रामचरितमानस · अध्याय 7
इति श्रीरामचरितमानसे सकल कलिकलुष विध्वंसने
विशुद्ध सन्तोष सम्पादनो नाम षष्ठः सेओपान
कुन्दैन्दुदरगौरसुन्दरं अम्बिकापतिमभीष्टसिद्धिदम् ।
कारुणीककलकञ्जलोचनं नौमि शङ्करमनङ्गमौचनम् ॥३॥
रहा एक दिन अवधि कर, अति आरत पुरलोग ।
जहाँ तह सोचा नारिनर, कुस तन राम बियोग ॥
सगुन होहिं सुन्दर सकल, मन प्रसन्न सब केर ।
प्रभु आगमन. जनाव जनु, नगर रम्य चहुँ फेर ॥
कौसल्यादि धातु सब, मन अनन्द अस होइ ।
आयौ प्रभु सिय अनुज जुत, कहन चहत अब कोई ।
भरत नयन भुज दच्छिन, फरकत बारहिं बार ।
जानि सगुन मन हरष व्यति, लागे करन बिचार ।
रहेउ एक दिन अवधि अधारा । समुझत मन दुख भयौ अपारा ॥
कारन कवन नाथ नहि आये। जानि कुटिल किधी मोहि बिसराये ॥१॥
अहह धन्य लछिमन बडभागी। राम-पदारबिन्द अनुरागी॥ऽ
कपटी कुटिल सोहि प्रभु चीन्हा । तात नाथ सङ्ग नहिँ लीन्हा ॥२॥
जाँ करनी सबुझहिँ प्रभु मारी । नहिँ निस्तार कलप सत कोरी ॥
जन अवगुन प्रभु मान न काऊ ! दीनबन्धु अति मृदुल सुभाऊ ॥३॥
मारे जिय भरोस दढ साई । मिलिहहिँ राम सगुन सुभ होई ॥
बीते अवधि रहहिँ जाँ प्रानो । अधम कवन जग मोहि समाना ॥४॥
राम-विरह सागर सह, भरत मगन मन होत ।
वित्र रूप धरि पवन-सुत, आइ गयौ जनु पोत ॥
बैठे देखि कुसासन, जटा-मुकुट कृसगात ।
राम राम रघुपति जपत, ववत नयन जलजात ॥१॥
रामबिरह सागर महँ, भरत मगन मन होत।
बिप्र रूप धरि पवन सुत, आइ गयौ जनु पोत॥
देखत हनूमान अति हरपेड । पुलक गात लोचन जल बरबैंड ॥
मन महँ बहुत भाँति सुख मानी । बोलेउ सवन सुधा सम बानी ॥१॥
जासु बिरह सोचहु दिन राती । रटहु निरन्तर गुन गन पाँती ॥
रघुकुलतिलक सुजन सुख दाता । आयौ कुसल देव मुनि त्राता ॥२॥
रिपु रन जीति सुजस तुर गावत । सीता अनुज सहित प्रभु आवत ॥
सुनत बचन बिसरे सब दूखा । तृषावन्त जिमि पाइ पियूखा ॥३॥
को तुम्ह तात कहाँ से आये । मोहि परम प्रिय बचन सुनाये ॥
मारुतसुत मै कपि हनुमाना । नाम मोर सुनु कृपानिधाना ॥४॥
दीनबन्धु रघुपति कर किहूर । सुनत भरत मैंटेउ उठि सादर ॥
मिलत प्रेम नहि हृदय माता । नयन स्रवत जल पुलकित गाता ॥५॥
कपि तव दरस सकल दुख बीते । सिले आजु मोहि राम पिरीते ॥
बार बार बूकी कुसलाता । तो कह देउँ काह सुनु भ्राता ॥६॥
एहि सन्देस सरिस जग माहीं । करि बिचार देखेउ कछु नाहीं ॥
नाहि न तात उरिन में तोही । अब प्रभु चरित सुनावहु मेआही ॥ ७॥
तब हनुमन्त नाइ पद माथा । कहे सकल रघुपति गुनगाथा ॥
कहु कपि कबहुँ कृपाल गुसाँई । सुमिरहिं मोहि दास की नाँई ॥८॥
निज दास ज्यों रघुबंसभूषन, कबहुँ मम सुमिरन करो ॥ऽ
सुनि भरत बचन बिनीत अति कपि, पुलकितत्त चरनन्हि परघो ।
रघुबीर निजमुख जासु गुनगन, कहत अग जग नाथ जो ।
काहे न होइ बिनीत परम पुनीत सदगुन- सिन्धु सेओ ॥ १ ॥
सागर सरि सर बिपिन अपारा। नाना भाँति शृष्टि बिस्तारा॥
सुर मुनि सिद्ध नाग नर किन्नर। चारि प्रकार जीव सचराचर ॥४॥
जो नहिँ देखा नहिँ सुना, जो मनहूँ न समाइ।
सब अद्भुत देखेउँ, बरनि कवनि बिधि जाइ।
एक एक ब्रह्मांड महँ, रहेउँ वरष सत एक।
एहि बिधि देखत फिरौँ मैं, अंडकटाह अनेक ॥८०॥
लोकलोकप्रति भिन्न बिधाता। भिन्न बिष्नु सिव मनु दिसि त्राता॥
नर गन्धर्व भूत बेताला। किन्नर निसिचर पसु खग ब्याला ॥१॥
देव दनुज गन नाना जाती। सकल जीव तहँ आनहिँ भाँती॥
महि सरि सागर सर गिरि नाना। सब प्रपञ्च तहँ आनहिँ आना ॥२॥
मूल पाठ: rāmacaritamānasa · Hindi Wikisource contributors · Sanskrit Wikisource · CC BY-SA 4.0