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रामचरितमानस · अध्याय 5

5.1

हनूमान तेहि परसा,कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
राम-काज कीन्हे बिनु, मोहि कहाँ विश्राम ॥१॥

5.2

जात पवन सुत देवन्ह देखा।जानै कहँ बल बुद्धि बिसेखा ॥
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठैन्हि आइ कही तेहिं बाता॥१॥

5.3

आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा।सुनत बचन कहें पवन-कुमारा ॥
राम-काज करि फिरि में आवौँ।सीता कै सुधि प्रभुहि सुनावौँ ॥२॥

5.4

तब तव बदन पैठिहौं आई। सत्य कहौँ मोहि जान दे माई॥
कवनेहुँ जतन देइ नहिं जाना । ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना ॥३॥

5.5

जोजन भरि तेहि बदन पसारा ।कपि त्तनु कीन्ह दुगुन विस्तारा॥
रह जोजन मुख तेहि ठयऊ । तुरत पवन-सुत बत्तिस भयऊ ॥४॥

5.6

जस जस सुरसा बदन बढावा । तासु दून कपि रूप देखावा ॥
सत जोजन तेहि आनन कीन्हा । अति लघु रूप पवन-सुत लीन्हा॥५॥

5.7

बदन पैठि पुनि बाहेर आवा । माँगा बिदा ताहि सिर नावा ॥
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा । बुधि-बल-मरम तार मैं पावा ॥६॥

5.8

रामकाज सब करिहहु, तुम्ह बल-बुद्धि-निधान।
आसिष देइ गई सो, हरषि चलेउ हनुमान ॥२॥

5.9

निसिचरि एक सिन्धु मह रहई। करि माया नम के खग गहई ।
जीव-जन्तु जे गगन उडाहीं । जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं॥१॥

5.10

गहै छाँह सक से न उडाई। एहि बिधि सदा गगन-चर खाई।
इ छल हनूमान कहँ कीन्हा । तासु कपट कपि तुरतहि चीन्हा ॥२॥

5.11

ताहि मारि मारुत-सुप्त बीरा । बरिधि पार गयौ मतिधीरा
तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुज्जत चंञ्चरीक मधु लोभा ॥३॥

5.12

नाना तरु फल फूल सुहाये । खग मृग बृन्द देखि मन भाये ॥
सैल बिसाल देखि एक आगे। ता पर धाइ चढेउ मय त्यागे ॥४॥

5.13

उमा न कछु कपि कै अधिकाई । प्रभु प्रताप जो कालहि खाई ॥
गिरि पर चढि लङ्का तेहि देखी । कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेखी ॥५॥

5.14

अति उतङ्ग जलनिधि चहुँ पासा । कनक-कोट कर परम प्रकासा ॥६॥

5.15

कनक-कोट बिचित्र मनि-कृत, सुन्दरायतना घना।
चौहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथी, चारु पुर बहु विधि बना ॥
गज बाजि खच्चर निकर पदचर, रथ बरूथन्हि को गनै।
बहु रूप निसिचर जूथ अतिबल, सेन बरनत नहिँ बनै ॥१॥

5.16

बन बाग उपबन बाटिका सर, कूप बापी सोहहीं।
नर-नाग-सुर-गन्धर्व कन्या, रूप मुनि मन मोहहीं ।
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।
नाना अखारेन्ह भिरहिँ बहु बिधि, एक एकन्ह तर्जहीं ॥२॥

5.17

करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन, नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।
कहुँ महिष मानुष धेनु खर अज, खल निसाचर अच्छहीं।
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की, कथा कछुयक है कही।
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि, त्यागि गति पैहैं सही ॥३॥

5.18

पुर रखवारे देखि बहु, कपि मन कीन्ह बिचार।
अति लघु रूप धरौँ निसि, नगर करौँ पैसार ॥३॥

5.19

मसक समान रूप कपि धरी । लङ्कहि चलेहु सुमिरि नरहरी।
नाम लङ्किनी एक निसिचरी । सो कह चलेसि मोहि निन्दरी॥१॥

5.20

जानेहि नहीं मरम सठ मोरा । मोर अहार , जहाँलगि चोरा॥
मुठिका एक महा-कपि हनी । रुधिर बमत धरनी ढनमनी ॥२॥

5.21

पुनि सम्भारि उठी सो लङ्का ।जोरि पानि कर बिनय ससङ्का ।
जब रावनहिं ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंच्चि कहा मोहि चीन्हा ॥३॥}
बिकल होसि तैं कपि के मारे । तब जानेसु निसिचर सङ्घारे ।
तात मोर अति पुन्य बहूता । देखेउ नयन राम कर दूता ॥४॥

5.22

तात स्वर्ग अपबर्ग सुख, धरिय तुला एक अङ्ग।
तूल न ताहि सकल मिलि, जो सुख लव सतसङ्ग ॥४॥

5.23

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदय राखि कोसलपुर-राजा॥
गरल सुधा रिपु करै मिताई। गो-पद सिन्धु अनल सितलाई ॥१॥

5.24

गरुअ सुमेरु रेनु सम ताही । राम कृपा करि चितवा जाही ॥
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना ॥२॥

5.25

मन्दिर मन्दिर प्रीति करि सोधा । देखे जहँ तहँ अगनित जोधा ॥
गयौ दसानन मन्दिर माहीं । अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं ॥३॥

5.26

सयन किये देखा कपि तेही । मन्दिर महँ न दीख वैदेही ।
भवन एक पुनि दीख सुहावा । हरिमन्दिर तहँ भिन्न बनावा ॥४॥

5.27

रामायुध अङ्कित गृह, सेभा बरनि न जाइ ॥
नव तुलसिका बृंद तहँ, देखि हरष कपिराइ ॥5॥

5.28

लङ्का निसिचर निकर निवासा । इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा ॥
मन महँ तरक करै कपि लागा। तेही समय बिभीषन जागा ॥१॥

5.29

राम राम तेहि सुमिरन कीन्हा । हृदय हरष कपि सञ्जन चीन्हा ।
एहि सन हठि करिहौँ पहिचानी । साधु तँ होइ न कारज हानी ॥२॥

5.30

बिप्र रूप धरि बचन सुनाये । सुनत विभीषन उठि तहँ आये ॥
करि प्रनाम पूछी कुसलाई । बिप्र कहहु निज कथा बुझाई ॥३॥

5.31

की तुम्ह हरिदासन्ह महँ कोई । मोरे हृदय प्रीति अति हाई ॥
की तुम्ह राम दीन-अनुरागी। आयहु मोहि करन बड-भागी ॥४॥

5.32

तब हनुमन्त कही सब,राम कथा निज नाम।
सुनत जुगल तन पुलक मन,मगन सुमिरि गुन ग्राम ॥६॥

5.33

सुनहु पवन-सुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महँ जीभ बिचारी।
तात कबहुँ मोहिजानि अनाथा। करिहहिँ कृपा भानुकुल-नाथा॥१॥

5.34

तामस तनु कछु साधन नाहौँ । प्रीति न पद-सरोज मन माहीं ॥
अब मोहि भा भरोस हनुमन्ता । बिनु हरि कृपा मिलहिँ नहिँ सन्ता ॥२॥

5.35

जौँ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा । तौ तुम्ह मोहि दरस हठि दीन्हा ॥
सुनहु बिभीषन प्रभु केऐ रीती । करहिं सदा सेवक पर प्रीती ॥३॥

5.36

कहहु कवन मैं परम कुलीना । कपि चञ्चल सबहीं बिधि हीना ॥
प्रात लेइ जो नाम हमारा । तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा ॥४॥

5.37

अस मैं अधम सखा सुनु,मोहू पर रघुवीर ।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन, भरे बिलोचन नीर ॥७॥

5.38

जानतहूँ अस स्वामि विसारी। फिरहिँ ते काहे न होहिँ दुखारी।
एहि बिधि कहत राम-गुन-ग्रामा॥ पावा अनिर्वाच्य बिस्रामा ॥9॥

5.39

पुनि सब कथा बिभीषन कही।जेहि बिधि जनक-सुता तहँ रही ।
तब हनुमन्त कहा सुनु भ्राता । देखा चहौँ जानकी माता ॥२॥

5.40

जुगुति बिभीषन सकल सुनाई ।चलेउ पवन-सुत बिदा कराई। ,
करि सोइ रूप गयौ पुनि तहँवा । बन असोक सीता रह जहँवा ॥३॥

5.41

देखि मनहिँ महँ कीन्ह प्रनामा । बैठेहि बीति जात निसि जामा ।
कृस तनु सीस जटा एक बेनी । जपति हृदय रघुपति गुन श्रेणी ॥४॥

5.42

निज पद नयन दिये मन, राम-चरन महँ लीन।
परम दुखी भा पवन-सुत; देखि जानकी दीन ॥8॥

5.43

तरु पल्लव महँ रहा लुकाई। करै विचार करौँ का भाई ॥
तेहि अवसर रावन तहँ आवा । सङ्गनारि बहु किये बनावा ॥१॥

5.44

बहु बिधि खल सीतहि समुझावा ।साम दाम भय भेद देखावा ।
कह रावन सुनु सुमुखि सयानी । मन्दोदरी आदि सब रानी ॥२॥

5.45

तव अनुचरी करौँ पन मोरा । एक बार बिलोकु मम ओरा ॥
तृन धरि ओट कहति बैदेही । सुमिरि अवधपति परम-सनेही ॥३॥

5.46

सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा । कबहुँ कि नलिनी करै बिकासा ।
अस मन समुझु कहति जानकी । खल सुधि नहिँ रघुबीर बान की ॥४॥

5.47

सठ सूने हरि आनेहि मोही ।अधम निलज्ज लाज नहिँ तोही ॥५॥

5.48

आपुहि सुनि खद्योत सम,रामहिँ भानु समान ।
परुष बचन सुनि काढि असि, बोला अति खिसियान ॥६॥

5.49

सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहौँ तवसिर कठिन कृपाना॥
नाहिँ त सपदि मानु मम बानी । सुमुखि होत न त जीवन हानी ॥१॥

5.50

स्याम-सरोज-दाम सम सुन्दर । प्रभु भुज करि कर सम दसकन्धर ॥
भुज कंठ कि तव अति घोरा। सुनु सठ अस प्रमान पन मोरा ॥२॥

5.51

त्रिजटा नाम राक्षसी एका। राम चरन-रति निपुन बिबेका॥
सबन्हौँ बोलि सुनायेसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना॥
चन्द्रहास हर मम परितापं। रघुपति-बिरह-अनल सज्जातं ।
सीतल निसित बहसि बर धारा । कह सीता हरु मम दुख भारा ॥३॥

5.52

सुनत बचन पुनि मारन धावा । मय-तनया कहि नीति बुझावा ॥
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई । सीतहि बहु बिधि त्रासह जाई ॥4॥

5.53

मास-दिवस महँ कहा न माना । तौ मैं मारब काढि कृपाना ॥
भवन गयौ दसकन्धर, इहाँ पिसाचिनि बृन्द ।
सीतहि त्रास देखावहिँ, धरहि रूप बहु मन्द ॥१०॥

5.54

त्रिजटा नाम राक्षसी एका । राम चरन रति निपुन बिबेका ॥
सबन्हाऐँ बालि सुनायेसि सपना । सीतहि सेइ करहु हित अपना ॥१॥

5.55

सपने बानर लङ्का जारी । जातुधान सेना सब मारी ॥
खर आरूढ नगन दससीसा । मुंडित सिर खंडित भुज बीसा ॥२॥

5.56

एहि बिधि सो दच्छिंन दिसि जाई। लङ्का मनहुँ बिभीषन पाई।
नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई ॥३॥

5.57

यह सपना मैं कहऊँ पुकारी । होइहि सत्य गये दिन चारी।
तासु बचन सुनि ते सब डरीँ । जनक-सुता के चरनन्हि परीं ॥
जहँ तहँ गई सकल मिलि, सीता कर मन सोच ।
मास दिवस बीते मोहि, मारिहि निसिचर पोच ॥११॥

5.58

त्रिजटा सन बाली करजोरी। मातु बिपति सङ्गिनि तैँ मोरी ॥
तजौँ देह करु बेगि उपाई । दुसह बिरह अब नहिँ सहि जाई ॥।
आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई।
सत्य करहि मम प्रीति सयानी । सुनै को स्रवन सूल सम बानी ॥२॥

5.59

सुनत बचन पद गहि समुझायेसि । प्रभु प्रताप-बल-सुजस सुनायेसि ।
निसि न अनल मिलु सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी॥३॥

5.60

कह सीता बिधि भा प्रतिकूला । मिलिहि न पावक मिटिहि न सूला ॥
देखियत प्रगट गगन अङ्गारा । अवनि न आवत एकौ तारा ॥४॥

5.61

पावकमय ससि स्रवत न आगी । मानहुँ
मोहि जानि हतभागी ।
सुनहि बिनय मम पिटप असोका । सत्य नाम करु हरु मम सोका ॥५॥

5.62

नूतन किसलय अनल समाना । देहि अगिनि तन करहि निदाना ॥
देखि परम बिरहाकुल सीता ।सो छन कपिहि कलप सम बीता ॥६॥

5.63

कपि करि हृदय बिचार, दीन्हि मुद्रिका डारि तब ।
जनु असोक अङ्गार, दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ ॥१२॥

5.64

तब देखी मुद्रिका मनोहर । राम-नाम-अंकित अति सुन्दर ॥
चकित चितव सुदरी पहिचानी । हरष बिषाद हृदय अकुलानी ॥१॥

5.65

जीति को सकै अजय रघुराई । माया तें असि रचि नहिं जाई ।
सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना ॥२॥

5.66

रामचन्द्र गुन बरनै लागा। सुनतहि सीता कर दुख भागा ॥
लागी सुलै स्रवन मन लाई । आदिहु तेँ सब कथा सुनाई ॥३॥

5.67

स्रवनामृत जेहि कथा सुनाई ।कहिं सो प्रगट होत किन भाई ॥
तब हनुमन्त निकट चलि गयऊ । फिरि बैठी मन बिसमय भयऊ
राम-दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की ॥
यह मुद्रिका मातु मैँ आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी ॥२॥

5.68

नर बानरहि सङ्ग कहु कैसे । कही कथा भै सङ्गति जैसे ॥६॥

5.69

कपि के बचन सप्रेम सुनि, उपजा मन विस्वास।
जाना मन क्रम बचन यह, कृपासिन्धु कर दास ॥१३॥

5.70

हरिजन जांनि प्रीति अति बाढी। सजल नयन पुलकावलि ठाढी।
बूढत बिरह जलधि हनुमाना । भयेउ तात मो कह जलजाना ॥१॥ .
अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी । अनुज सहित सुख-भवन-खरारी ।
कोमल चित कृपाल रघुराई । कपि केहि हेतु धरी निठुराई ॥२॥

5.71

सहज बानि सेवक सुखदायक । कबहुँक सुरति करत रघुनायक ॥
कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहि निरखि स्याम-मृदु-गाता॥३॥

5.72

बचन न आव नयन भरि बारी । अहह नाथ हौँ निपट बिसारी ॥
देखि परम बिरहाकुल सीता । बोला कपि मृदु बचन बिनीता ॥४॥

5.73

मातु कुसल प्रभु अनुज समेता । तव दुख दुखी सुकृपा-निकेता॥
जनि जननी मानहु जिय ऊना। तुम्ह तेँ प्रेम राम के दूना ॥५॥

5.74

रघुपति कर सन्देस अब, सुनु जननी धरि धीर।
अस कहि कपि गदगद भयौ, भरे बिलाचन नीर ॥१४॥

5.75

कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कह सकल भये बिपरीता।
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू । कालनिसा सम निसि ससि-भानू ॥१॥

5.76

कुबलय विपिन कुन्त बन सरिसा । बारिद तपत तेल जनु वरिसा ।
जे हित रहे करत तेइ पीरा । उरग स्वास सम त्रिबिधि समीरा ॥२॥

5.77

कहेहू तेँ कछु दुख घटि होई । काहि कहौँ यह जान न कोई ।
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा । जानत प्रिया एक मन मोरा ॥३॥

5.78

मन सदा रहत तोहि पाहीं । जानु प्रीति रस एतनेहिँ माहीँ ।
प्रभु सन्देस सुनत बैदेही । मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही ॥४॥

5.79

कह कपि हृदय धीर धरु माता । सुमिरु राम सेवक-सुख दाता ॥
उर आनहु रघुपति प्रभुताई । सुनि मम बचन तजहु कदराई ॥५॥

5.80

निसिचर निकर पतङ्ग सम, रघुपति बान कृसानु ।
जननी हृदय धीर धरु, जरे निसाचर जानु ॥१५॥

5.81

जौँ रघुबीर होति सुधि पाई । करते नहिँ बिलम्ब रघुराई ।
राम बान रबि उये जानकी । तम बरूथ कहँ जातुधान की ॥१॥

5.82

अबहिं मातु मैँ जाउँ लेवाई। प्रभु आयसु नहिं राम-दोहाई ॥
कछुक दिवस जननी धरू धीरा । कपिन्ह सहित ऐहहिं रघुबीरा ॥२॥

5.83

निसिचर मारि तोहि लेइ जैहहिँ । तिहुँ पुर नारदादि जस गैहहिं ।
हैं सुत कपि सब तुम्हहिं समाना । जातुधान भट अति बलवाना ॥३॥

5.84

मोरे हृदय परम सन्देहा । सुनि कपि प्रगट कीन्हि निज देहा।
कनक-भूधराकार सरीरा । समर-भयङ्कर अति बल-बीरा ॥४॥

5.85

सीता मन भरोस तब भयऊ । पुनि लघु रूप पवन-सुत लयऊ ॥३॥

5.86

सुनु माता साखामृग, नहिँ बल-बुद्धि बिसाल ।
प्रभुप्रताप तैं गरुडहि, खाइ परम लघु ब्याल ॥१६॥

5.87

मन सन्तोष सुनत कपि बानी। भगति-प्रताप-तेज-बल-सानी ॥
आसिष दीन्हि राम प्रिय जाना । होहु तात बल-सील-निधाना॥१॥

5.88

अजर अमर गुन-निधि सुत होहू । करहिं बहुत रघुनायक छोहू ॥
करहिं कृपा प्रभु अस सुलि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना ॥२॥

5.89

बार बार नायेसि पद सीसा । बोला बचन जोरि कर कीसा ।
अब कृतकृत्य भयौँ मैं माता ! आसिष तव अमोघ बिख्याता ॥३॥

5.90

सुनहु मातु मोहि अतिसयं भूखा । लागि देखि सुन्दर फल रूखा ॥
सुनु सुत करहिँ विपिन रखवारी । परम सुभट रजनीचर भारी ॥४॥

5.91

तिन्ह कर भय माता माहि नाहींँ । जौँ तुम्ह सुख मानहु मन माहीं ॥५॥

5.92

देखि बुद्धि-बल-निपुन कपि, कहेउ जानकी जाहु ।
रघुपति-चरन हृदय धरि, तात मधुर फल खाहु ॥१७॥

5.93

चलेउ नाइ सिर पैठेउ बागा। फल खायेसि तरु तारै लागा ॥
रहें तहाँ बहु भट रखवारे । कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे ॥१॥

5.94

नाथ एक आवा कपि भारी। तेहि असोकबाटिका उजारी ॥
खायेसि फल अरू बिटप उजारे । रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे ॥२॥

5.95

सुनि रावन पठये भट नाना । तिन्हहिँ देखि गर्जेउ हनुमाना ।
सब रजनीचर कपि सङ्घारे । गये पुकारत कछु अधमारे ॥३॥

5.96

पुनि पठयेउ तेहि अछयकुमारा । चला सङ्गः लै सुभट अपारा॥
आवत देखि बिटप गहि तर्जा । ताहि निपाति महाधुनि गर्जा ॥४॥

5.97

कछु मारेसि कछु मर्देसि, कछु मिलयेसि धरि धूरि ।
कछु पुनि जाइ पुकारे, प्रभु मर्कट बल-भूरि ॥१८॥

5.98

सुनि सुत बध लंकेस रिसाना । पठयेसि मेघनाद बलवाना ॥
मारेसि जनि सुत बाँधेसु ताही । देखिय कपिहि कहाँकर आही ॥१॥

5.99

चला इन्द्रजित अतुलित्त जोधा । बन्धु निधन सुनि उपजा क्रोधा ॥
कपि देखा दारुन भट आवा । कटकटाइ गर्जा अरु धावा ॥२॥

5.100

अति बिसाल तरु एक उपारा । बिरथ कीन्ह लंकेसकुमारा।
रहे महाभट ताके सङ्गा । गहि गहि कपि मर्द निज अंङ्गा ॥३॥

5.101

तिन्हहिं निपाति ताहि सन बाजा । भिरे जुगल मानहुँ गजराजा ॥
मुठिका मारि चढा तरु जाई । ताहि एक छन मुरछा आई ॥४॥

5.102

उठि बहोरि कीन्हेसि बहु माया । जीति न जाइ प्रभंजन-माया ॥५॥

5.103

ब्रह्म-अस्त्र तेहि साधा, कपि मन कीन्ह विचार।
जौँ न ब्रह्म-सर मानौँ, महिमा मिटै अपार ॥१९॥

5.104

ब्रह्मबान कपि कहँ तेहि मारा। परतिहु बार कटक सङ्घारा ॥
तेहि देखा कपि मुर्छित भयऊ । नागपास बाँधेसि लेइ गयऊ ॥१॥

5.105

जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव-बन्धन काटहिं नर ज्ञानी ।
तासुदूत कि बन्ध तर आवा । प्रभु कारज लगि कपिहि बँधावा ॥२॥

5.106

कपि-बन्धन सुनि निसिचर धाये । कौतुक लागि सभा सब आये ॥
दसमुख-सभा दीखि कपि जाई । कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई ॥३॥

5.107

कर जोरे सुर दिलिप विनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता ॥
देखि प्रताप न कपि मन सङ्का । जिमि अहि-गन महँ गरुड असङ्का॥४॥

5.108

कपिहि बिलोकि दसानन, विहँसा कहि दुर्बाद ।
सुत-बध-सुरति कीन्ह पुनि, उपजा हृदय बिषाद ॥२०॥

5.109

कह लङ्केस कवन तैँ कीसा । केहि के बल घालेहि बन खीसा ॥
की धौं स्रवन सुने नहिं मोही । देखौँ अति अलङ्क सठ तोही ॥१॥

5.110

मारे निसिचर केहि अपराधा । कहु सठ तोहि न प्रान कै बाधा ॥
सुनु रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचति माया ॥२॥

5.111

जाके बल विरंचि हरि ईसा । पालत सृजत हरत दससीसा ।
जा बल सीस धरत सहसानन । अंडकोस समेत गिरि कानन ॥३॥

5.112

धरै जो विविध देह सुर-त्राता । तुम्ह से सठन्ह सिखावनदाता ॥
हर-कोदंड कठिन जेहि भज्जा । तोहि समेत नृप-दल मद गज्जा ॥१॥

5.113

खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली । बधे सकल अतुलित बल-साली ॥२॥

5.114

जाके बल लवलेस तैं, जितेहु चराचर झारि ।
तासु दूत मैं जा करि, हरि आनेहुं प्रिय नारि ॥२१॥

5.115

जानौँ मैं तुम्हारि प्रभुताई। सहसबाहु. सनः परी लराई ॥
समरबालि सन करिंजस पावा।सुनिकपि बचन बिहँसि बहरावा॥१॥

5.116

खायेउँ फल प्रभु लागी भूखा। कपि सुभाव तेँ तारेउँ रूखा ॥
सब के देह परम प्रिय स्वामी। मारहिँ मोहिँ कुमारग-गामी ॥२॥

5.117

जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउ तनय तुम्हारे ॥
मोहि न कछु बाँधे कै लाजा । कीन्ह चहौँ निज प्रभु कर काजा ॥३॥

5.118

बिनती करौँ जोरि कर रावन । सुनहु मान तजि मोर सिखावन ॥
देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी । भ्रम तजि भजहु भगत भयहारी ॥४॥

5.119

जाके डर अति काल डेराई । जो सुर असुर चराचर खाई ॥
तासोँ बैर कबहुँ नहिं कीजै । मोरे कहे जानकी दीजै ॥
प्रनतपाल रघुनायक, करुनासिन्धु खरारि ।
गये सरन प्रभु राखिहहिँ, तव अपराध बिसारि ॥२२॥

5.120

राम चरन-पङ्कज उर धरहू । लङ्का अचल राज तुम्ह करहू ।
रिषि पुलस्ति जस बिमल मयङ्का तेहि ससि महँ जनिहाहु कलङ्का॥१॥

5.121

राम नाम बिनु गिरा न सोहा । देखु बिचारि त्यागि मद मोहा ॥
बसन हीन नहिँ सोह सुरारी। सब भूषन भूषित बर नारी ॥२॥

5.122

राम बिमुख सम्पति प्रभुताई । जाइ रही पाई बिनु पाई ॥
सजल-मूल जिन्ह सरितन्ह नाहिँ ।बरपि गये पुनि ताहि सुखाहीं॥३॥

5.123

सुनु दसकंठ कहौँ पन रोपी । बिमुख राम त्राता नहिँ कोपी ।
सङ्कर सहस बिष्णु अज तोही । सकहिँ न राखि राम कर द्रोही ॥२॥

5.124

मोह मूल बहु सूल प्रद, त्यागहु तम अमिमान ।
भजहु राम रघुनायक, कृपासिन्धु भगवान ॥२३॥

5.125

जदपिकहीकपिअतिहितबानी। भगति-बिबेक-बिरति-नय-सानी।
बोला बिहँसि महा अभिमानी। मिला हमहिँ कपि गुरु बड ज्ञानी ॥
मृत्यु निकट आई खल तोही ।लागेसि अधम सिखावन मोही।
उलटा होइहि कह हनुमाना । मति-भ्रम तोहि प्रगट मैं जाना ॥२॥

5.126

सुनि कपि बचन बहुत खिसियाना । बेगि न हरहु मूढ कर प्राना ।
सुनत निसाचर मारन धाये । सचिवन्ह सहित बिभीषन आये ॥३॥

5.127

नाइ सीस करि बिनय बहूता । नीति विरोध न मारिय दूता॥
आन दंड कछु करिय गोसाँई । सबहो कहा मन्त्र भल भाई ॥४॥

5.128

सुनत बिहँसि बोला दसकन्धर । अङ्गभङ्ग करि पठवहु बन्दर ॥३॥

5.129

कपि के ममता पूँछि पर, सबहि कहेउ समुझाइ ।
तेल बोरि पट बाँधि पुनि, पावक देहु लगाइ ॥२४॥॥
पूँछ हीनबानर तहँ जाइहि । तब सठ निज नाथहि लेइ आइहि ॥
जिन्ह के कीन्हेसि बहुत बडाई। देखौँ मैं तिन्ह के प्रभुताई ॥१॥

5.130

बचन सुनत कपि मन मुसुकाना । भै सहाइ सारद मैं जाना ।
जातुधान सुनि रावन बचना । लागे रचै मूढ सोइ रचना ॥२॥

5.131

रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढी पूँछि कीन्ह कपि खेला॥
कौतुक कहँ आये पुर-बासी । मारहि चरन करहिँ बहु हाँसी ॥३॥

5.132

बाजहिँ ढोल देहिँ सब तारी। नगर, फेरि पुनि पूँछि प्रजारी ॥
पावक जरत देखि हनुमन्ता । भयौ परम लघुरूप तुरन्ता ॥४॥

5.133

निबुकि चढेउ कपि कनक अटारी । भई सभीत निसाचर-नारीं ॥५॥

5.134

हरि-प्रेरित तेहि अवसर, चले मरुत उनचास ।
अट्टहास करि गर्जा, कपि बढि लाग अकास ॥२५॥

5.135

देह बिसाल परम हरुआई। मन्दिर तेँ मन्दिर चढ धाई ॥
जरै नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला ॥१॥

5.136

तात मात हा सुनिय पुकारा । एहि अवसर को हमहिँ उबारा ॥
हम जो कहा यह कपि नहिं होई । बानर रूप धरे सुर कोई ॥२॥

5.137

साधु अवज्ञा कर फल ऐसा । जरै नगर अनाथ कर जैसा ॥
जारा नगर निमिष एक माहीँ । एक बिभीषन कर गृह नाहीं ॥३॥

5.138

ता कर दूत अनले जेहि सिरजा। जरा न सो तेहि कारन गिरजा ॥
उलटि पलटि लङ्का सब जारी । कूदि परा पुनि सिन्धु मँझारी ॥४॥

5.139

पूँछि बुझाइ खोइ खम, धरि लघुरूप बहोरि ।
जनक-सुता के आगे, ठाढ भयौ कर जारि ॥२६॥

5.140

मातु मोहि दीजै कछु चीन्हा । जैसे रघुनायक माहि दीन्हा।
चूडामनि उतारि तब दयऊ । हरष समेत पवन-सुत लयऊ ॥१॥

5.141

कहेउ तात अस मोर प्रनामा । सब प्रकार प्रभु पूरनकामा ।
दीनदयाल बिरद सम्मारी। हरहु नाथ मम सङ्कट भारी॥२॥

5.142

तात सक्र-सुत कथा सुनायेहु । बान प्रताप प्रभुहि समुझायेहु ॥
मास दिवस महँ नाथ न आवा । तौ पुनि सोहि जियत नहिं पावा।३॥
कहु कपि केहि बिधि राखौँ प्राना । तुम्हहूँ तात कहत अब जाना।
तोहि देखि शीतल भै छाती। पुनि मो कहँ सोइ दिन सोइ राती॥४॥

5.143

जनक-सुतहि समुझाइ करि, बहु बिधि धीरज दीन्ह ।
चरन-कमल सिर नाइ कपि, गवन राम पहिँ कीन्ह ॥२०॥

5.144

चलत महाधुनि गर्जेसि भारी । गर्भ स्रवहिँ सुनि निसिचर-नारी।
नाँघि सिन्धु एहि पारहिआवा । सबद किलकिला कपिन्ह सुनावा ॥१॥

5.145

हरषे सब बिलोकि हनुमाना । नूतन जनम कपिन्ह तब जाना।
मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा । कीन्हेसि रामचन्द्र कर काजा ॥२॥

5.146

मिले सकल अति भये सुखारी। तलफत मीन पाव जनु बारी ।
चले हरषि रघुनायक पासा । पूछत कहत नवल इतिहासा ॥३॥

5.147

तब मधुबन भीतर सब आये । अङ्गद सम्मत मधु-फल खाये ॥
रखवारे जब बरजै लागे । मुष्टि प्रहार हनत सब भागे ॥४॥

5.148

जाइ पुकारे ते सब, बन उजार जुबराज ।
सुनि सुग्रीव हरष कपि, करि आये प्रभु काज ॥२८॥

5.149

ओ-जौँ न होतिसीतासुधि पाई । मधुबन के फल सकहिँ कि खाई ॥
एहि विधि मन बिचार करराजा। आइगये कपिसहित समाजा ॥१॥

5.150

आइ सबहिँ नावा पद सीसा । मिले सबन्हि अति प्रीति कपीसा ।
पूछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपा भी काज बिसेखी ॥२॥

5.151

नाथ काज कीन्हेउ हनुमाना । राखे सकल कपिन्ह के प्राना ॥
सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ । कपिन्ह सहित रघुपति पहँ चलेऊ ॥३॥

5.152

राम कपिन्ह जब आवत देखा ! किये काज मन हरष बिसेखा ॥
फटिकसिला बैठे दोउ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई ॥४॥

5.153

प्रीति सहित सब भेँटे, रघुपति करुना पुज्ज।
पूछी कुसल नाथ अब, कुसल देखि पद कंज ॥२६॥

5.154

जामवन्त कह सुनु रघुराया । जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया
ताहि सदा सुभ कुसल निरन्तर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर ॥१॥

5.155

इ बिजई बिनई गुन-सागर । तासु सुजस त्रय लोक उजागर
प्रभु की कृपा भयौ सब काजू । जनम हमार सुफल भा आजू ॥२॥

5.156

नाथ पवन-सुत कीन्हि जो करनी । सहसहु मुख न जाइ सो बरनी ॥
पवन-तनय के चरित सुहाये। जामवन्त रघुपतिहि सुनाये ॥३॥

5.157

सुनत कृपानिधि मन अति भाये । पुनि हनुमान हरषि हिय लाये।
कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्व प्रान की ॥४॥

5.158

नाम पाहरू दिवस निसि, ध्यान तुम्हार कपाट ।
लोचन निज पद जन्त्रित, जाहिँ प्रान केहि बाट ॥३०॥

5.159

चलत मोहि चूडामनि दीन्ही । रघुपति हृदय लाइ सोइ लीन्ही॥
नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनक-कुमारी॥१॥

5.160

अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना । दीनबन्धु प्रनतारति हरना ॥
मन क्रम बचन चरन अनुरागा । केहि अपराध नाथ हैँ त्यागी ॥२॥

5.161

अवगुन एक मोर मैं जाना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना
नाथ सो नयनन्हि कर अपराधा । निसरत प्रान करहिं हठि बाधा
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा । स्वास जरै छन माँह सरीरा॥
नयन स्रवाहिँ जल निज हित लागी । जरै न पाव देह बिरहागि
सीता कै अति बिपति बिसाला । बिनहिँ कहें भलि दीनदयाला ॥५॥

5.162

निमिष निमिष करूनानिधि, जाहिँ कलप सम बीति ।
बेगि चलिय प्रभु आनिय, भुज बल खल दल जीति ॥३१॥

5.163

सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना । भरि आये जल राजिव-नयना॥
बचन काय मन मम गति जाही। सपनेहुँबूझियबिपति कि ताही॥१॥

5.164

कह हनुमन्त विपत्ति प्रभु सोई। जब तब सुमिरन सजन न होई ॥
केतिक बात प्रभु जातुधान की । रिपुहि जीति आनिबी जानकी ॥२॥

5.165

सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनु धारी॥
प्रतिउपकार करौँ का तोरा । सनमुख होइन सकत मन मोरा ॥३॥

5.166

सुनु सुत तोहि उरिन मैं नाहीं । देखेउँ करि बिचार मन माहीं ॥
पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता । लोचन नीर पुलक अति गाता ॥४॥

5.167

सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख, गात हरषि हनुमन्त ।
चरन परेउ प्रेमाकुल, त्राहि त्राहि भगवन्त ॥३२॥

5.168

बार बार प्रभु चहहिँ उठावा । प्रेम मगन तेहि उठब न भावा ।
प्रभु कर पङ्कज कपि के सीसा । सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा ॥१॥

5.169

सावधान मन करि पुनि सङ्कर । लागे कहन कथा अति सुन्दर
कापि उठाइ प्रभु हृदय लगावां। कर गहि परम निकट बैठावा ॥२॥

5.170

कहु कपि रावन पालित लङ्का । केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बङ्का ।
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना । बोला बचन बिगत अभिमाना ॥३॥

5.171

साखामृग कै बडि मनुसाई । साखा तेँ साखा पर जाई ।
नाँघि सिन्धु हाटकपुर जारा।निसिचर-गन बधि विपिन उजारा ॥४॥

5.172

सब तव प्रताप रघुराई । नाथ न कछू मोरि प्रभुताई ॥५॥

5.173

ताकहँ प्रभु कछु अगम नहिँ, जापर तुम्ह अनुकूल।
तव प्रभाव बडवानलहिं, जारि सकै खलु तूल ॥३३॥

5.174

नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी॥
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी । एवमस्तु तब कहेउ भवानी ॥१॥

5.175

उमा राम सुभाव जेहिं जाना । ताहि भजन तजि भाव न आना ॥
यह सम्बाद जासु उर आवा। रघुपति-चरन-भगति सोइ पावा ॥२॥

5.176

सुनि प्रभु बचन कहहिँ कपि बृन्दा । जय जय जय कृपाल सुखकन्दा॥
तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा । कहा चलै कर करहु बनावा॥३॥

5.177

अब बिलम्ब केहि कारन कीजै । तुरत कपिन्ह कह आयसु दीजै ॥
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी ॥४॥

5.178

कपिपति बेगि बोलाये, आये यूथप यूथ।
नाना बरन अतुल बल, बानर भालु बरूथ ॥३४॥

5.179

प्रभु पद-पङ्कज नावहिं सीसा। गर्जहिँ भालु महाबल कीसा ॥
देखी राम सकल कपि सैना । चितै कृपा करि राजिव-नैना ॥१॥

5.180

राम कृपा बल पाइ कपिन्दा । भये पच्छजुत मनहुँ गिरिन्दा ॥
हरषि राम तब कीन्ह पयाना । सगुन भये सुन्दर सुभ नाना ॥२॥

5.181

जासु सकल मङ्गल-मय कीती । तासु पयान सगुन यह नीती ॥
प्रभु पयान जाना बैदेही । फरकि बाम अँग जानु कहि देही ॥३॥

5.182

जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई ।असगुन भयौ रावनहिँ सोई ॥
चला कटक को बरनै पारा । गर्जहिँ बानर भालु अपारा ॥४॥

5.183

नख आयुध गिरि पादप धारी ।चले गगन महि इच्छाचारी ॥
केहरिनाद भालु कपि करहीं । डगमगाह दिग्गज चिक्करहीं ॥५॥

5.184

चिक्करहिँ दिग्गज डोल महि गिरि,लोल सागर खरभरे ।
मन हरष दिनकर सोम सुर मुनि, नाग किन्नर दुख टरे ।
कटकटाहि मर्कट बिकट भट बहु, कोटि कोटिन्ह धावहीं।
जय राम प्रबल प्रताप कोसल, नाथ गुन गल गावहीं ॥४॥

5.185

सहि सक न बार उदार अहिपति बार बाराहि मोहई।
गह दसन पुनि पुनि कमठ-पृष्ठ, कठोर खो किमि सोहई।
रघुबीर रुचिर पयान प्रस्थिति, जानि परम सुहावनी ।
जनु कसठ-खर्पर सर्पराज सो, लिखस अबिचल पावनी ॥५॥

5.186

एहि बिधि जाइ कृपानिधि,उतरे सागर तीर ।
जहँ तह लागे खान फल, भालु बिपुल कपि बीर॥३॥

5.187

उहाँ निसाचर रहहिं ससङ्का । जब तें जारि गयौ कपि लड्डा।
निज निजगृह सब करहि विचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा॥१॥

5.188

जासु दूत बल बरनि न जाई । तेहि आये पुर कवन भलाई ।
दूतिन्ह सन सुनि पुरजन बानी । मन्दोदरी अधिक अकुलानी ॥२॥

5.189

रहसि जोरि कर पति पद लागी । बोली बचन नीति-रस पागी॥
कन्त करष हरि सन परिहरहू । मोर कहा अति हित हिय घरहू ॥३॥

5.190

समुझत जासु दूत कै करनी। स्रवहिं गर्भ रजनीचर-घरनी॥
तासु नारि निज सचिव बोलाई । पठवहु कन्त जौँ चहहु भलाई
तब कुल कमल-विपिन दुखदाई । सीता सीत-निसा सम आई ।
सुनहु नथ सीता बिनु दीन्हे । हितन तुम्हार सम्भु अज कीन्हे॥५॥

5.191

राम बान अहिगन सरिस, निकर निसाचर भेक ।
जबलगि ग्रसत न तबलगि, जतन करहु तजि टेक ॥३६॥

5.192

स्रवन सुनी सठ ताकरिवानी। विहँसा जगतबिदित अभिमानी।
समय सुभाव नारि कर साँचा मङ्गलमहँ भय मन अति काँचा ॥१॥

5.193

जौँ आवै मरकट कटकाई। जियहिँ विचार निसिचर खाई॥
कम्पाहिँ लोकप जाकी त्रसा। तासु नारि सभीत बडि हाँसा ॥२॥

5.194

असकहि बिहँसि ताहि उर लाई। चलेउ समा ममता अधिकाई॥
मन्दोदरी हृदय कर चिन्ता ।अयौ कन्त पर निधि निपीता ॥३॥

5.195

बैठेउ सभा खबरि असि पाई। सिन्धु पार सेना सब आई।
बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू ॥४॥

5.196

जितेहु सुरासुर तब खम नाहीँ । नर बानर केहि लेख माहीं ॥३॥

5.197

सचिव वैद गुरु तीनि जौँ, प्रिय बोलहिँ भय आस ।
राज धर्म तन तीनि कर, होइ बेगिही नास ॥३७॥

5.198

सोइ रावन कह बनी सहोई । अस्तुति करहिँ सुनाइ सुनाई ॥
अवसर जाति बिभीषन आवा । भ्राता चरन सीस तिन्ह नावा ॥१॥

5.199

पुनि सिर नाइ बैठ निज आसन । बोला बचन पाइ अनुसासन ॥
जौँ कृपाल पूछेहु मोहि बाता । मति अनुरूप कहौँ हित ताता ॥२॥

5.200

जो आपन चाहै कल्याला । सुजस सुमति सुभगति सुख नाना ॥
पर-नारि लिलार गोसाँई । तजै चौथि के चन्द कि नाई ॥३॥

5.201

दह भुवन एक पति होई । भूत-द्रोह तिष्ठै नहिं सोई ॥
गुनसागर नागर नर जोऊ । अलप-लोभ भल कहै न कोऊ ॥४॥

5.202

काम क्रोध मद लाभ सब, नाथ नरक के पन्थ ।
सन परिहरि रघुबीरही, भजहु मजहिँ जेहि सन्त ॥३८॥

5.203

तात राम नहिँ नर भूपाला । भुवनेश्वर कालहु कर काला ॥
ब्रह्म अनामय अज भगवन्ता । व्यापक अजित अनादि अनन्ता ॥१॥

5.204

गो द्विज धेनु देव हितकारी । कृपासिन्धु मानुष तनु धारी॥
जन रज्जन सज्जन खल ब्राता । बेद-धर्म रच्छक सुनु भ्राता ॥२॥

5.205

ताहि बयर- तजि नाइय माथा प्रनतारति भञ्जन रघुनाथा ॥
देहु नाथ प्रभु कह बैदेही । भजहु राम बिनु हेत सनेही ॥३॥

5.206

सरन गये प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व-द्रोह-कृत अघ जेहि लागा ..
जासु नाम त्रय ताप नसावन । सोइ प्रभु प्रगट समुझु जिय रावना
बार बार पद लागौँ, बिनय करौँ दससीस ।
परिहरि मान-मोह-मद, भजहु कोसलाधीस ॥
ऽमुनि पुलस्ति निज सिष्य सल, कहि पठई यह बात ।
तुरत सो मैं प्रभु सन कही, पाइ सुअवसर तात ॥३९॥

5.207

ओ-माल्यवन्त अतिसचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना॥
तात अनुज तब नीति-विभूषन। सो उर धरहु जो कहत विभीषन ॥१॥

5.208

रिपु उतकर्ष कहत सठ दोऊ । दूरि न करहु इहाँ है कोऊ ॥
माल्यवन्त गृह गयौ बहोरी। कहै विभीषन पुनि कर जोरी १२॥
सुमति कुमति सब के उर रहहीं । नाथ पुरान निगम अस कहहीं।
जहाँ सुमति तह सम्पति नाना । जहाँ कुमति तहँ त्रिपति निदाना ॥३॥

5.209

तव उर कुमति बसी बिपरीता । हित अनहित मानहु रिपु प्रीता ॥
कालराति निसिचर-कुल केरी । तेहि सीता पर प्रीति घनेरी ॥२॥

5.210

तात चरन गहि माँगौँ, राखहु मोर दुलार ।
सीता देहु राम कहँ ,अहित न हुओइ तुम्हार ॥४०॥

5.211

बुध-पुरान-स्रुति-सम्मत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी ॥
सुनत दसानन उठा रिसाई । खल ताहि निकट मृत्यु अब आई ॥१॥

5.212

जियसि सदा सठ मोर जियावा । रिपु कर पच्छ मूढ तोहि भावा ।
कहसि न खल अस को जग माहीँ । भुज बल जाहि जिता मैं नाहीं॥२॥

5.213

मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती । सठ मिलु जाइ तिन्हहिँ कहु नीती॥
अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा । अनुज गहे पद बारहि बारा ॥३॥

5.214

उमा सन्त कै इहै बडाई । मन्द करत जो करई भलाई ।
अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा । अनुज गहे पद बारहि बारा ॥३॥

5.215

सचिव सङ्ग लेइ नम-पथ गयऊ । सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ ॥५॥

5.216

राम सत्यसङ्कल्प प्रभु, सभा काल-बस तोरि।
मैं रघुबीर सरन अब,जाउँ देहु जनि खोरि ॥४१॥

5.217

अस कहि चला बिभीषन जबहीं। आयू-हीन भये सब तबहीं ॥
साधु अवज्ञा तुरत भवानी । कर कल्यान अखिल कै हानी ॥३॥

5.218

रावन जबहिँ बिभीषन त्यागा । भयौ विभव बिनु तबहिँ अभागा ॥
चलेउ हरषि रघुनायक पाही। करत मनोरथ बहु मन माहीं ॥२॥

5.219

देखिहौँ जाइ चरन-जलजाता ।अरुन मृदुल सेवक सुख-दाता ॥
जो पद परसि तरी रिषि-नारी । दंडक-कानन पावन-कारी ॥३॥

5.220

देखिहौँ जाइ चरन-जलजाता ।अरुन मृदुल सेवक सुख-दाता ॥
जो पद परसि तरी रिषि-नारी । दंडक-कानन पावन-कारी ॥३॥

5.221

जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि, भरत रहे मन लाइ।
ते पद आजु बिलोकिहौँ, इन्ह नयनन्हि अब जाइ ॥१२॥

5.222

एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा । आयौ सपदि सिन्धु एहि पारा॥
कपिन्ह बिभीषन आवत देखा । जाना कोउ रिपु दूत बिसेखा ॥१॥

5.223

ताहि राखि कपीस पहिँ आये । समाचार सब ताहि सुनाये।
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई । आवा मिलन दसानन भाई ॥२॥

5.224

कह प्रभु सखा बूझिये काहा । कहै कपीस सुलहु नरनाहा ॥
जानि न जाइ निसाचर माया । काम-रूप केहि कारन आया ॥३॥

5.225

भेद हमार लेन सठ आवा । राखिय बांधि माहि अस भावो।
सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत-भय-हारी ॥४॥

5.226

सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना । सरनागत बच्छल भगवाना ॥५॥

5.227

सरनागत कहँ जे तजहिँ, निज अनहित अनुमानि ।
ते नर पाँवर पापमय, तिन्हहिं बिलेआकत हानि ॥४३॥

5.228

कोटि बिप्रबध लागै जाहू । आये सरन तजौँ नहि ताहू ॥
सनमुख होइ जीव माहि जबहीँ । जनम कोटि अघ नासहितबहीं॥१॥

5.229

पापवन्त कर सहज सुभाऊ । भजन मेआर तेहि भाव न काऊ॥
जौँ पै दुष्ट हृदय सोइ होई । मारे सनमुख आव कि साई ॥२॥

5.230

निर्मल लन जन सो मोहि पावा । माहि कपट छल-छिद्र न भावा ॥
भेद लेन पठवा दससीसा । तबहुँ न मछु भय हानि कपीसा ॥३॥

5.231

जग महँ सखा निसाचर जेते। लछिमन हनैँ निमिष महँ तेते ॥।
जौँ सभीत आवा सरनाई। रखिहौँ ताहि प्रान की नाँई ॥4॥

5.232

उभय भाँति तेहि आनहु, हँसि कह कृपा-निकेत ।
जब कृपाल कहि कपि चले, अङ्गद हनू समेत ॥44॥

5.233

सादर तेहि आगे करि बानर । चले जहाँ रघुपति करुनाकर ॥
दूरिहि हैं देखेउ दाउ भ्राता। नयनानन्द दान के दाता ॥१॥

5.234

बहुरि राम छवि-धाम बिलोकी । रहेउ ठठुकि एकटक पल रोकी ।
भुजप्रलम्ब कंजारुन लोचन । स्यामल गात प्रनत भय मोचन ॥२॥

5.235

सिद्ध कन्ध आयत उर सोहा । आनन अमित मदन मन मोहा ।
नयन नीर पुलकित अति गाता । मन धरि धीर कही मृदु बाता ॥३॥

5.236

नाथ दसानन कर मैं भ्राता । निसिचर बंस जनम सुरत्राता ।
पापनिय तानसदेहा । जथा उलूकहि तम पर नेहा ॥४॥

5.237

स्रवन सुजस सुनि आयौँ, प्रभु भंजन भव भीर ।
त्राहि त्राहि आरति हरन, सरन सुखद रघुधीर ॥४॥

5.238

अस कहि करत दंडवत देखा । तुरत उठे प्रभु हरष बिसेखा ॥
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा । भुज बिसाल गहि हृदय लगावा ॥१॥

5.239

अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी । बोले बचन भगत भय-हारी
कहु लंकेस सहित परिवारा । कुसल कुठाहर बास तुम्हारा ॥२॥

5.240

खल-मंडली बसहु दिन राती । सखा धरम निबहै केहि भाँती ॥
मैं जानौँ तुम्हारि सब रीती । अति नयनिपुन न भाव अनीती॥३॥

5.241

बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट सङ्ग जनि देइ बिधाता ।
अब पद देखि कुसल रघुराया । जौँ तुम्ह कीन्हि जानि जन दाया ॥
तबलगि कुसल न जीव कहुँ ,सपनेहुँ मन बिश्राम॥
जबलगि भजत न राम कहँ, सोक-धाम तजि काम ॥६॥

5.242

तबलगि हृदय बसत खल नाना । लोभ मोह मत्सर मद माना ॥
जबलगि उर न बसत रधुनाथा । धरें चाप सायक कटि भाथा ॥१॥

5.243

ममता तरुन तमी अँधियारी। राग द्वेष उलूक सुखकारी॥
तबलगि बसति जीव मन माहीं। जबलगि प्रभु प्रताप रवि नाहीं ॥२॥

5.244

अब मैं कुसल मिटे भय भारे । देखि राम-पद-कमल तुम्हारे ॥
तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला । तोहि न व्याप त्रिबिधि भव सूला ॥३॥

5.245

मैँ निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरन कीन्ह नहिँ काऊ
जासु रूप मुनि ध्यान न आवा ।तेहिं प्रभु हरषि हृदय मोहि लावा॥
अहोभाग्य मम अमित अति, राम कृपा सुख पुंज ।
देखेउँ नयन बिरंचि सिव, सेव्य जुगल पदकंज ॥१७॥

5.246

सुनहु सखा निज कहौँ सुभाऊ । जान भुसुंडि सम्भु गिरिजाऊँ।
जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवै समय सरन तकि मोही ॥१॥

5.247

तजि मद मोह कपट छल नाना । करौँ सदा तेहि साधु समाना ।
जननी जनक बन्छु सुत दारा । तन धन भवन सुहृद परिवारा॥२॥

5.248

सब के समता ताग बटोरी । मम पद सनहिँ बाँध बरि डोरी ॥
समदरसी इच्छा कछु नाहीँ । हरष सेकि अय नहिँ मन माहीँ ॥३॥

5.249

अस सज्जन मम उर बस कैसे । लोभी हृदय बसै धनु जैसें ॥
तुम्ह सारिखे सन्त प्रिय मोरे । धरौँ देह नहिँ आन निहोरे ॥४॥

5.250

सगुन उपासक पर-हित, निरत नीति दृढ नेम ।
ते नर प्रान समान मम, जिन्ह के द्विज-पद प्रेम ॥४॥

5.251

सुनु लङ्केस सकल गुन तोरें । तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें ॥
राम बचन सुनि बानर-जूथा । सकल कहहिं जय कृपा-बरूथा ॥१॥

5.252

सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी । नहिँ अघात श्रवनामृत जानी ।
पदअम्बुज गहि बारहिं बारा । हृदय समात न प्रेमु अपारा ॥२॥

5.253

सुनहु देव सचराचर स्वामी । प्रनतपाल उर अन्तरजामी ॥
उर कछु प्रथम बासना रही । प्रभु-पद-प्रीति-सरित सो बही ॥२॥

5.254

अब कृपाल निज भगति पावनी । देहु सदा सिव मन भावनी ॥
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा । मागा तुरत सिन्धु कर नीरा ॥४॥

5.255

जदपि सखा तव इच्छा नाहीँ । मोर दरस अमोघ जग माहीँ ॥
अस कहि राम तिलक तेहि सारा । सुमन अष्टि नम अई अपारा ॥५॥

5.256

रावन क्रोध अनल निज, स्वास समीर प्रचंड।
जरत बिभीषन राखेउ, दीन्हेउ राज अखंड॥
जो सम्पति सिव रावनहिँ, दीन्हि दिये दस माथ।
इ सम्पदा विभीषनहिँ, सकुचि दीन्हि रघुनाथ ॥
अस प्रभु छाडि भजहिँ जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ विषाना।
निज जन जानि ताहि अपनावा । प्रभु सुभाव कपिकुल मन भावा ॥१॥

5.257

पुनि सर्वज्ञ सर्व उर बासी । सर्वरूप ऽसब रहित उदासी ।
बोले बचन नीति प्रतिपालक । कारन मनुज दनुज कुल घालक ॥२॥

5.258

सुनु कपीस लङ्कापति बीरा । केहि बिधि तरिय जलधि गम्भीरा ॥
सङ्कल मकर उरग झष जाती । अति अगाध दुस्तर सब भाँती ॥३॥

5.259

कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिन्धु सोषक तब सायक।
जदापि तदपि नीति असिगाई । बिनय करिय सागर सन जाई ॥४॥

5.260

प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि, कहिहि उपाय बिचारि ।
बिनु प्रयास सागर तरिहि, सकल मालु-कपि धारि ॥५०॥

5.261

सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिय दैव जौँ होइ सहाई ।
मन्त्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अतिदुख पावा ॥१॥

5.262

नाथ दैव कर कवन भरोसा । सोखिय सिन्धु करिय मन रोसा ॥
कादर मन कहँ एक अधारा । दैव दैव आलसी पुकारा ॥२॥

5.263

सुनत विहँसि बोले रघुबीरा । ऐसै करन धरहु मन धीरा॥
अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई । सिन्धु समीप गये रघुराई ॥३॥

5.264

प्रथम प्रनाम कीन्ह सिर नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई ॥
जबहिँ विभीषण प्रभु पहिं आये। पाछे रावना दूत पठाये ॥४॥

5.265

सकल चरित तिन्ह देखे, भरे कपट कपि देह ।
प्रभु गुन हृदय सराहहिँ, सरनागत पर नेह ॥५॥

5.266

प्रगट बखानहिँ राम सुभाऊ । अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ ॥
रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने । सकल बाँधि कपीस पहिँ आने ॥१॥

5.267

कह सुग्रीव सुनहु सब बानर । अङ्गभङ्गकरि पठवहु निसिचर ।
सुनि सुग्रीव बचन कपि धाये । बाँधि कटक चहुँ पास फिराये ॥२॥

5.268

बहु प्रकार मारन कपि लागे । दीन पुकारत तदपि न त्यागे ।
जो हमार हर नासा काना। तेहि कौसलाधीस कै आना ॥३॥

5.269

सुनि लछिमल सब निकट बोलाये । दया लागि हँसि तुरत छोडाये।
रावन कर दीजेहु यह पाती । लछिमन बचन बाँचु कुलघाती ॥४॥

5.270

कहेहु मुखागर मूढ सन, मम सन्देस उदार ।
सीता देह मिलहु न त, आवा काल तुम्हार ॥५२॥

5.271

ओ-तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन-गाथा॥
कहत राम जस लंका आये । रावन चरन सीस तिन्ह नाये ॥१॥

5.272

बिहँसि दसानन पूछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता।
पुनि कहु खबर बिभीषन केरी। जाहिं मृत्यु आई अति नेरी ॥२॥

5.273

करत राज लङ्का सठ त्यागी। होइहि जव कर कीट अभागी ॥
पुनि कहु भालु-कीस ऽकटकाई । कठिन काल प्रेरित चलि आई ॥३॥

5.274

जिन्ह के जीवन कर रखवारा । भयौ मृदुल चित्त सिन्धु बेचारा ॥
कहु तपसिन्ह के बात बहारी। जिन्ह के हृदय त्रास अति मोरी ॥४॥

5.275

की भै भेंट कि फिरि गये, लवन सुजस सुनि मार ।
कहसिन रिपु दल तेज बल, बहुत चकित चित तार ॥५३॥

5.276

नाथ कृपाकरि पूछेउ जैसे । सानहु कहा क्रोध तजि तैसे ॥
मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा । जातहि लाल तिलक तेहि लारा ॥१॥

5.277

रावन दूत हलहि सुनि काला । पिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना ॥
खवन नासिका काठै लागे । राम सपथ दीन्हे हम त्यागे ॥२॥

5.278

पूछेउ नाथ राम कटकाई । बदन कोटिसत बरनि न जाई।
नाना बरन भालु कषि धारी । बिकदालन बिसाल भय-कारी ॥३॥

5.279

जेहि पुर दहेउ हतेउ सुत तारा । सकल कपिन्ह महँ तेहिबल थोरा ॥
अमित नाम भट कठिन कराला । अमित नाग बल बिपुल बिसाला ॥
द्विबिद मयन्द नील नल, अङ्गदादि बिकटासि ।
दधिमुख केहरि कुमुद गव, जामवन्त बल रासि ॥४॥

5.280

ये कपिसब सुग्नीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनै को नाना
रामकृपा अतुलित बल तिन्हहीँ। टन समान त्रैलोकहि गनहीं ॥१॥

5.281

अस मैं स्रवन सुना दसकन्धर । पदुम अठारह यूथप बन्दर ॥
नाथ कटक महँ सो कपि नाहीँ। जो न तुम्हहिँ जीतै रन माहीं ॥२॥

5.282

परम क्रोध मीजहिँ सब हाथा । आयसु पै न देहि रघुनाथा
खहिँ सिन्धु सहित झष ब्याला। पूरहिँ न त भरि कुधर बिसाला ॥३॥

5.283

मर्दि गर्द मिलवहिँ दससीसा । ऐसै बचन कहहिँ सब कीसा ॥
गर्जहिँ तर्जहिँ सहज असङ्का । मानहुँ ग्रसन चहत्त हहिँ लङ्का ॥४॥

5.284

सहज सूर कपि भालु सब, पुनि सिर पर प्रभु राम ।
रावन काल कोटि कहँ, जीति सकहिँ संग्राम ॥५५॥

5.285

राम तेज-बल-बुधि बिपुलाई । सेष सहस-सत सकहिँ न गाई ॥
सक सर एक सोखि सत सागर । तव भ्रातहि पूछेउ नय-नागर ॥१॥

5.286

तासु बचन सुनि सागर पाहीँ । माँगत पन्थ कृपा मन माहीँ॥
सुनत बचन बिहँसा दससीसा । जौं असि मति सहाय कृत कीसा ॥२॥

5.287

सहज भीरु कर बचन दिढाई । सागर सन ठानी मचलाई ॥
मूढ मृषा का करति बडाई । रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई ॥३॥

5.288

सचिव सभीत बिभीषन जाके । विजय बिभूति कहा जग ताके ॥
सुनि खल बचन दूत रिस बाढी। समय बिचारि पत्रिका काढी ॥४॥

5.289

रामानुज दीन्ही यह पाती। नाथ बँचाइ जुडावहु छाती।
बिहँसि बाम कर लीन्ही रावन । सचिव बोलि सठ लाग बँचावन ॥५॥

5.290

बातन्ह मनहिं रिझाइ सठ, जनि घालसि कुल खीस ।
राम बिरोध न उबरसि , सरन विष्नु अज ईस ॥
की तजि मान अनुज इव, प्रभु-पद-पङ्कज भृङ्ग ।
होइ कि राम सरानल, खल कुल सहित पतङ्ग ॥५६॥

5.291

सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई ॥
भूमि परा कर गहत अकासा । लघु तापस कर बाग-बिलासा॥१॥

5.292

कह सुक नाथ सत्य सब बानी । समुझहु छाडि प्रकृति अभिमानी ।
सुनहु वचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा ॥२॥

5.293

अति कोमल रघुबीर सुभाऊ । जदपि अखिल लोक कर राऊ ॥
मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिहीं। उर अपराध न एकौ धरिहीं ॥३॥

5.294

जनक-सुता रघुनाथहि दोजेऐ । एतना कहा मोर प्रभु कीजै ।
जब तेहि देन कहा बैदेही । चरन प्रहार कीन सठ तेही ॥४॥

5.295

नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिन्धु रघुनायक जहाँ ।
करि प्रनाम निज कथा सुनाई। राम कृपा आपनि गति पाई ॥५॥

5.296

रिषि अगस्ति के साप भवानी । राच्छस भयौ रहा मुनि ज्ञानी ॥
बन्दि राम-पद बारहि बारा । मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा ॥६॥

5.297

बिनय न मानत जलधि जड, गये तीनि दिन बीति ।
बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीति ॥५७॥

5.298

लछिमन बान सरासन आनू । सोखौँ बारिधि बिसिख-कृसानू ॥
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीति । सहज कृपन सन सुन्दर नीती ॥१॥

5.299

ममता रत सन ज्ञान कहानी । अति लोभी सन बिरति बखानी॥
क्रोधिहि सम कामिहि हरिकथा । उसर बीज बये फल जथा ॥२॥

5.300

असकहि रघुपति चाप बढावा । यह मत लछिमन के मन भावा ।
सन्धानेउ प्रभु बिसिख कराला । उठी उदधि उरअन्तर ज्वाला ॥३॥

5.301

मकर उरग झष-गन अकुलाने। जरत जन्तु जलनिधि जब जाने ॥
कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयेउ तजि माना ॥४॥

5.302

काटेहि पै कदली फरै, कोटि जतन कोउ सींच ।
विनय न मान खगेस सुनु- डाटेहि पै नव नीच ॥८॥

5.303

सभय सिन्धु गहि पद प्रभु केरे । छमहु नाथ सब अवगुन मेरे ।
गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कै नाथ सहज जड करनी ॥१॥

5.304

तव प्रेरित मायाँ उपजाये । सृष्टि हेतु सब ग्रन्थन्हि गाये ॥
प्रभु आयसु जेहि कहँ जसि अहई । सो तेहि भाँति रहे सुख लहई ॥२॥

5.305

प्रभु भल कीन्ह मोहि सिख दीन्ही । मरजादा पुनि तुम्हरिय कीन्ही ॥
ढोल गँवार सूद्र पसु नारी । सकल ताडना के अधिकारी ॥३॥

5.306

प्रभु प्रताप मैँ जांब सुखाई । उत्तरिहि कटक न मारि बडाई ॥
प्रभु आज्ञा अपेल स्रुति गाई । करौ सो बेगि जो तुम्हहिँ सुहाई॥४॥

5.307

सुनत बिनीत बचन अति, कह कृपाल मुसुकाइ।
जेहि बिधि उत्तरै कपि कटक, तात सो कहहु उपाइ ॥५६॥

5.308

नाथ नील नल कपि दोउ भाई। लरिकाई रिषि आसिष पाई ॥
तिन्ह के परस किये गिरि मारे । तरिहहि जडधि प्रताप तुम्हारे ॥१॥

5.309

मैं पुनि उर धरि प्रभु प्रभुताई । करिहौँ बल अनुमान सहाई ॥
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइय। जेहि यह सुजस लोक तिहुँ गाइय ॥२॥

5.310

एहि सर मम उत्तर तट बासी । हतहु नाथ खल नर अघ रासी ।
सुनि कृपाल सागर मन पीरा । तुरतहि हरी राम रनधीरा ॥३॥

5.311

देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयौ सुखारी॥
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा । चरन बन्दि पायोधि सिधावा ॥
निज भवन गवनेउ सिन्धु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ ।
यह चरित कलि मलहर जथामति, दास तुलसी गायऊ ।
सुख भवन संसय समन दमल बिषाद रघुपति गुन गना।
तजि सकल आस भरोस गावहि, सुनहि सन्तत सठ मना ॥६॥

5.312

सकल सुमङ्गल दायक, रघुनायक गुन गान ।
सादर सुनहिँ ते तरहिँ भव, सिन्धु बिना जलजान ॥३०॥

5.313

इति श्रीरामचरितमानसे सकलकलिकलुष विध्वंसने
ज्ञान सम्पादनो नाम पञ्चमः सोपानः
समाप्तः।
यो ददाति सतां शम्भुः कैवल्यमपिदुर्लभम् ।
खलानां दण्डकृद्योसौ शङ्करः शं तनोतु माम ॥३॥

मूल पाठ: rāmacaritamānasa · Hindi Wikisource contributors · Sanskrit Wikisource · CC BY-SA 4.0

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