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व्याकरणमहाभाष्य · भाग 381400

(प्_2,1.24) क_इ,383.2-384,8 रो_इइ,582-587 {41।50} अर्थकृतः .
(प्_2,1.24) क_इ,383.2-384,8 रो_इइ,582-587 {42।50} तत्पुरुषे सति रुहादीनाम् क्तः कर्तरि भवति धात्वर्थस्य अनपवर्गे .
(प्_2,1.24) क_इ,383.2-384,8 रो_इइ,582-587 {43।50} आरूढः वृक्षम् देवदत्तः इति .
(प्_2,1.24) क_इ,383.2-384,8 रो_इइ,582-587 {44।50} बहुव्रीहौ व्यपवृक्ते कर्मणि भवति .
(प्_2,1.24) क_इ,383.2-384,8 रो_इइ,582-587 {45।50} आरूढः वृक्षः देवदत्तेन इति .
(प्_2,1.24) क_इ,383.2-384,8 रो_इइ,582-587 {46।50} अन्यथाजातीयकः खलु अपि प्रत्यक्षेण अर्थसम्प्रत्ययः अन्यथाजातीयकः सम्बन्धात् .
(प्_2,1.24) क_इ,383.2-384,8 रो_इइ,582-587 {47।50} राज्ञः सखा राजसखा .
(प्_2,1.24) क_इ,383.2-384,8 रो_इइ,582-587 {48।50} सम्बन्धात् एतत् गन्तव्यम् नूनम् राज अपि अस्य सखा इति .
(प्_2,1.24) क_इ,383.2-384,8 रो_इइ,582-587 {49।50} उभयम् खलु अपि इष्यते : स्वस्ति सोमसखा पुनः एहि .
(प्_2,1.24) क_इ,383.2-384,8 रो_इइ,582-587 {50।50} गवाङ्सखः इति .
(प्_2,1.26) क_इ,384.10-12 रो_इइ,587 {1।7} किम् उदाहरणम् .
(प्_2,1.26) क_इ,384.10-12 रो_इइ,587 {2।7} खट्वारूढः जाल्मः .
(प्_2,1.26) क_इ,384.10-12 रो_इइ,587 {3।7} क्षेपे इति उच्यते .
(प्_2,1.26) क_इ,384.10-12 रो_इइ,587 {4।7} कः क्षेपः नाम .
(प्_2,1.26) क_इ,384.10-12 रो_इइ,587 {5।7} अधीत्य स्नात्वा गुरुभिः अनुज्ञातेन खट्वा आरोढव्या .
(प्_2,1.26) क_इ,384.10-12 रो_इइ,587 {6।7} यः इदानीम् अतः अन्यथ करोति सः खट्वारूढः अयम् जाल्मः .
(प्_2,1.26) क_इ,384.10-12 रो_इइ,587 {7।7} न अतिव्रतवान् इति .
(प्_2,1.29) क_इ,384.14-20 रो_इइ,588 {1।12} अत्यन्तसंयोगे समासस्य अविशेषवचनात् क्तेन समासवचनानर्थक्यम् .
(प्_2,1.29) क_इ,384.14-20 रो_इइ,588 {2।12} अत्यन्तसंयोगे समासस्य अविशेषवचनात् क्तान्तेन च अक्तान्तेन च कालाः क्तान्तेन इति समासवचनम् अनर्थकम् .
(प्_2,1.29) क_इ,384.14-20 रो_इइ,588 {3।12} अत्यन्तसंयोगे इति एव सिद्धम् .
(प्_2,1.29) क_इ,384.14-20 रो_इइ,588 {4।12} अनत्यन्तसंयोगार्थम् तु .
(प्_2,1.29) क_इ,384.14-20 रो_इइ,588 {5।12} अनत्यन्तसंयोगार्थम् तर्हि इदम् वक्तव्यम् .
(प्_2,1.29) क_इ,384.14-20 रो_इइ,588 {6।12} षट् मुहूर्ताः चराचराः .
(प्_2,1.29) क_इ,384.14-20 रो_इइ,588 {7।12} ते कदा चित् अहः गच्छन्ति कदा चित् रात्रिम् .
(प्_2,1.29) क_इ,384.14-20 रो_इइ,588 {8।12} तत् उच्यते अहर्गताः रात्रिगताः इति .
(प्_2,1.29) क_इ,384.14-20 रो_इइ,588 {9।12} न एतत् अस्ति .
(प्_2,1.29) क_इ,384.14-20 रो_इइ,588 {10।12} गतग्रहणात् अपि एतत् सिद्धम् .
(प्_2,1.29) क_इ,384.14-20 रो_इइ,588 {11।12} इदम् तर्हि .
(प्_2,1.29) क_इ,384.14-20 रो_इइ,588 {12।12} अहरतिसृताः रात्र्यतिसृताः मासप्रमितः चन्द्रमाः .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {1।52} तत्कृतार्थेन इति किमर्थम् .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {2।52} दध्ना पटुः घृतेन पटुः .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {3।52} न एतत् अस्ति .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {4।52} असामर्थ्यात् अत्र न भविष्यति .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {5।52} कथम् असामर्थ्यम् .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {6।52} सापेक्षम् असमर्थम् भवति इति .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {7।52} न हि दध्नः पटुना सामर्थ्यम् .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {8।52} केन तर्हि .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {9।52} भुजिना .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {10।52} दध्ना भुङ्क्ते पटुः इति .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {11।52} इह अपि तर्हि न प्राप्नोति .

(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {12।52} शङ्कुलाखण्डः किरिकाणः इति .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {13।52} अत्र अपि न शङ्कुलायाः खण्डेन सामर्थ्यम् .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {14।52} केन तर्हि .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {15।52} करोतिना .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {16।52} शङ्कुलया कृतः खण्डः इति .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {17।52} वचनात् भविष्यति .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {18।52} इह अपि वचनात् भविष्यति दध्ना पटुः घृतेन पटुः इति .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {19।52} तस्मात् तत्कृतार्थग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {20।52} गुणवचनेन इति किमर्थम् .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {21।52} गोभिः वपावान् धान्येन धनवान् .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {22।52} किम् पुनः इह उदाहरणम् .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {23।52} शङ्कुलाखण्डः देवदत्तः इति .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {24।52} कथम् पुनः गुणवचनेन समासः उच्यमानः द्रव्यवचनेन स्यात् .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {25।52} इह तृतीया तत्कृतार्थेन गुणेन इति इयता सिद्धम् .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {26।52} सः अयम् एवम् सिद्धे सति यत् वचनग्रहणम् करोति तस्य एतत् प्रयोजनम् एवम् यथा विज्ञायेत गुणम् उक्तवता गुणवचनेन इति .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {27।52} कथम् पुनः अयम् गुणवचनः सन् द्रव्यवचनः सम्पद्यते .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {28।52} आरभ्यते तत्र मतुब्लोपः गुणवचनेभ्यः मतुपः लुक् इति .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {29।52} तत् यथा शुक्लगुणः शुक्लः कृष्णगुणः कृष्णः एवम् खण्डगुणः खण्डः .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {30।52} यदि एवम् न अर्थः कृतार्थग्रहणेन .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {31।52} भवति हि शङ्कुलायाः खण्डेन सामर्थ्यम् .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {32।52} असामर्थ्यात् च अत्र न भविष्यति दध्ना पटुः घृतेन पटुः इति .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {33।52} तस्मत् न अर्थः तत्कृतार्थग्रहणेन .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {34।52} तृतीयासमासे अर्थग्रहणम् अनर्थकम् अर्थगतिः हि अवचनात् .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {35।52} तृतीयासमासे अर्थग्रहणम् अनर्थकम् .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {36।52} किम् कारणम् .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {37।52} अर्थगतिः हि अवचनात् .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {38।52} अन्तरेण अपि वचनम् अर्थगतिः भविष्यति .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {39।52} निर्देश्यम् इति चेत् तृतीयार्थनिर्देशः अपि .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {40।52} अथ एवम् अपि निर्देशः कर्तव्यः इति चेत् तृतीयार्थनिर्देशः अपि कर्तव्यः स्यात् .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {41।52} तृतीया तदर्थकृतार्थेन इति वक्तव्यम् .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {42।52} तत् तर्हि वक्तव्यम् .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {43।52} न वक्तव्यम् .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {44।52} न अयम् अर्थनिर्देशः .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {45।52} किम् तर्हि .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {46।52} योगाङ्गम् इदम् निर्दिश्यते .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {47।52} सति च योगाङ्गे योगविभागः करिष्यते .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {48।52} तृतीया तत्कृतेन गुणवचनेन समस्यते .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {49।52} ततः अर्थेन .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {50।52} अर्थशब्देन च तृतीया समस्यते .
(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {51।52} धान्याऋथः वसनार्थः .

(प्_2,1.30) क_इ,384.22-385.22 रो_इइ,589-592 {52।52} पूर्वसदृशसमोनार्थ इति अर्थग्रहणम् न कर्तव्यम् भवति .
(प्_2,1.31) क_इ,385.24-386.3 रो_इइ,592-593 {1।7} पूर्वादिषु अवरस्य उपसङ्ख्यानम् .
(प्_2,1.31) क_इ,385.24-386.3 रो_इइ,592-593 {2।7} पूर्वादिषु अवरस्य उपसङ्ख्यानम् .
(प्_2,1.31) क_इ,385.24-386.3 रो_इइ,592-593 {3।7} मासावरः अयम् संवत्सरावरः अयम् .
(प्_2,1.31) क_इ,385.24-386.3 रो_इइ,592-593 {4।7} सदृशग्रहणे उक्तम् .
(प्_2,1.31) क_इ,385.24-386.3 रो_इइ,592-593 {5।7} किम् उक्तम् .
(प्_2,1.31) क_इ,385.24-386.3 रो_इइ,592-593 {6।7} सद्र्शग्रहणम् अनर्थकम् तृतीयासमासवचनात् .
(प्_2,1.31) क_इ,385.24-386.3 रो_इइ,592-593 {7।7} षष्ठ्यर्थम् इति चेत् तृतीयासमासवचनानर्थक्यम् इति .
(प्_2,1.32) क_इ,386.5-8 रो_इइ,593 {1।8} कर्तृकरणे कृता क्तेन .
(प्_2,1.32) क_इ,386.5-8 रो_इइ,593 {2।8} कर्तृकरणे कृता क्तेन इति वक्तव्यम्. अहिहतः नखनिर्भिन्नः दात्रलूनः परशुच्छिन्नः .
(प्_2,1.32) क_इ,386.5-8 रो_इइ,593 {3।8} कृता क्तेन इति किमर्थम् .
(प्_2,1.32) क_इ,386.5-8 रो_इइ,593 {4।8} इह मा भूत् .
(प्_2,1.32) क_इ,386.5-8 रो_इइ,593 {5।8} दात्रेण लूनवान् परशुना छिन्नवान् .
(प्_2,1.32) क_इ,386.5-8 रो_इइ,593 {6।8} तत् तर्हि वक्तव्यम् .
(प्_2,1.32) क_इ,386.5-8 रो_इइ,593 {7।8} न वक्तव्यम् .
(प्_2,1.32) क_इ,386.5-8 रो_इइ,593 {8।8} बहुलवचनात् सिद्धम् .
(प्_2,1.33) क_इ,386.10-15 रो_इइ,594 {1।7} कृत्र्यैः अधिकार्थवचने अन्यत्र अपि दृश्यते .कृत्र्यैः अधिकार्थवचने अन्यत्र अपि दृश्यते इति वक्तव्यम् .
(प्_2,1.33) क_इ,386.10-15 रो_इइ,594 {2।7} बुसोपेन्ध्यम् तृणोपेन्ध्यम् घनघात्यम् .
(प्_2,1.33) क_इ,386.10-15 रो_इइ,594 {3।7} साधनम् कृता इति वा पादहारकाद्यर्थम् .
(प्_2,1.33) क_इ,386.10-15 रो_इइ,594 {4।7} अथ वा साधनम् कृता सह समस्यते इति वक्तव्यम् .
(प्_2,1.33) क_इ,386.10-15 रो_इइ,594 {5।7} किम् प्रयोजनम् .
(प्_2,1.33) क_इ,386.10-15 रो_इइ,594 {6।7} पादहारकाद्यर्थम् .
(प्_2,1.33) क_इ,386.10-15 रो_इइ,594 {7।7} पादाभ्याम् ह्रियते पादहारकः गले चोप्यते गलेचोपकः .
(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {1।37} अन्नेन व्यञ्जनम् भक्ष्येण मिश्रीकरणम् इति असमर्थसमासः .
(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {2।37} अन्नेन व्यञ्जनम् भक्ष्येण मिश्रीकरणम् इति असमर्थसमासः अयम् द्रष्टव्यः .
(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {3।37} किम् कारणम् .
(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {4।37} कारकाणाम् क्रियया सामर्थ्यात् .
(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {5।37} कारकाणाम् क्रियया सामर्थ्यम् भवति न तेषाम् अन्योन्येन .
(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {6।37} तत् यथा निश्रयण्या द्वाभ्याम् काष्ठाभ्याम् सामर्थ्यम् न तेषाम् अन्योन्येन .
(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {7।37} एवम् तर्हि आह अयम् अन्नेन व्यञ्जनम् भक्ष्येण मिश्रीकरणम् इति न च अस्ति सामर्थ्यम् .
(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {8।37} तत्र वचनात् समासः भविष्यति .
(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {9।37} वचनप्रामाण्यात् इति चेत् नानाकारकाणाम् प्रतिषेधः . वचनप्रामाण्यात् इति चेत् नानाकारकाणाम् प्रतिषेधः वक्तव्यः .
(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {10।37} तिष्ठतु दध्ना ओदनः भुज्यते देवदत्तेन .
(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {11।37} सिद्धम् तु समानाधिकरणाधिकारे क्तः तृतीयापूर्वपदः उत्तरपदलोपः च षिद्धम् एतत् .
(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {12।37} कथम् .
(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {13।37} समानाधिकरणाधिकारे वक्तव्यम् क्तः तृतीयापूर्वपदः समस्यतेसुपा उत्तरपदस्य च लोपः भवति इति .
(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {14।37} दध्ना उपसिक्तः दध्युपसिक्तः दध्युपसिक्तः ओदनः दध्योदनः गुडेन संसृष्टाः गुडसंसृष्टाः , गुडसंसृष्टाः धानाः गुडधानाः .
(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {15।37} षष्ठीसमासः च युक्तपूर्णान्तः .
(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {16।37} षष्ठीसमासः च युक्तपूर्णान्तः समस्यते उत्तरपदस्य च लोपः वक्तव्यः .
(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {17।37} अश्वानाम् युक्तः अश्वयुक्तः अश्वयुक्तः रथः अश्वरथः .

(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {18।37} दध्नः पूर्णः ददिपूर्णः दधिपूर्णः घटः दधिघटः .
(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {19।37} तत् तर्हि बहु वक्तव्यम् .
(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {20।37} न वा असमासे अदर्शनात् .
(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {21।37} न वा वक्तव्यम् .
(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {22।37} किम् कारणम् .
(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {23।37} असमासे अदर्शनात् .
(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {24।37} यत् हि असमासे दृश्यते समासे च न दृश्यते तत् लोपारम्भम् प्रयोजयति .
(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {25।37} न च असमासे उपसिक्तशब्दः संसृष्टशब्दः पूर्णशब्दः वा दृश्यते .
(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {26।37} कथम् तर्हि सामर्थ्यम् गम्यते .
(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {27।37} युक्तार्थसम्प्रत्ययात् च सामर्थ्यम् .
(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {28।37} दध्ना युक्तार्थता सम्प्रतीयते .
(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {29।37} कथम् पुनः ज्ञायते दध्ना युक्तार्थता सम्प्रतीयते इति .
(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {30।37} सम्प्रत्ययात् च तदर्थाध्यवसानम् .
(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {31।37} सम्प्रत्ययात् च तदर्थः अध्यवसीयते .
(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {32।37} अवश्यम् च एतत् एवम् विज्ञेयम् .
(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {33।37} सम्प्रतीयमानार्थलोपे हि अनवस्था .यः हि मन्यते सम्प्रतीयमानार्थानाम् शब्दानाम् लोपः भवति इति अनवस्था तस्य लोपस्य स्यात् .
(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {34।37} दधि इति उक्ते बहवः अर्थाः गम्यन्ते मन्दकम् उत्तरकम् निलीनकम् इति तद्वाचिनाम् शब्दानाम् लोपः वक्तव्यः स्यात् .
(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {35।37} तथा गुडः इति उक्ते मधुरशब्दस्य शृङ्गवेरम् इति उक्ते च कटुशब्दस्य .
(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {36।37} अन्तरेण खलु अपि शब्दप्रयोगम् बहवः अर्थाः गम्यन्ते अक्षिनिकोचैः पाणिविहारैः च .
(प्_2,1.34-35) क_इ,386.18-388.4 रो_इइ,595-597 {37।37} तद्वाचिनाम् शब्दानाम् लोपः वक्तव्यः स्यात् .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {1।105} किम् चतुर्थ्यन्तस्य तदर्थमात्रेण समासः भवति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {2।105} एवम् भवितुम् अर्हति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {3।105} चतुर्थी तदर्थमात्रेण चेत् सर्वप्रसङ्गः अविशेषात् .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {4।105} चतुर्थी तदर्थमात्रेण चेत् सर्वप्रसङ्गः सर्वस्य चतुर्थ्यन्तस्य तदर्थमात्रेण सह समासः प्राप्नोति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {5।105} अनेन अपि प्राप्नोति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {6।105} रन्धनाय स्थाली अवहननाय उलूखलम् इति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {7।105} किम् कारणम् .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {8।105} अविशेषात् .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {9।105} न हि कः चित् विशेषः उपादीयते एवञ्जातीयकस्य चतुर्थ्यन्तस्य तदर्थेन सह समासः भवति इति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {10।105} अनुपादीयमने विशेषे सर्वप्रसङ्गः .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {11।105} बलिरक्षिताभ्याम् च अनर्थकम् वचनम् .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {12।105} बलिरक्षिताभ्याम् च समासवचनम् अनर्थकम् .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {13।105} यः हि महाराजाय बलिः महाराजार्थः सः भवति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {14।105} तत्र तदर्थः इति एव सिद्धम् .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {15।105} यदि पुनः विकृतिः चतुर्थ्यन्ता प्रकृत्या सह समस्यते इति एतत् लक्षणम् क्रियेत .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {16।105} विकृतिः प्रकृत्या इति चेत् अश्वघासादीनाम् उपसङ्ख्यानम् .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {17।105} विकृतिः प्रकृत्या इति चेत् अश्वघासादीनाम् उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {18।105} अश्वघासः श्वश्रूसुरम् हस्तिविधा इति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {19।105} अर्थेन नित्यसमासवचनम् .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {20।105} अर्थ्शब्देन नित्यसमासः वक्तव्यः .

(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {21।105} ब्राह्मणार्थम् क्षत्रियार्थम् .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {22।105} किम् विकृतिः चतुर्थ्यन्ता प्रकृत्या सह समस्यते इति अतः अर्थेन नित्यसमासः वक्तव्यः .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {23।105} न इति आह सर्वथा अर्थेन नित्यसमासः वक्तव्यः विग्रहः मा भूत् इति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {24।105} सर्वलिङ्गता च .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {25।105} सर्वलिङ्गता च वक्तव्या .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {26।105} ब्राह्मणार्थम् पयः ब्राह्मणार्थः सूपः ब्राह्मणार्था यवागूः इति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {27।105} किम् अर्थेन नित्यसमासः उच्यते इति अतः सर्वलिङ्गता वक्तव्या .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {28।105} न इति आह .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {29।105} सर्वथा सर्वलिङ्गता वक्तव्या .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {30।105} किम् कारणम् .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {31।105} अर्थशब्दः अयम् पुंलिङ्गः उत्तरपदार्थप्रधानः च तत्पुरुषः .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {32।105} तेन पुंलिङ्गस्य एव समासस्य अभिधानम् स्यात् स्त्रीनपुंसकलिङ्गस्य न स्यात् .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {33।105} तत् तर्हि बहु वक्तव्यम् .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {34।105} विकृतिः प्रकृत्या इति वक्तव्यम् .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {35।105} अश्वघासादीनाम् उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {36।105} अर्थेन नित्यसमासः वक्तव्यः .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {37।105} सर्वलिङ्गता च वक्तव्या .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {38।105} न वक्तव्यम् .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {39।105} यत् तावत् उच्यते विकृतिः प्रकृत्या इति वक्तव्यम् .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {40।105} न वक्तव्यम् .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {41।105} आचार्यप्रवृत्तिः ज्ञायपति विकृतिः चतुर्थ्यन्ता प्रकृत्या सह समस्यते इति यत् अयम् बलिरकिषितग्रहणम् करोति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {42।105} कथम् कृत्वा ज्ञापकम् .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {43।105} यथाजातीयकानाम् समासे बलिरक्षितग्रहणेन अर्थः तथाजातीयकानाम् समासः .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {44।105} यदि च विकृतिः चतुर्थ्यन्ता प्रकृत्या सह समस्यते न तदर्थमात्रेण ततः बलिरकिषितग्रहणम् अर्थवत् भवति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {45।105} यत् अपि उच्यते अश्वघासादीनाम् उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् इति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {46।105} न कर्तव्यम् .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {47।105} अश्वघासादयः षष्ठीसमासाः भविष्यन्ति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {48।105} यत् हि यदर्थम् भवति अयम् अपि तत्र अभिसम्बन्धः भवति अस्य इदम् इति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {49।105} तत् यथा गुरोः इदम् गुर्वर्थम् इति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {50।105} ननु च स्वरभेदः भवति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {51।105} चतुर्थीसमासे सति पूर्वपदप्रकृतिस्वरत्वेन भवितव्यम् षष्ठीसमासे पुनः अन्तोदात्तत्वेन ण अस्ति भेदः .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {52।105} चतुर्थीसमासे अपि सति अन्तोदात्तत्वेन एव भवितव्यम् .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {53।105} कथम् .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {54।105} आचार्यप्रवृत्तिः ज्ञापयति विकृतिः चतुर्थ्यन्ता प्रकृतिस्वरा भवति न चतुर्थीमात्रम् इति यत् अयम् चतुर्थी तदर्थे अर्थे क्ते च इति अर्थग्रहणम् क्तग्रहणम् च करोति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {55।105} कथम् कृत्वा ज्ञापकम् .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {56।105} यथाजातीयकानाम् अर्थग्रहणेन क्तग्रहणेन च अर्थः तथाजातीयकानाम् प्रकृतिस्वरत्वम् .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {57।105} यदि च विकृतिः चतुर्थ्यन्ता प्रकृत्या भवति न चतुर्थीमात्रम् ततः अर्थग्रहणम् क्तग्रहणम् च अर्थवत् भवति .यत् अपि उच्यते अर्थेन नित्यसमासः वक्तव्यः इति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {58।105} न वक्तव्यः .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {59।105} सर्थप्प्रत्ययः करिष्यते .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {60।105} किम् कृतम् भवति .

(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {61।105} न च एव हि कदा चित् विग्रहः भवति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {62।105} अपि च सर्वलिङ्गता सिद्धा भवति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {63।105} यदि सर्थप्प्रतयः क्रियते इत्सञ्ज्ञा न प्राप्नोति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {64।105} अथ अपि कथम् चित् इत्सञ्ज्ञा स्यात् एवम् अपि श्र्यर्थम् भ्वर्थम् इति अङ्गस्य इति इयङुवङौ स्याताम् .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {65।105} एवम् तर्हि बहुव्रीहिः भवैष्यति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {66।105} किम् कृतम् भवति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {67।105} भवति वै कः चित् अस्वपदविग्रहः बहुव्रीहिः .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {68।105} तत् यथा शोभनम् मुखम् अस्याः सुमुखी इति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {69।105} न एवम् शक्यम् .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {70।105} इह हि महदर्थम् इति आत्त्वकपौ प्रसज्येताम् .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {71।105} एवम् तर्हि तदर्थस्य उत्तरपदस्य अर्थशब्दः आदेशः करिष्यते .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {72।105} किम् कृतम् भवति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {73।105} न च एव कदा चित् आदेशेन विग्रहः भवति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {74।105} अपि च सर्वलिङ्गता सिद्धा भवति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {75।105} तत् तर्हि वक्तव्यम् .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {76।105} न वक्तव्यम् .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {77।105} योगविभागः करिष्यते .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {78।105} चतुर्थी सुबन्तेन सह समस्यते .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {79।105} ततः तदर्थार्थ .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {80।105} तदर्थस्य उत्तरपदस्य अर्थशब्दः आदेशः भवति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {81।105} इह अपि तर्हि समासः प्राप्नोति छात्राय रुचितम् छात्राय स्वदितम् इति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {82।105} आचार्यप्रवृत्तिः ज्ञापयति तादर्थ्ये य चतुर्थी सा समस्यते न चतुर्थीमात्रम् इति यत् अयम् हितसुखग्रहणम् करोति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {83।105} कथम् कृत्वा ज्ञापकम् .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {84।105} यथाजातीयकानाम् समासे हितसुखग्रहणेन अर्थः तथाजातीयकानम् समासः .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {85।105} यदि च तादर्थ्ये या चतुर्थी सा समस्यते न चतुर्थीमात्रम् ततः हितसुखग्रहणम् अर्थवत् भवति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {86।105} इह अपि तर्हि तदर्थस्य उत्तरपदस्य अर्थशब्दः आदेशः प्राप्नोति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {87।105} यूपाय दारु यूपदारु रथदारु .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {88।105} वावचनम् विधास्यते .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {89।105} इह अपि तर्हि विभाषा प्राप्र्नोति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {90।105} ब्राह्मणाऋथम् क्षत्रियार्थम् इति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {91।105} एवम् तर्हि आचार्यप्रवृत्तिः ज्ञापयति प्रकृतिविकृत्योः यः समासः तत्र तदर्थस्य उत्तरपदस्य अर्थशब्दः आदेशः भवति अन्यत्र नित्यः इति यत् अयम् बलिहितग्रहणम् करोति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {92।105} एवम् तर्हि उदकार्थः वीवधः .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {93।105} स्थानिवद्भावात् उदभावः प्राप्नोति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {94।105} तस्मात् न एवम् शक्यम् .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {95।105} न चेत् एवम् अर्थेन नित्यसमासः वक्तव्यः सर्वलिङ्गता च .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {96।105} न एषः दोषः .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {97।105} इदम् तावत् अयम् प्रष्टव्यः .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {98।105} अथ इह ब्राह्मणेभ्यः इति का एषा चतुर्थी .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {99।105} तादर्थ्ये इति आह .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {100।105} यदि तादर्थ्ये चतुर्थी अर्थशब्दस्य प्रयोगेण न भवितव्यम् उक्तार्थानाम् अप्रयोगः इति .

(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {101।105} समासः अपि तर्हि न प्राप्नोति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {102।105} वचनात् समासः भविष्यति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {103।105} यत् अपि उच्यते सर्वलिङ्गता च वक्तव्या इति .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {104।105} न वक्तव्या .
(प्_2,1.36) क_इ,388.6-390.19 रो_इइ,598-603 {105।105} लिङ्गम् अशिष्यम् लोकाश्रयत्वात् लिङ्गस्य .
(प्_2,1.37) क_इ,390.21-24 रो_इइ,604 {1।4} अत्यल्पम् इदम् उच्यते भयेन इति .
(प्_2,1.37) क_इ,390.21-24 रो_इइ,604 {2।4} भयभीतभीतिभीभिः इति वक्तव्यम् .
(प्_2,1.37) क_इ,390.21-24 रो_इइ,604 {3।4} वृकात् भयम् वृकभयम् वृकात् भीतः वृकभीतः वृकात् भीतिः वृकभीतिः वृकात् भीः वृकभीः इति .
(प्_2,1.37) क_इ,390.21-24 रो_इइ,604 {4।4} अपरः आह : भयनिर्गतजुगुप्सुभिः इति वक्तव्यम् : वृकभयम् ग्रामनिर्गतः अधर्मजुगुप्सुः इति .
(प्_2,1.40) क_इ,390.26-391.2 रो_इइ,604 {1।6} शौण्डादिभिः इति वक्तव्यम् .
(प्_2,1.40) क_इ,390.26-391.2 रो_इइ,604 {2।6} इह अपि यथा स्यात् .
(प्_2,1.40) क_इ,390.26-391.2 रो_इइ,604 {3।6} अक्षधूर्तः स्त्रीधूर्तः अक्षकितवः स्त्रीकितवः इति .
(प्_2,1.40) क_इ,390.26-391.2 रो_इइ,604 {4।6} तत् तर्हि वक्तव्यम् .
(प्_2,1.40) क_इ,390.26-391.2 रो_इइ,604 {5।6} न वक्तव्यम् .
(प्_2,1.40) क_इ,390.26-391.2 रो_इइ,604 {6।6} बहुवचननिर्देशात् शौण्डादिभिः इति विज्ञास्यते .
(प्_2,1.42) क_इ,391.4-7 रो_इइ,605 {1।7} ध्वाङ्क्षेण इति अर्थग्रहणम् .
(प्_2,1.42) क_इ,391.4-7 रो_इइ,605 {2।7} ध्वाङ्क्षेण इति अर्थग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_2,1.42) क_इ,391.4-7 रो_इइ,605 {3।7} इह अपि यथा स्यात् .
(प्_2,1.42) क_इ,391.4-7 रो_इइ,605 {4।7} तीर्थकाकः इति .
(प्_2,1.42) क_इ,391.4-7 रो_इइ,605 {5।7} क्षेपे इति उच्यते .
(प्_2,1.42) क_इ,391.4-7 रो_इइ,605 {6।7} कः इह क्षेपः नाम .
(प्_2,1.42) क_इ,391.4-7 रो_इइ,605 {7।7} यथा तीर्थे काकाः न चिरम् स्थातारः भवन्ति एवम् यः गुरुकुलानि गत्वा न चिरम् तिष्ठति स उच्यते तीर्थकाकः इति .
(प्_2,1.43) क_इ,391.9-13 रो_इइ,605 {1।12} कृत्यैः नियोगे यद्ग्रहणम् .
(प्_2,1.43) क_इ,391.9-13 रो_इइ,605 {2।12} कृत्यैः नियोगे इति वक्तव्यम् .
(प्_2,1.43) क_इ,391.9-13 रो_इइ,605 {3।12} इह अपि यथा स्यात् .
(प्_2,1.43) क_इ,391.9-13 रो_इइ,605 {4।12} पूर्वाःणेगेयम् साम प्रातः अध्येयः अनुवाकः इति .
(प्_2,1.43) क_इ,391.9-13 रो_इइ,605 {5।12} तत् तर्हि वक्तव्यम् .
(प्_2,1.43) क_इ,391.9-13 रो_इइ,605 {6।12} न वक्तव्यम् .
(प्_2,1.43) क_इ,391.9-13 रो_इइ,605 {7।12} ऋणे इति एव सिद्धम् .
(प्_2,1.43) क_इ,391.9-13 रो_इइ,605 {8।12} इह यत् यस्य नियोगतः कार्यम् ऋणम् तस्य तत् भवति .
(प्_2,1.43) क_इ,391.9-13 रो_इइ,605 {9।12} ततः ऋणे इति एव सिद्धम् .
(प्_2,1.43) क_इ,391.9-13 रो_इइ,605 {10।12} यग्रहणम् च कर्तव्यम् .
(प्_2,1.43) क_इ,391.9-13 रो_इइ,605 {11।12} इह मा भूत् .
(प्_2,1.43) क_इ,391.9-13 रो_इइ,605 {12।12} पूर्वाह्णे दातव्या भिक्षा इति .
(प्_2,1.47) क_इ,391.15-20 रो_इइ,605 {1।9} किम् उदाहरणम् .
(प्_2,1.47) क_इ,391.15-20 रो_इइ,605 {2।9} अवतप्तेनकुलस्थितम् ते एतत् .
(प्_2,1.47) क_इ,391.15-20 रो_इइ,605 {3।9} क्षेपे इति उच्यते .
(प्_2,1.47) क_इ,391.15-20 रो_इइ,605 {4।9} कः इह क्षेपः नाम .
(प्_2,1.47) क_इ,391.15-20 रो_इइ,605 {5।9} यथा अवतप्ते नकुलाः न चिरम् स्थातारः भवन्ति एवम् कार्याणि आरभ्य यः न चिरम् तिष्ठति स उच्यते अवतप्तेनकुलस्थितम् ते एतत् इति .
(प्_2,1.47) क_इ,391.15-20 रो_इइ,605 {6।9} क्षेपे सप्तम्यन्तम् क्तान्तेन सह समस्यते इति उच्यते .

(प्_2,1.47) क_इ,391.15-20 रो_इइ,605 {7।9} तत्र सगतिकेन सनकुलेन च समासः न प्राप्नोति .
(प्_2,1.47) क_इ,391.15-20 रो_इइ,605 {8।9} क्षेपे गतिकारकपूर्वे उक्तम् . किम् उक्तम् .
(प्_2,1.47) क_इ,391.15-20 रो_इइ,605 {9।9} कृद्ग्रहणे गतिकारकपूर्वस्य अपि इति .
(प्_2,1.48) क_इ,392.2-3 रो_इइ,606 {1।5} किमर्थः चकारः .
(प्_2,1.48) क_इ,392.2-3 रो_इइ,606 {2।5} एवकारार्थः .
(प्_2,1.48) क_इ,392.2-3 रो_इइ,606 {3।5} पात्रेसमितादयः एव .
(प्_2,1.48) क_इ,392.2-3 रो_इइ,606 {4।5} क्व मा भूत् .
(प्_2,1.48) क_इ,392.2-3 रो_इइ,606 {5।5} परमम् पात्रेसमिताः इति .
(प्_2,1.49) क_इ,392.5-14 रो_इइ,606-607 {1।13} इह कस्मात् अव्ययीभावः न भवति .
(प्_2,1.49) क_इ,392.5-14 रो_इइ,606-607 {2।13} एका नदी एकनदी .
(प्_2,1.49) क_इ,392.5-14 रो_इइ,606-607 {3।13} नदीभिः सङ्ख्या इति प्राप्नोति .
(प्_2,1.49) क_इ,392.5-14 रो_इइ,606-607 {4।13} इह कः चित् समासः पूर्वपदार्थप्रधानः , कः चित् उत्तरपदार्थप्रधानः , कः चित् अन्यपदार्थप्रधानः , कः चित् उभयपदार्थप्रधानः .
(प्_2,1.49) क_इ,392.5-14 रो_इइ,606-607 {5।13} पूर्वपदार्थप्रधानः अव्ययीभावः , उत्तरपदार्थप्रधानः तत्पुरुषः , अन्यपदार्थप्रधानः बहुव्रीहिः , उभयपदार्थप्रधानः द्वन्द्वः. न च अत्र पूर्वपदार्थप्राधान्यम् गम्यते .
(प्_2,1.49) क_इ,392.5-14 रो_इइ,606-607 {6।13} अथवा अव्ययीभावः क्रियताम् बहुव्रीहिः इति .
(प्_2,1.49) क_इ,392.5-14 रो_इइ,606-607 {7।13} बहुव्रीहिः भविष्यति विप्रतिषेधेन .
(प्_2,1.49) क_इ,392.5-14 रो_इइ,606-607 {8।13} भवेत् एकसञ्ज्ञाधिकारे सिद्धम् परङ्कार्यत्वे तु न सिध्यति .
(प्_2,1.49) क_इ,392.5-14 रो_इइ,606-607 {9।13} आरम्भसामर्थ्यात् च अव्ययीभावः प्राप्नोति परङ्कार्यत्वात् च बहुव्रीहिः .
(प्_2,1.49) क_इ,392.5-14 रो_इइ,606-607 {10।13} परङ्कार्यत्वे च न दोषः .
(प्_2,1.49) क_इ,392.5-14 रो_इइ,606-607 {11।13} नदीभिः सङ्ख्यायाः समाहारे अव्ययीभावः वक्तव्यः .
(प्_2,1.49) क_इ,392.5-14 रो_इइ,606-607 {12।13} सः च अवश्यम् वक्तव्यः .
(प्_2,1.49) क_इ,392.5-14 रो_इइ,606-607 {13।13} सर्वम् एकनदीतरे .
(प्_2,1.51.1) क_इ,393.2-19 रो_इइ,607-609 {1।32} समाहारः इति कः अयम् शब्दः .
(प्_2,1.51.1) क_इ,393.2-19 रो_इइ,607-609 {2।32} समाङ्पूर्वात् हरतेः सर्मसाधने घञ् .
(प्_2,1.51.1) क_इ,393.2-19 रो_इइ,607-609 {3।32} समाह्रियते समाहारः इति .
(प्_2,1.51.1) क_इ,393.2-19 रो_इइ,607-609 {4।32} यदि कर्मसाधनः पञ्च कुमार्यः समहृताः पञ्चकुमारि दशकुमारि गोस्त्रियोः उपसर्जनस्य इति ह्रस्वत्वम् न प्राप्नोति द्विगुः एकवचनम् इति एतत् च वक्तव्यम् .
(प्_2,1.51.1) क_इ,393.2-19 रो_इइ,607-609 {5।32} एवम् तर्हि भावसाधनः भविष्यति .
(प्_2,1.51.1) क_इ,393.2-19 रो_इइ,607-609 {6।32} समाहरणम् समाहारः .
(प्_2,1.51.1) क_इ,393.2-19 रो_इइ,607-609 {7।32} अथ भावसाधने सति किम् अभिधीयते .
(प्_2,1.51.1) क_इ,393.2-19 रो_इइ,607-609 {8।32} यत् तत् औत्तराधर्यम् .
(प्_2,1.51.1) क_इ,393.2-19 रो_इइ,607-609 {9।32} कः पुनः गवाम् समाहारः .
(प्_2,1.51.1) क_इ,393.2-19 रो_इइ,607-609 {10।32} यत् तत् अर्जनम् क्रयणम् भिषणम् अपरहरणम् वा .
(प्_2,1.51.1) क_इ,393.2-19 रो_इइ,607-609 {11।32} यदि एवम् विक्षिप्तेषु पूलेषु गोषु चरन्तीषु न सिध्यति .
(प्_2,1.51.1) क_इ,393.2-19 रो_इइ,607-609 {12।32} एवम् तर्हि समभ्याशीकरणम् समाहारः .
(प्_2,1.51.1) क_इ,393.2-19 रो_इइ,607-609 {13।32} एवम् अपि पञ्चग्रामी षण्णगरी त्रिपुरी इति न सिध्यति .
(प्_2,1.51.1) क_इ,393.2-19 रो_इइ,607-609 {14।32} किम् कारणम् .
(प्_2,1.51.1) क_इ,393.2-19 रो_इइ,607-609 {15।32} सम् एकत्ववाची आङ् आभिमुख्ये वर्तते हरतिः देशान्तरप्रापणे .
(प्_2,1.51.1) क_इ,393.2-19 रो_इइ,607-609 {16।32} न अवश्यम् हरतिः देशान्तरप्रापणे एव वर्तते .
(प्_2,1.51.1) क_इ,393.2-19 रो_इइ,607-609 {17।32} किम् तर्हि .
(प्_2,1.51.1) क_इ,393.2-19 रो_इइ,607-609 {18।32} सादृश्ये अपि वर्तते .
(प्_2,1.51.1) क_इ,393.2-19 रो_इइ,607-609 {19।32} तत् यथा मातुः अनुहरति पितुः अनुहरति .

(प्_2,1.51.1) क_इ,393.2-19 रो_इइ,607-609 {20।32} अथ वा पञ्चग्रामी षण्णगरी त्रिपुरी इति न एव इदम् इयति एव अवतिष्ठते .
(प्_2,1.51.1) क_इ,393.2-19 रो_इइ,607-609 {21।32} अवश्यम् असौ ततः किम् चित् आकाङ्क्षति क्रियाम् वा गुणम् वा .
(प्_2,1.51.1) क_इ,393.2-19 रो_इइ,607-609 {22।32} यत् आकाङ्क्षत तत् एकम् स च समाहारः .
(प्_2,1.51.1) क_इ,393.2-19 रो_इइ,607-609 {23।32} अयम् तर्हि भावसाधने सति दोषः .
(प्_2,1.51.1) क_इ,393.2-19 रो_इइ,607-609 {24।32} पञ्चपूली आनीयताम् इति भावानयने चोदिते द्रव्यानयनम् न प्रापोति .
(प्_2,1.51.1) क_इ,393.2-19 रो_इइ,607-609 {25।32} न एषः दोषः .
(प्_2,1.51.1) क_इ,393.2-19 रो_इइ,607-609 {26।32} इह तावत् अयम् प्रष्टव्यः .
(प्_2,1.51.1) क_इ,393.2-19 रो_इइ,607-609 {27।32} अथ इह गौः अनुबन्ध्यः अजः अग्नीषोमीयः इति कथम् आकृतौ चोदितायाम् द्रव्ये आरम्भणालम्भनप्रोक्षणविशसनानि क्रियन्ते .
(प्_2,1.51.1) क_इ,393.2-19 रो_इइ,607-609 {28।32} असम्भवात् .
(प्_2,1.51.1) क_इ,393.2-19 रो_इइ,607-609 {29।32} आकृतौ आरम्भणादीनाम् सम्भवः न अस्ति इति कृत्वा आकृतिसहचरिते द्रव्ये आरम्भणादीनि क्रियन्ते .
(प्_2,1.51.1) क_इ,393.2-19 रो_इइ,607-609 {30।32} इदम् अपि एवञ्जातीयकम् एव .
(प्_2,1.51.1) क_इ,393.2-19 रो_इइ,607-609 {31।32} असम्भवात् भावानयनस्य द्रव्यानयनम् भविष्यति .
(प्_2,1.51.1) क_इ,393.2-19 रो_इइ,607-609 {32।32} अथ वा अव्यतिरेकात् द्रव्याकृत्योः .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {1।54} किम् पुनः द्विगुसञ्ज्ञा प्रत्ययोत्तरपदयोः भवति .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {2।54} एवम् भवितुम् अर्हति .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {3।54} द्विगुसञ्ज्ञा प्रत्ययोत्तरपदयोः चेत् इतरेतराश्रयत्वात् अप्रसिद्धिः .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {4।54} द्विगुसञ्ज्ञा प्रत्ययोत्तरपदयोः चेत् इतरेतराश्रयत्वात् अप्रसिद्धिः .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {5।54} का एतरेतराश्रयता .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {6।54} द्विगुनिमित्ते प्रत्ययोत्तरपदे प्रत्ययोत्तरपदनिमित्ता च द्विगुसञ्ज्ञा .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {7।54} तत् एतत् इतरेतराश्रयम् .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {8।54} इतरेतराश्रयाणि च न प्रकल्पन्ते .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {9।54} एवम् तर्हि अर्थे इत् वक्ष्यामि .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {10।54} अर्थे चेत् तद्धितानुत्पत्तिः बहुव्रीहिवत् .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {11।54} अर्थे चेत् तद्धितोत्पत्तिः न प्राप्नोति .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {12।54} पाञ्चनापितिः , द्विमातुरः , त्रैमातुरः .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {13।54} किम् कारणम् .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {14।54} द्विगुना उक्तत्वात् बहुव्रीहिवत् .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {15।54} तत् यथा चित्रगुः इति बहुव्रीहिणोक्तत्वात् मत्वर्थस्य मत्वर्थीयः न भवति .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {16।54} एवम् तर्हि समासतद्धितविधौ इति वक्ष्यामि .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {17।54} समासतद्धितविधौ इति चेत् अन्यत्र समाससञ्ज्ञाभावः .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {18।54} समासतद्धितविधौ इति चेत् अन्यत्र समाससञ्ज्ञा न प्राप्नोति .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {19।54} क्व अन्यत्र .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {20।54} स्वरे .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {21।54} पञ्चारत्निः , दशारत्निः .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {22।54} इगन्ते द्विगौ इति एषः स्वरः न प्राप्नोति .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {23।54} सिद्धम् तु प्रत्ययोत्तरपदयोः च इति वचनात् .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {24।54} सिद्धम् एतत् .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {25।54} कथम् .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {26।54} प्रत्ययोत्तरपदयोः च इति वचनात् .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {27।54} प्रत्ययोत्तरपदयोः द्विगुसञ्ज्ञा भवति इति वक्तव्यम् .

(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {28।54} ननु च उक्तम् द्विगुसञ्ज्ञा प्रत्ययोत्तरपदयोः चेत् इतरेतराश्रयत्वात् अप्रसिद्धिः इति .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {29।54} न एषः दोषः .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {30।54} इतरेतराश्रयमात्रम् एतत् चोदितम् सर्वाणि च इतरेतराश्रयाणि एकत्वेन परिहृतानि सिद्धम् तु नित्यशब्दत्वात् इति .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {31।54} न इदम् तुल्यम् अन्यैः इतरेतराश्रयैः .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {32।54} न हि सञ्ज्ञा नित्या .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {33।54} एवम् तर्हि भाविनी सञ्ज्ञा विज्ञास्यते .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {34।54} तत् यथा : कः चित् कम् चित् तन्तुवायम् आह : अस्य सूत्रस्य शाटकम् वय इति .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {35।54} सः पश्यति .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {36।54} यदि शाटकः न वातव्यः अथ वातव्यः न शाटकः .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {37।54} शाटकः वातव्यः च इति विप्रतिषिद्धम् .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {38।54} भाविनी खलु अस्य सञ्ज्ञा अभिप्रेता .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {39।54} सः मन्ये वातव्यः यस्मिन् उते शाटकः इति एतत् भवति इति .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {40।54} एवम् इह अपि तस्मिन् द्विगुः भवति यस्य अभिनिर्वृत्तस्य प्रत्यय उत्तरपदम् इति च एते सञ्ज्ञे भविष्यतः .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {41।54} अथ वा पुनः अस्तु अर्थे इति .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {42।54} ननु च उक्तम् अर्थे चेत् तद्धितानुत्पत्तिः बहुव्रीहिवत् इति .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {43।54} न एषः दोषः .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {44।54} न अवश्यम् अर्थशब्दः अभिधेये एव वर्तते .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {45।54} किम् तर्हि .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {46।54} स्यादर्थे अपि वर्तते .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {47।54} तत् यथा .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {48।54} दारार्थम् घटामहे .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {49।54} धनार्थम् भिक्षामहे .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {50।54} दाराः नः स्युः .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {51।54} धनानि नः स्युः इति .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {52।54} एवम् इह अपि तद्धितार्थे द्विगुः भवति तद्धितः स्यात् इति .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {53।54} द्विगोः वा लुग्वचनम् ज्ञापकम् तद्धितोत्पत्तेः .
(प्_2,1.51.2) क_इ,393.20-394.24 रो_इइ,609-612 {54।54} अथ वा यत् अयम् द्विगोः लुक् अनपत्ये इति द्विगोः उत्तरस्य तद्धितस्य लुकम् शास्ति तत् ज्ञापयति आचार्यः उत्पद्यते द्विगोः तद्धितः इति.
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {1।71} समाहारसमूहयोः अविशेषात् समाहारग्रहणानर्थक्यम् तद्धितार्थेन कृतत्वात् .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {2।71} समाहारः समूहः इति अविशिष्तौ एतौ अर्थौ .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {3।71} समाहारसमूहयोः अविशेषात् समाहारग्रहणम् अनर्थकम् .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {4।71} किम् कारणम् .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {5।71} तद्धितार्थे कृतत्वात् .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {6।71} तद्धितार्थे द्विगुः इति एवम् अत्र द्विगुः भविष्यति .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {7।71} यदि तद्धितार्थे द्विगुः इति एवम् अत्र द्विगुः भवति तद्धितोत्पत्तिः प्राप्नोति .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {8।71} उत्पद्यताम् .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {9।71} लुक् भविष्यति .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {10।71} लुक्कृतानि प्राप्नुवन्ति .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {11।71} कानि .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {12।71} पञ्चपूली दशपूली .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {13।71} अपरिमाणबिस्ताचितकम्बलेभ्यः न तद्धितलुकि इति प्रतिषेधः प्राप्नोति .

(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {14।71} पञ्चगवम् दशगवम् .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {15।71} गोः अतद्धितलुकि इत् टच् न प्रप्नोति .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {16।71} न एषः दोषः .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {17।71} अविशेषेण द्विगोः ङीप् भवति इति उक्त्वा समाहारे इति वक्ष्यामि .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {18।71} तत् नियमार्थम् भविष्यति .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {19।71} समाहारे एव न अन्यत्र इति .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {20।71} गोः अकारः द्विगोः समाहारे .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {21।71} अविशेषेण गोः टच् भवति इति उक्त्वा द्विगोः समाहारे इति वक्ष्यामि .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {22।71} तत् नियमार्थम् भविष्यति .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {23।71} समाहारे एव न अन्यत्र इति .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {24।71} अभिधानार्थम् तु .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {25।71} अभिधानार्थम् तु समाहारग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {26।71} समाहारेण अभिधानम् यथा स्यात् तद्धितार्थेन मा भूत् इति .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {27।71} किम् च स्यात् .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {28।71} तद्धितोत्पत्तिः प्रसज्येत .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {29।71} उत्पद्यताम् .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {30।71} लुक् भविष्यति .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {31।71} लुक्कृतानि प्राप्नुवन्ति .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {32।71} सर्वाणि परिहृतानि .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {33।71} न सर्वाणि परिहृतानि .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {34।71} पञ्चकुमारि दशकुमारि .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {35।71} लिक् तद्धितलुकि इति ङीपः लुक् प्रसज्येत .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {36।71} द्वन्द्वतत्पुरुषयोः उत्तरपदे नित्यसमासवचनम् .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {37।71} द्वन्द्वतत्पुरुषयोः उत्तरपदे नित्यसमासः वक्तव्यः .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {38।71} वाग्दृषदप्रियः छत्रोपानहप्रियः पञ्चगवप्रियः दशगवप्रियः .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {39।71} किम् प्रयोजनम् .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {40।71} समुदायवृत्तौ अवयवानाम् मा कदा चित् अवृत्तिः भूत् इति .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {41।71} तत् तर्हि वक्तव्यम् .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {42।71} न वक्तव्यम् .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {43।71} इह द्वौ पक्षौ वृत्तिपक्षः अवृत्तिपक्षः च .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {44।71} यदा वृत्तिपक्षः तदा सर्वेषाम् एव वृत्तिः .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {45।71} यदा तु अवृत्तिः तदा सर्वेषाम् अवृत्तिः .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {46।71} उत्तरपदेन परिमाणिन द्विगोः समासवचनम् .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {47।71} उत्तरपदेन परिमाणिन द्विगोः समासः वक्तव्यः .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {48।71} द्विमासजातः त्रिमासजातः .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {49।71} किम् पुनः कारणम् न सिध्यति .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {50।71} सुप् सुपा इति वर्तते .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {51।71} एवम् तर्हि इदम् स्यात् : द्वौ मासौ द्विमासम् , द्विमासम् जातस्य इति .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {52।71} न एवम् शक्यम् .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {53।71} स्वरे हि दोषः स्यात् .

(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {54।71} द्विमासजातः इति प्राप्नोति द्विमासजातः इति च इष्यते .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {55।71} द्व्याह्नजातः च न सिध्यति .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {56।71} द्व्यहजात इति प्राप्नोति न च एवम् भवितव्यम् .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {57।71} भवितव्यम् च यदा समाहारे द्विगुः .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {58।71} द्व्यह्नजातः तु न सिध्यति .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {59।71} किम् उच्यते परिमाणिना इति न पुनः अन्यत्र अपि .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {60।71} पञ्चगवप्रियः दशगवप्रियः .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {61।71} अन्यत्र समुदायबहुव्रीहित्वात् उत्तरपदप्रसिद्धिः .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {62।71} अन्यत्र समुदायबः हुव्रीहिसञ्ज्ञ्ः .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {63।71} अन्यत्र समुदायबहुव्रीहित्वात् उत्तरपदम् प्रसिद्धम् .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {64।71} उत्तरपदे प्रसिद्धे उत्तरपदे इति द्विगुः भविष्यति .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {65।71} सर्वत्र मत्वर्थे प्रतिषेधः .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {66।71} सर्वेषु पक्षेषु द्विगुसञ्ज्ञायाः मत्वर्थे प्रतिषेधः वक्तव्यः .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {67।71} किम् प्रयोजनम् .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {68।71} पञ्चखट्वा दशखट्वा .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {69।71} द्विगोः इति ईकारः मा भूत् .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {70।71} पञ्चगुः दशगुः .
(प्_2,1.51.3) क_इ,395.1-396.11 रो_इइ,612-616 {71।71} गोः अतद्धितलुकि इति टच् मा भूत् इति .
(प्_2,1.52) क_इ,396.13-23 रो_इइ,617-618 {1।25} किम् अनन्तरे योगे सङ्ख्यापूर्वः सः द्विगुसञ्ज्ञः आहोस्वित् पूर्वमात्रे .
(प्_2,1.52) क_इ,396.13-23 रो_इइ,617-618 {2।25} किम् च अतः .
(प्_2,1.52) क_इ,396.13-23 रो_इइ,617-618 {3।25} यदि अनन्तरे योगे एकशाटी द्विगोः इति ईकारः न प्राप्नोति .
(प्_2,1.52) क_इ,396.13-23 रो_इइ,617-618 {4।25} अथ पूर्वमात्रे अकभिक्षा अत्र अपि प्राप्नोति .
(प्_2,1.52) क_इ,396.13-23 रो_इइ,617-618 {5।25} अस्तु अनन्तरे .
(प्_2,1.52) क_इ,396.13-23 रो_इइ,617-618 {6।25} कमम् एकशाटी .
(प्_2,1.52) क_इ,396.13-23 रो_इइ,617-618 {7।25} ईकारान्तेन समासः भविष्यति .
(प्_2,1.52) क_इ,396.13-23 रो_इइ,617-618 {8।25} एका शाटी एकशाटी .
(प्_2,1.52) क_इ,396.13-23 रो_इइ,617-618 {9।25} इह तर्हि एकापूपी द्विगोः इति ईकारः न प्राप्नोति .
(प्_2,1.52) क_इ,396.13-23 रो_इइ,617-618 {10।25} अस्तु तर्हि पूर्वमात्रे. कथम् एकभिक्षा .
(प्_2,1.52) क_इ,396.13-23 रो_इइ,617-618 {11।25} टाबन्तेन समासः भविष्यति .
(प्_2,1.52) क_इ,396.13-23 रो_इइ,617-618 {12।25} एका भिक्षा एकभिक्षा .
(प्_2,1.52) क_इ,396.13-23 रो_इइ,617-618 {13।25} इह तर्हि सप्तर्षयः इगन्ते द्विगौ इति एषः स्वरः प्राप्नोति .
(प्_2,1.52) क_इ,396.13-23 रो_इइ,617-618 {14।25} अस्तु तर्हि अनन्तरे .
(प्_2,1.52) क_इ,396.13-23 रो_इइ,617-618 {15।25} कथम् एकापूपी .
(प्_2,1.52) क_इ,396.13-23 रो_इइ,617-618 {16।25} समाहारे इति एव सिद्धम् .
(प्_2,1.52) क_इ,396.13-23 रो_इइ,617-618 {17।25} कः पुनः अत्र समाहारः .
(प्_2,1.52) क_इ,396.13-23 रो_इइ,617-618 {18।25} यत् तद्दानम् सम्भ्रमः वा .
(प्_2,1.52) क_इ,396.13-23 रो_इइ,617-618 {19।25} इह तर्हि पञ्चहोतारः दशहोतारः इगन्ते द्विगौ इति एषः स्वरः न प्रप्नोति .
(प्_2,1.52) क_इ,396.13-23 रो_इइ,617-618 {20।25} अस्तु तर्हि पूर्वमात्रे .
(प्_2,1.52) क_इ,396.13-23 रो_इइ,617-618 {21।25} कथम् सप्तर्षयः .
(प्_2,1.52) क_इ,396.13-23 रो_इइ,617-618 {22।25} अन्तोदात्तप्रकरणे त्रिचक्रादीनाम् छन्दसि इति एवम् एतत् सिद्धम् .

(प्_2,1.52) क_इ,396.13-23 रो_इइ,617-618 {23।25} अथ वा पुनः अस्तु अनन्तरे .
(प्_2,1.52) क_इ,396.13-23 रो_इइ,617-618 {24।25} कथम् पञ्चहोतारः दशहोतारः .
(प्_2,1.52) क_इ,396.13-23 रो_इइ,617-618 {25।25} आद्युदात्तप्रकरणे दिवोदासादीनाम् छन्दसि इति एव सिद्धम् .
(प्_2,1.53) क_इ,397.2-3 रो_इइ,619 {1।5} किम् उदाहरण्म् .
(प्_2,1.53) क_इ,397.2-3 रो_इइ,619 {2।5} वैयाकरणखसूचिः .
(प्_2,1.53) क_इ,397.2-3 रो_इइ,619 {3।5} किम् व्याकरणम् कुत्सितम् आहोस्वित् वैयाकरणः .
(प्_2,1.53) क_इ,397.2-3 रो_इइ,619 {4।5} वैयाकरणः कुत्सितः .
(प्_2,1.53) क_इ,397.2-3 रो_इइ,619 {5।5} तस्मिन् कुत्सिते तत्स्थम् अपि कुत्सितम् भवति .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {1।63} उपमानानि इति उच्यते .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {2।63} कानि पुनः उपमानानि .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {3।63} किम् यत् एव उपमानम् तत् एव उपमेयम् आहोस्वित् अन्यत् उपमानम् अन्यत् उपमेयम् .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {4।63} किम् च अतः .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {5।63} यदि यत् एव उपमानम् तत् एव उपमेयम् कः इह उपमार्थः गौः इव गौः इति .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {6।63} अथ अन्यत् एव उपमानम् अन्यत् उपमेयम् कः इह उपमार्थः गौः इव अश्वः इति .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {7।63} एवम् तर्हि यत्र किम् चित् सामान्यम् कः चित् विशेषः तत्र उपमानोपमेये भवतः .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {8।63} किम् वक्तव्यम् एतत् .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {9।63} न हि .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {10।63} कथम् अनुच्यमानम् गंस्यते .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {11।63} मानम् हि नाम अनिर्ज्ञातज्ञानार्थम् उपादीयते अनिर्ज्ञातम् अर्थम् ज्ञास्यामि इति .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {12।63} तत् समीपे यत् न अत्यन्ताय मिमीते तत् उपमानम् .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {13।63} गौः इव गवयः इति .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {14।63} गौः निर्ज्ञातः गवयः अनिर्ज्ञातः .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {15।63} कामम् तर्हि अनेन एव हेतुना यस्य गवयः निर्ज्ञातः स्यात् गौः अनिर्ज्ञातः तेन कर्तव्यम् स्यात् गवयः इव गौः इति. बाढम् कर्तव्यम् .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {16।63} किम् पुनः इह उदाहरणम् .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {17।63} शस्त्रीश्यामा .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {18।63} क्व पुनः अयम् श्यामाशब्दः वर्तते .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {19।63} शत्र्याम् इति आह .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {20।63} केन इदानीम् देवदत्ता अभिधीयते .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {21।63} समासेन. यदि एवम् शस्त्रीश्यामो देवदत्तः इति न सिध्यति .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {22।63} उपसर्जनस्य इति ह्रस्वत्वम् भविष्यति .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {23।63} यदि तर्हि उपसर्जनानि अपि एवञ्जातीयकानि भवन्ति तित्तिरिकल्माषी कुम्भकपाललोहिनी अनुपसर्जनलक्षणः ईकारः न प्राप्नोति .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {24।63} एवम् तर्हि शस्त्र्याम् एव शस्त्रीशब्दः वर्तते देवदत्तायाम् श्यामाशब्दः .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {25।63} एवम् अपि गुणः अनिर्दिष्टः भवति .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {26।63} बहवः शस्त्र्याम् गुणाः तीक्ष्णा सूक्ष्मा पृथुः इति .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {27।63} अनिर्दिश्यमानस्य अपि गुणस्य भवति लोके सम्प्रत्ययः .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {28।63} तत् यथा चन्द्रमुखी देवदत्ता इति .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {29।63} बहवः चन्द्रे गुणाः या च असौ प्रियदर्शनता सा गम्यते .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {30।63} एवम् अपि समानाधिकरणेन इति वर्तते .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {31।63} व्यधिकरणत्वात् समासः न प्राप्नोति .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {32।63} किम् हि वचनात् न भवति .

(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {33।63} यदि अपि तावत् वचनात् समासः स्यात् इह तु खलु मृगी इव चपला मृगचपला समानाधिकरणलक्षणः पुंवद्भावः न प्राप्नोति .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {34।63} एवम् तर्हि तस्याम् एव उभयम् वर्तते .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {35।63} एतत् च अत्र युक्तम् यत् तस्याम् एव उभयम् वर्तते इति .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {36।63} इतरथा हि बहु अपेक्ष्यम् स्यात् .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {37।63} यदि तावत् एवम् विग्रहः क्रियते शस्त्री इव श्यामा देवदत्ता इति शस्त्र्याम् श्यामा इति एतत् अपेक्ष्यम् .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {38।63} अथ अपि एवम् विग्रहः क्रियते यथा सास्त्रीश्यामा तद्वत् इयम् देवदत्ता इति एवम् अपि देवदत्तायाम् श्यामा इति अपेक्ष्यम् स्यात् .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {39।63} एवम् अपि गुणः अनिर्दिष्टः भवति .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {40।63} बहवः शस्त्र्याम् गुणाः तीक्ष्णा सूक्ष्मा पृथुः इति .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {41।63} अनिर्दिश्यमानस्य अपि गुणस्य भवति लोके सम्प्रत्ययः .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {42।63} तत् यथा चन्द्रमुखी देवदत्ता इति .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {43।63} बहवः चन्द्रे गुणाः या च असौ प्रियदर्शनता सा गम्यते .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {44।63} उपमानसमासे गुणवचनस्य विशेषभाक्त्वात् सामन्यवचनाप्रसिद्धिः .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {45।63} उपमानसमासे गुणवचनस्य विशेषभाक्त्वात् सामन्यवचनस्य अप्रसिद्धिः स्यात् .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {46।63} शस्त्रीश्यामा .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {47।63} श्यामाशब्दः अयम् शस्त्रीशब्देन अभिसम्बध्यमानः विशेषवचनः सम्पद्यते .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {48।63} तत्र सामान्यवचनैः इति समासः न प्राप्नोति .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {49।63} न वा श्यामत्वस्यो उह्हयत्र भावात् तद्वाचक्त्वात् च शब्दस्य सामान्यवचनप्रसिद्धिः .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {50।63} न वा एषः दोषः .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {51।63} किम् कारणम् .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {52।63} श्यामत्वस्यो उह्हयत्र भावात् .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {53।63} उभयत्र एव श्यामत्वम् अस्ति शस्त्र्याम् देवदत्तायाम् च .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {54।63} तद्वाचक्त्वात् च शब्दस्य .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {55।63} सामान्यवचनप्रसिद्धिः तद्वाचकः च अत्र श्यामाशब्दः प्रयुज्यते .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {56।63} किम्वाचकः .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {57।63} उभयवाचकः .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {58।63} श्यामत्वस्य उभयत्र भावात् तद्वाचकत्वात् च शब्दस्य सामान्यवचनम् प्रसिद्धम् .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {59।63} सामान्यवचने प्रसिद्धे सामान्यवचनैः इति समासः भविष्यति .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {60।63} न च अवश्यम् सः एव सामान्यवचनः यः बहूनाम् सामान्यम् आह. द्वयोः अपि सामान्यम् आह सः अपि सामान्यवचनः एव .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {61।63} अथ वा सामान्यवचनैः इति उच्यते .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {62।63} सर्वः च शब्दः अन्येन शब्देन अभिसम्बध्यमानः विशेषवचनः सम्पद्यते .
(प्_2,1.55) क_इ,397.5-398.19 रो_इइ,619-627 {63।63} ते एवम् विज्ञास्यामः प्राक् अभिसम्बन्धात् सामान्यवचनः इति .
(प्_2,1.56) क_इ,398.21-399.2 रो_इइ,627-628 {1।13} सामान्याप्रयोगे इति किमर्थम् .
(प्_2,1.56) क_इ,398.21-399.2 रो_इइ,627-628 {2।13} इह मा भूत् .
(प्_2,1.56) क_इ,398.21-399.2 रो_इइ,627-628 {3।13} पुरुषः अयम् व्याघ्रः इव शूरः .
(प्_2,1.56) क_इ,398.21-399.2 रो_इइ,627-628 {4।13} पुरुषः अयम् व्याघ्रः इव बलवान् .
(प्_2,1.56) क_इ,398.21-399.2 रो_इइ,627-628 {5।13} सामान्याप्रयोगे इति शक्यम् अकर्तुम् .
(प्_2,1.56) क_इ,398.21-399.2 रो_इइ,627-628 {6।13} कस्मात् न भवति पुरुषः अयम् व्याघ्रः इव शूरः .
(प्_2,1.56) क_इ,398.21-399.2 रो_इइ,627-628 {7।13} पुरुषः अयम् व्याघ्रः इव बलवान् इति .
(प्_2,1.56) क_इ,398.21-399.2 रो_इइ,627-628 {8।13} असामर्थ्यात् .
(प्_2,1.56) क_इ,398.21-399.2 रो_इइ,627-628 {9।13} कथम् असामर्थ्यम् .

(प्_2,1.56) क_इ,398.21-399.2 रो_इइ,627-628 {10।13} सापेक्षम् असमर्थम् भवति इति .
(प्_2,1.56) क_इ,398.21-399.2 रो_इइ,627-628 {11।13} एवम् तर्हि सिद्धे सति यत् सामान्याप्रयोगे इति प्रतिषेधम् शास्ति तत् ज्ञापयति आचार्यः भवति वै प्रधानस्य सापेक्षस्य अपि समासः इति .
(प्_2,1.56) क_इ,398.21-399.2 रो_इइ,627-628 {12।13} किम् एतस्य ज्ञापने प्रयोजनम् .
(प्_2,1.56) क_इ,398.21-399.2 रो_इइ,627-628 {13।13} राजपुरुषः अभिरूपः राजपुरुषः दर्शनीयः अत्र वृत्तिः सिद्धा भवति .
(प्_2,1.57) क_इ,399.4-26 रो_इइ,628-632 {1।34} विशेषणविशेष्ययोः उभयविशेषणत्वात् उभयोः च विशेष्यत्वात् उपसर्जनाप्रसिद्धिः .
(प्_2,1.57) क_इ,399.4-26 रो_इइ,628-632 {2।34} विशेषणविशेष्ययोः उभयविशेषणत्वात् उभयोः च विशेष्यत्वात् उपसर्जन्स्य अप्रसिद्धिः .
(प्_2,1.57) क_इ,399.4-26 रो_इइ,628-632 {3।34} कृष्णतिलाः इति कृष्णशब्दः अयम् तिलशब्देन अभिसम्बध्यमानः विशेषणवचनः सम्पद्यते .
(प्_2,1.57) क_इ,399.4-26 रो_इइ,628-632 {4।34} तथा तिलशब्दः कृष्णशब्देन अभिसम्बध्यमानः विशेषणवचनः सम्पद्यते .
(प्_2,1.57) क_इ,399.4-26 रो_इइ,628-632 {5।34} तत् उभयम् विशेषणम् भवति उभयम् च विशेष्यम् .
(प्_2,1.57) क_इ,399.4-26 रो_इइ,628-632 {6।34} विशेषणविशेष्ययोः उभयविशेषणत्वात् उभयोः च विशेष्यत्वात् उपसर्जन्स्य अप्रसिद्धिः .
(प्_2,1.57) क_इ,399.4-26 रो_इइ,628-632 {7।34} न वा अन्यतरस्य प्रधानभावात् तद्विशेषकत्वात् च अपरस्य उपसर्जनप्रसिद्धिः .
(प्_2,1.57) क_इ,399.4-26 रो_इइ,628-632 {8।34} न वा एषः दोषः .
(प्_2,1.57) क_इ,399.4-26 रो_इइ,628-632 {9।34} किम् कारणम् .
(प्_2,1.57) क_इ,399.4-26 रो_इइ,628-632 {10।34} अन्यतरस्य प्रधानभावात् .
(प्_2,1.57) क_इ,399.4-26 रो_इइ,628-632 {11।34} अन्यतरत् अत्र प्रधानम् .
(प्_2,1.57) क_इ,399.4-26 रो_इइ,628-632 {12।34} तद्विशेषकत्वात् च अपरस्य .
(प्_2,1.57) क_इ,399.4-26 रो_इइ,628-632 {13।34} तद्विशेषकम् च अपरम् .
(प्_2,1.57) क_इ,399.4-26 रो_इइ,628-632 {14।34} अन्यतरस्य प्रधानभावात् तद्विशेषकत्वात् च अपरस्य उपसर्जनसञ्ज्ञा भविष्यति .
(प्_2,1.57) क_इ,399.4-26 रो_इइ,628-632 {15।34} यदा अस्य तिलाः प्राधान्येन विवक्षिताः भवन्ति कृष्णः विशेषणत्वेन तदा तिलाः प्रधानम् कृष्णः विशेषणम् .
(प्_2,1.57) क_इ,399.4-26 रो_इइ,628-632 {16।34} कामम् तर्हि अनेन एव हेतुना यस्य कृष्णाः प्राधान्येन विवक्षिताः भवन्ति तिलाः विशेषणत्वेन तेन कर्तव्यम् तिलकृष्णाः इति .
(प्_2,1.57) क_इ,399.4-26 रो_इइ,628-632 {17।34} न कर्तव्यम् .
(प्_2,1.57) क_इ,399.4-26 रो_इइ,628-632 {18।34} न हि अयम् द्वन्द्वः तिलाः च कृष्णाः च इति .
(प्_2,1.57) क_इ,399.4-26 रो_इइ,628-632 {19।34} न खलु अपि षष्ठीसमासः तिलानाम् कृष्णाः इति .
(प्_2,1.57) क_इ,399.4-26 रो_इइ,628-632 {20।34} किम् तर्हि .
(प्_2,1.57) क_इ,399.4-26 रो_इइ,628-632 {21।34} द्वौ इमौ प्रधानशब्दौ एकस्मिन् अर्थे युगपत् अवरुध्येते .
(प्_2,1.57) क_इ,399.4-26 रो_इइ,628-632 {22।34} न च द्वयोः प्रधानशब्दयोः एकस्मिन् अर्थे युगपत् अवरुध्यमानयोः किम् चित् अपि प्रयोजनम् अस्ति .
(प्_2,1.57) क_इ,399.4-26 रो_इइ,628-632 {23।34} तत्र प्रयोगात् एतत् गन्तव्यम् .
(प्_2,1.57) क_इ,399.4-26 रो_इइ,628-632 {24।34} नूनम् अत्र अन्यतरत् प्रधानम् तद्विशेषकम् च अपरम् इति .
(प्_2,1.57) क_इ,399.4-26 रो_इइ,628-632 {25।34} तत्र तु एतावान् सन्देहः किम् प्रधानम् किम् विशेषणम् इति .
(प्_2,1.57) क_इ,399.4-26 रो_इइ,628-632 {26।34} सः च अपि क्व सन्देहः .
(प्_2,1.57) क_इ,399.4-26 रो_इइ,628-632 {27।34} यत्र उभौ गुणशब्दौ .
(प्_2,1.57) क_इ,399.4-26 रो_इइ,628-632 {28।34} तत् यथा कुञ्जखञ्जकः खञ्जकुब्जकः इति .
(प्_2,1.57) क_इ,399.4-26 रो_इइ,628-632 {29।34} यत्र हि अन्यतरत् द्रव्यम् अन्यतरः गुणः तत्र यत् द्रव्यम् तत् प्रधानम् .
(प्_2,1.57) क_इ,399.4-26 रो_इइ,628-632 {30।34} तत् यथा शुक्लम् आलभेत कृष्णम् आलभेत इति न पिष्टपिण्डीम् आलभ्य कृती भवति .
(प्_2,1.57) क_इ,399.4-26 रो_इइ,628-632 {31।34} अवश्यम् तद्गुणम् द्रव्यम् आकाङ्क्षति .
(प्_2,1.57) क_इ,399.4-26 रो_इइ,628-632 {32।34} कथम् तर्हि इमौ द्वौ प्रधानशब्दौ एकस्मिन् अर्थे युगपत् अवरुध्येते वृक्षः शिंशिपा इति .
(प्_2,1.57) क_इ,399.4-26 रो_इइ,628-632 {33।34} न एतयोः आवश्यकः समावेशः .
(प्_2,1.57) क_इ,399.4-26 रो_इइ,628-632 {34।34} न हि अवृक्षः शिंशिपा अस्ति .
(प्_2,1.58) क_इ,400.2-11 रो_इइ,633-634 {1।14} अथ किमर्थम् उत्तरत्र एवमादि अनुक्रमणम् क्रियते न विशेषणम् विशेष्येण बहुलम् इति एव सिद्धम् .
(प्_2,1.58) क_इ,400.2-11 रो_इइ,633-634 {2।14} बहुलवचनस्य अकृत्स्नत्वात् उत्तरत्रानुक्रमणसामर्थ्यम् .

(प्_2,1.58) क_इ,400.2-11 रो_इइ,633-634 {3।14} अकृत्स्नम् बहुलवचनम् इति उत्तरत्र अनुक्रमणम् क्रियते .
(प्_2,1.58) क_इ,400.2-11 रो_इइ,633-634 {4।14} यदि अकृत्स्नम् यत् अनेन कृतम् अकृतम् तत् .
(प्_2,1.58) क_इ,400.2-11 रो_इइ,633-634 {5।14} एवम् तर्हि न ब्रूमः अकृत्स्नम् इति .
(प्_2,1.58) क_इ,400.2-11 रो_इइ,633-634 {6।14} कृत्स्नम् च कारकम् च साधकम् च निर्वर्तकम् च .
(प्_2,1.58) क_इ,400.2-11 रो_इइ,633-634 {7।14} यत् च अनेन कृतम् सुक्तृतम् तत् .
(प्_2,1.58) क_इ,400.2-11 रो_इइ,633-634 {8।14} किमर्थम् तर्हि एवमादि अनुक्रमणम् क्रियते .
(प्_2,1.58) क_इ,400.2-11 रो_इइ,633-634 {9।14} उदाहरणभूयस्त्वात् .
(प्_2,1.58) क_इ,400.2-11 रो_इइ,633-634 {10।14} ते खलु अपि विधयः सुपरिगृहीताः भवन्ति येषु लक्षणम् प्रपञ्चः च .
(प्_2,1.58) क_इ,400.2-11 रो_इइ,633-634 {11।14} केवलम् लक्षणम् केवलः प्रपञ्चः वा न तथा कारकम् भवति .
(प्_2,1.58) क_इ,400.2-11 रो_इइ,633-634 {12।14} अवश्यम् खलु अस्माभिः इदम् वक्तव्यम् बहुलम् अन्यतरस्याम् उभयथा वा एकेषाम् इति .
(प्_2,1.58) क_इ,400.2-11 रो_इइ,633-634 {13।14} सर्ववेदपाऋइषदम् हि इदम् शास्त्रम् .
(प्_2,1.58) क_इ,400.2-11 रो_इइ,633-634 {14।14} तत्र न एकः पन्थाः शक्यः आस्थातुम्
(प्_2,1.59) क_इ,400.13-18 रो_इइ,635 {1।11} श्रेण्यादयः पठ्यन्ते .
(प्_2,1.59) क_इ,400.13-18 रो_इइ,635 {2।11} कृतादिः आकृतिगणः .
(प्_2,1.59) क_इ,400.13-18 रो_इइ,635 {3।11} श्रेण्यादिषु च्व्यर्थवचनम् .
(प्_2,1.59) क_इ,400.13-18 रो_इइ,635 {4।11} श्रेण्यादिषु च्व्यर्थग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_2,1.59) क_इ,400.13-18 रो_इइ,635 {5।11} अश्रेणयः श्रेणयः कृताः श्रेणिकृताः .
(प्_2,1.59) क_इ,400.13-18 रो_इइ,635 {6।11} यदा हि श्रेणयः एव किम् चित् क्रियन्ते तदा मा भूत् .
(प्_2,1.59) क_इ,400.13-18 रो_इइ,635 {7।11} अन्यत्र अयम् च्व्यर्थग्रहणेषु च्व्यन्तस्य प्रतिषेधम् शास्ति .
(प्_2,1.59) क_इ,400.13-18 रो_इइ,635 {8।11} तत् इह न तथा .
(प्_2,1.59) क_इ,400.13-18 रो_इइ,635 {9।11} किम् कारणम् .
(प्_2,1.59) क_इ,400.13-18 रो_इइ,635 {10।11} अन्यत्र पूर्वम् च्व्यन्तकार्यम् परम् च्व्यर्थकार्यम् .
(प्_2,1.59) क_इ,400.13-18 रो_इइ,635 {11।11} इह पुनः पूर्वम् च्य्वर्थकार्यम् परम् च्व्यन्तकार्यम् इति .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {1।49} नञ्विशिष्टे समानप्रकृतिवचनम् .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {2।49} नञ्विशिष्टे समानप्रकृतिग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {3।49} इह मा बूत् .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {4।49} सिद्धम् च अभुक्तम् च इति .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {5।49} अनञ् इति च प्रतिषेधः कर्तव्यः .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {6।49} इह मा भूत् .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {7।49} कर्तव्यम् अकृतम् इति .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {8।49} नुडिडधिकेन च .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {9।49} नुडिडधिकेन च समासः वक्तव्यः .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {10।49} इह अपि यथा स्यात् .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {11।49} अशितानशितेन जीवति .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {12।49} क्लिष्टाक्लिशितेन जीवति .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {13।49} किम् उच्यते समानप्रकृतिग्रहणम् कर्तव्यम् इति यदा नञ्विशिष्टेन इति उच्यते .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {14।49} न च अत्र नञ्कृतः एव विशेषः .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {15।49} किम् तर्हि .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {16।49} प्रकृतिकृतः अपि .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {17।49} अयम् विशिष्टशब्दः अस्ति एव अवधारणे वर्तते .

(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {18।49} तत् यथा .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {19।49} देवदत्तयज्ञदत्तौ आढ्यौ अभिरूपौ दर्शनीयौ पक्षवन्तौ देवदत्तः तु यज्ञदत्तात् स्वाध्यायेन विशिष्टः .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {20।49} स्वाध्यायेन एव इति गम्यते .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {21।49} अन्ये गुणाः समाः भवन्ति .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {22।49} अस्ति आधिक्ये वर्तते .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {23।49} तत् यथा .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {24।49} देवदत्तयज्ञदत्तौ आढ्यौ अभिरूपौ दर्शनीयौ पक्षवन्तौ देवदत्तः तु यज्ञदत्तात् स्वाध्यायेन विशिष्टः .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {25।49} स्वाध्यायेन अधिकः अन्ये गुणाः अविवक्षिताः भवन्ति .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {26।49} तत् यदा तावत् अवधारणे विशिष्टशब्दः तदा न एव अर्थः समानप्रकृतिग्रहणेन .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {27।49} न इह भविष्यति .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {28।49} सिद्धम् च अभुक्तम् च इति .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {29।49} न अपि अनञ् इति प्रतिषेधेन .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {30।49} न इह भविष्यति कर्तव्यम् अकृतम् इति .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {31।49} नुडिडधिकेन अपि तु तदा समासः न प्राप्नोति .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {32।49} यदा आधिक्ये विशिष्टशब्दः तदा समानप्रकृतिग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {33।49} इह मा भूत् षिद्धम् च अभुक्तम् च इति .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {34।49} अनञ् इति च प्रतिषेधः कर्तव्यः .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {35।49} इह मा भूत् .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {36।49} कर्तव्यम् अकृतम् इति .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {37।49} नुडिडधिकेन अपि तु समासद्ः सिद्धः भवति .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {38।49} तत्र आधिक्ये विशिष्टग्रहणम् मत्वा समानप्रकृतिग्रहणम् चोद्यते .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {39।49} अवधारणम् नञा चेत् नुडिड्विशिष्टेन न प्रकल्पेत .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {40।49} अथ चेत् अधिकविवक्षा कार्यम् तुल्यप्रकृतिकेन इति .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {41।49} कृतापकृतादीनाम् च उपसङ्ख्यानम् .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {42।49} कृतापकृतादीनाम् च उपसङ्ख्यानम् .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {43।49} कृतापकृतम् भुक्तविभुक्तम् पीतविपीतम् .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {44।49} सिद्धम् तु क्तेन विसमाप्तौ अनञ् .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {45।49} सिद्धम् एतत् .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {46।49} कथम्. क्तान्तेन क्रियाविसमाप्तौ अनञ् क्तान्तम् समस्यते इति वक्तव्यम् .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {47।49} गतप्रत्यागतादीनाम् च उपसङ्ख्यानम् .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {48।49} गतप्रत्यागतादीनाम् च उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_2,1.60) क_इ,400.20-401.27 रो_इइ,635-638 {49।49} गतप्रत्यागतम् यातानुयातम् पुटापुटिका क्रयाक्रयिका फलाफलिका मानोन्मानिका .
(प्_2,1.67) क_इ,402.2-5 रो_इइ,639 {1।6} अयुक्तः अयम् निर्देशः .
(प्_2,1.67) क_इ,402.2-5 रो_इइ,639 {2।6} समानाधिकरणेन इति वर्तते .
(प्_2,1.67) क_इ,402.2-5 रो_इइ,639 {3।6} कः प्रसङ्गः यद् व्यधिकरणानाम् समासः स्यात् .
(प्_2,1.67) क_इ,402.2-5 रो_इइ,639 {4।6} एवम् तर्हि ज्ञापयति आचार्यः यथाजातीयकम् उक्तम् उत्तरपदम् तथाजातीयकेन पूर्वपदेन समस्यते इति .
(प्_2,1.67) क_इ,402.2-5 रो_इइ,639 {5।6} किम् एतस्य ज्ञापने प्रयोजनम् .
(प्_2,1.67) क_इ,402.2-5 रो_इइ,639 {6।6} प्रातिपदिकग्रहणे लिङ्गविशिष्टस्य अपि ग्रहणम् भवति इति एषा परिभाषा न कर्तव्या भवति .
(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {1।37} इदम् विचार्यते : वर्णेन तृतीयासमासः वा स्यात् : कृष्णेन सारङ्गः कृष्णसारङ्गः समानाधिकरणेन वा : कृष्णः सारङ्गः कृष्णसारङ्गः इति .
(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {2।37} कः च अत्र विशेषः .

(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {3।37} वर्णेन तृतीयासमासः एतप्रतिषेधे वर्णग्रहणम् .
(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {4।37} वर्णेन तृतीयासमासः एतप्रतिषेधे वर्णग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {5।37} तृतीया पूर्वपदम् प्रकृतिस्वरम् भवति .
(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {6।37} अनेते वर्णः इति वक्तव्यम् .
(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {7।37} अथ द्वितीयेन वर्णग्रहणेन एतविशेषणेन अर्थः .
(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {8।37} बाढम् अर्थः यदि अवर्ण एतशब्दः अस्ति .
(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {9।37} ननु च अयम् अस्ति : आ* इतः एतः , कृष्णेतः , लोहितेतः इति .
(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {10।37} न अर्थः एवमर्थेन वर्णग्रहणेन .
(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {11।37} यदि तावत् अयम् कर्तरि क्तः तृतीया कर्मणि इति अनेन स्वरेण भवितव्यम् .
(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {12।37} अथ अपि कर्तरि परत्वात् कृत्स्वरेण भवितव्यम् .
(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {13।37} अथ समानाधिकरणः .
(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {14।37} समानाधिकरणे द्विः वर्णग्रहणम् .
(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {15।37} समानाधिकरणे द्विः वर्णग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {16।37} वर्णः वर्णेषु अनेते इति वक्तव्यम् .
(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {17।37} एकम् वर्णग्रहणम् कर्तव्यम् इह मा भूत् .
(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {18।37} परमशुक्लः परमकृष्णः इति .
(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {19।37} द्वितीयम् वर्णग्रहणम् कर्तव्यम् इह मा भूत् .
(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {20।37} कृष्णतिलाः इति .
(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {21।37} एकम् वर्णग्रहणम् अनक्र्थकम् .
(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {22।37} अन्यतरत्र कस्मात् न भवति .
(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {23।37} लक्षणप्रतिपदिकोक्तयोः प्रतिपदोक्तस्य एव इति .
(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {24।37} एवम् सति .
(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {25।37} तानि एतानि त्रीणि वर्णग्रहणानि भवन्ति समासविधौ द्वे स्वरविधौ च एकम् .
(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {26।37} यस्य अपि तृतीयासमासः तस्य अपि तानि एव त्रीणि वर्णग्रहणानि भवन्ति समासविधौ द्वे स्वरविधौ च एकम् .
(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {27।37} सामान्येन मम तृतीयासमासः भविष्यति तृतीया तत्कृतार्थेन गुणवचनेन इति .
(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {28।37} अवश्यम् वर्णेन प्रतिपदम् समासः वक्तव्यः यत्र तेन न सिध्यति तदर्थम् .
(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {29।37} क्व च तेन न सिध्यति .
(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {30।37} शुकबभ्रुः हरितबभ्रुः इति .
(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {31।37} तथा च सति तानि एव त्रीणि वर्णग्रहणानि भवन्ति समासविधौ द्वे स्वरविधौ च एकम् .
(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {32।37} अथ समानाधिकरणः सामान्येन सिद्धः स्यात् .
(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {33।37} बाढम् सिद्धः .
(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {34।37} कथम् .
(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {35।37} विशेषणम् विशेष्येण बहुलम् इति .
(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {36।37} एवम् अपि द्वे वर्णग्रहणे कर्तव्ये स्वरविधौ एव प्रतिपदोक्तस्य अभावात् .
(प्_2,1.69.1) क_इ,402.7-403.6 रो_इइ,639-641 {37।37} तस्मात् समानाधिकरणः इति एषः पक्षः ज्यायान् .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {1।151} समानाधिकरणाधिकारे प्रधानोपसर्जनानाम् परम् परम् विप्रतिषेधेन .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {2।151} समानाधिकरणाधिकारे प्रधानोपसर्जनानाम् परम् परम् भवति विप्रतिषेधेन .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {3।151} प्रधानानाम् प्रधानम् उपसर्जनानाम् उपसर्जनम् .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {4।151} प्रधानानाम् तावत् प्रधानम् .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {5।151} वृदारकनागकुञ्जरैः पूज्यमानम् इति अस्य अवकाशः गोवृन्दारकः अश्ववृन्दारकः .

(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {6।151} पोटायुवतीनाम् अवकाशः इभ्ययुवतिः आढ्ययुवतिः .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {7।151} इह उभयम् प्राप्नोति .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {8।151} नागयुवतिः वृन्दारकयुवतिः .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {9।151} प्रधानानाम् परम् भवति विप्रतिषेधेन .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {10।151} उपसर्जनानाम् परम् उपसर्जनम् .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {11।151} सन्महत्परमोत्कृष्टाः इति अस्य अवकाशः सद्गवः सदश्वः .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {12।151} कृत्यतुल्याख्या अजात्या इति अस्य अवकाशः तुल्यश्वेतः तुल्यकृष्णः .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {13।151} इह उभयम् प्राप्नोति : तुल्यसत् तुल्यमहान् .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {14।151} उपसर्जनानाम् परम् उपसर्जनम् भवति विप्रतिषेधेन .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {15।151} समानाधिकरणसमासात् बहुव्रीहिः . समानाधिकरणसमासात् बहुव्रीहिः भवति विप्रतिषेधेन .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {16।151} समानाधिकरणसमासस्य अवकाशः वीरः पुरुषः वीरपुरुषः .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {17।151} बहुव्रीहेः अवकाशः कण्ठेकालः .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {18।151} इह उभयम् प्राप्नोति : वीरपुरुषकः ग्रामः .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {19।151} बहुव्रीहिः भवति विप्रतिषेधेन .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {20।151} कदा चित् कर्मधारयः सर्वधनाद्यर्थः .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {21।151} कदा चित् कर्मधारयः भवति बहुव्रीहेः .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {22।151} किम् प्रयोजनम् .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {23।151} सर्वधनाद्यर्थः .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {24।151} सर्वधनी सर्वबीजी सर्वकेशी नटः गौरखरवत् वनम् गौरमृगवत् वनम् कृष्णसर्पवान् वल्मीकः लोहितशालिमान् ग्रामः .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {25।151} किम् प्रयोजनम् .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {26।151} कर्मधारयप्रकृतिभिः मत्वर्थीयैः अभिधानम् यथा स्यात् .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {27।151} किम् च कारणम् न स्यात् .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {28।151} बहुव्रीहिणा उक्तत्वात् मत्वर्थस्य .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {29।151} यदि उक्तत्वम् हेतुः कर्मधारयेण अपि उक्तत्वात् न प्राप्नोति .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {30।151} न खलु अपि सञ्ज्ञाश्रयः मत्वर्थीयः .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {31।151} किम् तर्हि .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {32।151} अर्थाश्रयः .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {33।151} सः यथा एव बहुव्रीहिणा उक्तत्वात् न भवति एवम् कर्मधारयेण अपि उक्तत्वात् न भविष्यति .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {34।151} एवम् तर्हि इदम् स्यात् : सर्वाणि धनानि सर्वधनानि सर्वधनानि अस्य सनिति सर्वधनी .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {35।151} न एवम् शक्यम् .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {36।151} नित्यम् एवम् सति कर्मधारयः स्यात् .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {37।151} तत्र यत् उक्तम् कदा चित् कर्मधारयः इति एतत् अयुक्तम् .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {38।151} एवम् तर्हि भवति वै किम् चित् आचार्याः कार्यवत् बुद्धिम् कृत्वा पठन्ति कार्याः शब्दाः इति .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {39।151} तद्वत् इदम् पठितम् समानाधिकरणसमादात् बहुव्रीहिः कर्तव्यः कदा चित् कर्मधारयः सर्वधनाद्यर्थः इति .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {40।151} यद् उच्यते समानाधिकरणसमासात् बहुव्रीहिः भवति विप्रतिषेधेन इति न एषः युक्तः विप्रतिषेधः .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {41।151} अन्तरङ्गः कर्मधारयः .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {42।151} का अन्तरङ्गता .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {43।151} स्वपदार्थे कर्मधारयः अन्यपदार्थे बहुव्रीहिः .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {44।151} अस्तु .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {45।151} विभाषा कर्मधारयः .

(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {46।151} यदा न कर्मधारयः तदा बहुव्रीहिः भविष्यति .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {47।151} एवम् अपि यदि अत्र कदा चित् कर्मधारयः भवति कर्मधारयप्रकृतिभिः मत्वर्थीयैः अभिधानम् प्राप्नोति .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {48।151} सर्वः च अयम् एवमर्थः यत्नः कर्मधारयप्रकृतिभिः मत्वर्थीयैः अभिधानम् मा भूत् इति .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {49।151} एवम् तर्हि न इदम् तस्य योगस्य उदाहरणम् विप्रतिषेधे परम् इति .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {50।151} किम् तर्हि .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {51।151} इष्टिः इयम् पठिता .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {52।151} समानाधिकरणसमासात् बहुव्रीहिः इष्टः कदा चित् कर्मधारयः सर्वधनाद्यर्थः इति .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {53।151} यदि इष्टिः पठिता न अर्थः अनेन .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {54।151} इह हि सर्वे मनुष्याः अल्पेन यत्नेन महतः अर्थान् आकाङ्क्षन्ति .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {55।151} एकेन माषेण शतसहस्रम् .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {56।151} एकेन कुद्दालकेन खारीसहस्रम् .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {57।151} तत्र कर्मधारयप्रकृतिभिः मत्वर्थीयैः अभिधानम् अस्तु बहुव्रीहिणा इति बहुव्रीहिणा भविष्यति लघुत्वात् .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {58।151} कथम् सर्वधनी सर्वबीजी सर्वकेशी नटः इति .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {59।151} इनिप्रकरणे सर्वादेः इनिम् वक्ष्यामि .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {60।151} तत् च अवश्यम् वक्तव्यम् ठनः बाधनार्थम् .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {61।151} कथम् गौरखरवत् वनम् गौरमृगवत् वनम् कृष्णसर्पवान् वल्मीकः लोहितशालिमान् ग्रामः .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {62।151} अस्ति अत्र विशेषः .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {63।151} जात्या अत्र अभिसम्बन्धः क्रियते .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {64।151} कृष्णसर्पः नाम सर्पजातिः सा अस्मिन् वल्मीके अस्ति .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {65।151} यदा हि अन्तरेण जातिम् तद्वताम् अभिसम्बन्धः क्रियते कृष्णसर्पः वल्मीकः इति एवम् तदा भविष्यति .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {66।151} पूर्वपदातिशये आतिशायिकात् बहुव्रीहिः सूक्ष्मवस्त्रतराद्यर्थः .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {67।151} पूर्वपदातिशये आतिशायिकात् बहुव्रीहिः भवति विप्रतिषेधेन .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {68।151} किम् प्रयोजनम् .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {69।151} सूक्ष्मवस्त्रतराद्यर्थः .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {70।151} आतिशायिकस्य अवकाशः पटुतरः पटुतमः .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {71।151} बहुव्रीहेः अवकाशः चित्रगुः शबलगुः .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {72।151} इह उभयम् प्राप्नोति सूक्ष्मवस्त्रतरः तीक्ष्ण्शृङ्गतरः .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {73।151} बहुव्रीहिः भवति विप्रतिषेधेन .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {74।151} न एषः युक्तः विप्रतिषेधः .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {75।151} विर्पतिषेधे परम् इति उच्यते .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {76।151} पूर्वः च बहुव्रीहिः परः आतिशायिकः .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {77।151} इष्टवाची परशब्दः .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {78।151} विप्रतिषेधे परम् यत् इष्टम् तत् भवति .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {79।151} एवम् अपि अयुक्तः .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {80।151} अन्तरङ्गः आतिशाइयिकः .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {81।151} का अन्तरङ्गता .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {82।151} ङ्याप्प्रातिपदिकात् आतिशायिकः सुबन्तानाम् बहुव्रीहिः .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {83।151} आतिशायिकः अपि न अन्तरङ्गः .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {84।151} कथम् .
(प्_2,1.69.2) क_इ,403.7-406.8 रो_इइ,641-653 {85।151} समर्थात् तद्धितः उत्पद्यते सामर्थ्यम् च सुबन्तेन्त .

मूल पाठ: Vyākaraṇamahābhāṣya · Edition: Franz Kielhorn (Bombay 1880-1885), revised by K.V. Abhyankar (Poona 1972-1996). · Data entry George Cardona · GRETIL (Göttingen) · CC BY-NC-SA 4.0

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