व्याकरणमहाभाष्य · भाग 341360
(प्_1,4.60.2) क_इ,342.7-343.8 रो_इइ,446-448 {42।55} न एतत् अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_1,4.60.2) क_इ,342.7-343.8 रो_इइ,446-448 {43।55} क्रियते एतत् न्यासे एव .
(प्_1,4.60.2) क_इ,342.7-343.8 रो_इइ,446-448 {44।55} तत्वम् .
(प्_1,4.60.2) क_इ,342.7-343.8 रो_इइ,446-448 {45।55} सुदत्तम् .
(प्_1,4.60.2) क_इ,342.7-343.8 रो_इइ,446-448 {46।55} अचः उपसर्गात् तः इति तत्वम् मा भूत् इति .
(प्_1,4.60.2) क_इ,342.7-343.8 रो_इइ,446-448 {47।55} षत्वम् .
(प्_1,4.60.2) क_इ,342.7-343.8 रो_इइ,446-448 {48।55} सुसिक्तम् घटशतेन सुस्तुतम् श्लोकशतेन .
(प्_1,4.60.2) क_इ,342.7-343.8 रो_इइ,446-448 {49।55} उपसर्गात् इति षत्वम् मा भूतिति .
(प्_1,4.60.2) क_इ,342.7-343.8 रो_इइ,446-448 {50।55} सुः पूजायाम् इति एतत् न वक्तव्यम् भवति .
(प्_1,4.60.2) क_इ,342.7-343.8 रो_इइ,446-448 {51।55} न एतत् अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_1,4.60.2) क_इ,342.7-343.8 रो_इइ,446-448 {52।55} क्रियत एतत् न्यासे एव .
(प्_1,4.60.2) क_इ,342.7-343.8 रो_इइ,446-448 {53।55} णत्वम् .
(प्_1,4.60.2) क_इ,342.7-343.8 रो_इइ,446-448 {54।55} दुर्नयम् दुर्नीतमिति .
(प्_1,4.60.2) क_इ,342.7-343.8 रो_इइ,446-448 {55।55} उपसर्गात् इति णत्वम् मा भूत् इति .
(प्_1,4.61) क_इ,343.10-12 रो_इइ,449 {1।8} कृभ्वस्तियोगे इति वक्तव्यम् .
(प्_1,4.61) क_इ,343.10-12 रो_इइ,449 {2।8} इह एव यथा स्यात् .
(प्_1,4.61) क_इ,343.10-12 रो_इइ,449 {3।8} ऊरीकृत्य ऊरीभूय .
(प्_1,4.61) क_इ,343.10-12 रो_इइ,449 {4।8} इह मा भूत् .
(प्_1,4.61) क_इ,343.10-12 रो_इइ,449 {5।8} ऊरी पक्त्वा .
(प्_1,4.61) क_इ,343.10-12 रो_इइ,449 {6।8} तत् तर्हि वक्तव्यम् .
(प्_1,4.61) क_इ,343.10-12 रो_इइ,449 {7।8} न वक्तव्यम् .
(प्_1,4.61) क_इ,343.10-12 रो_इइ,449 {8।8} क्रियायोगे इति अनुवर्तते न च अन्यया क्रियया ऊर्यादिच्विडाचाम् योगः अस्ति .
(प्_1,4.62.1) क_इ,343.14-22 रो_इइ,449-450 {1।13} कथम् इदम् विज्ञायते .
(प्_1,4.62.1) क_इ,343.14-22 रो_इइ,449-450 {2।13} इतेः परम् इतिपरम् न इतिपरम् अनितिपरम् इति आहोस्वित् इतिः परो यस्मात् तत् इदम् इतिपरम् न इतिपरम् अनितिपरमिति .
(प्_1,4.62.1) क_इ,343.14-22 रो_इइ,449-450 {3।13} किम् च अतः .
(प्_1,4.62.1) क_इ,343.14-22 रो_इइ,449-450 {4।13} यदि विज्ञायत इतेः परम् इतिपरम् न इतिपरम् अनितिपरम् इति खाट् इति कृत्वा निरष्ठीवत् इति अत्र प्राप्नोति .
(प्_1,4.62.1) क_इ,343.14-22 रो_इइ,449-450 {5।13} अथ इतिः परो यस्मात् तत् इदम् इतिपरम् न इतिपरम् अनितिपरमिति श्रौषट् वौषट् इति कृत्वा निरष्ठीवत् इति अत्र प्राप्नोति .
(प्_1,4.62.1) क_इ,343.14-22 रो_इइ,449-450 {6।13} अस्तु तावत् इतिः परो यस्मात् तत् इदम् इतिपरम् न इतिपरम् अनितिपरमिति .
(प्_1,4.62.1) क_इ,343.14-22 रो_इइ,449-450 {7।13} ननु च उक्तम् श्रौषट् वौषट् इति कृत्वा निरष्ठीवत् इति अत्र प्राप्नोति इति .
(प्_1,4.62.1) क_इ,343.14-22 रो_इइ,449-450 {8।13} न एषः दोषः .
(प्_1,4.62.1) क_इ,343.14-22 रो_इइ,449-450 {9।13} इदम् तावत् अयम् प्रष्टव्यः .
(प्_1,4.62.1) क_इ,343.14-22 रो_इइ,449-450 {10।13} अथ इह ते प्राक् धातोः इति कथम् गतिमात्रस्य पूर्वप्रयोग्ः भवति .
(प्_1,4.62.1) क_इ,343.14-22 रो_इइ,449-450 {11।13} उपोद्धरति इति .
(प्_1,4.62.1) क_इ,343.14-22 रो_इइ,449-450 {12।13} गत्याकृतिः प्रतिनिर्दिश्यते .
(प्_1,4.62.1) क_इ,343.14-22 रो_इइ,449-450 {13।13} इह अपि तर्हि अनुकरणाकृतिः निर्दिश्यते .
(प्_1,4.62.2) क_इ,343.23-344. 3 रो_इइ,450 {1।9} किमर्थम् इदम् उच्यते .
(प्_1,4.62.2) क_इ,343.23-344. 3 रो_इइ,450 {2।9} अनुकरणस्य इतिकरणपरत्वप्रतिषेधः अनिष्टशब्दनिवृत्त्यर्थः .
(प्_1,4.62.2) क_इ,343.23-344. 3 रो_इइ,450 {3।9} अनुकरणस्य इतिकरणपरत्वप्रतिषेधः उच्यते .
(प्_1,4.62.2) क_इ,343.23-344. 3 रो_इइ,450 {4।9} किम् प्रयोजनम् .
(प्_1,4.62.2) क_इ,343.23-344. 3 रो_इइ,450 {5।9} अनिष्टशब्दनिवृत्त्यर्थः .
(प्_1,4.62.2) क_इ,343.23-344. 3 रो_इइ,450 {6।9} अनिष्ठशब्दता मा भूत् इति .
(प्_1,4.62.2) क_इ,343.23-344. 3 रो_इइ,450 {7।9} इदम् विचारयिष्यति तेप्राग्धातुवचनम् प्रयोगनियमार्थम् वा स्यात् सञ्ज्ञानियमार्थम् वा इति .
(प्_1,4.62.2) क_इ,343.23-344. 3 रो_इइ,450 {8।9} तत् यदा प्रयोगनियमार्थम् तदा अनिष्ठशब्दनिवृत्त्यर्थम् इदम् वक्तव्यम् .
(प्_1,4.62.2) क_इ,343.23-344. 3 रो_इइ,450 {9।9} यदा हि सञ्ज्ञानियमार्थम् तदा न दोषः भवति .
(प्_1,4.63) क_इ,344.5-10 रो_इइ,450-451 {1।14} इदम् अतिबहु क्रियते आदरे अनादरे सत् असत् इति .
(प्_1,4.63) क_इ,344.5-10 रो_इइ,450-451 {2।14} आदारे सत् इति एव सिद्धम् .
(प्_1,4.63) क_इ,344.5-10 रो_इइ,450-451 {3।14} कथम् असत्कृत्य इति .
(प्_1,4.63) क_इ,344.5-10 रो_इइ,450-451 {4।14} तदन्तिविधिना भविष्यति .
(प्_1,4.63) क_इ,344.5-10 रो_इइ,450-451 {5।14} केन इदानीम् अनादरे भविष्यति .
(प्_1,4.63) क_इ,344.5-10 रो_इइ,450-451 {6।14} नञा आदरप्रतिषेधम् विज्ञास्यामः .
(प्_1,4.63) क_इ,344.5-10 रो_इइ,450-451 {7।14} नादरे अनादरे इति .
(प्_1,4.63) क_इ,344.5-10 रो_इइ,450-451 {8।14} न एवम् शक्यम् .
(प्_1,4.63) क_इ,344.5-10 रो_इइ,450-451 {9।14} आदरप्रसङ्गे एव हि स्यात् .
(प्_1,4.63) क_इ,344.5-10 रो_इइ,450-451 {10।14} अनादरप्रसङ्गे न स्यात् .
(प्_1,4.63) क_इ,344.5-10 रो_इइ,450-451 {11।14} अनादरग्रहणे पुनः क्रियमाणे बहुव्रीहिः अयम् विज्ञायते .
(प्_1,4.63) क_इ,344.5-10 रो_इइ,450-451 {12।14} अविद्यमानादरे अनादरे इति .
(प्_1,4.63) क_इ,344.5-10 रो_इइ,450-451 {13।14} तस्मात् अनादरग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_1,4.63) क_इ,344.5-10 रो_इइ,450-451 {14।14} असतः तु तदन्तविधिना सिद्धम् .
(प्_1,4.65) क_इ,344. 12-14 रो_इइ,452 {1।10} अन्तःशब्दस्य आङ्किविधिसमासणत्वेषु पसङ्ख्यानम् .
(प्_1,4.65) क_इ,344. 12-14 रो_इइ,452 {2।10} अन्तःशब्दस्य आङ्किविधिसमासणत्वेषु पसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_1,4.65) क_इ,344. 12-14 रो_इइ,452 {3।10} अङ् .
(प्_1,4.65) क_इ,344. 12-14 रो_इइ,452 {4।10} अन्तर्धा .
(प्_1,4.65) क_इ,344. 12-14 रो_इइ,452 {5।10} किविधिः .
(प्_1,4.65) क_इ,344. 12-14 रो_इइ,452 {6।10} अन्तर्धिः .
(प्_1,4.65) क_इ,344. 12-14 रो_इइ,452 {7।10} समासः .
(प्_1,4.65) क_इ,344. 12-14 रो_इइ,452 {8।10} अन्तर्हत्य .
(प्_1,4.65) क_इ,344. 12-14 रो_इइ,452 {9।10} णत्वम् .
(प्_1,4.65) क_इ,344. 12-14 रो_इइ,452 {10।10} अन्तर्हण्यात् गोभ्यो गाः .
(प्_1,4.74) क_इ,344.16-345.7 रो_इइ,452-453 {1।23} साक्षात्प्रभृतिषु च्व्यर्थग्रहणम् .
(प्_1,4.74) क_इ,344.16-345.7 रो_इइ,452-453 {2।23} साक्षात्प्रभृतिषु च्व्यर्थग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_1,4.74) क_इ,344.16-345.7 रो_इइ,452-453 {3।23} असाक्षात्साक्षात्कृत्वा साक्षात्कृत्य .
(प्_1,4.74) क_इ,344.16-345.7 रो_इइ,452-453 {4।23} यदा हि साक्षात् एव किम् चित् क्रियते तदा मा भूत् इति .
(प्_1,4.74) क_इ,344.16-345.7 रो_इइ,452-453 {5।23} मकारान्तत्वम् च गतिसञ्ज्ञासन्नियुक्तम् .
(प्_1,4.74) क_इ,344.16-345.7 रो_इइ,452-453 {6।23} मकारान्तत्वम् च गतिसञ्ज्ञासन्नियोगेन वक्तव्यम् .
(प्_1,4.74) क_इ,344.16-345.7 रो_इइ,452-453 {7।23} लवणङ्कृत्य .
(प्_1,4.74) क_इ,344.16-345.7 रो_इइ,452-453 {8।23} तत्र च्विप्रतिषेधः .
(प्_1,4.74) क_इ,344.16-345.7 रो_इइ,452-453 {9।23} तत्र च्व्यन्तस्य प्रतिषेधः वक्तव्यः .
(प्_1,4.74) क_इ,344.16-345.7 रो_इइ,452-453 {10।23} लवणीकृत्य .
(प्_1,4.74) क_इ,344.16-345.7 रो_इइ,452-453 {11।23} न वा पूर्वेण कृतत्वात् ण वा वक्तव्यम् .
(प्_1,4.74) क_इ,344.16-345.7 रो_इइ,452-453 {12।23} किम् कारणम् .
(प्_1,4.74) क_इ,344.16-345.7 रो_इइ,452-453 {13।23} पूर्वेण कृतत्वात् .
(प्_1,4.74) क_इ,344.16-345.7 रो_इइ,452-453 {14।23} अस्तु अनेन विभाषा .
(प्_1,4.74) क_इ,344.16-345.7 रो_इइ,452-453 {15।23} पूर्वेण नित्यः भविष्यति .
(प्_1,4.74) क_इ,344.16-345.7 रो_इइ,452-453 {16।23} इदम् तर्हि प्रयोजनम् .
(प्_1,4.74) क_इ,344.16-345.7 रो_इइ,452-453 {17।23} मकारान्तत्वम् च गतिसञ्ज्ञासन्नियुक्तम् इति उक्तम् .
(प्_1,4.74) क_इ,344.16-345.7 रो_इइ,452-453 {18।23} तत् च्व्यन्तस्य मा भूत् इति .
(प्_1,4.74) क_इ,344.16-345.7 रो_इइ,452-453 {19।23} एतत् अपि न अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_1,4.74) क_इ,344.16-345.7 रो_इइ,452-453 {20।23} लवणशब्दस्य अयम् विभाषा लवणम्शब्द आदेशः क्रियते .
(प्_1,4.74) क_इ,344.16-345.7 रो_इइ,452-453 {21।23} यदि च लवणी शब्दस्य अपि विभाषा लवणम्शब्दः आदेशः भवति न किम् चिद् दुष्यति .
(प्_1,4.74) क_इ,344.16-345.7 रो_इइ,452-453 {22।23} त्रैशब्द्यम् च ह साध्यम् .
(प्_1,4.74) क_इ,344.16-345.7 रो_इइ,452-453 {23।23} । तच्च एवम् सति सिद्धम् भवति इति .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {1।43} किमिदम् प्राग्धातुवचनम् प्रयोगनियमार्थम् : एते प्राक् एव धातोः प्रयोक्तव्याः .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {2।43} आहोस्वित् सञ्ज्ञानियमार्थम् : एते प्राक् च अक्प्राक् च प्रयोक्तव्याः , प्राक् प्रयुज्यमानानाम् गतिसञ्ज्ञा भवति इति .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {3।43} कः च अत्र विशेषः .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {4।43} प्राग्धातुवचनम् प्रयोगनियमार्थम् इति चेत् अनुकरणस्य इतिकरणपरप्रतिषेधः अनिष्टशब्दनिवृत्त्यर्थः .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {5।43} प्राग्धातुवचनम् प्रयोगनियमार्थम् इति चेत् अनुकरणस्य इतिकरणपरप्रतिषेधः वक्तव्यः .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {6।43} किम् प्रयोजनम् .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {7।43} अनिष्टशब्दनिवृत्त्यर्थः .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {8।43} अनिष्टशबता मा भूत् इति .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {9।43} छन्दसि परव्यवहितवचनम् च .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {10।43} छन्दसि परे अपि व्यवहिताः च इति वक्तव्यम् .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {11।43} सञ्ज्ञानियमे सिद्धम् .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {12।43} सञ्ज्ञानियमे सिद्धम् एतत् भवति .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {13।43} अस्तु तर्हि सञ्ज्ञानियमः .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {14।43} उभयोः अनर्थकम् वचनम् अनिष्टादर्शनात् .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {15।43} उभयोः अपि पक्षयोः वचनमनर्थकम् .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {16।43} किम् कारणम् .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {17।43} अनिष्टादर्शनात् .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {18।43} न हि कः चित्प्रपचति इति प्रयोक्तव्ये पचतिप्र इति प्रयुङ्क्ते .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {19।43} यदि च अनिष्टम् दृश्येत ततः यत्नार्हम् स्यात् .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {20।43} उपसर्जनसन्निपाते तु पूर्वपरव्यवस्थार्थम् .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {21।43} उपसर्जनसन्निपाते तु पूर्वपरव्यवस्थार्थम् एतत् वक्तव्यम् .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {22।43} ऋषभम् कूलमुद्रुजम् ऋषभम् कूलमुद्वहम् .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {23।43} अत्र गतेः प्राक् धातोः प्रयोगः यथा स्यात् .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {24।43} यदि उपसर्जनसन्निपाते पूर्वपरव्यवस्थार्थम् इदम् उच्यते सुकटम्कराणि वीरणान् इ इति अत्र गतेः प्राक् धातोः प्रयोगः प्राप्नोति .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {25।43} आचार्यप्रवृत्तिः ज्ञापयति न अत्र गतेः प्राक्प्रयोगः भवति इति यत् अयम् ईषद्दुःसुषु कृच्छ्राकृच्छार्थेषु खल् इति खकारम् अनुबन्धम् करोति .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {26।43} कथम् कृत्वा ज्ञापकम् .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {27।43} खित्करणे एतत् प्रयोजनम् खिति इति मुम् यथा स्यात् इति .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {28।43} यदि च अत्र गतेः प्राक्प्रयोगः स्यात् खित्करणम् अनर्थकम् स्यात् .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {29।43} अस्तु अत्र मुम् .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {30।43} अनव्ययस्य इति प्रतिषेधः भविष्यति .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {31।43} पश्यति तु आचार्यः न अत्र गतेः प्राक् धतोः प्रयोगः भवति इति ततः खकारम् अनुबन्धम् करोति .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {32।43} न एतत् अस्ति ज्ञापकम् .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {33।43} यदि अपि अत्र गतेः प्राक्प्रयोगः स्यात् स्यातेवात्र मुमागमः .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {34।43} कथम् .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {35।43} कृद्ग्रहणे गतिकारकपूर्वस्य अपि ग्रहणम् भवति इति .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {36।43} तस्मात् न अर्थः एवमर्थेन प्राग्धातुवचनेन .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {37।43} कथम् ऋषभम् कूलमुद्रुजम् ऋषभम् कूलमुद्वहम् .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {38।43} न एषः दोषः .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {39।43} न एषः उदिः उपपदम् .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {40।43} किम् तर्हि .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {41।43} विशेषणम् .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {42।43} उदि कूले रुजिवहोः .
(प्_1,4.80) क_इ,345.9-346.14 रो_इइ,453-456 {43।43} उत्पूर्वाभ्याम् रुजिवहिभ्याम् कूले उपपदे इति .
(प्_1,4.83) क_इ,346.16-18 रो_इइ,456-457 {1।7} किमर्थम् महती सञ्ज्ञा क्रियते .
(प्_1,4.83) क_इ,346.16-18 रो_इइ,456-457 {2।7} अन्वर्थसञ्ज्ञा यथा विज्ञायेत .
(प्_1,4.83) क_इ,346.16-18 रो_इइ,456-457 {3।7} कर्म प्रोक्तवन्तः कर्मप्रवचनीयाः इति .
(प्_1,4.83) क_इ,346.16-18 रो_इइ,456-457 {4।7} के पुनः कर्म प्रोक्तवन्तः .
(प्_1,4.83) क_इ,346.16-18 रो_इइ,456-457 {5।7} ये सम्प्रति क्रियाम् न आहुः .
(प्_1,4.83) क_इ,346.16-18 रो_इइ,456-457 {6।7} के च सम्प्रति क्रियाम् न आहुः .
(प्_1,4.83) क_इ,346.16-18 रो_इइ,456-457 {7।7} ये अप्रयुज्यमानस्य क्रियाम् आहुः ते कर्मप्रवचनीयाः .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {1।45} किमर्थम् इदम् उच्यते .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {2।45} कर्मप्रवचनीयसञ्ज्ञा यथा स्यात् .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {3।45} गत्युपसर्गसञ्ज्ञे मा भूताम् इति .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {4।45} किम् च स्यात् .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {5।45} शाकल्यस्य सम्हिताम् अनु प्रावर्षत् : गतिः गतौ इति निघातः प्रसज्येत .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {6।45} यदि एवम् वेः अपि कर्मप्रवचनीयसञ्ज्ञा वक्तव्या .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {7।45} वेः अपि निघातः न इष्यते : प्रादेशम् प्रादेशम् विपरिलिखति .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {8।45} अस्ति अत्र विशेषः .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {9।45} न अत्र वेः लिखिम् प्रति क्रियायोगः .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {10।45} किम् तर्हि .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {11।45} अप्रयुज्यमानम् .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {12।45} प्रादेशम् प्रादेशम् विमाय परिलिखति इति .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {13।45} यदि एवम् अनोः अपि कर्मप्रवचनीयसञ्ज्ञया न अर्थः .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {14।45} अनोः अपि हि न वृषिम् प्रति क्रियायोगः .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {15।45} किम् तर्हि अप्रयुज्यमानम् .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {16।45} शाकल्येन सुकृताम् सम्हिताम् अनुविशम्य देवः प्रावर्षत् .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {17।45} इदम् तर्हि प्रयोजनम् द्वितीया यथा स्यात् कर्मप्रवचनीययुक्ते द्वितीया इति .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {18।45} अतः उत्तरम् पठति .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {19।45} अनुर्लक्षणेवचनानर्थक्यम् सामान्यकृतत्वात् .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {20।45} अनुर्लक्षणेवचनार्थक्यम् .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {21।45} किम् कारणम् .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {22।45} सामान्यकृतत्वात् .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {23।45} सामान्येन एव अत्र कर्मप्रवचनीयसञ्ज्ञा भविष्यति लक्षणेत्थम्भूताख्यानभागवीप्सासु प्रतिपर्यनवः इति .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {24।45} हेत्वर्थम् तु वचनम् .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {25।45} हेत्वर्थम् इदम् वक्तव्यम् .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {26।45} हेतुः शाकल्यस्य सम्हिता वर्षस्य न लक्षणम् .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {27।45} किम् वक्तव्यम् एतत् .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {28।45} न हि .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {29।45} कथम् अनुच्यमानम् गंस्यते .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {30।45} लक्षणम् हि नाम सः भवति येन पुनः पुनः लक्ष्यते न यः सकृदपि निमित्तत्वाय कल्पते .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {31।45} सकृत् च असौ शाकल्येन सुकृताम् सम्हिताम् अनुशिम्य देवः प्रावर्षत् .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {32।45} सः तर्हि तथा .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {33।45} निर्देशः कर्तव्यः अनुः हेतौ इति .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {34।45} अथ इदानीम् लक्षणेन हेतुः अपि व्याप्तः न अर्थः अनेन .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {35।45} लक्षणेन हेतुः अपि व्याप्तः .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {36।45} न हि अवश्यम् तत् एव लक्षणम् भवति येन पुनः पुनः लक्ष्यते .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {37।45} किम् तर्हि .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {38।45} यत् सकृत् अपि निमित्त्वाय कल्पते तत् अपि लक्षणम् भवति .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {39।45} तत् यथा अपि भवान् कमण्डुलपाणिम् छात्रम् अद्रक्षीत् इति .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {40।45} सकृत् आसौ कमण्डलुपाणिः छात्रः दृष्टः तस्य तत् एव लक्षणम् भवति .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {41।45} तत् एव तर्हि प्रयोजनम् द्वितीया यथा स्यात् कर्मप्रवचनीययुक्ते द्वितीया इति .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {42।45} एतत् अपि न अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {43।45} सिद्धा अत्र द्वितीया कर्मप्रवचनीययुक्ते इति एव .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {44।45} न सिध्यति .
(प्_1,4.84) क_इ,346.20-347.21 रो_इइ,458-460 {45।45} परत्वात् हेतुत्वाश्रया तृतीया प्राप्नोति .
(प्_1,4.89) क_इ,347.23-25 रो_इइ,461 {1।6} आङ् मर्यादाभिविध्योः इति वक्तव्यम् .
(प्_1,4.89) क_इ,347.23-25 रो_इइ,461 {2।6} इह अपि यथा स्यात् आकुमारम् यशः पाणिनेः इति .
(प्_1,4.89) क_इ,347.23-25 रो_इइ,461 {3।6} तत् तर्हि वक्तव्यम् .
(प्_1,4.89) क_इ,347.23-25 रो_इइ,461 {4।6} न वक्तव्यम् .
(प्_1,4.89) क_इ,347.23-25 रो_इइ,461 {5।6} मर्यादावचने इति एव सिद्धम् .
(प्_1,4.89) क_इ,347.23-25 रो_इइ,461 {6।6} एषा अस्य यशसः मर्यादा .
(प्_1,4.90) क_इ,348.2-6 रो_इइ,461-462 {1।10} कस्य लक्षणदयः अर्थाः निर्दिश्यन्ते .
(प्_1,4.90) क_इ,348.2-6 रो_इइ,461-462 {2।10} वृक्षादीनाम् .
(प्_1,4.90) क_इ,348.2-6 रो_इइ,461-462 {3।10} किमर्थम् पुनः इदम् उच्यते .
(प्_1,4.90) क_इ,348.2-6 रो_इइ,461-462 {4।10} कर्मप्रवचनीयसञ्ज्ञा यथा स्यात् .
(प्_1,4.90) क_इ,348.2-6 रो_इइ,461-462 {5।10} गत्युपसर्गसञ्ज्ञे मा भूताम् इति .
(प्_1,4.90) क_इ,348.2-6 रो_इइ,461-462 {6।10} न एतत् अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_1,4.90) क_इ,348.2-6 रो_इइ,461-462 {7।10} यत्क्रियायुक्ताः तम् प्रति गत्युपसर्गसञ्ज्ञे भवतः न च वृक्षादीन् प्रति क्रियायोगः .
(प्_1,4.90) क_इ,348.2-6 रो_इइ,461-462 {8।10} इदम् तर्हि प्रयोजनम् द्वितीया यथा स्यात् कर्मप्रवचनीययुक्ते द्वितीया इति .
(प्_1,4.90) क_इ,348.2-6 रो_इइ,461-462 {9।10} वृक्षम् प्रति विद्योतते .
(प्_1,4.90) क_इ,348.2-6 रो_इइ,461-462 {10।10} वृक्षमनु विद्योतते इति .
(प्_1,4.93) क_इ,348.8-20 रो_इइ,462-464 {1।24} किमर्थम् अधिपर्योः अनर्थकयोः कर्मप्रवचनीयसञ्ज्ञा उच्यते .
(प्_1,4.93) क_इ,348.8-20 रो_इइ,462-464 {2।24} कर्मप्रवचनीयसञ्ज्ञा यथा स्यात् .
(प्_1,4.93) क_इ,348.8-20 रो_इइ,462-464 {3।24} गत्युपसर्गसञ्ज्ञे मा भूताम् इति .
(प्_1,4.93) क_इ,348.8-20 रो_इइ,462-464 {4।24} न एतत् अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_1,4.93) क_इ,348.8-20 रो_इइ,462-464 {5।24} यत्क्रियायुक्ताः तम् प्रति गत्युपसर्गसञ्ज्ञे भवतः अनर्थकौ च इमौ .
(प्_1,4.93) क_इ,348.8-20 रो_इइ,462-464 {6।24} इदम् तर्हि प्रयोजनम् पञ्चमी यथा स्यात् पञ्चमी अपाङ्परिभिः इति .
(प्_1,4.93) क_इ,348.8-20 रो_इइ,462-464 {7।24} कुतः पर्यागम्यत इति .
(प्_1,4.93) क_इ,348.8-20 रो_इइ,462-464 {8।24} सिद्धा अत्र पञ्चमी अपादाने इति एव .
(प्_1,4.93) क_इ,348.8-20 रो_इइ,462-464 {9।24} आतः च अपादानपञ्चमी एषा .
(प्_1,4.93) क_इ,348.8-20 रो_इइ,462-464 {10।24} यत्र अपि अधिशब्देन योगे पञ्चमी न विधीयते तत्र अपि श्रूयते .
(प्_1,4.93) क_इ,348.8-20 रो_इइ,462-464 {11।24} कुतः अध्यागम्यत इति .
(प्_1,4.93) क_इ,348.8-20 रो_इइ,462-464 {12।24} एवम् तर्हि सिद्धे सति यत् अनर्थकयोः गत्युपसर्गसञ्ज्ञाबाधिकाम् कर्मप्रवचनीयसञ्ज्ञाम् शास्ति तत् ज्ञापयति आचार्यः अनर्थकानाम् अपि एषाम् भवति अर्थवत्कृतम् इति .
(प्_1,4.93) क_इ,348.8-20 रो_इइ,462-464 {13।24} किम् एतस्य ज्ञापने प्रयोजनम् .
(प्_1,4.93) क_इ,348.8-20 रो_इइ,462-464 {14।24} निपातस्य अनर्थकस्य प्रातिपदिकत्वम् चोदितम् .
(प्_1,4.93) क_इ,348.8-20 रो_इइ,462-464 {15।24} तत् न वक्तव्यम् भवति .
(प्_1,4.93) क_इ,348.8-20 रो_इइ,462-464 {16।24} अथ वा न एव इमौ अनर्थकौ .
(प्_1,4.93) क_इ,348.8-20 रो_इइ,462-464 {17।24} किम् तर्हि अनर्थकौ इति उच्यते .
(प्_1,4.93) क_इ,348.8-20 रो_इइ,462-464 {18।24} अनर्थान्तर्वाचिनौ अनर्थकौ .
(प्_1,4.93) क_इ,348.8-20 रो_इइ,462-464 {19।24} धातुना उक्ताम् क्रियाम् आहतुः .
(प्_1,4.93) क_इ,348.8-20 रो_इइ,462-464 {20।24} तद् अविशिष्टम् भवति यथा शङ्खे पयः .
(प्_1,4.93) क_इ,348.8-20 रो_इइ,462-464 {21।24} यदि एवम् धातुना उक्तत्वात् तस्यार्थस्य उपसर्गप्रयोगो न प्राप्नोति उक्तार्थानाम् अप्रयोगः इति .
(प्_1,4.93) क_इ,348.8-20 रो_इइ,462-464 {22।24} उक्तार्थानामपि प्रयोगः दृश्यते .
(प्_1,4.93) क_इ,348.8-20 रो_इइ,462-464 {23।24} तत् यथा अपूपौ द्वौ आनय .
(प्_1,4.93) क_इ,348.8-20 रो_इइ,462-464 {24।24} ब्राह्मणौ द्वौ अनय इति .
(प्_1,4.96) क_इ,348.22-349. 4 रो_इइ,464-465 {1।15} इह कस्मात् न भवति .
(प्_1,4.96) क_इ,348.22-349. 4 रो_इइ,464-465 {2।15} सर्पिषः अपि स्यात् .
(प्_1,4.96) क_इ,348.22-349. 4 रो_इइ,464-465 {3।15} गोमूत्रस्य अपि स्यात् .
(प्_1,4.96) क_इ,348.22-349. 4 रो_इइ,464-465 {4।15} किम् च स्यात् .
(प्_1,4.96) क_इ,348.22-349. 4 रो_इइ,464-465 {5।15} द्वितीया अपि प्रसज्येत कर्मप्रवचनीययुक्ते द्वितीया इति .
(प्_1,4.96) क_इ,348.22-349. 4 रो_इइ,464-465 {6।15} न एषः दोषः .
(प्_1,4.96) क_इ,348.22-349. 4 रो_इइ,464-465 {7।15} न इमे अप्यर्थाः निर्दिश्यन्ते .
(प्_1,4.96) क_इ,348.22-349. 4 रो_इइ,464-465 {8।15} किम् तर्हि .
(प्_1,4.96) क_इ,348.22-349. 4 रो_इइ,464-465 {9।15} परपदार्थाः इमे निर्दिश्यन्ते .
(प्_1,4.96) क_इ,348.22-349. 4 रो_इइ,464-465 {10।15} एतेषु अर्थेषु यत् पदम् वर्तते तत् प्रति अपिः कर्मप्रवचनीयसञ्ज्ञः भवति इति .
(प्_1,4.96) क_इ,348.22-349. 4 रो_इइ,464-465 {11।15} अथ वा यत् अत्र कर्मप्रवचनीययुक्तम् न अदः प्रयुज्यते .
(प्_1,4.96) क_इ,348.22-349. 4 रो_इइ,464-465 {12।15} किम् पुनः तत् .
(प्_1,4.96) क_इ,348.22-349. 4 रो_इइ,464-465 {13।15} बिन्दुः .
(प्_1,4.96) क_इ,348.22-349. 4 रो_इइ,464-465 {14।15} बिन्दोः तर्हि कस्मात् न भवति .
(प्_1,4.96) क_इ,348.22-349. 4 रो_इइ,464-465 {15।15} उपपदविभक्तेः कारकविभक्तिः बलीयसी इति प्रथमा भविष्यति इति .
(प्_1,4.97) क_इ,349.6-9 रो_इइ,466 {1।6} अधिरीश्वरवचने उक्तम् .
(प्_1,4.97) क_इ,349.6-9 रो_इइ,466 {2।6} किम् उक्तम् .
(प्_1,4.97) क_इ,349.6-9 रो_इइ,466 {3।6} यस्य च ईश्वरवचनम् इति कर्तृनिर्देशः चेत् अवचनात् सिद्धम् .
(प्_1,4.97) क_इ,349.6-9 रो_इइ,466 {4।6} प्रथमानुपपत्तिः तु .
(प्_1,4.97) क_इ,349.6-9 रो_इइ,466 {5।6} स्ववचनात् सिद्धम् इति .
(प्_1,4.97) क_इ,349.6-9 रो_इइ,466 {6।6} अधिः स्वम् प्रति कर्मप्रवचनीयसञ्ज्ञः भवति इति वक्तव्यम् .
(प्_1,4.99) क_इ,349.11-19 रो_इइ,466-467 {1।13} लादेशे परस्मैपदग्रहणम् पुरुषबाधितत्वात् .
(प्_1,4.99) क_इ,349.11-19 रो_इइ,466-467 {2।13} लादेशे परस्मैपदग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_1,4.99) क_इ,349.11-19 रो_इइ,466-467 {3।13} किम् कारणम् .
(प्_1,4.99) क_इ,349.11-19 रो_इइ,466-467 {4।13} पुरुषबाधितत्वात् .
(प्_1,4.99) क_इ,349.11-19 रो_इइ,466-467 {5।13} इह वचने हि सञ्ज्ञाबाधनम् .
(प्_1,4.99) क_इ,349.11-19 रो_इइ,466-467 {6।13} इह हि क्रियमाणे अनवकाशा पुरुषसञ्ज्ञा परस्मैपदसञ्ज्ञाम् बाधेत .
(प्_1,4.99) क_इ,349.11-19 रो_इइ,466-467 {7।13} परस्मैपदसञ्ज्ञा अपि अनवकाशा .
(प्_1,4.99) क_इ,349.11-19 रो_इइ,466-467 {8।13} सा वचनात् भविष्यति .
(प्_1,4.99) क_इ,349.11-19 रो_इइ,466-467 {9।13} सावकाशा परसमैपदसञ्ज्ञा .
(प्_1,4.99) क_इ,349.11-19 रो_इइ,466-467 {10।13} कः वकाशः .
(प्_1,4.99) क_इ,349.11-19 रो_इइ,466-467 {11।13} शतृक्क्वसू अवकाशः .
(प्_1,4.99) क_इ,349.11-19 रो_इइ,466-467 {12।13} सिचि वृद्धौ तु परस्मैपदग्रहणम् ज्ञापकम् पुरुषाबाधकत्वस्य .
(प्_1,4.99) क_इ,349.11-19 रो_इइ,466-467 {13।13} यत् अयम् सिचि वृद्धिः परस्मैपदेषु इति परस्मैपदग्रहणम् करोति तत् ज्ञापयति आचार्यः न पुरुषसञ्ज्ञा परस्मैपदसञ्ज्ञाम् बाधते इति .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {1।38} प्रथममध्यमोत्तमसञ्ज्ञायाम् आत्मनेपदग्रहणम् समसङ्ख्यार्थम् . प्रथममध्यमोत्तमसञ्ज्ञायाम् आत्मनेपदग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {2।38} आत्मनेपदानाम् च प्रथममध्यमोत्तमसञ्ज्ञाः भवन्ति इति वक्तव्यम् .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {3।38} किम् प्रयोजनम् .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {4।38} समसङ्ख्यार्थम् .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {5।38} सङ्ख्यातानुदेशः यथा स्यात् .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {6।38} अक्रियमाणे हि आत्मनेपदग्रहणे तिस्रः सञ्ज्ञाः षट् सञ्ज्ञिनः .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {7।38} वैषम्यात् सङ्ख्यातानुदेशः न प्राप्नोति .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {8।38} क्रियमाणे अपि च आत्मनेपदग्रहणे आनुपूर्व्यवचनम् च .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {9।38} आनुपूर्व्यवचनम् च कर्तव्यम् .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {10।38} अक्रियमणे हि कस्य चित् एव त्रिकस्य प्रथमसञ्ज्ञा स्यात् कस्य चित् एव मध्यमसञ्ज्ञा कस्य चित् एव उत्तमसञ्ज्ञा .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {11।38} न वैकशेषनिर्देशात् .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {12।38} यत् तावत् उच्यते आत्मनेपदग्रहणम् कर्तव्यम् समसङ्ख्यार्थम् इति .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {13।38} तत् न कर्तव्यम् .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {14।38} सञ्ज्ञाः अपि षत् एव निर्दिश्यन्ते .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {15।38} कथम् .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {16।38} एकशेषनिर्देसात् .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {17।38} एकशेषनिर्देशः अयम् .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {18।38} अथ एतस्मिन् एकशेषनिर्देशे सति किम् अयम् कृतैकशेषाणाम् द्वन्द्वः .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {19।38} प्रथमः च प्रथमः च प्रथमौ मध्यमः च मध्यमः च मध्यमौ उत्तमः च उत्तमः च उत्तमौ प्रथमौ च मध्यमौ च उत्तमौ च प्रथममध्यमोत्तमाः इति .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {20।38} आहोस्वित् कृतद्वन्द्वानाम् एकशेषः .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {21।38} प्रथमौ च मध्यमः च उत्तमः च प्रथममध्यमोत्तमाः .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {22।38} प्रथममध्यमोत्त्तमाः च प्रथममध्यमोत्तमाः च प्रथममध्यमोत्तमाः इति .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {23।38} किम् च अतः .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {24।38} यदि कृतैकेशेषाणाम् द्वन्द्वः प्रथममध्यमयोः प्रथमसञ्ज्ञा प्राप्नोति .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {25।38} उत्तमप्रथमयोः मध्यमसञ्ज्ञा प्राप्नोति .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {26।38} मध्यमोत्तमयोः उत्तमसञ्ज्ञा प्राप्नोति .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {27।38} अथ कृतद्वन्द्वानामेकशेषो न दोषः भवति .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {28।38} यथा न दोषः तथा अस्तु .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {29।38} किम् पुनः अत्र न्याय्यम् .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {30।38} उभयम् इति आह .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {31।38} उभयम् हि दृश्यते .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {32।38} तत् यथा .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {33।38} बहु शक्तिकिटकम् बहूनि शक्तिकिटकानि बहु स्थालीपिठरम् बहूनि स्थालीपिठराणि .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {34।38} यत् अपि उच्यते क्रियमाणे अपि आत्मनेपदग्रहणे आनुर्पूर्व्यवचनम् कर्तव्यम् इति .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {35।38} न कर्तव्यम् .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {36।38} लोकतः एतत् सिद्धम् .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {37।38} तत् यथा लोके विहव्यस्य द्वाभ्याम् द्वाभ्याम् अग्निः उप्स्थेयः इति .
(प्_1,4.101) क_इ,350.2-24 रो_इइ,468-469 {38।38} न च उच्यते आनुपूर्व्येण इति आनुपूर्व्येण च उपस्थीयत इति .
(प्_1,4.104) क_इ,351.2-10 रो_इइ,470-471 {1।17} त्रीणि त्रीणि इति अनुवर्तते उताहो न .
(प्_1,4.104) क_इ,351.2-10 रो_इइ,470-471 {2।17} किम् च अतः .
(प्_1,4.104) क_इ,351.2-10 रो_इइ,470-471 {3।17} यदि अनुवर्तते अष्ठनः आ विभक्तौ इति आत्वम् न प्राप्नोति .
(प्_1,4.104) क_इ,351.2-10 रो_इइ,470-471 {4।17} अथ निवृत्तम् प्रथमयोः पूर्वसवर्णः इति अत्र प्रत्यययोः एव ग्रहणम् प्राप्नोति .
(प्_1,4.104) क_इ,351.2-10 रो_इइ,470-471 {5।17} यथा इच्छसि तथा अस्तु .
(प्_1,4.104) क_इ,351.2-10 रो_इइ,470-471 {6।17} अस्तु तावत् अनुवर्तते इति .
(प्_1,4.104) क_इ,351.2-10 रो_इइ,470-471 {7।17} ननु च उक्तम् अष्ठन आ विभक्तौ इति आत्वम् न प्राप्नोति इति .
(प्_1,4.104) क_इ,351.2-10 रो_इइ,470-471 {8।17} वचनात् भविष्यति .
(प्_1,4.104) क_इ,351.2-10 रो_इइ,470-471 {9।17} अथ वा पुनः अस्तु निवृत्तम् .
(प्_1,4.104) क_इ,351.2-10 रो_इइ,470-471 {10।17} ननु च उक्तम् प्रथमयोः पूर्वसवर्णः इति अत्र प्रत्यययोः एव ग्रहणम् प्राप्नोति इति .
(प्_1,4.104) क_इ,351.2-10 रो_इइ,470-471 {11।17} न एषः दोषः .
(प्_1,4.104) क_इ,351.2-10 रो_इइ,470-471 {12।17} अचि इति अनुवर्तते .
(प्_1,4.104) क_इ,351.2-10 रो_इइ,470-471 {13।17} न चाजादी प्रथमौ प्रत्ययौ स्तः .
(प्_1,4.104) क_इ,351.2-10 रो_इइ,470-471 {14।17} ननु च एवम् विज्ञायते अजादी यौ प्रथमौ अजादीनाम् वा यौ प्रथमौ इति .
(प्_1,4.104) क_इ,351.2-10 रो_इइ,470-471 {15।17} यत् तर्हि तस्मात् शसः नः पुम्सि इति अनुक्रान्तम् पूर्वसवर्णदीर्घम् प्रतिनिर्दिशति तत् ज्ञापयति आचार्यः विभक्त्योः ग्रहणम् इति .
(प्_1,4.104) क_इ,351.2-10 रो_इइ,470-471 {16।17} अथ वा वचनग्रहणम् एव कुर्यात् .
(प्_1,4.104) क_इ,351.2-10 रो_इइ,470-471 {17।17} औजसोः पूर्वसवर्णः इति .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {1।100} किमर्थम् इदम् उच्यते .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {2।100} युष्मदस्मच्छेषवचनम् नियमार्थम् .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {3।100} नियमार्थः अयम् आरम्भः .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {4।100} अथ एतस्मिन् नियमार्थे विज्ञायमाने किम् अयम् उपपदनियमः युष्मदि मध्यमः एव अस्मदि उत्तमः एव आहोस्वित् पुरुषनियमः युष्मदि एव मध्यमः अस्मदि एव उत्तमः इति .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {5।100} किम् च अतः .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {6।100} यदि पुरुषनियमः शेषग्रहणम् कर्तव्यम् शेषे प्रथमः इति .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {7।100} किम् कारणम् .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {8।100} मध्यमोत्तमौ नियतौ युष्मदस्मदी अनियते .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {9।100} तत्र प्रथमः अपि प्राप्नोति .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {10।100} तत्र शेषग्रहणम् कर्तव्यम् प्रथमनियमार्थम् .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {11।100} शेषे एव प्रथमः भवति न अन्यत्र इति .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {12।100} अथ अपि उपपदनियमः एवम् अपि शेषग्रहणम् कर्तव्यम् शेषे प्रथमः इति .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {13।100} युष्मदस्मदी नियते मध्यमोत्तमौ अनियतौ तौ शेषे अपि प्राप्नुतः .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {14।100} तत्र शेषग्रहणम् कर्तव्यम् शेषनियमार्थम् .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {15।100} शेषे प्रथमः एव भवति न अन्यः इति .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {16।100} उपपदनियमे शेषग्रहणम् शक्यम् अकर्तुम् .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {17।100} कथम् .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {18।100} युष्मदस्मदी नियते मध्यमोत्तमौ अनियतौ तौ शेषे अपि प्राप्नुतः .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {19।100} ततः वक्ष्यामि प्रथमः भवति इति .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {20।100} तत् नियमार्थम् भविष्यति .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {21।100} यत्र प्रथमः च अन्यः च प्राप्नोति तत्र प्रथमः भवति इति .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {22।100} तत्र युष्मदस्मदन्येषु प्रथमप्रतिषेधः शेषत्वात् .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {23।100} तत्र युष्मदस्मदन्येषु प्रथमस्य प्रतिषेधः वक्तव्यः .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {24।100} त्वम् च देवदत्तः च पचथः .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {25।100} अहम् च देवदत्तः च पचावः .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {26।100} किम् कारणम् .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {27।100} शेषत्वात् .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {28।100} शेषे प्रथमः इति प्रथमः प्राप्नोति .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {29।100} सिद्धम् तु युष्मदस्मदोः प्रतिषेधात् .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {30।100} सिद्धम् एतत् .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {31।100} कथम् .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {32।100} युष्मदस्मदोः प्रतिषेधात् .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {33।100} शेषे प्रथम्ः युष्मदस्मदोः न इति वक्तव्यम् .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {34।100} युष्मदि मध्यमात् अस्मदि उत्तमः प्रतिषेधेन .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {35।100} युष्मदि मध्यमात् अस्मदि उत्तमः इति एतत् भवति विप्रतिषेधेन .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {36।100} युष्मदि मध्यमः इति अस्य अवकाशः त्वम् पचसि .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {37।100} अस्मदि उत्तमः इति अस्य अवकाशः अहम् पचामि .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {38।100} इह उभयम् प्राप्नोति त्वम् च अहम् च पचावः .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {39।100} अस्मदि उत्तमः इति एतत् भवति विर्प्रतिषेधेन .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {40।100} सः तर्हि विप्रतिषेधः वक्त्वयः .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {41।100} न वक्तव्यः .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {42।100} त्यदादीनाम् यत् यत् परम् तत् तत् शिष्यते इति एवम् अस्मदः शेषः भविष्यति .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {43।100} तत्र अस्मदि उत्तमः इति एव सिद्धम् .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {44।100} अनेकशेषभावार्थम् तु . अनेकशेषभावार्थम् तु सः विप्रतिषेधः वक्तव्यः .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {45।100} यदा च एकशेषः न .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {46।100} कदा च एकशेषः न .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {47।100} सहविवक्षायाम् एकशेषः .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {48।100} यदा न सहविवक्षा तद एकशेषः न अस्ति .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {49।100} न वा युष्मदस्मदोः अनेकशेषभावात् तदधिकरणानाम् अपि अनेकशेषभावात् अविप्रतिषेधः .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {50।100} न वा अर्थः विप्रतिषेधेन .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {51।100} किम् कारणम् .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {52।100} युष्मदस्मदोः अनेकशेषभावात् तदधिकरणानाम् अपि युष्मदस्मदधिकरणानाम् अपि एकशेषेन न भवितव्यम् .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {53।100} त्वम् च अहम् च पचसि पचामि च इति .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {54।100} क्रियापृथक्त्वे च द्रव्यपृथक्त्वदर्शनम् अनुमानम् उत्तरत्र अनेकशेषभावस्य .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {55।100} क्रियापृथक्त्वे च द्रव्यपृथक्त्वम् दृश्यते .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {56।100} तत् यथा पचसि पचामि च त्वम् च अहम् च इति .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {57।100} तत् अनुमानम् उत्तरयोः अपि क्रिययोः एकशेषः न भवति इति .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {58।100} एवम् च कृत्वा सः पि अदोषः भवति यत् उक्तम् तत्र युष्मदस्मदन्येषु प्रथमप्रतिषेधः शेषत्वात् इति .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {59।100} तत्र अपि हि एवम् भवितव्यम् त्वम् च देवदत्तः च पचसि पचति च .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {60।100} अहम् च देवदत्तः च पचामि पचति च इति .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {61।100} यत् तावत् उच्यते न वा युष्मदस्मदोः अनेकशेषभावात् तदधिकरणानाम् अपि अनेकशेषभावात् अविप्रतिषेधः इति .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {62।100} दृश्यते हि युष्मदस्मदोः चानेकशेषः तदधिकरणानाम् च एकशेषः .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {63।100} तत् यथा त्वम् च अहम् च वृत्त्रहन् उभौ सम्प्रयुज्यावहै इति .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {64।100} यत् अपि उच्यते क्रियापृथक्त्वे च द्रव्यपृथक्त्वदर्शनम् अनुमानम् उत्तरत्र अनेकशेषभावस्य इति .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {65।100} क्रियापृथक्त्वे खलु अपि द्रव्यैकशेषः भवति इति दृश्यते .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {66।100} तत् यथा अक्षाः भज्यन्ताम् भक्ष्यन्ताम् दीव्यन्ताम् इति .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {67।100} एवम् च कृत्वा सः अपि दोषो भवति यत् उक्तम् तत्र युष्मदस्मदन्येषु प्रथमप्रतिषेधः शेषत्वात् इति .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {68।100} न एषः दोषः .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {69।100} परिहृतम् एतत् सिद्धम् तु युष्मदस्मदोः प्रतिषेधात् इति .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {70।100} सः तर्हि प्रतिषेधः वक्तव्यः .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {71।100} न वक्तव्यः .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {72।100} शेषे प्रथमः विधीयते .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {73।100} न हि शेषः च अन्यः च शेषग्रहणेन गृह्यते .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {74।100} भवेत् प्रथमः न स्यान् .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {75।100} मध्यमोत्तमौ अपि न प्राप्नुतः .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {76।100} किम् कारणम् .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {77।100} युष्मदस्मदोः उपपदयोः मध्यमोत्तमौ उच्येते .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {78।100} न च युष्मदस्मदी अन्यः च युष्मदस्मद्ग्रहणेन गृह्यते .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {79।100} यत् अत्र युष्मत् यत् च अस्मत् तत्तदाश्रयौ मध्यमोत्तमौ भविष्यतः .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {80।100} यथा एव तर्हि यत् अत्र युष्मत् यत् च स्मत् तदाश्रयौ मध्यमोत्तमौ भवतः एवम् यः अत्र शेषः तदाश्रयः प्रथमः प्राप्नोति .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {81।100} एवम् तर्हि शेषे उपपदे प्रथमः विधीयते .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {82।100} उपोच्चारि पदम् उपपदम् .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {83।100} यत् च अत्र उपोच्चारि न सः शेषः यः च शेषः न तत् उपोच्चारि .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {84।100} भवेत् प्रथमः न स्यात् .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {85।100} मध्यमोत्तमौ अपि न प्राप्नुतः .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {86।100} किम् कारणम् .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {87।100} युष्मदस्मदोः उपपदयोः मध्यमोत्तमौ उच्येते .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {88।100} उपोच्चारि पदम् उपपदम् .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {89।100} यत् च अत्र उपोच्चारि न ते युष्मदस्मदी ये च युष्मदस्मदी न तत् उपोच्चारि .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {90।100} एवम् तर्हि शेषेण सामानाधिकरण्ये प्रथमः विधीयते .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {91।100} न च अत्र शेषेण एव सामानाधिकरण्यम् .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {92।100} भवेत् प्रथमः न स्यात् .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {93।100} मध्यमोत्तमौ अपि न प्राप्नुतः .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {94।100} किम् कारणम् .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {95।100} युष्मदस्मद्भ्याम् सामानाधिकरण्ये मध्यमोत्तमौ उच्येते न च अत्र युष्मदस्मद्भ्याम् एव सामानाधिकरण्यम् .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {96।100} एवम् तर्हि त्यदादीनि सर्वैः नित्यम् इति एवम् अत्र युष्मदस्मदोः शेषः भविष्यति .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {97।100} तत्र युष्मदि मध्यमः अस्मदि उत्तमः इति एव सिद्धम् .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {98।100} न सिध्यति .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {99।100} स्थानिनि अपि इति प्रथमः प्राप्नोति .
(प्_1,4.105, 107-108.1) क_इ,351.13-353.27 रो_इइ,471-476 {100।100} त्यदादीनाम् खलु अपि यत् यत् परम् तत् तत् शिष्यते इति यदा भवतः शेषः तदा प्रथमः प्राप्नोति
(प्_1,4.105, 107-108.2) क_इ,353.27-354. 15 रो_इइ,477-478 {1।30} युष्मदि मध्यमः अस्मदि उत्तमः इति एव उच्यते. तौ इह न प्राप्नुतः : परमत्वम् पचसि .
(प्_1,4.105, 107-108.2) क_इ,353.27-354. 15 रो_इइ,477-478 {2।30} परमाहम् पचामि इति .
(प्_1,4.105, 107-108.2) क_इ,353.27-354. 15 रो_इइ,477-478 {3।30} तदन्तविधिना भविष्यति .
(प्_1,4.105, 107-108.2) क_इ,353.27-354. 15 रो_इइ,477-478 {4।30} इह अपि तर्हि तदन्तविधिना प्राप्नुतः : अतित्वम् पचति .
(प्_1,4.105, 107-108.2) क_इ,353.27-354. 15 रो_इइ,477-478 {5।30} अत्यहम् पचति इति .
(प्_1,4.105, 107-108.2) क_इ,353.27-354. 15 रो_इइ,477-478 {6।30} ये च अपि एते समानाधिकरणवृत्तयः तद्धिताः तत्र च मध्यमोत्तमौ न प्राप्नुतः : त्वत्तरः पचसि मत्तरः पचामि इति .
(प्_1,4.105, 107-108.2) क_इ,353.27-354. 15 रो_इइ,477-478 {7।30} त्वद्रूपः पचसि मद्रूपः पचामि इति .
(प्_1,4.105, 107-108.2) क_इ,353.27-354. 15 रो_इइ,477-478 {8।30} त्वत्कल्पः पचसि .
(प्_1,4.105, 107-108.2) क_इ,353.27-354. 15 रो_इइ,477-478 {9।30} मत्कल्पः पचामि इति. एवम् तर्हि युष्मद्वति अस्मद्वति इति एवम् भविष्यति .
(प्_1,4.105, 107-108.2) क_इ,353.27-354. 15 रो_इइ,477-478 {10।30} इह अपि तर्हि प्राप्नुतः : अतित्वम् पचति .
(प्_1,4.105, 107-108.2) क_इ,353.27-354. 15 रो_इइ,477-478 {11।30} अत्यहम् पचति इति .
(प्_1,4.105, 107-108.2) क_इ,353.27-354. 15 रो_इइ,477-478 {12।30} एवम् तर्हि युष्मदि साधने अस्मदि साधने इति एवम् भविष्यति .
(प्_1,4.105, 107-108.2) क_इ,353.27-354. 15 रो_इइ,477-478 {13।30} एवम् च कृत्वा सः अपि अदोषः भवति यत् उक्तम् तत्र युष्मदस्मदन्येषु प्रथमप्रतिषेधः शेषत्वात् इति .
(प्_1,4.105, 107-108.2) क_इ,353.27-354. 15 रो_इइ,477-478 {14।30} अथ वा प्रथमः उत्सर्गः करिष्यते .
(प्_1,4.105, 107-108.2) क_इ,353.27-354. 15 रो_इइ,477-478 {15।30} तस्य युष्मदस्मदोः उपपदयोः मध्यमोत्तमौ अपवादौ भविष्यतः .
(प्_1,4.105, 107-108.2) क_इ,353.27-354. 15 रो_इइ,477-478 {16।30} तत्र युष्मद्गन्धः च अस्मद्गन्धः च अस्ति इति कृत्वा मध्यमोत्तमौ भविष्यतः .
(प्_1,4.105, 107-108.2) क_इ,353.27-354. 15 रो_इइ,477-478 {17।30} अथ इह कथम् भवितव्यम् .
(प्_1,4.105, 107-108.2) क_इ,353.27-354. 15 रो_इइ,477-478 {18।30} अत्वम् त्वम् सम्पद्यते त्वद्भवति मद्भवति इति .
(प्_1,4.105, 107-108.2) क_इ,353.27-354. 15 रो_इइ,477-478 {19।30} आहोस्वित् त्वद्भवसि मद्भवामि इति .
(प्_1,4.105, 107-108.2) क_इ,353.27-354. 15 रो_इइ,477-478 {20।30} त्वद्भवति मद्भवति इति एवम् भवितव्यम् .
(प्_1,4.105, 107-108.2) क_इ,353.27-354. 15 रो_इइ,477-478 {21।30} मध्यमोत्तमौ कस्मात् न भवतः .
(प्_1,4.105, 107-108.2) क_इ,353.27-354. 15 रो_इइ,477-478 {22।30} गौणमुख्ययोः मुख्ये सम्प्रत्ययः भवति .
(प्_1,4.105, 107-108.2) क_इ,353.27-354. 15 रो_इइ,477-478 {23।30} तत् यथा .
(प्_1,4.105, 107-108.2) क_इ,353.27-354. 15 रो_इइ,477-478 {24।30} गौः अनुबन्ध्यः अजः अग्नीष्होमीयः इति न बाहीकः अनुबध्यते .
(प्_1,4.105, 107-108.2) क_इ,353.27-354. 15 रो_इइ,477-478 {25।30} कथम् तर्हि बाहीके वृद्ध्यात्त्वे भवतः .
(प्_1,4.105, 107-108.2) क_इ,353.27-354. 15 रो_इइ,477-478 {26।30} गौः तिष्ठति .
(प्_1,4.105, 107-108.2) क_इ,353.27-354. 15 रो_इइ,477-478 {27।30} गाम् आनय इति .
(प्_1,4.105, 107-108.2) क_इ,353.27-354. 15 रो_इइ,477-478 {28।30} अर्थाश्रये एतत् एवम् भवति .
(प्_1,4.105, 107-108.2) क_इ,353.27-354. 15 रो_इइ,477-478 {29।30} यत् हि शब्दाश्रयम् शब्दमात्रे तत् भवति .
(प्_1,4.105, 107-108.2) क_इ,353.27-354. 15 रो_इइ,477-478 {30।30} शब्दाश्रये च वृद्ध्यात्त्वे .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {1।53} परः सन्निकर्षः सम्हिता चेत् अद्रुतायाम् असंहितम् . परः सन्निकर्षः संहिता चेत् अद्रुतायाम् वृत्तौ संहितासञ्ज्ञा न प्राप्नोति .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {2।53} द्रुतायाम् एव हि परः सन्निकर्षो वर्णानाम् न अद्रुतायाम् .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {3।53} तुल्यः सम्निकर्षः .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {4।53} तुल्यः सम्निकर्षः वर्णानाम् द्रुतमध्यमविलिम्बितासु वृत्तिषु .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {5।53} किङ्कृतः तर्थि विशेषः .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {6।53} वर्णकालभूयस्त्वम् तु . वर्णानाम् तु कालभूयस्त्वम् .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {7।53} तत् यथा .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {8।53} हस्तिमशकयोः तुल्यः सन्निकर्षः प्राणिभूयस्त्वम् तु .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {9।53} यदि एवम् द्रुतायाम् तपरकरणे मध्यमविलिम्बितयोः उपसङ्ख्यानम् कालभेदात् .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {10।53} द्रुतायाम् तपरकरणे मध्यमविलिम्बितयोः उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {11।53} किम् कारणम् .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {12।53} कालभेदात् .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {13।53} ये द्रुतायाम् वृत्तौ वर्णाः त्रिभागाधिकाः ते मध्यमायाम् ये मध्यमायाम् वृत्तौ वर्णाः त्रिभागाधिकास्ते विलिम्बितायाम् .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {14।53} उक्तम् वा .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {15।53} किम् उक्तम् .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {16।53} सिद्धम् तु अवस्थिताः वर्णाः वक्तुः चिराचिरवचनात् वृत्तयः विशिष्यन्ते इति .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {17।53} अथ वा शब्दाविरामः संहिता इति एतत् लक्षणम् करिष्यते .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {18।53} शब्दाविरामे प्रतिवर्णम् अवसानम् .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {19।53} शब्दाविरामे प्रतिवर्णम् अवसानसञ्ज्ञा प्राप्नोति .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {20।53} किम् इदम् प्रतिवर्णम् इति .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {21।53} वर्णम् वर्णम् प्रति प्रतिवर्णम् .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {22।53} येन एव यत्नेन एकः वर्णः उच्च्यार्यते विच्छिन्ने वर्णे उपसंहृत्य तम् अन्यम् उपादाय द्वितीयः प्रयुज्यते तथा तृतीयः तथा चतुर्थः .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {23।53} एवम् तर्हि अनवकाशा संहितासञ्ज्ञा अवसानसञ्ज्ञाम् बाधिष्यते .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {24।53} अथ वा अवसानसञ्ज्ञायाम् प्रकर्षगतिः विज्ञास्यते : साधीयः यः विरामः इति .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {25।53} कः च साधीयः .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {26।53} यः शब्दार्थयोः विरामः .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {27।53} अथ वा ह्रादाविरामः संहा इति एतत् लक्षणम् करिष्यते .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {28।53} ह्रादाविरामे स्पर्शाघोषसंयोगे असन्निधानात् असंहितम् .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {29।53} ह्रादाविरामे स्पर्शानाम् अघोषाणाम् संयोगे असम्निधानात् संहितासञ्ज्ञा न प्राप्नोति .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {30।53} कुक्कुटः पिप्पका पित्तम् इति .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {31।53} किम् उच्यते संयोगे इति .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {32।53} अथ यत्र एकः पचति इति एकः पूर्वपरयोः ह्रादेन प्रच्छाद्यते .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {33।53} तद् यथा .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {34।53} द्वयोः रक्तयोः वस्त्रयोः मध्ये शुक्लम् वस्त्रम् तद्गुणम् उपलभ्यते .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {35।53} बदरपिटके रिक्तकः लोहकंसः तद्गुणः उपलभ्यते .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {36।53} एकेन तुल्यः सन्निधिः .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {37।53} यथा एकः वर्णः ह्रादेन प्रच्छाद्यते एवम् अनेकः अपि .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {38।53} अथ वा पौर्वापर्यम् अकालव्यपेतम् संहिता इति एतत् लक्षणम् करिष्यते. पौर्वापर्यम् अकालव्यपेतम् संहिता चेत् पूर्वापराभावात् असंहितम् . पौर्वापर्यम् अकालव्यपेतम् संहिता चेत् पूर्वापराभावात् संहितासञ्ज्ञा न प्राप्नोति .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {39।53} न हि वर्णानाम् पौर्वापर्यम् अस्ति .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {40।53} किम् कारणम् .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {41।53} एकैकवर्णवर्तित्वात् वाचः उच्चरितप्रध्वंसित्वात् च वर्णानाम् .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {42।53} एकैकवर्णवर्तिनी वाक् .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {43।53} न द्वौ युगपत् उच्चारयति .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {44।53} गौः इति यावत् गकारे वाक् वर्तते न औकारे न विसर्जनीये .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {45।53} यावत् औकारे न गकारे न विसर्जनीये .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {46।53} यावत् विसर्जनीये न गकारे न औकारे .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {47।53} उच्चरितप्रध्वंसित्वात् .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {48।53} उच्चरितप्रध्वंसिनः खलु अपि वर्णाः .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {49।53} उच्चरितः प्रध्वस्तः .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {50।53} अथ अपरः प्रयुज्यते .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {51।53} न वर्णः वर्णस्य सहायः .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {52।53} एवम् तर्हि बुद्धौ कृत्वा सर्वाः चेष्ठाः कर्ता धीरः तत्वन्नीतिः शब्देन अर्थान् वाच्यान् दृष्ट्वा बुद्धौ कुर्यात् पौर्वापर्यम् . बुद्धिविषयम् एव शब्दानाम् पौर्वापर्यम् .
(प्_1,4.109) क_इ,354.17-356.13 रो_इइ,478-484 {53।53} इह यः एषः मनुष्यः प्रेक्षापूर्वकारी भवति सः पश्यति असमिन् अर्थे अयम् शब्दः प्रयोक्त्वयः स्मिन् तावत् शब्दे अयम् तावत् वर्णः ततः अयम् ततः अयम् इति .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {1।79} इदम् विचार्यते अभावः अवसानलक्षणम् स्याद् विरामः वा इति .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {2।79} कः च अत्र विशेषः .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {3।79} अभावे अवसानलक्षणे उपर्यभाववचनम् . अभावेआवसानलक्षणे उपर्यभावग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {4।79} उपरि यः अभावः इति वक्तव्यम् .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {5।79} पुरस्तात् अपि हि शब्दस्य अभावः तत्र मा भूत् इति .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {6।79} किम् च स्यात् .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {7।79} रसः रथः .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {8।79} खरवसानयोर्विसर्जनीयः इति विसर्जनीयः प्रसज्येत .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {9।79} अस्तु तर्हि विरामः .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {10।79} विरामे विरामवचनम् .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {11।79} यस्य विरामः विरामग्रहणम् तेन कर्तव्यम् .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {12।79} ननु च यस्य अपि अभावः तेन अपि अभावग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {13।79} परार्थम् मम भविष्यति .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {14।79} अभावः लोपः .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {15।79} ततः अवसानम् च इति .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {16।79} मम अपि तर्हि विरामग्रहणम् परार्थम् भविष्यति .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {17।79} विरामः लोपः अवसानम् च इति .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {18।79} उपरि यः विरामः इति वक्तव्यम् .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {19।79} पुरस्तात् अपि शब्दस्य विरामः तत्र मा भूत् इति .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {20।79} किम् च स्यात् .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {21।79} रसः रथः .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {22।79} खरवसानयोर्विसर्जनीयः इति विसर्जनीयः प्रसज्येत .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {23।79} आरम्भपूर्वकः मम विरामः .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {24।79} अथ वा न इदम् अवसानलक्षणम् विचार्यते .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {25।79} किम् तर्हि .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {26।79} सञ्ज्ञी .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {27।79} अभावः वसानसञ्ज्ञी स्यात् विरामः वा इति .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {28।79} कः च अत्र विशेषः .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {29।79} अभावे अवसानसञ्ज्ञिनि उपर्यभाववचनम् .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {30।79} अभावे अवसानसञ्ज्ञिन् युपर्यभावग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {31।79} उपरि यः भावः इति वक्तव्यम् .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {32।79} पुरस्तात् अपि हि शब्दस्य अभावः तत्र मा भूत् इति .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {33।79} किम् च स्यात् .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {34।79} रसः रथः .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {35।79} खरवसानयोर्विसर्जनीयः इति विसर्जनीयः प्रसज्येत .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {36।79} अस्तु तर्हि विरामः अवासनम् .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {37।79} विरामे विरामवचनम् .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {38।79} यस्य विरामः तेन विरामग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {39।79} ननु च यस्य अपि अभावः तेन अपि अभावग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {40।79} परार्थम् मम भविष्यति .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {41।79} अभावः लोपः .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {42।79} ततः अवसानम् च इति .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {43।79} मम अपि तर्हि विरामग्रहणम् परार्थम् भविष्यति .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {44।79} विरामः लोपः अवसानम् च इति .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {45।79} उपरि यः विरामः इति वक्तव्यम् .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {46।79} ननु च यस्य अपि अभावः तेन अपि अभावग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {47।79} परार्थम् मम भविष्यति .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {48।79} अभावः लोपः .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {49।79} ततः अवसानम् च इति .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {50।79} मम अपि तर्हि विरामग्रहणम् परार्थम् भविष्यति .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {51।79} विरामः लोपः अवसानम् च इति .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {52।79} उपरि यः विरामः इति वक्तव्यम् .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {53।79} ननु च उक्तम् आरम्भपूर्वकः इति .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {54।79} न अवश्यम् अयम् रमिः प्रवृत्तौ एव वर्तते .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {55।79} किम् तर्हि .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {56।79} अप्रवृत्तौ अपि .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {57।79} तत् यथा .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {58।79} उपरतानि अस्मिन् कुले व्रतानि .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {59।79} उपरतः स्वाध्यायः इति .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {60।79} न च तत्र स्वाध्यायः भूतपूर्वः भवति न अपि व्रतानि .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {61।79} भावाविरामभावित्वात् शब्दस्य वसानलक्षणम् न .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {62।79} भावाविरामभावित्वात् शब्दस्य अवसानलक्षणम् न उपपद्यते .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {63।79} किम् इदम् भावाविरामभावित्वात् इति .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {64।79} भावस्य अविरामः भावाविरामः भावाविरामेण भवति इति भावाविरामभावी भावाविरामभाविनः भावो भावाविरामभावित्वम् .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {65।79} अपरः आह .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {66।79} भावभावित्वादविरामभावित्वात् च शब्दस्य अवसानलक्षणम् न उपपद्यते इति .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {67।79} तत्परः इति वा वर्णस्य अवसानम् . विरामपरः वर्णः वसानसञ्ज्ञः भवति इति वक्तव्यम् .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {68।79} वर्णः अन्त्यः वा अवसानम् .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {69।79} अथ वा व्यक्तम् एव पठितव्यम् अन्त्यः वर्णः वसानसञ्ज्ञः भवति इति .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {70।79} तत् तर्हि वक्तव्यम् .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {71।79} न वक्तव्यम् .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {72।79} संहितावसानयोः लोकविदितत्वात् सिद्धम् .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {73।79} सम्हिता अवसानम् इति लोकविदितौ एतौ अर्थौ .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {74।79} एवम् हि कः चित् कम् चिद् अधीयानम् आह : शन्नोदेवीयम् सम्हितया अधीष्व इति .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {75।79} सः तत्र परमसन्निकर्षम् अधीते .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {76।79} अपरः आह : केन वस्यसि इति .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {77।79} सः आह : अकारेण इकारेण उकारेण इति .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {78।79} एवम् एतौ लोकविदिततौ अर्थौ .
(प्_1,4.110) क_इ,356.15-358.8 रो_इइ,484-488 {79।79} तयोः लोकविदितत्वात् सिद्धम् इति .
(प्_2,1.1.1) क_इ,359.2-20 रो_इइ,491-496 {1।28} विधिः इति कः अयम् शब्दः .
(प्_2,1.1.1) क_इ,359.2-20 रो_इइ,491-496 {2।28} विपूर्वात् धाञः कर्मसाधनः इकारः .
(प्_2,1.1.1) क_इ,359.2-20 रो_इइ,491-496 {3।28} विधीयते विधिः इति .
(प्_2,1.1.1) क_इ,359.2-20 रो_इइ,491-496 {4।28} किम् पुनः विधीयते .
(प्_2,1.1.1) क_इ,359.2-20 रो_इइ,491-496 {5।28} समासः विभक्तिविधानम् पराङ्गवद्भावः च .
(प्_2,1.1.1) क_इ,359.2-20 रो_इइ,491-496 {6।28} किम् पुनः अयम् अधिकारः आहोस्वित् परिभाषा .
(प्_2,1.1.1) क_इ,359.2-20 रो_इइ,491-496 {7।28} कः पुनः अधिकारपरिभाषयोः विशेषः .
(प्_2,1.1.1) क_इ,359.2-20 रो_इइ,491-496 {8।28} अधिकारः प्रतियोगम् तस्य अनिर्देशार्थः इति योगे योगे उपतिष्ठते .
(प्_2,1.1.1) क_इ,359.2-20 रो_इइ,491-496 {9।28} परिभाषा पुनः एकदेशस्था सती सर्वम् शास्त्रम् अभिज्वलयति प्रदीपवत् .
(प्_2,1.1.1) क_इ,359.2-20 रो_इइ,491-496 {10।28} तत् यथा प्रदीपः सुप्रज्वलितः एकदेशस्थः सर्वम् वेश्म अभिज्वलयति .
(प्_2,1.1.1) क_इ,359.2-20 रो_इइ,491-496 {11।28} कः पुनः अत्र प्रयत्नविशेषः .
(प्_2,1.1.1) क_इ,359.2-20 रो_इइ,491-496 {12।28} अधिकारे सति स्वरयितव्यम् परिभाषायाम् पुनः सत्याम् सर्वम् अपेक्ष्यम् .
(प्_2,1.1.1) क_इ,359.2-20 रो_इइ,491-496 {13।28} तथा इदम् अपरम् द्वैतम् भवति .
(प्_2,1.1.1) क_इ,359.2-20 रो_इइ,491-496 {14।28} एकार्थीभावः वा सामर्थ्यम् स्यात् व्यपेक्षा वा इति .
(प्_2,1.1.1) क_इ,359.2-20 रो_इइ,491-496 {15।28} तत्र एकार्थीभावे सामर्थ्ये अधिकारे च सति समासः एकः सङ्गृहीतः भवति बिभक्तिविधानम् पराङ्गवद्भावः च असङ्गृहीतः .
(प्_2,1.1.1) क_इ,359.2-20 रो_इइ,491-496 {16।28} व्यपेक्षायाम् पुनः सामर्थ्ये अधिकारे च सति बिभक्तिविधानम् पराङ्गवद्भावः च सङ्गृहीतः समासः तु एकः असङ्गृहीतः .
(प्_2,1.1.1) क_इ,359.2-20 रो_इइ,491-496 {17।28} अन्यत्र खलु अपि समर्थग्रहणानि युक्तग्रहणानि च कर्तव्यानि भवन्ति .
(प्_2,1.1.1) क_इ,359.2-20 रो_इइ,491-496 {18।28} क्व अन्यत्र .
(प्_2,1.1.1) क_इ,359.2-20 रो_इइ,491-496 {19।28} इसुसोः सामर्थ्ये न चवाहाहैवयुक्ते इति .
(प्_2,1.1.1) क_इ,359.2-20 रो_इइ,491-496 {20।28} व्यपेक्षायाम् पुनः सामर्थ्ये परिभाषायाम् च सत्याम् यावान् व्याकरणे पदगन्धः अस्ति सः सर्वः सङ्गृहीतः भवति समासः तु एकः असङ्गृहीतः .
(प्_2,1.1.1) क_इ,359.2-20 रो_इइ,491-496 {21।28} तत्र एकार्थीभावः सामर्थ्यम् परिभाषा च इति एवम् सूत्रम् अभिन्नतरकम् भवति .
(प्_2,1.1.1) क_इ,359.2-20 रो_इइ,491-496 {22।28} एवम् अपि क्व चित् अकर्तव्यम् समर्थग्रहणम् क्रियते क्व चित् च कर्तव्यम् न क्रियते .
(प्_2,1.1.1) क_इ,359.2-20 रो_इइ,491-496 {23।28} अकर्तव्यम् तावत् क्रियते समर्थानाम् प्रथमात् वा इति .
(प्_2,1.1.1) क_इ,359.2-20 रो_इइ,491-496 {24।28} कर्तव्यम् च न क्रियते कर्मणि अण् समर्थात् इति .
(प्_2,1.1.1) क_इ,359.2-20 रो_इइ,491-496 {25।28} ननु च गम्यते तत्र सामर्थ्यम् .
(प्_2,1.1.1) क_इ,359.2-20 रो_इइ,491-496 {26।28} कुम्भकारः नगरकारः इति .
(प्_2,1.1.1) क_इ,359.2-20 रो_इइ,491-496 {27।28} सत्यम् गम्यते उत्पन्ने तु प्रत्यये .
(प्_2,1.1.1) क_इ,359.2-20 रो_इइ,491-496 {28।28} सः एव तावत् समर्थात् उत्पाद्यः .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {1।96} अथ समर्थग्रहणम् किमर्थम् .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {2।96} वक्ष्यति द्वितीया श्रितादिभिः समस्यते .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {3।96} कष्टश्रितः नरकश्रितः इति .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {4।96} समर्थग्रहणम् किमर्थम् .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {5।96} पश्य देवदत्त कष्टम् .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {6।96} श्रितः विष्णुमित्रः गुरुकुलम् .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {7।96} तृतीया तत्कृतार्थेन गुणवचनेन .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {8।96} शङ्कुलाखण्डः किरिकाणः .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {9।96} समर्थग्रहणम् किमर्थम् .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {10।96} तिष्ठ त्वम् शङ्कुलया .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {11।96} खण्डः धावति मुसलेन .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {12।96} चतुर्थी तदर्थार्थबलिहितसुखरक्षितैः .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {13।96} गोहितम् अश्रहितम् .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {14।96} समर्थग्रहणम् किमर्थम् .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {15।96} सुखम् गोभ्यः .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {16।96} हितम् देवदत्ताय .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {17।96} पञ्चमी भयेन .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {18।96} वृकभयम् दस्युभयम् चोरभयम् .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {19।96} समर्थग्रहणम् किमर्थम् .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {20।96} गच्छ त्वम् मा वृकेभ्यः .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {21।96} भयम् देवदत्तस्य यज्ञदत्तात् .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {22।96} षष्ठी सुबन्तेन समस्यते : राजपुरुषः , ब्राह्मणकम्बलः .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {23।96} समर्थग्रहणम् किमर्थम् .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {24।96} भार्या राज्ञः .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {25।96} पुरुषः देवदत्तस्य .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {26।96} सप्तमी शौण्डैः : अक्षशौण्डः , स्त्रीशौण्डः .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {27।96} समर्थग्रहणम् किमर्थम् .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {28।96} कुशलः देवदत्तः अक्षेषु .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {29।96} शौण्डः पिबति पानागारे .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {30।96} अथ क्रियमाणे अपि समर्थग्रहणे इह कस्मात् न भवति महत् कष्टम् श्रितः इति .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {31।96} न वा भवति महाकष्टश्रितः इति .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {32।96} भवति यदा एतत् वाक्यम् भवति : महत् कष्टम् महाकष्टम् , महाकष्टम् श्रितः महाकष्टश्रितः इति .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {33।96} यदा तु एतत् वाक्यम् भवति : महत् कष्टम् श्रितः इति तदा न भवितव्यम् तदा च प्रप्नोति .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {34।96} तदा कस्मात् न भवति .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {35।96} कस्य कस्मात् न भवति .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {36।96} किम् द्वयोः आहोस्वित् बहूनाम् .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {37।96} बहूनाम् कस्मात् न भवति .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {38।96} सुप् सुपा इति वर्तते .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {39।96} ननु च भोः आकृतौ शास्त्राणि प्रवर्तन्ते .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {40।96} तत् यथा प्रातिपदिकात् इति वर्तमाने अन्यस्मात् च अन्यस्मात् च प्रातिपदिकात् उत्पत्तिः भवति .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {41।96} सत्यम् एतत् .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {42।96} आकृतिः तु प्रत्येकम् परिसमाप्यते .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {43।96} यावति एतत् परिसमाप्यते प्रातिपदिकात् इति तावतः उत्पत्त्या भवितव्यम् .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {44।96} प्रत्येकम् च एतत् परिसमाप्यते न समुदाये .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {45।96} एवम् इह अपि यावति एतत् परिसमाप्यते सुप् सुपा इति तावतः समासेन भवितव्यम् .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {46।96} द्वयोः द्वयोः च एतत् परिसमाप्यते न बहुषु .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {47।96} द्वयोः तर्हि कस्मात् न भवति .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {48।96} असामर्थ्यात् .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {49।96} कथम् असामर्थ्यम् .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {50।96} सापेक्षम् असमर्थम् भवति इति .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {51।96} यदि सापेक्षम् असमर्थम् भवति इति उच्यते राजपुरुषः अभिरूपः राजपुरुषः दर्शनीयः अत्र वृत्तिः न प्राप्नोति .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {52।96} न एषः दोषः .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {53।96} प्रधानम् अत्र सापेक्षम् .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {54।96} भवति च प्रधानस्य सापेक्षस्य अपि समासः .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {55।96} यत्र तर्हि अप्रधानम् सापेक्षम् भवति तत्र ते वृत्तिः न प्राप्नोति : देवदत्तस्य गुरुकुलम् , देवदत्तस्य गुरुपुत्रः , देवदत्तस्य दासभार्या इति .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {56।96} न एषः दोषः .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {57।96} समुदायपेक्षा अत्र षष्ट्ःई सर्वम् गुरुकुलम् अपेक्षते .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {58।96} यत्र तर्हि न समुदायपेक्षा षष्ट्ःई तत्र वृत्तिः न प्राप्नोति : किम् ओदनः शालीनाम् .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {59।96} सक्त्वाढकम् आपणीयानाम् .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {60।96} कुतः भवान् पाटलिपुत्रकः .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {61।96} इह च अपि : देवदत्तस्य गुरुकुलम् , देवदत्तस्य गुरुपुत्रः , देवदत्तस्य दासभार्या इति : यदि एषा समुदायपेक्षा षष्ट्ःई स्यात् न एतत् नियोगतः गम्येत देवदत्तस्य यः गुरुः तस्य यः पुत्रः इति .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {62।96} किम् तर्हि .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {63।96} अन्यस्य अपि गुरुपुत्रः देवदत्तस्य किम् चित् इति एषः अर्थः गम्येत .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {64।96} यतः तु नियोगतः देवदत्तस्य यः गुरुः तस्य यः पुत्रः इति एषः अर्थः गम्यते अतः मन्यामहे न समुदायपेक्षा षष्ट्ःई इति .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {65।96} अन्यत्र खलु अपि समर्थग्रहणे सापेक्षस्य अपि कार्यम् भवति .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {66।96} क्व अन्यत्र .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {67।96} इसुसोः सामर्थ्ये .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {68।96} ब्राहमणस्य सर्पिः करोति इति .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {69।96} तस्मात् न अएत शक्यक् वक्तुम् सापेक्षम् असमर्थम् भवति इति .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {70।96} वृत्तिः तर्हि कस्मात् न भवति महत् कष्टम् श्रितः इति .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {71।96} सविशेषणानाम् वृत्तिः न वृत्तस्य वा विशेषणम् न प्रयुज्यते इति वक्तव्यम् .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {72।96} यदि सविशेषणानाम् वृत्तिः न वृत्तस्य वा विशेषणम् न प्रयुज्यते इति उच्यते देवदत्तस्य गुरुकुलम् देवदत्तस्य गुरुपुत्रः देवदत्तस्य दासभार्या इति अत्र वृत्तिः न प्राप्नोति .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {73।96} अगुरुकुलपुत्रादीनाम् इति वक्तव्यम् .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {74।96} तत् तर्हि वक्तव्यम् सविशेषणानाम् वृत्तिः न वृत्तस्य वा विशेषणम् न प्रयुज्यते अगुरुकुलपुत्रादीनाम् इति .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {75।96} न वक्तव्यम् .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {76।96} वृत्तिः तर्हि कस्मात् न भवति .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {77।96} अगमकत्वात् .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {78।96} इह समानार्थेन वाक्येन भवितव्यम् समासेन च .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {79।96} यः च इह अर्थः वाक्येन गम्यते महत् कष्टम् श्रितः इति न जातु चित् समासेन असौ गम्यते महत् कष्टश्रितः इति .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {80।96} एतस्मात् हेतोः ब्रूमः अगमकत्वात् इति .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {81।96} न ब्रूमः अपशब्दः स्यात् इति .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {82।96} यत्र गमकः भवति भवति तत्र वृत्तिः .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {83।96} तत् यथा : देवदत्तस्य गुरुकुलम् , देवदत्तस्य गुरुपुत्रः , देवदत्तस्य दासभार्या इति .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {84।96} यदि अगमकत्वम् हेतुः न अर्थः समर्थग्रहणेन .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {85।96} इह अपि भार्या राज्ञः पुरुषः देवदत्तस्य इति यः अर्थः वाक्येन गम्यते न असौ जातु चित् समासेन असौ गम्यते भार्य राजपुरुषः देवदत्तस्य इति .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {86।96} तस्मात् न अर्थः समर्थग्रहणेन .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {87।96} इदम् तर्हि प्रयोजनम् .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {88।96} अस्ति असमर्थसमासः नञ्समासः गमकः .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {89।96} तस्य साधुत्वम् मा भूत् .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {90।96} अकिञ्चित् कुर्वाणम् अमाषम् हरमाणम् अगाधात् उत्सृष्टम् इति .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {91।96} एतत् अपि न अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {92।96} अवश्यम् कस्य चित् नञ्समासस्य गमकस्य साधुत्वम् वक्तव्यम् .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {93।96} असूर्यम्पश्यानि मुखानि अपुनर्गेयाः श्लोकाः अश्राद्धभोजी अलवणभोजी ब्राह्मणः .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {94।96} सुट् अनपुंसकस्य एतत् नियमार्थम् भविष्यति .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {95।96} एतस्य एव असमर्थसमासस्य नञ्समासस्य गमकस्य साधुत्वम् भवति न अन्यस्य इति .
(प्_2,1.1.2) क_इ,359.21-361.24 रो_इइ,496-504 {96।96} तस्मान् न अर्थः समर्थग्रहणेन .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {1।109} अथ क्रियमाणे अपि समर्थग्रहणे समर्थम् इति उच्यते किम् समर्थम् नाम .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {2।109} पृथगर्थानाम् एकार्थीभावः समर्थवचनम् .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {3।109} पृथगर्थानाम् पदानम् एकार्थीभावः समर्थम् इति उच्यते .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {4।109} वाक्ये पृथगर्थानि राज्ञः पुरुषः इति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {5।109} समासे पुनः एकार्थानि राजपुरुषः इति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {6।109} किम् उच्यते पृथगर्थानि इति यावता राज्ञः पुरुषः आनीयताम् इति उक्ते राजपुरुषः इति च सः एव .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {7।109} न अपि ब्रूमः अन्यस्य आनयनम् भवति इति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {8।109} कः तर्हि एकार्थीभावकृतः विशेषः .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {9।109} सुबलोपः व्यवधानम् यथेष्टम् अन्यतरेण अभिसम्बन्धः स्वरः .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {10।109} सुपः अलोपः भवति वाक्ये .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {11।109} राज्ञः पुरुषः इति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {12।109} समासे पुनः न भवति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {13।109} राजपुरुषः इति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {14।109} व्यवधानम् च भवति वाक्ये .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {15।109} राज्ञः ऋद्धस्य पुरुषः इति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {16।109} समासे न भवति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {17।109} राजपुरुषः इति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {18।109} यथेष्टम् अन्यतरेण अभिसम्बन्धः भवति वाक्ये .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {19।109} रज्ञः पुरुषः पुरुषः राज्ञः इति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {20।109} समासे न भवति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {21।109} राजपुरुषः इति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {22।109} द्वौ स्वरौ भवतः वाक्ये .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {23।109} रज्ञः पुरुषः .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {24।109} समासे पुनः एकः एव .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {25।109} राजपुरुषः इति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {26।109} न एते एकार्थीभावकृताः विशेषाः .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {27।109} किम् तर्हि .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {28।109} वाचनिकानि एतानि .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {29।109} आह हि भगवान् सुपः धातुप्रातिपदिकयोः उपसर्जनम् पूर्वम् समासस्य अन्तः उदात्तः भवति इति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {30।109} इमे तर्हि एकार्थीभाव्कृताः विशेषाः .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {31।109} सङ्ख्याविशेषः व्यक्ताभिदानम् ल्कुपसर्जनविशेषणम् चयोगः इति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {32।109} सङ्ख्याविशेषः भवति वाक्ये .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {33।109} राज्ञः पुरुषः राज्ञोः पुरुषः राज्ञाम् पुरुषः इति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {34।109} समासे न भवति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {35।109} राजपुरुषः इति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {36।109} अस्ति कारणम् येन एतत् एवम् भवति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {37।109} किम् कारणम् .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {38।109} यः असौ विशेषवाची शब्दः तदसान्निध्यात् .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {39।109} अङ्ग हि भवान् तम् उच्चारयतु गंस्यते सः विशेषः .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {40।109} ननु च न एतेन एवम् भवितव्यम् .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {41।109} न हि शब्दकृतेन नाम अर्थेन भवितव्यम् .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {42।109} अर्थकृतेन नाम शब्देन भवितव्यम् .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {43।109} तत् एतत् एवम् दृश्यताम् .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {44।109} अर्थरूपम् एव एतत् एवञ्जातीयकम् येन अत्र विशेषः न गम्यते इति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {45।109} अवश्यम् च एतत् एवम् विज्ञेयम् .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {46।109} यः हि मन्यते यः असौ विशेषवाची शब्दः तदसान्निध्यात् अत्र विशेषः न गम्यते इति इह तस्य विशेषः गम्येत : अप्सुचरः गोषुचरः वर्षासुजः इति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {47।109} व्यक्ताभिधानम् भवति वाक्ये .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {48।109} ब्राह्मणस्य कम्बलः तिष्ठति इति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {49।109} समासे पुनः अव्यक्तम् .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {50।109} ब्राह्मणकम्बलः तिष्ठति इति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {51।109} सन्देहः भवति सम्बुद्धिः स्यात् षष्ठीसमासः वा इति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {52।109} एषः अपि अविशेषः .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {53।109} भवति हि किम् चित् वाक्ये अव्यक्तम् तत् च समासे व्यक्तम् .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {54।109} वाक्ये तावत् अव्यक्तम् .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {55।109} अर्धम् पशोः देवदत्तस्य इति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {56।109} सन्देहः भवति पशुगुणस्य वा देवदत्तस्य यत् अर्धम् अर्थ वा यः असौ सञ्ज्ञीभूतः पशुः नाम तस्य यत् अर्धम् इति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {57।109} तत् च समासे व्यक्तम् भवति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {58।109} अर्ध्हपशुः देवदत्तस्य इति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {59।109} उपसर्जनविशेषणम् भवति वाक्ये .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {60।109} ऋद्धस्य राज्ञः पुरुषः इति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {61।109} समासे न भवति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {62।109} राजपुरुषः इति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {63।109} एषः अपि अदोषः .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {64।109} समासे अपि उपसर्जनविशेषणम् भवति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {65।109} तत् यथा देवदत्तस्य गुरुकुलम् देवदत्तस्य गुरुपुत्रः देवदत्तस्य दासभार्या इति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {66।109} चयोगः भवति वाक्ये .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {67।109} स्वचयोगः स्वामिचयोगः च .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {68।109} स्वचयोगः राज्ञः गौः च अश्वः च पुरुषः च इति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {69।109} समासे न भवति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {70।109} राज्ञः गवाश्वपुरुषाः इति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {71।109} स्वामिचयोगः देवदत्तस्य च यज्ञदत्तस्य च विष्णुमित्रस्य च गौः इति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {72।109} समासे न भवति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {73।109} देवदत्तयज्ञदत्तविष्णुमित्राणाम् गौः इति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {74।109} अथ एतस्मिन् एकार्थीभाव्कृते विशेषे किम् स्वाभाविकम् शब्दैः अर्थाभिधानम् आहोस्वित् वाचनिकम् .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {75।109} स्वाभाविकम् इति आह .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {76।109} कुतः एतत् .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {77।109} अर्थानादेशात् .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {78।109} न हि अर्थाः आदिश्यन्ते .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {79।109} कथम् पुनः अर्थान् आदिशन् एवम् ब्रूयात् न अर्थाः आदिश्यन्ते इत् .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {80।109} यत् आह भवान् अनेकम् अन्यपदार्थे चार्थे द्वन्द्वः अपत्ये रक्ते निर्वृत्ते इति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {81।109} न एतानि अर्थादेशनानि .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {82।109} स्वभावतः एतेषाम् शब्दानाम् एतेषु अर्थेषु अभिनिविष्टानाम् निमित्तत्वेन अन्वाख्यानम् क्रियते .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {83।109} तत् यथा .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {84।109} कूपे हस्तदक्षिणः पन्थाः .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {85।109} अभ्रे चन्द्रमसम् पश्य इति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {86।109} स्वभावतः तत्रस्थस्य पथः चन्द्रमसः च निमित्तत्वेन अन्वाख्यानम् क्रियते .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {87।109} एवम् इह अपि चार्थे यः सः द्वन्द्वसमासः अन्यपदार्थः यः सः बहुव्रीहिः इति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {88।109} किम् पुन कारणम् न आदिश्यन्ते .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {89।109} तत् च लघ्वर्थम् .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {90।109} लघ्वर्थम् हि अर्थाः न आदिश्यन्ते .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {91।109} अवश्यम् हि अनेन अर्थान् आदिशता केन चित् शब्देन निर्देशः कर्तव्यः स्यात् .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {92।109} तस्य च तावत् केन कृतः येन असौ क्रियते .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {93।109} अथ तस्य केन चित् कृतः तस्य केन कृतः इति अनवस्था .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {94।109} असम्भवः खलु अपि आदेशः तस्य .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {95।109} कः हि नाम समर्थः धातुप्रातिपदिकप्रत्ययनिपातानाम् अर्थान् आदेष्टुम् .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {96।109} न च एतत् मन्तव्यम् प्रत्ययार्थे निर्दिष्टे प्रकृत्यर्थः अनिर्दिष्टः इति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {97।109} भवति हि गुणाभिधाने गुणिनः सम्प्रत्ययः .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {98।109} तत् यथा शुक्लः कृष्णः इति .
(प्_2,1.1.3) क_इ,361.25-363.28 रो_इइ,505-516 {99।109} विषमः उपन्यासः .
मूल पाठ: Vyākaraṇamahābhāṣya · Edition: Franz Kielhorn (Bombay 1880-1885), revised by K.V. Abhyankar (Poona 1972-1996). · Data entry George Cardona · GRETIL (Göttingen) · CC BY-NC-SA 4.0