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ग्रंथ पाठ

ऋग्वेद · अध्याय 1.019

1.019.01

प्रति त्यं चारुम् अध्वरं गोपीथाय प्र हूयसे ।
मरुद्भिर् अग्न आ गहि ॥

1.019.02

नहि देवो न मर्त्यो महस् तव क्रतुम् परः ।
मरुद्भिर् अग्न आ गहि ॥

1.019.03

ये महो रजसो विदुर् विश्वे देवासो अद्रुहः ।
मरुद्भिर् अग्न आ गहि ॥

1.019.04

य उग्रा अर्कम् आनृचुर् अनाधृष्टास ओजसा ।
मरुद्भिर् अग्न आ गहि ॥

1.019.05

ये शुभ्रा घोरवर्पसः सुक्षत्रासो रिशादसः ।
मरुद्भिर् अग्न आ गहि ॥

1.019.06

ये नाकस्याधि रोचने दिवि देवास आसते ।
मरुद्भिर् अग्न आ गहि ॥

1.019.07

य ईङ्खयन्ति पर्वतान् तिरः समुद्रम् अर्णवम् ।
मरुद्भिर् अग्न आ गहि ॥

1.019.08

आ ये तन्वन्ति रश्मिभिस् तिरः समुद्रम् ओजसा ।
मरुद्भिर् अग्न आ गहि ॥

1.019.09

अभि त्वा पूर्वपीतये सृजामि सोम्यम् मधु ।
मरुद्भिर् अग्न आ गहि ॥

मूल पाठ: Ṛgveda-Saṃhitā · Edition: Theodor Aufrecht Die Hymnen des Rigveda. Mandala I-VI Bonn Mareus Theodor Aufrecht Die Hymnen des Rigveda. Mandala VII-X Bonn Mareus · Data entry Barend A. Van Nooten Gary B. Holland · GRETIL (Göttingen) · CC BY-NC-SA 4.0

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