्य देकर व्रत खोलना | चंद्रमा देर से निकलने के कारण जल्दी पारण | शास्त्रसम्मत करुणा: अष्टमी का चंद्रमा आधी रात को निकलता है। निर्जला मां के स्वास्थ्य की रक्षा और ध्रुव जैसे अटल संरक्षण की कामना से तारों को अर्घ्य दिया जाता है। |
| करवा चौथ के जल के लोटे का उपयोग | पूजा के जल का सहज पुनः उपयोग | व्रत-संतति: पति की सुरक्षा के व्रत और संतान की सुरक्षा के व्रत को एक ही अखंड साधना के प्रवाह में पिरोना। |
इस पूजा में पहनी जाने वाली चांदी की स्याहू की माला अत्यंत मार्मिक प्रतीक है। परिवार में जितनी संतानें होती हैं, उनके नाम के चांदी के गोल दाने उस माला में पिरोए जाते हैं। बच्चे के विवाह होने पर भी दाने जोड़े जाते हैं। पूजा के समय मां उस माला को हाथ में लेकर कथा सुनती है और दिवाली तक उसे धारण करती है। यह इस बात का स्मरण कराता है कि संतान का जीवन कितना कोमल है और उसे हमेशा धर्म और करुणा के धागे में बांधकर रखना चाहिए।
तारों को अर्घ्य देने का विधान हिंदू धर्म की व्यावहारिक करुणा को दर्शाता है। करवा चौथ पूर्णिमा के ठीक चार दिन बाद आता है, इसलिए उस दिन चंद्रमा जल्दी निकल आता है। लेकिन कृष्ण पक्ष की अष्टमी आते-आते चंद्रमा के निकलने का समय आधी रात के आसपास पहुंच जाता है। पूरे दिन भूखी-प्यासी रहने वाली मां यदि आधी रात तक जल न पिए, तो उसका स्वास्थ्य बिगड़ सकता है और घर के दैनिक कर्तव्य प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए हमारे आचार्यों ने तारों को आकाश का प्रतिनिधि मानकर उन्हें अर्घ्य देने की छूट दी। तारे दिशा दिखाते हैं, और मां प्रार्थना करती है कि उसके बच्चे भी जीवन के अंधकार में सही राह पर चलें।
पशु-पक्षियों का मातृत्व और आधुनिक पर्यावरण दृष्टि
जब हम अहोई अष्टमी की कथा में अपने बच्चों के लिए बिल में रोती हुई साही का प्रसंग पढ़ते हैं, तो यह आधुनिक पर्यावरण चेतना के बहुत निकट दिखाई देता है।
बीसवीं सदी के प्रसिद्ध दार्शनिक आर्न नेस ने एक विचार प्रस्तुत किया था जिसे गहन पारिस्थितिकी कहा जाता है। उनका कहना था कि प्रकृति के प्रत्येक जीव का अपना एक स्वतंत्र मूल्य है, चाहे वह मनुष्य के किसी काम आए या न आए। प्रकृति केवल मनुष्यों के उपभोग के लिए बनी कोई सामग्री नहीं है।
अहोई अष्टमी की कथा यही सिखाती है। वह स्त्री किसी दुर्भावना से जंगल नहीं गई थी। वह कोई शिकार नहीं कर रही थी। वह तो केवल अपने धार्मिक त्यौहार के लिए पवित्र मिट्टी लेने गई थी। फिर भी कथा कहती है कि आपका उद्देश्य कितना भी पावन क्यों न हो, वह किसी दूसरे जीव के आवास को उजाड़ने का अधिकार आपको नहीं देता। मनुष्य की सभ्यता का कोई भी उत्सव मूक प्राणियों की कब्र पर नहीं मनाया जा सकता।
पशु व्यवहार पर लंबे समय तक शोध करने वाले आधुनिक वैज्ञानिकों, जैसे फ्रांस डी वाल, मार्क बेकॉफ और जेन गुडॉल ने अपने अध्ययनों में सिद्ध किया है कि स्तनधारी जीवों में अपनी संतानों के प्रति गहरा मानसिक लगाव और शोक का भाव होता है। जब किसी बंदर, हाथी, व्हेल या अन्य पशु का बच्चा मरता है, तो वे कई दिनों तक खाना छोड़ देते हैं, रोते हैं और अवसाद में चले जाते हैं।
हमारे पूर्वजों के पास आज की प्रयोगशालाएं या हार्मोन जांचने की मशीनें नहीं थीं। लेकिन उनके पास प्रकृति को गहराई से देखने वाली संवेदनशील दृष्टि थी। उन्होंने बहुत पहले समझ लिया था कि मां का हृदय चाहे मनुष्य का हो या किसी जंगली पशु का, ममता की भाषा और वियोग का दर्द दोनों में एक जैसा ही होता है। इसी सत्य को लोक-चेतना में स्थापित करने के लिए उन्होंने इस पर्व की रचना की।
नीति और आधुनिक विज्ञान की स्पष्ट सीमा रेखा
यहां हमें यह स्पष्ट समझना होगा कि प्राचीन ग्रंथों की यह दृष्टि कहां तक आधुनिक विचारों से मिलती है और कहां दोनों का मार्ग अलग हो जाता है।
इन दोनों के बीच का वास्तविक संबंध नैतिक, मनोवैज्ञानिक और पर्यावरणीय है। यह व्रत इस बात का ऐतिहासिक प्रमाण है कि हमारे समाज ने वन्यजीवों के आवास के संरक्षण और जीवों की संवेदनशीलता को धार्मिक कर्तव्य का अनिवार्य अंग बना दिया था।
लेकिन हमें इसे किसी जादुई या भौतिक विज्ञान का दावा मानने से बचना चाहिए। आधुनिक विज्ञान पशुओं के शोक को मस्तिष्क की रासायनिक क्रिया और विकासवादी प्रक्रिया के आधार पर समझाता है। विज्ञान इस बात का समर्थन नहीं करता कि किसी पशु के मुंह से निकला श्राप वास्तव में किसी मनुष्य के हृदय की धड़कन रोक सकता है, या दीवार पर मिट्टी का चित्र बना देने से बच्चों की शारीरिक बीमारियां अपने आप ठीक हो जाएंगी।
त्यौहारों के समय इंटरनेट पर फैलाई जाने वाली कपोल-कल्पित बातों से भी सावधान रहना आवश्यक है। कुछ लोग दावा करने लगते हैं कि अहोई अष्टमी का निर्जला उपवास मां के डीएनए में ऐसा परिवर्तन करता है जो बच्चों की कोशिकाओं को विकिरण से बचा लेता है, या साही के बिल से कोई विशेष चुंबकीय तरंगें निकलती हैं। ऐसे दावों का न तो संस्कृत के किसी ग्रंथ में कोई उल्लेख है और न ही आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में इनका कोई आधार है।
अहोई अष्टमी की महानता किसी नकली विज्ञान की बैसाखी पर नहीं टिकी है। इसका असली सौंदर्य इसकी नैतिक सच्चाई में है। आज जब पूरी दुनिया में विकास के नाम पर जंगलों को काटा जा रहा है और वन्यजीवों के आवास छीने जा रहे हैं, तब सदियों पुराना यह व्रत हमें रुककर यह सोचने पर विवश करता है कि हमारे पैर के नीचे किसी नन्हे जीव की दुनिया तो नहीं कुचली जा रही।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
अहोई अष्टमी पर केवल देवी की जगह साही और उसके बच्चों की तस्वीर क्यों बनाई जाती है?
यह विधान प्रत्यक्ष प्रायश्चित्त का प्रतीक है। मूल कथा के अनुसार परिवार पर संकट एक पशु मां के बच्चों की अनजाने में हुई मृत्यु के कारण आया था। शास्त्रों का नियम है कि जिस जीव को आपने पीड़ा पहुंचाई है, उसकी उपेक्षा करके केवल ईश्वर से क्षमा नहीं मांगी जा सकती। दीवार पर साही और उसके बच्चों को बनाकर पूजना इस बात की स्वीकृति है कि पशु का मातृत्व भी मनुष्य के मातृत्व के समान ही वंदनीय है।
करवा चौथ की तरह अहोई अष्टमी पर चंद्रमा को अर्घ्य क्यों नहीं दिया जाता?
कृष्ण पक्ष की अष्टमी को चंद्रमा बहुत देर से, लगभग आधी रात के समय निकलता है। दिन भर निर्जला रहने वाली मां यदि आधी रात तक पानी न पिए, तो उसका स्वास्थ्य बिगड़ सकता है। शास्त्रों ने शारीरिक कष्ट से बचाने के लिए सांझ के समय तारों को देखकर अर्घ्य देने का विधान किया है। तारे मार्गदर्शक और अटल सुरक्षा के प्रतीक माने जाते हैं।
अहोई माता का शास्त्रीय स्वरूप कौन सा है?
अहोई माता भगवती पार्वती का ही लोक-प्रकट वात्सल्य रूप हैं। पुराणों के अनुसार इनका संबंध षष्ठी देवी यानी देवसेना से है, जो छोटे बच्चों की रक्षा करती हैं और अकाल मृत्यु से बचाती हैं। इन्हें स्कंदमाता का रूप भी माना जाता है, जिन्होंने स्वामी कार्तिकेय का पालन-पोषण किया था।
अहोई अष्टमी और मथुरा के राधा कुंड स्नान में क्या संबंध है?
इसी दिन वैष्णव परंपरा में बहुलाष्टमी मनाई जाती है, जो बहुला गाय के सत्य और मातृत्व का पर्व है। पद्म पुराण के अनुसार कार्तिक कृष्ण अष्टमी को ही मध्य रात्रि में राधा कुंड प्रकट हुआ था। इस दिन राधा कुंड में स्नान करने से संतान के कष्ट दूर होते हैं। दोनों ही परंपराएं जीव-जगत के प्रति करुणा और मातृत्व के सम्मान पर केंद्रित हैं।
प्रामाणिक ग्रंथ और स्रोत
- भविष्योत्तर पुराण (पारंपरिक व्रत-कथा संग्रह)
- निर्णयसिंधु, कमलाकर भट्ट (1612 ईस्वी)
- धर्मसिंधु, काशीनाथ उपाध्याय (1790 ईस्वी)
- व्रतराज, विश्वनाथ शर्मा
- मनुस्मृति (अध्याय 3 और 11)
- ब्रह्मवैवर्त पुराण (प्रकृति खंड, अध्याय 43)
- देवी भागवत पुराण (स्कंध 9, अध्याय 46)
- रघुवंश महाकाव्य, कालिदास (प्रथम एवं द्वितीय सर्ग)
- अथर्ववेद, भूमि सूक्त (12.1)
- पशु व्यवहार एवं स्तनधारी मातृत्व अध्ययन (फ्रांस डी वाल, मार्क बेकॉफ और जेन गुडॉल का शोध)
- गहन पारिस्थितिकी के सिद्धांत (आर्न नेस)
यह वही दर्शाता है जो मूल ग्रंथ कहते हैं; आधुनिक विज्ञान से की गई तुलना एक व्याख्या है, कोई अंतिम वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं।


