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रामचरितमानस · अध्याय 6

6.1

लव निमेष परमानु जुग, बरष कलप सर चंड ।
भजसि न मन तेहि राम कहँ, काल जासु कोदंड
सिन्धु बचन सुनि राम,सचिव बोलि प्रभु अस कहेउ ।
अब बिलम्ब केहि काम, करहु सेतु उत्तरै कटक ॥
सुनहु भानु-कुल-केतु, जामवन्त करजोरि कह ।
नाथ नाम तव सेतु, नर चढि भवसागर तरहिँ ।
यह लघु जलधि तरत कति बारा अस सुनि पुनि कह पवनकुमारा ॥
प्रभु प्रताप बडवानल भारी । सोखेउ प्रथम पयोनिधि बारी॥१॥

6.2

तव रिपु-नारि रुदन जल-धारा । मरेउ बहोरि श्रयौ तेहि खारा ॥
सुनि अति-उक्ति पवन-सुत केरी । हरषे. कपि रघुपति तन हेरी ॥२॥

6.3

जामवंत बोले दोउ भाई। नल-नीलहि सब कथा सुनाई।
राम-प्रताप सुमिरि मन माहीं । करहु सेतु प्रयास कछु नाहीं ॥३॥

6.4

बोलि लिये कपि निकर बहोरी । सकल सुनहु विनती कछु मोरी।
राम-चरन-पङ्कज उर धरहू । कौतुक एक भालु कपि करहू ॥४॥

6.5

धाबहु मरकट-बिकट बरूथा । आनहु बिटप गिरिन्ह के जूथा ॥
सुनि कपि भालु चले करि हूहा । जय रघुबीर प्रताप-समूहा ॥५॥

6.6

अति उतड्ग गिरि पादप, लीलहि लेहिँ उठाइ ।
आनि देहि नल नीलहि, रचहिँ ते सेतु बनाइ ॥१॥

6.7

सैल निसाल आनि कपि देहीं। कन्दुक इव नल नील ते लेहीं।
देखि सेतु अति सुन्दर रचना । बिहंसि कृपानिधि बोले बचना ॥१॥

6.8

परम-रस्य उत्तम। यह धरनी। महिमा अमित जाइ नहिँ बरनी
करिहौं इहाँ संभु थापना । मारे हृदय परम-कलपना ॥२॥

6.9

सुनि कपीस बहु दूत पठाये। मुनिबर सकल बोलि लेइ आये ॥
लिङ्ग थापि विधिवत करि पूजा।शिव समान मोहि न दूजा ॥३॥

6.10

शिव-द्रोही मम भगत कहावा । सो नर सपनेहुँ मोहिं न भावा ॥
सङ्कर-विमुख भगति चह मोरी। सो . नारकी मूढ मति थोरी ॥४॥

6.11

सङ्कर प्रिय मम द्रोही, सिव द्रोही मम दास ।
ते नर करहिं कलप भरि, घोर नरक महँ बास ॥२॥

6.12

जो रामेस्वर दरसन करिहहिं । ते तनु तजि मम लोक सिधरिहहिं। ।
जो गंगा-जल आनि चढाइहीं । से साजुज्य मुक्ति नर पाइहिं॥१॥

6.13

होइ अकाम जो छल तजि सेइहि । भगति मारि तेहि संकर देइहि ॥
ममकृत सेतु जो दरसन करिही। सेआ बिनु सम भव-सागर तरिही ॥२॥

6.14

राम बचन सब्द के जिय भाये । मुनिबर निज निज आर म आये।
गिरिजा रघुपति कै यह रीती । सन्तत करहिं प्रनत पर प्रीती॥३॥

6.15

बाँधेउ सेतु नील-नल-नागर । राम कृपा- जस भयौ उजागर ॥
बूडहिँ आनहिँ बोरहिँ जेई । भये उपल बोहित सम तेई ॥४॥

6.16

महिमा यह न जलधि के बरनी । पाहन गुन न कपिन्ह कै करनी ॥५॥

6.17

श्रीरघुबीर प्रताप ते , सिन्धु तरे पापोन ।
ते मतिमंद जे राम लजि, अजहिँ जाइ प्रभु आन ॥३॥

6.18

बाँधि सेतु अति सुदृढ बनावा । देखि कृपानिधि के मन भावा ॥
चली सेन कछु बरनि न जाई । गरजहि मरकट भट समुदाई ॥१॥

6.19

सेतुबन्ध ढिग चढि रघुराई। चितव कृपाल सिन्धु बहुताई।
देखन कहँ प्रभु करुनाकन्दा । प्रगट भये सब जलचर-बृन्दा ॥२॥

6.20

मकर नक्र अख नाना व्याला । सत-जोजन-तन परम घिसाला ॥
ऐसेउ एक तिन्हहि जे खाहीं । एकन्ह के डर तेपि डेराहीं ॥३॥

6.21

प्रभुहि बिलोकहि दरहिँ न टारे । मन हरषित सब भये सुखारे ।
तिन्हकी ओट न देखियबारी । मगन भये हरि रूप निहारी ॥४॥

6.22

चला कटक कछु बरनि न जाई । को कहि सक कपि-दल-बिपुलाई ॥५॥

6.23

सेतुबन्ध भै भीर अति, कपि नम-पंथ उडाहि।
अपरऽ जलचरन्हि ऊपर, चढि चढि पारहि जाहि ॥१॥

6.24

ऽऽचौ०--अस कौतुक बिलोकि दोउ भाई। बिहँसि चले कृपाल रघुराई ।
सेन सहित उत्तरे रघुबीश । कहि न जाइ कपि-जूथप-मीरा ॥१॥

6.25

सिन्धु पार प्रभु डेरा कीन्हा । सकल कपिन्ह कहँ आयुस दीन्हा ।
खाहु जाइ फल मूल सुहाये । सुनत भालु कपि जहँ तह धाये ॥२॥

6.26

सब तरु फरे राम-हित-लागी । रितु अरु कुरितु काल गति त्यागी॥
खाहिँ मधुर-पाल विदप हलावहिँ । लङ्का सनमुख सिखर चलावहिं ॥३॥

6.27

जह कहुँ फिरत निसाचर पावहिं । धेरि सकल बहु नाच नचावहिं ।
दसनन्हि काटि नासिका कानो । कहि प्रभुसुजस देहि तब जाना ॥४॥

6.28

जिन्ह कर नासा कान निपाता। तिन्ह रावनहि कही सब बाता ॥
सुनत स्रवन बारिधि-बन्धाना । दसमुख बोलि उठा अकुलाना ॥५॥

6.29

बाँधेउ बननिधि नीरनिधि, जलधि सिन्धु बारीस ।
सत्य तोयनिधि कस्पति, उदधि पयोधि नदीस ॥५॥

6.30

व्याकुलता निज समुझिवहोरी। बिहँसि चला गृह करि मय भोरी।
मन्दोदरी सुनेउ प्रभु ओयो । कौतुक ही पाथोधि बँधायो ॥१॥

6.31

कर गहि पतिहि भवन निज आनी। बाली परम-मनोहर बानी ॥
चरण नाइ सिर अञ्चल रोपा । सुनहु बचन पिय परिहरि कोपा ॥२॥

6.32

नाथ भैर कीजे ताही साँ। बुधि बल सकिय जीति जाही साँ॥
तुम्हहि रघुपतिहि अन्तर कैसा । खलु खद्योत दिनकरहि जैसा ॥३॥

6.33

अति बल मधु-कैटम जिन्ह मारे । महाबोर दिति-सुत सहारे ।
जेहि बलि बाँधि सहसभुज मारा । सोइ अवतरेउ हरन महि-भारा ॥४॥

6.34

तासु बिरोध न कीजिय नाथा । काल करम जिव. जाके हाथा ॥५॥

6.35

रामहि साँपिय जानकी, नाइ कमल-पद माथ ।
सुत कहँ राज समर्षि बन, जाइ लजिय रघुनाथ ॥६॥

6.36

नाथ दीन दयाल रघुराई । बाघौ सनमुख गये न खाई ॥
चाहिय करन सा सब करि बीते। तुम्ह सुर असुर चराचर जीते ॥१॥

6.37

सन्त कहहि असि नीति दसानन । चौथे पन जाइहि नृप कानन ॥
तासु भजन कीजिय तहँ भरता। जो करता पालन संहरता ॥२॥

6.38

इ रघुबीर प्रनत-अनुरागी । मजहु नाथ ममता सब त्यागी ॥ऽ
मुनिबर जतन कहिँ जेहि लागी । भूप राज तजि होहि बिरागी ॥३॥

6.39

इ कोसलाधीस रघुराया । आयौ करन तोहि पर दाया ।
जाँ पिय मानहु मार सिखावन । हाइ सुजस तिहुँ पुर अति पावन ॥४॥

6.40

नाथ भजहु · रघुनाथहि, अचल होइ अहिवात ॥७॥

6.41

तब रावन मय-सुता उठाई। कहै लाग खल निज प्रभुताई ॥
सुनु तैं प्रिया बृथा भय माना । जग जोधा को मोहि समाना ॥१॥

6.42

बरुन कुबेरु पवन जम काला । भुजं बल जितेउँ सकल दिगपाला ॥
देव दनुज नर सब बस मेरे । कवन हेतु उपजा भय तोरे ॥२॥

6.43

नाना विधि तेहि कहेसि बुझाई। सभा बहोरि बैठ सो जाई ॥
मन्दोदरी हृदय अस जाना। काल-बिबस उपजा अभिमाना ॥३॥

6.44

समा आइ मन्त्रिन्ह तेहि बूझा । करब कवनि बिधि रिपु से जूझा ॥
कहहि लचिव सुनु निलिचर-नाहा । बार बार प्रभु पूछहु काहा ॥४॥

6.45

कहहु कवन भय करिय बिचारा । नर कपि भालु अहार हमारा।
बचन सबहि के सवन सुनि, कह प्रहस्त कर जारि ।
नीति-बिरोध ऽन करिय प्रभु, मन्त्रिन्ह मति अति-थोरि ॥८॥

6.46

कहहिँ सचिव सठ ठकुरसोहाती । नाथ न पूर आव एहि भाँती ॥
बारिधि नाँघि एक कपि आवा। तासु चरित मन महँ सब गावा ॥१॥

6.47

उधा न रही तुम्हहिँ तब काहू । जारत नगर कस न धरि खाहू ॥
सुनत नीक आगे दुख पावा। सचिवन्ह अख मत प्रभुहि सुनावा॥२॥

6.48

जेहि बोरीस बँधायौ हेला । उतरेउ सेन-समेत सुबेला ॥
भनु मनुज खाब हम भाई । बचन कहहिँ सत्र गाल फुलाई ॥३॥

6.49

तात बचन मम सुनु अति आदर । जनि मन गुनहु मोहि करि कादर।
प्रिय बानी जे सुनहि जे कहहीं। ऐसे नर निकाय जग अहही ॥४॥

6.50

बचन परम-हित सुनत कठोरे । सुनहि जे कहहिँ ते नर प्रभु थोरे।
प्रथम बसीठ पठव सुनु नीती । सीता दे करहु पुनि प्रीती ॥५॥

6.51

नारि पाई फिरि जाहि जाँ, तो न बाढैय रारि ।
नाहि त सनमुख समर-महि, तात करिय हठि मारि ॥
यह मत जों मानहु प्रभु सारा । उभय प्रकार सुजस जग तारो ॥
सुत सन कह दसकंठ रिलाई । असि अति सठ केहि ताहि सिखाई ॥१॥

6.52

अबहीं लें उर संसय होई । बेनु-मूल सुत भयेहु घाई ॥
सुनि पितु गिरा परुष अतिधारा । चला भवन कहि बचन कठोरा ॥२॥

6.53

हित मत ताहि न लागत कैसे। काल-बिबस कह भेषज जैसे ॥
सन्ध्या समय जानि दलसीसा । भवन चलेउ निरखत भुज-बीसा ॥३॥

6.54

लङ्का सिखर उपर आगारा । अति-विचित्र तहँ होइ अखारा ॥
बैठ जाइ तेहि मन्दिर रावन । लागे किलर गुण-गाण-गावन ॥४॥

6.55

बाजहिँ ताल पखाउज बीना । नृत्य करईइ अपछरा प्रबीना ॥१॥

6.56

सुनासीर सत सरिस सो, सन्तत करै बिलास ।
परम-प्रबल रिपु सीस पर, तदपि न कछु मन त्रास ॥१०॥

6.57

इहाँ सुबेल-सैल रघुबीरा । उतरे सेन-सहित अति-श्रीरा॥
सैल-सङ्ग एक सुन्दर देखी । अति उत्तङ्ग सम्म सुस विसेखी॥१॥
तहँ तरु-किसलय-सुमन सुहाये । लछिमन रचि निज हाथ डसाये ॥
तापर रुचिर मृदुल सृगछाला । तेहि आसन आलीन कृपाला ॥२॥

6.58

प्रभु कृत सीस कपीस उछङ्गा । बाल दहिन दिसि चाप निषङ्गा ॥
दुहुँ कर-कमल सुधारत बाना । कह लकेसं मन्त्र लगि काना ॥३॥

6.59

बडभागी अङ्गद हनुमाना । चरन-कमल चाँपत विधि नाना ॥
प्रभु पाछे लछिमन बीरासन । कति-निषा कर-बान-सरासन ॥४॥

6.60

एहि बिधि करुना-सील गुन, धाम राम आसीन ।
ते नर धन्य जे ध्यान एहि, रहत सदा लयलीन ॥
पूरब-दिसा बिलोकि प्रभु, देखा उदित्त भयङ्क ॥
कहत सबहि देखहु ससिहि, मृगपति सरिस असङ्क ॥११॥

6.61

पूरब दिसि गिरि-गुहा निवासी । परम प्रताप तेज बल रासी।
अत्त-नाग-तम-कुरुम बिदारी । ससि केसरी गगन-चन-चारी ॥१॥

6.62

बिथुरे नभ मुकुताहल तारा । निसि-सुन्दरी केर सिङ्गोरा ॥
कह प्रभु ससि मह मेचकताई। कहहु काह निज निज मति भाई ॥२॥

6.63

कह सुग्रीव सुनहु रघुराई । ससि महँ प्रगट भूमि के झाँई ।
मारेउ राहु ससिहि कह कोई । उर महँ परी स्यामता साई ॥३॥

6.64

कोउ कह जब विधि रति-मुख कीन्हा। सार भाग सखि कर हरि लीन्हो ।
इद्र से प्रकट इन्दु उर माहौँ । तेहि भग देखिय नभ परिछाहीं ॥४॥

6.65

प्रभु कह गरल बन्धु ससि केरा। अतिप्रिय लिज उर दीन्ह बसेरा।
विष सज्जुत कर निकर पसारी। जारत बिरहवन्त नर नारी ॥५॥

6.66

कह मारुत-सुत सुनहु प्रभु, ससि तुम्हार प्रिय दास ।
तव मूरति बिधु उर बसति, सोइ स्यामता आस ॥
पवन-तनय के बचन सुनि, बिहंसे राम सुजान ।
दच्छिन दिसि अवलोकि प्रभु, बोले कृपानिधान ॥१२॥

6.67

देखु बिभीषन दच्छिन आला । धन घमंड दामिनी बिलासा ॥
मधुर मधुर गरजै धन घोरा । अष्टि होइ जनि उपल कठोरा॥१॥

6.68

कहै बिभीषन सुनहु कृपाला । तडित न होइ न बारिद-माला ॥
लंका सिखर उपर आगारी । तह दलकन्धर देख ‘अखारा ॥२॥

6.69

न्न। मेघडंबर सिर–भारी । लाइ जनु जलद घटा अति कारी ॥
मन्दोदरी सबन ताटङ्का । सोइ प्रभु जनु . दामिनी दमङ्का ॥३॥

6.70

माजहिं ताल मृदङ्ग अनूपा । सोइ रव मधुर सुनहु सुर-भूपा ॥
प्रभु मुसुकान समुझि अभिमाना। चाप चढाइ बान सन्धाना ॥४॥

6.71

छन्न मुकुट ताटङ्क तन, हते एकही बान ।
सब के देखत सहि परे, सरम न कोऊ जान ।
अस कौतुक करि राम-सर, प्रबिसेउ आइ निषङ्ग।
रावन सभा ससङ्क सब, देखि महा-रस-मङ्ग॥१३॥

6.72

कम्प न भूमि न मरुत विसेखा । अब सब कछु नयन न देखा ।
चहिँ सब निज हृदय मझारी। असगुन भयौ भयङ्कर भारी ॥१॥

6.73

दसमुख देखि सभा भय पाई । बिहॅसि बचन कह जुगुति बनाई ।
सिरौ गिरे सन्तत सुभ जाही । मुकुट खसे कस असगुन ताही ॥२॥

6.74

सयन करहु निज निज गृह जाई । गवने भवन चरन सिर नाई ॥
मन्दोदरी सोच उर बसे । जब ते खजनपूर महि खसेऊ ॥३॥

6.75

सजले-नयन कह जुग कर जोरी । सुनहु प्रानपति बिनती मोरी ।
कन्त राम-बिरोध परिहरहू । जानि मनुज जनि मन हठ धरहू ॥४॥

6.76

बिस्व-रूप रघु-बंस-मनि, करहु बच्चन विस्वासु ।
लोक कल्पना बेद कर, अङ्ग अङ्ग प्रति जासु ॥१४॥

6.77

पद-पाताल सीस-अज-धामा। अपर लोक अंग अंग बितामा ॥
भृकुटि-बिलास भयङ्कर-काला । नयन-दिवाकर कच-धन-माला ॥१॥

6.78

जासु प्रान अस्विनी कुमारा । निसि अरु दिवस निमेष अपारा ॥
सवन दिखा दस बेद बखानी । मारुत स्वास निगम निजबानी ॥२॥

6.79

अधर-लोभ जम-दसन-कराला । माया हास बाहु-दिगपाला।
आनन-अनल अम्बुपति-जोहा । उत्तपति पालन प्रलय समीहा ॥३॥

6.80

रोम-राजि अष्टादस-बारा । अलिप-लैल सरिता नस-जारा ॥
उदर-उदधि अध-गो जातना । जग-मय प्रभु का बहु कलपना ॥४॥

6.81

अहङ्कार-सिव बुद्धि-अज, मन-ससि चित्त-महान ।
अनुज बास सचराचर-रूप राम भगवान ॥
अस बिचारि सुनु मानपति, अनुसन बयर बिहाइ ।
प्रीति करहु रघुबीर-पद, सम अहिवात न जाइ ॥१५॥

6.82

बिहँसा नारि बचन सुनि काना। अहो मोह-महिमा बलवाना ॥
नारि सुभाव सत्य कवि कहहीं। अवगुन आठ सदा उर रहहीं ॥९॥

6.83

साहस अनृत चपलता माया । भय अबिबेक असौच अदाया॥
रिपु कर रूप सकल तैं गावा । अति विसाल जय मोहि सुनावा ॥२॥

6.84

सब प्रिया सहज बस मारे । समुझि परा प्रसाद अब तोरे ।
जाने प्रिया तोरि चतुराई । एहि मिस कहेहु मोरि मनाई ॥३॥

6.85

तव बतकही गूढ सृग-लोचनि । समुझत-सुखद सुनत-अय मोचनि।
मन्दोदरि मन महँ अस ठयजा पियहि काल-बस मति-मम भयऊ ॥४॥

6.86

एहि बिधि करत बिनोद बहु, प्रात पगट दसकन्ध ।
सहज असङ्कलरूपति, सभा गयौ मद-अन्ध ।
फूलै फरान बेत, जदपि सुधा बरषाहं, जलद ।
मूरुख हृदय न चेत, जो गुरु मिलहिं बिरचि-सिब ॥१६॥

6.87

इहाँ प्रात जागे रघुराई। पूछा मत सब सचिव बोलाई ।
कहहु बेगि का करिय उपाई। जामवन्त कह पद सिर नाई ॥१॥

6.88

सुनु सर्वज्ञ - सकल-उर-बासी । बुधि बल तेज धरम गुन रासी ॥
मन्त्र कहौँ निज-मित अनुसारा दूत पठाइय बालिकुमारा ॥२॥

6.89

नीक मंत्र सब के मन माना । अङ्गद सन कह कृपानिधाना ।
बालि-तनय बुधि बलगुन-धामा । लङ्का जाहु तात मम कामा ॥३॥

6.90

बहुत बुझाइ तुम्हहिँ का कहऊँ । परम-चतुर मैं जानत अहऊँ ।
काज हमार तासु हित होई । रिपु सन करेहु बतकही सेआई ४॥
ध-प्रभु अज्ञा धरि लोस, चरन बन्दि अङ्गद उठेउ ।
इ गुन-सागर-ईस, राम कृपा जा पर करहु ।
स्वयं-सिद्ध सब काज नाथ मोहि आदर दियेउ।
अस बिचारि जुबराज, तनु पुलकित हरषित हिये ॥१०॥

6.91

बन्दि चरन उर धरि प्रभुताई । अङ्गद चलेउ सबहि सिर नाई ॥
प्रभु प्रताप उर सहज असङ्का । रन-बांकुरा बालि-सुत बङ्का ॥१॥

6.92

पैठत रावन कर बेटा । खेलत रहा सो होइ गै मेंटा॥
बातहि बात करप बढि आई। जुगल-अतुल-बलपुनि तरुनाई ॥२॥

6.93

तेहि अङ्गद कहैं लात उठाई । गहि पद पटकेउ भूमि भवाई ॥
निसिचर-निकर देखि अट भारी। जहँ तहँ चले न सकहिँ पुकारी ॥३॥

6.94

एक एक सन मरम ने कहीं। समुझि तासु वध चुप करि रहहीं ॥
भयौ कोलाहल नगर मंझारी । आवा कपि लङ्का जेहि जारी ॥४॥

6.95

अब धौँ काह करिहि करतारा । अति-सभीत सब करहि बिचारा ॥
बिनु पूढे मग देहि देखाई । जेहि बिलोक सेआइ जाइ सुखाई ॥५॥

6.96

गयौ सभा दरबार तब, सुमिरि राम-पद-कञ्ज।
सिंह-ठवनि इत उत चितव, धीर-बीर-बल-पुञ्ज ॥१८॥

6.97

तुरत निसाचर एक पठावा । समाचार रावनहि जनावा ॥
सुनत बिहसि बोला दससीसा । आनहु बोलि कहाँ कर कीसा॥१॥

6.98

आयसु पाइ दूत बहु धाये। कपि-कुञ्जरहि बोलि लेइ आये ॥
अङ्गद दीख दसानन बैसा । सहित प्रान कज्जल गिरि जैसा ॥२॥

6.99

भुजा बिटप लिर सृङ्ग समाना । रामावली लता जनु नोना ॥
मुख नासिका नयन अरु काना । गिरि कन्द्रा खोह अनुमाना ॥३॥

6.100

गयौ सभा मल नेकु न मुरा । बालि-तनय अति-अल-बाँकुरा ॥
उठे सभासद कपि कह देखी । रावन उर मा क्रोध बिसेखी ॥४॥

6.101

जथा मत्त-गज-जूथ मह, पञ्चानन चलि जाइ।
रामप्रताप सुमिरि मन, बैठ सभा सिर नाइ ॥१९॥

6.102

कह दसकंठ कवन बन्दर । मैं रघुनीष दूत इसकन्धर ॥
मम जनकहि तोहि रही मिताई । तव हित कारन आयौँ माई॥१॥

6.103

उत्तम-कुल पुलस्ति कर नाती । सिव बिरंजि पूजेहु बहु भाँती ॥
बर पायहु कीन्हेहु सब काजा । जीतेहु लोकपाल सत्र राजा । २॥
नृप अभिमान मोह बस किया । हरि आनेहु सीता जगदम्बा ॥
अब सुम कहा सुनहु तुम्ह मोरा । सब अपराध छमिहि प्रभु तोरा ॥३॥

6.104

दसन गहहु तन कंठ कुठारी। परिजन सहित सङ्ग निज नारी!
सादर जनक-सुता करि आगे। एहि विधि चलहु सकल भय त्यागे ॥४॥

6.105

प्रनतपाल रघुबंस-मनि, त्राहि त्राहि अब मोहि ।
आरत गिरा सुनत प्रभु, अमय करहिंगे तोहि ॥२०॥

6.106

रे कपि पत्ति न बोलु सँभारी । गूढ न जानहि माहि सुरारी॥
कहु निज नाम जनक कर भाई। केहि नाते मानिये मिताई ॥१॥

6.107

अङ्गद नाम बालि कर बेटा । ता. साँ काहुँ भई हो भेंटा।
अङ्गद बचन सुनत सकुचोना। रही बालि बानर मैं जाना ॥२॥

6.108

अङ्गद तहीँ बालि कर बालक । उपजेहु बंस अनल कुल-चालक ॥
ऽऽऽगर्भ न गयौ व्यर्थ तुम्ह जायहु । निज-मुख तापस दूत कहायहु ॥३॥

6.109

अब कहु कुसल बालि कहँ अहई । बिहँसि बचन तब अङ्गद कहई ।
दिन दस गये बालि पहँ जाई । बूझेहु कुसल सखा : उर लाई ॥४॥

6.110

राम-बिरोध कुसल जसि होई। सो सब ताहि सुनाइहि साई ।
सुनु सठ भेद होइ मन ताके । श्रीरघुवीर हृदय नहिं जाके ॥५॥

6.111

हम कुल-पालक सत्य तुम्ह, कुल-पालक दससीस
अन्धौ बधिर न अस कहहि, नयन कान तब बीस ॥२१॥

6.112

सिव-बिरञ्चि-सुर-मुनि-समुदाई । चाहत जासु चरन-सेवकाई ।
तासु दूत होइ हम कुल बारा । ऐसिहु मति उर बिहर न तोरा ॥१॥

6.113

सुनि कठोर बानी कणि केरी । कहत दसानन नयन तरेरो ।
खल तव कठिन बचन सग सहऊँ । नीति धरम मैं जानत अहऊँ ॥२॥

6.114

कह कपि धरमलीलता तोरी । हमहुँ सुनी कृत पर-तिय-चारी।
देखी नयन दूत रखवारी। बूडि न भरहु धरम-व्रत-धारी ॥३॥

6.115

कान नाक बिलु भगिनि निहारी। छमा कोन्हि तुम्ह धरम बिचारी ॥
धरमसीलता तब जग जागी । पावा दरस हमहुँ बड भागी ॥४॥

6.116

जनि जल्पसि जड जन्तु कपि, लठ बिलोकु मम बाहु ।
लोकपाल बल बिपुल ससि, असन हेतु सब राहु ॥
पुनि नम-सर मम-कर-निकर, कमलन्हि पर करि बास ।
भित भयौ मराल इव, सम्भु सहित कैलास ॥२२॥

6.117

तुम्हरे कटक माँक सुनु अङ्गद।मो सन तिरिहि कवन जोधा बद।
तव प्रभु नारि-बिरह बल-हीना । अनुज तासु दुख दुखी मलीना ॥१॥

6.118

तुम्ह सुग्रीव कूल-द्रुम दोऊ । अनुज हमार भीरु अति सोऊ ।
जामवन्त मन्त्री अति बूढा। खो कि होइ अब समर-अरूढा ॥२॥

6.119

सिल्प-कर्म जानहिँ नल-नीला । है कपि एक महा-बल-सीला॥
आवा प्रथम नगर जेहि जारा । सुनि हँसि बोलेउ बालिकुमारा ॥३॥

6.120

सत्य बचन कहु निसिचर-नाहा । साँचेहु कीस कीन्ह पुर-दाहा ॥
रावन नगर अलप कपि दहई । सुनि अस बचन सत्य को कहई ॥४॥

6.121

जो अति-सुभट सराहेहु रोवन । सो सुग्रीव केर लघु-धावन ।
चलै बहुत सा बीर न होई। पठवा खबर लेन हम साई. ॥५॥

6.122

सत्य नगर कपि जारेज, बिनु प्रभु आयसु पाइ।
फिरि न गयौ सुग्रीव पहि, तेहि भय रहा लुकाइ ।
सत्य कहहि दसकंठ सन्न, माहि न सुनि कछु कोह ।
कोउ न हमारे कटक अस, तो सन लरत जो सोह ।
प्रीति बिरोध समान सन, करिय नीति असि आहि ।
जौँ मृगपत्ति बध मेडुझन्हि, अल कि कहै कोउ ताहि ॥
जदपि लघुता राम कहूँ, ताहि बधे बड दोष ।
तदपि कठिन दसकंठ सुनु, छत्रिजाति कर रोप ॥
बक्र-उत्ति धनु बचन-सर, हृदय दहेउ रिपु कोस ।
प्रतिउत्तर सडसिन्ह मनहुँ, काढत भट दससीस ॥
हँसि बोलेउ दसमौलि तब, कपि कर बड गुन एक।
जो प्रतिपालै तासु हित, करै उपाय अनेक ॥२३॥

6.123

धन्य कीस जो निज-प्रभु-काजा। जहँ तह नाचै परिहरि लाजा॥
नाचि कूदि करि लोग रिझाई। पति-हित करै धरम निपुनाई ॥१॥

6.124

अङ्गद स्वामिभक्त तव जाती। प्रभु गुन कम न कहसि एहि आँतो।
मैं गुन-गाहक परम-सुजाना । तब कटुरदनि करौँ नहिँ काना ॥२॥

6.125

कह कपि तब गुन-गाहकताई । सल्य पवन-सुत माहि सुनाई ॥
बन-बिधन्सि सुत-बधि पुर-जारा । तदपि न तेहि कछु कृत अपकारा ॥३॥

6.126

इ बिचारि तव प्रकृति सुहाई । दसकन्धर मैं कोन्हि ढिठाई ।
देखेउँ आइ जो कछु कपि भाषा । तुम्हरे लाज न रोष न माषा ॥४॥

6.127

जौं असि मति पितु खायेहु कीसा । कहि अस बचन हँसा दस सीसा॥
पितहि खाइ खाते पुनि ताही । अबहीं समुझि परा कछु माही ॥५॥

6.128

बालि-बिमल-जस-भाजन जानो । हतौँ न तोहि अधम अभिमानी ॥
कहु रावन रावन जग केते। मैं निज सबन सुने सुनु जेते ॥६॥

6.129

बलिहि जितल एक गयौ पताला । राखा बाँधि सिसुन्ह हयसाला।
खेलहि बालक मारहिं जाई । दया लागि बलि दीन्ह छोडाई ॥७॥

6.130

एक बहोरि सहसभुज देखा। धाइ धरा जिमि जन्तु बिसेखा।
कौतुक लागि भवन लेइ आवा । सो पुलस्ति मुनि जाइ छोडावा
एक कहत माहि सकुच्च अति, रहा बालि की काँख ।
इन्ह मह रावन ते कवन, सत्य बदहि तजि माँख ॥२४॥

6.131

सुनु साठ सेआइ रावन छल-सोला । हर-गिरि जानु जासु भुज-लीला
जान उमापति जासु सुराई । पूजेउँ जेहि सिर-सुमन चढाई ॥१॥

6.132

सिरसरोज निज करन्हि उतारी । पूजेउँ अमित बार त्रिपुरारी ॥
भुज विक्रम जानहिँ दिगपाला । सठ अजहूँ जिनके उर साला ॥२॥

6.133

जानहिं दिग्गज उर कठिनाई । जब जन मिरेउँ जाइ बरिआई ॥
जिन्ह के दसन करालन फूटे । उर लागत मूलक इव टूटे ॥३॥

6.134

जासु चलत डोलत इमि धरली । चढत अत्त-गज जिमि लघु तरनी ॥
इ रावन जग बिदित प्रतापी । सुनेहि न सबन अलोक प्रलापी ॥४॥

6.135

तेहि रावन कह लघु कहलि, नर कर करसि बखान ।
रे कपि बर्बर खर्ब खल, अब जाना तब ज्ञान ॥२॥

6.136

सुनि अङ्गद लकोप कह बानी । बोलु सँभारि अधम अभिमानी॥
सहसबाहु-सुज-गहन अपारा । दहन अनल-सम जासु कुठारा ॥१॥

6.137

जासु परसु सागर-स्वर-धारा । बूडे कृप अगनित बहु धारा ॥
तासु गर्ष जेहि देखत भागा । सा नर क्यों इससीस अभागा ॥२॥

6.138

राम मनुज कंस रे सठ बङ्गा । धन्वी-काम नदी पुनि गङ्गा ।
पसु-सुरधेनु कल्पतरु-रूखा। अन्नदान अरु अन्नदान अरु रस-पीयूखा ॥३॥

6.139

बैनतेय-खग अहि-सहसानन । चिन्तामनि पुनि उपल दसानन ।
सुनु मतिमन्द लोक-बैकुंठा । लाभ कि रघुपति-भगति-अकुंठा ॥
सेन सहित तब लान मथि, बन-उजारि पुर जारि ।
कस रे सठ हनुमान कपि, गयौ जो तब सुत मारि ॥२६॥

6.140

सुनु रावन परिहरि चतुराई । मजसि न कृपासिन्धु रघुई ॥
जौं खल भयेसि राम कर तोही । ब्रह्म रुद्र सक राखि न तोही ॥१॥

6.141

मूढ वृथा जनि मारसि गाला । राम-शयर अस होइहि हाला॥
तव सिर-निकर कपिन्ह के आगे । परिहहिँ धरनि राम-सर-लागे ॥२॥

6.142

ते तब सिर कन्दुक इक नाना । खेलिहहिँ भालु कोस चौगाना ।
जबहिँ समर कोपिहि रघुनायक । छुटिहहिँ अति कराल बहु सायक ॥३॥

6.143

तब कि चलिहि अस गाल तुम्हारा अस विचार भजु राम उदारा
सुनत बचन रावन परजरा । जरत महानल जनु धुन परा॥४॥

6.144

कुम्भकरन अस बन्धु मम, सुत प्रसिद्ध सकारि ।
भार पराक्रम नहिँ सुनेहि, जितेउँ चराचर झारि ॥२०॥

6.145

सठ साखामृग जोरि हाई । बाँधा सिन्धु इहै प्रभुताई ॥
नाँघहिँ खग अनेक बारीला । सूर न होहि ते खुनु सब कीसा ॥१॥

6.146

मम-भज-सागर बल-जल-पूरा । जहँ बूढें बहु सुर-नर-सूरा ॥
बीस पयोधि अगाध अपारा को अल बीर जो पाइहि पाश ॥२॥

6.147

दिगपालन्ह मैं नीर भरावा । भूप सुयस खस मोहि सुनावा ॥
जौँ पै समर सुभट तव नाथा। पुनि पुनि कहसि जासु-गुन-गाथा ॥३॥

6.148

तौ बसीठ पठवत केहि काजा । रिपु सेन प्रीति करत नहिं लाजा ॥
हरगिरि-मथन निरखु-मम पाहू । पुनि सठ कपि निज प्रभुहि सराह॥४॥

6.149

सूर कवन रावन सरिस, स्व कर काटि जेहि सीस।
हुने अनल अति-हरण बहु,-बार साखि गौरीस ॥२८॥

6.150

जरत बिलोकेजबहिँ कपाला। विधि के लिखे अङ्क निज भाला ॥
नर के कर आपन बध बाँची ।हँसेउँ जानि विधि गिरा असाँचा॥१॥

6.151

उ मन समुझि त्रास नहिँ मारे । लिखा बिरजि जरठ-मति-भारे ।
आन बीर बल सठ मम आगे। पुनि पुनि कहसि लाजपति-त्यागे ॥२॥

6.152

कह अङ्गद सलज्ज जग माहीं । रावन ताहि समान कोउ नाही ।
लाजवन्त तक सहज सुमाऊ । निज-मुखनिजगुन कहसिनकाऊ॥३॥

6.153

सिर अरू सैल कथा चित रही। ता तें बार बीस तै कही ॥
सूजबल राखेहु उर घाली । जीतेहु सहसबाहु-बलि-बाली ॥४॥

6.391

पाहि पाहि रघुबीर गोसाँई । यह खल खाइ काल की नाई ॥
तेहि देखे कपि सकल पराने । दसहुँ चाप सायक सन्धाने ॥४॥<।पोएम् >
हे स्वामी रघुनाथजी ! रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिये, यह दुष्ट काल की तरह खा रहा
रावण ने देखा कि सब वानर भाग गये, तप दसों धनुषों पर वाण का सन्धान किया 10
हरिगितिका छांड
<पोएम्>सन्धानि धनु सर निकर छाडेसि, उरग जिमि उडि लागहीं।
रहे पूरि सर धरनी-गगन-दिसि,-विदिसि कहँ कपि भागहीं॥
भयो अति-कोलाहल निकल कपि, दल भालु बालहिँ आतुरे ।
रघुबीर करुनासिन्धु आरत, बन्धु जन-रच्छक हरे ॥८॥

6.392

ओ -निज-दल बिकल देखि कटि, कसि निषङ्ग धनु हाथ ।
लछिमन चले क्रुद्ध होइ, लाइ राम-पद-भाथ ॥२॥

6.393

२ खल का पारसि कपि आलू । मोहि बिलाकु तोर मैं
खोजत रहेउँ तोहि सुत-घाती । आजु निपाति जुडावौँ छाती ॥१॥

6.394

अस कहि छाडेखि बान प्रचंडा । लछिमन किये सकल सत खंडा
कोटिन्ह आयुध रावन डारे। तिल प्रवान करि काटि निवारे ॥२॥

6.395

पुनि निज बानन्ह कीन्ह प्रहारा । स्यन्दन भजि सारथी मारा ॥
सत सत सर मारे दस भाला । गिरि-सृङ्गन्ह जनु प्रबिसहि ब्याला ॥३॥

6.396

सत सर पुनि मारा उर माहीं । परेउ अवनितल सुधि कछु नाहीं ॥
उठा प्रबल पुनि मुरछा जागी। छाडिसि ब्रह्म दोन्हि जो साँगीं ॥४॥

6.397

से ब्रह्म-दत्त प्रचंड सक्ति अनन्त उर लागी सही।
परयो बीर विकल उठाव दसमुख, अतुल बल महिमा रही।
ब्रह्मांड-भुवन निराज जाके एक सिर जिमि रज-कनी।
तेहि वह उठावन मूढ राजन, जान नहिँ त्रिभुवन-धनी ॥६॥

6.398

दे०-देखि पवन-सुत धायेउ, बोलत बचन कठोर ।
आवत कपिहि हनेड तेहि, मुष्टि-अहार प्रचार ॥८॥

6.399

जानु टेकि कषि भूमि न गिरा। उठा सँभारि बहुत रिस भरा
मुठिका एक ताहि कपि भारा । परेउसैल जनु बज्न प्रहारा ॥९॥

6.400

मुरछा गई बहोरि से जागा । कपि बल बिपुल सराहन लागा।
धिग धिग सम्म पौरुषधिग सोही । जाँ से जियत उठेसि सुर द्रोही ॥२॥

6.401

असकहि लछिमन कहँ कपि ल्यायो । देखि दसानन विसमय पायो ।
कह रघुबीर समुझु जिय माता । तुम्ह कृतान्त भच्छक सुरत्राता ॥३॥

6.402

सुनत बचन उठि बैठ कृपाला। गई गगन सा सक्ति ‘कराला ॥
पुनि कादंड थान गहि धाये। रिपु सनमुख अति आतुर आये॥४॥ ॥
आतुर बहारि बिभाजि स्यन्दन, सूत हति व्याकुल किया।
गिरयो धनि दसकल्धार बिकलतर, बान सत बेध्यो : हियो ।
सारथी दूसर धालि रथ तेहि, तुरत लङ्का ऽ, लेइ गयो ।
रघुबीर बन्धु प्रतापपुज बहारि, प्रभु चरनन्हि नयो ॥१०॥

6.403

उहाँ दसोगन जामि करि, करई लाग कछु जज्ञ।
राम विरोध विजय बहत, सठ हठ-बरू अति-अज्ञ ॥६॥

6.404

इहाँ बिभीषन सब सुधि पाई। सपदि जाइ रघुपतिहि सुनाई।
नाथ करै रावन एक जागा । सिद्ध भये नहिँ मरिहि अगा॥९॥

6.405

पठवहु देव बेगि मट बन्दर । करहिँ मिधंस आव दसकन्धर ।
प्रात होत प्रक्षु सुभट पठाये। हनुमदादि अङ्गद सब धाये ॥२॥

6.406

कौतुक कूदि चढे कपि लूला पैठे रावन भवन अलका॥
जन्य करत जवहीं से देखा ।सकल कपिन्ह मा क्रोध बिलेखा ॥३॥

6.407

रन से निलज भाजि गृह आधा । इहाँ आइ बक-ध्यान लगावा ॥
अस कहि अङ्गद मारेउ लाता । चितवन सठ स्वारथ मन राता ॥४॥

6.408

नहिं चितब जब करि कोप कपि गहि, दसन्ह लातन्ह मारहीं ॥
घरि केस नारि निकारि बाहेर, तेति दीन पुकारहीं।
चली समीधर अनी अपारा । बहु गज-रध-पदाति-असवारा।
प्रभु सनमुख धाये खल कैसे। सलम-समूह अनल कह जैसे ॥२॥

6.409

देव बचन सुनि प्रभु मुस्काना । उठि रघुवीर सुधार बाना ॥
जटा-जूट हुद बाँधे थे। सहहि सुमन बी बिच गाथे॥१॥
अरुन-नयन वारिद-तनु-स्यामा । अखिल-लेक लोचन-अभिरामा ।
कटि तट परिवार कसे निषला । कर कोदंड कठिन सारडा ॥५॥

6.410

सारङ्ग कर सुन्दर निषङ्ग सिलीमुखाकर कटि कस्यो।
भुजदंड पीन मनोहरायत,-उर-घरासुर-पद-लस्यो ॥
कह दासतुलसी जयहि प्रभु सर, चाप कर फेरन लगे।
ब्रह्मांड दिग्गज कमठ अहि महि, सिन्धु झूधर डगमगे ॥१२॥

6.411

हरणे देव बिलोकि छबि, बरहिँ सुमन अपार ।
जय जय प्रभु गुन-ज्ञान-बल, धाम हरन महि भार ॥६॥

6.412

एही बीच निसाचर अनी । कसमसात आई अति घनो ।
देखि चले सनमुख कपि-महा। प्रलयकाल के जनु घन-घट्टा ॥१॥

6.413

बहु कृपान तरवारि चमङ्कहिँ । जनु दसदिति दामिनी दमहि ।
गज-रथ-तुरंग चिकार कठोस । गर्जा मनहुँ बलाहक घोरा॥२॥

6.414

कपि लङ्गुर बिपुल नम छाये। मनहुँ इन्द्रधनु उये सुहाये ॥
उठै धूहि मानहुँ जल धारा । बान बुन्द भै वृष्टि अपारा ॥
दुहुँ दिसि पर्वत करहिँ प्रहारा । बज्रपात जनु बाहिँ बारा ॥
रघुपति कोपि बान झरि लाई । घायल मे निसिचर समुदाई ॥४॥

6.415

लागत बान चोर चिक्करहौं । धुर्मि घुर्मि जहँ तह महि परहीं।
सावहिँ सैल जनु निर्भर बारी । सोनित-सरि कादर भयकारी ॥५॥

6.416

कादर भयङ्कर रुधिर सरिता, चली परम-अपावनो।
उ कूल-दल रथ-रेस चक्र, अवर्त्त बहति भयावनी ।
जलजन्तु गज-पदचर-तुरग-खर, बिबिध बाहन को गनै ।
सर-सक्ति-तोमर-सर्प चाप-तरङ्ग चर्म-कमठ घने ॥ १३ ॥

6.417

बीर परहिँ जनु तीर तरु, मज्जा बहु बह फेन ।
कादर देखि डराहिँ तेहि, सुभटन्ह के मन चेन ॥८॥

6.424

बालहिं जो जय जय मुंड एंड प्रचंड सिर बिनु धावहीं ।
खप्परिन्ह खरग अलुजिक जुज्झहि, सुभट भटन्ह ढहावहीं ।
निसिचर बरूथ बिर्दि गर्जहि, मालु कपि दर्पित भये ।
सङ्ग्राम-अङ्गन सुभट सावहि, राम-सर निकरन्हि हये।१४॥
रावन हृदय विचारा, मा निसिचर संहार ।
मैं अकेल कपि भालु बहु, माया करौँ अपार ८८॥
देवन्ह प्रभुहि पयादे.देखा । उपजा उर अति छाम बिसेखा ।
सुरपति मिजब्रय तुरत पठावा । हरष सहित मातलि लेइ आवा ॥१॥

6.425

तेजपुज्ज रथ दिव्य ऽ अनूपा । हरषि चढे कोसलपुरभूपा ॥
चल तुरग मनोहर चारी । अजर अमर मन सम गतिकारो ॥२॥

6.426

रथारूढ रघुनाथहि देखी। धाये कपि बल पाइ बिसेखी ।
सही न जाइ कपिन्ह के मारी। तर शवन माया विस्तारी ॥३॥

6.427

माया रघुनीरहि बाँची। लछिमन कपिन्ह सोमानी साँची।
देखी कपिन्ह निसाचर अनी । अनुज सहिन बहु कोसलधनी ॥2॥

6.428

बहु राम लछिमन देखि मर्कट, भालु मन अति अपहरे ।
जनु चित्र लिखित समेत लछिमन, जहँ हो तहँ वितहि खरे ।
निज सेन चकित बिलोकि हँसि सर, शाप सजि कोललधनी।
मायां हरी हरि निमिष सह हरषी सकल मरकट-अनी ॥१॥

6.429

ओ-बहुरि राम सब तन चितई, बोले बचन गॅमोर ।
द्वन्द-जुद्ध देखहु सकल, अमित भये अति और बीर॥८॥
चोओ- अस कहि स्थरघुनाथ चलावा । विप्र-घरन-पङ्कज सिर नाना ।
तब लङ्कस क्रोध उर छावा । गर्जत तर्जत सनमुख धावा ॥१॥

6.430

जीतेहु जे ऽभट सजग माहीं । सुनु तापस में तिन्ह सम नाहीं ॥
रावन नाम जगत जस जाना। लोकप जाके
बन्दीखाना॥२॥

6.431

खर-दूषन-हबन्ध तुम्ह मारा । बधेहु व्याध इव बालि बिचारा ॥
निसिचर - निकर सुभट संहारेहु । कुम्भकरन घननादहि मारेहु ॥ ३ ॥

6.432

आजु वयर सब लेउ निग्राही । जैं। रन भूप भाजी न जाई।
आजु करौँ खलु कालं-हवाले । परेहु कठिन भाजि
नहिं जाही ।रावन के पलि ॥४॥
सुनि दुर्बचन काल-बस जाना । बिहँसि बचन कह कृपानिधाना ॥
सत्य सत्य सब तब प्रभुताई । जलपसि जनि देखाउ मनुवाई ॥५॥ऽ
जनि जल्पना करि सुजस नासहि, नीति सुनहि
करहि छमा ।
संसार महँ पूरुष त्रिबिधि पाटल रसाल पनसं समा ॥
एक सुमन प्रद एक-सुमन-फल एक, फलै केवल डागही ॥
एक कहहिं कहहिं करहिं अपर एक, करहिं कहत न बागही ॥ १६ ॥

6.434

पुनि पुनि प्रभु काटत भुज सीसा । अति कौतुही कोसलाघीसा ॥
रहे छाइ नमः सिर अरु बाहू । मानहुँ अमित केतु अरु राहू ॥७॥

6.435

जनु राहु केतु अनेक नम पथ, खत्रत सोनित धावहीँ।
रघुवीर तीर प्रचंड लागहिँ, भूमि गिरन न पावहीं ॥
एक एक सर सिर निकर छेदे नभ उडत इमि साहहीं ।
जनु कोपि दिनकर कर निकर जहाँ-तहाँ विधुन्तुद पोहहीं ॥१८॥

6.436

जिमि जिमि प्रभु हर तासु सिर, तिमि तिमि होहिं अपार ।
सेबत विषय बिबर्ध जिमि, नित नित नूतन मार ॥२॥<।पोएम् >
जैसे जैसे प्रभु रामचन्द्रजी उसके सिरों को काटते हैं, तैसे तैसे वे इस तरह अपार बढते जा रहे हैं, जैसे विषय के लेवन से दिन दिन नवीन कामदेव बढता है ॥ ६२ ॥

6.437

<पोएम् > चौ० - दसमुख देखि सिन्ह के बाढी। बिसरा मरन भई रिस गाढी ॥
मूढ महा-अभिमानी । घायड दसौ सरासन तानी ॥१॥

6.438

समर-भूमि दखकन्धर कोच्यो । बरषि बान रघुपति रथ तोच्या ॥
दंड एक रथ देखि न परेऊ । जनु निहार महँ दिनकर दुरे ॥२॥
हाहाकार सुरन्ह जब कीन्हा । तब प्रभु कोपि कारमुक लीन्हा ॥
सर निवारि रिपु के सिर काटे । ते दिसि बिदिसि गगनमहि पाटे ॥३॥<।पोएम् >
जब देवताओं ने हाहाकार क्रिया, तब प्रभु रामचन्द्रजी ने फोध कर धनुष हाथ में लिया । शत्रु के बाणों को निवारण कर उसके सिर काटे, वे दिशा-विदिशा, आकाश और पृथ्वी में भर गये ॥ ३ ॥

6.439

<पोएम्> काटे सिर नम-मारग धावहिं । जय जय धुनि करि भय उपजावहिं ॥
कह लछिमन हनुमान कपीसा । कहँ रघुबीर कोसलाधीसा ॥8॥

6.441

उमा बिभीषन रावन, सनमुख चितव कि कोउ ।
अब भिरत काल ज्यों, श्रीरघुबीर प्रभाउ ॥९४॥

6.442

चो०-देखा समित बिभीषन भारी घायड हनूमान गिरिधारी ॥
रथ तुरङ्ग सारथी निपाता । हृदय माँझ तेहि मारेसि लाता ॥१॥

6.443

ठाढ रहा अति-कम्पित गाता । गयौ बिभीषन जहाँ जन त्रांता ॥
पुनि रावन तेहि हतेउ पचारी । चलेउ गगन कंपि पूँछ पसारी ॥२॥

6.444

गहेसि पूँछ कपि सहित उडाना । पुनि फिरि मिरेड प्रचल हनुमाना ॥
लरत अकास जुगल सम जोधा । एकहि एक हनत कर क्रोधा ॥३॥

6.445

हहिं नम छल बल बहु कहीं । कज्जल गिरि सुमेरु जनु लरहीं ।
बुधिबल निसिचर परै न मारेउ। तब मारुत-सुत प्रभु सम्भारेउ ॥१॥

6.446

सम्भारि श्रीरघुबीर धीर प्रचारि कपि रावन हत्या ।
महि परत पुनि उठि लरत देवन्ह, जुगल कहँ जय जय सन्येओ ॥
हनुमन्त सङ्कद देखि मर्कट, मालु क्रोधातुर चढे ।
रन-मंत रावन सकल सुभट प्रचंड भुज-बल दलमले ॥२१॥
तब रघुवीर प्रचारे, धाये कीस प्रचंड ।
कपि दल परबल देखि तेहि, कीन्ह प्रगट पाखंड ॥६५॥

6.447

चो०- अन्तर्धान मयौछन एका । पुनि प्रगटे वल रूप अनेका ॥
रघुपति के भालु कपि जेते ।जहाँ तहाँ प्रगट दुसानन तेते ॥१॥

6.448

तेहि कारन खल देखे कपिन्ह अमित दससीसा । जहाँ तहाँ भजे भालु अरु कोसा ॥
भागे बानर घरहिं न धीरा । त्राहि त्राहि लक्षिमन रघुबीरा ॥२॥
दह-दिसि धावहिँ कोटिव्ह रावन । गर्जहिं घोर कठोर मयावन ॥
डरे सकल सुर चले पराई । जय के आस तजहु अब भाई ॥३॥
सब सुर जिते एक दसकन्धर । अब बहु गिरि कन्दर ॥
रहे बिरचि सम्भु मुनि ज्ञानी । जिन्ह जिन्ह प्रभु महिमा कछु जानी ॥४॥

6.449

जाना प्रताप ते रहे निर्भय, कपिन्ह रिपु माने फुरे ।
चले बिचलि मर्कटभालु सकल, कृपाल पाहि भयातुरे ॥
हनुमान अङ्गद नील नल अति, बल लरत रनयाँकुरे ।
मर्दहिं ऽदसानन कोटि कोटिन्ह, कपट-भू भट - अङ्कुरे ॥२२॥

6.450

सुर बार देखे विकल, हँसे कोसलाघीस ।
सजि सारङ्ग एक सर, हते सकल दससीस ॥९६॥

6.451

चो०- प्रभुछन महँ माया सब कोटी । जिमिवधि उये जाहिँ तम फाटी ॥
रावन एक देखि सुर हरषे फिरे सुमन बहु प्रभु पर बरणे ॥१॥

6.452

भुज उठाइ रघुपति कपि फेरे । फिरे एक एकन्ह तब ढेरे ॥
प्रभु बल पाइ आलु कपि धाये । तरल तमकि सजग-महि आये ॥२॥

6.453

अस्तुति करत देवतन्हि देखे । भयौँ एक में इन्ह के लेखे ॥
सहु सदा तुम्ह मोर सरायल । अस कहि कोपि गगन पथ चायल ॥३॥

6.454

हाहाकार करत सुर भागे । खलहु हु हमारे आगे ॥
देखि बिकल सुर अआयो । कूदि चरन गहि भूमि गिरायेओ ॥४॥
गहि भूमि पारयो लात मारयो, बालि-सुतं प्रभु पहिँ गयो ।
सम्मारि उठि दसकंठ घोर कठोर व गर्जत भयो ।
करि दाप चाप चढाई दस सन्धानि तर बहु बरई ।
किय सकल भट घायल भयाकुल, देखि निज बल हरषई ॥२३॥

6.455

तब रघुपति रावन के खीस भुजा सर चाप ।
काटे बहुत बढे पुनि, जिमि तीरथ कर पाप ॥७॥

6.456

सिर भुज बाढि देखि रिपु केरी । भालु कपिन्ह रिस भई घनेरी ॥
परत न मूढ कटेहु भुज सीसा । धाये कोपि भालु भेंट कीसा ॥१॥

6.457

बालि-तनय मारुति नल नीला । दुबिद कपीस
पनस बलसीला ॥
बिटप महीधर करहिं महारा। सोइ गिरि तरु गहि कपिन्ह से मारा ॥२॥

6.458

एक लखन्ह रिपु- बपुष-बिदारी । मागि चलहिँ एक लातन्ह मारी ॥
तब नल नील सिरन्ह चढि गयऊ । नखम्हि लिलार बिदारत भयऊ ॥३॥

6.459

रूधिर बिलांकि सकोप सुरारी । तिन्हहिं धरन कहाँ भुजा पसारी ॥
गहे न जाहिँ करन्हि पर फिरहीं। जन जुग मधुप कमल बन चरहीं ॥ ४ ॥

6.460

कोपि कृदि होउ घरेसि बहोरी। महि पटकत भजे भुजा मरोरी ॥
पुनि सकोप दस धनु कर लीन्हे । सरन्ह मारि घायल कपि कीन्हे ॥५॥
हनुमदादि सुरछित करि बन्दर । पाइ प्रदोष हरथ दसकन्धर
मुरछित देखि सकल कपि बीरा। जामवन्त घाय॥ नी ॥६॥

6.461

सङ्ग भालु भूधर तरु धारी । मारन लगे पचादि पचारी ॥
भयौ क्रुद्ध रावन बलवाना । गहि पर महि पटक भट नाना ॥७॥

6.462

उर लात घात प्रचंड लागत, बिकल रथ तैं सहि परा ।
गहि मा बीस कर मनहुँ कमलन्ह बसे निसि लघुकरा ॥
मुरछित बिलोकि बहोरि पद हति, भालुपति प्रभु पहिँ गयो ।
निसि जानि स्यन्दन घालि तेहि तब, सूत जतन करत भयो ॥२१॥

6.463

मुरछा बिगत भालु कपि, सब आये प्रभु पास ।
निलियर सकल रावनहि, घेरि रहे अति-त्रास ॥८॥

6.464

तेही निसि सीता पहिजाई । त्रिजटा कहि सब कथा सुनाई ॥
सिर शुज बाढि सुनत रिपु केरी । सीता उर ऐ त्रास घनेरी ॥१॥

6.465

मुख मलील उपजी सन चिन्ता । त्रिजटा सन बाली त सीता
होइहि काह कहसि किन माता । केहि बिधि मरिहि चिस्व-दुख-दाता॥२॥

6.466

रघुपति-सर सिर कटेहु न मरई । बिधि बिमरीन चरित सब करई ॥
मोर अभाग्य जिआवत ओही। जेहि है हरि-पद-कमल बिछोही ॥३॥

6.467

जेहि कृत कपट कनक-मृग-शूठा । अजहुँ से दैव भोहि पर रूठा ।
जेहि विधि मोहि दुख दुसह सहाये । लछिमन कहँ कटु-बचन कहाये ॥४॥

6.468

रघुपति बिरह सबिष सर भारी । तकि तकि मार बार बहु मारी ॥
ऐसेहुं दुख जोराखु मम माना । सोइ बिधि ताहि जिआव न आना ॥५॥

6.471

जब कीन्ह तेहि पाखंड । अये प्रगट जन्तु प्रचंड ।
बेताल भूत पिसाच । कार घरे धनु नाराच ॥१॥

6.472

जोगिनि गहे करनाल । एक हाथ मनुज-कपाल ।
करि सच सानित पान । नाचहिँ कहिँ बहु गान ॥२॥

6.473

धरु मारू बालहि घोर । रहि पूरि धुनि बहुँ और ।
मुख बाइ. घावहिँ खान । तब लगे कीस ऽपरान ॥३॥

6.474

जह जाहि मर्कट भागि। तह धरत देखहि आगि।
भये बिकल बानर मालु । पुनि लाग बरषद बालु ॥१॥

6.475

जहँ तहँ थकित करि कीस । गर्जेउ बहुरि दससीस ।
लछिमन कपीस समेत । भये सकल बीर अचेत ॥५॥

6.476

हा राम हा रघुनाथ । कहि सुभट मोजहिँ हाथ ।
एहि बिधि सकल बल तरि । तेहि कीन्ह कपट बहारि ॥६॥

6.477

प्रगटेसि बिपुल हनुमान । धाये गये पाषाण।
तिन्ह राम घेरे जाइ । चहुँ दिसि वरूथ बनाइ ॥७॥

6.478

मारहु घरहु जनि जाइ । कटकटहिँ पूँछ उठाइ ।
दह-दिसि लंगूर बिराज । तेहि मध्य कोसल राज ॥ ८ ॥

6.479

तेहि सध्य कोसलराज सुन्दर, स्याम तनु मोक्षा लही ।
जनु इन्द्रधनुष अनेक की बर, बारि तुङ्ग तमालही ॥
प्रभु देखि हरष बिषाद उर सुर, बढत जय जय जय करी ।
रघुबीर एकहि तीर कोपि निमेष महँ माया हरी ॥२७॥

6.480

माया बिगत कपि भालु हरषे, बिटप गिरि गहि सब फिरे ।
सर निकर छाडे राम रावन, बाहु-सिर पुनि महि गिरे ॥
श्रीराम रावन समर चरित अनेक कल्प जो गावहीँ ।
सत सेन सावद निगम कबि तेउ, तदपि पार न पावहीं ॥२८॥

6.481

ताके गुल गन कछु कहे, जड-मति तुलसीदास ।
निज-पीरुप अनुसार जिमि, माछी उडै अकास ॥
कांटे सिर भुज बार बहु, भरत न भट लस ।
प्रभु क्रीडत सुर सिह मुनि, व्याकुल देखि कलेस ॥ १०१ ॥

6.482

काटत बढहिँ सीख समुदाई । जिमि प्रति लाम लाभ अधिकाई ॥
मरै न रिषु ममयौ बिसेखा । राम बिभोषन तन तब देखा ॥१॥

6.483

उमा काल मरु जा की ईछा । सेआ प्रभु जन कर प्रीति परीक्षा ॥
सुनु सर्बज्ञ चराचर नायक । प्रणतपाल
सुरमुनीसुखदायि॥२॥
नाभिकुंड पियूज लस याके । नाथ जियत रावन बल ताके
सुनत विवीषन बचन कृपाला । हरषि गहे कर बान
कराला ॥३॥
असम होन लागे तब नाना । रोवहिं बहु सृगाल- खर-स्वाना ॥
बोलहिं खग जग आरति हेतू । प्रगट भये नभ जहँ तहँ केतू ॥४॥

6.484

दस - दिसि दाह होन अति लागा । भयौ परच बिनु रबि उपरागा ॥
सदोदरि उर कम्पति भारी । प्रतिमा सबहिं नयन- मग बारी ॥
प्रतिमा रुदहिं पविपात नम अति, प्रात वह डालति मही ।
बरषाहिँ बलाहक रुधिर कच रज, असुभ अति सक को कही ॥
उत्तपात अमित बिलाकि नम सुर, बिकल बोलहिं जय जये ।
सुर समय जानि कृपाल रघुपति, चाप सर जारत भये ॥२॥

6.485

खैचि सरासन वन लगि, छोडे सर एकतीस ।
रघुनाथ - सायक चले, मानहुँ काल फनीस ॥ १०२ ॥

6.486

लायक एक नाभि सर सोखा । अपर लगे सिर भुज करि रोखा ।
लै सिर बाहु चले नाराचा। सिर-भुज हीन रुंड महि नाचा ॥१॥

6.488

सिर जटा सुकुट प्रसून विच विश्व, अति मनोहर राजहौं ।
जतु नीलगिरि पर तडित पटल, समेत उडुगन भ्राजहीं ॥
भुजदंड सर कोदंड फेरत, रुधिर कन तन अति बने ।
जनु पायसुनी तमाल पर बैठी बिपुल सुख आपने ॥३१॥

6.489

कृपा दृष्टि करि बृष्टि प्रभु, अभय
आलु कीस सब हरणे, जय सुखधाम मुकुन्द ॥ १०३ ॥

6.490

पति सिर देखत मन्दोदरी । मुरछित बिकल धरनि खसि परी ॥
जुबतिवृन्द रोवत, उठिधाई । तेहि उठाइ रावन पहि आई॥१॥

6.491

पति गति देखि ते करहि पुकारा । छूटे कच नहि बघुन तारा ॥
उर ताडना करहि बिधि नाना । रोवत करहिं प्रताप बखाना ॥३॥

6.492

तब बल नाथ ढोल नित धरनी । तेज हीन पावक सखि तपती ॥
सेष कमठ सहि सकहिं न भाग । सो तनु भूमि परेउ भरि द्वारा ॥३॥

6.493

वरुन कुबेर सुरेस समीरा । रन वनमुख पर काहु न छोरा ॥
भुजबल जितेहु काल जम साई । आजु परेहु अनाथ की नोई ॥१॥
जगत विहित तुम्हारि प्रभुताई । सुत परिजन बल बरनि नजाई ॥
राम बिमुख असे हाल तुम्हारा । रहा न कोउ कुल रावनिहारा ॥५॥
तब बस विधि प्रपञ्च सब नाथा । समय दिखिए नित नावहिं माथा ॥
अब तव सिर सुज जम्बुक खाहीं । राम बिमुख यह अनुचित नाहीं ॥६॥
जानेउ सलुज करि दनुज-कानन, दहन पावक हरि स्वयं ।
जेहि नमत सिव ब्रह्मादि सुर पिय, मजेहु नहिँ करुनामयं ॥
आजन्म त परद्रोह-रस पापौघमय तब तनु अर्थ ।
तुम्हह दियो निज धाम राम नमामि ब्रह्म निरामयं ॥३२॥

6.494

अहह नाथ रघुनाथ सम, कृपासिन्धु नहिँ आन ।
जोगि बृन्द दुर्लभ गति, तोहि दीन्हि भगवान ॥ १०४ ॥

6.495

मन्दोदरी बच्चन सुनि काना । सुर मुनि सिद्ध सबन्हि सुख माना ॥
अज महेस नारद सनकादी । जे मुनिबर परमारथ- बांदी ॥१॥

6.496

भार लावत रघुपतिहि निहारा । प्रेम-मगन संघ भये सुखारी !
रुदन करत देखी सब नारी । गयेउ बिभीषन मन दुख भारी ॥२॥

6.497

बन्धु दसा बिलोकि दुख कीन्हा । तब प्रभु अनुजहि आयसु दीन्हा ॥
लछिमन तेहि बहु बिधि समुझायो । बहुरि बिभीषन प्रभु पहिं आये। ॥३॥

6.499

प्रभु के वचन सवन सुनि, नहिं अचाहिँ कपि- पुञ्ज !
बार बार सिर नावहीं, गहहिँ सकल पद- कञ्ज ॥१०६ ॥

6.500

पुनि प्रभु बोलिलियेहनुमाना । लङ्का जाहु कहेउ भगवाना ॥
समाचार जानकिहि सुनावहु । सासुकुसल लेइ तुम्ह चलि आवहु ॥१॥

6.501

तब हनुमन्त नगर महँ आये । सुनिं निखिचरी निसावर धाये ॥
बहु प्रकार तिन्ह पूजा कीन्ही । जनक-सुता दिखाइ पुनि दोन्ही ॥२॥

6.502

दूरिहि तैं प्रनाम कपि कीन्हा । रघुपति दूत जानकी चीन्हा ॥
कहहु तात प्रभु कृपा निकेता ।कुसल अनुज - कपि- सेन समेता ॥३॥

6.503

सब विधि कुसल कोसलाघीसा ।मातुः समर: जीतेउ दससीसा ॥
अविचल राज बिभीषन पायो । सुनि कपि बचन हरष उर छायो ॥४॥

6.504

अति हरण-मन तन पुलक लोचन, सजल कह पुनि पुनि रमा ।
का देउँ ताहि त्रैलोक महँ कपि किमपि नहि बानी समा ॥
सुनु मातु मैं पायौँ अखिल जग, राज आजु न संखयं ।
रन जीति रिपु दल-बन्धु- जुत-पस्यामि राममनामयं ॥३४॥

6.505

सुनु सुत सद्गुण सकल तव, हृदय बसहु हनुमन्त ।
सानुकूल कोसलपति, हहु समेत अनन्त ॥ १०७॥

6.506

अब सोइ जतन करहु तुम्ह ताता । देखौँ नयन स्याम मृदु गाता ॥
तब हनुमान राम पहिँ जाई । जनक-सुता के कुसल सुनाई ॥ ९ ॥

6.507

सुनि सन्देस अनुकुल भूषन । बोलि लिये जुबराज बिभीषन ॥
मारुतसुत के सङ्ग सिधावहु । सादर जनक- सुतहि लेइ आवहु ॥२॥

6.508

तुरतहि सकल गये जहँ सीता । सेवहिँ सब निशिचरों बिनीता ॥
बेगि विभिषण तिन्हहि सिखावा । सोदर तिन्ह सीतहिं अन्हवावा ॥३॥

6.509

बहु प्रकार सूचन पहिरायें । सिबिका रुचिर साजि पुनि लाय्यें
तापर हरषि चढी बैदेही । सुमिरि राम-सुख धाम सनेही ॥४॥

6.510

बेतानि - रच्छक चहुँ पाचा । चले सकल मन पश्म-हुलासा !
देखन भालु कीस सब आये । रच्छक कोपि निवारन घाये ॥५॥

6.511

कह रघुबीर कहा मम मानहु । सीतहि सखा पयादे आनहु ॥
देखहि कपि जननी की नाँई । बिहँसि कहा रघुनाथ गोसाँई ॥६॥

6.512

सुनि प्रभु बचन भालु कपि हर । नभ तें सुरन्ह सुमन बहु बरषे ॥
सीता प्रथम अनल मह राखी । प्रगट कीन्ह चह अन्तर-साखी ॥७॥

6.513

तेहि कारन करुना निधि, कहे कछुक दुर्बाद ।
सुनत जातुधानी सब लागी करन बिषाद ॥ १०८ ॥

6.514

प्रभु के बन्धन सीस धरि सीता । बोली मन क्रम बचन पुनीता ॥
लछिमन होहु धरम के नेगी : पावक प्रगट करहु तुम्ह बेगी ॥१॥

6.515

सुनि लछिमन सीता के बानी । बिरह- बिबेक धरम-नति सानी ॥
लोचन सजल जारि कर दोऊ । प्रभु सन कछु कहि सकत न ओऊ ॥२॥

6.516

देखि राम रुख लछिमन धाये।पावक प्रगटि काठ बहु लाये ॥
पावक प्रबल देखि बैदेही । हृदय हरष कछु भय नहि तेहा ॥३॥

6.517

जो मन बंध क्रम मम उर माहीं । तजि रघुबीर आन गति नाहीं ॥
तौ कृसानु श्रव कै गति जाना । मे कहँ होहु शिखंड समाना ॥१॥

6.518

खंड-सम पावक प्रबेस किया सुमिरि प्रभु मैथिली ।
सायकोसलेस महेस बन्दित, चरन रति अति-निर्मली ॥
प्रतिबिम्ब अरु लौकिक कलङ प्रचंड पावक महँ करे ।
प्रभु चरित काहुन लखे सुर नभ, सिद्ध मुनि देखहिं खरे ॥३५॥

6.519

धरि रूप पावक पानि गहि श्री सत्य स्रुति जग विदित जो ।
जिमि छीरसागर इन्दिरा रामहिँ समय आनि से ॥
राम बाम-बिभाग राजति, रुचिर अति सोमा भलो ।
नव-नील नीरज निकट मानहुँ, कनक- पङ्कज की कली ॥३६॥
बरषहिँ सुमन हरषि सुर, बाजहिं गगन निसान ।
गवाहि किन्नर सुर-वधू,नाचाहिँ चढी बिमान ॥
तब रघुपति अनुसासन पाई । मातलि चलेउ चरन सिर नाई ॥
आये देव सदा स्वारथी । वचन कहहिं जनु परमार्थी ॥१॥

6.520

दीनबन्धु दयाल रघुराया । देव कीन्ह देवन्ह पर दाया ॥ ऽ
बिस्व द्रोह:रत यह खल कामी । निज अघ गयौ कुमारग- गामी ॥२॥

6.521

तुम्ह सम रूप ब्रह्म अबिनासी । सदा एकरस सहज उदासी ॥
अकल अगुन अज अनघ अनामय । अजित अमोघ-सक्ति करुनामय ॥३॥

6.522

मीन कमठ सूकर नरहरी । बामन परसुराम बपु घरी ।
जब जब नाथ सुरन्ह दुख पायो । नाना तनु घरि तुम्हहिं नसायो ॥४॥
रावन पाप-मल सुर-द्रोही । काम-लोभ-मद-यस अति- कोही ।
साउ कृपाल तव धाम सिधावा । यह हमरे मन बिसमय आवा ॥५॥

6.523

हम देवतः परम अधिकारी । स्वास्थ-रत तत्र भगति बिसारी ॥
नव-प्रबाधु सन्तत हम परे । अब प्रभु पाहि सरन अनुसरे ॥६॥

6.524

कवि बिनती सुरसिह सब, रहे जहँ तहँ कर जोरि
अति सप्रेम तन पुल कि बिधि, अस्तुति करत बहोरि ॥११०॥

6.525

अब राम सदा सुखधाम हरे । रघुनायक सायक-चाप धरे ॥
सिंह भवं बोरन-दारन प्रभो । गुन सागर नागर नाथ बिभो ॥१॥

6.526

तनु काम अनेक अनूप छंबी । गुन गावत सिद्ध सुनीन्द्र कबी ॥
जस पावन नावन नागमहा । खगनाथ जथा करि कोप गहा ॥२॥
जन-रजन भंजन सोक-भयं । गत-क्रोध सदा प्रभु बोध-मयं ॥
अवतार उदार अपार गुनं । महि-भार- बिमजन ज्ञान-घनं ॥३॥

6.534

तुरत पवन- लुप्त भवनत भयऊ। तब प्रभु भरद्वाज पहिँ गयऊ ॥
नाना विधि सुनि पूजा कीन्ही । अस्तुति करिपुनि आसिष दीन्ही ॥२॥

6.535

मुनि-पद बन्दि जुगल कर जोरी । चढि बिमान प्रभु चले बहोरी ॥
इहाँ निषाद सुना प्रभु आये । नाव नाव कहि लोग बुलाये ॥३॥
सुरसरि नाँघि जान जब आयो । उतरेउ तट प्रभु आयसु पायो ।
तब सीता पूजी सुरसरी । बहु प्रकार पुनि चरनन्हि परी॥४॥
दीन्हि असीस हरषि मन गङ्गा । सुन्दरि तव अहिवात अभङ्गा ॥
सुनत गुहा धायौ प्रेमाकुल । आयल निकट परम सुख-सङ्कुल ॥३॥
प्रभुहि सहित बिलाकि बैदेही । परेड अवनि तन सुधि नहिँ तेही ॥
प्रीति परम बिलोकि रघुराई । हरषि उठाइ लियो उर लाई ॥६॥

6.536

लियो हृदय लाइ कृपानिधान सुजान राय रमापती ।
बैठारि परम- समीप बूझी, कुसल सो कर बीनती ॥
अब कुसल पद-पहूज बिलाकि विरचि-सङ्कर-सेव्य जे ।
सुख-धाम पूरन - काम राम नमानि राम नमामि ते ॥३॥

6.537

सब भाँति अधम निषाद से हरि, भरत ज्याँ उर लाइयो ।
मति मन्द तुलसीदास से प्रभु, मोह-बस बिसराइये ॥
यह रावनारि चरित्र पावन राम-पद-रति-प्रद सदा ।
कामादि- हर बिज्ञान-कर, सुर सिद्ध मुनि गावहिं मुदा ॥३९॥

6.538

समर बिजय रघुबीर के, चरित जे सुनहिं सुजान ।
बिजय-बिबेक विभूति नित, तिन्हहिं देहि भगवान ॥
यह कलिकाल मलायतन, मन कपि देखु बिचार ।
श्रीरघुनाथ-नाम तजि, नाहि न आन अधार ॥१२१॥

मूल पाठ: rāmacaritamānasa · Hindi Wikisource contributors · Sanskrit Wikisource · CC BY-SA 4.0

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