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ग्रंथ पाठ

रामचरितमानस · अध्याय 1

1.1

वर्णानामर्थसङ्घनां रसानां छन्दसामपि।
मङ्गलानां च कर्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥१॥

1.2

भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ।
याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम्॥२॥

1.3

वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं, शङ्कररूपिणम्।
यमाश्रितो हि वक्रोपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते॥३॥

1.4

सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ।
वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कवीश्वरकपीश्वरौ॥४॥

1.5

उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्।
सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्॥५॥

1.6

यन्मायावशवर्त्ति विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुराः।
यत्सत्त्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाऽहेर्भ्रमः।
यत्पादप्लव एक एव हि भवास्सोधेस्तितीविताम्।
वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्॥६॥

1.7

नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद्रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि।
स्वान्तःसुखायतुलसी रघुनाथगाथाभाषानिवन्धमतिमञ्जुलमातनोति॥७॥

1.8

रठा-जेहि सुमिरत सिधि होइ, गन-नायक करि-बर-बदन।
करौ अनुग्रह सोइ, बुद्धि-रासि सुभ-गुन-सदन॥
मूक होइ बाचाल, पङ्गु चढै गिरिवर गहन।
जासु कृपा सो दयाल, द्रवौ सकल-कलिमल-दहन॥
नील-सरोरुह-स्याम, तरुन-अरुन-बारिज नयन।
करौ सो मम उर धाम, सदा छीर-सागर-सयन।
कुन्द-इन्दु-सम देह, उमा-रमन करुना-अयन।
जाहि दोन पर नेह, करौ कृपा मर्दन-मयन॥
बन्दौँ गुरु-पद-कञ्ज, कृपा-सिन्धु नर-रूप-हरि।
महामोह-तम-पुञ्ज, जासु बचन-रबि-कर-निकर॥
बन्दौँ गुरु-पद-पदुम-परागा। सुरुचि-सुबास सरस अनुरागा॥
अमिय मूरि-मय चूरन चारू समन सकल-भव-रुज-परिवारू॥१॥

1.9

सुकृत सम्भू-तन विमल बिभूती। मज्जुल मङ्गल-मोद-प्रसूती॥
जन मन मज्जु मुकुर मल हरनी। किये तिलक गुन-गन बस करनी॥२॥

1.10

श्रीगुरु-पद-नख मनि-गन-जोती। सुमिरत दिव्य-दृष्टि हिय होती।
दलन मोह-तम सासु प्रकासू। बडे भाग उर आवै जासू॥३॥

1.11

उघरहिँ बिमल बिलोचन ही के। मिटहिँ दोष दुख भव-रजनी के॥
सूझहिँ रामचरित-मनि-मानिक। गुपुत प्रगट जहँ जो जेहि खानिक॥४॥

1.12

जथा सुअञ्जन अञ्जि दृग, साधक सिद्ध सुजान।
कौतुक देखहिँ सैल बन, भूतल भूरि निधान॥१॥

1.13

गुरु-पद-रज मृदु मञ्जुल अञ्जन। नयन-अमिय दृग दोष बिभञ्जन।
तेहि करि बिमल बिबेक बिलोचन। बरनौँ रामचरित भव-मोचन॥१॥

1.14

बन्दौँ प्रथम महोसुरचरना। माह जनित संसय सब हरना॥
सुजन-समाज सकल-गुन-खानी। करौँ प्रनाम सप्रेम सुबानी॥२॥

1.15

साधु चरित सुभ सरिस कपासू। निरस बिसद गुन-मय फल जासू॥
जो सहि दुख पर-छिद्र दुरावा। वन्दनीय जेहि जग जस पावा॥३॥

1.16

मुद-मङ्गल-मय सन्त-समाजू। जो जग जङ्गम तीरथराजू॥
रामभगति जहँ सुरसरि धारा। सरसै ब्रह्म-विचार-प्रचारा॥४॥

1.17

विधि-निषेध-मय कलिमल-हरनी। करम कथा रविनन्दिनि बरनी॥
हरि-हर-कथा बिराजति बेनी। सुनत सकल-मुद-मङ्गल देनी॥५॥

1.18

बट बिस्वास अचल निज-धर्मा। तीरथराज-समाज सुकर्मा॥
सबहि सुलभ सब दिन सब देसा। सेवत साइर समन कलेसा॥६॥

1.19

अकथ अलौकिक तीरथराऊ। देइ सद्य फल प्रगट प्रमाऊ॥७॥

1.20

सुनि समुझहिँ जन मुदित मन, मज्जहिँ अति अनुराग।
लहहिं चारि-फल अछत-तनु, साधु-समाज प्रयाग॥२॥

1.21

मज्जन फल पेखिय ततकाला। काक होहिं पिक बकौ मराला॥
सुनि आचरज करै जनि कोई। सत-सङ्गति-महिमा नहिँ गाई॥१॥

1.22

बालमीकि नारद घटजोनी। निज निज मुखनि कही निज होनी॥
जलचर थलचर नभचर नाना। जे जड-चेतन जीव जहाना॥२॥

1.23

मति कीरति गति भूति भलाई। जब जेहि जतन जहाँ जेहि पाई॥
जानब सतसङ्ग प्रभाऊ। लोकहु बेद न आन उपाऊ॥३॥

1.24

बिनु सतसङ्ग बिबेक न होई। राम-कृपा-बिनु सुलम न सोई॥
सतसङ्गति मुद-मङ्गल मूला। साइ फल सिधि सब साधन फूला॥४॥

1.25

सठ सुधरहिँ सतसङ्गति पाई। पारस परस कुधातु सुहाई॥
विधि बस सुजन कुसङ्गति परहीं। फनि मनि सभ निज गुन अनुसरहीँ॥५॥

1.26

बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी। कहत साधु-महिमा सकुचानी॥
मो सन कहि जात न कैसे। साक-बनिक मनि-गन-गुन जैसे॥६॥

1.27

बन्दौँ सन्त समान चित, हित अनहित नहिं कोउ।
अञ्जलि-गत सुभ-सुमन जिमि, सम सुगन्ध कर दोउ॥
सन्त सरल चित जगत हित, जानि सुभाउ सनेहु।
बाल बिनय सुनि सुरुचि लखि, राम-चरन-रति देहु॥३॥

1.28

बहुरिवन्दि खलगन सतिभाये। जे बिनु काज दाहिनेहुँ बाँये।
पर-हित-हानि लाभ जिन्ह केरे। उजरे हरष विषाद बसेरे॥१॥

1.29

हरि-हर-जस राकेस राहु से। पर अकाज भट सहसबाहु से॥
जे पर-दोष लखहिँ सहसाखी। परहित घृत जिनके मन माखी॥२॥

1.30

तेज-कृपानु रोष महिषेसा। अघ-अवगुन-धन धनी धनेसा॥
उदय केतु सम हित सबही के। कुम्भकरन सम सोवत नीके॥३॥

1.31

पर अकाज लगि तनु परिहरहीं। जिमि हिम-उपल कृषी दलि गरहीं॥
बन्दौँ खल जस सेष सरोषा। सहस-बदन बरनै पर-दोषा॥१॥

1.32

पुनि प्रनववोँ पृथुराज समाना। पर अघ सुनै सहस-दस-काना॥
बहुरि सक्र सम बिनवौँ तेही। सन्तत सुरा-नीक हित जेही॥५॥

1.33

बचन बज्र जेहि सदा पियारा। सहस-नयन पर दोष निहारा॥६॥

1.34

उदासीन-अरि-मीत-हित, सुनत जरहिं खल रीति।
जानि पानि जुग जीरि जन, विनती करै सप्रीति॥४॥

1.35

में अपनी दिसि कीन्ह निहोरा। तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा॥
बायस पालिय अति अनुरागा। होहिँ निरामिष कबहुँ कि कागा॥१॥

1.36

बन्दौँ सन्त असज्जन चरना। दुख-प्रद-उभय बीच कछु धरना।
मिछुरत एक प्रान हरि लेहीं। मिलत एक दारुन दुख देहीं॥२॥

1.37

उपजहिँ एक सङ्ग जग माहीं। जलज जोँक जिमि गुन बिलगाहीं॥
सुधा सुरा सम साधु असाधू। जनक एक जग जलधि अगाधू॥३॥

1.38

भल अनभलनिजनिज करतूती। लहत सुजस अपलोक बिभूती॥
सुधा-सुधाकर-सुरसरि-साधू। गरल-अनल-कलिमलसरि-ब्याधू॥४॥

1.39

गुन अवगुन जानत सब कोई। जो जेहि भाव नीक तेहि सोई॥५॥

1.40

भलो भलाइहि पै लहै, लहै निचाइहि नीचु।
सुधा सराहिय अमरता, गरल सराहिय मीचु॥५॥

1.41

खल-अघ-अगुन साधु-गुन-गाहा। उभय अपार उदधि अवगाहा॥
तेहि तेँ कछु गुन दोष बखाने। सङ्ग्रह त्याग न बिनु पहिचाने॥१॥

1.42

भलेउ पोच सब विधि उपजाये। गनि गुन दोष बेद बिलगाये॥
कहहिँ बेद इतिहास पुराना। बिधि-प्रपञ्च गुन अवगुन साना॥२॥

1.43

दुख-सुख पाप-पुन्य दिन-राती। साधु-असाधु सुजाति-कुजाती॥
दानव-देव ऊँच अरु नीचू। अमिय सजीवन माहुर मीचू॥३॥

1.44

माया ब्रह्म जीव-जगदीसा। लच्छि-अलच्छि रङ्क-अवनीसा॥
कासी-मग सुरसरि-क्रमनासा। मरु-मालव महिदेव-गवासा॥४॥

1.45

सरग-नरक अनुराग-बिरागा। निगम-अगम गुन-दोष-विभागा॥५॥

1.46

जड-चेतन गुन-दोष मय, बिस्व कीन्ह करतार।
सन्त हंस गुन गहहिँ पय, परिहरि बारि बिकार॥६॥

1.47

अस बिबेक जब देइ बिधाता। तब तजि दोष गुनहि मन राता॥
काल सुभाउ करम बरिआई। अलौ प्रकृति-बस चुकै भलाई॥१॥

1.48

सुधारि हरिजन जिमि लेहीँ। दलि दुख दोष बिमल जस देहीं।
खलौ करहिँ अल पाइ सुसङ्ग। मिटै न मलिन सुभाउ अभङ्गू॥२॥

1.49

लखि सुबेष जग बञ्चक जेऊ। बेष प्रताप पूजियहि तेऊ।
उघरहिँ अन्त न हाइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू॥३॥

1.50

किये कुबेष साधु सनमानू। जिमि जग जामवन्त हनुमानू॥
हानि-कुसङ्ग सुसङ्गति-लाहू। लोकहु बेद बिदित सब काहू॥४॥

1.51

गगन चढै रज पवन प्रसङ्गा। कोचहि मिलै नीच जल सङ्गा॥
साधु-असाधु-सदन सुक सारी। सुमिरहिं राम देहि गनि गारी॥
धूम कुसङ्गति कारिख होई। लिखिय पुरान मज्जु मसि सोई॥
इ जल अनल अनिल सङ्घाता। होइ जलद जग-जीवन-दाता॥६॥

1.52

ग्रह भेषज जल पवन पट, पाइ कुजोग सुजोग।
होहिं कुबस्तु सुबस्तु जग, लखहिँ सुलच्छन लोग।
सम प्रकास तम पाख दुहुँ, नाम भेद बिधि कीन्ह।
ससि पोषक सेओषक समुझि, जग जस अपजस दीन्ह॥
जड चेतन जग जीव जत, सकल राम-मय जानि।
बन्दौँ सब के पद-कमल, सदा जारि जुग पानि॥
देव दनुज नर नाग खग, प्रेत पितर गन्धर्व।
बन्दौँ किन्नर रजनिचर, कृपा करहु अब सर्व॥७॥

1.53

आकर चारि लाख चौरासी। जाति जीव जल-थल-नभ-वासी॥
सीय-राम-मय सब जग जानी। करौँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥१॥

1.54

जानि कृपाकर किङ्कर मोहू। सब मिलि करहु छाडि छल छोहू॥
निजबुधिबल भरोस मोहिँनाहीँ। ता तें बिनय करौँ सब पाहीं॥२॥

1.55

करन चहौँ रघुपति-गुन-गाहा। लघु-मति-मोरि चरित अवगाहा।
सूझ न एकौ अङ्ग उपाऊ। मन-मति-मनोरथ राऊ॥३॥

1.56

मति अति नीच ऊँचि रुचि आछी। चहिय अमिय जग जुरै न छाछी॥
मिहहिँ सज्जन मोरि ढिठाई। सुनिहहिँ बाल बचन मन लाई॥४॥

1.57

जौं बालक कह तोतरि बाता। सुनहिँ मुदित मन पितु अरु माता॥
हँसिहहिँ कूर कुटिल कुबिचारी। जे पर-दूषन भूषन-धारी॥५॥

1.58

निज कबित्त केहि लाग न नीका। सरस होउ अथवा अति फीका॥
जे पर-भनिति सुनत हरषाहीं। ते बर पुरुष बहुत जग नाही॥६॥

1.59

जग बहु नर सरि सर सम भाई। जे निज बाढि बढहि जल पाई।
सज्जन सकृत सिन्धु सम कोई। देखि पूर बिधु बाढड जाई ॥७॥

1.60

भाग छोट अभिलाष बड, करौँ एक बिस्वास।
पैहहिं सुख सुनि सुजन जन, खल करिहहिँ उपहास ॥८॥

1.61

खल परिहास होइ हित मोरा। काक कहहिं कलकंठ कठोरा॥
हंसहि बक दादुर चातकही। हँसहिं मलिन खल बिमल बतकही ॥१॥

1.62

कबित रसिक न राम-पद-नेहू। तिन्ह कहँ सुखद हासरस एहू॥
भाषा भनिति भोरि मति मोरी। हँसिबे जोग हँसे नहिं खोरी॥२॥

1.63

प्रभु-पद-प्रीति न साभुक्ति नीकी। तिन्हहिं कथा सुनि लागिहि फीकी॥
हरि-हर-पद-रति मतिनकुतरकी। तिन्ह कहँ मधुर कथा रघुबर की॥३॥

1.64

रामगति-भूषित जिय जानी। सुनिहहिं सुजन सराहि सुबानी॥
कबि न होउँ नहिँ चतुर प्रबीनू। सकल कला सब बिद्या-हीनू॥१॥

1.65

आखर अरथ अलंकृत नाना। छन्द प्रबन्ध अनेक विधाना॥
भाव-भेद रस-भेद अपारा। कबित दोष-गुन बिबिध प्रकारा॥५॥

1.66

कबित बिबेक एक नहिं मोरे। सत्य कहौँ लिखि कागद कोरे॥६॥

1.67

भनिति मोरि सब गुन रहित, विस्व विदित गुन एक।
बिचारि सुनिहहिँ सुमति, जिन्ह के बिमल बिबेक॥६॥

1.68

एहि महँ रघुपति नाम उदारा। अति पावन पुरान-स्रुति-सारा॥
मङ्गल-भवन अमङ्गल-हारी। उमा सहित जेहि जपत पुरारी॥१॥

1.69

भनिति बिचित्र सुकबि कृत जोऊ। राम नाम बिनु सोह न सोऊ॥
बिपु-बदनी सब भाँति सँवारी। सोह न बसन बिना बर नारी॥२॥

1.70

सब गुन रहित कुकबि कृत बानी। राम नाम जस अङ्कित जानी॥
सादर कहहिँ सुनहि बुध ताही। मधुकर सरिस सन्त गुन-ग्राही॥३॥

1.71

जदपि कबित रस एकौ नाहीं। राम-प्रताप प्रगट एहि माहीं।
इ भरोस मोरे मन आवा। केहि न सुसङ्ग बडप्पन पावा॥१॥

1.72

धूमौ तजै सहज करुआई। अगर प्रसङ्ग सुगन्ध बसाई
भनिति भदेस बस्तु भलि बरनी। राम-कथा जग-मङ्गल-करनी॥५॥

1.73

मङ्गल-करनि कलिमल-हरनि तुलसी कथा रघुनाथ की।
गति कूर कबिता-सरित की ज्योँ सरित-पावन-पाथ की॥
प्रभु सुजस सङ्गति भनिति मलि होइहि सुजन मन-भावनी।
भव-अङ्ग भूति मसान की सुमिरत सुहावनि पावनी॥१॥

1.74

प्रिय लागिहि अति सबहि मम, भनिति ति राम-जस-सङ्ग।
दारु बिचार कि करै कोउ, बन्दिय मलय प्रसङ्ग।
स्याम-सुरभि-पय बिसद अति, गुनद-करहिं सब पान।
गिराग्राम्य सिय-राम-जस, गावहिँ सुनहिँ सुजान॥१०॥

1.75

मनि-मानिक-मुकता-छबि जैसी।अहि-गिरि-गज-सिरसोहनतैसी।
नृप-किरीट तरुनी-तनु पाई। लहहिं सकल सोभा अधिकाई॥१॥

1.76

तैसेहि सुकबि कबित बुध कहहीं। उपजहिँ अनत अनत छबि लहहीं॥
भगति-हेतु बिधि भवन बिहाई। सुमिरत सारद आवति धाई॥२॥

1.77

रामचरितसर बिनु अन्हवाये। सो सम जाइ न कोटि उपाये॥
कबि कोबिद अस हृदय बिचारी। गावहिं हरिजस कलिमल-हारी॥३॥

1.78

कीन्हे प्राकृत-जन गुनगाना। सिर धुनि गिरा लगति पछिताना।
हृदय-सिन्धु मति-सीपि समाना। स्वाती-सारद कहहिँ सुजाना॥४॥

1.79

जौं बरषद बर-बारि बिचारू। होहिँ कबित-मुकता-मनि चारू॥५॥

1.80

जुगुति बेधि पुनि पोहियहि, रामचरित बर ताग।
पहिरहिँ सज्जन बिमल उर, सोभा अति अनुराग॥११॥

1.81

जे जनमे कलिकाल कराला। करतब बायस बेष मराला॥
चलत कुपन्थ बेद-मग छाँडे। कपट-कलेवर कलिमल-भाँडे॥१॥

1.82

बञ्चक भगत कहाइ राम के। किङ्कर कञ्चन कोह-काम के।
तिन्ह महँ प्रथम रेख जग मारी। धिक धरमध्वज धन्धक धोरी॥२॥

1.83

जौं अपने अवगुन सब कहऊँ। बाढै कथा पार नहिँ लहऊँ॥
तातेँ मैं अति अलप बखाने। थोरे महँ जानिहहिँ सयाने॥३॥

1.84

समुझि बिबिध बिधि बिनती मोरी। कोउ न कथा सुनि देइहि खोरी॥
एतेहु पर करिहहिं जे सङ्का। मोहि ते अधिक ते जड मति-रक्षा॥४॥

1.85

कबि न होउँ नहिं चतुर कहावौँ। मति अनुरूप राम-गुन गावौँ॥
कहँ रघुपति के चरित अपारा। कहँ मति मोरि निरत संसारा॥५॥

1.86

जेहि मारुत गिरि मेरु उडाहीँ। कहहु तूल केहि लेखे माहीं॥
समुझत अमित राम प्रभुताई। करत कथा मन अति कदराई॥६॥

1.87

सारद सेष महेस बिधि, आगम निगम पुरान।
नेति नेति कहि जासु गुन, करहिं निरन्तर गान॥१२॥

1.88

सब जानत प्रभु प्रभुता सोई। तदपि कहे बिनु रहा न कोई॥
तहाँ बेद अस कारन राखा। भजन प्रभाउ भाँति बहु भाखा॥१॥

1.89

एक अनीह अरूप अनामा। अज सच्चिदानन्द परधामा॥
व्यापक बिस्व-रूप भगवाना। तेहि धरि देह चरित कृत नाना॥२॥

1.90

केवल भगतन्ह हित लागी। परम कृपाल प्रनत-अनुरागी॥
जेहि जन पर ममता अति छोहू। जेहिं करुना करि कीन्ह न कोहू॥३॥

1.91

गई बहोर गरीब-नेवाजू। सरल सबल साहिब रघुराजू॥
बुध बरनहिँ हरिजस अस जानी। करहिं पुनीत सुफल निज-बानी॥४॥

1.92

तेहि बल मैं रघुपति गुन-गाथा। कहिहौँ नाइ राम-पद माथा।
मुनिन्ह प्रथम हरि-कीरति गाई। तेहि मग चलत सुगम मोहि भाई॥५॥

1.93

अति अपार जे सरित बर, जौँ नृप सेतु कराहिँ।
चढि पिपीलिकौ परम-लघु, बिनु स्रम पारहि जाहि॥१३॥

1.94

एहि प्रकार बल मनहिँ देखाई। करिहौँ रघुपति कथा सुहाई॥
व्यास-आदिकबि-पुङ्गव नाना। जिन्ह सादर हरि सुजस बखाना॥१॥

1.95

चरन-कमल बन्दौँ तिन्ह केरे। पुरवहुँ सकल मनोरथ मेरे॥
कलि के कबिन्ह करौँ परनामा। जिन्ह बरने रघुपति-गुन-ग्रामा॥२॥

1.96

जे प्राकृति कबि परम सयाने। भाषा जिन्ह हरि चरित बखाने॥
भये जे अहहिं जे होइहहिं आगे। प्रनवौँ सबहि कपट छल त्यागे॥३॥

1.97

होहु प्रसन्न देहु बरदानू। साधु-समाज भनिति सनमानू॥
जो प्रबन्ध बुध नहिं आदरही। सो बम बादि बाल-कबि करहीं ॥४॥

1.98

कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई॥
राम-सुकीरति भनिति भदेसा। असमञ्जस अस हमहिँ अँदेसा॥५॥

1.99

तुम्हरी कृपा सुलभ सोउ मोरे। सियनि सुहावनि टाट पटोरे॥६॥

1.100

सरल कबित कीरति बिमल, सोइ आदरहिं सुजान।
सहज बयर बिसराइ रिपु, जो सुनि करहिँ बखान॥
न होइ बिनु बिमल मति, मोहि मति-बल अति थोर।
करौ कृपा हरि-जस कहौँ, पुनि पुनि करौँ निहोर॥
कबि कोबिद रघुबर-चरित, मानस मञ्जु मराल।
बाल-बिनय सुनि सुरुचि लखि, मो पर होहु कृपाल॥
बन्दौँ मुनि-पद-कञ्जु, रामायन जेहिं निरमयेउ।
सखर सकोमल मञ्जु, दोष-रहित दूषन-सहित॥
बन्दौँ चारिउ बेद, भव-बारिधि-बोहित सरिस।
जिन्हहिं न सपनेहुँ खेद, बरनत रघुवर-बिसद-जस॥
बन्दौँ बिधि-पद-रेनु, भव-सागर जेहि कीन्ह जहँ।
सन्त-सुधा-ससि-धेनु, प्रगटे खल-विष-बारुनी॥
बिबुध बिप्र बुध ग्रह चरन, बन्दि कहौँ कर जोरि।
होइ प्रसन्न पुरवहु सकल, मञ्जु मनोरथ मोरि॥१४॥

1.101

पुनि बन्दौँ सारद सुरसरिता। जुगल पुनीत मनोहर-चरिता॥
मज्जन पान पाप हर एका। कहत सुनत एक हर अबिबेका॥१॥

1.102

गुरु पितु मातु महेस-भवानी। प्रनवौँ दीनबन्धु दिन-दानी॥
सेवक स्वामि सखा सिय-पीके। हितनिरुपधि सब विधि तुलसी के॥२॥

1.103

कलि बिलोकि जग-हित हर-गिरजा। साबर मन्त्र जाल जिन्ह सिरजा।
अनमिल आखर अरथ न जापू। प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू॥३॥

1.104

महेस मोहि पर अनुकूला। करौँ कथा मुद-मङ्गल-मूला॥
सुमिरि सिवा-सिव पाइ पसाऊ। बस्नौँ रामचरित चित-चाऊ॥४॥

1.105

भनिति मोरि सिव कृपा बिभाती। ससि-समाज मिलि मनहुँ सुराती।
जे एहि कथहि सनेह-समेता। कहिहहिँ सुनिहहिँ समुझि सचेता॥५॥

1.106

होइहहिँ राम-चरन-अनुरागी। कलिमल-रहित सुमङ्गल-भागी॥६॥

1.107

सपनेहुँ साँचेहु मोहि पर, जौँ हर-गौरि-पसाउ।
तौ फुर होउ जो कहौँ सब, भाषा-भनिति-प्रभाउ॥१५॥

1.108

बन्दौँ अवधपुरी अतिपावनि। सरजू-सरि कलि-कलुष-नसावनि॥
प्रनवौँ पुर-नर-नारि बहोरी। ममता जिन्ह पर प्रभुहि न थोरी॥१॥

1.109

सिय-निन्दक अघ-ओघ नसाये। लोक बिसाक बनाइ बसाये।
बन्दौँ कौसल्या दिसि प्राची। कीरति जासु सकल जग माची॥२॥

1.110

प्रगटेउ जहँ रघुपति ससि चारू। बिस्व-सुखद खल-कमल-तुसारू॥
दसरथ राउ सहित सब रानी। सुकृत-सुमङ्गल मूरति मानी॥३॥

1.111

करौँ प्रनाम करम-मन-बानी। करहु कृपा सुत-सेवक जानी॥
जिन्हहिँ बिरचि बडभयौ विधाता। महिमा-अवधि राम-पितु-माता॥४॥

1.112

बन्दौँ अवध भुआल, सत्य प्रेम जेहि राम पद।
बिछुरत दीनदयाल, प्रिय तनु तृन इव परिहरेउ॥१६॥

1.113

प्रनवौँ परिजन सहित बिदेहू। जाहि राम-पद गूढ-सनेहू॥
जोग भोग महँ राखेउ गोई। राम बिलोकत प्रगटेउ सोई॥१॥

1.114

प्रनवौँ प्रथम भरत के चरना। जासु नेम ब्रत जाइ न बरना॥
राम-चरन-पङ्कज मन जासू। लुबुध मधुप इव तजै न पासू॥२॥

1.115

बन्दौँ लछिमन-पद-जल जाता । सीतल सुभग भगत-सुखदाता॥
रघुपति कीरति बिमल पताका। दंड-समान भयौ जस जाका॥३॥

1.116

सेष सहस्त्र-सीस जग कारन। जो अवतरेउ भूमि-भय-टारन॥
सदासा सानुकूल रह मा पर। कृपासिन्धु सौमित्रि गुनाकर॥४॥

1.117

रिपुसूदन पद कमल नमामी। सूर सुसील भरत अनुगामी॥
महाबीर बिनवौँ हनुमाना। राम जासु जस आपु बखाना॥५॥

1.118

प्रनवौँ पवन कुमार, खल बन पावक ज्ञान घन।
जासु हृदय आगार, बसहिं राम सर चाप धर॥१७॥

1.119

ची॰ – कपिपति रीछ निसाचर राजा। अङ्गदादि जे कीस-समाजा॥
बन्दौँ सब के चरन सुहाये। अधम-सरीर राम जिन्ह पाये॥१॥

1.120

रघुपति चरन उपासक जेते। खग मृग सुर नर असुर समेते॥
घन्दौँ पद-सरोज सघ केरे। जे बिनु काम राम के चेरे॥२॥

1.121

सुक सनकादि भगत मुनि नारद। जे मुनिवर बिज्ञान बिसारद॥
प्रनवौँ सबहिँ धरनि धरि सीसा। करहु कृपा जन जानि मुनीसा॥३॥

1.122

जनक-सुता जग-जननि जानकी। अतिसय प्रिय करना निधान की।
ताके जुग-पद-कमल मनावौँ। जासु कृपा निरमल मति पावौँ॥४॥

1.123

पुनि मन-बचन-करम रघुनायक। चरन-कमल बन्दौँ सब लायक॥
राजिव-नयन धरे धनु-सायक। भगत-विपति-मञ्जन सुखदायक॥५॥

1.124

गिरा-अरथ जल-बीचि सम, कहियत भिन्न न भिन्न।
बन्दौँ सीता-राम-पद, जिन्हहि परम प्रिय खिन्न॥८॥

1.125

बन्दौँ नाम राम रघुबर को। हेतु कृसानु-भानु-हिमकर को।
बिधि-हरि-हर-मय-बेद-प्रान सो। अगुन अनूपम गुन-निधान सो॥१॥

1.126

महा मन्त्र जोइ जपत महेसू। कासी मुकुति हेतु उपदेसू॥
महिमा जासु जान गनराऊ। प्रथम पूजियत नाम प्रभाऊ॥२॥

1.127

जान आदिकबि नाम-प्रतापू। भयौ सुद्ध करि उलटा जापू॥
सहस-नाम-सम सुनि सिव बानी। जपि जेँई पिय सङ्ग भवानी॥३॥

1.128

हरषे हेतु हेरि हर ही को। किय भूषन तिय भूषन ती को।
नाम प्रभाव जान सिव नीको। कालकूट फल दीन्ह अमी को॥४॥

1.129

बरषा रितु रघुपति भगति, तुलसी सालि सुदास।
राम नाम बर बरन जुग, सावन भादवँ मास॥१६॥

1.130

आखर मधुर मनोहर दोऊ। बरन बिलोचन जन जिय जोऊ॥
सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू। लोक-लाहु परलोक-निबाहू॥१॥

1.131

कहत सुनत सुमिरत सुठि नीके। राम-लखन-सम प्रिय तुलसी के॥
बरनत बरन प्रीति बिलगाती। ब्रह्म-जीव-सम सहज-सँघाती॥२॥

1.132

नर-नारायन-सरिस सुभ्राता। जग पालक बिसेष जन त्राता॥
भगति-सुतिय कल करन-बिभूषन। जग-हित-हेतु बिमल बिधु-पूषन॥३॥

1.133

स्वाद तोष सम सुगति सुधा के। कमठ सेष सम धर बसुधा के॥
जन-मन-मञ्जु-कञ्ज-मधु कर से। जीह जसोमति हरि हलधर से॥४॥

1.134

एक छत्र एक मुकुट-मनि, सब बरनन्हि पर जोउ।
तुलसी रघुबर नाम के, बरन बिराजित दोउ॥२०॥

1.135

समुझत सरिस नाम अरु नामी। प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी॥
नाम रूप दुई ईस उपाधी। अकथ अनादिसुसामुझि साधी॥१॥

1.136

को बड छोट कहत अपराधू। सुनि गुन भेद समुझिहहिँ साधू॥
देखिअहि रूप नाम-आधीना। रूप-ज्ञान नहि नाम बिहीना॥२॥

1.137

रूप बिसेष नाम बिनु जाने। करतल गत न परहिँ पहिचाने।
सुमिरिय नाम रूप बिनु देखे। आवत हृदय सनेह बिसेखे॥३॥

1.138

नाम-रूप-गुन अकथ कहानी। समुझत सुखद न परति बखानी॥
अगुन सगुन बिच नाम सुसाखी। उभय प्रबोधक चतुर दुभाखी॥४॥

1.139

राम-नाममनि-दीप धरु, जीह देहरी-द्वार।
तुलसी भीतर बाहरहुँ, जौं चाहसि उँजियार॥२१॥

1.140

नाम जीह जपि जागहीँ जोगी। विरति बिरञ्चि प्रपञ्च वियोगी।
ब्रह्म सुखहि अनुभवहिँ अनूपा। अकथ अनामय नाम न रूपा॥१॥

1.141

जाना चहहिं गूढ गति जेऊ। नाम जीह जपि जानहिँ तेऊ॥
साधक नाम जपहिं लव लाये। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाये॥२॥

1.142

जपहिँ नाम जन आरत भारी। मिटहिँ कुसङ्कट होहिं सुखारी॥
राम भगत जग चारि प्रकारा। सुकृती चारिउ अनघ उदारा॥३॥

1.143

चहूँ चतुर कहँ नाम अधारा। ज्ञानी प्रभुहि बिसेष पियारा॥
चहुँ जुग चहुँ स्रुति नाम प्रभाऊ। कलि बिसेष नहिँ आन उपाऊ॥४॥

1.144

सकल कामना हीन जे, राम भगति रस लीन।
नाम प्रेम पीयूष हृद, तिन्हहूँ किये मन मोन॥२२॥

1.145

अगुनसगुनदुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा॥
मारे मत बड नाम दुहूँ ते। कियजेहि जुगनिज बस निज बूते॥१॥

1.146

प्रौढ सुजन जनि जानहिं जन की। कहौँ प्रतीति प्रीति रुचि मन की॥
एक दारु गत देखिय एकू। पावक सम जुग ब्रह्म बिबेकू॥२॥

1.147

उभय अगम जुग सुगम नाम तेँ। कहौँ नाम बड ब्रह्म राम तें॥
व्यापक एक ब्रह्म अबिनासी। सत चेतन घन आनँद रासी॥३॥

1.148

अस प्रभु हृदय अछत अबिकारी। सकल जीव जग दीन दुखारी॥
नाम निरूपन नाम जतन तें। सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें॥४॥

1.149

निरगुन ते एहि भाँति बड, नाम प्रभाउ अपार।
कहौँ नाम बड राम तें, निज बिचार अनुसार॥२३॥

1.150

राम भगत हित नर तनु धारी। सहि सङ्कट किय साधु सुखारी॥
नाम सप्रेम जपत अनयासा। भगत होहिँ मुद मङ्गल बासा॥१॥

1.151

राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति सुधारी॥
रिषि हित राम सुकेतुसुताकी। सहित सेन सुत कीन्ह बिबाकी॥२॥

1.152

सहित दोष-दुख दास दुरासा। दलै नाम जिमि रबि निसि नासा॥
भञ्जेउँ राम आपु भवचापू। भव-भय-अञ्जन नाम-प्रतापू॥३॥

1.153

दंडक बन प्रभु कीन्ह सुहावन। जन-मन-अमित नाम किय पावन॥
निसिचर-निकर दले रघुनन्दन। नाम सकल-कलि-कलुष निकन्दन॥४॥

1.154

सबरी गीध सुसेवकनि, सुगति दीन्हि रघुनाथ।
नाम उधारे अमित खल, बेद बिदित गुन-गाथ॥२४॥

1.155

राम सुकंठ बिभीषन दोऊ। राखे सरन जान सब कोऊ॥
नाम गरीब अनेक निवाजे। लोक बेद बर बिरद बिराजे॥१॥

1.156

राम भालु-कपि-कटक बटोरा। सेतु-हेतु स्रम कीन्ह न थोरा॥
नाम लेत भव-सिन्धु सुखाहीं। करहु विचार सुजन मन माहीं॥२॥

1.157

राम सकुल-रन-रावन मारा। सीय सहित निज-पुर पग धारा॥
राजा राम अवध रजधानी। गावत गुन सुर-मुनि-बर-बानी॥३॥

1.158

सेवक सुमिरत नाम सप्रीती। बिनु सम प्रबल मोह दल जीती॥
फिरत सनेह-मगन सुख अपने। नाम प्रसाद सोच नहिँ सपने॥४॥

1.159

ब्रह्म-राम-तेँ नाम बड, बरदायक बरदानि।
रामचरित-सतकोटि महँ, लिय महेस जिय जानि॥२॥

1.160

नाम प्रसाद सम्भु अबिनासी। साज-अमङ्गल मङ्गल-रासी।
सुक सनकादि सिद्ध मुनि जोगी। नाम-प्रसादब्रह्म-सुख-भोगी॥१॥

1.161

नारद जानेउ नाम प्रतापू। जग-प्रिय-हरि हरि-हर-प्रिय आपू॥
नाम जपत प्रभु कीन्ह प्रसादू। भगत-सिरोमनि भे प्रहलादू॥२॥

1.162

ध्रुव सगलानि जपेउ हरि-नाऊँ। पायौ अचल अनूपम ठाऊँ।
सुमिरि पवन-सुत पावन नामू। अपने बस करि राखे रामू ॥३॥

1.163

अपत अजामिल गज गनिकाऊ। भये मुकुत हरि नाम प्रभाऊ॥
कहौँ कहाँ लगि नाम बडाई। राम न सकहिं नाम-गुन गाई॥४॥

1.164

नाम राम को कल्पतरु, कलि कल्यान-निवास।
जो सुमिरत भयो भाँग तें, तुलसी तुलसीदास॥२६॥

1.165

चहुँ जुग तीनि काल तिहुँ लोका। भये नाम जपि जीव विसोका॥
बेद-पुरान-सन्त मत एहू। सकल सुकृत फल राम सनेहू॥१॥

1.166

ध्यान प्रथम जुग मख विधि दूजे। द्वापर परितोषन प्रभु पूजे॥
कलि केवल मल मूल मलीना। पाप पयोनिधि जन मन मीना॥२॥

1.167

नाम कामतरु काल कराला। सुमिरत समन सकल जग जाला॥
राम नाम कलि अभिमत दाता। हित परलोक लोक पितु माता॥३॥

1.168

नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलम्बन एकू॥
कालनेमि कलि कपट निधानू। नाम सुमति समरथ हनुमानू॥४॥

1.169

राम नाम नरकेसरी, कनककसिपु कलिकाल।
जापक जन प्रहलाद जिमि, पालिहि दलि सुर साल॥२७॥

1.170

भाय कुभाय अनख आलसहूँ। नाम जपत मङ्गल दिसि दसहूँ॥
सुमिरि सो नाम राम गुनगाथा। करौँ नाइ रघुनाथहि माथा॥१॥

1.171

मोरि सुधारिहि सोसब भाँती। जासु कृपा नहिँ कृपा अघाती॥
राम सुस्वामि कुसेवक मो सो। निज दिसि देखि दयानिधि पोसो॥२॥

1.172

लोकहु बेद सुसाहिब रीती। बिनय सुनत पहिचानत प्रीती॥
गनी गरीब ग्राम नर नागर। पंडित मूढ मलीन उजागर॥३॥

1.173

सुकबि कुकबि निज-मति-अनुहारी। नृपहि सराहत सब नर नारी॥
साधु सुजान सुसील नृपाला। ईस-अंस-भव परम कृपाला॥४॥

1.174

सुनि सनमानहि सबहि सुबानी। भनिति भगति नति गति पहिचानी॥
यह प्राकृत महिपाल सुभाऊ। जान-सिरोमनि कोसलराऊ॥५॥

1.175

रीझत राम सनेह निसाते। को जग मन्द मलिन-मन मो ते॥६॥

1.176

सठ सेवक की प्रीति रुचि, रखिहहिँ राम कृपालु।
उपल किये जलजान जेहि, सचिव सुमति कपि भालु॥
हौँहुँ कहावत सब कहत, राम सहत उपहास।
साहिब सीतानाथ से, सेवक तुलसीदास॥२८॥

1.177

अति बडि मोरि ढिठाई खोरी। सुनि अघ नरकहुनाक सिकोरी॥
समुझिसहममोहिअपडरअपने। सो सुधि राम कीन्ह नहिं सपने॥१॥

1.178

सुनि अवलोकि सुचित चख चाही। भगति मोरि मति स्वामि सराही॥
कहत नसाइ होइ हिय नीकी। रीझत राम जानि जन जी की॥२॥

1.179

रहति न प्रभु चित चूक किये की। करत सुरति सय बार हिये की॥
जेहि अघ बधेउ ब्याध इव बाली। फिरि सुकंठ सोइ कीन्हि कुचाली॥३॥

1.180

इ करतूति बिभीषन केरी। सपनेहुँ सो न राम हिय हेरी॥
ते भरतहि भेँटत सनमाने। राज-सभा रघुबीर बखाने॥
प्रभु तरु तर कपि डार पर, ते किय आपु समान।
तुलसी कहीं न राम से, साहिब सील-निधान॥
राम निकाई रावरी, है सबही को नीक।
जौं यह साँची है सदा, तौ नीको तुलसीक॥
एहि बिधि निज गुन दोष कहि, सबहि बहुरि सिर नाइ।
बरनौँ रघुबर-बिसद-जस, सुनि कलि कलुष नसाइ॥२६॥

1.181

जागबलिक जो कथा सुहाई। भरद्वाज मुनिबरहि सुनाई॥
कहिहौँ सोइ सम्बाद बखानी। सुनहु सकल सज्जन सुख मानी॥१॥

1.182

सम्भु कीन्ह यह चरित सुहावा। बहुरि कृपा करि उमहि सुनावा॥
इ शिव कागभुसुंडिहि दीन्हा। रामभगति अधिकारी चीन्हा॥२॥

1.183

तेहि सन जागबलिक पुनि पावा। तिन्ह पुनि मरवाज प्रति गावा॥
ते खोता बकता सम सीला। समदरसी जानहिँ हरिलीला॥३॥

1.184

जानहिँ तीनि काल निज-ज्ञाना। करतल गत आमलक समाना।
औरौ जे हरिभगत सुजाना। कहहिँ सुनहिँ समुझहिँ विधि नाना॥४॥

1.185

मैं पुनि निज गुरुसन सुनी, कथा सो सूकरखेत।
समुझी नहिँ तसि बालपन, तब अति रहेउँ अचेत॥
सीता बकता ज्ञान-निधि, कथा राम के गूढ।
किमि समुझौँ में जीव जड, कलिमल ग्रसित-बिमूढ॥३०॥

1.186

तदपिकही गुरुबारहि बारा। समुझि परी कछु भति अनुसारा।
भाषाबद्ध करब मैं सोई। मोरे मन प्रबोध जेहि हाई॥१॥

1.187

जस कछु बुधि-बिबेक-बल मेरे। तस कहिहौँ हिय हरि के प्रेरे॥
निज सन्देह-मोह-भ्रम-हरनी। करौँ कथा भव-सरिता-तरनी॥२॥

1.188

बुध-बिस्राम सकल-जन-रञ्जनि। राम-कथा कलि-कलुष-बिभञ्जनि॥
रामकथा-कलि-पन्नग-भरनी। पुनि बिबेक-पावक कहँ अरनी॥३॥

1.189

रामकथा कलि कामद गाई। सुजन सजीवनि मूरि सुहाई॥
इ बसुधातल सुधा तरङ्गिनि। भय भञ्जनि भ्रम भेक भुअङ्गिनि॥४॥

1.190

असुर सेन सम नरक निकन्दिनि। साधु बिधुध कुल हित गिरिनन्दिनि।
सन्त समाज पयोधि रमा सी। बिस्व भार भर अचल छमा सी॥५॥

1.191

जमगन मुँह मसि जग जमुना सी। जीवन मुकुति हेतु जनु कासी॥
रामहि प्रिय पावनि तुलसी सी। तुलसिदास हित हिय हुलसी सी॥६॥

1.192

सिव प्रिय मेकल सैल सुता सी। सकल सिद्धि सुख सम्पतिरासी।
सदगुन मुरगन अम्ब अदिति सी। रघुवर भगति प्रेम परमिति सी॥७॥

1.193

रामकथा मन्दाकिनी, चित्रकूट चित चारु।
तुलसी सुभग सनेह बन, सिय रघुबीर बिहारु॥३१॥

1.194

राम चरित चिन्तामनि चारू। सन्त सुमति तिय सुभग सिंगारू॥
जग मङ्गल गुन ग्राम राम के। दानि मुकुनि धन धरम धाम के॥१॥

1.195

सदगुरु ज्ञान बिरोग-जोग के। बिबुध बैद भव भीम रोग के।
जननि जनक सिय राम प्रेम के। बीज सकल ब्रत धरम नेम के॥२॥

1.196

समन पाप सन्ताप सोक के। प्रिय पालक परलोक लोक के॥
सचिव सुभट भूपति बिचार के। कुम्भज लोभ उदधि अपार के॥३॥

1.197

काम-कोह कलिमल करि गन के। केहरि सावक जन मन बन के॥
अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के। कामद घन दारिद दवारि के॥४॥

1.198

मन्त्र महा मनि बिषय ब्याल के। मेटत कठिन कुअङ्क भाल के॥
हरन मोह तम दिनकर कर से। सेवक सालि पाल जलधर से॥५॥

1.199

अभिमत दानि देवतरु बर से। सेवत सुलभ सुखद हरि हर से॥
सुकबि सरद नभ मन उडुगन से। राम भगत जन जीवन धन से॥६॥

1.200

सकल सुकृत फल भूरि भोग से। जग हित निरुपधि साधु लोग से॥
सेवक मन मानस मराल से। पावन गङ्ग तरङ्ग माल से॥७॥

1.201

कुपथ कुतर्क कुचाल कलि, कपट दम्भ पाखंड।
दहन राम गुनग्राम जिमि, ईंधन अनल प्रचंड॥
रामचरित राकेस कर, सरिस सुखद सब काहु।
सज्जन कुमुद चकोर चित, हित बिसेष बड लाहु॥३२॥

1.202

कीन्ह प्रस्न जेहि भाँति भवानी। जेहि विधि सङ्कर कहा बखानी॥
सब हेतु कहब मैं गाई। कथा प्रबन्ध विचित्र धनाई॥१॥

1.203

जेहि यह कथा सुनी नहिं होई। जनि आचरज करै सुनि सोई॥
कथा अलौकिक सुनहिँ जे ज्ञानी। नहिँ आचरज करहिं अस जानी॥२॥

1.204

राम कथाकै मिति जग नाहीँ। अस प्रतीति तिन्ह के मन माहीँ॥
नाना भाँति राम अवतारा। रामायन सतकोटि अपारा॥३॥

1.205

कपल भेद हरिचरित सुहाये। भाँति अनेक मुनीसन्ह गाये॥
करिय न संसय अस उर आनी। सुनिय कथा सादर रति मानी॥४॥

1.206

राम अनन्त अनन्त गुन, अमित कथा विस्तार।
सुनि आचरज न मानिहहिँ, जिन्ह के बिमल विचार॥३३॥

1.207

यहि बिधि सब संसय करि दूरी। सिर धरि गुरु पद पङ्कज धूरी॥
पुनि सबही प्रनवौँ कर जोरी। करत कथा जेहि लाग न खोरी॥१॥

1.208

सादर सिवहि नाइ अब माथा। बरनौँ बिसद राम गुन गाथा॥
सम्बत सोरह सै इकतीसा। करौँ कथा हरि पद धरि सीसा॥२॥

1.209

नौमी भौमबार मधु मासा। अवधपुरी यह चरित प्रकासा॥
जेहि दिन राम जनम स्रुति गावहिँ। तीरथ सकल तहाँ चलि आवहि॥३॥

1.210

असुर नाग खग नर मुनि देवा। आइ करहिँ रघुनायक सेवा॥
जन्म महोत्सव रचहिँ सुजाना। करहिं राम कल कीरति गाना॥४॥

1.211

मज्जहिँ सज्जन बृन्द बहु, पावन सरजू नीर।
जपहिँ राम धरि ध्यान उर, सुन्दर स्याम सरीर॥३४॥

1.212

दरस परस मज्जन अरु पाना। हरई पाप कह बेद पुराना॥
नदी पुनीत अमित महिमा अति। कहि न सकैसारदाबिमल मति॥१॥

1.213

राम धामदा पुरी सुहावनि। लोक समस्त विदित अति पावनि॥
चारि खानि जग जीव अपारा। अवध तजे तन नहिँ संसारा॥२॥

1.214

सब बिधि पुरी मनोहर जानी। सकल सिद्धि प्रद मङ्गल खानी॥
बिमल कथा कर कीन्ह अरम्भा। सुनत नसाहिँ काम मद दम्भा॥३॥

1.215

रामचरितमानस एहि नामा। सुनत स्रवन पाइय बिस्रामा॥
मन करि विषय अनल बन जरई। होइ सुखी जौँ एहि सर परई॥४॥

1.216

रामचरितमानस मुनि भावन। बिरचेउ सम्भु सुहावन पावन॥
त्रिबिध दोष दुःख दारिद दावन। कलि कुचालिकुलि कलुष नसावन॥५॥

1.217

रचि महेस निज मानस राखा। पाइ सुसमौ सिवा सन भाखा॥
तातें रामचरितमानस बर। धरेउ नाम हिय हेरि हरषि हर॥६॥

1.218

कहौँ कथा सोइ सुखद सुहाई। सादर सुनहु सजन मन लाई॥७॥

1.219

जस मानस जेहि बिधि भयौ, जग प्रचार जेहि हेतु॥
अब सोइ कहौँ प्रसङ्ग सब, सुमिरि उमा बृषकेतु॥३५॥

1.220

सम्भु प्रसाद सुमतिहिय हुलसी। रानचरितमानस कबि तुलसी॥
करै मनोहर मति अनुहारी। सुजन सुचित सुनि लेहु सुधारी॥१॥

1.221

सुमति भूमि थल हृदय अगाधू। बेद पुरान उदधि घन साधू॥
बरषहिं राम सुजस घर बारी। मधुर मनोहर मङ्गलकारी॥२॥

1.222

लीला सगुन जो कहहिँ बखानी। सोइ स्वच्छता करई मलहानी॥
प्रेम भगति जो बरनि न जाई। सोइ मधुरता सुसीतलताई॥३॥

1.223

जल सुकृत-सालि हित होई। रामभगत जन जीवन साई॥
मेधा महि गत से जल पावन। सकिलि स्रवन मगचलेउ सुहावन॥४॥

1.224

भरेउ सुमानस सुथल थिराना। सुखद सीत रुचि चारु चिराना॥५॥

1.225

सुठि सुन्दर सम्बाद बर, बिरचे बुद्धि बिचारि।
तेइ एहि पावन सुभग सर, घाट मनोहर चारि॥३६॥

1.226

सप्त प्रबन्ध सुजग सोपाना। ज्ञान-नयन निरखत मन माना॥
रघुपति-महिमा अगुन अबाधा। बरनब सोइबर बारि अगाधा॥१॥

1.227

राम-सीय जस सलिल सुधासम। उपमा बीचि बिलास मनोरम॥
पुरैन सघन चारु चौपाई। जुगुति मञ्जु मनि सीप सुहाई॥२॥

1.228

न्द सोरठा सुन्दर दोहा। सोइ बहु रङ्ग कमल कुल सोहा॥
अरथ अनूप सुभाव सुभासा। सोइ पराग मकरन्द सुबासा॥३॥

1.229

सुकृत पुज मञ्जुल अलिमाला। ज्ञान बिराग बिचार मराला॥
धुनि अवरेब कबित गुन जाती। मीन मनोहर ते बहु भाँती॥४॥

1.230

अरथ धरम कमादिक चारों। कहब ज्ञान बिज्ञान बिचारी॥
नवरंस जप तप जोग बिरागा। ते सब जलचर चारु तडागा॥५॥

1.231

सुकृती साधु नाम गुन गानो। ते बिचित्र जल बिहँग समाना॥
सन्तसभा चहुँ दिसि अँबराई। स्रद्धा रितु बसन्त सम गाई॥६॥

1.232

भगति निरूपन बिबिध बिधाना। छमा दया दम लता बिताना॥
सम जम नियम फूल फल ज्ञाना। हरि पद रति रस बेद बखाना॥७॥

1.233

औरौ कथा अनेक प्रसङ्गा। तेइ सुक पिक बहु बरन विहङ्गा॥८॥

1.234

पुलक बाटिका-बाग बन, सुख सुविहङ्गविहारु।
माली सुमन सनेह जल सींचत लोचन चारु॥३७॥

1.235

जे गावहिं यह चरित सँभारे। तेइ एहि ताल चतुर रखवारे॥
सदा सुनहिँ सादर नर नारी। तेइ सुर बर मानस अधिकारी॥१॥

1.236

अति-खल जे विषयी बक कागा। एहि सर निकट न जाहिँ अभागा॥
सम्बुक भेक सिवार समाना। इहाँ न विषय कथा-रस नाना॥२॥

1.237

तेहि कारन आवत हिय हारे। कामी काक बलाक बिचारे॥
आवत एहि सर अति कठिनाई। राम कृपा बिनु आइ न जाई॥३॥

1.238

कठिन कुसङ्ग कुपन्थ कराला। तिन्ह के बचन बाघ हरि व्याला॥
गृह कारज नाना जञ्जाला। तेइ अति दुर्गम सैल बिसाला॥४॥

1.239

बन बहु विषम मोह मद माना। नदी कुतर्क भयङ्कर नाना॥५॥

1.240

जे स्रद्धा सम्बल रहित, नहिँ सन्तन्ह कर साथ।
तिन्ह कहँ मानस अगम अति, जिन्हहि न प्रिय रघुनाथ॥३८॥

1.241

जौं करि कष्ट जाइ पुनि कोई। जातहि नीद जुडाई होई॥
जडता जाड विषम उर लागा। गयहुन मज्ज न पाव अभागा॥१॥

1.242

करि न जाइ सर मज्जन पाना। फिरि आवै समेत अभिमाना।
जौँ बहोरि कोउ पूछन आवा। सर निन्दा करि ताहि बुझावा॥२॥

1.243

सकल विघ्न ब्यापहिँ नहिँ तेही। राम सुकृपा बिलोकहिं जेही॥
इ सादर मज्जन सर करई। महाघोर त्रय ताप न जरई॥३॥

1.244

ते नर यह सर तजहिँ न काऊ। जिन्ह के राम चरन भल भाऊ॥
जो नहाइ चह एहि सर भाई। सो सतसङ्ग करौ मन लाई॥४॥

1.245

अस मानस मानस चष चाही। भै कबि बुद्धि बिमल अवगाही॥
भयौ हृदय आनन्द उछाहू। उमगेउ प्रेम प्रमोद प्रबाहू॥५॥

1.246

चली सुभग कबिता सरिता सी। राम बिमल जस जल भरिता सो॥
सरजू नाम सुमङ्गल मूला। लोक बेद मत मञ्जुल कूला॥६॥

1.247

नदी पुनीत सुमानस नन्दिनि। कलिमल त्रिन तरु मूल निकन्दिनि॥७॥

1.248

स्रोता त्रिविधि समाज पुर, ग्राम नगर दुहुँ कूल।
सन्त सभा अनुपम अवध, सकल सुमङ्गल मूल॥३॥

1.249

रामभगति सुरसरितहि जाई। मिली सुकीरति सरजु सुहाई॥
सानुज राम समर जस पावन। मिलेउ महानद सोन सुहावन॥१॥

1.250

जुग घिच भगति देव धुनि धारा। सोहति सहित सुधिरति बिचारा॥
त्रिविधि ताप त्रासक तिमुहानी। राम सरूप सिन्धु समुहानी॥२॥

1.251

मानस-मूल मिली सुरसरिही। सुनत सुजन-मन पावन करिही॥
बिच बिच कथा विचित्र बिभागा। जनु सरि तीर तीर बन बागा॥३॥

1.252

उमा-महेस-बिबाह बराती। ते जलचर अगनित बहु भाँती॥
रघुबर-जनम अनन्द-बधाई। भँवर तरङ्ग मनोहरताई॥
बालचरित चहुँ बन्धु के, बनज बिपुल बहु रङ्ग।
नृप-रानी-परिजन सुकृत, मधुकर बारि बिहङ्ग॥४०॥

1.253

सीय-स्वयम्बर-कथा सुहाई। सरित सुहावनि सो छबि छाई॥
नदी नाव पटु प्रस्न अनेका। केवट कुमल उतर सबिबेका॥१॥

1.254

सुनि अनुकथन परसपर होई। पथिक-समाज सोह सरि सोई॥
घोर धार भृगुनाथ रिसानी। घाट सुबन्ध राम बर बानी॥२॥

1.255

सानुज राम-बिबाह-उछाहू। सो सुन उमग सुखद सब काहू॥
कहत सुनत हरषहिँ पुलकाहीं। ते सुकृती मन मुदित नहाहीं॥३॥

1.256

राम तिलक हित मङ्गल साजा। परब जोग जनु जुरेउ समाजा॥
काई कुमति केकई केरी। परी जासु फल बिपति घनेरी॥४॥

1.257

समन अमित उतपात सब, भरत चरित जप जाग।
कलि अघ खल अवगुन कथन, ते जल मल बक काग॥४१॥

1.258

कीरति सरित छहूँ रितु रूरी। समय सुहावनि पावनि भूरी॥
हिम हिमसैल-सुता सिव ब्याहू। सिसिर सुखद प्रभु-जनम-उछाहू॥१॥

1.259

बरनब राम विवाह समाजू। सो मुद-मङ्गल मय रितुराजू॥
ग्रीषम दुसह राम-बन-गवनू। पन्थ-कथा खर-आतप-पवनू॥२॥

1.260

बरषा घोर निसाचर रारी। सुर-कुल-सालि सुमङ्गल-कारी॥
राम-राजसुख बिनय बडाई। बिसद सुखद सोइ सरद सुहाई॥३॥ ॥
सती-सिरोमनि सिय-गुन-गाथा। सोइ गुन अमल अनूपम पाथा॥
भरत सुभाउ सुसीतलताई। सदा एकरस बरनि न जाई ॥४॥

1.261

अवलोकनि बोलनि मिलनि, प्रीति परसपर हास।
भायप भलि चहुँ बन्धु की, जलमाधुरी सुबास॥४२॥

1.262

आरति बिनय दीनता मोरी। लघुता ललित सुबारि न खोरी॥
अदभुत सलिल सुनत गुनकारी। आस पियास मनामल-हारी॥१॥

1.263

राम सुप्रेमहि पोषत पानी। हरत सकल कलि-कलुष गलानी॥
भव स्रम सोषक तोषक तोषा। समन दुरित दुख दारिद दोषा॥२॥

1.264

काम कोह मद मोह नसावन। बिमल बिबेक बिराग बढावन॥
सादर मज्जन पान किये ते। मिटिहि पाप परिताप हिये ते॥३॥

1.265

जिन्ह एहि बारि न मानस धोये। ते कायर कलिकाल बिगोये॥
तृषित निरखि रबि-कर-भव-बारी। फिरिहहिँ मृग जिमि जीव दुखारी॥४॥

1.266

मति अनुहारि लुबारि गुन, गन गनि मन अन्हवाइ।
सुमिरि भवानी-सङ्करहि, कह कबि कथा सुहाइ॥
अब रघुपति-पद-पङ्करुह, हिय धरि पाइ प्रसाद।
कहौँ जुगल मुनिबर्ज कर, मिलन सुभग सम्बाद॥४३॥

1.267

भरद्वाज मुनि बसहिँ प्रयागा। तिन्हहिँ राम-पद अति अनुरागा॥
तापस सम-दम-दया निधाना। परमारथ-पथ परम सुजाना॥१॥

1.268

माघ मकर-गत-रबि जब हाई। तीरथपतिहि आव सब कोई॥
देवदनुज-किन्नर-नर-स्रेनी। सादर मज्जहिँ सकल त्रिबेनी॥२॥

1.269

पूजहिँ माधव-पद-जलजाता। परसि अषयवट हरषहिँ गाता॥
भरद्वाज-आश्रम अति पावन। परम-रम्य मुनिबर मन भावन॥३॥

1.270

तहाँ होइ मुनि-रिषय-समाजा। जाहिँ जे मज्जन तीरथराजा॥
मज्जहिं प्रात समेत उछाहा। कहहिं परसपर हरि-गुन-गाहा॥४॥

1.271

ब्रह्म निरूपन धर्म-बिधि, बरनहिं तत्व-विभाग।
कहहिं भगति भगवन्त कै, सज्जुत-ज्ञान-विराग॥४४॥

1.272

एहि प्रकार भरिभाघ नहाहीँ। पुनि सब निज निज आस्रम जाहीँ॥
प्रति सम्बत अति होइ अनन्दा। मकर मज्जि गवनहिँ मुनिबृन्दा॥१॥

1.273

एक बार भरि मकर नहाये। सब मुनीस आस्रमन्ह सिधाये॥
जागबलिकमुनिपरमबिबेकी। भरद्वाज राखे पद टेकी॥२॥

1.274

सादर चरन-सरोज पखारे। अति पुनीत आसन बैठारे॥
करि पूजा मुनि-सुजस बखानी। बोले अति पुनीत मृदु-बानी॥३॥

1.275

नाथ एक संसय बड मोरे। करगत वेद-तत्त्व सब तोरे॥
कहत सो मोहि लागत भय लाजा। जौँ न कहौँ बड होइ अकाजा॥४॥

1.276

सन्त कहहिँ अस नीति प्रभु, स्रुति-पुरान-मुनि गाव।
होइ न बिमल बिबेक उर, गुरु सन किये दुराव॥४॥

1.277

असबिचारि प्रगदौँ निजमोहू। हरहु नाथ करि जन पर छोहू॥
राम नाम कर अमित प्रभावा। सन्त पुरान उपनिषद गावा॥१॥

1.278

सन्तत जपत सम्भु अबिनासी। सिव भगवान ज्ञान-गुन-रासी॥
आकर चारिजीव जग अहहीँ। कासी मरत परम-पद लहहीँ॥२॥

1.279

पि राम-महिमा मुनिराया। सिव उपदेस करत करि दाया॥
राम कवन प्रभु पूछौँ तोही। कहिय बुझाइ कृपानिधि मोही॥३॥

1.280

एक राम अवधेस-कुमारा। तिन्ह कर चरित बिदित संसारा॥
नारि बिरह दुख लहेउ अपारा। भयौ रोष रन रावन मारा॥४॥

1.281

प्रभु सोइ राम कि अपर कोउ, जाहि जपत त्रिपुरारि।
सत्यधाम सर्वज्ञ तुम्ह, कहहु बिबेक बिचारि॥४६॥

1.282

जैसे मिटै मोह भ्रम भारी। कहहु सो कथा नाथ बिस्तारी॥
जागबंलिक बोले मुसुकाई। तुम्हहिँ विदित रघुपति प्रभुताई॥१॥

1.283

रामभगत तुम्ह मन क्रम बानी। चतुराई तुम्हारि मैं जानी॥
चाहहु सुनै राम-गुन-गूढा। कीन्हेहु प्रस्न मनहुँ अति मूढा॥२॥

1.284

तात सुनहु सादर मन लाई। कहौँ राम कै कथा सुहाई॥
महामोह महिषेस बिसाला। रामकथा कालिका कराला॥३॥

1.285

रामकथा ससि-किरन समाना। सन्त चकोर करहिं जेहि पाना॥
ऐसै संसय कीन्ह भवानी। महादेव तब कहा बखानी॥४॥

1.286

कहौँ सो मति अनुहारि अब, उमा-सम्भु सम्बाद।
भयौ समय जेहि हेतु जेहि, सुनु मुनि मिदिहि बिषाद॥४७॥

1.287

एक बार त्रेताजुग माहीं। सम्भु गये कुम्भज रिषि पाहीं॥
सङ्ग सती जगजननि भवानी। पूजे रिषि अखिलेस्वर जानी॥१॥

1.288

रामकथा मुनिबर्ज बखानी। सुनी महेस परम सुख मानी॥
रिषि पूछी हरिभगति सुहाई। कही सम्भु अधिकारी पाई॥२॥

1.289

कहत सुनत रघुपति-गुन-गाथा। कछु दिन तहाँ रहे गिरिनाथा॥
मुनि सन बिदा माँगि त्रिपुरारी। चले भवन सँग दच्छकुमारी॥३॥

1.290

तेहि अवसर भञ्जन महिभारा। हरि रघुबंस लीन्ह अवतारा॥
पिता बचन तजि राज उदासी। दंडकबन बिचरत अबिनासी॥४॥

1.291

हृदय विचारत जात हर, केहि बिधि दरसन होइ।
गुपुत-रूप अवतरेउ प्रभु, गये जान सब कोई॥
सङ्कर उर अतिछाभ, सती न जानै मरम सोइ।
तुलसी दरसन लोभ, मन डर लोचन लालची॥४८॥

1.292

रावन मरन मनुज कर जाँचा। प्रभु बिधि बचन कीन्ह चह साँचा॥
जौँ नहिँ जाउँ रहै पछितावा। करत बिचार न बनत बनावा॥१॥

1.293

एहि बिधि भये सोचबस ईसा। तेही समय जाइ दससीसा॥
लीन्ह नीच मारीचहि सङ्गा। भयौ तुरत से कपट-कुरङ्गा॥२॥

1.294

करि छल मूढ हरी बैदेही। प्रभु प्रमाउ तस बिदित न तेही॥
मृग बधि बन्धु सहित प्रभु आये। आस्रम देखि नयन जल छाये॥३॥

1.295

बिरह बिकल नर इव रघुराई। खोजत बिपिन फिरत दोउ भाई॥
कबहूँ जोग बियोग न जा के। देखा प्रगट दुसह दुख ताके॥४॥

1.296

अति बिचित्र रघुपति चरित, जानहिँ परम सुजान।
जे मतिमन्द बिमोहबस, हृदय धरहिँ कछु आन॥४९॥

1.297

सम्भु समय तेहि रामहिँ देखा। उपजा हिय अति हरष बिसेखा॥
भरि लोचन छबिसिन्धु निहारी। कुसमय जानि न कीन्ह चिन्हारी॥१॥

1.298

जय सच्चिदानन्द जग-पावन। अस कहि चलेउ मनोज-नसावन॥
चले जात सिव सती-समेता। पुनि पुनि पुलकत कृपानिकेता॥२॥

1.299

सती सो दसा सम्भु कै देखी। उर उपजा सन्देह बिसेखी॥
सङ्कर जगतबन्ध जगदीसा। सुर नर मुनि सब नावहिँ सीसा॥३॥

1.300

तिन्ह नृप-सुतहि कीन्ह परनामा। कहि सच्चिदानन्द परधामा।
भये मगन छबि तासु बिलोकी। अजहुँ प्रीति उर रहति न रोकी॥४॥

1.301

ब्रह्म जो ब्यापक बिरज अज, अकल अनीह अभेद।
कि देह धरि होइ नर, जाहि न जानत बेद॥५०॥

1.302

बिनु जो सुर-हित नर-तनु-धारी। सोउ सरबज्ञ जथा त्रिपुरारी॥
खोजै सो कि अज्ञ इव नारी। ज्ञान-धाम श्रीपति असुरारी॥१॥

1.303

सम्भु गिरा पुनि मृषा न होई। सिव सरबज्ञ जान सब कोई॥
अस संसय मन भयौ अपारा। होइ न हृदय प्रबोध प्रचारा॥२॥

1.304

जद्यपि प्रगट न कहेउ भवानी। हर अन्तरजामी सब जानी॥
सुनहु सती तव नारि सुभाऊ। संसय अस न धरिय उर काऊ॥३॥

1.305

जासु कथा कुम्भज रिषि गाई। भगति जासु मैं मुनिहिँ सुनाई॥
इ मम इष्टदेव रघुबीरा। सेवत जाहि सदा मुनि धीरा॥१॥

1.306

मुनिधीर जोगी सिद्ध सन्तत, बिमल मन जेहि ध्यावहीं।
कहि नेति निगम पुरान आगम, जासु कीरति गावहीं।
इ राम व्यापक ब्रह्म भुवन-निकाय-पति मायाधनी।
अवतरेउ अपने भगत-हित निजतन्त्र नित रघुकुल-मनी॥२॥

1.307

लाग न उर उपदेस, जदपि कहेउ सिव बार बहु।
बोले बिहँसि महेस, हरि-माया-बल जानि जिय॥५१॥

1.308

जौँ तुम्हरे मन अति सन्देहू। तौ किन जाइ परीछा लेहू॥
तबलगि बैठ अहौँ बट छाहीँ। जबलगि तुम्ह ऐहहु मोहि पाहीं॥१॥

1.309

जैसे जाइ मोह-भ्रम-भारी। करेहु सो जतन बिबेक बिचारी॥
चली सती सिव आयसु पाई। करै विचार करौँ का भाई॥२॥

1.310

इहाँ सम्भु अस मन अनुमाना। दच्छ-सुत्ता कहँ नहि कल्याना॥
मोरेहु कहे न संसय जाहीं। बिधि बिपरीत मलाई नाहीं॥३॥

1.311

होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तरक बढावै साखा॥
अस कहि जपन लगे हरि-नामा। गई सती जहँ प्रभु सुखधामा॥४॥

1.312

पुनि पुनि हृदय बिचार करि, धरि सीता कर रूप।
आगे होइ चलि पन्थ तेहि, जेहि आवत नर-भूप॥३२॥

1.313

लछिमन दीख उमा-कृत-बेषा। चकित मये भ्रम हृदय बिसेषा॥
कहि न सकत कछु अति गम्भीरा। प्रभु प्रभाउ जानत मतिधीरा॥१॥

1.314

सती कपट जानेउ सुर-स्वामी। सबदरसी सबअन्तर-जामी॥
सुमिरत जाहि मिटै अज्ञाना। सोइ सरबज्ञ राम भगवाना॥२॥

1.315

सती कीन्ह चह तहौँ दुराऊ। देखहु नारि-सुभाउ-प्रभाऊ॥
निज-माया-बल हृदय बखानी। बाले बिहँसि राम मृदु-बानी॥३॥

1.316

जोरि पानि प्रभु कोन्ह प्रनामू। पिता समेत लीन्ह निज नामू॥
कहेउ बहोरि कहाँ बृषकेतू। बिपिन अकेलि फिरहु केहि हेतू॥४॥

1.317

राम-बचन-मृदु गूढ सुनि, उपजा अति सङ्कोच।
सती सभीत महेस पहिँ, चली हृदय बड सेआच॥५३॥

1.318

मैं सङ्कर कर कहा न माना। निज अज्ञान राम पर आना॥
जाइ उतर अब देइहौँ काहा। उर उपजा अति दारुन-दाहा॥१॥

1.319

जाना राम सती दुख पावा। निज प्रभाउ कछु प्रगटि जनावा॥
सती दीख कौतुक मग जाता। आगे राम सहित श्री भ्राता॥२॥

1.320

फिरि चितवा पाछे प्रभु देखा। सहित बन्धु सिय सुन्दर बेखा॥
जहँ चितवहिँ तहँ प्रभु आसीना। सेवहिँ सिद्ध मुनीस प्रबीना॥३॥

1.321

देखे सिव बिधि बिष्नु अनेका। अमित प्रभाउ एक तेँ एका॥
बन्दत चरन करत प्रभु सेवा। बिबिध बेष देखे सब देवा॥४॥

1.322

सती बिधात्री इन्दिरा, देखी अमित अनूप।
जेहि जेहि बेष अजादि सुर, तेहि तेहि तनु अनुरूप॥५४॥

1.323

देखे जहँ तहँ रघुपति जेते। सक्तिन्ह सहित सकल सुर तेते॥
जीव चराचर जे संसारा। देखे सकल अनेक प्रकारा॥१॥

1.324

पूजहिं प्रभुहि देव बहु बेखा। राम-रूप दूसर नहिँ देखा॥
अवलोके रघुपति बहुतेरे। सीता सहित न बेष घनेरे॥२॥

1.325

इ रघुबर सोइ लछिमन सीता। देखि सती अति भई सभीता॥
हृदय कम्प तन सुधि कछु नाहीं। नयन मूँदि बैठी मग माहीँ॥३॥

1.326

बहुरि बिलोकेउ नयन उधारी। कछु न दीख तहँ दच्छकुमारी॥
पुनि पुनि नाइ राम-पद सीसा। चली तहाँ जहँ रहे गिरीसा॥४॥

1.327

गई समीप महेस तब, हँसि पूछी कुसलात।
लीन्हि परीछा कवन विधि, कहहु सत्य सब बात॥५५॥

1.328

सती समुझि रघुबीर प्रभाऊ। भय-बस प्रभु सन कीन्ह दुराऊ॥
कछु न परीछा लीन्हि गोसाँई। कीन्ह प्रनाम तुम्हारिहि नाँई॥१॥

1.329

जो तुम्ह कहा सो मृषा न होई। मोरे मन प्रतीति अति सोई॥
तब सङ्कर देखेउ धरि ध्याना। सती जो कीन्ह चरित सब जाना॥२॥

1.330

बहुरि राम-मायहि सिर नावा। प्रेरि सतिहि जेहि झूठ कहावा॥
हरि-इच्छा भावी बलवाना। हृदय बिचारत सम्भु सुजाना॥३॥

1.331

सती कीन्ह सीता कर वेषा। सिव-उर भयौ बिषाद बिसेषा॥
जौँ अब करौँ सती सन प्रीती। मिटै भगति-पथ होइ अनीती॥४॥

1.332

परम-प्रेम तजि जाइ नहिँ, किये प्रेम बड पाप।
प्रगटि न कहत महेस कछु, हृदय अधिक सन्ताप॥५६॥

1.333

तब सङ्कर प्रमु-पद सिर नावा। सुमिरत राम हृदय अस आवा॥
एहि तन सतिहि भेँट मोहि नाहीँ। सिव सङ्कल्प कीन्ह मन माहीं॥१॥

1.334

अस बिचारि सङ्कर मतिधीरा। चले भवन सुमिरत रघुबीरा॥
चलत गगन भै गिरा सुहाई। जय महेस भलि भगति दिढाई॥२॥

1.335

अस पन तुम्ह बिनु करै को आना। राम भगत समरथ भगवाना॥
सुनि नभ-गिरा सती उर सोचा। पूछा सिवहि संमेत सकोचा॥३॥

1.336

कीन्ह कवन पन कहहु कृपाला। सत्य-धाम प्रभु दीनदयाला॥
जदपि सती पूछा बहु भाँती। तदपि न कहेउ त्रिपुर-आराती॥४॥

1.337

सतीहृदय अनुमान किय, सब जानेउँ सरबज्ञ।
कीन्ह कपट मैं सम्भु सन, नारि सहज जड अज्ञ॥
जल पय सरिस बिकाइ, देखहु प्रीति कि रीति मलि।
बिलग होत रस जाइ, कपट खटाई परतहीं॥५७॥

1.338

हृदय सोच समुझत निज करनी। चिन्ता अमित जाइ नहिँ बरनी॥
कृपासिन्धु सिव परम अगाधा। प्रगट न कहेउ मोर अपराधा॥१॥

1.339

सङ्कर-रुख अवलोकि भवानी। प्रभु मोहि तजेउ हृदय अंकुलानी॥
निज अघ समुझि न कछु कहि जाई। तपैअवाँ इव उर अधिकाई॥२॥

1.340

सतिहि ससोच जानि बृषकेतू। कही कथा सुन्दर सुख-हेतू॥
बरनत पन्थ बिबिध इतिहासा। बिस्वनाथ पहुँचे कैलासा॥३॥

1.341

तहँ पुनि समुझि समुझि पन आपन। बैठे बट तर करि कमलासन॥
सङ्कर सहज-सरूप सँभारा। लागि समाधि अखंड अपारा॥४॥

1.342

सत्ती बसहि कैलास तब, अधिक सोच मन माहिँ।
मरम न कोऊ जान कछु, जुग सम दिवस सिगहिँ॥५८॥

1.343

नित नव सोच सती उरमारा। कब जैहौँ दुख-सागर पारा॥
मैं जो कीन्ह रघुपति अपमाना। पुनि पति-वचन मृषा करि जाना॥१॥

1.344

फल मोहि बिधाता दीन्हा। जो कछु उचित रहा सेआइ कीन्हा॥
अब विधिअसबूझिय नहिँ तोही। सङ्कर-बिमुख जिआवसि मोही॥२॥

1.345

कहि न जोड कछु हृदय गलानी। मन महँ रामहिँ सुमिरि सयानी॥
जौँ प्रभु दीनदयाल कहावा। आरति-हरन बेद जस गावा॥३॥

1.346

तो मैं बिनय करौँ कर जोरी। छूटै बेगि देह यह मोरी॥
जौँ मेरे सिव-चरन सनेहू। मन क्रम बचन सत्य व्रत एहू॥४॥

1.347

तौ सबदरसी सुनिय प्रभु, करौ सो बेगि उपाइ।
होइ मरन जेहि बिनहिँ स्रम, दुसह बिपत्ति बिहाइ॥५९॥

1.348

एहि बिधि दुखित प्रजेसकुमारी। अकथनीय दारुन दुख भारी॥
बीते सम्बत सहस-सतासी। तजी समाधि सम्भु अबिनासी॥१॥

1.349

राम नाम सिव सुमिरन लागे। जानेउ सती जगतपति जागे॥
जाइ सम्भु-पद बन्दन कीन्हा। सन्मुख सङ्कर आसन दीन्हा॥२॥

1.350

लगे कहन हरिकथा रसाला। दच्छ प्रजेस भये तेहि काला॥
देखा बिधि बिचारि सब लायक। दच्छहि कीन्ह प्रजापति-नायक॥३॥

1.351

बड अधिकार दच्छ जब पावा। अति अभिमान हृदय तब आवा॥
नहिँ कोउ अस जनमा जग माहीँ। प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं॥४॥

1.352

दच्छ लिये मुनि बोलि सब, करन लगे बड जाग।
नेवते सादर सकल सुर, जे पावत मख भाग ॥६०॥

1.353

किन्नर नाग सिद्ध गन्धर्वा। बधुन्ह समेत चले सुर सर्बा॥
बिष्नु बिरञ्चि महेस बिहाई। चले सकल सुर जान बनाई॥१॥

1.354

सती बिलोके ब्योम बिमाना। जात चले सुन्दर विधि नाना॥
सुर-सुन्दरी करहिँ कल गाना। सुनत स्रवन छूटहिँ मुनि ध्याना॥२॥

1.355

पूछेउ तब सिव कहेउ बखानी। पिता जग्य सुनि कछु हरषानी॥
जौँ महेस मोहि आयसु देहौँ। कछु दिन जाइ रहौँ मिस एहीँ॥३॥

1.356

पति-परित्याग हृदय दुख भारी। कहै न निज अपराध बिचारी॥
बाली सती मनोहर बानी। भय सङ्कोच प्रेम रस सानी॥४॥

1.357

पिता भवन उत्सव परम, जौँ प्रभु आयसु होइ।
तो मैँ जाउँ कृपायतन, सादर देखन सोइ॥६१॥

1.358

कहेहु नीक मोरे मन भावा। यह अनुचित नहिँ नेवत पठावा॥
दच्छ सकल निज सुता बोलाई। हमरे बयर तुम्हहुँ बिसराई॥१॥

1.359

ब्रह्म-सभा हम सन दुख माना। तेहि तेँ अजहुँ करहिं अपमाना॥
जौँ बिनु बोले जाहु भवानी। रहै न सील सनेह न कानी॥२॥

1.360

जदपि मित्र-प्रभु-पितु-गुरु गेहा। जाइय बिनु बोले न सँदेहा॥
तदपि बिरोध मान जहँ कोई। तहाँ गये कल्यान न होई॥३॥

1.361

भाँति अनेक सम्भु समुझावा। भावी बस न ज्ञान उर आवा॥
कह प्रभु जाहु जो बिनहि बोलाये। नहिँ मलि बात हमारे भाये॥४॥

1.362

करि देखा हर जतन बहु, रहै न दच्छकुमारि।
दिये मुख्य गन सङ्ग तब, बिदा कीन्ह त्रिपुरारि॥६२॥

1.363

पिता-भवन जब गई भवानी। दच्छ-त्रास काहु न सनमानी॥
सादर भलेहि मिली एक माता। भगिनी मिलीँ बहुत मुसुकाता॥१॥

1.364

दच्छ न कछु पूंछी कुसलाता। सतिहि बिलोकि जरे सब गाता॥
सती जाइ देखेउ तब जागा। कतहुँ न दोख सम्भु कर भागा॥२॥

1.365

तब चित्त चढेउ जो सङ्कर कहेऊ। प्रभु-अपमान समुझि उर दहेऊ॥
पाछिल दुख न हृदय अस ब्यापा। जस यह भयौ महा परितापा॥३॥

1.366

जद्यपि जग दारुन दुख नाना। सब तेँ कठिन जाति-अपमाना॥
समुझि सो सतिहि भयौ अति क्रोधा। बहु बिधि जननी कीन्ह प्रबोधा॥४॥

1.367

सिव अपमान न जाइ सहि, हृदय न होइ प्रबोध।
सकल समाहि हठि हटकि तब, बोली बचन सक्रोध॥६३॥

1.368

सुनहु सभासद सकल मुनिन्दा। कही सुनी जिन्ह सङ्कर निन्दा॥
फल तुरत लहब सब काहू। भली भाँति पछिताब पित्ताहू॥१॥

1.369

सन्त-सम्भु-श्रीपति अपबादा। सुनिय जहाँ तहँ असि मरजादा॥
काढिय तासु जीभ जो बसाई। स्रवन मूँदि न त चलिय पराई॥२॥

1.370

जगदातमा महेस पुरारी। जगत-जनक सब के हितकारी॥
पिता-मन्दमति निन्दत तेही। दच्छ-सुक्र-सम्भव यह देही॥३॥

1.371

तजिहौँ तुरत देह तेहि हेतू। उर धरि चन्द्रमौलि बृषकेतू॥
अस कहि जोग-अगिनि तनु जारा। भयौ सकल मख हाहाकारा॥४॥

1.372

सती मरन सुनि सम्भु गन, लगे करन मख खीस।
जग्य-बिधन्स बिलोकि भृगु, रच्छा कोन्हि मुनीस॥६४॥

1.373

समाचार सब सङ्कर पाये। बीरभद्र करि कोप पठाये॥
जग्य बिधन्स जाइ तिन्ह कीन्हा। सकल सुरन्ह बिधिवत फल दीन्हा॥१॥

1.374

भै जग बिदित दच्छ-गति सोई। जसि कछु सम्भु-बिमुख कै होई॥
यह इतिहास सकल जग जाना। तात संछेप बखाना॥
सती मरत हरि सन बर माँगा। जनम जनम सिव-पद अनुरागा॥
तेहि कारन हिमगिरि-गृह जाई। जनमी पारबती तनु पाई॥३॥

1.375

जब तेँ उमा सैल-गृह-जाई। सकल सिद्धि सम्पति तहँ छाई॥
जहँ तहँ मुनिन्ह सुआस्त्रम कीन्हे। उचित बास हिम भूधर दीन्हें॥४॥

1.376

सदा सुमन फल सहित सब, द्रुम नव नाना जाति।
प्रगटी सुन्दर सैल पर, मनि-आकर बहु भाँति॥६५॥

1.377

सरिता सब पुनीत जल बहहीँ। खग मृग मधुप सुखी सब रहहीँ॥
सहज-बयर सब जीवन्ह त्यागा। गिरि पर सकल करहिँ अनुरागा॥१॥

1.378

ह सैल गिरिजा गृह आये। जिमि जन रामप्रगति के पाये॥
नित नूतन मङ्गल गृह तासू। ब्रह्मादिक गावहिँ जस जासू॥२॥

1.379

नारद समाचार सब पाये। कौतुकहीं गिरि-गेह सिधाये॥
सैलराज बड आदर कीन्हा। पद पखारि बर आसन दीन्हा॥३॥

1.380

नारि सहित मुनि-पद सिर नावा। चरन-सलिल सब भवन सिंचावा॥
निज सौभाग्य बहुत विधि बरना। सुता बोलि मेली मुनि चरना॥४॥

1.381

त्रिकालभ्य सर्वग्य तुम्ह, गति सर्वत्र तुम्हारि।
कहहु सुता के दोष गुन, मुनिबर हृदय बिचारि॥६६॥

1.382

कह मुनि बिहँसि गूढ मृदु बानी। सुता तुम्हारि सकल-गुन-खानी॥
सुन्दर सहज सुसील सयानी। नाम उमा अम्बिका भवानी॥१॥

1.383

सब लच्छन्न-सम्पन्न कुमारी। होइहि सन्तत पियहि पियारी॥
सदा अचल एहि कर अहिवाता। एहि ते जस पैहहि पितु-माता॥२॥

1.384

होइहि पूज्य सकल जग माहीं। एहि सेवत कछु दुर्लभ नाहीँ॥
एहि कर नाम सुमिरि संसारा। तिय चढिहहिं पतिव्रत असि धारा॥३॥

1.385

सैल सुलच्छनि सुता तुम्हारी। सुनहु जे अब अवगुन दुइ-चारी॥
अगुन अमान मातु-पितु हीना। उदासीन सब संसय छीना॥४॥

1.386

जोगी जटिल अकाम-मन, नगन अमङ्गल-बेख।
अस स्वामी एहि कहँ मिलिहि, परी हस्त असि रेख॥६७॥

1.387

सुनि मुनि-गिरा सत्य जिय जानी। दुख-दम्पतिहि उमा-हरखानी॥
नारदहू यह भेद न जाना। दसा एक समुझब बिलगाना॥१५॥

1.388

सकल सखी गिरिजा गिरि मैना। पुलक सरीर भरे जल नैना॥
होइ न मृषा देवरिषि भाखा। उमा सो वचन हृदय धरि राखा॥२॥

1.389

उपजेउ सिव-पद-कमल सनेहू। मिलन कठिन भा मन सन्देहू॥
जानि कुअवसर प्रीति दुराई। सखी-उछङ्ग बैठि पुनि जाई॥३॥

1.390

झूठि न होइ देवरिषि बानी। सोचहिँ दम्पति सखी सयानी॥
उर धरि धीर कहै गिरिराऊ। कहहु नाथ का करिय उपाऊ॥४॥

1.391

कह मुनीस हिमवन्त सुनु, जो विधि लिखा लिलार।
देव दनुज नर नाग मुनि, कोउ न मेटनिहार॥६८॥

1.392

तदपि एक मैं कहौँ उपाई। होइ करै जौँ दैव सहाई॥
जस घर मैं बरनेउँ तुम्ह पाहीँ। मिलिहि उमहि तस संसय नाहीँ॥१॥

1.393

जे जे बर के दोष बखाने। ते सब सिव पहिँ मैं अनुमाने॥
जौँ बिबाह सङ्कर सन होई। दोषौ गुन सम कह सब कोई॥२॥

1.394

जौँ अहि-सेज सयन हरि करहीं। बुध कछु तिन्ह कर दोष न धरहीँ॥
भानु-कृसानु सर्ब-रस खाहीँ। तिन्ह कहँ मन्द कहत कोउ नाहीँ॥३॥

1.395

सुभ अरु असुभ सलिल सब बहई। सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई॥
समरथ कहँ नहिँ दोष गोसाँई। रवि पावक सुरसरि की नाँई॥४॥

1.396

जौँ ऐसहि इसिषा करहिँ, नर विवेक अभिमान।
परहिँ कलप भरि नरक महँ, जीव कि ईस समान॥६६॥

1.397

सुरसरि जल कृत बारुनि जाना। कबहुँ न सन्त करहिँ तेहि पाना॥
सुरसरि मिले सो पावन जैसे। ईस अनीसहि अन्तर तैसे॥१॥

1.398

सम्भु सहज समरथ भगवाना। एहि बिबाह सब विधि कल्याना॥
दुराराध्य पै अहहिँ महेसू। आसुतोष पुनि किये कलेसू॥२॥

1.399

जौँ तप करै कुमारि तुम्हारी। भाविउ मेदि सकहिँ त्रिपुरारी॥
जद्यपि बर अनेक जग माहीं। एहि कह सिव, तजि दूसर नाहीँ॥३॥

1.400

बर-दायक प्रनतारति-भञ्जन। कृपासिन्धु सेवक-मन-रञ्जन॥
इच्छित-फल बिनु सिव अवराधे। लहिय न कोटि जोगजप साधे॥४॥

1.401

अस कहि नारद सुमिरि हरि, गिरिजहि दोन्हि असीस।
होइहि अब कल्यान सब, संसय तजहु गिरीस॥७॥

1.402

अस कहि ब्रह्म-भवन मुनि गयऊ। आगिल चरित सुनहु जस भयऊ॥
पतिहि एकन्त पाइ कह मैना। नाथ न मैं समुझे मुनि-बैना॥१॥

1.403

जौँ घर बर कुल होइ अनूपा। करिय बिबाह सुता-अनुरूपा।
न त कन्या बरु रहौ कुँआरी। कन्त उमा मम प्रान-पियारी॥२॥

1.404

जौँ न मिलिहि बर गिरजहि जोगू। गिरि जड सहज कहिहि सब लागू॥
इ बिचारि पति करहु बिबाहू। जेहि न बहोरि होइ उर दाहू॥३॥

1.405

अस कहि परी चरन धरि सासा। बोले सहित सनेह गिरीसा॥
बरु पावक प्रगटै ससि माहीँ। नारद बचन अन्यथा नाहीं॥४॥

1.406

प्रिया सोच परिहरहु सब, सुमिरहु श्रीभगवान।
पारबती निरमयौ जेहि, साइ करिहि कल्यान॥७१॥

1.407

अब जौँ तुम्हहिँ सुता पर नेहू। तो अस जाइ सिखावन देहू॥
करै सो तप जैहि मिलहि महेसू। आन उपाय न मिटिहि कलेसू॥१॥

1.408

नारद बचन सगर्भ सहेतू। सुन्दर सब-गुन-निधि-बृषकेतू॥
अस बिचारि तुम्ह तजहु असङ्का। सबहि भाँति सङ्कर अकलङ्का॥२॥

1.409

सुनि पति-बचन हरषि मन माहीँ। गई तुरत उठि गिरिजा पाहीँ॥
उमहि बिलोकि नयन भरि बारी। सहित सनेह गोद बैठारी॥३॥

1.410

बारहिँ बार लेति उर लाई। गदगद कंठ न कछु कहि जाई॥
जगत-मातु सर्बज्ञ भवानी। मातु-सुखद बोली मृदु-बानी॥४॥

1.411

सुनहि मातु मैं दीख अस, सपन सुनावौँ ताहि।
सुन्दर गौर सुबिप्र-बर अस उपदेसेउ मोहि॥७२॥

1.412

करहि जाइ तप सैलकुमारी। नारद कहा सो सत्य बिचारी॥
मातु-पितहि पुनि यह मत भावा। तप-सुख प्रद दुख-दोष-नसावा॥१॥

1.413

तप-बल रचै प्रपञ्च बिधाता। तप-बल विष्नु सकल-जग-त्राता॥
तप-अल सम्भु करहि संहारा। तप-बल सेष धरहिँ महि भारा॥२॥

1.414

तप अधार सब सृष्टि भवानी। करहि जाइ तप अस जिय जानी॥
सुनत बचन बिसमित महँतारी। सपन सुनायौ गिरिहि हँकारी॥३॥

1.415

मातु-पितहि बहु बिधि समुझाई। चली उमा तप-हित हरषाई॥
प्रिय परिवार पिता अरु माता। भये विकल मुख आव न बाता॥४॥

1.416

बेदसिरा-मुनि आइ तब, सबहिँ कहा समुझाइ।
पारबती महिमा सुनत, रहे प्रबोधहि पाइ॥७३॥

1.417

उर धरि उमा प्रान-पति-चरना। जाइ बिपिन लागी तप करना॥
अति सुकुमारि न तनु तप जोगू। पति-पद सुमिरि तजे सब भोगू॥१॥

1.418

नित नव चरन उपज अनुरागा। बिसरी देह तपहि मन लागा॥
सम्बत सहस मूल फल खाये। साग खाइ सत बरष गँवाये॥२॥

1.419

कछु दिन भोजन बारि बतासा। किये कठिन कछु दिन उपवासा॥
बेल-पाति महि पर सुखाई। तीनि सहस सम्बत से खाई॥३॥

1.420

पुनि परिहरे सुखाने सुखाने परना। उमहिँ नाम तय भयौ अपरना॥
देखि उमहिँ तप-खीन-सरीरा। ब्रह्म-गिरा भै गगन गँभीरा॥४॥

1.421

भयौ मनोरथ सुफल तव, सुनु गिरिराज-कुमारि।
परिहरु दुसह कलेस सन्न, अब मिलिहहि त्रिपुरारि॥७४॥

1.422

अस तप काहु न कीन्ह भवानी। भये अनेक धीर मुनि ज्ञानी॥
अब उर धरहु ब्रह्म-बर-बानी। सत्य सदा सन्तत सुचि जानी॥१॥

1.423

आवहिँ पिता बुलावन जबहीं। हठ परिहरि घर जायहु तबहीं॥
मिलहिँ तुम्हहिँ जब सप्त-रिषीसा। जानेहु तब प्रमान बागीसा॥२॥

1.424

सुनत गिरा विधि गगन बखानी। पुलकगात गिरिजा हरषानी॥
उमा चरित सुन्दर मैं गावा। सुनहु सम्भु कर चरित सुहावा॥३॥

1.425

जब तेँ सती जाइ तनु त्यागा। तब तेँ सिव-मन भयौ बिरागा॥
जपहिँ सदा रघुनायक-नामा। जहँ तहँ सुनहिँ राम-गुन-ग्रामा॥४॥

1.426

चिदानन्द सुख-धाम सिब, बिगत मोह-मद-काम।
बिचरहिँ महि धरि हृदय हरि, सकल-लोक-अभिराम॥७५॥

1.427

कतहुँ मुनिन्ह उपदेसहिँ ज्ञाना। कतहुँ राम गुन करहिं बखाना॥
जदपि अकाम तदपि भगवाना। भगत-बिरह-दुख दुखित-सुजाना॥१॥

1.428

एहि विधि गयौ काल बहु बीती। नित नै होइ राम-पद-प्रीती॥
नेम प्रेम सङ्कर कर देखा। अबिचल हृदय भगति कै रेखा॥२॥

1.429

प्रगटे राम कृतज्ञ कृपाला। रूप-सील-निधि तेज बिसाला॥
बहु प्रकार सङ्करहि सराहा। तुम्ह बिनु अस ब्रत को निरबाहा॥३॥

1.430

बहु बिधि राम सिवहि ससुझावा। पारबती कर जनम सुनावा॥
अति पुनीत गिरिजा कै करनी। बिस्तर सहित कृपानिधि बरनी॥४॥

1.431

अब बिनती मम सुनहु सिव, जौँ मो पर निज-नेहु।
जाइ बिबाहहु सैलजहि, यह मोहि माँगे देहु॥७६॥

1.432

कह सिव जदपि उचित अस-नाहीँ। नाथ बचन पुनिमेटि न जाहीं॥
सिर धरि आयसु करिय तुन्हारा। परम धरम यह नाथ हमारा॥१॥

1.433

मातु-पिता-गुरु-प्रभु कै बानी। बिनहि बिचार करिय सुभ जानी॥
तुम्ह सब भाँति परम हितकारी। अज्ञा सिर पर नाथ तुम्हारी॥२॥

1.434

प्रभु तोषेउ सुनि सङ्कर बचना। भगति-विवेक-धर्मजुत रचना॥
कह प्रभु हर तुम्हार पन रहेऊ। अब उर रोखेउ हम जो कहेऊ॥३॥

1.435

अन्तरधान भये अस भाखी। सङ्कर सेआइ मूरति उर राखी॥
तबहिँ सप्तरिषि सिव पहिँ आये। बोले प्रभु अति बचन सुहाये॥४॥

1.436

पारबती पहिँ जाइ तुम्ह, प्रेम परिच्छा लेहु।
गिरिहि प्रेरि पठयहु भवन, दूरि करेहु सन्देहु॥७७॥

1.437

रिषिन्ह गौरि देखी तहँ कैसी। मूरतिवन्त तपस्या जैसी।
बोले मुनि सुनु सैलकुमारी। करहु कवन कारन तप भारी॥१॥

1.438

केहि अवराधहु का तुम्ह चहहू। हम सन सत्य मरम सब कहहू।
सुनत रिषिन्ह के बचन भवानी। बोली गूढ मनोहर बानी॥२॥

1.439

कहत मरम मन अति सकुचाई। हँसिहहु सुनि हमारि जडताई॥
मन हठ परा न सुनै सिखावा। चहत बारि पर भीति उठावा॥३॥

1.440

नारद कहा सत्य सोइ जाना। बिनु पङ्खन्ह हम चहहिँ उडाना॥
देखहु मुनि अबिबेक हमारा। चाहिय सदा सिवहि भरतारा॥४॥

1.441

सुनत बचन बिहँसे रिषय, गिरि-सम्भव तव देह।
नारद कर उपदेस सुनि, कहहु बसेउ को गेह॥७८॥

1.442

दच्छ-सुतन्ह उपदेसेन्हि जाई। तिन्ह फिरि भवन न देखा आई॥
चित्रकेतु कर घर उन्ह घाला। कनककसिपुकर पुनि अस हाला॥१॥

1.443

नारद सिख जे सुनहिँ नर नारी। अवसि होहिँ तजि भवन भिखारी॥
मन कपटी तन-सज्जन चीन्हा। आपु सरिस सबही चह कीन्हा॥२॥

1.444

तेहि के बचन मानि बिस्वासा। तुम्ह चाहहु पति सहज उदासा॥
निर्गुन निलज कुबेष कपाली। अकुल अगेह दिगम्बर ब्याली॥३॥

1.445

कहहु कवन सुख अस बर पाये। भल भूलिहु ठग के बौराये॥
पञ्ज कहे सिव सती बिबाही। पुनि अवडेरि मरायेन्हि ताही॥४॥

1.446

अब सुख सोवत सोच नहिँ, भीख माँगि भव खाहिँ।
सहज-एकाकिन्ह के भवन, कबहुँ कि नारि खटोहिँ॥७९॥

1.447

अजहूँ मानहु कहा हमारा। हम तुम्ह कहँ बर नीक बिचारा॥
अति-सुन्दर सुचिसुखद सुसीला। गावहिँ बेद जासु जस लीला॥१॥

1.448

दूषनरहित सकल-गुन-रासो। श्रीपति पुर-बैकुंठ-निवासी॥
अस बर तुम्हहिँ मिलाउब आनी। सुनत बिहँसि कह बचन मवानी॥२॥

1.449

सत्य कहेहु गिरि-भव तनु एहा। हठ न छूट छूटै बरु दोहा॥
कनकौ पुनि पषान तेँ होई। जारेहु सहज न परिहर सेआई॥३॥

1.450

नारद बचन न मैं परिहरऊँ। बसौ भवन उजरौ नहिँ डरऊँ॥
गुरु के बचन प्रतीति न जेही। सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही॥४॥

1.451

महादेव अवगुन अवगुन भवन, बिष्नु सकल-गुन-धाम।
जेहि कर मन रम जाहि सन, तेहि तेही सन काम ॥८०॥

1.452

जौँ तुम्ह मिलतेहु प्रथम मुनीसा। सुनतिउँ सिख तुम्हारि धरि सीसा॥
अब मैं जनम सम्भु हित हारा। को गुनदूषन करै विचारा॥१॥

1.453

जौँ तुम्हरे हठ हृदय बिसेषी। रहि न जाइ बिनु किये बरेषी॥
तौ कौतुकिअन्ह आलस नाहीँ। वर-कन्या अनेक जग माहीं॥२॥

1.454

जनम कोटि लगि रगरि हमारी। बरौँ सम्मु न त रहौँ कुँआरी॥
तजौँ न नारद कर उपदेसू। आपु कहहिँ सत बार महेसू॥३॥

1.455

मैं पाँ परौँ कहै जगदम्बा। तुम्ह गृह गवनहु भयौ बिलम्बा॥
देखि प्रेम बोले मुनि ज्ञानी। जय जय जगदम्बिके भवानी॥४॥

1.456

तुम्ह माया भगवान सिव, सकल जगत पितु मातु।
नाइ चरन सिर मुनि चले, पुनि पुनि हरषित गातु॥८॥

1.457

जाइ मुनिन्ह हिमवन्त पठाये। करि बिनती गिरिजहि गृह ल्याये॥
बहुरि सप्तरिषि सिव पहिं जाई। कथा उमा कै सकल सुनाई॥१॥

1.458

भये मगन सिव सुनत सनेहा। हरषि सप्तरिषि गवने गेहा॥
मन थिर करि तब सम्भु सुजाना। लगे करन रघुनायक ध्याना॥२॥

1.459

तारक-असुर भयौ तेहि काला। भुज प्रताप बल तेज बिसाला॥
तेहिँ सब लोक लोकपति-जीते। भये देव सुख-सम्पति रीते॥३॥

1.460

अजर अमर सो जीति न जाई। हारे सुर करि बिबिध लराई॥
तब बिरञ्चि पहिं जाइ पुकारे। देखे बिधि सब देव दुखारे॥४॥

1.461

सब सन कहा बुझाइ बिधि, दनुज निधन तब होइ।
सम्भु-सुक्र-सम्भूत-सुत, एहि जीतै रन सोइ॥२॥

1.462

मोर कहा सुनि करहु उपाई। होइहि ईस्वर करिहि सहाई॥
सती जो तजी दच्छ-मख देहा। जनमी जाइ हिमाचल गेहा॥१॥

1.463

तेहि तप कीन्ह सम्भु पति लागी। सिव समाधि बैठे सब त्यागी॥
जदपि अहै असमञ्जस भारी। तदपि बात एक सुनहु हमारी॥२॥

1.464

पठवहु काम जाइ सिव पाहीँ। करै छोभ सङ्कर मन माहीं॥
तब हम जाइ सिवहि सिर नाई। करवाउब बिबाह बरिआई॥३॥

1.465

एहि विधि भलेहि देव हित होई। मत अति नीक कहै सब कोई॥
अस्तुति सुरन्ह कीन्हि अति-हेतू। प्रगटेउ विषमबान झखकेतू॥४॥

1.466

सुरन्ह कही निज बिपति सब, सुनि मन कीन्ह बिचार।
सम्भु बिरोध न कुसल मोहि, बिहँसि कहेउ अस मार॥३॥

1.467

तदपि करब मैं काज तुम्हारा। स्रुति कह परम-धरम-उपकारा॥
परहिन लागि तजै जो देही। सन्तत सन्त प्रसंसहि तेही॥।१॥ऽ
अस कहि चलेउ सबहि सिर नाई। सुमन धनुष कर सहित सहाई॥
चलत मार अस हृदय बिचारा। सिव-बिरोध ध्रुव मरन हमारा॥२॥

1.468

तब आपन प्रभाव विस्तारा। निज बस कीन्ह सकल संसारा॥
कोपेउ जबहिँ बारिचर-केतू। छन महँ मिटे सकल स्रुति-सेतू॥३॥

1.469

ब्रह्मचर्ज ब्रत सञ्जम नाना। धीरज धरम ज्ञान बिज्ञाना॥
सदाचार जप जोग बिरागा। समय बिबेक कटक सब भागा॥४॥

1.470

भागेउ बिबेक सहाय सहित सो सुभट सञ्जुग-महि मुरे।
सदग्रन्थ-पर्बत-कन्दरन्हि महँ, जाई तेहि अवसर दुरे॥
होनिहार का करतार को रखवार जग खरभर परा।
दुइ माथ केहि रतिनाथ जेहि कहँ, कोपि कर धनु-सर धरा॥३॥

1.471

जे सजीव जग चर अचर, नारि पुरुष अस नाम।
ते निज निज मरजाद तजि, भये सकल बस काम॥८४॥

1.472

सब के हृदय मदन अभिलाखा। लता निहारि नवहिं तरु साखा॥
नदी उमगि अम्बुधि कहँ धाई। सङ्गम करहिं तलाव तलाई॥१॥

1.473

जहँ असि दसा जडन्ह कै बरनी। को कहि सकै सचेतन्ह करनी॥
पसु पच्छी नभ-जल-थल-चारी। भये काम-बस समय-बिसारी॥२॥

1.474

मदन-अन्ध ब्याकुल सब लोका। निसि दिन नहिँ अवलोकहि कोका॥
देव दनुज नर किन्नर ब्याला। प्रेत पिसाच भूत बेताला॥३॥

1.475

इन्ह की दसा न कहेउँ बखानी। सदा काम के चेरे जानी॥
सिद्ध बिरक्त महामुनि जोगी। तेपि कामबस अये वियोगी॥४॥

1.476

भये काम-बस जोगीस तापस, पाँवरनि की को कहै।
देखहिँ चराचर नारि मय जे, ब्रह्म-मय देखत रहै॥
अबला बिलोकहिँ पुरुष-मय-जग, पुरुष सब अबला-मयं।
दुइ दंड भरि ब्रह्मांड भीतर, काम कृत कौतुक अयं॥४॥

1.477

धरा न काहूँ धीर, सब के मन मनसिज हरे।
जे राखे रघुबीर, ते उबरे तेहि काल महँ॥८५॥

1.478

उभयघरी अस कौतुक भयऊ। जब लगि काम सम्भु पहिँ गयऊ॥
सिवहि बिलोकि ससङ्केउ मारू। भयौ जथाथिति सब संसारू॥१॥

1.479

भये तुरत सब जीव सुखारे। जिमि मद उतरि गये मतवारे॥
रुद्रहि देखि मदन भय माना। दुराधरष दुर्गम भगवाना॥२॥

1.480

फिरत लाज कछु करिनहिं जाई। मरन ठानि मन रचेसि उपाई॥
प्रगटेसि तुरत रुचिर रितुराजा। कुसुमित नव तरु सखा बिराजा॥३॥

1.481

बन उपबन बापिका तडागा। परम सुभग सब दिसा विभागा॥
जहँ तहँ जनु उमगत अनुगगा। देखि मुयेहु मन मनसिज जागा॥४॥

1.482

जागेउ मनोभव मुयेहु मन बन, ‒ सुभगता न परै कही।
सीतल सुगन्ध सुमन्द मारुत, मदन-अनल सखा सही॥
बिकसे सरन्हि बहु कञ्ज गुञ्जत, ‒पुज्ज मञ्जुल मधुकरा।
कलहंस पिक सुक सरस-रव करि, ‒गान नाचहिँ अपछरा॥५॥

1.483

सकल कला करि कोटि बिधि, हारेउ सेन समेत।
चली न अचल समाधि सिव, कोपेउ हृदय निकेत॥६॥

1.484

देखि रसाल बिटप बर साखा। तेहि पर चढेउ मदन मन माखा॥
सुमन चाप निज सर सन्धाने। अति रिसि ताकि स्रबन लगि ताने॥१॥

1.485

आँडेउ विषम बान उर लागे। छूटि समाधि सम्भु तब जागे॥
भयौ ईस मन छोभ बिसेखी। नयन उघारि सकल दिसि देखी॥२॥

1.486

सौरभ-पल्लव मदन बिलोका। भयौ कोप कम्पेउ त्रैलोका॥
तब सिव तीसर नयन उघारा। चितवत काम भयौ जरिछारा॥३॥

1.487

हाहाकार भयौ जग भारी। डरपे सुर भये असुर सुखारी॥
समुझि काम-सुख सोचहिँ भोगी। भये अकंटक साधक जोगी॥४॥

1.488

जोगी अकंटक भये पति-गति, सुनत रति मुरछित भई।
रोदति बदति बहु भाँति करुना, करति सङ्कर पहि गई॥
अति प्रेम करि बिनती बिबिध बिधि, जोरि कर सनमुख रही।
प्रभु आसुतोष कृपाल सिव, अबला निरखि बोले सही॥६॥

1.489

अब तेँ रति तव नाथ कर, होइहि नाम अनङ्ग।
बिनु बपु ब्यापिहि सबहि पुनि, सुनु निज मिलन प्रसङ्ग॥८७॥

1.490

जन जदुबंस कृष्न अवतारा। होइहि हरन महा महि भारा॥
कृष्न-तनय होइहि पति तोरा। बचन अन्यथा होइन मोरा॥१॥

1.491

रति गवनी सुनि सङ्कर बानी। कथा अपर अब कहौँ बखानी॥
देवन्ह समाचार पाये। ब्रह्मादिक बैकट सिधाये॥२॥

1.492

सब सुर बिष्नु बिरञ्जि समेता। गये जहाँ सिव कृपा-निकेता॥
पृथक पृथक तिन्ह कीन्ह प्रसंसा। भये प्रसन्न चन्द्र-अवतंसा॥३॥

1.493

बोले कृपासिन्धु बृषकेतू। कहहु अमर आयहु केहि हेतू॥
कह बिधि तुम्ह प्रभु अन्तरजामी। तदपिभगति-बसबिनवौँस्वामी॥४॥

1.494

सकल सुरन्ह के हृदय अस, सङ्कर परम उछाह।
निज नयनन्हि देखा चहहिँ, नाथ तुम्हार बिबाह॥८८॥

1.495

यह उत्सव देखिय भरि लोचन। सोह कछु करहु मदन-मद-मोचन॥
काम जारि रति कहँ बर दीन्हा। कृपासिन्धु यह अतिभल कीन्हा॥१॥

1.496

सासति करि पुनि करहिँ पसाऊ। नाथ प्रभुन्ह कर सहज-सुभाऊ॥
पारबती तप कीन्ह अपारा। करहु तासु अब अङ्गीकारा॥२॥

1.497

सुनि विधि बिनय समुझि प्रभु बानी। ऐसै होउ कहा सुख मानी॥
तब देवन्ह दुन्दुभी बजाई। बरषि सुमन जयजय सुर-साँई॥३॥

1.498

अवसर जानि सप्तरिषि आये। तुरतहि बिधि गिरि-भवन पठाये॥
प्रथम गये जहँ रही भवानी। बोले मधुर बचन छल-सानी॥४॥

1.499

कहा हमार न सुनेहु तब, नारद के उपदेस।
अब भा झूठ तुम्हार पन, जारेउ काम महेस॥८९॥

1.500

सुनि बोली मुसुकाइ भवानी। उचित कहेउ मुनिबर बिज्ञानी॥
तुम्हरे जान काम अब जारा। अब लगि सम्भु रहे सबिकारा ॥१॥

1.501

हमरे जान सदा सिव जोगी। अज अनवद्य अकाम अभोगी ॥
जौँ मैँ सिव सेयेउँ अस जानी। प्रीति समेत करम-मन-बानी ॥२॥

1.502

तौ हमार पन सुनहु मुनीसा। करिहहिँ सत्य कृपानिधि ईसा ॥
तुम्ह जो कहा हर जारेउ मारा। सो अति बड अविबेक तुम्हारा ॥३॥

1.503

तात अनल कर सहज सुभाऊ। हिम तेहि निकट जाइ नहिँ काऊ ॥
गये समीप सो अवसि नसाई। असि मनमथ महेस कै नाई ॥४॥

1.504

हिय हरषे मुनि बचन सुनि, देखि प्रीति बिस्वास ।
चले भवानिहि नाइ सिर, गये हिमाचल पास ॥९०॥

1.505

सबप्रसङ्गगिरि पतिहि सुनावा। मदन दहन सुनि अति दुख पावा ॥
बहुरि कहेउ रति करबरदाना। सुनि हिमवन्त बहुत सुख माना ॥१॥

1.506

हृदय बिचारि सम्भू प्रभुताई। सादर मुनिवर लिये बोलाई॥
सुदिन सुनखत सुघरी सोचाई। बेगि बेद विधि लगन धराई ॥२॥

1.507

पत्री सप्तरिषिन्ह सो दीन्ही। गहि पद विनय हिमाचल कीन्ही॥
जाइ विधिहि तिन्ह दीन्हि से पाती। बाँचत प्रीति न हृदय समाती ॥३॥

1.508

लगन बाँचि बिधि सबहि सुनाई। हरषे सुनि सत्र सुर समुदाई॥
सुमन वृष्टि नभ बाजन बाजे। मङ्गल कलस दसहु दिसि साजे ॥४॥

1.509

लगे सँवारन सकल सुर, बाहन बिविध विमान॥
होहिँ सगुन मङ्गल सुखद, करहिँ अपछरा गान ॥९१॥

1.510

सिवहि सम्भुगन करहिँ सिँगारा। जटा-मुकुट अहि-मौर सँवारा॥
कुंडल कङ्कन पहिरे ब्याला। तन-विभूति पठ-केहरि-छाला॥१॥

1.511

ससि ललाट सुन्दर सिर गङ्गा। नयन-तीनि उपबीत-भुजङ्गा॥
गरल-कंठ उर नर-सिर-माला। असिव-बेष सिव-धाम कृपाला ॥२॥

1.512

कर त्रिसूल अरु डमरु विराजा। चले बसह चढि बाजहिँ बाजा॥
देखि सिवहिँ सुर-त्रिय मुसुकाहीँ। बर लायक दुलहिनि जग नाहीं ॥३॥

1.513

बिष्नु बिरच्जि आदि सुर ब्राता। चढि चढि बाहन चले बराता॥
सुर-समाज सब भाँति अनूपा। नहिँ बरात दूलह अनुरूपा ॥४॥

1.514

बिष्नु कहा अस बिहँसि तब, बोलि सकल दिसिराज।
बिलग बिलग हाएइ चलहु सब, निज निज सहित समाज ॥२॥

1.515

बर अनुहारि बरात न भाई। हँसी करैहौ पर पुर जाई॥
बिष्नु बचन सुनि सुर मुसुकाने। निज निज सेन सहित बिलगाने ॥१॥

1.516

मनहीँ मन महेस मुसुकाहीँ। हरि के व्यङ्ग बचन नहिँ जाहीं॥
अतिप्रिय-बचन सुनत प्रियकेरे। भृङ्गिहि-प्रेरि सकल गन टेरे ॥२॥

1.517

सिव अनुसासन सुनि सब आये। प्रभु-पद-जलज सीस तिन्ह नाये॥
नाना-बाहन नाना-बेखा। बिहँ से सित्व समाज निज देखा ॥३॥

1.518

कोउ मुख-हीन बिपुल-मुख काहू। बिनु-पद-कर कोउ बहु-पद-बाहू॥
बिपुल-नयन कोउ नयन-बिहीना। रिष्ट-पुष्ट कोउ अति तन खीना ॥४॥

1.519

तन-खीन कोउ अति-पीन पावन, कोउ अपावन गति धरे।
भूषन कराल कपाल कर सब, सद्य सोनित तन भरे॥
खर-खान-सुअर-सृगाल-मुख गन, बेष अगनित को गनै।
बहु जिनिस प्रेत-पिसांच-जोगि-जमाति बरनत नहिँ बनै ॥७॥

1.520

नाचहिँ गावहिँ गीत, परम तरङ्गी भूत सब।
देखत अति बिपरीत, बोलहिँ बचन विचित्र विधि ॥९३॥

1.521

जस दूलह तस बनी बराता। कौतुक बिबिध हाएहिँ भग जाता॥
इहाँ हिमाचल रचेउ बिताना। अति बिचित्र नहिँ जाइ बखाना ॥१॥

1.522

सैल सकल जहँ लगि जग माहीँ। लघु बिसाल नहिँ वरनि सिराहीँ॥
बन सागर सब नदी तलावा। हिमगिरि सब कहँ नेवत पठावा ॥२॥

1.523

कामरूप सुन्दर तनु धारी। सहित समाज साएह बर नारी॥
आये सकल हिमाचल गेहा। गावहिँ मञ्जुर सहित सनेहा ॥३॥

1.524

प्रयमहिँ गिरि बहु गृह सँवराये। जथाजोग जहँ तहँ सब छाये॥
पुर-सोभा अवलोकि सुहाई। लागै लघु बिरच्जि निपुनाई ॥४॥

1.525

लघु लागि बिधि की निपुनता, अवलोकि पुर सोभा सही।
बन बाग कूप तडाग सरिता, सुभग सब सक को कही॥
मङ्गल बिपुल तोरन पताका, केतु गृह गृह सोहहीँ॥
बनिता पुरुष सुन्दर चतुर छबि,-देखि मुनि मन माएहहीँ ॥८॥

1.526

जगदम्बा जहँ अवतरी, सो पुर बरनि कि जाइ।
रिधि सिधि सम्पति सकल सुख, नित नूतन अधिकाइ ॥९४॥

1.527

नगर निकट बरात जब आई। पुर खरभर सोभा अधिकाई॥
करि बनाव सजि बाहन नाना। चले लेन सादर अगवाना ॥१॥

1.528

हिय हरषे सुर-सेन निहारी। हरिहि देखि अति भये सुखारी॥
सिव समाज जब देखन लागे। बिडरि चले बाहन सब भागे ॥२॥

1.529

धरि धीरज तहाँ रहे सयाने। बालक सब लेइ जीव पराने॥
गये मवन पूछहिँ पितु माता। कहहिँ बचन भय कम्पित गाता ॥३॥

1.530

कहिय काह कहि जाइ न बाता। जम कर धारि किधौँ बरियाता॥
बर बौराह बरद असवारा। व्याल कपाल बिभूषन छारा ॥४॥

1.531

तन छार ब्याल कपाल भूषन, नगन जटिल भयङ्करा।
सँग भूत प्रेत पिसाच जोगिनि, बिकट-मुख रजनीचरा॥
जो जियत रहिहि बरात देखत, पुन्य बड तेहि कर सही।
देखिहि सो उमा बिबाह घर घर, बात असि लरिकन्ह कही ॥९॥

1.532

समुझि महेस समाज सब, जननि जनक मुसुकाहिँ।
बाल बुझाये बिबिध विधि, निडर होहु डर नाहिँ ॥९५॥

1.533

लेइ अगवान बरातहि आये। दिये सबहि जनवास सुहाये॥
मैना सुभ आरती सँवारी। सङ्ग सुमङ्गल गावहिँ नारी ॥१॥

1.534

कञ्चनथार साएह बर पानी। परिछन चली हरहि हरषानी॥
विकट-बेष रुद्रहि जब देखा। अबलन्ह उर भय भयौ बिसेखा ॥२॥

1.535

भागि भवन पैठी अति त्रासा। गये महेस जहाँ जनवासा॥
मैना हृदय भयौ दुख भारी। लीन्ही बोलि गिरीस-कुमारी ॥३॥

1.536

अधिक सनेह गोद बैठारी। स्याम-सरोज नयन भरि बारी ॥
जेहि बिधि तुम्हहिँ रूप अस दीन्हा। तेहि जड बर बाउर कस कीन्हा॥४॥

1.537

कस कीन्ह बर बौराह बिधि जेहि, तुम्हहिँ सुन्दरता दई।
जो फल चहिय सुरतरुहि सो, बरबस बबूरहि लागई॥
तुम्ह सहित गिरि तेँ गिरौँ पावक, जरौँ जलनिधि महँ परौँ॥
घर जाउ अपजस होउ जग, जीवत बिबाह न हौँ करौँ ॥१०॥

1.538

भई बिकल अबला सकल, दुखित देखि गिरि-नारि।
करि बिलाप रोदति बदति, सता सनेह सँभारि ॥९६॥

1.539

नारद कर मैं काह बिगारा। भवन मोर जिन्ह बसत उजारा॥
अस उपदेस उमहिँ जिन्ह दीन्हा। बौरे बरहि लागि तप कीन्हा ॥१॥

1.540

साँचेहु उनके मोह न माया। उदासीन धन धाम न जाया॥
पर-घर-घालक लाज न भीरा। वाँझ कि जान प्रसव की पीरा ॥२॥

1.541

जननिहिँ विकल बिलोकि भवानी। बोली जुत-बिबेक मृदु बानी॥
अस बिचारि सेआचहि मति माता। सो न टरै जो रचै विधाता ॥३॥

1.542

करम लिखा जौँ बाउर नाहू। तौ कत दोष लगाइय काहू॥
तुम्ह सन मिठिहि कि विधि के अङ्का। मातु व्यर्थ जनि लेहु कलङ्का ॥४॥

1.543

जनि लेहु मातु कलङ्क करुना,-परिहरहु अवसर नहीँ।
दुखसुख जो लिखा लिलार हमरे, जाब जहँ पाउब तहीँ॥
सुनि उमा बचन बिनीत कोमल, सकल अबला सोचहीँ।
बहु भाँति बिधिहि लगाइ दूषन, नयन बारि बिमाएएचहीं ॥११॥

1.544

तेहि अवसर नारद सहित, अरु रिषि-सप्त समेत।
समाचार सुनि तुहिन-गिरि, गवने तुरत निकेत ॥९७॥

1.545

तब नारद सबही समुझावा। पूरब-कथा-प्रसङ्ग सुनावा॥
मैना सत्य सुनहु मम बानी। जगदम्बा तव सुता भवानी ॥१॥

1.546

अजा अनादि-सक्ति अबिनासिनि। सदा सम्भु अरघङ्ग-निवासिनि॥
जग-सम्भव-पालन-लय कारिनि। निज-इच्छा लीला बपु धारिनि ॥२॥

1.547

जनमी प्रथम दच्छ-गृह जाई। नाम सती सुन्दर तनु पाई॥
तहौँ सती सङ्करहि बिबाहोँ। कथा प्रसिद्ध सकल जग माहीँ ॥३॥

1.548

एक बार आवत सिव सङ्गा। देखेड रघुकुल कमल पतङ्गा॥
भयौ मोह सिव कहा न कीन्हा। भ्रम बस बेष सीय कर लीन्हा ॥४॥

1.549

सिय बेष सती जो कीन्ह तेहि, अपराध सङ्कर परिहरी।
हर बिरह जाइ बहोरि पितु के, जग्य जोगानल जरी॥
अब जनमि तुम्हरे भवन निजपति, लागि दारुन तप किया।
अस जानि संसय तजहु गिरिजा, सर्वदा सङ्कर प्रिया ॥१२॥

1.550

सुनि नारद के बचन तब, सब कर मिटा विषाद।
न महँ ब्यापेउ सकल पुर, घर घर यह सम्बाद ॥९८॥

1.551

तब मैना हिमवन्त अनन्दे। पुनि पुनि पारवती-पद बन्दे।
नारि पुरुष सिसु जुबा सयाने। नगर लोग सब अति हरपाने ॥१॥

1.552

लगे होन पुर मङ्गल गाना। सजे सबहिँ हाटक-घट नाना॥
भाँति अनेक भई जेवनारा। सूप-सास्त्र जस किछु व्यवहारा ॥२॥

1.553

जेवनार कि जाइ बखानी। बसहिँ भवन जेहि मातु भवानी॥
सादर बोले सकल बराती। बिष्नु बिरच्जि देव सब जाती ॥३॥

1.554

बिबिध पाँति बैठी जेवनारा। लगे परोसन निपुन सुआरा॥
नारि-बृन्द सुर जेँवत जानी। लगीँ देन गारी मृदु बानी ॥४॥

1.555

गारी मधुर सुर देहिँ सुन्दरि, व्यङ्ग बचन सुनावहीँ।
भोजन करहिँ सुर अति बिलम्ब, बिनोद सुनि सचु पावहीँ॥
जेँवत जो बढेउ अनन्द सो, मुख कोटिहू न परै कह्यो।
अँचवाइ दीन्हे पान गवने, बास जहँ जाको रह्यो ॥१३॥

1.556

बहुरि मुनिन्ह हिमवन्त कहँ, लगन सुनाई आइ।
समय बिलोकि बिबाह कर, पठये देव बुलाइ ॥९९॥

1.557

बोलि सकल सुर सादर लीन्हे। सबहि जयोचित आसन दीन्हे॥
बेदी बेद-बिधान सँवारी। सुभग सुमङ्गल गावहिं नारी ॥१॥

1.558

सिंहासन अति दिब्य सुहावा। जाइ न बरनि बिचित्र बनावा॥
बैठे सिव विप्रन्ह सिर नाई। हृदय सुमिरि निज प्रभु रघुराई ॥२॥

1.559

बहुरि मुनीसन्ह उमा बोलाई। करि सिङ्गार सखी लेइ आई॥
देखत रूप सकल. सुर मोहे। बरनै छबि अस जग कबि को हे ॥३॥

1.560

जगदम्बिका जानि भव-भामा। सुरन्ह मनहिं मन कीन्ह प्रनामा॥
सुन्दरता-मरजाद भवानी। जाइ न कोटिहु बदन बखानी ॥४॥

1.561

कोटिहु बदन नहिँ बनै बरनत, जग-जननि-साएभा महा।
सकुचहिँ कहत खुति सेष सारद, मन्द-मति तुलसी कहा ॥
बि-खानि मातु भवानि गवनी, मध्य मंडप सिव जहाँ।
अवलोकि सकै न सकुच पति-पद,-कमल मन मधुकर तहाँ ॥१४॥

1.562

मुनि अनुसासन गनपतिहि, पूजेउ सम्मु-भवानि।
कोउ सुनि संसय करै जनि, सुर अनादि जिय जानि ॥१००॥

1.563

जसि बिबाह के बिधि खुति गाई। महामुनिन्ह सो सब करवाई॥
गहि गिरीस कुस कन्या पानी। भवहि समरपी जानि भवानी ॥१॥

1.564

पानि-ग्रहन जब कीन्ह महेसा। हिय हरषे तब सकल सुरेसा॥
बेद मन्त्र मुनिबर उच्चरहीँ। जय जय जय सङ्कर सुर करहीँ ॥२॥

1.565

बाजहिँ बाजन विबिध बिधाना। सुमन बृष्टि नभ भै बिधि नाना॥
हर गिरिजा कर भयेउ बिधाहू। सकल भुवन भरि रहा उछाहू ॥३॥

1.566

दासी दास तुरग रथ नागा। धेनु बसन मनि बस्तु विभागा॥
अन्न कनक-भाजन भरि जाना। दाइज दीन्ह न जाइ बखाना ॥४॥

1.567

दाइज दियाए बहु भाँति पुनि कर,-जोरि हिम-भूधर कह्यो।
का देउँ पूरनकाम सङ्कर, चरन-पङ्कज गहि रह्यो॥
सिव कृपासागर ससुर का सन्तोष सब भाँतिहि कियाए।
पुनि गहे पद-पाथोज मैना, प्रेम परिपूरन हियो ॥१५॥

1.568

नाथ उमा मम प्रान प्रिय, गृह-किङ्करी करेहु।
मेहु सकल अपराध अब, हाइ प्रसन्न बर देहु ॥१०१॥

1.569

बहु बिधि सम्भु सास समुझाई। गवनी भवन चरन सिर नाई॥
जननी उमा बोलि तब लीन्ही। लेइ उछङ्ग सुन्दरसिख दीन्हो॥१॥

1.570

करेहु सदा सङ्कर-पद-पूजा। नारि धरम पति-देव न दूजा॥
बचन कहत भरि लोचन बारी। बहुरि लाइ उरलीन्हि कुमारी ॥२॥

1.571

कत बिधि सृजी नारि जग माहीँ। पराधीन सपनेहुँ सुख माहीं॥
भै अति प्रेम बिकल महँतारी। धीरज कीन्ह कुसमय बिचारी ॥३॥

1.572

पुनि पुनि मिलति परति गहि चरना। परम प्रेम कछु जाइ न वरना॥
सब नारिन्ह मिलि मैँटि भवानी। जाइ जननि उर पुनि लपटानी ॥४॥

1.573

जननिहि बहुरि मिलि चली उचित असीस सब काहू दई।
फिरि फिरि बिलोकति मातु तन तब, सखी लै सिव पहिँ गई।
जाचक सकल सन्तोषि सङ्कर, उमा सहित भवन चले।
सब अमर हरषे सुमन बरषि निसान नभ बाजे भले ॥१६॥

1.574

चले सङ्ग हिमवन्त तब, पहुँचावन अति हेतु।
बिबिध भाँति परितोष करि, बिदा कीन्हि वृषकेतु ॥१०२॥

1.575

तुरत भवन आये गिरिराई। सकल सैल सर लिये बोलाई॥
आदर दान बिनय बहु माना। सब कर विदा कीन्ह हिमवाना॥१॥

1.576

जबहिं सम्भु कैलासहि आये। सुर सब निज निज लोक सिधाये॥
जगत मातु-पितु सम्भु-भवानी। तेहि सिङ्गार न कहौँ बखानी ॥२॥

1.577

करहिँ बिबिध बिधि भोग बिलासा। गनन्ह समेत बसहिँ कैलासा॥
हर-गिरिजा बिहार नित नयऊ ।एहि विधि बिपुल काल चलि गयऊ ॥३॥

1.578

तब जनमेउ षट-बदन-कुमारा। तारक असुर समर जेहि मारा॥
आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। षट-मुख जनम सकल जग जाना ॥४॥

1.579

जग जान षनमुख जनम करम प्रताप पुरुषारथ महा।
तेहि हेतु मैँ वृषकेतु-सुत कर, चरित सञ्छेपहि कहा॥
यह उमा-सम्भु बिबाह जे नर, नारि कहहिँ जे गावहीँ।
कल्यान काज बिबाह मङ्गल, सर्बदा सुख पावहीं ॥१७॥

1.580

चरित-सिन्धु गिरिजारवन, बेद न पावहिँ पार।
बरनै तुलसीदास किमि, अति मति-मन्द गँवार ॥१०३॥

1.581

सम्भु चरित सुनि सरस सुहावा। भरद्वाज मुनि अति सुख पावा॥
बहु लालसा कथा पर बाढी। नयन-नीर रोमावलि ठाढी ॥१॥

1.582

प्रेम बिबस मुख आव न बानी। दसा देखि हरषे मुनि-ज्ञानी॥
अहो धन्य तब जनम मुनीसा। तुम्हहिँ प्रान सम प्रिय गौरीसा ॥२॥

1.583

सिव-पद-कमल जिन्हहिँ रति नाहीं। रामहिँ ते सपनेहुँ न सुहाहीँ॥
बिनु छल विस्वनाथ-पद नेहू। रामभगत कर लच्छन एहू ॥३॥

1.584

सिव सम को रघुपति-ब्रत-धारी। बिनु अघ तजी सत्ती असि नारी॥
पन करि रघुपति-भगति दिढाई। को सिव सम रामहिँ प्रिय भाई ॥४॥

1.585

प्रथमहिँ कहि मैँ सिव चरित, बूझा मरम तुम्हार।
सुचि सेवक तुम्ह राम के, रहित समस्त बिकार ॥१०४॥

1.586

मैँ जाना तुम्हार गुन सीला। कहौँ सुनहु अब रघुपति-लीला॥
सुनु मुनि आजु समागम तोरे। कहि न जाइ जस सुख मन मारे ॥१॥

1.587

रामचरित अति अमित मुनीसा। कहि न सकहिँ सतकोटि अहीसा॥
तदपि जथा स्रुत कहौँ बखानी। सुमिरि गिरापति प्रभु धनु-पानी ॥२॥

1.588

सारद दारु-नारि-सम स्वामी। राम-सूत्रधर अन्तरजामी॥
जेहि पर कृपा करहिँ जन जानी। कबि-उर-अजिर नचावहिँ बानी ॥३॥

1.589

प्रनवौँ सोइ कृपाल रघुनाथा। बरनौँ विषद तासु गुन गाथा॥
परम रम्य गिरिबर कैलासू। सदा जहाँ सिव-उमा निवासू ॥४॥

1.590

सिद्ध तपोधन जोगि जन, सुर किन्नर मुनि बृन्द।
बसहि तहाँ सुकृती सकल, सेवहिँ सिव सुखकन्द ॥१०५॥

1.591

हरि-हर-विमुख धरम रति नाहीँ। ते नर तहँ सपनेहुँ नहिँ जाहोँ।
तेहि गिरि पर बट बिटप विसाला। नित नूतन सुन्दर सब काला ॥१॥

1.592

त्रिविध समीर सुसीतल छाया। सिव-बिस्राम बिटप स्रुति गाया॥
एक बार तेहि तर प्रभु गयऊ। तरु बिलोकि उर अति सुख भयऊ ॥२॥

1.593

निज कर डासि नाग-रिपु-छाला। बैठे सहजहिँ सम्भु कृपाला॥
कुन्द-इन्दु-दर गौर सरीरा। भुज-प्रलम्ब परिधन-मुनि-चीरा ॥३॥

1.594

तरुन-अरुन-अम्बुज सम चरना। नख-दुति भगत-हृदय-तम-हरना।
भुजग-भूति-भूषन त्रिपुरारी। आनन सरद-चन्द-छवि हारी ॥४॥

1.595

जटा-मुकुट-सुरसरित सिर, लोचन नलिन बिसाल।
नीलकंठ लावन्यनिधि, साएह बाल-बिधु-भाल ॥१०६॥

1.596

बैठे साएह काम-रिपुं कैसे। घरे सरीर सान्त-रस जैसे।
पारबतीभल अवसर जानी। गई सम्भु पहिँ मातु भवानी ॥१॥

1.597

जानि प्रिया आदर अति कीन्हा। बाम-भाग आसन हर दीन्हा।
बैठी सिव समीप हरपाई। पूरब-जनम-कथा चित आई ॥२॥

1.598

पति-हिय-हेतु अधिक मन मानी। बिहँसि उमा बोली मृदु बानी॥
कथा जो सकल-लोक-हितकारी। सोइ पूछन चह सैल-कुमारी ॥३॥

1.599

बिस्वनाथ मम-नाथ पुरारी। त्रिभुवन महिमा बिदित तुम्हारी॥
चर अरु अचर नाग नर देवा । सकल करहिँ पद-पङ्कज-सेवा ॥४॥

1.600

प्रभु समरथ सरबज्ञ सिव, सकल कला-गुन धाम।
जोग-ज्ञान-बैराग्य-निधि, प्रनत-कलपतरु नाम ॥१०७॥

1.601

जौँ माए पर प्रसन्न सुखरासी। जानिय सत्य माहि निज-दासी॥
तौ प्रभु हरहु मोर अज्ञानी। कहि रघुनाथ कथा बिधि नाना ॥१॥

1.602

जासु भवन सुरतरु तर होई। सह कि दरिद्र-जनित-दुख साएई॥
ससि-भूषन अस हृदय बिचारी। हरहु नाथ मम मति भ्रम भारी ॥२॥

1.603

प्रभु जे मुनि परमारथबादी। कहहिँ राम कहँ ब्रह्म अनादी॥
सेष सारदा बेद पुराना। सकल करहिँ रघुपति-गुन-गाना ॥३॥

1.604

तुम्ह पुनि राम राम दिन राती। सादर जपहु अनङ्ग-अराती॥
राम सो अवध-तृपति-सुत साई। की अज अगुन अलख-गति कोई ॥४॥

1.605

जौँ नृप-तनय त ब्रह्म किमि, नारि बिरह मति भोरि।
देखि चरित महिमा सुनत, भ्रमति बुद्धि अति माएरि ॥१०८॥

1.606

जौँ अनीह व्यापक बिभु कोऊ। कहहु बुझाइ नाथ मोहि सोऊ॥
अज्ञ जानि रिस उर जनि धरहू। जेहि विधि मोह मिटै सोइ करहू ॥१॥

1.607

मैँ बन दीख राम प्रभुताई। अति-भय-विकल न तुम्हहिँ सुनाई॥
तदपि मलिन मनबोधन आवा। साए फल भली भाँति हम पावा ॥२॥

1.608

अजहूँ कछु संसय मन मोरे। करहु कृपा विनवौँ कर जोरे॥
प्रभु तब मोहि बहु भाँति प्रबोधा। नाथ सो समुझि करहु जनि क्रोधा ॥३॥

1.609

तब कर अस बिमाएह अब नाहीँ। राम-कथा पर रुचि मन माहीँ॥
कहहु पुनीत राम-गुन-गाथा। भुजगराज-भूषन सुर-नाथा ॥४॥

1.610

बन्दौँ पद धरि धरनि सिर, विनय करौँ कर जोरि।
बरनहु रघुबर-बिसद-जस, स्त्रुति-सिद्धान्त निचोरि ॥१०९॥

1.611

जदपि जोषिता अनअधिकारी। दासी मन क्रम बचन तुम्हारी॥
गूढौ तत्व न साधु दुरावहिँ। आरत अधिकारी जहँ पावहिँ ॥१॥

1.612

अति आरति पूछौँ सुरराया। रघुपति कथा कहहु करि दाया॥
प्रथम साए कारन कहहु बिचारी। निर्गुन-ब्रह्म सगुन-जपु-धारी ॥२॥

1.613

पुनि प्रभु कहहु राम अवतारा। बालचरित पुनि कहहु उदारा॥
कहहु जथा जानकी बिबाही। राज तजा सो दूषन काही ॥३॥

1.614

बन बसि कीन्हे चरित अपारा। कहहु नाथ जिमि रावन मारा॥
राज वैठि कीन्ही बहु लीला। सकल कहहु सङ्कर सुभ-सीला ॥४॥

1.615

बहुरि कहहु करुनायतन, कीन्ह जो अचरज राम।
प्रजा सहित रघुबंस-मनि, किमि गवने निज-धाम ॥११०॥

1.616

पुनि प्रभु कहहु सातत्व बखानी। जेहि बिज्ञान मगन मुनिज्ञानी।
भगति ज्ञान बिज्ञान बिरागा। पुनि सब बरनहु सहित बिभागा ॥१॥

1.617

औरौ राम-रहस्य अनेका। कहहु नाथ अति बिमल बिबेका॥
जो प्रभु मैँ पूछा नहिँ होई। सोउ दयाल राखहु जनि गाएई ॥२॥

1.618

तुम्ह त्रिभुवन गुरु बेद बखाना। आन जोव पाँवर का जाना।
प्रस्न उमा कै सहज सुहाई। छल बिहीन सुनि सिव मन भाई ॥३॥

1.619

हर हिय राम-चरित सब आये। प्रेम पुलक लोचन जलं छाये।
श्रीरघुनाथ-रूप उर आवा। परमानन्द अमित सुख पावा ॥४॥

1.620

भगन ध्यान-रस दंड जुग, पुनि मन बाहेर कीन्ह।
रघुपति-चरित महेस तब, हरषित बरनै लीन्ह ॥१११॥

1.621

झूठौ सत्य जाहि विनु जाने। जिमि भुजङ्ग बिनु रजु पहिचाने॥
जेहि जाने जग जाइ हेराई। जागे जथा सपन भ्रम जाई ॥१॥

1.622

बन्दौँ बाल-रूप सोइ रामू। सब सिधि सुलभ जपत जिसु नामू॥
मङ्गल-भवन अमङ्गल-हारी। द्रवौ सो दसरथ अजिर-बिहारी ॥२॥

1.623

करि प्रनाम रामहिँ त्रिपुरारी। हरषि सुधा सम गिरा उचारी॥
धन्य धन्य गिरिराज-कुमारी। तुम्ह समान नहिँ कोउ उपकारी ॥३॥

1.624

पूछेहु रघुपति-कथा प्रसङ्गा। सकल-लोक जग-पावनि गङ्गा॥
तुम्ह रघुबीर चरन अनुरागी। कोन्हिहु प्रस्न जगत-हित लागो ॥४॥

1.625

रामकृपा तेँ पारबति, सपनेहुँ तब मन माहिँ।
क मोह सन्देह भ्रम, मम बिचार कछु नाहिँ ॥११२॥

1.626

तदपि असङ्का कीन्हिहु साएई। कहत सुनत सब कर हित हाई॥
जिन्ह हरिकथा सुनी नहिँ काना। खवन-रन्ध्र अहि-भवन समाना ॥१॥

1.627

नयनन्हि सन्त दरस नहिँ देखा। लोचन माएर-पड्ख कर लेखा॥
ते सिर कटु-तूँचरि समतूला। जे न नमन हरि-गुरु-पद-मूला ॥२॥

1.628

जिन्ह हरिभगति हृदय नहिँ आनी। जीवत सव समान ते प्रानी॥
जो नहिँ करै राम-गुन-गाना। जीह सा दादुर-जीह समाना ॥३॥

1.629

कुलिस-कठोर निठुर सोइ छाती। सुनि हरि-चरित न जो हरपाती।
गिरिजा सुनहु राम कै लीला। सुर-हित दनुज-बिमोहन-सोला ॥४॥

1.630

रामकथा सुरधेनु सम, सेवत सब सुख-दानि।
सतसमाज सुरलोक सब, को न सुनै अस जानि ॥११३॥

1.631

रामकथा सुन्दर करतारी। संसय-बिहग उडावनिहारी॥
रामकथा कलि-बिटप कुठारी। सादर सुनु गिरिराज-कुमारी ॥१॥

1.632

राम नाम गुन चरित सुहाये। जनम करम अगनित सुति गाये॥
जथा अनन्त राम भगवाना। तथा कथा कीरति गुन नाना ॥२॥

1.633

तदपि जथा-सुत जसि मति माएरी। कहिहौँ देखि प्रीति अति तारी॥
उमा प्रस्न तब सहज सुहाई। सुखद सन्त सम्मत माहि भाई ॥३॥

1.634

एक बात नहिँ माहि सुहानी। जदपि मोह-बस कहेहु भवानी॥
तुम्ह जो कहा राम कोउ आना। जेहि खुति गाव धरहिँ मुनिध्याना॥४॥

1.635

कहहिँ सुनहिँ अस अधम नर, ग्रसे जे माह पिसाच।
पाखंडी हरि-पद-बिमुख, जानहिँ झूठ न साँच ॥१९४॥

1.636

अज्ञ अकोबिद अन्ध अभागी। काई बिषय मुकुर-मन लागी॥
लम्पद कपटी कुटिल बिसेखी। सपनेहुँ सन्त-सभा नहिँ देखी ॥१॥

1.637

कहहिँ ते बेद असम्मत बानी। जिन्हहिँ न सूझ लाभ नहि हानी॥
मुकुर मलिन अरु नयन बिहीना। राम-रूप देखहिँ किमि दीना ॥२॥

1.638

जिन्ह के अगुन न सगुन बिबेका। जल्पहिँ कल्पित बचन अनेका॥
हरि-माया-बस जगत भ्रमाहीँ। तिन्हहिँ कहत कछु अघटित नाहीँ ॥३॥

1.639

बातुल भूत-बिबस मतवारे। ते नहिँ बोलहिँ बचन बिचारे॥
जिन्ह कृत महा-मोह-मद पाना। तिन्ह कर कहा करिय नहिँ काना ॥४॥

1.640

अस निज हृदय बिचारि, तजु संसय भजु राम-पद।
सुनु गिरिराज-कुमारि, भ्रम-तम रबि-कर-वचन-मम ॥११५॥

1.641

सगुनहिँ अगुनहिँ नहिँ कछु भेदा। गावहिँ मुनि पुरान बुध वेदा॥
अगुन अरूप अलख अज जोई। भगत-प्रेम-बस सगुन साए होई ॥१॥

1.642

जो गुन रहित सगुन सोइ कैसे। जल-हिम-उपल बिलग नहिँ जैसे॥
जासु नाम भ्रम-तिमिर-पतङ्गा। तेहि किमि कहिय बिमाएह प्रसङ्गा ॥२॥

1.643

राम सच्चिदानन्द दिनेसा। नहिँ तहँ मोह-निसा-लवलेसा॥
सहज प्रकास-रूप भगवाना। नहिँ तहँ पुनि बिज्ञान बिहाना ॥३॥

1.644

हरष बिषाद ज्ञान अज्ञाना। जीव-धरम अहमित अभिमाना॥
राम ब्रह्म ब्यापक जग जाना। परमानन्द परेस पुराना ॥१॥

1.645

पुरुष-प्रसिद्ध प्रकास-निधि, प्रगट परावर-नाथ।
रघुकुल-मनि मम स्वामि सोइ, कहि सिव नायौ माथ ॥११६॥

1.646

निजभ्रम नहिँ समुझहिँ अज्ञानी। प्रभु परमोह धरहिँ जड प्रानी॥
जथा गगन धन-पटल निहारी झाँपेउ भानु कहहिँ कुभिचारी ॥१॥

1.647

चित्तव जो लोचन अङ्गुलि लाये। प्रगट जुगल ससि तेहि के भाये॥
उमा राम-विषयक अस माएहा। नभ तम-धूम-धूरि जिमि सोहा ॥२॥

1.648

विषय करन सुर जीव समेता। सकल एक तेँ एक सचेता॥
सब कर परम-प्रकासक जोई। राम अनादि अवधपति सेआई ॥३॥

1.649

जगत प्रकास्य प्रकासक रामू। मायाधीस ज्ञान-गुन-धामू॥
जासु सत्यता तेँ जड माया। भास सत्य इव माह सहाया ॥४॥

1.650

रजत सीप महँ भास जिमि, जथा भानु-कर-वारि।
जदपि मृषा तिहुँ काल सो, भ्रम न सकै कोउ टारि ॥११७॥

1.651

एहि बिधि जगहरि आस्त्रित रहई। जदपि असत्य देत दुख अहई॥
जौँ सपने सिर काटै कोई। बिनु जागे न दूरि दुख होई ॥१॥

1.652

जासु कृपा अस भ्रम मिटि जाई। गिरिजा सेआइ कृपालु रघुराई॥
आदि अन्त कोउ जासु न पावा,। मति अनुमान निगम अस गावा ॥२॥

1.653

बिनु पद चलै सुनै बिनु काना। कर बिनु करम करै विधि नाना॥
आनन रहित सकल-रस-भोगी। बिनु बानी वकता बड जोगी ॥३॥

1.654

तन बिनु परस नयन बिनु देखा। ग्रहै ध्रान बिनु बास असेखा।
असि सब भाँति अलौकिक करनी। महिमा जासु जाइ नहिँ बरनी ॥४॥

1.655

जेहि इमि गावहिँ वेद बुध, जाहि धरहिँ मुनि ध्यान।
साएइ दसरथ-सुत भगत-हित, कोसलपति-भगवान ॥११८॥

1.656

कासी मरत जन्तु अवलोकी। जासु नाम बल करौँ बिसोकी॥
इ प्रभु मोर चराचर स्वामी। रघुबर सब उर अन्तरजामी ॥१॥

1.657

बिसहु जासु नाम नर कहहीँ। जनम अनेक रचित अघ दहहीँ॥
सादर सुमिरन जे नर करहीँ। भव-बारिधि गो-पद इव तरहीँ ॥२॥

1.658

राम साए परमातमा भवानी। तहँ भ्रम अति अबिहित तब बानी॥
अस संसय आनत उर माहीँ। ज्ञान विराग सकल गुन जाहीँ ॥३॥

1.659

सुनि सिव के सम-भञ्चन-बचना। मिटि गै सब कुतरक कै रचना।
भै रघुपति-पद प्रीति प्रतीती। दारुन असम्भावना बीती ॥४॥

1.660

पुनि पुनि प्रभु-पद कमल गहि, जोरि पङ्करुह पानि।
बोली गिरिजा बचन बर, मनहुँ प्रेम रस सानि ॥१९९॥

1.661

ससि-कर सम सुनि गिरा तुम्हारी। मिटा मोह सरदात प मारी।
तुम्ह कृपाल मम संसय हरेऊ। राम-सरूप जानि मेआहि परेऊ ॥१॥

1.662

नाथ कृपा अब गयौ विषादा। सुखी भैउँ प्रभु-चरन-प्रसादा।
अब मोहि आपनि किङ्करि जानी। जदपि सहज जड नारि अयानी ॥२॥

1.663

प्रथम जो मैँ पूछा सोइ कहहू। जौँ मो पर प्रसन्न प्रभु अहहू॥
राम ब्रह्म चिन्मय अबिनासी। सर्व रहित सब उर-पुर वासी ॥३॥

1.664

नाथ धरेउ नर तनु केहि हेतू। मीहि समुझाइ कहहु चुपकेतू॥
उमा बचन सुनि परम बिनीता। राम कथा पर प्रीति पुनीता ॥४॥

1.665

हिय हरषे कामारि तब, सङ्कर सहज सुजान।
बहु विधि उमहिँ प्रसंसि पुनि, बोले कृपानिधान॥
सुनु सुभ-कथा भवानि, रामचरितमानस बिमल।
कहा भुसुंडि बखानि, सुना बिहग-नायक गरुड॥
हरि-गुन नाम अपार, कथा रूप अगनित अमित।
मैं निज मति अनुसार, कहौँ उमा सादर सुनहु।
सम्बाद उदार, जेहि बिधि भा आगे कहब।
सुनहु राम अवतार, चरित परम सुन्दर अनघ॥
हरि गुन नाम अपार, कथा रूप अगनित अमित।
मैं निज मति अनुसार, कहौँ उमा सादर सुनहु ॥१२०॥

1.666

सुनु गिरिजा हरिचरित सुहाये। बिपुल बिसद निगमागम गाये॥
हरि अवतार हेतु जेहि होई। इदमित्थं कहि जाइ न साई ॥१॥

1.667

राम अतर्क्य बुद्धि मन बानी। मत हमार अस सुनहिँ सयानी॥
तदपि सन्त मुनि बेद पुराना। जस कछु कहहिँ स्वमति अनुमाना ॥२॥

1.668

तस मैँ सुमुखि सुनावौँ तोही। समुझि परै जस कारन माएही॥
जब जब होइ धरम कै हानी। बाढै असुर अधम अभिमानी ॥३॥

1.669

करहिँ अनीति जाइ नहिँ बरनी । सीदहिँ बिप्र-धेनु-सुर-धरनी॥
तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा ॥४॥

1.670

असुर मारि थापहिँ सुरन्ह, राखहिँ निज-खुति-सेतु।
जग बिस्तारहिँ विसद जस, राम-जनम कर हेतु ॥१२१॥

1.671

साइ जस गाइ भगत भव तरहीँ। कृपासिन्धु जन-हित तनु धरहीँ।
राम-जनम के हेतु अनेका। परम बिचित्र एक तेँ एका ॥१॥

1.672

जनम एक दुइ कहौँ बखानी। सावधान सुनु सुमति भवानी॥
द्वारपाल हरि के प्रिय दोऊ। जय अरु बिजय जान सब कोऊ ॥२॥

1.673

बिन साप तेँ दूनौँ भाई। तामस असुर देह तिन्ह पाई॥
कनककसिपु अरु हाटकलोचन। जगतविदित सुरपति मद-मोचन ॥३॥

1.674

बिजई समर बीर बिख्याता। धरि बराह वपु एक निपाता॥
होइ नरहरि दूसर पुनि मारा। जन प्रहलाद सुजस विस्तारा ॥४॥

1.675

भये निसाचर जाइ तेइ, महाबीर बलवान।
कुम्भकरन रावन, सुभट, सुर-बिजई जग जान ॥१२२॥

1.676

मुकुत न भये हते भगवाना। तीनि जनम द्विज बचन प्रमाना॥
एक बार तिन्ह के हित लागी। घरेउ सरीर भगत अनुरागी ॥१॥

1.677

कस्यप अदिति तहाँ पितु माता। दसरथ कौसल्या बिख्याता॥
एक कलप एहि बिधि अवतारा। चरित पवित्र किये संसारा ॥२॥

1.678

एक कलप सुर देखि दुखारे। समर जलन्धर सन सब हारे।
सम्भु कीन्ह सङ्काम अपारा। दनुज महाबल मरै न मारा ॥३॥

1.679

परम-सती असुराधिप-नारी। तेहि बल ताहि न जितहिँ पुरारी ॥४॥

1.680

छल करि टारेउ तासु ब्रत, प्रभु सुर कारज कीन्ह।
जब तेइँ जानेउँ मरम तब, साथ कोप करि दीन्ह ॥१२३॥

1.681

तासु साप हरि कीन्ह प्रबाना। कौतुक-निधि कृपाल भगवाना॥
तहाँ जलन्धर रावन भयऊ। रन हति राम परम-पद दयऊ ॥१॥

1.682

एक जनम कर कारन एहा। जेहि लगि राम धरी नर-देहा॥
प्रति अवतार कथा प्रभु केरी। सुनु मुनि बरनी कबिन्ह घनेरी ॥२॥

1.683

नारद साप दीन्ह एक बारा। कलप एक तेहि लगि अवतारा॥
गिरिजा चकित भई सुनि बानी। नारद बिष्नु भगत पुनि ज्ञानी ॥३॥

1.684

कारन कवन साप मुनि दीन्हा। का अपराध रमापति कीन्हा।
यह प्रसङ्ग माएहि कहहु पुरारी। मुनि मन माएह आचरज भारी ॥४॥

1.685

बोले बिहँसि महेस तब, ज्ञानी मूढ न कोइ।
जेहि जस रघुपति करहिँ जब, सो तस तेहि छन होइ॥
कहौँ राम-गुन गाथ, भरद्वाज सादर सुनहु।
भव भज्जन रघुनाथ, भजुः तुलसी तजि मान मद ॥१२४॥

1.686

हिम गिरि गुहा एक अति पावनि। बह समीप सुरसरी सुहावनि॥
आस्त्रम परम पुनीत सुहावा। देखि देवरिषि मन अतिभावा ॥१॥

1.687

निरखि सैल सरि बिपिन विभागा। भयौ रमापति-पद अनुरागा॥
सुमिरत हरिहि साप गति बाधी। सहज बिमल मन लागि समाधी ॥२॥

1.688

मुनि गति देखि सुरेस डराना। कामहिँ बोलि कीन्ह सनमाना॥
सहित सहाय जाहु मम हेतू। चलेउ हरषि हिय जलचर केतू ॥३॥

1.689

सुनासीर मन महँ असि त्रासा। चहत देवरिषि मम पुर बासा।
जे कामी लोलुप जग माहीँ। कुटिल काक इव सबहि डेराहीँ ॥४॥

1.690

सूख हाड लेइ भाग सठ, स्वान निरखि मृगराज।
ईनि लेइ जनि जानि जड, तिमि सुरपतिहि न लाज ॥१२५॥

1.691

तेहि आस्त्रमहि मदन जब गयऊ। निज माया बसन्त निरमयऊ।
कुसुमित बिबिध बिटप बहु रङ्गा। कूजहिँ कोकिल गुञ्जहिँ भृङ्गा ॥१॥

1.692

चली सुहावनि त्रिबिध बयारी। काम-कृसानु बढावनि हारी।
रम्भादिक सुर-नारि नबीना। सकल असमसर-कला-प्रबीना ॥२॥

1.693

करहिँ गान बहु तान तरङ्गा। बहु बिधि क्रीडहिँ पानि-पतङ्गा॥
देखि सहाय मदन हरषाना। कीन्हेसि पुनि प्रपञ्च विधि नाना ॥३॥

1.694

काम-कला कछु मुनिहिँ न ब्यापी। निज-भय डरेउ मनेआभव पापो॥
सीम कि चापि सकै कोउ तासू। बड रखवार रमापति जासू ॥४॥

1.695

सहित सहाय समीत अति, मानि हारि मन मैन।
गहेसि जाइ मुनि चरन तब, कहिं सुठि आरत बैन ॥१२६॥

1.696

भयौ न नारद मन कछु रोषा। कहि प्रिय बचन काम परितोषा।
नाइ चरन सिर आयसु पाई। गयौ मदन तव सहित सहाई ॥१॥

1.697

मुनि सुसीलता आपनि करनी। सुरपति-सभा जाइ सब बरनी॥
सुनि सब के मन अचरज आवा। मुनिहि प्रसंसि हरिहि सिर नावा ॥२॥

1.698

तव नारद गवने सिव पाहीँ। जिता काम अहमिति मन माहीँ।
मार चरित सङ्करहि सुनाये। अति प्रिय जानि महेस सिखाये ॥३॥

1.699

बार बार बिनवौँ मुनि तोही। जिमि यह कथा सुनायहु माएही॥
तिमि जनि हरिहि सुनायहु कबहूँ। चलेहु प्रसङ्ग दुरायहु तबहूँ ॥४॥

1.700

सम्भु दीन्ह उपदेस हित, नहिँ नारदहि सोहान।
भरद्वाज कौतुक सुनहु, हरि-इच्छा बलवान ॥१२७॥

1.701

राम कीन्ह चाहहिँ साएइ होई। करै अन्यथा अस नहिँ कोई॥
सम्भु बचन मुनि मन नहिँ भाये। तब बिरञ्चि के लोक सिधाये ॥१॥

1.702

एक बार करतल बर-बीना। गावत हरि-गुन गान-प्रबीना॥
ईरसिन्धु गवने मुनिनाथा। जहँ बस श्रीनिवास स्त्रुतिमाथा ॥२॥

1.703

हरषि मिले उठि रमानिकेता। बैठे आसन रिषिहि समेता॥
बोले बिहँसि चराचर-राया। बहुते दिनन्ह कीन्हि मुनि दाया ॥३॥

1.704

काम-चरित नारद सब भाखे। जद्यपि प्रथम बरजि सिव राखे॥
अति प्रचंड रघुपति कै माया। जेहि न मोह अस को जग जाया ॥४॥

1.705

रूख बदन करि बचन मृदु, बोले श्रीभगवान।
तुम्हरे सुमिरन तेँ मिटहिँ, मोह मार मद मान ॥१२८॥

1.706

सुनु मुनि मोह हाएइ मन ताके। ज्ञान बिराग हृदय नहिं जाके॥
ब्रह्मचरज-व्रत-रत सतिधीरा। तुम्हहिँ कि करै मनोभव पीरा ॥१॥

1.707

नारद कहेउ सहित अभिमाना। कृपा तुम्हारि सकल भगवाना॥
करुनानिधि मन दीख बिचारी। उर-अड्कुरेउ गर्ब-तरु भारी ॥२॥

1.708

बेगि सो मैं डारिहौँ उपारी। पन हमार सेवक-हितकारी॥
मुनि कर हित मम कौतुक होई। अवसि उपाय करब मैँ साएई ॥३॥

1.709

तब नारद हरि-पद सिर नाई। चले हृदय अहमिति अधिकाई॥
श्रीपति निज-माया तब प्रेरी। सुनहु कठिन करनी तेहि केरी ॥४॥

1.710

विरचेल भग महँ नगर तेहि, सत जोजन विस्तार।
श्रीनिवासपुर तेँ अधिक, रचना विविध प्रकार ॥१२९॥

1.711

बसहिँ नगर सुन्दर नर नारी। जनु बहु मनसिज-रति तनु धारी॥
तेहि पुर बसै सोलनिधि राजा। अगनित हय गय सेन समाजा ॥१॥

1.712

सत-सुरेस सम बिभव बिलासा। रूप तेज बल नीति निवासा॥
बिस्व-मोहनी तासु कुमारी। श्री बिमोह जिसु रूप निहारी ॥२॥

1.713

इ हरि माया सब गुन खानी। सोभा तासु कि जाइ बखानी॥
करै स्वयम्बर से नप-बाला। आये तहँ अगनित महिपाला ॥३॥

1.714

मुनि कौतुकी नगर तेहि गयऊ। पुरबासिन्ह सब पूछत भयऊ॥
सुनि सब चरित भूप गृह आये। करि पूजा नृप मुनि बैठाये ॥४॥

1.715

आनि देखाई नारदहि, भूपति राजकुमारि।
कहहु नाथ गुन दोष सब, एहि के हृदय बिचारि ॥१३०॥

1.716

देखि रूप मुनि बिरति बिसारी। बडी बार लगि रहे निहारी॥
लच्छन तासु बिलोकि भुलाने। हृदय हरष नहिँ प्रगट बखाने ॥१॥

1.717

जो एहि बरै अमर सोइ होई। समर भूमि तेहि जीत न कोई॥
सेवहिँ सकल चराचर ताही। बरै सीलनिधि कन्या जाही ॥२॥

1.718

लच्छन सब बिचारि उर राखे। कछुक धनाइ भूप सल भाखे॥
सुता सुलच्छन कहि नृप पाहीँ। नारद चले सोच मन माहीँ ॥३॥

1.719

करौँ जाइ सोइ जतन बिचारी। जेहि प्रकार माएहि बरै कुमारी॥
जप तप कछु न होइ तेहि काला। हे बिधि मिलै कवन बिधि बाला ॥४॥

1.720

एहि अवसर चाहिय परम, सोभा रूप बिसाल।
जो बिलोकि रीझै कुँअरि, तब मेलै जयमाल ॥१३१॥

1.721

हरि सन माँगौँ सुन्दरताई। होइहि जात गहरु मोहि भाई॥
मोरे हित हरि सम नहिँ कोऊ। एहि अवसर सहाय सेआइ होऊ ॥१॥

1.722

बहु बिधि बिनय कीन्ह तेहि काला। प्रगटेउ प्रभु कौतुकी कृपाला॥
प्रभु बिलोकि मुनि नयन जुडाने। होइहि काज हिये हरषाने ॥२॥

1.723

अति आरति कहि कथा सुनाई। करहु कृपा करि होहु सहाई॥
आपन रूप देहु प्रभु माएही। आन माँति नहिँ पावौँ ओही ॥३॥

1.724

जेहि बिधि नाथ होइ हित माएरा। करहु से बेगि दास मैँ ताएरा॥
निज-माया बल देखि बिसाला। हिय हँसि वाले दीनदयाला ॥४॥

1.725

जेहि बिधि होइहि परम हित, नारद सुनहु तुम्हार।
इ हम करव न आन कछु, बचन न मृषा हमार ॥१३२॥

1.726

कुपथ माँग रुज व्याकुल रोगी। बैद न देइ सुनहु मुनि जोगी॥
एहि बिधि हित तुम्हार मैँ ठयऊ। कहि अस अन्तरहित प्रभु भयऊ॥१॥

1.727

माया बिबस भये मुनि मूढा। समुझी नहिँ हरि गिरा निगूढा॥
गवने तुरत तहाँ रिषिराई। जहाँ स्वयम्बर-भूमि बनाई ॥२॥

1.728

निज निज आसन बैठे राजा। बहु बनाव करि सहित समाजा॥
मुनि मन हरष रूप अति मोरे। मोहि तजि आनहिँ बरिहि न भाएरे ॥३॥

1.729

मुनि हित कारन कृपानिधाना। दीन्ह कुरूप न जाइ बखाना॥
चरित्र लखि काहु न पावा। नारद जानि सबहि सिर नावा ॥४॥

1.730

रहे तहाँ दुइ रुद्र गन, ते जानहिँ सब भेउ।
बिप्र बेष देखत फिरहिँ, परम कौतुकी तेउ ॥१३३॥

1.731

जेहि समाज बैठे मुनि जाई। हृदय रूप अहमिति अधिकाई॥
तहँ बैठे महेस गन दोऊ। बिप्र बेष गति लखै न कोऊ ॥१॥

1.732

करहिँ कूटि नारदहि सुनाई। नीकि दोन्हि हरि सुन्दरताई॥
रोभिहि राजकुँअरि छवि देखी। इन्हहिँ बरिहि हरि जानि बिसेखी ॥२॥

1.733

मुनिहि माह मन हाथ पराये। हँसहिँ सम्भु-गन अति सचु पाये॥
जदपिसुनहिँ मुनि अटपटि बानी। समुझि न परै बुद्धिभ्रम सानी ॥३॥

1.734

काहु न लखा सो चरित बिसेखा। सो सरूप नृप कन्या देखा॥
मर्कट बदन भयङ्कर देही। देखत हृदय कोध भा तेही ॥४॥

1.735

सखी सङ्ग लेइ कुँवरि तब, चलि जनु राजमराल।
देखत फिरै महीप सब, कर सरीज जयमाल ॥१३४॥

1.736

जेहि दिसि बैठे नारद फूली। सो दिसि तेहिन बिलाएकी भूली॥
पुनि पुनि मुनि उकसहिँ अकुलाहीँ। देखि दसा हुर-गन मुसुकाहीँ ॥१॥

1.737

धरि नृप तनु तहँ गयौ कृपाला। कुँअरि हरषि मेलेउ जयमाला॥
दुलहिनि लेइ गये लच्छिनिवासा। नृप-समाज सब भयौ निरासा ॥२॥

1.738

मुनि अति बिकल माह मति नाँठी। मनि गिरि गई छूटि जनु गाँठी॥
तब हर-गन बोले मुसुकाई। निज मुख मुकुर बिलोकहु जाई ॥३॥

1.739

अस कहि दोउ भागे भय भारी। बदन दीख मुनि बारि निहारी॥
बेष बिलोकि क्रोध अति बाढा। तिन्हहिँ सराप दीन्ह अति गाढा ॥४॥

1.740

हाएहु निसाचर जाइ तुम्ह, कपटी पापी दोउ।
हँसेहु हमहिँ सो लेहु फल, बहुरि हँसेहु मुनि कोउ ॥१३५॥

1.741

पुनि जल दीख रूप निज पावा। तदपि हृदय सन्तोष न आवा॥
फरकत अधर कोप मन माहीँ। सपदि चले कमलापति पाहीँ ॥१॥

1.742

देइहौँ साप कि मरिहौँ जाई। जगत मेरि उपहास कराई॥
बीचहि पन्थ मिले दनुजारी। सङ्ग रमा सोइ राजकुमारी ॥२॥

1.743

बोले मधुर बचन सुर-साँई। मुनि कहँ चले बिकल की नाँई॥
सुनत बचन उपजा अति क्रोधा। माया-बस न रहा मन बोधा ॥३॥

1.744

पर सम्पदा सकहु नहिँ देखी। तुम्हरे इरिषा कपट बिसेखी ॥
मथत सिन्धु रुद्रहि बौरायेहु। सुरन्ह प्रेरि विष पान करायेहु ॥४॥

1.745

असुर सुरा बिष सङ्करहिँ, आपु रमा मनि चारु।
स्वारथ साधक कुटिल तुम्ह, सदा कपट व्यवहारु ॥१३६॥

1.746

परम स्वतन्त्र न सिर पर कोई। भावै मनहिँ करहु तुम्ह सोई॥
भलेहि मन्द मन्देहि भल करहू। बिसमय हरषन हिय कछु धरहू ॥१॥

1.747

डहँकि डहँकि परचेउ सब काहू। अति असङ्क मन सदा उछाहू॥
करम सुभासुभ तुम्हहिँ न बाधा। अब लगि तुम्हहिँ न काहू साधा ॥२॥

1.748

भले भवन अब बायन दीन्हा। पाबहुगे फल आपन कीन्हा॥
बज्चेहु मोहि जवनि धरि देहा। सोइ तनु धरहु साप मम एहा ॥३॥

1.749

कपि आकृति तुम्ह कीन्हि हमारी। करिहहिँ कीस सहाय तुम्हारी॥
मम अपकार कीन्ह तुम्ह भारी। नारि-बिरह तुम्ह होब दुखारी ॥४॥

1.750

साप सीस धरि हरषि हिय, प्रभु बहु बिनती कीन्ह।
निज-माया के प्रबलता, करषि कृपानिधि लीन्ह ॥१३७॥

1.751

जब हरि माया दूरि निवारी। नहिँ तहँ रमा न राजकुमारी॥
तब मुनि अति सभीत हरि-चरना। गहे पाहि प्रनतारति हरना ॥१॥

1.752

मृषा होउ मम साप कृपाला। मम इच्छा कह दीनदयाला॥
मैँ दुर्बचन कहे बहुतेरे। कह मुनि पाप मिटिहि किमि मेरे ॥२॥

1.753

जपहु जाइ सङ्कर सत-नामा। होइहि हृदय तुरत बिस्रामा।
कोउ नहिँ सिव समान प्रिय मोरे। असि परतीति तजहु जनि भाएरे ॥३॥

1.754

जेहि पर कृपा न करहिँ पुरारी। सो न पाव मुनि भगति हमारी।
अस उर धरि महि बिचरहु जाई। अब न तुम्हहिँ माया नियराई ॥४॥

1.755

बहु बिधि मुनिहि प्रबोधि प्रभु, तब भये अन्तरधान।
सत्यलोक नारद चले, करत राम-गुन-गान ॥१३८॥

1.756

हर-गन मुनिहि जात पथ देखी। बिगत माह मन हरष बिसेखी॥
अति सभीत नारद पहिँ आये। गहि-पद आरत बैन सुनाये ॥१॥

1.757

हर-गन-हम न बिप्र मुनिराया। बड अपराध कीन्ह फल पाया॥
साप-अनुग्रह करहु कृपाला। बोले नारद दीनदयाला ॥२॥

1.758

निसिचर जाइ होहु तुम्ह दोऊ। बैभव बिपुल तेज बल होऊ॥
भुज-बल बिस्व जितब तुम्ह जहिआ। धरिहहिँ बिष्नु मनुज तनु तहिआ॥३॥

1.759

समर भरन हरि हाथ तुम्हारा। होइहहु मुकुत न पुनि संसारा॥
चले जुगल मुनि-पद सिर नाई। भये निसाचर कालहि पाई ॥४॥

1.760

एक कलप एहि हेतु प्रभु, लीन्ह मनुज अवतार।
सुर-रज्जन सज्जन-सुखद, हरि भज्जन-भुबि-भार ॥१३९॥

1.761

एहि बिधि जनम करम हरि केरे। सुन्दर सुखद बिचित्र घनेरे॥
कलप कलप प्रति प्रभु अवतरहीँ। चारु चरित नाना विधि करहीँ ॥१॥

1.762

तब तब कथा मुनीसन्ह गाई। परम पुनीत प्रबन्ध बनाई॥
बिबिध प्रसङ्ग अनूप बखाने। करहिँ न सुनि आचरज सयाने ॥२॥

1.763

हरि-अनन्त हरि-कथा-अनन्ता। कहहिँ सुनहि बहु बिधि सब सन्ता॥
रामचन्द्र के चरित सुहाये। कलप कोदि लगि जाहिँ न गाये ॥३॥

1.764

यह प्रसङ्ग मैँ कहा भवानी। हरि-माया मोहहिँ मुनि ज्ञानी॥
प्रभु कौतुकी प्रनत-हितकारी। सेवत सुलभ सकल-दुख-हारी ॥४॥

1.765

सुर नर मुनि कोउ नाहिँ, जेहि न माह माया प्रबल॥
अस बिचारि मन माहिँ, भजिय महा-माया-पतिहि ॥१४०॥

1.766

अपर हेतु सुनु सैलकुमारी। कहौँ बिचित्र कथा बिस्तारी॥
जेहि कारन अज अगुन अरूपा। ब्रह्म भयौ कोसलपुर-भूपा ॥१॥

1.767

जो प्रभु बिपिन फिरत तुम्ह देखा। बन्धु समेत धरे मुनि बेखा॥
जासु चरित अवलोकि भवानी। सती सरीर रहिहु बौरानी ॥२॥

1.768

अजहुँ न छाया मिटति तुम्हारी। तासु चरित सुनु भ्रम-रुज-हारी॥
लीला कीन्हि जो तेहि अवतारा। सो सब कहिहौँ मति अनुसारा ॥३॥

1.769

भरद्वाज सुनि सङ्कर बानी। सकुचि सप्रेम उमा हरषानी।
लगे बहुरि बरनै वृषकेतू। सो अवतार भयौ जेहि हेतू ॥४॥

1.770

साए मैँ तुम्ह सन कहौँ सब, सुनु मुनीस मन लाइ।
रामकथा-कलिमल-हरनि, मङ्गल-करनि सुहाइ ॥१४१॥

1.771

स्वायम्भुव-मनु अरु सतरूपा। जिन्ह तेँ मै नर सृष्टि अनूपा॥
दम्पति घरम-आचरन नीका। अजहुँ गाव सुति जिन्ह कै लीका ॥१॥

1.772

नृप उत्तानपाद सुत तासू। ध्रुव हरि-भगत भयौ सुत जासू॥
लघु सुत नाम प्रियब्रत ताही। बेद पुरान प्रसंसहिँ जाही ॥२॥

1.773

देवहूति पुनि तासु कुमारी। जो मुनि-कर्दम के प्रिय नारी॥
आदिदेव प्रभु दीनदयाला। जठर धरेउ जेहि कपिल कृपाला ॥३॥

1.774

सांख्यसास्त्र जिन्ह प्रगट गखाना। तत्व बिचार निपुन भगवाना॥
तेहि मनु राज कीन्ह बहु काला। प्रभु आयसु सब बिधि प्रतिपाला ॥४॥

1.775

होइ न बिषय बिराग, भवन बसत भा चौथ पन।
हृदय बहुत दुख लाग, जनम गयौ हरिभगति बिनु ॥१४२॥

1.776

बरबस राज सुतहि नृप दीन्हा। नारि समेत गवन बन कीन्हा॥
तीरथ बर नैमिष बिख्याता। अति पुनीत साधक-सिधि-दाता॥१॥

1.777

बसहिँ तहाँ मुनि-सिद्ध-समाजा। तहँ हिय हरषि चले मनुराजा॥
पन्थ जात साएहहिं मति-धीरा। ज्ञान-भगति जनु धरे सरीरा ॥२॥

1.778

पहुँचे जाइ धेनुमति-तीरा। हरषि नहाने निरमल नीरा॥
आये मिलन सिद्धि मुनि ज्ञानी। धरम-धुरन्धर नृपरिषि जानी ॥३॥

1.779

जहँ जहँ तीरथ रहे सुहाये। मुनिन्ह सकल सादर करवाये॥
कृस-सरीर मुनि-पट परिधाना। सत-समाज नित सुनहिँ पुराना ॥४॥

1.780

द्वादस अच्छर मन्त्र पुनि, जपहिँ सहित अनुराग।
बासुदेव-पद-पङ्करुह, दम्पति मन अति लाग ॥१४३॥

1.781

करहिँ अहार साक फल कन्दा। सुमिरहिँ ब्रह्म सच्चिदानन्दा॥
पुनि हरि हेतु करन तप लागे। बारि-अधार मूल फल त्यागे ॥१॥

1.782

उर अभिलाष निरन्तर होई। देखिय नयन परम प्रभु सेआई॥
अगुन अखंड अनन्त अनादी। जेहि चिन्तहिँ परमारथबादी ॥२॥

1.783

नेति नेति जेहि बेद निरूपा। चिदानन्द निरुपाधि अनूपा॥
सम्भु बिरज्चि बिष्नु भगवाना। उपजहिँ जासु अंस तेँ नाना ॥३॥

1.784

ऐसेउ प्रभु सेवक बस अहई। भगत हेतु लीला तनु गहई।
जौँ यह बचन सत्य स्त्रुति भाषा। तौ हमार पूजिहि अभिलाषा ॥४॥

1.785

एहि बिधि बीते बरष षट,—सहस बारि आहार।
सम्बत सप्त-सहस्त्र पुनि, रहे समीर अधार ॥१४४॥

1.786

बरष सहस-दस त्यागेउ सोऊ। ठाढे रहे एक पग दोऊ॥
विधि हरि हर तप देखि अपारा। मनु समीप आये बहु बारा ॥१॥

1.787

माँगहु बर बहु भाँति लोभाये। परम धीर नहिँ चलहिँ चलाये॥
अस्थि–मात्र होइ रहेउ सरीरा। तदपि मनाग मनहिँ नहिँ पीरा ॥२॥

1.788

प्रभु सर्बज्ञ दास निज जानी। गति अनन्य तापस नृप-रानी॥
माँगु माँगु बर भै नभ बानी। परम गंभीर कृपामृत सानी ॥३॥

1.789

मृतक–जिआवनि गिरा सुहाई। सवन–रन्ध्र होइ उर जब आई॥
हृष्ट-पुष्ट तन भये सुहाये। मानहुँ अबहिँ भवन तैँ आये ॥४॥

1.790

स्त्रवन सुधा-सम बचन सुनि, पुलक प्रफुल्लित गात।
बाएले मनु करि दंडवत, प्रेम न हृदय समात ॥१४५॥

1.791

सुनु सेवक सुरतरु-सुरधेनू। बिधि-हरि-हर-बन्दित पद-रेनू॥
सेवत सुलभ सकल सुखदायक। प्रनत पाल सचराचर नायक ॥१॥

1.792

जौँ अनाथ-हित हम पर नेहू। तौ प्रसन्न होइ यह बर देहू॥
जो सरूप बस सिव मन माहीँ। जेहि कारन मुनि जतन कराहीँ ॥२॥

1.793

जो भुसुंडि-मन-मानस हंसा। सभुन अगुन जेहि निगम प्रसंसा॥
देखहि हम सो रूप भरि लोचन। कृपा करहु प्रनतारति-मोचन ॥३॥

1.794

दम्पति बचन परम प्रिय लागे। मृदुल बिनीत प्रेम-रस पागे॥
भगत-बछल प्रभु कृपानिधाना। विस्वबास प्रगटे भगवाना ॥४॥

1.795

नील-सरोरुह नील-मनि, नील-नीरधर-स्याम।
लाजहिँ तनु साभा निरखि, कोटि कोटि सत काम ॥१४६॥

1.796

सरद-मयङ्क-बदन छबि सीवाँ। चारु-कपाल चिबुक दर ग्रीवाँ॥
अधर-अरुन रद सुन्दर नासा। बिधुकर निकर बिनिन्दक हासा ॥१॥

1.797

नव अम्बुज अम्बक-छबि नीकी। चितवनि ललित भावती जी की॥
भृकुटि मनोज-चाप छबि-हारी। तिलक ललाट-पटल दुतिकारी ॥२॥

1.798

कुंडल मकर मुकुट सिर भ्राजा। कुटिल केस जनु मधुप-समाजा॥
उर श्रीवतस रुचिर बनमाला। पदिक-हार भूषन मनि-जाला ॥३॥

1.799

केहरि-कन्धर चारु जनेऊ। बाहु बिभूषन सुन्दर तेऊ॥
करि-कर सरिस-सुभग भुजदंडा। कटि निषङ्ग कर सर कोदंडा ॥१॥

1.800

तडित बिनिन्दक पीत-पट, उदर रेख बर तीनि॥
नाभि मनोहर लेति जनु, जमुन-भँवर छबि छीनि ॥१४७॥

1.801

पद-राजीव बरनि नहि जाही। मुनि मन मधुप बसहिँ जिन्ह माहीं॥
बाम भाग समिति अनुकूला। आदि सक्ति छबि-निधि जग-मूला ॥१॥

1.802

जासु अंस उपजहिँ गुन खानी। अगनित लच्छि उमा ब्रह्मानी॥
भृकुटि बिलास जासु जग होई। राम बाम-दिसि सीता साई ॥२॥

1.803

वि-समुद्र हरि रूप बिलोकी। एक टक रहे नयन पट रोकी॥
चितवहिँ सादर रूप अनूपा। तृप्ति न मानहिँ मनु सतरूपा ॥३॥

1.804

हरष-बिबस तनु दसा भुलानी। परे दंड इव गहि पद पानी॥
सिर परसे प्रभु निज-कर-कञ्जा। तुरत उठाये करुना-पुञ्जा ॥४॥

1.805

बोले कृपा-निधान पुनि, अति प्रसन्न माएहि जानि।
माँगहु बर जोइ भाव मन, महादानि अनुमानि ॥१४८॥

1.806

सुनि प्रभु बचन जोरि जुग पानी। धरि धीरज बोले मृदु बानी॥
नाथ देखि पद-कमल तुम्हारे। अव पूरे सब काम हमारे ॥१॥

1.807

एक लालसा बडि उर माहीँ। सुगम अगम कहि जाति सो नाहीँ॥
तुम्हहिँ देत अति सुगम गोसाँई। अगम लाग मोहि निज कृपिनाई ॥२॥

1.808

जथा दरिद्र कल्पतरु पाई। बहु सम्पत्ति माँगत सकुचाई॥
तासु प्रभाव जान नहिँ साई। तथा हृदय मम संसय होई ॥३॥

1.809

तुम्ह जानहु अन्तरजामी। पुरवहु मार मनोरथ स्वामी॥
सकुच बिहाइ माँगु नप मोही। मोरे नहिँ अदेय कछु ताएही ॥४॥

1.810

दानि-सिरोमनि कृपानिधि, नाथ कहौँ सतभाउ।
चाहौँ तुम्हहिँ समान सुत, प्रभु सन कंवन दुराउ ॥१४९॥

1.811

देखि प्रीति सुनि बचन अमोले। एवमस्तु करुनानिधि बोले॥
आपु सरिस खोजौँ कहँ जाई। नृप तव तनय होब मैँ आई ॥१॥

1.812

सतरूपहि बिलोकि कर जोरे। देबि माँगु बर जो रुचि ताएरे॥
जो बर नाथ चतुर नृप माँगा। सोइ कृपाल माएहि अति प्रिय लागा ॥२॥

1.813

प्रभु परन्तु सुठि होति ढिठाई। जदपि भगत-हित तुम्हहिँ सुहाई॥
तुम्ह ब्रह्मादि-जनक जग खामी। ब्रह्म सकल-उर-अन्तरजामी ॥३॥

1.814

अस समुझत मन संसय होई। कहा जो प्रभु प्रबान पुनि साएई॥
जे निज भगत नाथ तव अहहीँ। जो सुख पावहिँ जो गति लहहीँ ॥४॥

1.815

साएइ-सुख साएइ-गति साएइ-भगति, सोइ निज चरन-सनेहु।
साएइ-बिबेक साइ-रहनि प्रभु, हमहिँ कृपा करि देहु ॥१५०॥

1.816

सुनि मृदु गूढ रुचिर बच रचना। कृपासिन्धु बोले मृदु बचना॥
जो कछु रुचि तुम्हरे मन माहीँ। मैँ साए दीन्ह सब संसय नाहीँ ॥१॥

1.817

मातु बिबेक अलौकिक तोरे। कबहुँ न मिटिहि अनुग्रह मोरे॥
बन्दि चरन मनु कहेउ बहोरी। और एक विनती प्रभु माएरी ॥२॥

1.818

सुत-विषयक तव पद-रति होऊ। माएहि बड मूढ कहै किन कोऊ॥
मनि बिनु फनि जिमि जल बिनु मीना। मम जीवन तिमि तुम्हहिँ अधीना ॥३॥

1.819

अस बर माँगि चरन गहि रहेऊ। एवमस्तु करुनानिधि कहेऊ॥
अब तुम्ह मम अनुसासन मानी। बसहु जाइ सुरपति-रजधानी ॥४॥

1.820

तहँ करि भोग बिसाल, सात गये कछु काल पुनि।
होइहहु अवध-भुआल, तब मैँ होब तुम्हार सुत ॥१५१॥

1.821

इच्छामय नर-बेष सँवारे। होइहौँ प्रगट निकेत तुम्हारे॥
अंसन्ह सहित देह धरि ताता। करिहौँ चरित भगत-सुख-दाता ॥१॥

1.822

जेहि सुनि सादर नर बडभागी। भव तरिहहिँ ममता-मद त्यागी॥
आदिसक्ति जेहि जग उपजाया। सोउ अवतरिहि माएरि यह माया ॥२॥

1.823

पुरौब मैँ अभिलाष तुम्हारा। सत्य सत्य पन सत्य हमारा॥
पुनि पुनि अस कहि कृपानिधाना। अन्तरधान भये भगवाना ॥३॥

1.824

दम्पपि उर धरि भगति कृपाला। तेहि आस्त्रमनि बसे कछु काला।
समय पाइ तनु तजि अनयासा। जाइ कीन्ह अमरावति बासा ॥४॥

1.825

यह इतिहास पुनीत अति, उमहि कहा वृषकेतु।
भरद्वाज सुनु अपर पुनि, राम-जनम कर हेतु ॥१५२॥

1.826

सुनु मुनि कथा पुनीत पुरानी। जो गिरिजा प्रति सम्भु बखानी॥
बिस्व-बिदित एक कैकय देसू। सत्यकेतु तहँ बसै नरेसू ॥१॥

1.827

धरम-धुरन्धर नीति-निधीना। तेज प्रताप सील बलवाना॥
तेहि के भये जुगल-सुत बीरा। सब-गुन-धाम महा-रनधीरा ॥२॥

1.828

राज-धनी जो जेठ सुत आही। नाम प्रताप-भानु अस ताही ॥
अपर-सुतहि अरिमर्दन नामा। भुज-बल-अतुल अचल-सङ्गामा ॥३॥

1.829

भाइहि माइहि परम समीती। सकल दोष छल वरजित प्रीती॥
जेठे सुतहि राज नृप दीन्हा। हरि हित आपु गवन बन कीन्हा ॥४॥

1.830

जब प्रताप-रबि भयौ नप, फिरी दोहाई देस।
प्रजा पाल अति बेद विधि, कतहुँ नहीँ अघ लेस ॥१५३॥

1.831

नृप-हित-कारक सचिव सयाना। नाम धरमरुचि सुक्र समाना॥
सचिव सयान बन्धु-बल-बीरा। आपु प्रताप-पुञ्ज रनधीरा ॥१॥

1.832

सेन सङ्ग चतुरङ्ग अपारा। अमित सुभट सब समर जुझारा॥
सेन बिलोकि राउ हरषाना। अरु बाजे गहगहे निसाना ॥२॥

1.833

बिजय हेतु कटकई बनाई। सुदिन साधि नृप चलेउ बजाई॥
जहँ तहँ परी अनेक लराई। जीते सकल भूप बरिआई ॥३॥

1.834

सप्त-दीप भुज-बल बस कीन्हे। लेइ लेइ दंड छाडि नृप दीन्हे॥
सकल अवनि-मंडल तेहि काला। एक प्रताप-भानु महिपाला ॥१॥

1.835

स्वबस बिस्व करि बाहु बल, निज-पुर कीन्ह प्रबेस॥
अरथ-धरम-कामादि सुख, सेवै समय नरेस ॥१५४॥

1.836

भूप प्रताप-भानु बल पाई। कामधेनु भै भूमि सुहाई॥
सब दुख बरजित प्रजा सुखारी। घरम-सील सुन्दर नर नारी ॥१॥

1.837

सचिव धरमरुचि हरि-पद-प्रीती। नृप-हित-हेतु सिखव नित नीती॥
गुरु सुर सन्त पितर महिदेवा। करै सदा नृप सब के सेवा ॥२॥

1.838

भूप-धरम जे बेद बखाने। सकल करै सादर सुख माने॥
दिन-प्रति देइ बिबिध बिधि दाना। सुनै सास्त्र बर बेद पुराना ॥३॥

1.839

नाना बापी कूप तडागा। सुमन-बाटिका सुन्दर बागा॥
बिप्र-भवन सुर-भवन सुहाये। सब तीरथन्ह विचित्र बनाये ॥४॥

1.840

जहँ लगि कहे पुरान स्त्रुति, एक एक सब जाग।
बार सहर सहस्र नृप, किये सहित अनुराग ॥१५५॥

1.841

हृदय न कछु फल अनुसन्धाना। भूप बिबेकी परम सुजाना॥
करै जे धरम करम मन वानी। वासुदेव अरपित नृप-ज्ञानी ॥१॥

1.842

चढि बर बाजि बार एक राजा। भृगया कर सब साजि समाजा॥
बिन्ध्याचल गंभीर बन गयऊ। मृग पुनीत बहु मारत भयऊ ॥२॥

1.843

फिरत बिपिन नृप दीख बराहू। जनु वन दुरेउ ससिहि ग्रसि राहू॥
बड बिधु नहिँ समात मुख माहीँ। मनहुँ क्रोध बस उगिलत नाहीँ ॥३॥

1.844

कोल कराल दसन छबि गाई। तनु बिसाल पीवर अधिकाई॥
घुरघुरात हय आरव पाये। चकित बिलोकत कान उठाये ॥४॥

1.845

नील-महीधर-सिखर सम, देखि बिसाल बराह।
चपरि चलेउ हय सुटुकि नृप, हाँकि न होइ निबाह ॥१५६॥

1.846

आवत देखि अधिकरव बाजी। चलेउ बराह मरुत-गति भाजी॥
तुरत कीन्ह नृप सर सन्धाना। महि मिलि गयौ बिलोकत बाना ॥१॥

1.847

तकि तकि तीर महीस चलावा। करि छल सुअर सरीर बचावा॥
प्रगटत दुरत जाइ मृग भागा। रिस बस भूप चलेउ सँग लागा ॥२॥

1.848

गयौ दूरि धन-गहन बराहू। जहँ नाहिँन गज बाजि निबाहू॥
अति अकेल बन बिपुल कलेसू। तदपि न भृग-मग तजै नरेसू ॥३॥

1.849

कोल बिलोकि भूप बड धीरा। भागि पैठ गिरि-गुहा-गँमीरा॥
अगम देखि नृप अति पछिताई। फिरेउ महाबन परेउ भुलाई ॥४॥

1.850

खेद-खिन्न छुद्धित तृषित, राजा बाजि समेत।
खोजत ब्याकुल सरित सर, जल बिनु भयौ अचेत ॥१५७॥

1.851

फिरत बिपिन आस्रम एक देखा। तहँ बस नृपति कपट-मुनि बेखा॥
जासु देस नृप लीन्ह छडाई। समर सेन तजि गयौ पराई ॥१॥

1.852

समय प्रताप-भानु कर जानी। आपन अति असमय अनुमानी॥
गयौ न गृह मन बहुत गलानी। मिला न राजहि नृप अभिमानी ॥२॥

1.853

रिस उर मारि रङ्क जिमि राजा। बिपिन बसै तापस के साजा॥
तासु समीप गवन नृप कीन्हा। यह प्रताप-रवि तेहि तब चीन्हा ॥३॥

1.854

राउ तृषित नहिँ सो पहिचाना। देखि सुबेष महामुनि जाना॥
उतरि तुरँग तेँ कोन्ह प्रनामा। परम चतुर न कहेउ निज नामा ॥४॥

1.855

भूपति तृषित बिलोकि तेहि, सरवर दीन्ह दिखाय।
भज्जन पान समेत हय, कोन्ह नृपति हरपाय ॥१५८॥

1.856

गै स्त्रम सकल सुखी नूप भयऊ। निज आस्त्रम तापस लेइ गयऊ॥
आसन दीन्ह अस्त रबि जानी। पुनि तापस बोलेउ मृदु बानी ॥१॥

1.857

को तुम्ह कस बन फिरहु अकेले। सुन्दर जुबा जीव पर हेले॥
चक्रवर्ति के लच्छन ताएरे। देखत दया लागि अति माएरे ॥२॥

1.858

नाम प्रताप-भानु अवनीसा। तासु सचिव मैँ सुनहु मुनीसा॥
फिरत अहेरे परेउँ भुलाई। बडे भाग देखेउँ पद आई ॥३॥

1.859

हम कहँ दुर्लभ दरस तुम्हारा। जानत हौँ कछु भल हाएनिहारा॥
कह मुनि तात भयौ अँधियारा। जोजन सत्तरि नगर तुम्हारा ॥४॥

1.860

निसा-घोर गम्भीर-बन, पन्थ न सुनहु सुजान।
बसहु आजु अस जानि तुम्ह, जायहु होत बिहान॥
तुलसी जसि भवितव्यता, तैसी मिलै सहाइ।
आपु न आवै ताहि पहिँ, ताहि तहाँ लेइ जाइ ॥१५९॥

1.861

भलेहि नाथ आयसु धरि सीसा। बाँधि तुरग तरु बैठ महीसा॥
नृप बहु भाँति प्रसंसेउ ताही। चरन बन्दि निज-भाग्य सराही ॥१॥

1.862

पुनि बोलेउ मृदु गिरा सुहाई। जानि पिता प्रभु करौँ ढिठाई॥
मोहि मुनीस सुत सेवक जानी। नाथ नाम निज कहौ बखानी ॥२॥

1.863

तेहि न जान नृप नृपहि सो जाना। भूप सुहृद से कपट सयाना॥
बैरी पुनि छत्री पुनि राजा। छल बल कीन्ह चहै निज काजा ॥३॥

1.864

समुझि राज-पुख दुखित अराती। अवाँ अनल इव सुलगै छाती॥
सरल बचन नृप कै सुनि काना। वयर सँभारि हृदय हरषाना ॥४॥

1.865

कपट बोरि बानी मृदुल, बोलेउ जुगुति समेत।
नाम हमार भिखारि अब, निरधन रहित निकेत ॥१६०॥

1.866

कह नृप जे बिज्ञान निधाना। तुम्ह सारिखे गलित अभिमाना॥
रहहिँ अपनपौ सदा दुराये। सब बिधि कुसल कुबेष बनाये ॥१॥

1.867

तेहि तेँ कहहिँ सन्त स्त्रुति टेरे। परम अकिञ्चन प्रिय हरि केरे॥
तुम्ह सम अधन भिखारि अगेहा। होत बिरज्जि सिवहि सन्देहा ॥२॥

1.868

जोसि साएसि तव चरन नमामी। मो पर कृपा करिय अब स्वामी॥
सहज प्रीति भूपति कै देखी। आपु विषय विस्वास बिसेखी ॥३॥

1.869

सब प्रकार राजहि अपनाई। बोलेउ अधिक सनेह जनाई॥
सुनु सतिभाउ कहौँ महिपाला। इहाँ बसत बीते बहु काला ॥४॥

1.870

अब लगि माएहि न मिलेउ कोउ, मैँ न जनावौँ काहु।
लोकमान्यता अनल सम, कर तप-कानन दाहु ॥
तुलसी देखि सुबेखु, भूलहिँ मूढ न चतुर नर।
सुन्दर केकिहि पेखु, बचन सुधा-सम असन-अहि ॥१६१॥

1.871

ता तेँ गुपुत रहौँ जग माहीँ। हरि तजि किमपि प्रयोजन नाहीँ॥
प्रभु जानत सब बिनहिँ जनाये। कहहु कवन सिधि लोक रिझाये ॥१॥

1.872

तुम्ह सुचि सुमति परम प्रिय माएरे। प्रीति प्रतीति मोहि पर ताएरे॥
अब जौँ तात दुरावौँ ताएही। दारुन दोष घटै अति माएही ॥२॥

1.873

जिमि जिमि तापस कथै उदासा। तिमि तिम नृपहि उपज विस्वासा॥
देखा स्वबस करम-मन-बानी। तब बोला तापस बगध्यानी ॥३॥

1.874

नाम हमार एकतनु भाई। सुनि नृप बोलेउ पुनि सिर नाई॥
कहहु नाम कर अरथ बखानी। माएहि सेवक अति आपन जानो ॥४॥

1.875

आदि सृष्टि उपजी जबहि, तब उतपति भै माएरि।
नाम एकतनु हेतु तेहि, देह न धरी बहोरि ॥१६२॥

1.876

जनि आचरज करहु मन माहीँ। सुत तप तेँ दुर्लभ कछु नाहीँ॥
तप बल तेँ जग सूजै विधाता। तप बल बिष्नु भये परित्राता ॥१॥

1.877

तप बल सम्भु करहिँ सङ्घारा। तप तेँ अगम न कछु संसारा॥
भयौ नृपहि सुनि अति अनुरागा। कथा पुरातन कहै सो लागा ॥२॥

1.878

धरम करम इतिहास अनेका। करै निरूपन बिरति बिबेका॥
उदभव-पावन-प्रलय कहानी। कहेसि अमित आचरज बखानी ॥३॥

1.879

सुनि महीस तापस बस भयऊ। आपन नाम कहन तब लयऊ॥
कह तापस नृप जानौँ ताएही। कीन्हेहु कपट लाग भल माएही ॥४॥

1.880

सुनु महीस असि नीति, जहँ तहँ नाम न कहहिँ नृप।
माएहि ताएहि पर अति प्रीति, सोइ चतुरता बिचारि तव ॥१६३॥

1.881

नाम तुम्हार प्रताप-दिनेसा, सत्यकेतु तव पिता नरेसा॥
गुरु प्रसाद सब जानिय राजा, कहिय न आपन जानि अकाजा ॥१॥

1.882

देखि तात तव सहज सुधाई। प्रीति प्रतीति नीति निपुनाई॥
उपजि परी ममता मन माएरे। कहौँ कथा निज पूछे तोरे ॥२॥

1.883

अब प्रसन्न मैं संसय नाहीँ। माँगु जो भूप भाव मन माहीँ॥
सुनि सुबचन भूपति हरषाना। गहि पद बिनय कीन्हि बिधि नाना ॥३॥

1.884

कृपासिन्धु मुनि दरसन तारे। चारि पदारथ करतल माएरे॥
प्रभुहि तथापि प्रसन्न बिलोकी। माँगि अगम बर हाएउँ बिसोकी ॥४॥

1.885

जरा-मरन-दुख रहित तनु, समर जितै जनि कोउ।
एक-छत्र रिपु-हीन महि, राज कलप सत होउ ॥१६४॥

1.886

कह तापस नृप ऐसेइ होऊ। कारन एक कठिन सुनु सोऊ॥
कालौ तव-पद नाइहि सीसा। एक बिप्र-कुल छाडि महीसा ॥१॥

1.887

तप बल बिप्र सदा बरिआरा। तिन्ह के कोप न कोउ रखवारा॥
जौँ बिप्रन्ह बस करहु नरेसा। तौ तुव बस बिधि बिष्नु महेसा ॥२॥

1.888

चल न ब्रह्म-कुल सन बरिआई। सत्य कहौँ दोउ भुजा उठाई॥
विप्र साप बिनु सुनु महिपाला। तोर नास नहिँ कवनेहुँ काला ॥३॥

1.889

हरषेउ राउ बचन सुनि तासू। नाथ न होइ मार अब नासू॥
तव प्रसाद प्रभु कृपानिधाना। मो कहँ सर्ब काल कल्याना ॥४॥

1.890

एवमस्तु कहि कपट-मुनि, बोला कुटिल बहाएरि।
मिलव-हमार भुलाब-निज, कहहु त हमहिँ न खोरि ॥१६५॥

1.891

ता तेँ मैँ तोहि बरजौँ राजा। कहे कथा तव परम अकाजा॥
ठेँ स्त्रवन यह परत कहानी। नास तुम्हार सत्य मम बानी ॥१॥

1.892

यह प्रगटे अथवा द्विज-सापा। नास तोर सुनु भानुप्रतापा॥
आन उपाय निधन तव नाहीँ। जौँ हरि हर कोपहिँ मन माहीँ ॥२॥

1.893

सत्य नाथ पद-गहि नृप भाखा। द्विज-गुरु-कोप कहहु को राखा॥
राखै गुरु जौँ कोप बिधाता। गुरु-बिरोध नहिँ कोउ जग त्राता ॥३॥

1.894

जौँ न चलब हम कहे तुम्हारे। होउ नास नहिँ सोच हमारे॥
एकहि हर डरपत मन भौरा । प्रभु महिदेव-साप अति घोरा ॥४॥

1.895

होहिं बिप्र बस कवनि विधि, कहहु कृपा करि सोउ।
तुम्ह तजि दीनदयाल निज, हितू न देखौँ कोउ ॥१६६॥

1.896

सुनु नृप बिबिध जतन जग माहीँ। कष्टसाध्य पुनि होहिँ कि नाहीँ॥
अहै एक अति सुगम उपाई। तहाँ परन्तु एक कठिनाई ॥१॥

1.897

मम आधीन जुगुति नृप सोई। माएर जाब तव नगर न होई॥
आजु लगे अरु जब तेँ भयऊँ। काहू के गृह ग्राम न गयऊँ ॥२॥

1.898

जौँ न जाउँ तौ होइ अकाजू। बना आई असमज्जस आजू॥
सुनि महीस बोलेउ मृदु बानो। नाथ निगम असि नीति बखानी ॥३॥

1.899

बडे सनेह लघुनह पर करहौँ। गिरि निज सिरन्हि सदा तृन धरहीँ॥
जलधि अगाध मौलि बह फेनू। सन्तत धरनि धरत सिर रेनू ॥४॥

1.900

अस कहि गहे नरेस पद, स्वामी होहु कृपाल।
मोहि लागि दुख सहिय प्रभु, सज्जन दीनदयाल ॥१६७॥

1.901

जानि नृपहि आपन आधीना। बोला तापस कपट-प्रबीना।
सत्य कहौँ भूपति सुनु ताएही। जग नाहिँ न दुर्लभ कछु माएही ॥१॥

1.902

अवसि काज मैँ करिहौँ ताएरा। मन क्रम बचन भगत तैँ मारा।
जोग-जुगुति तप मन्त्र प्रभाऊ। फलै तबहिँ जब करिय दुराऊ ॥२॥

1.903

जौँ नरेस मैँ करौँ रसोई। तुम्ह परुसहु मोहि जान न कोई॥
अन्न सो जोइ जाइ भोजन करई। सोइ सोइ तव आयसु अनुसरई ॥३॥

1.904

पुनि तिन्ह के गृह जेवैँ जोऊ। तव बस होइ भूप सुनु सोऊ॥
जाइ उपाय रचहु नृप एहू। सम्बत भरि सङ्कलप करेहू ॥४॥

1.905

नित नूतन द्विज सहस-सत, बरेहु सहित परिवार।
मैँ तुम्हरे सङ्कलप लगि, दिनहि करब जेवनार ॥१६८॥

1.906

एहि बिधि भूप कष्ट अति योरे। हाइहहिँ सकल बिप्र बस तोरे॥
करिहहिँ बिप्र होम मख सेवा। तेहि प्रसङ्ग सहजहिँ बस देवा ॥१॥

1.907

और एक तोहि कहौँ लखाऊ। मैँ एहि बेष न आउब काऊ।
तुम्हरे उपरोहित कहँ राया। हरि आनब मैँ करि निज माया ॥२॥

1.908

तप बल तेहि करि आपु समाना। रखिहौँ इहाँ बरप परमाना।
मैँ धरि तासु बेष सुनु राजा। सब बिधि तोर सँवारब काजा ॥३॥

1.909

गै निसि बहुत सयन अब कीजे। मोहि तोहि भूप भेँट दिन तोजे।
मैँ तप बल तोहि तुरग समेता। पहुँचैहौँ सोवतहि निकेता ॥४॥

1.910

मैँ आउब सोइ वेष धरि, पहिचानेहु तब मोहि।
जब एकान्त बोलाइ सब, कथा सुनावौँ तोहि ॥१६९॥

1.911

सयन कीन्ह नृप आयसु मानी। आसन जाइ बैठ छल-ज्ञानी॥
स्त्रमित भूप निद्रा अति आई। सो किमि सोव सोच अधिकाई ॥१॥

1.912

कालकेतु निसिचर तहँ आवा। जेहि सूकर होइ नृपहि भुलावा॥
परम मित्र तापस-नृप-केरा। जानि सो अति कपट घनेरा ॥२॥

1.913

तेहि के सत सुत अरु दस भाई। खल अति अजय देव-दुख-दाई॥
प्रथमहिँ भूप समर सब मारे। बिप्र सन्त सुर देखि दुखारे ॥३॥

1.914

तेहि खल पाछिल बयर सँभारा। तापस नृप मिलि मन्त्र बिचारा॥
जेहि रिपु-छय साएइ रचेन्हि उपाऊ। भावी बस न जान कछु राऊ ॥४॥

1.915

रिपु तेजसी अकेल अपि, लघु करि गनिय न ताहु।
अजहुँ देत दुख रवि ससिहि, सिर अवसेषित राहु ॥१७०॥

1.916

तापस नूप निज सखहि निहारी। हरपि मिलेउ उठि भयौ सुखारी॥
मित्रहि कहि सब कथा सुनाई। जातुधान बोला सुख पाई ॥१॥

1.917

अब साधेउँ रिपु सुनहु नरेसा। जौँ तुम्ह कीन्ह मोर उपदेसा॥
परिहरि सोच रहहु अब साएई। बिनु ओषध बिआधि बिधि खाई ॥२॥

1.918

कुल समेत रिपु-मूल बहाई। चौथे दिवस मिलब मैँ आई॥
तापस-नृपहि बहुत परितोषी। चला महा कपटी अति रोषी ॥३॥

1.919

भानुप्रतापहि बाजि समेता। पहुँचायेसि छत माँझ निकेता॥
नृपहि नारि पहिँ सयन कराई। हय-गृह बाँधेसि बाजि बनाई ॥१॥

1.920

राजा के उपरोहितहि, हरि लेइ गयौ बहोरि।
लेइ राखेसि गिरि खोह महँ, माया करि मति भारि ॥१७१॥

1.921

चो॰—आपु बिरचि उपरोहित रूपा। परेउ जाइ तेहि सेज अनूपा॥
जागेउ नृप अनभये बिहाना। देखि भवन बड अचरज माना ॥१॥

1.922

मुनि महिमा मन महँ अनुमानी। उठेउ गँवहिँ जेहि जान न रानी॥
कानन गयौ बाजि चढि तेहो। पुर नर नारि न जानेउ केहो ॥२॥

1.923

गये जाम जुग भूपति आवा। घर घर उत्सव बाज बघावा॥
उपरोहितहि देख जब राजा। चकित बिलोक सुमिरि सोइ काजा ॥३॥

1.924

जुग सम नृपहि गयौ दिन तीनी। कपटी मुनि-पद रहि मति लीनी।
समय जानि उपरोहित आवा। नृपहि मते सब कहि समुझावा ॥४॥

1.925

नृप हरषेउ पहिचानि गुरु, भ्रम-बल रहा न चेत।
बरे तुरत सत-सहस बर, बिप्र कुटुम्ब समेत ॥१७२॥

1.926

उपरोहित जेवनार बनाई। छरस चारि बिधि जसि स्त्रुति गाई॥
माया-मय तेहि कीन्हि रसोई। बिञ्जन बहु गनि सकै न कोई ॥१॥

1.927

बिबिध मृगन्ह कर आमिष राँधा। तेहि महँ बिप्र मास खल साँधा॥
भोजन कह सब बिप्र बोलाये। पद पखारि आसन बैठाये ॥२॥

1.928

परुसन जबहिँ लाग महिपाला। भै अकास-वानी तेहि काला॥
बिप्र-वृन्द उठि उठि गृह जाहू। है बडि हानि अन्न जनि खाहू ॥३॥

1.929

भयौ रसाएई भूसुर मासू। सब द्विज उठे मानि बिस्वासू॥
भूप विकल मति माएह भुलानी। भावी बस न आव मुख वानी ॥४॥

1.930

बोले बिप्र सकोप तब, नहिँ कछु कीन्ह बिचार।
जाइ निसाचर होहु नृप, मूढ सहित परिवार ॥१७३॥

1.931

छत्रबन्धु तैँ बिप्र बोलाई। घालै लिये सहित समुदाई॥
ईस्वर राखा धरम हमारा। जैहसि तैँ समेत परिवारा ॥१॥

1.932

सम्बत मध्य नास तव होऊ। जलदाता न रहिहि कुल कोऊ॥
नृप सुनि साप बिकल अति त्रासा। भै बहोरि बर गिरा अकासा ॥२॥

1.933

बिप्रहु साप बिचारि न दीन्हा। नहिँ अपराध भूप कछु कीन्हा॥
चकित बिप्र सब सुनि नभ बानी। भूप गयौ जहँ भोजन-खानी ॥३॥

1.934

तहँ न असन नहिँ बिप्र सुआरा। फिरेउ राउ मन सोच अपारा॥
सब प्रसङ्ग महिंसुरन्ह सुनाई। त्रसित परेउ अवनी अकुलाई ॥४॥

1.935

भूपति भावी मिटै नहिँ, जदपि न दूषन तोर।
किये अन्यथा होइ नहिँ, बिप्र-साप अति घोर ॥१७४॥

1.936

अस कहि सब महिदेव सिधाये। समाचार पुरबासिन्ह पाये॥
चहिँ दूषन दैवहिँ देहीँ। बिरचत हंस काग किय जेहीँ ॥१॥

1.937

उपरोहितहि भवन पहुँचाई। असुर असुर तापसहि खबरि जनाई॥
तेहि खल जहँ तहँ पत्र पठाये। सजि सजि सेन भूप सब आये ॥२॥

1.938

घेरेन्हि नगर निसान बजाई। बिबिध भाँति नित होइ लराई॥
जूझे सकल सुभट करि करनी। बन्धु समेत परेउ नृप धरनी ॥३॥

1.939

सत्यकेतु-कुल कोउ नहिँ बाचा। बिप्र-साप किमि होइ असाँचा॥
रिपु जिति सब नृप नगर बसाई। निज-पुर गवने जय जस पाई ॥४॥

1.940

भरद्वाज सुनु जाहि जत्ब, हाएइ बिधाता बाम।
धूरि मेरु सम जनक जम, ताहि ब्याल सम दाम ॥१७५॥

1.941

काल पाइ मुनि सुनु सोइ राजा। भयौ निसाचर सहित समाजा।
दस-सिर ताहि बीस-भुजदंडा। रावन नाम बोर बरिवंडा ॥१॥

1.942

भूप अनुज अरिमर्दन नामा। भयौ सो कुम्भकरन बल धामा
सचिव जो रहा धरमरुचि जासू। भयौ बिमात्र-बन्धु लघु तासू ॥२॥

1.943

नाम विभीषन जेहि जग जाना। बिष्नु-भगत विज्ञान-निधाना॥
रहे जे सुत सेवक नृप केरे। भये निसाचर घोर घनेरे ॥३॥

1.944

काम-रूप खल जिनिस अनेका। कुटिल भयङ्कर बिगत-विधेका॥
कृपा-रहित हिंसक सब पापी। बरनि न जाहिँ बिस्व परितापी ॥४॥

1.945

उपजे जदपि पुलस्त्य-कुल; पावन अमल अनूप।
तदपि महीसुर साप-बस, भये साल अघ-रूप ॥१७६॥

1.946

कीन्ह बिबिध तप तीनिउँ भाई। परम उन नहिं बरनि सो जाई।
गयौ निकट तप देखि बिधाता। माँगहु बर प्रसन्न मैँ ताता ॥१॥

1.947

करि बिनती पद गहि दससीसा। बोलेउ बचन सुनहु जगदीसा॥
हम काहू के महिँ न मारे। बानर मनुज जाति दुई बारे ॥२॥

1.948

एवमस्तु तुम्ह बड तप कीन्हा। मैँ ब्रह्मा मिलि तेहि बर दीन्हा॥
पुनि मनु कुम्भकरन पहिँ गयऊ। तेहि बिलोकि मन बिसमय भयऊ ॥३॥

1.949

जौँ एहि खल नित करब अहारू। होइहि सत्र उजार संसारू॥
सारद प्रेरि तासु मति फेरी। माँगेसि नींद मास षट केरी ॥४॥

1.950

गये बिभीषन पास पुनि, कहेउ पुत्र घर माँगु।
तेहि माँगेउ भगवन्त पद,-कमल अमल अनुरागु ॥१७७॥

1.951

तिन्हहिं देइ बर ब्रह्म सिधाये। हरषित ते अपने गृह आये॥
मय-तनुजा मन्दोदरि नामा। परम-सुन्दरी नारि-ललामा ॥१॥

1.952

इ मय दीन्हि रावनहि आनी। होइहि जातुधान-पति जानी॥
हरषित भयौ नारि भलि पाई। पुनि दोउ बन्धु बिआहेसि जाई ॥२॥

1.953

गिरि-त्रिकूट एक सिन्धु मँझारी। बिधि-निर्मित दुर्गम अति मारी॥
इ मय दानव बहुरि सँवारा। कनक रचित मनि भवन अपारा ॥३॥

1.954

भोगावति जसि अहि-कुल बासा। अमरावति जसि सक्र-निवासा॥
तिन्ह तेँ अधिक रम्य अति बङ्का। जग बिख्यात नाम तेहि लङ्का ॥४॥

1.955

खाँई सिन्धु गंभीर अति, चारिहु दिसि फिरि आव।
कनक-कोट मनि-खचित दृढ, बरनि न जाइ बनाव ॥
हरि प्रेरित जेहि कलप जोइ, जातुधान-पति होइ।
सूर प्रतापी अतुल-बल, दल समेत बस सोइ ॥१७८॥

1.956

रहे तहाँ निसिचर भट भारे। ते सब सुरम्ह समर सङ्घारे।
अब तहँ रहहिँ सक्र के प्रेरे। रच्छक कोटि जच्छपति केरे ॥१॥

1.957

दसमुख कतहुँ खबरि असि पाई। सेन साजि गढ घेरेसि जाई॥
देखि बिकट भट बडि कटकाई। जच्छ जीव लेइ गयौ पराई ॥२॥

1.958

फिरि सब नगर दसानन देखा। गयौ सोच सुख भयौ बिसेखा॥
सुन्दर सहज अगम अनुमानी । कीन्ह तहाँ रावन रजधानी ॥३॥

1.959

जेहि जस जोग बाँटि गृह दीन्हे। सुखो सकल रजनीचर कीन्हे॥
एक बार कुबेर पर धावा। पुष्पक-जानि जीति लेइ आवा ॥४॥

1.960

कौतुकहो कैलास पुनि, लीन्हेसि जाइ उठाइ।
मनहुँ तौलि निज बाहु बल, चना बहुन सुख पाइ ॥१७९॥

1.961

सुख सम्पति सुत सेन सहाई। जय प्रताप बल बुद्धि बडाई॥
नित नूतन सब बाढत जाई। जिमि प्रति लाभ लाएभ अधिकाई ॥१॥

1.962

अति बल कुम्भकरन असभ्राता। जेहि कहँ नहिँ प्रतिभट जग जाता॥
करै पान सोवै षट मासा। जागत होइ तिहूँ-पुर त्रासा ॥२॥

1.963

जौँ दिन-प्रति अहार कर साएई। बिस्व बेगि सब चौपट हाई॥
समर धीर नहिँ जाइ बखाना। तेहि समअमित बीर बलवाना ॥३॥

1.964

बारिदनाद जेठ सुत तासू। भठ महँ प्रथम लोक जग जासू॥
जेहि न हाएइ रन-सनमुख कोई। सुर-पुर नितहि परावरन होई ॥४॥

1.965

कुमुख अकम्पन कुलिसरद, धूमकेतु अतिकाय।
एक एक जग जीति सक, ऐले सुभट निकाय ॥१८०॥

1.966

काम-रूप जानहिँ सब माया। सपनेहुँ जिन्ह के धरम न दाया॥
दसमुख बैठ सभा एक बारा। देखि अमित आपन परिवारा ॥१॥

1.967

सुत-समूह जन परिजन नाती। गनै को पार निसाचर जाती॥
सेन बिलोकि सहज अभिनानी। बोला बचन क्रोध-मद-सानी ॥२॥

1.968

सुनहु सकल रजनीचर जूया। हमरे बैरी बिबुध-बरूया॥
ते सनमुख नहिँ करहिँ लराई। देखि सबल-रिपु जाहिँ पराई ॥३॥

1.969

तिन्ह कर मरन एक बिधि हाएई। कहौँ बुझाइ सुनहु अब साएई॥
द्विज-भोजन मख होम सराधा। सब के जाइ करहु तुम्ह बाधा ॥४॥

1.970

छुधा-छीन बल-हीन सुर, सहजहि मिलिहहिँ आइ।
तब मारिहौँ कि छाडिहौँ, भली भाँति अपनाइ ॥१८१॥

1.971

मेघनाद कहँ पुनि हँकरावा। दीन्ही सिख बल बयर बढावा॥
जे सुर समर-धीर बलबाना। जिन्ह के लरिबे कर अमिमाना ॥१॥

1.972

तिन्हहिँ जीति रन आनेसु बाँधी। उठि सुन पितु-अनुसासन काँधी॥
एहि बिधि सबही आज्ञा दीन्ही। आपुन चलेउ गदा कर लोन्ही ॥२॥

1.973

चलत दसानन डोलसि अवनी। गर्जत गर्भ-स्त्रवत सुर-रवनो॥
रावन आवत सुनेउ सकोहा। देवन्ह तके मेरु गिरि खोहा ॥३॥

1.974

दिगपालन्ह के लोक सुहाये। सूने सकल दसानन पाये॥
पुनि पुनि सिंहनाद करि भारी। देइ देवतन्ह गारि प्रचारी ॥४॥

1.975

रन-मद मत्त फिरै जग धावा। प्रतिभट खोजत कतहुँ न पावा॥
रवि ससि पवन बरुन धन-धारी। अगिनि काल जम सब अधिकारी ॥५॥

1.976

किन्नर सिद्ध मनुज सुर नागा। हठि सबहो के पन्धहि लागा॥
ब्रह्म-सृष्टि जहँ लगि तनु-धारी। दसमुख-बसवर्त्ती नर नारी ॥६॥

1.977

आयसु कहिँ सकल भयभीता। नवहिँ आइ नित चरन बिनीता ॥७॥

1.978

भुज-बल बिस्व बस्य करि, राखेसि कोउ न स्वतन्त्र।
मडलीक-मनि रावन, राज करै निज-मन्त्र ॥
देव जच्छ गन्धर्व नर, किन्नर नाग कुमारि।
जीति बरी निज-बाहु-बल, बहु सुन्दरि बर नारि ॥१८२॥

1.979

इन्द्रजीत सन जो कछु कहेऊ। सो सब जनु पहिलेहि करि रहेऊ॥
प्रथमहिँ जिन्ह कहँ आयसु दीन्हा। तिन्ह कर चरित सुनहु जो कोन्हा ॥१॥

1.980

देखत भीम-रूप सब पापी। निसिचर-निकर देव-परितापी॥
करहिँ उपद्रव असुर निकाया। नाना रूप धरहिँ करि माया ॥२॥

1.981

जेहि बिधि होइ धरम-निर्मूला। सो सब करहिँ बेद-प्रतिकूला॥
जेहि जेहि देस धेनु द्विज पावहिँ। नगर गाँउ पुर आगि लगावहिँ ॥३॥

1.982

सुभ-आचरन कतहुँ नहिँ होई। देव बिप्र गुरु मान न कोई॥
नहिँ हरिभगति जज्ञ जप दाना। सपनेहुँ सुनिय न बेद पुराना ॥४॥

1.983

जप जोग बिरागा, तप मख-भागा, स्त्रवन सुनै दससीसा।
आपुन उठि धावै, रहै न पावै, धरि सब घालै खीसा॥
अस भ्रष्ट अचारा, भा संसारा, धरम सुनिय नहिँ काना।
तेहि बहु बिधि त्रासै, देस निकासै, जो कह बेद-पुराना ॥१॥

1.984

बरनि न जाइ अनीति, घोर निसाचर जो करहिँ।
हिंसा पर अति प्राति, तिन्ह के पापहि कवनि मिति ॥१८३॥

1.985

बाढे खल बहु चार जुआरा। जे लम्पट पर-धन पर-दारा॥
मानहिँ मातु पिता नहिँ देवा। साधुन्ह सन करवावहिँ सेवा ॥१॥

1.986

जिन्ह के यह आचरन भवानी। ते जानहु निसिचर सम प्रानी॥
अतिसय देखि धरम कै हानी। परम सभीत धरा अकुलानी ॥२॥

1.987

गिरि सरि सिन्धु भार नहिँ मोही। जस मोहि गरुअ एक पर-द्रोही।
सकल घरम देखा बिपरीता। कहि न सकै रावन भयभीता ॥३॥

1.988

धेनु-रूप धरि हृदय बिचारी। गई तहाँ जहँ सुर-मुनि-झारी॥
निज-सन्ताप सुनायेसि रोई। काहूँ तेँ कछु काज न होई ॥४॥

1.989

सुर मुनि गन्धर्बा, मिलि करि सर्बा, गे बिरज्चि के लोका।
सँग गा-तनु धारी, भूमि बिचारी, परम बिकल भय सोका॥
ब्रह्मा सब जाना, मन अनुमाना, माएरौ कछु न बसाई।
जा करि तैँ दासी, सो अबिनासी, हमरौ तोर सहाई ॥२॥

1.990

धरनि घरहि मन धीर, कह बिरज्चि हरि-पद सुमिरु।
जानत जन की पीर, प्रभु मज्जिहि दारुन बिपत्ति ॥१८४॥

1.991

ब्रैठे सुर सब करहिँ बिचारा। कहँ पाइय प्रभु करिय पुकारा।
पुर बैकुंठ जान कह कोई। कोउ कह पयनिधि बस प्रभु साएई ॥१॥

1.992

जाके हृदय भगति जसि प्रीती। प्रभु तहँ प्रगट सदा तेहि रीती॥
तेहि समाज गिरिजा मैँ रहेऊँ। अवसर पाइ बचन एक कहेऊँ ॥२॥

1.993

हरि ब्यापक सर्वत्र समाना। प्रेम तेँ प्रगट हाएहिँ मैँ जाना॥
देस काल दिसि विदिसहु माहीँ। कहहु से कहाँ जहाँ प्रभु नाहीँ ॥३॥

1.994

अग-जग-मय सब रहित बिरागी। प्रेम तेँ प्रभु प्रगटै जिमि आगी॥
मोर बचन सत्ब के मन माना। साधु साधु करि ब्रह्म बखाना ॥४॥

1.995

सुनि बिरज्चि मन हरषि तन,-पुलकि नयन बह नीर।
अस्तुति करत जाएरि कर, सावधान मति-धीर ॥१८५॥

1.996

जय जय सुर-नायक, जन सुख-दायक, प्रनतपाल भगवन्ता।
गो-द्विज-हितकारी, जय असुरारी, सिन्धु-सुता प्रिय कन्ता॥
पालन सुर धरनी, अदभुत-करनी, मरम न जानै कोई।
जो सहज कृपाला, दीनदयाला, करहु अनुग्रह साएई ॥३॥

1.997

जय जय अबिनासी, सन घट बासी, व्यापक परमानन्दा।
अबिगत गाएतोतं, चरित पुनीतं, माया रहित मकुन्दा॥
जेहि लागि बिरागी, अति अनुरागी, विगत माह मुनिवृन्दा।
निसिबासर ध्यावहिँ, गुन गन गावहिँ, जयति सच्चिदानन्दा ॥४॥

1.998

जेहि सृष्टि उपाई, त्रिबिधि बनाई, सङ्ग सहाय न दूजा।
करौ अघारी, चिन्त हमारी, जानिय भगति न पूजा॥
जो भव-भय भज्जन, मुनि-मन रज्जन, गञ्जन बिपति बरूया।
मन बच क्रम बानी, छाडि सयानी, सरन सकल-सुर-जूथा ॥५॥

1.999

सारद स्त्रुति सेषा, रिषय असेषा, जा कहँ कोउ नहिँ जाना।
जेहि दीन पियारे, बेद पुकारे, द्रवौ सो श्रीभगवाना॥
भव-बारिधि-मन्दर, सब निधि सुन्दर, गुन मन्दिर सुख-पुज्जा।
मुनि सिद्ध सकल सुर, परम भयातुर, नमत नाथ-पद-कज्जा ॥६॥

1.1000

जानि सभय सुर-भूमि सुनि, बचन समेत सनेह।
गगन-गिरा गम्भीर भै, हरनि सोक-सन्देह ॥१८६॥

1.1001

जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा। तुम्हहिँ लागि धरिहौँ नर-बेसा॥
अंसन्ह सहित मनुज अवतारा। लेइहौँ दिनकर-बंस उदारा ॥१॥

1.1002

कस्यप अदिति महा तप कीन्हा। तिन्ह कहँ मैँ पूरब बर दीन्हा॥
ते दसरथ-काऐसल्या—रूपा। कोसलपुरी प्रगट नर-भूपा ॥२॥

1.1003

तिन्ह के गृह अवतरिहौँ जाई। रघुकुल तिलक सुचारिउ भाई॥
नारद बचन सत्य सब करिहौँ। परम सक्ति समेत अवतरिहौँ ॥३॥

1.1004

हरिहौँ सकल भूमि गरुआई। निर्भय होहु देव समुदाई॥
गगन ब्रह्म-बानी सुनि काना। तुरत फिरे सुर हृदय जुडाना ॥४॥

1.1005

तब ब्रह्मा धरनिहि समुझावा। अभय अई मरोस जिय आवा ॥५॥

1.1006

निज लोकहि बिरज्चि गे, देवन्ह इहै सिखाइ।
बानर-तनु धरि धरि महि, हरि-पद सेवहु जाइ ॥१८७॥

1.1007

गये देव सब निज निज धामा। भूमि सहित मन कहँ बिस्रामा॥
जो कछु आयसु ब्रह्मा दीन्हा। हरषे देव बिलम्ब न कीन्हा ॥१॥

1.1008

बनचर देइ धरी छिति माहीँ। अतुलित बल-प्रताप तिन्ह पाहीँ॥
गिरि-तरु-नख आयुध सब बीरा। हरि मारग चितवहिँ मतिधीरा ॥२॥

1.1009

गिरि कानन जहँ तहँ महि पूरी। रहे निज निज अनीक रुचिरूरी।
यह सब रुचिर चरित मैँ भाखा। अब सो सुनहु जो बीचहि राखा ॥३॥

1.1010

अवधपुरी रघुकुल-मनि राऊ। बेद बिदित तेहि दसरथ नाऊ॥
धरम-धुरन्धर गुन-निधि ज्ञानी। हृदय भगति मति सारँग-पानी ॥४॥

1.1011

कौसल्यादि नारि प्रिय, सब आचरन पुनीत।
पति अनुकूल प्रेम दृढ, हरि-पद-कमल विनीत ॥१८८॥

1.1012

एक बार भूपति मनमाहीँ। भै गलानि मारे सुत नाहीँ॥
गुरु गृह गयौ तुरत महिपाला। चरन लागि करि विनय बिसाला ॥१॥

1.1013

निज दुख सुख सब गुरुहि सुनायो। कहि बसिष्ठ बहु बिधि समुझायो॥
धरहु धीर होइहहिँ सुत-चारी। त्रिभुवन-विदित भगत-भय-हारी ॥२॥

1.1014

सृङ्गी रिषिहि बसिष्ठ बोलावा। पुत्रकाम सुभ जग्य करावा॥
भगति सहित मुनि आहुति दीन्हे। प्रगटे अगिनि चरू कर लीन्हे ॥३॥

1.1015

जो वसिष्ठ कछु हृदय विचारा। सकल काज भा सिद्ध तुम्हारा॥
यह हबि बाँटि देहु नृप जाई। यथा जोग जेहि भाग बनाई ॥४॥

1.1016

तब अद्वस्य भये पावक, सकल समहि समुझाइ।
परमानन्द मगन नृप, हरष न हृदय समाइ ॥१८९॥

1.1017

तबहि राय प्रिय नारि बोलाई। कौसल्यादि तहाँ चलि आई॥
अरध-भाग कौसल्यादि दीन्हा। उभय माग आधे कर कीन्हा ॥१॥

1.1018

कैकेई कहँ नप सो दयऊ। रहेउ साए उभय भाग पुनि भयऊ॥
कौसल्या कैकयी हाथ धरि। दीन्ह सुमित्राहि मन प्रसन्न करि ॥२॥

1.1019

एहि बिधि गर्भ-सहित सब नारी। भईँ हृदय हरषित सुख-भारी॥
जो दिन से हरि गर्भहि आये। सकल लोक सुख-सम्पति छाये ॥३॥

1.1020

मन्दिर महँ सब राजहिँ रानी। सोभा—सील-तेज की खानी।
सुख-जुत कछुक काल चलि गयऊ। जेहि प्रभु प्रगट सो अवसर भयऊ ॥४॥

1.1021

जोग लगन ग्रह बार तिथि, सकल मये अनुकूल।
चर अरु अचर हरष-जुत, राम-जनम सुख-मूल ॥१९०॥

1.1022

नवमी तिथि मधु माख पुनीता। सुकल पच्छ अभिजित हरि-प्रीता।
मध्य दिवस अति सीत न घामा। पावन-काल लोक-विखामा ॥१॥

1.1023

सीतल मन्द सुरभि बह बाऊ। हरषित सुर सन्तन्ह मन चाऊ।
बन कुसुमित गिरि-गन-मनिआरा। स्रवहिँ सकल सरितामृत-धारा ॥२॥

1.1024

अवसर बिरज्चि जब जाना। चले सकल सुर साजि विमाना॥
गगन बिमल सङ्कल-सुर-जूथा। गावहिँ गुन गन्धर्व-बरुथा ॥३॥

1.1025

बरषहिँ सुमन सुअञ्जलि साजी। गहगहि गगन दुन्दुभी बाजी॥
अस्तुति करहिँ नांग-मुनि-देवा। बहु बिधि लावहिँ निज निज सेवा ॥४॥

1.1026

सुर-समूह बिनती करि, पहुँचे निज निज धाम।
जगनिवास प्रभु प्रगटे, अखिल-लोक-बिस्राम ॥१९१॥

1.1027

भये प्रगट कृपाला, दीनदयाला, काऐसल्या-हितकारी।
हरषित महँतारी, मुनि-मन-हारी, अदभुत रूप बिचारी।
लोचन अभिरामं, तनु-धन-स्यामं, निज आयुध भुज चारी।
भूषन बनमाला, नयन बिसाला, सोभा-सिन्धु खरारी ॥७॥

1.1028

कह दुइ कर जोरा, अस्तुति तोरी, केहि बिधि करौँ अनन्ता।
माया-गुन-ज्ञाना,-तीत अमाना, बेद पुरान भनन्ता॥
करुना-सुख-सागर, सब गुन आगर, जेहि गावहिँ स्त्रुति सन्ता।
मम-हित-लागी, जन-अनुरागी, भयौ प्रगट श्रीकन्ता ॥८॥

1.1029

ब्रह्मांड निकाया, निर्मित-माया, रोम रोम प्रति, बेद कहै।
मम उर सो बासी, यह उपहासी, सुनत धीर मति, थिर न रहै॥
उपजा जब ज्ञाना, प्रभु मुसुकाना, चरित बहुत बिधि, कीन्ह चहै।
कहि कथा सुहाई, मातु बुझाई, जेहि प्रकार सुन, प्रेम लहै ॥१॥

1.1030

माता पुनि बोली, सो मति डोली, तजहु तात यह रूपा।
कीजिय सिसुलीला, अति प्रिय-सोला, यह सुख परम अनूपा॥
सुनि बचन सुजाना, रोदन ठाना, हाइ बालक सुर-भूपा॥
यह चरित जे गावहिँ, हरि पद पावहिँ, ते न परहिँ भव-कूपा ॥९॥

1.1031

बिप्र-धेनु-सुर-सन्त हित, लीन्ह मनुज-अवतार।
निज-इच्छा निर्मित-तनु, माया-गुन-गो पार ॥१९२॥

1.1032

सुनि सिसु रुदन परम प्रिय बानी। सम्भ्रम चलि ओई सब रानी।
हरषित जहँ तहँ धाईँ दासी। आनँद मगन सकल पुरबासी ॥१॥

1.1033

दसरथ पुत्र-जन्म सुनि काना। मानहुँ ब्रह्मानन्द समाना॥
परम-प्रेम-मन पुलक-सरीरा। चाहत उठन करत मति धीरा ॥२॥

1.1034

जा कर नाम सुनत सुभ होई। माएरे गृह आवा प्रभु साएई।
परमानन्द-पूरि-मन राजा। कहा बोलाइ बजावहु बाजा ॥३॥

1.1035

गुरु बसिष्ट कहें गयौ हँकारा। आये द्विजन्ह सहित नृप-द्वारा॥
अनुपम बालक देखेन्हि जाई। रूप-रासि गुन कहि न सिराई ॥४॥

1.1036

तब नन्दीमुख-खाध करि, जातकरम सब कीन्ह।
हाटक धेनु बसन भनि, नृप बिप्रन्ह कहँ दोन्ह ॥१९३॥

1.1037

ध्वज पताक तोरन पुर छावा। कहि न जाइ जेहि भाँति बनावा॥
सुमनबृष्टि अकास तैँ हाएई। ब्रह्मानन्द मगन सब लोई ॥१॥

1.1038

बृन्द बृन्द मिलि चलीँ लोगाई। सहज सिंगार किये उठि धाई॥
कनक-कलस मङ्गल भरि थारा। गावत पैठहिँ भूप-दुआरा ॥२॥

1.1039

करि आरती निछावर करहीँ। बार बार सिसु चरनन्हि परहीँ॥
मागध सूत बन्दि-गन गायक। पावन गुन गावहिँ रघुनायक ॥३॥

1.1040

सरबस-दान दीन्ह सब काहू। जेहि पावा राखा नहिँ ताहू॥
मृगमद-चन्दन-कुङ्कुम कीचा। मची सकल बीथिन्ह बिच बीचा ॥४॥

1.1041

गृह गृह बाज बधाव सुभ, प्रगटे सुखमा-कन्द।
हरषवन्त सब जहँ तहँ, नगर नारि-नर-वृन्द ॥१९४॥

1.1042

कैकय-सुता सुमित्रा दोऊ। सुन्दर-सुत जनमत भैँ ओऊ॥
वह सुख सम्पति समय समाजा। कहि न सकै सारद अहिराजा ॥१॥

1.1043

अवधपुरी सोहै एहि भाँती। प्रभुहि मिलन आई जनु राती॥
देखि भानु जनु मन सकुचानी। तदपि बनी सन्ध्या अनुमानी ॥२॥

1.1044

अगर-धूप बहु जनु अँधियारी। उडै अवीर मनहुँ अरुनारी॥
मन्दिर-मनि-समूह जनु तारा। नृप गृह कलस सेओ इन्दु उदारा ॥३॥

1.1045

भवन बेद-धुनि अति मृदुबानी। जनु खग मुखर समय जनु सानी।
कौतुक देखि पतङ्ग भुलाना। एक मास तेई जात न जाना ॥४॥

1.1046

मास दिवस कर दिवस भा, मरम न जानै कोइ।
रथ समेत रवि थाकेउ, निसा कवनि विधि होइ ॥१९५॥

1.1047

यह रहस्य काहू नहिँ जाना। दिन-मनि चले करत गुन गाना॥
देखि महोत्सव सुर मुनि नागा। चले भवन बरनत निज भागा ॥१॥

1.1048

औरौ एक कहौँ निज चोरी। सुनुगिरिजा अति दुढ मति ताएरी॥
काकभुसुंडि सङ्ग हम दोऊ। मनुज-रूप जानै नहिँ कोऊ ॥२॥

1.1049

परमानन्द प्रेम-सुख फूले। बीथिन्ह फिरहिँ मगन मन भूले॥
यह सुभ चरित जान पै साएई। कृपा राम कै जा पर होई ॥३॥

1.1050

तेहि अवसर जो जेहि बिधि आवा। दीन्ह भूप जो जेहि मन भावा॥
गज रथ तुरग हेम गो हीरा। दीन्हे नृप नाना बिधि चीरा ॥४॥

1.1051

मन सन्तोष सबन्हि के, जहँ तहँ देहिँ असीस।
सकल तनय चिरजीवहु, तुलसिदास के ईस ॥१९६॥

1.1052

छुक दिवस बीते एहि भाँती। जात न जानिय दिन अरु राता।
नाम-करन कर अवसर जानी। भूप बोलि पठये मुनि-ज्ञानी ॥१॥

1.1053

करि पूजा भूपति अस भाखा। धरिय नाम जो मुनि गुनि राखा॥
इन्ह के नाम अनेक अनूपा। मैँ नृप कहब स्वमति अनुरूपा ॥२॥

1.1054

जो आनन्द-सिन्धु सुख-रासी। सीकर तें त्रैलोक सुपासी॥
सुख-धाम राम अस नामा। अखिल-लोक दायक विखामा ॥३॥

1.1055

बिस्व-भरन-पोषन कर जोई। ता कर नाम भरत अस होई॥
जा के सुमिरन तेँ रिपु-नासा । नाम सत्रुहन बेद प्रकासा ॥४॥

1.1056

लच्छनधाम राम-प्रिय, सकल जगत आधार।
गुरु बसिष्ठ तेहि राखा, लछिमन नाम उदार ॥१९७॥

1.1057

धरे नाम गुरु हृदय बिचारी। बेद-तत्व नृप तव सुत चारी॥
मुनि-धन जन-सरबस सिव-प्राना। बाल केलि-रस-तेहि सुख माना ॥१॥

1.1058

बारेहि तेँ निज हित पति जानी। लछिमन राम-चरन-रति मानी॥
भरत सत्रुहन दूनौ भाई। प्रभु सेवक जसि प्रोति बडाई ॥२॥

1.1059

स्याम गौर सुन्दर दोउ जोरी। निरखहिँ छबि जननी तृन तोरी॥
चारिउ सील-रूप गुन धामा। तदपि अधिक सुख-सागर-रामा ॥३॥

1.1060

हृदय अनुग्रह इन्दु प्रकासा। सूचत किरन मनोहर हासा॥
कबहुँ उछङ्ग कबहुँ बर पलना। मातु दुलारहिँ कहि प्रिय ललना ॥४॥

1.1061

व्यापक-ब्रह्म निरञ्जन, निर्गुन बिगत बिनोद।
अज प्रेम-भगति बस, कौसल्या के गोद ॥१९८॥

1.1062

कामकोटि-छबि स्याम सरीरा। नीलकज बारिद गम्भीरा॥
अरुन चरन-पङ्कज नख जोती। कमल दलन्हि बैठे जनु माएती ॥१॥

1.1063

रेख कुलिस ध्वज अङ्कुस साएहै। नूपुर धुनि सुनि मुनि मन मोहै॥
कटि किङ्किनी उदर त्रय रेखा। नाभि गँभीर जान जेहि देखा ॥२॥

1.1064

भुज बिसाल भूषन जुत भूरी। हिय हरि-नख अति सोभा रुरी॥
उर मनि-हार-पदिक की सोभा। बिप्र-चरन देखत मन लोभा ॥३॥

1.1065

कम्बु कंठ अति चिबुक सुहाई। आनन अमित मदन-छबि छाई॥
दुइ दुइ दसन अधर अरुनारे। नासा तिलक को बरनै पारे ॥४॥

1.1066

सुन्दर स्रवन सुचारु कपोला। अति प्रिय मधुर ताएतरे बोला॥
चिक्कन कच कुञ्चित गभुआरे। बहु प्रकार रचि मातु सँवारे ॥५॥

1.1067

पीत झँगुलिया तनु पहिराई। जानु-पानि विचरनि माएहि भाई॥
रूप सकहिँ नहिँ कहि स्रुति सेखा। सो जानहिँ सपनेहुँ जिन्ह देखा ॥६॥

1.1068

सुख सन्दोह माएह पर, ज्ञान-गिरा-गोतीत।
दम्पति परम प्रेम-बस, कर सिसु चरित पुनीत ॥१९९॥

1.1069

एहि बिधि राम जगत-पितु-माता। कोसलपुरबासिन्ह सुख-दाता॥
जिन्ह रघुनाथ चरन रनि मानी। तिन्ह को यह गति प्रगट भवानी ॥१॥

1.1070

रघुपत्ति-बिमुख जतन कर कोरा। कवन सकै भव-बन्धन छोरी॥
जीव चराचर बस कै राखे। सो माया प्रभु साएँ भय भाखे ॥२॥

1.1071

भृकुटि-बिलास नचावै ताही। अस प्रभु छाडि भजिय कहु काही॥
मन क्रम बचन छाडि चतुराई। भजत कृपा करिहहिँ रघुगई ॥३॥

1.1072

एहि बिधि सिसु-बिनोद प्रभु कीन्हा। सकल नगर-बासिन्ह सुख दीन्हा॥
लेइ उछङ्ग कबहुँक हलरावै। कबहुँ पालने घालि झुलावै ॥४॥

1.1073

प्रेम मगन कौसल्या, निसि दिन जात न जान।
सुत-सनेह-बस माता, बाल-चरित कर गान ॥२००॥

1.1074

एक बार जननी अन्हवाये। करि सिंगार पलना पौढाये॥
निजकुल इष्टदेव भगवाना। पूजा हेतु कीन्ह असनाना ॥१॥

1.1075

करि पूजा नैवेद चढावा। आपु गई जहँ पाक बनावा॥
बहुरि मातु तहवाँ चलि आई। भोजन करत देख सुत जाई॥२॥

1.1076

गह जननी सिसु पहिँ भयभीता। देखा बाल तहाँ पुनि सूता॥
बहुरि आइ देखा सुत साएई। हृदय कम्प मन धीर न होई ॥३॥

1.1077

इहाँ उहाँ दुइ बालक देखा। मति भ्रम माएर कि आन बिसेखा॥
देखि राम जननी अकुलानी। प्रभु हँसि दीन्ह मधुर मुतुकानी ॥४॥

1.1078

देखरावा मातहि निज, अदभुत रूप अखंड।
रोम रोम प्रति लागे, कोटि कोटि ब्रह्मंड ॥२०१॥

1.1079

अगनितरविससिसिवचतुरानन। बहुगिरिसरितसिन्धुमहिकानन॥
काल करम गुन ज्ञान सुभाऊ। सोउ देखा जो सुना न काऊ ॥१॥

1.1080

देखी माया सब बिधि गाढी अति सभीत जोरे कर ठाढी॥
देखा जीव नचावै जाही। देखी भगति जो छोरै ताही ॥२॥

1.1081

तन पुलकित मुख बचन न आवा। नयन मूँदि चरनन्हि सिर नावा॥
बिसमयवन्त देखि महँतारी। भये बहुरि सिसु रूप खरारी ॥३॥

1.1082

अस्तुति करि न जाइ भय माना। जगत-पिता मैँ सुत करि जाना॥
हरि जननी बहु बिधि समुझाई। यह जनि कतहुँ कहसि सुनु माई ॥४॥

1.1083

बार बार कौसल्या, बिनय करै कर जोरि।
अब जनि कबहूँ व्यापै, प्रभु मोहि माया ताएरि ॥२०२॥

1.1084

बाल चरितहरिबहु बिधि कीन्हा। अति अनन्द दासन्ह कहँ दीन्हा॥
कछुक काल बीते सब भाई। बडे भये परिजन सुखदाई ॥१॥

1.1085

चूडाकरन कीन्ह गुरु जाई। बिप्रन्ह पुनि दछिना बहु पाई॥
परम मनोहर चरित अपारा। करत फिरत चारिउ सुकुमारा ॥२॥

1.1086

मन-क्रम-बचन अगोचर जाई। दसरथ-अजिर बिचर प्रभु सोई॥
भोजन करत बाल जब राजा। नहिँ आवत तजि बाल-समाजा॥३॥

1.1087

कौसल्या जब बोलन जाई। ठुमुक ठुमुक प्रभु चलहिँ पराई॥
निगम नेति सिव अन्त न पावा। ताहि धरै जननी हठि धावा ॥४॥

1.1088

धूसर धूरि भरे तनु आये। भूपति बिहँसि गोद बैठाये ॥५॥

1.1089

भोजन करत चपल चित, इत उत अवसर पाइ।
भाजि चले किलकत मुख, दधि-ओदन लपटाइ ॥२०३॥

1.1090

बालचरित अति सरल सुहाये। सारद सेष सम्भु स्त्रुति गाये॥
जिन्ह कर मन इन्ह सन नहिँ राता। ते जन बञ्चित किये बिधाता ॥१॥

1.1091

भये कुमार जबहिँ सब भ्राता। दीन्ह जनेऊ गुरु-पितु-माता॥
गुरु गृह गये पढन रघुराई। अलप काल बिद्या सब आई ॥२॥

1.1092

जाकी सहज स्वास स्त्रुति चारी। सो हरि पढ यह कौतुक भारी॥
विद्या-बिनय निपुन गुन-सीला। खेलहिँ खेल सकल नृप-लीला ॥३॥

1.1093

करतल बान धनुष अति साएहा। देखत रूप चराचर मोहा॥
जिन्ह बीथिन्ह बिहरहिँ सब भाई। थकित होहिँ सब लोग लुगाई ॥४॥

1.1094

कोसलपुर-बासी नर, नारि बृद्ध अरु बाल।
प्रानहूँ तेँ प्रिय लागत, सब कहँ राम कृपाल ॥२०४॥

1.1095

बन्धु सखा सँग लेहिँ बोलाई। बन मृगया नित खेलहिँ जाई॥
पावन-मृग मारहिँ जिय जानी। दिनप्रति नृपहि देखावहिँ आनी ॥१॥

1.1096

जे मृग राम बान के मारे। ते तनु तजि सुरलोक सिधारे॥
अनुज सखा सँग भोजन करहीँ। मातु पिता अज्ञा अनुसरहीँ ॥२॥

1.1097

जेहि बिधि सुखी होहिँ पुर लोगा। करहिँ कृपानिधि सेआइ सञ्जोगा॥
बेद पुरान सुनहिँ मन लाई। आघु कहहिँ अनुजन्ह समुझाई ॥३॥

1.1098

प्रातकाल उठि कै रघुनाथा। मातु पिता गुरु नावहिँ माथा॥
आयसु माँगि करहिँ पुर-काजा। देखि चरित हरषै मन राजा ॥४॥

1.1099

व्यापक अकल अनीह अज, निर्गुन नाम न रूप।
भगत-हेतु नाना बिधि, करत चरित्र अनूप ॥२०५॥

1.1100

यह सब चरित कहा मैँ गाई। आगिल कथा सुनहु मन लाई॥
बिस्वामित्र महामुनि ज्ञानी। बसहिँ बिपिन सुभ आस्त्रम जानी ॥१॥

1.1101

जहँ जप जोग जज्ञ मुनि करहीँ। अति मारीच सुबाहुहि डरहीँ॥
देखत जज्ञ निसाचर धावहिँ। करहिँ उपद्रव मुनि दुख पावहिँ ॥२॥

1.1102

गाधि-तनय मन चिन्ता ब्यापी। हरि विनु मरहिँ न निसिचर पापी॥
तब मुनिबर मन कीन्ह बिचारा। प्रभु अवतरेउ हरन महि-भारा ॥३॥

1.1103

एहू मिस देखौँ पद जाई। करि बिनती आनौँ दोउ भाई॥
ज्ञान बिराग सकल गुन अयना। सेओ प्रभु मैँ देखब मरि नयना ॥४॥

1.1104

बहु बिधि करत मनोरथ, जात लागि नहिँ बार।
करि भज्जन सरजू-जल, गये भूप-दरबार ॥२०६॥

1.1105

चा॰—मुनि आगमन सुना जब राजा। मिलन गयौ लेइ बिप्र समाजा॥
करि दंडवत सुनिहि सनमानी। निज आसन बैठारेन्हि आनी॥१॥

1.1106

चरन पखारि कीन्हि अति पूजा। मो सम आजु धन्य नहिँ दूजा॥
बिबिध भाँति भोजन करवावा। मुनिबर हृदय हरष अति पावा ॥२॥

1.1107

पुनि चरनन्हि मेले सुत चारी। राम देखि मुनि देह बिसारी॥
भये मगन देखत मुख सोभा। जनु चकोर पूरन ससि लोभा ॥३॥

1.1108

तब मन हरषि बचन कह राऊ। मुनि अस कृपा न कीन्हेहु काऊ॥
केहि कारन आगमन तुम्हारा। कहहु सो करत न लावौँ बारा ॥४॥

1.1109

असुर समूह सतावहिँ माही। मैं जाचन आयौँ नृप तोही॥
अनुज समेत देहु रधुनाथा। निखिचर बध मैं होब सनाथा ॥५॥

1.1110

देहु भूप मन हरषित, तजहु माह अज्ञान।
धर्म सुजस प्रभु तुम्ह कौँ, इन्ह कहँ अति कल्यान ॥२०७॥

1.1111

सुनि राजा अतिअप्रिय बानी। हृदय-कम्प मुख-दुति-कुम्हिलानी।
थेपन पायौँ सुत चारी। बिप्र बचन नहिँ कहेउ बिचारी ॥१॥

1.1112

माँगहु भूमि धेनु धन कोसा। सरबस देउँ आजु सहरोसा॥
देह प्रान तेँ प्रिय कछु नाहीँ। सोउ मुनि देउँनिमिष एक माहीँ॥२॥

1.1113

सब सुत प्रिय माएहि प्रान कि नाँई। राम देत नहिँ बनै गेसाँई॥
कहँ निसिचर अति घोर कठोरा। कहँ सुन्दर सुत परम किसोरा ॥३॥

1.1114

सुनि नृप-गिरा प्रेम-रस-सानी। हृदय हरष माना मुनि ज्ञानी॥
तब बसिष्ठ बहु बिधि समुझावा। नृप सन्देह नास कहँ पावा ॥४॥

1.1115

अति आदर दोउ तनय बोलाये। हृदय लाइ बहु भाँति सिखाये॥
मेरे प्राननाथ सुत दोऊ। तुम्ह मुनिपिता आन नहिँ कोऊ ॥५॥

1.1116

सौँपे भूप रिषिहि सुत, बहु बिधि देइ असीस।
जननी भवन गये प्रभु, चले नाइ पद सीस॥
पुरुष सिंह दोउ बीर, हरषि चले मुनि भय हरन।
कृपासिन्धु मतिधीर, अखिल-बिस्व कारन-करन ॥२०८॥

1.1117

अरुन नयन उर बाहु बिसाला। नील जलद तनु स्याम तमाला॥
कटि पट पीत कसे बर भाथा। रुचिर चाप सायक दुहुँ हाथा ॥१॥

1.1118

स्याम गौर सुन्दर दोउ भाई। बिस्वामित्र महानिधि पाई॥
प्रभु ब्रह्मन्य-देव मैँ जाना। मोहि हित पिता तजेउ भगवाना ॥२॥

1.1119

चले जात मुनि दीन्हि देखाई। सुनि ताडका क्रोध करि धाई॥
एकहि बान प्रान हरि लीन्हा। दीन जानि तेहि निज-पद दीन्हा ॥३॥

1.1120

तब रिषिनिज-नाथहि जिय चीन्ही। बिद्यानिधि कहँ बिद्या दीन्ही॥
जा तेँ लाग न छुघा पिपासा। अतुलित-बलतन तेज प्रकामा ॥४॥

1.1121

आयुध सर्ब समर्पि कै, प्रभु निज आस्त्रम आनि।
कन्द मूल फल भोजन, दोन्ह भगति हित जानि ॥२०९॥

1.1122

प्रात कहा मुनि सन रघुराई। निर्भय जज्ञ करहु तुम्ह जाई॥
होम करन लागे मुनि झारी। आपु रहे मख की रखवारी ॥१॥

1.1123

सुनि मारीच निसाचर काएही। लेइ सहाय धावा मुनि-द्रोही॥
बिनु फर वान राम तेहि मारा। सत जोजन गा सागर पारा ॥२॥

1.1124

पावक-सर सुबाहु पुनि जारा। अनुज निसाचर कटक सँघारा॥
मारि असुर द्विज-निर्भय-कारी। अस्तुति काहिँ देव-मुनि-झारी ॥३॥

1.1125

तहँ पुनि कछुक दिवस रघुराया। रहे कोन्हि बिप्रन्ह पर दाया॥
भगति हेतु बहु कथा पुराना। कहे बिप्र जद्यपि प्रभु जाना ॥४॥

1.1126

तब मुनि सादर कहा बुझाई । चरित एक प्रभु देखिय जाई॥
धनुष-जज्ञ सुनि रघुकुल नाथा । हरषि चले मुनिबर के साथा ॥५॥

1.1127

आस्त्रम एक दीख मग माहीँ। खग मृग जीव जन्तु तहँ नाहीँ॥
पूछा मुनिहि सिला प्रभु देखी। सकल कथा रिषि कही बिसेखी ॥६॥

1.1128

गौतम-नारि साप बस, उपल देह धरि धीर।
चरन-कमल-रज चाहति, कृपा करहु रघुबीर ॥२१०॥

1.1129

परसत पद-पावन, सोक नसावन, प्रगट भई तप,-पुज्ज सही।
देखत रघुनायक, जन-सुख-दायक, सनमुख होइ कर,-जाएरि रही॥
अति प्रेम अधीरा, पुलक-सरीरा, मुख नहिँ आवै, बचन कही।
अतिसय बडभागी, चरनन्हि लागी, जुगल नयन जल,-धार बही ॥२॥

1.1130

धीरज मन कीन्हा, प्रभु कहँ चीन्हा, रघुपति कृपा भगति पाई।
अति निर्मल बानी, अस्तुति ठानी, ज्ञान-गम्य जय, रघुराई॥
मैं नारि अपावन, प्रभु जग-पावन, रावन-रिपु जन,-सुखदाई।
राजीव-बिलोचन, भव-भय-मोचन, पाहि पाहि सरनहिँ आई ॥३॥

1.1131

मुनि साप जो दीन्हा, अति भल कीन्हा, परम अनुग्रह, मैँ माना।
देखेउँ भरि लोचन, हरि भव-मोचन, इहै लाभ सङ्कर जाना॥
बिनती प्रभु माएरी, मैं मति भारी, नाथ न बर माँगौँ आना।
पद-कमल-परागा, रस अनुरागा, मम मन मधुप करै पाना ॥४॥

1.1132

जेहि पद सुरसरिता, परम पुनीता, प्रगट भई सिव,-सीस धरी।
ई पद-पङ्कज, जेहि पूजत अज, मस सिर धरेउ कृपाल हरी॥
एहि भाँति सिधारी, गौतम नारी, बार बार हरि, चरन परी।
जो अति मन भावा, सो बर पावा, गह पतिलोक अनन्द भरी ॥५॥

1.1133

अस प्रभु दीनबन्धु हरि, कारन रहित दयाल।
तुलसिदास सठ ताहि मजु, छाडि कपट जज्जाल ॥२११॥

1.1134

चले राम लछिमन मुनि सङ्गा। गये जहाँ जग-पावनि गङ्गा॥
गाधि-सूनु सब कथा सुनाई। जेहि प्रकार सुरसरि महि आई ॥१॥

1.1135

तब प्रभु रिषिन्ह समेत नहाये। बिबिध दान महिदेवन्ह पाये।
हरषि चले मुनि-वृन्द-सहाया। बेगि विदेह-नगर नियराया ॥२॥

1.1136

पुर रस्यता राम जब देखी। हरषे अनुज समेत बिसेखी॥
बापो कूप सरित सर नाना। सलिल सुधा-सम मनि-सोपाना ॥३॥

1.1137

गुज्जत मज्जु मत्त-रस भृङ्गा। कूजत कल बहु बरन बिहङ्गा॥
बरन बरन विकसे बनजाता। त्रिविधि समीर सदा सुख-दाता ॥४॥

1.1138

सुमन बाटिका बाग बन, बिपुल विहङ्ग निवास।
फूलत फलत सुपल्लवत, सेहत पुर चहुँ पास ॥२१२॥

1.1139

बनै न बरनत नगर निकाई। जहाँ जाइ मन तहैँ लोभाई॥
चारु बजार बिचित्र अँवारी। मनिमय जनु बिधि स्वकर सेवारी ॥१॥

1.1140

धनिक-बनिक बर धनद समाना। बैठे सकल बस्तु लेइ नाना॥
हट सुन्दर गली सुहाई। सन्तत रहहिँ सुगन्ध सिँचाई ॥२॥

1.1141

मङ्गल-मय मन्दिर सब केरे। चित्रित जनु रतिनाथ चितेरे॥
पुर नर-नारि सुमग सुचि सन्ता। घरमसील ज्ञानी गुनवन्ता ॥३॥

1.1142

अति अनूप जहँ जनक-निवासू। विथ कहिँ शिबुध बिलोकि बिलासू॥
होत चकित चित कोट बिलोकी। सकल भुवन सोभा जनु रोकी ॥४॥

1.1143

धवल-धाम मनि-पुरट-पट, सुघटित नाना भाँति।
सिय-निवास सुन्दर-सदन, सोभा किमि कहि जाति ॥२१३॥

1.1144

चो॰—सुभग द्वार सब कुलिस कपाठा। भूप भीर नट मागध भाटा॥
बनी बिसाल बाजि-गज-साला। हय-गय-रथ सड्कुल सब काला ॥१॥

1.1145

सूर सचिव सेनप बहुतेरे। नृप गृह सरिस सदन सब केरे॥
पुर बाहिर सर सरित समीपा। उतरे जहँ तहँ बिपुर महीपा ॥२॥

1.1146

देखि अनूप एक अँबराई। सव सुपास सब भाँति सुहाई॥
कौसिक कहेउ माएर मन माना। इहाँ रहिय रघुबीर सुजाना ॥३॥

1.1147

भलेहि नाथ कहि कृपा निकेता। उत्तरे तहँ मुनि-वृन्द समेता॥
बिस्वामित्र महामुनि आये। समाचार मिथिलापति पाये ॥४॥

1.1148

सङ्ग सचिव सुचि भूरि भट, भूसुर बर गुरु ज्ञाति।
चले मिलन सुनिनायकहि, सुदित राउ एहि भाँति ॥२१४॥

1.1149

कीन्ह प्रनाम चरन धरि माथा। दीन्हि असीस मुदित मुनिनाथा॥
बिप्र-वृन्द सब सादर बन्दे। जानि भाग्य बड राउ अनन्दे ॥१॥

1.1150

कुसल प्रस्न कहि बारहिँ बारा। विस्वामित्र नृपहि बैठारा॥
तेहि अवसर आये दोउ भाई। गये रहे देखन फुलवाई ॥२॥

1.1151

स्याम गौर मृदु बयस किसाएरा। लोचन सुखद बिस्व-चित चाएरा।
उठे सकल जब रघुपति आये। विस्वामित्र निकट बैठाये ॥३॥

1.1152

भये सब सुखी देखि दोउ भ्राता। बारि बिलोचन पुलकित गाता॥
मूरति मधुर भनोहर देखी। भयौ विदेह बिदेह बिसेखी ॥४॥

1.1153

प्रेम मगन मन जानि नृप, करि बिबेक धरि धीर।
बोलेउ मुनि-पद नाइ सिर, गदगद गिरा गँभीर ॥२१॥

1.1154

ची॰—कहहुनाथसुन्दरदोउबालक। मुनिकुल-तिलक कि नृपकुल-पालक॥
ब्रह्म जो निगम नेति कहि गावा। उमय बेष धरि की सेआइ आवा ॥१॥

1.1155

सहज बिराग-रूप मन माएरा। थकित होत जिमि चन्द चकोरा॥
ता तेँ प्रभु पूछौँ सतिभाऊ। कहहु नाथ जनि करहु दुराऊ ॥२॥

1.1156

इन्हहिँ बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्म-सुखहि मन त्यागा॥
कह मुनि बिहँसि कहेहु नप नीका। बचन तुम्हार न होइ अलीका ॥३॥

1.1157

ये प्रिय सबहि जहाँ लगि प्रानी। मन मुसुकाहिँ राम सुनि बानी॥
रघुकुल-मनि दसरथ के जाये। मम हित लागि नरेस पठाये ॥४॥

1.1158

राम लखन दोउ बन्धु बर, रूप-सील-बल धाम।
मख राखेउ सब साखि जग, जिते असुर सङ्ग्राम ॥२१६॥

1.1159

मुनि तव चरन देखि कह राऊ। कहि न सकौँ निज पुन्य प्रभाऊ॥
सुन्दर स्याम गौर दोउ भ्राता। आनँदहू के आनँद दाता ॥१॥

1.1160

इन्ह कै प्रीति परसपर पावनि। कहि न जाइ मन भाव सुहावनि॥
सुनहु नाथ कह मुदित बिदेहू। ब्रह्म-जीव इव सहज सनेहू ॥२॥

1.1161

पुनि पुनि प्रभुहि चितव नरनाहू। पुलक गात उर अधिक उछाहू॥
मुनिहि प्रसंसि नाइ पद सीसू। चलेउ लिवाइ नगर अवनीसू ॥३॥

1.1162

सुन्दर सदन सुखद् सब काला। तहाँ बास लेइ दीन्ह भुआला॥
करि पूजा सब बिधि सेवकाई। गयौ राउ गृह विदा कराई ॥४॥

1.1163

रिषय सङ्घ रघुबंस-मनि, करि भोजन विस्त्राम।
बैठे प्रभु भ्राता सहित, दिवस रहा भरि जाम ॥२१७॥

1.1164

लखन हृदय लालसा बिसेखी। जाइ जनकपुर आइय देखी॥
प्रभु भय बहुरि मुनिहि सकुचाहीँ। प्रगट न कहहिँ मनहिँ मुसुकाहीँ ॥१॥

1.1165

राम अनुज मन की गति जानी। भगतबछलता हिय हुलसानी॥
परम बिनीत सकुचि मुसुकाई। बोले गुरु अनुसासन पाई ॥२॥

1.1166

नाथ लखन पुर देखन चहहीँ। प्रभु सकोच डर प्रकट न कहहीँ॥
जौँ राउर आयसु मैँ पावौँ। नगर देखाइ तुरत लेइ आवौँ ॥३॥

1.1167

सुनि मुनीस कह बचन सप्रीती। कस न राम तुम्ह राखहु नीती॥
धरम-सेतु-पालक तुम्ह ताता। प्रेम-बिबस सेवक-सुख-दाता ॥४॥

1.1168

जाइ देखि आवहु नगर, सुख-निधान दोउ भाइ।
करहु सुफल सब के नयन, सुन्दर बदन देखाइ ॥२१८॥

1.1169

मुनि-पद-कमल बन्दि दोउ भ्राता। चले लोक-लोचन सुख-दाता॥
बालक-वृन्द देखि अति सोभा। लगे सङ्ग लोचन मन लोभा ॥१॥

1.1170

पीत-बसन परिकर कटि माथा। चारु चाप सर सेआहत हाथा॥
तन अनुहरत सुचन्दन खोरी। स्यामल गौर मनोहर जोरी ॥२॥

1.1171

कैहरि-कन्धर बाहु बिसाला। उर अति रुचिर नाग-मनि-माला॥
सुभग सान सरसोरुह लोचन। बदन-मयङ्क ताप त्रय मोचन ॥३॥

1.1172

कानन्हि कनक-फूल छबि देहीँ। चितवत चितहि चोरि जनु लेहीँ॥
चितवनि चारु भृकुटि बर बाँकी। तिलक रेख सोभा जनु चाकी ॥४॥

1.1173

रुचिर चौतनी सुभग सिर, मेचक कुञ्चित केस।
नख-सिख सुन्दर बन्धु दोउ, सोभा सकल सुदेस ॥२१९॥

1.1174

देखन नगर भूप-सुत आये। समाचार पुरबासिन्ह पाये॥
धाये घाम काम सब त्यागी। मनहुँ रङ्क निधि लूटन लागी ॥१॥

1.1175

निरखि सहज सुन्दर दोउ भाई। होहिँ सुखी लोचन फल पाई॥
जुबती भवन झरोखन्हि लागीँ। निरखहिँ राम रूप अनुरागीँ ॥२॥

1.1176

कहहिँ परसपर बचन सप्रीती। सखि इन्ह कोटि काम छबि जीती॥
सुर नर असुर नाग मुनि माहीँ। सोमा असि कहुँ सुनियति नाहीँ ॥३॥

1.1177

बिष्नु चारि भुज बिधि मुख चारी। बिकट-बेष मुख-पञ्च पुरारी॥
अपर देव अस कोउ न आही। यह छबि सखी पटतरिय जाही ॥४॥

1.1178

बय किसोर सुखमा-सदन, स्याम गौर सुख-धाम।
अङ्ग अङ्ग पर वारियहि, कोटि कोटि सत काम ॥२२०॥

1.1179

कहहु सखी अस को तनुधारी। जो न मोह यह रूप निहारी॥
कोउ सप्रेम बोली मृदु बानी। जो मैँ सुना सा सुनहु सयानी ॥१॥

1.1180

ये दोऊ दसरथ के ढाएटा। बाल-मरालन्ह के कल जोटा।
मुनि-कौसिक-मख के रखवारे। जिन्ह रन-अजिर निसाचर मारे ॥२॥

1.1181

स्याम-गात कल-कञ्ज-बिलोचन। जो मारीच-सुभुज-मद मोचन॥
कौसल्या-सुत सो सुख-खानी। नाम राम धनु-सायक-पानी ॥३॥

1.1182

गौर किसोर बेष बर काछे। कर-सर-चाप राम के पाछे।
लछिमन नाम राम लघु भ्राता। सुनु सखि तासु सुमित्रा माता ॥४॥

1.1183

बिप्र काज करि बन्धु दोउ, मग मुनि-बधू उधारि।
आये देखन चाप-मख, सुनि हरषीँ सब नारि ॥२२१॥

1.1184

देखि राम छबि कोउ एक कहई। जोग जानकिहि यह बर अहई।
जौँ सखि इन्हहिँ देख नरनाहू। पन परिहरि हठि करै बिबाहू ॥१॥

1.1185

कोउ कह ये भूपति पहिचाने। मुनि समेत सादर सनमाने॥
सखि परन्तु पन राउ न तजई। बिधि-बस हठि अबिबेकहि भजई ॥२॥

1.1186

कोउ कह जाँ भल अहै बिधाता। सब कहँ सुनिय उचित फलदाता॥
तौ जानकिहि मिलिहि बर एहू। नाहिँन आलि इहाँ सन्देहू ॥३॥

1.1187

जौँ बिधि-बस अस बनै सँजोगू। तौ कृतकृत्य होहिँ सब लोगू॥
सखि हमरे आरति अति ताते। कबहुँक ये आवहिँ एहि नाते ॥४॥

1.1188

नाहिँ त हम कहँ सुनहु सखि, इन्ह कर दरसन दूरि।
यह सङ्घट तब होइ जब, पुन्य पुराकृत भूरि ॥२२२॥

1.1189

बोली अपर कहेहु सखि नीका। एहि बिबाह अति हित सबही का॥
कोउ कह सङ्कर चाप कठोरा। ये स्यामल मृदुगात किसोरा ॥१॥

1.1190

सब असमञ्जस अहै सयानी। यह सुनि अपर कहै मृदु बानी॥
सखि इन्हकहँ कोउ कोउ अस कहहीँ। बड प्रमाउ देखत लघु अहहीँ॥२॥

1.1191

परसि जासु पद-पङ्कज धूरी। तरी अहिल्या कृत-अघ-भूरी॥
से कि रहिहि बिनु सिव-धनु ताएरे। यह प्रतीति परिहरिय न भोरे ॥३॥

1.1192

जेहि बिरज्चि रचि सीय सँवारी। तेहि स्यामल बर रचेउ बिचारी॥
तासुबचन सुनि सब हरषानी। ऐसै होउ कहहिँ मृदु बानी ॥४॥

1.1193

हिय हरषहिँ बरषहिँ सुमन, सुमुखि सुलोचनि-वृन्द।
जाहिँ जहाँ जहँ बन्धु दाउ, तहँ तहँ परमानन्द ॥२२३॥

1.1194

पुर पूरब-दिसि गे दोउ भाई। जहँ धनु-मख हित भूमि बनाई॥
अति विस्तार चारु गच ढारी। बिमल-बेदिका सचिर सँवारी ॥१॥

1.1195

चहुँ दिसि कञ्चन मञ्च बिसाला। रचे जहाँ बैठहिँ महिपाला॥
तेहि पाछे समीप चहुँ पासा। अपर मञ्च मंडली बिलासा ॥२॥

1.1196

कछुक ऊँचि सब भाँति सुहाई। बैठहिँ नगर लोग जहँ जाई॥
तिन्ह के निकट बिसाल सुहाये। धवल धाम बहु बरन बनाये ॥३॥

1.1197

जहँ बैठे देखहिँ सब नारी। जथाजोग निज-कुल अनुहारी॥
पुर-बालक कहि कहि मृदु बचना। सादर प्रभुहि देखावहिँ रचना ॥४॥

1.1198

सब सिसु एहि मिस प्रेम-बस, परसि मनोहर गात।
तन पुलकहिँ अति हरष हिय, देखि देखि दोउ भ्रात ॥२२४॥

1.1199

सिसु सब राम प्रेम बस जाने। प्रीति समेत निकेत बखोने॥
निज निज रुचि सब लेहिँ बोलाई। सहित सनेह जाहिँ दोउ भाई ॥१॥

1.1200

राम देखावहिँ अनुजहि रचना। कहि मृदु मधुर मनोहर बचना॥
लव निमेष महँ भुवन-निकाया। रचै जासु अनुसासन माया ॥२॥

1.1201

भगति हेतु सोइ दीनदयाला। चितवत चकित धनुष-मख-साला॥
कौतुक देखि चले गुरु पाहीँ। जानि बिलम्ब त्रास मन माहीँ ॥३॥

1.1202

जासु त्रास डर कहँ डर हाएई। भजन प्रभाव देखावत साएई॥
कहि बातैँ मृदु मधुर सुहाई। किये बिदा बालक बरिआई ॥४॥

1.1203

समय सप्रेम बिनीत अति, सकुच सहित दोउ भाइ।
गुरु-पद-पङ्कज नाइ सिर, बैठे आयसु पाइ ॥२२५॥

1.1204

निसि प्रबेस मुनि आयसु दीन्हा। सबही सन्ध्या-बदन कीन्हा॥
कहत कथा इतिहास पुरानी। रुचिर रजनि जुग जाम सिरानी ॥१॥

1.1205

मुनिबर सयन कीन्ह तब जाई। लगे चरन चाँपन दोउ भाई॥
जिन्ह के चरन-सरोरुह लागी। करत बिबीध जप जोग बिरागी ॥२॥

1.1206

ते दोउ बन्धु प्रेम जनु जीते। गुरु-पद-पदुम पलोटत प्रीते॥
बार बार मुनि आज्ञा दीन्ही। रघुबर जाइ सयन तब कीन्ही ॥३॥

1.1207

चाँपत चरन लखन उर लाये। समय सप्रेम परम सचु पाये॥
पुनि पुनि प्रभु कह सावहु ताता। पौढे धरि उर पद-जल जाता ॥४॥

1.1208

उठे लखन निसि बिगत सुनि, अरुनसिखा धुनि कान।
गुरु तेँ पहिलेहि जगतपति, जागे राम सुजान ॥२२६॥

1.1209

सकल सौच करि जाइ नहाये। नित्य निबाहि मुनिहि सिर नाये॥
समय जानि गुरु आयसु पाई। लेन प्रसून चले दोउ भाई ॥१॥

1.1210

भूप बाग बर देखेउ जाई। जहँ बसन्त-रितु रही लाएभाई॥
लागे बिटप मनोहर नाना। बरन बरन बर बेलि बिताना ॥२॥

1.1211

नव-पल्लव फल सुमन सुहाये। निज-सम्पत्ति सुर-रूख लजाये॥
चातक कोकिल कीर चकोरा। कूजत बिहँग नटत कल मोरा ॥३॥

1.1212

मध्य बाग सर साह सुहावा। मनि-सोपान बिचित्र बनावा॥
बिमल सलिल सरसिज बहु रङ्गा। जल-खग-कूजत गुञ्जत भृङ्गा ॥४॥

1.1213

बाग तडाग विलोकि प्रक्षु, हरषे बन्धु समेत।
परम-रस्य आराम यह, जो रामहिँ सुख देत ॥२२७॥

1.1214

चहुँ दिसि चित्तै पूछि माली गन। लगे लेन दल फूल मुदित मन॥
तेहि अवसर सीता तहँ आई। गिरिजा पूजन जननि पठाई ॥१॥

1.1215

सङ्ग सखी सब सुभग सयानी। गावहिँ गीत मनोहर बानी॥
सर समीप गिरिजा गृह साएहा। बरनि न जाइ देखि मन मोहा ॥२॥

1.1216

मज्जन करि सर सखिन्ह समेता। गई मुदित मन गौरि निकेता॥
पूजा कीन्हि अधिक अनुरागा। निज-अनुरूप सुभग बर माँगा ॥३॥

1.1217

एक सखी सिय सङ्ग बिहाई। गई रही देखन फुलवाई॥
तेहि दोउ बन्धु बिलोके जाई। प्रेम-बिबस सीता पहिँ आई ॥४॥

1.1218

तासु दसा देखी सखिन्ह, पुलक-गात जल-नैन।
कहु कारन निज हरष कर, पूछहिँ सब मृदु बैन ॥२२८॥

1.1219

देखन बाग कुँअर दुइ आये। बय-किसोर सब भाँति सुहाये॥
स्याम गौर किमि कहौँ बखानी। गिरा अनयन नयन बिनु बानी ॥१॥

1.1220

सुनि हरषीँ सब सखी सयानी। सिय हिय अति उतकंठा जानी॥
एक कहै नृप सुत तेइ आली। सुने जे मुनि सँग आये काली ॥२॥

1.1221

जिन्ह निज रूप मोहनी डारी। कान्हे स्वबस नगर-नर-नारी॥
बरनत छवि जहँ तहँ सब लोगू। अवसि देखियहि देखन जोगू ॥३॥

1.1222

तासु अचन अति सियहि सुहाने। दरस लागि लोचन अकुलाने॥
चलीँ अग्र करि प्रिय सखि साएई। प्रीति पुरातन लखै न कोई ॥४॥

1.1223

सुमिरि सीय नारद बचन, उपजी प्राति पुनीत।
चकित बिलोकति सकल दिसि, जनु सिसु मृगी सभीत ॥२२९॥

1.1224

कङ्कन किङ्किनि नूपुर धुनि सुनि। कहत लखन सन राम हृदय गुनि॥
मानहुँ मदन दुन्दुभी दीन्ही। मनसा बिस्व बिजय कह कीन्ही ॥१॥

1.1225

अस कहि फिरि चितये तेहि ओरा। सिय मुख ससि भये नयन चकोरा।
भये बिलोचन चारु अचञ्चल। मनहुँ सकुचि निमि तजे दूगञ्चल ॥२॥

1.1226

देखि सीय सोभा सुख पावा। हृदय सराहत बचन न आवा॥
जनु बिरज्चि सब निज निपुनाई। बिरचि बिस्व कह प्रगटि देखाई ॥३॥

1.1227

सुन्दरता कहँ सुन्दर करई। छबि-गृह दीप-सिखा जनु बरई॥
सब उपमा कबि रहे जुठारी। केहि पटुतरौँ विदेह-कुमारी ॥४॥

1.1228

सिय सोभा हिय बरनि प्रभु, आपनि दसा बिचारि।
बोले सुचि-मन अनुज सन, बचन समय अनुहारि ॥२३०॥

1.1229

तात जनक तनया यह साएई। धनुष-यज्ञ जेहि कापुन हाएई॥
पूजन गौरि सखी लेइ आई। करत प्रकास फिरै फुलवाई ॥१॥

1.1230

जासु बिलोकि अलौकिक सोभा। सहज पुनीत माएर मन छोमा॥
सब कारन जान बिधाता। फरकहिँ सुभग अङ्ग सुनु भ्राता ॥२॥

1.1231

रघुवंसिन्ह कर सहज सुभाऊ। भन कुपन्थ पग घरैँ न कऊ॥
मोहि अतिसय प्रतीति मन केरी। जेहि सपनेहुँ पर-नारि न हेरी ॥३॥

1.1232

जिन्ह कै लहहिँ न रिपु रन पीठी। नहिँ पावहिँ परतिय मन दीठी॥
मङ्गन लहहिँ न जिन्ह के नाहीँ। ते नर बर थोरे जग माहीँ ॥४॥

1.1233

करत बतकही अनुज सन, मन सिय रूप लोभान।
मुख-सरोज मकरन्द-छबि, करै मधुप इव पान ॥२३१॥

1.1234

चितवति चकित चहूँदिसि सीता। कहँ गये नृप-किसोर मन चिन्ता॥
जहँ बिलोक मृग-सावक-नैनी। जनुतहँबरिस कमल-सित-स्रेनी ॥१॥

1.1235

लता ओट तब सखिन्ह लखाये। स्यामल गौर किसोर सुहाये॥
देखि रूप लोचन ललचाने। हरषे जनु निज निधि पहिचाने ॥२॥

1.1236

थके नयन रघुपति छबि देखे। पलकन्हिहूँ परिहरी निमेखे॥
अधिक सनेह देह भै भाएरी। सरद-ससिहि जनु चितव चकोरी ॥३॥

1.1237

लोचन मग रामहिँ उर आनी। दीन्हे पलक कपाट सयानी॥
जबसिय सखिन्ह प्रेम-बस जानी। कहि न सकहिँ कछु मन सकुचानी ॥४॥

1.1238

लता-भवन से प्रगट भे, तेहि अवसर दोउ भाइ।
निकसे जनु जुग बिमल बिधु, जलद-पटल बिलगाइ ॥२३२॥

1.1239

सोभा सीँव सुभग दोउ बीरा। नील-पीत-जलजात सरीरा॥
माएर-पंख सिर सोहत नीके। गुच्छ बीच बिच कुसुम-कली के ॥१॥

1.1240

भाल तिलक स्त्रम-बिन्दु सुहाये। स्त्रवन सुभग भूषन छबि छाये॥
बिकट भृकुटि कच घूघुरबारे। नव-सरोज लोचन रतनारे ॥२॥

1.1241

चारु चिबुक नासिका कपोला। हास बिलास लेत मन मोला॥
मुख-छबि कहि न जाइ माएहि पाहीँ। जो बिलोकि बहु काम लजाहीँ ॥३॥

1.1242

उर-मनि-माल कम्बु कल ग्रीवाँ। काम-कलम-कर भुज बल सीवाँ॥
सुमन समेत बाम कर दोना। साँवर कुँवर सखी सुठि लाएना ॥४॥

1.1243

केहरि-कटि पट-पीत-धर, सुखमा-सीलनिधान।
देखि भानुकुलभूषनहिँ, बिसरा सखिन्ह अपान ॥२३३॥

1.1244

धरि धीरज,एक आलि सयानी। सीता सन बाली गहि पानी॥
बहुरि गौरि कर ध्यान धरेहू। भूप-किसोर देखि किन लेहू ॥१॥

1.1245

सकुचि सीय तब नयन उधारे। सनमुख दोउ रघु सिंह निहारे॥
नख-सिख देखि राम कै सामा। सुमिरि पिता पन मन अति छाएभा ॥२॥

1.1246

परबस सखिन्ह लखी जब सीता। मयौ गहरु सब कहहिँ सभीता॥
पुनि आउब एहि बिरियाँ काली। अस कहि मन बिहँसी एक आली॥३॥

1.1247

गूढगिरा सुनि सिय सकुचानी। मयौ बिलम्ब मातु भय मानी॥
धरि बड धीर राम उर आनी। फिरी अपनपौ पितु बस जानी ॥४॥

1.1248

देखन मिस मृग बिहँग तरु, फिरै बहोरि बहाएरि।
निरखि निरखि रघुबीर छबि, बाढै प्रीति न थोरि ॥२३४॥

1.1249

जानि,कठिन सिव चाप बिसूरति। चली राखि उर स्यामल मूरति॥
प्रभु जब जात जानकी जानी। सुख-सनेह सोभा-गुन खानी ॥१॥

1.1250

परमप्रेममय मृदु मसि कीन्ही। चारु चित्र भीतर लिखि लीन्ही॥
गई भवानी भवन बहोरी। बन्दि चरन बोली कर जोरी ॥२॥

1.1251

जय जय गिरि-बर-राज किसोरी। जय महेस-मुख-चन्द चकोरी॥
जय गज-बदन षडानन-माता। जगत-जननि-दामिनि-दुति गाता ॥३॥

1.1252

नहिँ तव आदि मध्य अवसाना। अमित प्रभाव बेद नहिँ जाना॥
भव-भव-विभव-पराभव कारिनि। बिस्व-बिमोहनि स्वबस-बिहारिनि ॥४॥

1.1253

पतिदेवता सुतीय महँ, मातु प्रथम तव रेख।
महिमा अमित न सकहिँ कहि, सहस सारदा सेख ॥२३५॥

1.1254

सेवत ताएहि सुलभ फल चारी। बर-दायिनि त्रिपुरारि पियारी॥
देबि पूजि पद-कमल तुम्हारे। सुरनर मुनिसब होहिँ सुखारे ॥१॥

1.1255

मोर मनोरथ जानहु नीके। बसहु सदा उर-पुर सबही के॥
कीन्हेउँ प्रगट ऽन कारन तेही। अस कहि चरन गहे बैदेही ॥२॥

1.1256

बिनय प्रेम-बस भई भवानी। खसी माल मूरति मुसुकानी॥
सादर सिय प्रसाद सिर धरेऊ। बाएली गौरि हरष हिय भरेऊ ॥३॥

1.1257

सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन-कामना तुम्हारी॥
नारद बचन सदा सुचि साँचा। सो बर मिलिहि जाहि मन राँची॥४॥

1.1258

मन जाहि राचेउ मिलिहि सो बर- सहज सुन्दर साँवरो।
करुनानिधान सुजान सील सनेह जानत रावरो॥
एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय, सहित हिय हरषित अली।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि, मुदित मन मन्दिर चली ॥१८॥

1.1259

जानि गौरि अनुकूल, सिय-हिय-हरष न जाइ कहि।
मज्जुल-मङ्गल-मूल, बाम अङ्ग फरकन लगे ॥२३६॥

1.1260

हृदय सराहत सीय लोनाई। गुरु समीप गवने दोउ भाई॥
राम कहा सब कौसिक पाहीँ। सरल सुभाउ छुआ छल नाहीँ ॥१॥

1.1261

सुमन पाइ मुनि पूजा कीन्ही। पुनि असीस दुहुँ भाइन्ह दीन्हीँ॥
सुफल मनोरथ होहु तुम्हारे। राम लखन सुनि भये सुखारे ॥२॥

1.1262

करि भाजन मुनिबर बिज्ञानी। लगे कहन कछु कथा पुरानी॥
बिगत-दिवस गुरु आयसु पाई। सन्ध्या करन चले दोउ भाई ॥३॥

1.1263

प्राची दिसि ससि उयेउ सुहावा। सिय-मुख सरिस देखि सुख पावा॥
बहुरि बिचार कीन्ह मन माहीँ। सीय बदन सम हिमकर नाहीँ ॥४॥

1.1264

जनम-सिन्धु पुनि बन्धु-बिष, दिन-मलीन सकलङ्क।
सिय-मुख समता पाव किमि, चन्द्र बापुरो रङ्क ॥२३७॥

1.1265

घटै बढै बिरहिनि दुखदाई। ग्रसै राहु निज सन्धिहि पाई।
कोक सोक-प्रद पङ्कज-द्रोही। अवगुन बहुत चन्द्रमा तोही ॥१॥

1.1266

बैदेही-मुख पदतर दीन्हे। होइ दोष बड अनुचित कीन्हे॥
सिय-मुख-छबि बिधु ब्याज बखानी। गुरु पहिँ चले निसा बडि जानी ॥२॥

1.1267

करि मुनि-चरन-सरोज प्रनामा। आयसु पाइ कीन्ह बिस्त्रामा॥
बिगत निसा रघुनायक जागे। बन्धु बिलोकि कहन अस लागे ॥३॥

1.1268

उयेउ अरुन अवलोकहु ताता। पङ्कज-कोक-लोक सुखदाता॥
बोले लखन जोरि जुग पानी। प्रभु-प्रभाव-सूचक मृदु बानी ॥४॥

1.1269

अरुनोदय सकुचे कुमुद, उडुगन जोति भलीन।
तिमि तुम्हार आगमन सुनि, भये नृपति बल हीन ॥२३८॥

1.1270

नृप सब नखत करहिँ उँजियारी। दारिन सकहिँ चाप तम भारी॥
कमल-कोक-मधुकर-खग नाना। हरषे सकल निसा अवसाना ॥१॥

1.1271

ऐसेहि प्रभु सब भगत तुम्हारे। हाएइहहिँ टूटे धनुष सुखारे॥
उयेउ भानु बिनु स्त्रम तम नासा। दुरे नखत जग तेज प्रकासा ॥२॥

1.1272

रबि निज उदय ब्याज रघुराया। प्रभु प्रताप सब नृपन्ह देखाया॥
तव-भुज-बल-महिमा उदघाटी। प्रगटी धनु विघटन परिपाटी ॥३॥

1.1273

बन्धु बचन सुनि प्रभु मुसुकाने। होइ सुचि सहज पुनीत नहाने॥
नित्यक्रिया करि गुरु पहिँ आये। चरन-सरोज सुभग सिर नाये ॥४॥

1.1274

सतानन्द तब जनक बोलाये। कैआसिक मुनि पहिँ तुरत पठाये॥
जनक बिनय तिन्ह आइ सुनाई। हरषे बालि लिये दोउ भाई ॥५॥

1.1275

सतानन्द पद बन्दि प्रभु, बैठे गुरु पहिँ जाइ॥
चलहु तात मुनि कहेउ तब, पठयौ जनक बेलाइ ॥२३९॥

1.1276

सीय-स्वयम्बर देखिय जाई। ईस काहि धौँ देह बडाई॥
लखन कहा जस भाजन सोई। नाथ-कृपा-तव जा पर हाई ॥१॥

1.1277

हरषे मुनि सब सुनि बर बानी। दीन्ह असीस सबहि सुख मानी॥
पुनि मुनि-बन्द समेत कृपाला। देखन चले धनुष-मख-साला ॥२॥

1.1278

रङ्गभूमि आये दोउ भाई। असि सुधि सब पुरबासिन्ह पाई॥
चले सकल गृह-काज बिसारी। बाल जुवान जरठ नर नारी ॥३॥

1.1279

देखी जनक भीर भै भारी। सुचि सेवक सब लिये हँकारी ॥
तुरत सकल लोगन्ह पहिँ जाहू। आसन उचित देहु सब काहू ॥४॥

1.1280

कहि मृदु बचन बिनीत तिन्ह, बैठारे नर नारि।
उत्तम मध्यम नीच लघु, निज निज थल अनुहारि ॥२४०॥

1.1281

राजकुँअर तेहि अवसर आये। मनहुँ मनोहरता तन छाये॥
गुन-सागर नागर बर बीरा। सुन्दर स्यामल गौर सरीरा ॥१॥

1.1282

राज-समाज विराजत रुरे। उडुगन महँ जनु जुग विधु पूरे॥
जिन्ह कै रही भावना जैसी। प्रभु मूरति देखी तिन्ह तैसी ॥२॥

1.1283

देखहिँ भूप महा-रन-धीरा। मनहुँ वीररस धरे सरीरा॥
डरे कुटिल नृप प्रभुहि निहारी। मनहुँ भयानक मूरति भारी ॥३॥

1.1284

रहे असुर छल छोनिप बेखा। तिन्ह प्रभु प्रगट काल सम देखा॥
पुरबासिन्ह देखे दोउ भाई। नर-भूषन लोचन सुखदाई ॥१॥

1.1285

नारि बिलोकहिँ हरषि हिय, निज निज रुचि अनुरूप।
जनु सेहत सृङ्गार धरि, भूरति परम अनूप ॥२४१॥

1.1286

बिदुषन्ह प्रभु बिराट मय दीसा। बहु मुख-कर-पग-लोचन-सीसा॥
जनक जाति अवलोकहिँ कैसे। सजन सगे प्रिय लागहिँ जैसे ॥१॥

1.1287

सहित बिदेह बिलोकहिँ रानी। सिसु सम प्रीति न जाइ बखानी॥
जोगिन्ह परम-तत्व-मय मासा। सान्त-सुद्ध-सम सहज प्रकासा ॥२॥

1.1288

हरिभगतन्ह देखे दोउ भ्राता। इष्टदेव इव सब सुख-दाता॥
रामहिँ चितव भाव जेहि सीया। सो सनेह सुख नहिँ कथनीया ॥३॥

1.1289

उर अनुभवति न कहि सक सोऊ। कवन प्रकार कहै कबि कोऊ॥
जेहि बिधि रहा जाहि जस भाऊ। तेहि तस देखेउ कोसलराऊ ॥४॥

1.1290

राजत राज-समाज महँ, कोसलराज-किसोर।
सुन्दर स्यामल गौर तनु, बिस्व-बिलोचन चाएर ॥२४२॥

1.1291

सहज मनेआहर मूरति दोऊ। कोटि-काम उपमा लघु सोऊ॥
सरद-चन्द-निन्दक मुख नीके। नीरज-नयन भावते जी के ॥१॥

1.1292

चितवनि चारु मार-मद-हरनी। भावति हृदय जाति नहिँ बरनी॥
कल-कपोल-स्त्रुति-कुंडल-लोला। चिवुक अधर सुन्दर मृदु बाएला ॥२॥

1.1293

कुमुदबन्धु-कर-निन्दक हासा। भृकुटी बिकट मनोहर नासा॥
भाल बिसाल तिलक झलकाहीँ। कच बिलोकि अलि अवलि लजाहीँ ॥३॥

1.1294

पीत चौतनी सिरन्ह सुहाई। कुसुम-कली बिच बीच बनाई॥
रेखा रुचिर कम्बु कल ग्रीवाँ। जनु त्रिभुवन सुखमा की सीवाँ ॥४॥

1.1295

कुञ्जरमनि-कंठा-कलित, उरन्हि तुलसिका-भाल।
वृषभ-कन्ध केहरि-ठवनि, बल-निधि बिसाल ॥२४३॥

1.1296

कटि तूनीर पीत-पट बाँधे। कर-सर धनुष-बाम-बर काँधे॥
पीत-जज्ञौपबीत सोहाये। नख-सिख मज्जु महाछबि छाये ॥१॥

1.1297

देखि लोग सब भये सुखारे। एकटक लोचन चलत न तारे॥
हरषे जनक देखि दोउ भाई। मुनि-पद-कमल गहे तब जाई ॥२॥

1.1298

करि बिनती निज कथा सुनाई। रङ्गअवनि सब मुनिहि देखाई॥
जहँ जहँ जाहि कुँवर बर दोऊ। तह तह चकित चितव सब कोज ॥३॥

1.1299

निज निज रुख रामहिँ सब देखा। कोउ न जान कछु चरित बिसेखा॥
मलि रचना मुनि नृप सन कहेऊ। राजा मुदित महा सुख लहेऊ ॥४॥

1.1300

सब मञ्चन्ह तेँ मच्च एक, सुन्दर बिसद बिसाल।
मुनि समेत दोउ बन्धु तह, बैठारे महिपाल ॥२४४॥

1.1301

प्रभुहि देखि सब नुप हिय हारे। जनु राकेस उदय भये तारे॥
अस प्रतीति सब के मन माहीँ। राम चाप ताएरब सक नाहीँ ॥१॥

1.1302

बिनु भब्जेहु अव-धनुष विसाला। मेलिहि सीय राम उर माला॥
अस बिचारि गवनहु घर भाई। जस प्रताप बल तेज गँवाई ॥२॥

1.1303

बिहँसे अपर भूप सुनि बानी। जे अबिबेक अन्ध अभिमानी॥
ताएरेहु धनुष ब्याह अवगाहा। बिनु ताएरे को कुँवरि बियाहा ॥३॥

1.1304

एक बार कालहु किन होऊ। सिय हित समर जितब हम सोऊ॥
यह सुनि अपर भूप मुसुकाने। धरमसील हरिभगत सयाने ॥४॥

1.1305

सीय बियाहब राम, गरब दूरि करि नृपन्ह को।
जीति को सक सङ्ग्राम, दसरथ के रन-बाँकुरे ॥२४५॥

1.1306

ची॰—वृथा मरहु जनि गाल बजाई। मन-मोदकन्हि कि भूख बताई॥
सिख हमारि सुनि परम पुनीता। जगदम्बा जानहु जिय सीता ॥१॥

1.1307

जगतपिता रघुपतिहि बिचारी। भरि लोचन छबि लेहु निहारी॥
सुन्दर सुखद सकल-गुन-रासो। ये दोउ बन्धु सम्भु-उर-बासी ॥२॥

1.1308

सुधा समुद्र समीप बिहाई। मृग-जल निरखि मरहु कत धाई॥
करहु जाइ जा कहँ जोइ भावा। हम तो आजु जनम-फल पावा ॥३॥

1.1309

अस कहि भले भूप अनुरागे। रूप अनूप बिलोकन लागे॥
देखहिँ सुर नभ चढे बिमाना। बरषहिँ सुमन करहिं कल गाना ॥४॥

1.1310

जानि सुअवसर सीय तब, पठई जनक बोलाइ।
चतुर सखी सुन्दर सफल, सादर चलीँ लेवाइ ॥२४६॥

1.1311

सिय साभा नहिँ जाइ बखानी। जगदम्बिका रूप-गुन-खानी॥
उपमा सकल मोहि लघु लागी। प्राकृत नारि अङ्ग अनुरागी ॥१॥

1.1312

सीय बरनि तेहि उपमा देई। कुकबि कहाइ अजस को लेई॥
जौँ पटतरिय तीय महँ सीया। जग असि जुबति कहाँ कमनीया ॥२॥

1.1313

गिरा-मुखर तनु-अरध-भवानी। रति अति दुखित अननु पति जानी॥
विष-बारुनी-बन्धु प्रिय जेहो। कहिय रमा सम किमि वैदेही ॥३॥

1.1314

जाऐँ छवि-सुधा-पयोनिधि होई। परम-रूप-मय कच्छप साई॥
भा-रजु मन्दर-सिङ्गारू। मथै पानि पङ्कज निज मारू ॥४॥

1.1315

एहि बिधि उपजै लच्छि जब, सुन्दरता सुख-मूल।
तदपि सकोच समेत कबि, कहहिँ सीय समतूल ॥२४७॥

1.1316

चली सङ्गलै सखो सयानी। गावत गीत मनोहर बानी।
साएह नवल-तनु सुन्दर सारी। जगत जननि अतुलित छबि भारी ॥१॥

1.1317

भूषन सकल सुदेस सुहाये। अङ्ग अङ्ग रचि सखिन्ह बनाये।
रङ्गभूमि जब सिय पग धारी। देखि रूप मेआहे नर नारी॥२॥

1.1318

हरषि सुरन्ह दुन्दुभी बजाई। बरषि प्रसून अपछरा गाई॥
पानि-सरोज साह जयमाला। अवचट चितये सकल भुआला॥३॥

1.1319

सीय चकित चित रामहि चाहा। भये मोह-बस सब नरनाहा॥
मुनि समीप देखे दोउ भाई। लगे ललकि लोचन निधि पाई॥४॥

1.1320

गुरुजन लाज समाज बड, देखि सीय सकुचानि॥
लगी बिलोकन सखिन्ह तन, रघुबीरहि उर आनि॥२४८॥

1.1321

राम रूप अरु सियछवि देखे। नर नारिन्ह परिहरी निमेखे॥
चहिँ सकल कहत सकुचाहीँ। बिधि सनविनय करहिमन माहीं॥१॥

1.1322

हरु बिधि बेगि जनक जडताई। मति हमारि असि देहि सुहाई॥
बिनु बिचार पन तजि नरनाहू। सीय राम कर करै बियाहू॥२॥

1.1323

जग मल कहिहि भाव सब काहू। हठ कीन्हे अन्तहु उर दाहू॥
एहि लालसा मगन सब लोगू। बर साँवरो जानकी जोगू॥३॥

1.1324

तब बन्दीजन जनक बोलाये। बिरदावली कहत चलि आये॥
कह नृप जाइ कहहु पन मोरा। चले भाट हिय हरष न थोरा॥४॥

1.1325

बोले बन्दी बचन बर, सुनहु सकल महिपाल।
पन बिदेह कर कहहिँ हम, भुजा उठाइ बिसाल॥२४९॥

1.1326

नृप-भुजबल-बिधु सिव-धनु-राहू। गरुअ कठोर बिदित्त सब काहू॥
रावन बान महाभट भारे। देखि सरासन गँवहिँ सिधारे ॥१॥

1.1327

इ पुरारि-कोदंड कठोरा। राज-समाज आजु जेई तोरा॥
त्रिभुवन-जय-समेत बैदेही। बिनहिँ बिचार बरह हठि तेही॥२॥

1.1328

सुनि पन सकल भूप अभिलाखे। भट मानी अतिसय मन माखे॥
परिकर बाँधि उठे अकुलाई। चले इष्टदेवन्ह सिर नाई॥३॥

1.1329

तमकि ताकि तकि सिव-धनु धरहीँ। उठै न कोटि भाँति बल करहीँ॥
जिन्ह के कछु बिचार मन माहीँ। चाप समीप महीप न जाहीँ॥४॥

1.1330

तमकि धरहिँ धनु मूढ नृप, उठै न चलहिँ लजाइ।
मनहुँ पाइ भट बाहु बल, अधिक अधिक गरुआइ॥२५०॥

1.1331

भूप सहस-दस एकहि बारा। लगे उठावन टरै न टारा॥
डगै न सम्भु सरासन कैसे। कामी बचन सती मन जैसे॥१॥

1.1332

सब नृप भये जोग उपहासी। जैसे बिनु बिराग सन्यासी॥
कीरति विजय बीरता भारी। चले चाप कर बरबस हारी॥२॥

1.1333

श्रीहत भये हारि हिय राजा। बैठे निज निज जाइ समाजा॥
नृपन्ह बिलोकि जनक अकुलाने। बोले बचन रोष जनु साने॥३॥

1.1334

दीप दीप के भूपति नाना। आये सुनि हम जो पन ठाना।
देव दनुज धरि मनुज सरीरा। बिपुल बीर आये रनधीरा॥४॥

1.1335

कुँअरि मनोहर बिजय बडि, कीरति अति-कमनीय।
पावनिहार बिरञ्चि जनु, रचेउ न धनु-दमनीय॥२५१॥

1.1336

कहहु काहि यह लाभ न भावा। काहुन सङ्कर-चाप चढावा॥
रहौ चढाउब तोरब भाई। तिल भर भूमि न सकेउ छुडाई॥१॥

1.1337

अब जनि कोउ माखै भट मानी। बीर-बिहीन मही मैं जानी॥
तजहु आस निज निज गृह जाहू। लिखा न बिधि बैदेहि बिबाहू॥२॥

1.1338

सुकृत जाइ जौँ पन परिहरऊँ। कुँअरि कुँआरि रहौ का करऊँ॥
जौँ जनतेउँ बिनु भट भुँइ भाई। तौ पन करि होतेउँ न हँसाई॥३॥

1.1339

जनक बचन सुनि सब नर नारी। देखि जानकिहि भये दुखारी॥
माखे लखन कुटिल भै भौंहैं। रद-पट फरकत नयन रिसौहेँ॥४॥

1.1340

कहि न सकत रघुबीर डर, लगे बचन जनु बान।
नाइ राम-पद-कमल सिर, बोले गिरा प्रमान॥२५२॥

1.1341

रघुबंसिन्ह महँ जहँ कोउ होई। तेहि समाज अस कहै न कोई॥
कही जनक जसि अनुचित बानी। बिद्यमान रघुकुल-मनि जानी॥१॥

1.1342

सुनहु भानुकुल-पङ्कज भानू। कहौँ सुनाव न कछु अभिमानू॥
जौँ तुम्हार अनुसासन पावौँ। कन्दुक इव ब्रह्मांड उठावौँ॥२॥

1.1343

काँचे घट जिमि डारौँ फोरी। सकौँ मेरु मूलक इव तोरी॥
तव प्रताप महिमा भगवाना। का बापुरो पिनाक पुराना॥३॥

1.1344

नाथ जानि अस आयसु होई। कौतुक करौँ बिलोकिय सोई॥
कमलनाल जिमि चाप चढावौँ। जोजन सत प्रमान लेइ धावौँ॥४॥

1.1345

तारौँ छत्रकदंड जिमि, तव प्रताप बल नाथ।
जौँ न करौँ प्रभु-पद सपथ, कर न धरौँ धनु भाथ॥२५३॥

1.1346

लखन सकोप बचन जब बोले। डगमगानि महि दिग्गज डोले॥
सकल लोक सब भूप डेराने। सिय हिय हरष जनक सकुचाने॥१॥

1.1347

गुरु रघुपति सन्न मुनि मन माहीँ। मुदित भये पुनि पुनि पुलकाहीँ॥
सयनहिँ रघुपति लखन निवारे। प्रेम समेत निकट बैठारे॥२॥

1.1348

बिस्वामित्र समय सुभ जानी। बोले अति-सनेह-मय बानी॥
उठहु राम भञ्जुह भवचापा। भेटहु तात जनक परितापा॥३॥

1.1349

सुनि गुरु बचन चरन सिर नावा। हरष विषाद न कछु उर आवा॥
ठाढ भये उठि सहज सुभाये। ठवनि जुबा मृगराज लजाये॥४॥

1.1350

उदित उदय-गिरि मञ्च पर, रघुबर बाल-पतङ्ग।
बिकसे सन्त सरोज सब, हरषे लोचन-भङ्ग॥२५४॥

1.1351

नृपन्ह केरिआसानिसि नासी। बचन नखत अवलीन प्रकासी॥
मानी महिप कुमुद सकुचाने। कपटी भूप उलूक लुकाने॥१॥

1.1352

भये बिसोक कोक मुनि देवा। बरषहिँ सुमन जनावहिँ सेवा॥
गुरु-पद बन्दि सहित अनुरागा। राम मुनिन्ह सन आयसु माँगा॥२॥

1.1353

सहजहि चले सकल जग स्वामी। मत्त मञ्जु बर कुञ्जर-गामी॥
चलत राम सब पुर नर नारी। पुलक-पूरि-तन भये सुखारी॥३॥

1.1354

बन्दि पितर सुर सुकृत सँभारे। जौँ कछु पुन्य प्रमाउ हमारे॥
तौ सिव धनु मृनाल की नाँई। तारहिँ राम गनेस गोसाँई॥४॥

1.1355

रामहिँ प्रेम समेत लखि, सखिन्ह समीप बोलाइ।
सीता-मातु सनेह-बस, बचन कहै बिलखाइ॥२५५॥

1.1356

सखि सब कौतुक देखनिहारे। जेउ कहावत हितू हमारे॥
कोउ न बुझाइ कहै नृप पाहीँ। ये बालक अस हठ भल नाहीं॥१॥

1.1357

रावन बान छुआ नहिँ चापा। हारे सकल भूप करि दापा॥
धनु राजकुँअर कर देहीँ। बाल मराल कि मन्दर लेहीँ॥२॥

1.1358

भूप सयानप सकल सिरानी। सखि बिधिगति कछु जाति न जानी॥
बोली चतुर सखी मृदु बानी। तेजवन्त लधु गनिय न रानी॥३॥

1.1359

कहँ कुम्भज कहूँ सिन्धु अपारा। सोखेउ सुजस सकल संसारा।
रबिमंडल देखत लघु लागा। उदय तासु त्रिभुवन तम भागा॥४॥

1.1360

मन्त्र परम-लघु जासु बस, बिधि हरि हर सुर सर्ब।
महा मत्त गजराज कहँ, बस कर अङ्कुस खर्ब॥२५६॥

1.1361

काम कुसुम-धनु-सायक लीन्हे। सकल भुवन अपने बस कीन्हे॥
देबि तजिय संसय अस जानी। भञ्जब धनुप राम सुनु॥१॥

1.1362

सखी बचन सुनि भै परतीती । मिटा बिषाद बढी अति प्रीती॥
तष रामहिँ बिलोकि बैदेही। सभय हृदय बिनवति जेहि तेही॥२॥

1.1363

मनहीं मन मनाव अकुलानी। होहु प्रसन्न महेस भवानी॥
करहु सुफल आपनि सेवकाई। करि हित हरहु चाप गरुआई॥३॥

1.1364

गन-नायक बर-दायक देवा। आजु लगे कीन्हिउँ तव सेवा॥
बार बार बिनती सुनि मोरी। करहु चाप-गरुता अति थोरी॥४॥

1.1365

देखि देखि रघुबीर छबि, सुर मानव धरि धीर॥
भरे बिलोचन प्रेम-जल, पुलकावली-सरीर॥२५७॥

1.1366

नीके निरखि नयनभरि सोभा। पितु-पनसुमिरि बहुरि मन छोभा।
अहह तात दोरुन हठ ठानी। समुझत नहिँ कछु लाभ न हानी॥१॥

1.1367

सचिव समय सिख देइ न कोई। बुध-समाज बड अनुचित होई॥
कहँ धनु कुलिसहु चाहि कठोरा। कहँ स्यामल मृदु-गात-किसोरा॥२॥

1.1368

बिधि केहि भाँति धरौँ उर धीरा। सिरस सुमन कन बेधिय हीरा॥
सकल सभा के मति भै भोरी। अब मोहि सम्भुचाप गति तोरी॥३॥

1.1369

निज जडता लोगन्ह पर डारी। होहि हरुअर रघुपतिहि निहारी॥
अति परिताप सीय मन माहीँ। लव निमेष जुग सय सम जाहीँ॥४॥

1.1370

प्रभुहि चितै पुनि चितव महि, राजत लोचन लाल।
खेलत मनसिज मीन जुग, जनु बिधु मंडल डोल॥२५॥

1.1371

गिरा-अलिनि मुख पङ्कज रोकी। प्रगट न लाज-निसा अवलोकी।
लोचन जल रह लोचन कोना। जैसे परम कृपिन कर सोना॥१॥

1.1372

ऽसकुची ब्याकुलता बडिजानी। धरि धीरज प्रतीति उर आनी॥
तन मन बचन मोर पन साँचा। रघुपति पद सरोज चित राँचा॥२॥

1.1373

तौ भगवान सकल उर बासी। करिहहिँ माहिँ रघुपति के दासी॥
जेहि के जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलै न कछु सन्देहू॥३॥

1.1374

प्रभु तन चितै प्रेम पन ठाना। कृपानिधान राम सब जाना॥
सियहि बिलोकि तकेउ धनु कैसे। चितव गरुड लघु ब्यालहि जैसे॥४॥

1.1375

लखन लखेउ रघुबंस-मनि, ताकेउ हर-कोदंड
पुलकि गात बोले बचन, चरन चापि ब्रह्मंड॥२५९॥

1.1376

दिसि कुञ्जरहु कमठ अहि कोला। धरहु धरनि धरि धीर न डोला॥
राम चहहिँ सङ्कर धनु तोरा। होहु सजग सुनि आयसु मोरा॥१॥

1.1377

चाप समीप राम जब आये। नर नारिन्ह सुर सुकृत मनाये॥
सब कर संसय अरु अज्ञानू। मन्द महीपन्ह कर अभिमानू॥२॥

1.1378

भृगुपति केरि गरब गरुआई। सुर-मुनिबरन्ह केरि कदराई॥
सिय कर सोच जनक पछितावा। रानिन्ह कर दारुन-दुख-दावा॥३॥

1.1379

सम्भु-चाप बड बोहित पाई। चढे जाइ सब सङ्ग बनाई॥
राम-बाहुबल, सिन्धु अपारू। चहत पार नहिँ कोउ कनहारू॥४॥

1.1380

राम बिलोके लोग सब, चित्र लिखे से देखि।
चितई सीय कृपायतन, जानी बिकल बिसेखि॥२६०॥

1.1381

देखी बिपुल बिकल बैदेही। निमिष बिहोत कलप सम तेही॥
तृषित बारि बिनु जो तनु त्यागा। मुये करै का सुधा तडागा॥१॥

1.1382

का बरषा जब कृषी सुखाने। समय चुके पुनि का पछिताने॥
अस जिय जानि जानकी देखी। प्रभु पुलके लखि प्रीति बिसेखी॥२॥

1.1383

गुरुहि प्रनाम मनहिँ मन कीन्हा। अतिलाघव उठाइ धनु लीन्हा॥
दमकेउ दामिनि जिमि जब लयऊ। पुनिधनु नभ मंडल सभ भयऊ॥३॥

1.1384

लेत चढावत खैँचत गाढे। काहु न लखा देख सच ठाढे॥
तेहि छन राम मध्य धनु तोरा। भरेउ भुवन धुनि घोर कठोरा॥४॥

1.1385

भरे भुवन घोर कठोर रव रबि, बाजि तजि मारग चले।
चिक्करहिँ दिग्गज डोल महि अहि, कोल कूरम कलमले॥
सुर असुर मुनि कर कान दीन्हें, सकल बिकल बिचारहीँ॥
कोदंड खंडेउ राम तुलसी, जयति बचन उचारहीँ॥१६॥

1.1386

सङ्कर-चाप ऽजहाज, सागर रघुबर बाहुबल॥
बूड सो सकल समाज, चढे जो प्रथमहिँ मोह-बस॥२६१॥

1.1387

प्रभु दोउ चाप-खंड महि डारे। देखि लोग सब भये सुखारे॥
कौसिक रूप पयोनिधि पावन। प्रेम बारि अवगाह सुहावन॥१॥

1.1388

राम रूप राकेस निहारी। बढत बीचि पुलकावलि भारी॥
बाजे नभ गहगहे निसाना। देवबधू नाचहिँ करि गाना॥२॥

1.1389

ब्रह्मादिक सुर सिद्ध मुनीसा। प्रभुहि प्रसंसहिँ देहिँं असीसा॥
बरषहिँ सुमन रङ्ग बहु माला। गावहिं किन्नर गीत रसाला॥३॥

1.1390

रही भुवन भरि जय जय बानी। धनुष-भङ्ग धुनि जात न जानी॥
मुदित कहहिँ जहँ तहँ नर नारी। भञ्जेउ राम सम्भु धनु भारी॥४॥
बन्दी मागध सूत गन, बिरद बदहिँ मतिधीर।
करहिँ निछावरि लोग सब, हय गय धन मनि चीर॥२६२॥

1.1391

झाँझ मृदङ्ग सङ्ख सहनाई। भेरि ढोल दुन्दुभी सुहाई॥
बाजहिँ बहु बाजने सुहाये। जहँ तहँ जुबतिन्ह मङ्गल गाये॥१॥

1.1392

सखिन्ह सहित हरषीँ सब रानी। सूखत धान परा जनु पानी॥
जनक लहेउ सुख सोच बिहाई। पैरत थके थाह जनु पाई॥२॥

1.1393

श्रीहत भये भूप धनु टूटे। जैसे दिवस दीप छबि छूटे॥
सीय सुखहि बरनिय केहि भाँती। जनु चातकी पाइ जल स्वाती॥३॥

1.1394

रामहिँ लखन बिलोकत कैसे। ससिहि चकोर किसारक जैसे॥
सतानन्द तब आयसु दीन्ही। सीता गवन राम पहिँ कीन्हीँ॥१॥

1.1395

सङ्ग सखी सुन्दर चतुर, गावहिँ मङ्गलचार।
गवनी बाल-मराल-गति, सुखमा अङ्ग अपार॥२६३॥

1.1396

सखिन्ह मध्य सिय सोहति कैसी। छबि-गन-मध्य महाछबि जैसी॥
कर सरोज जयमाल सुहाई। बिस्व-बिजय-सोभा जेहि छाई॥१॥

1.1397

तन सकोच मन परम उछाहू। गूढ प्रेम लखि परै न काहू॥
जाइ समीप राम छबि देखी। रहि जनु कुँअरि चित्र अवरेखी॥२॥

1.1398

चतुर सखी लखि कहा बुझाई। पहिरावहु जयमाल सुहाई॥
सुनत जुगल कर मोल उठाई। प्रेम बिबस पहिराइ न जाई॥३॥

1.1399

हत जनु जुग जलज सनाला। ससिहि सभीत देत जयमाला॥
गावहिँ छवि अवलाकि सहेली। सिय जयमाल राम उर मेली॥४॥

1.1400

रघुबर उर जयमाल, देखि देव बरषहिँ सुमन॥
सकुचे सकल भुआल, जनु बिलोकि रवि कुमुद-गन॥२६॥

1.1401

पुर अरु ब्योम बाजने बाजे। खल भये मलिन साधु सब राजे।
सुर किन्नर नर नाग मुनीसा। जय जय जय कहि देहिँ असीसा॥१॥

1.1402

नाचहिँ गावहिँ बिवुध-बधूटी। बार बार कुसुमाञ्जलि छूटी।
जहँ तहँ बिन बेद धुनि करहीँ। धन्दी बिरदावलि उच्चरहीं॥२॥

1.1403

महि पाताल व्याल जस ब्यापा। राम बरी सिय भञ्जेउ चापा॥
करहिँ आरती पुर-नर-नारी। देहिँ निछावरि बित्त बिसारी॥३॥

1.1404

हति सीय राम कै जोरी। छबि सिङ्गार मनहुँ इक ठोरी॥
सखी कहहिँ प्रभु-पद गहु सीता। करति न चरन परस अति भीता॥४॥

1.1405

गौतम-तिय गति सुरति करि, नहिँ परसति पग पानि॥
मन बिहँसे रघुबंस मनि, प्रीति अलौकिक जानि॥२६५॥

1.1406

तब सिय देखि भूप अभिलाखे। कूर कपूत मूढ मन माखे॥
उठि उठि पहिरि सनाह अभागे। जहँ तहँ गाल बजावन लागे॥१॥

1.1407

लेहु छडाइ सीय कह कोऊ। धरि बाँधहु नृप-बालक दोऊ॥
तारे धनुष चाँड नहिँ सरई। जीवत हमहि कुँअरि को बरई॥२॥

1.1408

जौँ बिदेह कछु करै सहाई। जीतह समर सहित दोउ भाई॥
साधु-भूप बोले सुनि बानी। राज-समाजहि लाज लजानी॥३॥

1.1409

बल प्रताप बीरता बडाई। नाक पिनाकहि सङ्ग सिधाई ॥
इ सूरता कि अब कहुँ पाई । असि बुधि तो विधि मुँह ममि लाई ॥४॥

1.1410

देखहु रामहिँ नयन भरि, तजि इरषा मद कोहु ।
लखन-रोष पावक प्रबल, जानि सलभ जनि होहु ॥२६॥

1.1411

वैनतेय बलि जिमि चह कागू । जिमि सस चहै नाग-अरिभागू।
जिमि वह कुसल अकारन कोही । सब सम्पदा चहै सिव-द्रोही ॥१॥

1.1412

लोभी लोलुप कीरतिऽचहई ।अकलङ्कता कि कामी लहई ।
हरि-पद-विमुख सुगति जिमि चाहा । तस तुम्हार लोलच नग्नाहा ॥२॥

1.1413

कोलाहल सुनि सीय सकानी । सखी लेवाइ गई जहँ रानी,॥
राम सुभाय चले गुरु पाहीं। सिय-सनेह बरनत मन माहीं ॥३॥

1.1414

रानिन्ह सहित सोच बस सीयो । अब धौँ बिधिहि काह करनीया ॥
श्रृप बचन सुनि इत उत तकहीं। लखन राम-डर बोलि न सकहीं ॥४॥

1.1415

अरुन-नयन भृकुटी-कुटिल, चितवत नृपन्ह सकोप ।
मनहूँ मत्त-गज-गन निरखि, सिंह किसोरहि चोप ॥२६७॥

1.1416

खरसर देखि विकल पुर-नारी । सबमिलि देहि महीपन्ह गारो॥
तेहि अवसर सुनि सिव-धनु-अङ्गा । आयौ भृगुकुल कमल-पनङ्गा ॥१॥

1.1417

देखि महीप सकल सकुचाने । बाज झपट जनु लवा लुकाने ॥
गौर शरीर भूति मलि भाजा। माल घिसाल त्रिपुंड बिराजा ॥२॥

1.1418

स-जदा सास-बदन सुहावा । रिस-बस कछुक अरुन होइ आवा ।
भृकुटी-कुटिल नयन रिस राते। सहजहुँ चितवत मनहुँ रिसाते ॥३॥

1.1419

वृषभ कन्ध उर-बाहु बिलासा । चारु जनेउ मोल मृगछाला ॥
कटि मुनि-बसन तून दुइ बाँधे । धनु-सर-कर कुठार-कल-काँधे ॥४॥

1.1420

सान्त बेष करनी कठिन, बरनि न जाइ सरूप ।
धरि मुनि तनु जनु बीररस, आयौ जहँ सब भूप ॥२८॥

1.1421

देखत भूगुपति मेष कराला । उठे सकल भय-विकल भुआला ॥
पितु समेत कहि कहि निज नामा । लगे करन सब दंड-प्रनामा ॥१॥

1.1422

जेहि सुभाय चितवहिँ हित जानी । सो जानड जनु आयु खुटानी ॥
जनक बहोरि आइ सिर नावा । सीय बालाइ प्रनाम करावा ॥२॥

1.1423

आसिष दीन्हि सखी हरषानी । निज समाज लै गईं सयानी ॥
बिस्वामित्र मिले पुनि आई। पद-सरोज मेले दोउ भाई ॥३॥

1.1424

राम लखन दसरथ के ढोटा। दीन्हि असीस देखि भल जोटा ।
रामहिं चितै रहे थकि लोचन । रूप अपार-मार-मद मोचन ॥४॥

1.1425

बहुरि बिलोकि बिदेह सन, कहहु काह अति भीर ।
पूछत जानि अजान जिमि, ब्यापेउ कोप सरीर ॥२६॥

1.1426

समाचार कहि जनक सुनाये । जेहि कारन महीप सब आये ॥
सुनत बचन फिरि अनत निहारे । देखे चाँप-खंड महि डारे ॥१॥

1.1427

अति रिस बोलें बचन कठोरा । कहु जड जनक धनुष केइ तोरा ।
बेगि देखाउ मूढ न त आजू । उलटौँ महि जहँ लगि तव राजू ॥२॥

1.1428

अति डर उतर देत नृप नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं ।
सुर मुनि नाग नगर नर-नारी । सोचहिँ सकल त्रास उर भारी ॥३॥

1.1429

मन पछिताति सीय-महँतारी। बिधि अब सबरी बात बिगारी॥
भूगुपति कर सुभाउ सुनि सीता । अरध-निमेष कलप सम बीता॥४॥

1.1430

समय बिलोके लोग सब, जानि जानकी भीर।
हृदय न हरष बिषाद कछु, बोले श्रीरघुबीर ॥२७०॥

1.1431

नाथ सम्भु-धनु भञ्जनिहारा । होइहि कोउ एक दास तुम्हारा ॥
आयसु काह कहिय किन मोही । सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही ॥१॥

1.1432

सेवक सो जो करई सेवकाई । अरि करनी करि करिय लराई ।
हु हु राम जेहि सिव-धनु तोरा । सहसबाहु सम से रिपु मारा ॥२॥

1.1433

बिलगाउ बिहाइ समाजा। नत मारे जैहैं सब राजा ॥
सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने । बाले परसुधरहि अपमाने ॥३॥

1.1434

बहु धनुही तोरी लरकाँई । कबहुँ न असि रिस कीन्हि गुसाँई ॥
एहि धनु पर ममता केहि हेतू । सुनि रिसाइ कह भृगुकुल केतू ॥४॥

1.1435

रे नृप-बालक काल-बस, बोलत तोहि न सँभार।
धनुहीं सम त्रिपुरारि-धनु, विदित सकल संसार ॥२०१॥

1.1436

लखन कहा हाँसि हमरे जाना । सुनहु देव सब धनुष समाना ॥
का छति लाभ जून धनु तारे । देखा राम नये के भारे ॥१॥

1.1437

उअत टूट रघुपतिहु न दोषू । मुनि बिनु काज करिय कत रोषु ।
बोले चितै परस को ओरा। रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा ॥२॥

1.1438

बालक बोलि बघौँ नहिँ तोही । केवल मुनि जड जानहि मोही।
बाल-ब्रह्मचारी अति कोही । बिस्व-विदित छत्रिय-कुल-द्रोही ॥३॥

1.1439

भुज-बल भूमि भूप बिनु कीन्ही । बिपुल बार महिंदेवन्ह दोन्ही ॥
सहसबाहु-भुज छेदनिहारा । परसु बिलाकु महीप-कुमारा॥४॥

1.1440

मातु-पितहि जनि सोच बस, करसि महीप-किसोर।
गरभन के अरभक दलन, परसु मार अति घोर ॥२२॥

1.1441

बिहँसि लखन बोले मृदुबानी । अहो मुनीस महा अट मानी॥
पुनि पुनि माहि देखाव कुठारू । बहत उडावन फँकि पहारू ॥१॥

1.1442

इहाँ कुम्हड-बतिया कोउ नाहीं । जे तरजनी देखि मरि जाहीं ॥
देखि कुठार सरासन बाना। मैं कछु कहेउँ सहित अभिमाना ॥२॥

1.1443

भृगुकुल समुझि जनेउ बिलोकी । जो कछु कहहु सहौँ रिस रोकी ॥
सुर महिसुर हरिजन अरु गाई । हमरे कुल इन्ह पर न सुराई ॥३॥

1.1444

बधे पाप अपकीरति हारे । भारतहूँ पाँ परिय तुम्हारे ।
कोटि कुलिस सम बचन तुम्हारा । व्यर्थ धरहु धनु बान कुठारा ॥४॥

1.1445

जो बिलोकि अनुचित कहेउँ, छमहु महा मुनि धीर ।
सुनि सरोष भूगुबंस-मनि, ओले गिरा गंभीर ॥ २७३ ॥

1.1446

कौसिक सुनहु मन्द यह बालक । कुटिल काल बस निज कुल घालक॥
भानु-बंस-राकेस कलङ्कू। निपट निरङ्कुस अबुध असङ्क ॥१॥

1.1447

काल-कवलु होइहि छन माहीं । कहौँ पुकारि खोरि माहि नाहीं
तुम्ह हटकहु जौं चहहु उबारा । कहि प्रताप बल रोष हमारा ॥२॥

1.1448

लखन कहेउ मुनि सुजस तुम्हारा । तुम्हहिँ अछत्त को बरनै पारा ॥
अपने मुँह तुम्ह आपनि करनी। बार अनेक भाँति बहु थरनी ॥३॥

1.1449

सूर समर करनी करहिँ, कहि न जनावहिँ आप ।
बिदामान रन पाइ रिपु, कायर करहिं प्रलाप ॥२७४॥

1.1450

तुम्ह तौ काल हाँक जनु लावा। बार बार मोहि लागि घुलावा॥
सुनत लखन के वचन कठोरा । परसु सुधारि धरेउ कर घोरा ॥१॥

1.1451

अब जनि देइं दोष माहि लोगू ।कटुबादी बालक बध जोगू ॥
बाल बिलोकि बहुत मैं बाँचा । अब यह मरनहार मा साँचा ॥२॥

1.1452

कौसिक कहा छमिय अपराधू । बाल दोष-गुन गनहिँ न साधू ॥
कर कुठार मैं अकरन-कोही । आगे अपराधी गुरु-द्रोही ॥३॥

1.1453

उत्तर देत छाडौँ बिनु मारे। केवल ऽकासिक सील तुम्हारे ॥
न त एहि कोटि कुठार कठोरे । गुरुहि उरिन होतेउँ सम थोरे ॥४॥

1.1454

गाधि-सूनु कह हृदय हँसि, मुनिहि हरिअरै सूत्र ।
अय-मय-खाँड न ऊख-मय, अजहुँ न बूझ अबूझ ॥ २७५ ॥

1.1455

कहेउ लखन मुनि सील तुम्हारा । को नहिं जान बिदित संसारा॥
माता पितहि उरिन भये नोके । गुरु रिन रहा सोच बडजी के ॥१॥

1.1456

जनु हमरेहि माथे काढा । दिन चलि गयौ व्याज बहु बाढा।
अब आनिय व्यवहरिया बोली तुरत देउँ मैं थैली खोली ॥२॥

1.1457

सुनि कटु-बचन कुठार सुधारा । हाय हाय सब सभा पुकारा ।
भूगुबर परसु देखावहु मोही। विप्र बिचारि बचेउ नृप-द्रोही ॥३॥

1.1458

मिले न कबहुँ ,सुभट रन गाढे। द्विज-देवता घरहिँ के बोढे।
अनुचित कहिं सब लोग पुकारे। रघुपति सैनहिँ लखन निवारे ॥४॥

1.1459

लखन उतर आहुति सरिस, भृगुषर कोप कृसानु ।
बढत देखि जल सम बचन, बोले रघुकुल-भानु ॥ २७६ ॥

1.1460

नाथ करहु बालक पर छोहू । सूध दूध-मुख करिय न कोहू
जौँ पै प्रभु प्रश्राउ कछु जाना । ता कि बराबरि करै अजाना ॥१॥

1.1461

जौँ लरिका कछु अचगरि करहाँ । गुरु पितु मातु माद मन अरहीं।
करिय कृपा सिसु सेवक जानी । तुम्ह सम सील धीर मुनि ज्ञानी ॥२॥

1.1462

राम बचन सुनि कछुक जुडाने । कहि कछु लखन बहुरि मुसुकाने ॥
हँसत देखि नख-सिख रिस व्यापी । राम तर माता बड पापी ॥३॥

1.1463

गौर शरीर स्याम मन माहीं। कालकूट -मुख पय-मुख नाहीं ॥
सहज टेढ अनुहरै न तोही। नीच मीच सम देख न माही ॥४॥

1.1464

लखन कहेउ हँसि सुनहु मुनि, क्रोध पाप कर मूल ।
जेहि बस जन अनुचित करहिँ,होहिँ बिस्व प्रतिकूल ॥२७७॥

1.1465

मैं तुम्हार अनुचर मुनिराया। परिहरि कोप करिय अब दाया॥
टूट चाप नहिँ जुरहि रिसने । बैठिय हाइहहिँ पाय पिराने ॥१॥

1.1466

जौँ अति प्रिय ती करिय उपाई। जोरिय कोउ बड गुनी बालाई ॥
बोलत लखनहिं जनक डेराही । मष्ट करहु अनुचित भलनाहीं ॥२॥

1.1467

थर थर कापहिँ पुर-नर-नारी । छोट कुमार खोट अति मारी ।
भृगुपति सुनि सुनि निर्भय बानी। रिस तनु जरै होइ बल हानी ॥३॥

1.1468

बोले रामहि देइ निहोरा । बचौँ बिचारि बन्धु लघु तारा ॥
मन-मलीन तन सुन्दर कैसे । बिष-रस-भरा कनक-घट जैसे ॥४॥

1.1469

सुनि लछिमन बिहँ से बहुरि, नैन तरेरे राम ।
गुरु- समीप गवने सकुचि, परिहरि बानी बाम ॥२७८॥

1.1470

अति बिनीत मृदु सीतल बानी। बोले राम जोरि जुग पानी॥
सुनहु नाथ तुम्ह सहज सुजाना । बालक बचन करिय नहिँ काना॥
बररे बालक एक सुभाऊ । इन्हहिँ न बिदुष बिदूषहिँ काऊ ॥
तेहि नाहीं कछु काज बिगारा। अपराधी मैं नाथ तुम्हारा ॥२॥

1.1471

कृपा कोप बध बन्ध गोसाँई । मो पर करिय दास की नाँई ।
कहिय बेगि जेहि बिधि रिस जाई। मुनि-नायक सोइ करौँ उपाई ॥३॥

1.1472

कह मुनि राम जाइ रिस कैसे। अजहुँ अनुज तव चितव अनैसे॥
एहि के कंठ कुठार न दीन्हा । तो मैं कोह कोप करि कीन्हा ॥४॥

1.1473

गर्भ सवहिँ अवनिप-रवनि, सुनि कुठार-गति-घोर।
परसु अछत्त देखौँ जियत, बैरी भूप किसोर ॥२७९॥

1.1474

बहै न हाथ दहै रिस छाती। मा कुठार कुठित प-घाती।
भयेउ बाम बिधि फिरेउ सुभाऊ । मारे हृदय कृपा कसि काऊ॥१॥

1.1475

आजु दया दुख दुसह सहावा । सुनि सौमित्रि विहँसि सिर नावा।
बाउ-कृपा मूरति अनुकूलां । बोलत बचन झरत जनु फूला ॥२॥

1.1476

जौँ पै कृपा जरहिँ मुनि गाता । क्रोध भये तनु राखु विधाता ॥
देखु जनक हठि बालक एहू । कीन्ह चहत जड जमपुर गेहू ॥३॥

1.1477

बेगि करहु किन आँखिन्ह ओटा। देखत छोट खोट नृप ढाटा ॥
बिहँसे लखन कहा मन माहीं । मूंदे आँखि कतहुँ कोउ नाहीं
परसुराम तब राम प्रति, बोले उर अति क्रोध ।
सम्भु सरासन तोरि संठ, करसि हमार प्रबोध ॥२८०॥

1.1478

बन्धु कहै कटु सम्मत तेरे । तू छल बिनय करसि कर जारे ।
करु परितोष मार सङ्कामो । नाहि त छाडु कहाउब रामा ॥१॥

1.1479

ल तजि करहि समर सिव-द्रोही । बन्धु सहित न त मारौँ ताही ।
भृगुपति बकहिँ कुठार उठाये । मन मुसुकाहिँ राम सिर नाये ॥२॥

1.1480

गुनहु लखन कर हम पर रोषू । कतहुँ सुधाइहु तँ बड दोषू ।
टेढ जानि सङ्का सब काहू । बक्र चन्द्रमहिँ ग्रसै न राहू ॥३॥

1.1481

राम कहेउ रिस तजिय मुनीसा । कर कुठार आगे यह सीसा ॥
जेहि रिस जोइ करिय साइ स्वामी । माहि जानिय आपन अनुगामी ॥
प्रभुहि सेवकहि समर कस, तजहु विप्र-बर रोस ।
बेष बिलोकि कहेसि कछु, बालकहू नहिँ दोस ॥ २८१ ॥

1.1482

देखि कुठार बान-धनु-धारी । भै लरिकहि रिस बीर बिचारी॥
नाम जान पै तुम्हहिँ न चीन्हा । बंस सुभाउ उतर तेहि दीन्हा ॥१॥

1.1483

जौँ तुम्ह अवतेहु मुनि की नाँई । पद-रज सिर सिसु धरत गोसाँई।
महु चूक अनजानत केरी । चहिय विप्र उर कृपा घनेरी ॥२॥

1.1484

हमाहिँ तुम्हहिँ सरबरि कस नाथा । कहहु न कहाँ चरन कहँ माथा ॥
मात्र लघु नाम हमारो । परसु सहित बड नाम तुम्हारा ॥३॥

1.1485

देव एक गुन धनुष हमारे । नव गुन परम-पुनीत तुम्हारे ।
सब प्रकार हम तुम्ह सन हारे । छमहु बिप्र अपराध हमारे ॥४॥

1.1486

बार बार मुनि बिप्र घर, कहा राम सन राम !
बोले भृगुपति सरुष हसि, तहूँ बन्धु सम बाम ॥ २२ ॥

1.1487

निपटहि द्विज करिजानहिमाही। मैं जस बिप्र सुनावौँ तोही ॥
चाप-खुवा सर-आहुति जानू । कोप मोर अति घोर-कृसानू ॥१॥

1.1488

समिध सेन चतुरङ्ग सुहाई । महा-महीप भये पसु आई ॥
मैं एहि परसु काटि बलि दीन्हे । समर-जज्ञ जग कोटिन्ह कीन्हे ॥२॥

1.1489

मोर प्रभाव विदित नहिँ तोरे । बोलसि निदरि बिन के भोरे ॥
भञ्जेउ चाप दाप बड बाढा। अहमिति मनहुँ जीति जग ठाढा ॥३॥

1.1490

राम कहा मुनि कहहु विचारो। रिस अति बडि लघु चूक हमारी।
उअतहि टूट पिनाक पुराना । मैं केहि हेतु करौँ अभिमानो ॥४॥

1.1491

जौँ हम निदरहिं विप्र बदि, सत्य सुनहु भृगुनाथ ।
तौ अस को, जग सुभट जेहि, भय-बस नोवहि माथ ॥२३॥

1.1492

देव दनुज भूपति अट नाना । सम बल अधिक होउ बलवाना ।
जौँ रन हमाहिँ पचारै कोऊ। लरहिँ सखेन काल किन होऊ ॥१॥

1.1493

त्रिय धरि समर सकाना । कुल-कलङ्क तेहि पावर जाना ॥ कहौँ सुभाव न कुलहि प्रसंसी । कालहु डरहिन रन रघुवंसी ॥२॥

1.1494

बिप्र-बस के असि प्रभुताई । अभय हाइ जो तुम्हहिं डेराई ॥ सुनि मृदु गूढ बचन रघुपति के । उघरे पटल परसुधर-मति के ॥३॥

1.1495

राम रमापति कर धनु लेहू । खैचहु मार मिटै सन्देहू ॥ देत चाप आपुहि चलि गयऊ । परसुराम मन बिसमय भयऊ॥
जाना राम प्रभाव तब, पुलक प्रफुल्लित गात ॥ जोरि पानि बोले बचन, हृदय न प्रेम अमात ॥२८॥

1.1496

जय रघुबंस-बनज-बन-मोनू । गहन-दनुज-कुल दहन-कसानू ॥ जय सुर-बिन-धेनु-हितकारी । जय मद मोह-कोह-मभ-हारी ॥१॥

1.1497

बिनय-सील करुना-गुन सागर । जयति बचन-रचना अति नागर ॥ सेवक-सुखद सुभग सब अङ्गा । जय सरीर छबि कोटि अनङ्गा ॥२॥

1.1498

करौँ काह मुख एक प्रसंसा । जय महेस मन मानस हंसा ॥ अनुचित बहुत कहेउँ अज्ञाता । छम छमा मन्दिर दोउ माता ॥३॥

1.1499

कहि जय जय जय रघुकुलकेतू । भृगुपति गये बनहिँ तप-हेतू ॥ अपभय कुटिल महीप डेराने । जहँ तह कायर गँवहिं पराने ॥४॥

1.1500

देवन्ह दीन्ही दुन्दभी, प्रभु पर बरषहिँ फूल॥ हर पुर-नर-नारि सब, मिटा मोह-मय-सूल ॥२८॥

1.1501

अति गहगहे बाजने बाजे। सहि मनोहर मङ्गल साजे ॥ जूथ जूथ मिलि सुमुखि सुनयनी । करहिं गान कल कोकिल-बयनी ॥१॥

1.1502

सुख बिदेह कर बरनि न जाई । जनम दरिद्र मनहुँ निधि पाई ॥ बिगत नास भै पीय सुखारी । जनु बिधु उदय चकोर-कुमारी ॥२॥

1.1503

जनक कीन्ह कैआसिकहि मनोमा । प्रभु प्रसाद धनु भौजेउ रामा ॥ मोहि कृतकृत्य कीन्ह दुहुँ भाई । अब जोउचित सो कहिय गोसाँई ॥३॥

1.1504

कह मुनि सुनु नरनाथ प्रवीना । रहा विवाह चाप आधीना ॥ दूटत ही धनु भयेउ बिवाहू । सुर नर नाग विदित सब काहू ॥४॥

1.1505

तदपि जाइ तुम्ह करहु अब,जथा वंस व्यवहार ॥ बूझि विप्र कुल-बुद्ध गुरु, बेइ विदित आचार ॥२६॥

1.1506

दूत अवधपुर पठवहु जाई । आनहिँ नप दसरथहि बोलाई ॥ मुदित राउ कहि भलेहि कृपाला । पठये दूत बालि तेहि काला ॥१॥

1.1507

बहुरि महाजन सकल बोलाये। आइ सबन्हि सादर सिर नाये ॥ हाट बार मन्दिर सुर-बासा । नगर सँवारहु चारिहु पासा ॥२॥

1.1508

हरषि चले निज निज गृह आये। पुनि परिचारक बालि पठाये ॥ रचहु बिचित्र बितान बनाई। सिर धरि बचन चले सचु पाई ॥३॥

1.1509

पठये बालि गुनी तिन्ह नाना । जे मितान विधि कुसल सुजाना ॥ बिधिहि बन्दि तिन्ह कीन्ह अरम्माविरचे कनक कदलि के खम्मा॥
हरित-मनिन्ह के. पन्न फल, पदुमराग के फूल ॥ रचना देखि बिचित्र अति, मन बिच्चि कर भूल ॥२८॥

1.1510

बेनु हरित-मनि-मय सब कीन्हे। सरल सुपरन परहिँ नहिं चोन्है ॥ कनक कलित अहिबेलि बनाई। लखि नहिं परै सपरन सुहाई ॥१॥

1.1511

तेहि के रचि पचि बन्ध बनाये ॥ बिच बिच मुकुता-दाम लगाये मानिक मरकत कुलिस पिरोजा। चोरि कोरि पचि रचे सरोजा ॥२॥

1.1512

किये भृङ्ग बहुरि बिहङ्गा। गुजहिँ कूहिँ पवन प्रसङ्गा॥
सुर-प्रतिमा खम्झन्हि गढि काढी। मङ्गल-द्रव्य लिये सब ठाढी॥३॥

1.1513

भाँति अनेक पुराई। सिन्धुर-मनि मय सहज सुहाई॥४॥

1.1514

हाथी और मोतियों से सजाए गए चौक सहज ही अत्यंत सुहावने बनाये गए हैं॥४॥

1.1515

सौरम-पल्लव सुभग सुठि, किये नीलमनि कोरि॥
हेम-बौर मरकत-धार, लसत पाट-मय डोरि॥२८॥

1.1516

रुचिर बर बन्दनवारे। मनहुँ मनोभव फन्द सँवारे॥
मङ्गल-कलस अनेक बनाये। ध्वज पताक पर चवर सुहाये॥१॥

1.1517

दीप मनोहर मनि-मय नाना। जाइ अरनि विचित्र बिताना॥
जेहि मंडप दुलहिनि बैदेही। सो बरनै असि मति कद‍‌ही केहि॥२॥

1.1518

दूलह राम रूप-गुन-सागर। सो वितान तिहुँ लोक उजागर॥
जनक-भवन कै सौभा जैसी। गृह गृह प्रति पुर देखिय तैसी॥३॥

1.1519

जेहि तिरहुति तेहि समय निहारी। तेहि लघु लोग भुवन दस-चारी॥
जो सम्पदा नीच गृह सोहा। सो बिलोकि सुरनायक मोहा॥४॥

1.1520

बसै नगरजेहि लच्छि करि, कपट नारि बर बेष।
तेहि पुर के सोभा कहत, सकुचहिं सारद सेष॥२९॥

1.1521

पहुँचे दूत राम-पुर पावन। हरष नगर बिलोकि सुहावन।
भूप-द्वार तिन्ह खबरि जनाई। दुसरथ नृप सुनि लिये बोलाई॥१॥

1.1522

करि प्रनाम तिन्ह पाती दोन्ही। मुदित महीप आप उठि लीन्ही॥
बारि-बिलोचन बाँचत पाती। पुलक गात आई भरि छाती॥२॥

1.1523

राम-लखन-उर कर-नर-चीठी। रहि गये कहत न खाटी मीठी॥
पुंनि धरि धीर पत्रिका बाँचो। हरषी सभा बात सुनि साँची॥३॥

1.1524

खेलत रहे तहाँ सुधि पाई। आये भरत सहित हित भाई॥
पूछत अति सनेह सकुचाई। तात कहाँ से पाती आई॥४॥

1.1525

कुसल प्रान प्रिय बन्धु दोउ, अहहिँ कहहु केहि देस।
सुनि सनेह-साने-पचन, बाँची बहुरि नरेस॥२०॥

1.1526

मुनि पाती पुलके दोउ भ्राता। अधिक सनेह समात न गाता॥
प्रीति पुनीत भरत कै देखी। सकल सभा सुख लहे उ बिसेखी॥१॥

1.1527

तब नृप दूत निकट बैठारे। मधुर मनोहर बचन उचारे॥
भैया कहहु कुसल दोउ बारे। तुम्ह नीके निज नयन निहारे॥२॥

1.1528

श्यामल गौर धरे धनु भाथा। बय-किसोर कैसिक मुनि साथा॥
पहिचानहु तुम्ह कहहु सुभाऊ। प्रेम-बिबस पुनि पुनि कहि राऊ॥३॥

1.1529

जा दिन तैं मुनि गयौ लेवाई। तब तँ आजु साँचि सुधि पाई॥
कहहु बिदेह कवनि विधि जाने। सुनि प्रिय बचन दूत मुसुकाने॥४॥

1.1530

सुनहु महीपति मुकुट-मनि, तुम्ह सम धन्य न कोउ।
राम लखन जाके तनय, बिस्व-विभूषन दोउ॥२१॥

1.1531

पूछन जोग न तनय तुम्हारे। पुरुष-सिंह तिहुँ पुर उजियारे॥
जिन्ह के जस-प्रताप के आगे। ससि मलीन रबि सीतल लागे॥१॥

1.1532

तिन्ह कहँ कहिय नाथ किमि चीन्हे। देखिय रबि कि दीप कर लीन्हे॥
अनेका समिटे सुभट एक तँ एका॥२॥

1.1533

सम्मु-सरासन काहु न टारा। हारे सकल बीर बरियारा॥
तीनि लोक महँ जे भट मानी। सब कै सकति सम्भुधनु मानी॥३॥

1.1534

सकै उठाइ सरासुर मेरू। सेउ हिय हारि गयौ करि फेरू॥
जेहि कौतूहल सिव-सैल उठावा। सेउ तेहि सभा पराभव पावा॥४॥

1.1535

तहँ राम-रघुबंस-मनि, सुनिय महा-महिपाल।
भजेउ चांप प्रयास बिनु, जिमि गज पङ्कज-नाल॥२२॥

1.1536

सम्मु-सरासन काहु न टारा। हारे सकल बीर बरियारा॥
तीनि लोक महँ जे भट मानी। सब कै सकति सम्भुधनु मानी॥३॥

1.1537

सकै उठाइ सरासुर मेरू। सेउ हिय हारि गयौ करि फेरू॥
जेहि कौतूहल सिव-सैल उठावा। सेउ तेहि सभा पराभव पावा॥४॥

1.1538

तहँ राम-रघुबंस-मनि, सुनिय महा-महिपाल।
भजेउ चांप प्रयास बिनु, जिमि गज पङ्कज-नाल॥२२॥

1.1539

सुनि सरोष भृगुनायक आये। बहुत भाँति तिन्ह आँखि देखाये॥
देखि राम बल निज धनु दीन्हा। करि बहु बिनय गवन बन कीन्हा॥१॥

1.1540

राजन राम अतुल बल जैसे। तेज-निधान लखन पुनि तैसे॥
कम्पहिं भूप निलोकत जाके। जिमि गज हरि-किसोर के तोके॥२॥

1.1545

चलहु बेगि सुनि गुरु बचन, भलेहि नाथ सिर नाइ।
भूपति गवने भवन तब, दूतन्ह बास देवाइ॥२४॥

1.1546

राजा सब रनिवास बोलाई। जनक-पत्रिका बाँचि सुनाई॥
सुनि सन्देस सकल हरषानी। अपर कथा सब भूप बखानी॥१॥

1.1547

प्रेम-प्रफुल्लित राजहि रानी। मनहुँ सिखिनि सुनि बारित बानी॥
मुदित असीस देहि गुरु नारी। अति आनन्द मगन महतारी॥२॥

1.1548

लेहि परसपर अति प्रिय पाती। हृदय लगाइ जुडावहिँ छाती॥
राम लखन के कीरति करनी। बारहि बार भूप-बर बरनी॥३॥

1.1549

मुनि प्रसाद कहि द्वार सिधाये। रानिन्ह तब महिदेव बोलाये॥
दिये दान आनन्द समेता। चले विप्र-बर आसिष देता॥४॥

1.1550

जाचक लिये हकारि, दीन्हि निछावर कोटि बिधि।
चिरजीवहु सुत चारि, चक्रवति दुसरथ के॥२६५॥

1.1551

कहत चले पहिरे पट नाना। हरषि हने गहगहे निसाना॥
समाचार सब लोगन्ह पाये। लागे घर घर होन बधाये॥१॥

1.1552

भुवन चोरि-दस भरा उछाहू। जनकसुता-रघुधीर विधाहू॥
सुनि सुभऽ कथा लोग अनुरागे। मग-गृह-गली सँवारन लागे॥२॥

1.1553

जद्यपि अवध सदैव सुहावनि। रामपुरी मङ्गल-मय पावनि॥
तदपि प्रीति कै रीति सुहाई। मङ्गल-रचना रची बनाई॥३॥

1.1554

ध्वज पताक पट चामर चारू। छावा परम-विचित्र बजारू॥
कनक कलस तारन मनि-जाला। हरद दूब दधि अच्छत माला॥४॥

1.1555

मङ्गल भय निज निज भवन, लोगन्ह रचे बनाइ।
बीथी साँची चतुरसम, चौके चारु पुराइ॥२६॥

1.1556

जहँ तहँ जूथन जूथ मिलि भामिनि। सजिनव-सपत सकल दुति दामिनि॥
विधु-बदनी मृग-सावक-लोचनि। निज-सरूप रति-मान-बिमोचनि॥१॥

1.1561

भरत सकल साहनी बोलाये। मायसु दीन्ह मुदित उठि धाये॥
रचि रुचि जीन तुरग तिन्ह साजे। बरन बरन बर वाजि विराजे॥२॥

1.1562

सुभग सकल सुठि चञ्चल करनी। अय इव जरत धरत पग धरनी॥
माना जाति न जाहिं बखाने। निदरि पवन जनु चहत उडाने॥३॥

1.1563

तिन्ह सब छयल भये असवारा। भरत सरिस बय राजकुमारा॥
सब सुन्दर सब भूषन-धारी। कर सर चाप तून कटि-कारी॥४॥

1.1564

छरे छबीले छैल सव, सूर सुजान नवीन।
जुग पदचर अलवार प्रति, जे असि कलां प्रबीन॥२८॥

1.1565

चाँधे बिरद बीर रन गाढे। निकसि भये पुर बाहिर ठाढे॥
फेरहिं चतुर तुरग गति नाना। हरषे सुनि पनव निसाना॥१॥

1.1799

बन्दि बिप्र सुर गुरु पितु माता। पाइ असीस मुदित सब भ्राता॥
जननिन्ह सादर बदन निहारे। भूपति सङ्ग द्वार पग धारे॥१॥

1.1800

कीन्ह सौच सब सहज सुचि, सरित पुनीत नहाइ।
प्रातक्रिया करि तात पहिँ, आये चारिउ भाइ॥३५८॥

1.1801

भूप विलोकि लिये उर लाई। बैठे हरषि रजायसु पाई॥
देखि राम सब सभा जुडानी। लोचन लाभ अवधि अनुमानी॥१॥

1.1802

पुनि बसिष्ठ मुनि कौसिक आये। सुभग आसनन्हि मुनि बैठाये॥
सुतन्ह समेत पूजि पग लागे। निरखि राम दोउ गुरु अनुरागे॥२॥

1.1803

कहहिँ बसिष्ठ धरम इतिहासा। सुनहिँ महीस सहित रनिवासा॥
मुनि मन अगम गाधि सुत करनी। मुदित बसिष्ठ बिपुल बिधि करनी॥३॥

1.1804

बोले बामदेव सब साँची। कीरति कलित लोक तिहुँ माँची॥
सुनि आनन्द भयौ सब काहू। राम-लखन-उर अधिक उछाहू॥४॥

1.1805

मङ्गल मोद उछाह नित, जाहिँ दिवस एहि भाँति।
उमगी अवध अनन्द भरि, अधिक अधिक अधिकाति॥३५९॥

1.1806

सुदिन सोधि कल कङ्कन छोरे। मङ्गल मोद बिनोद न थोरे॥
नित नव सुख सुर देखि सिहाहीं। अवध जनम जाचहिँ बिधि पाहीं॥१॥

1.1807

बिस्वामित्र चलन नित चहहीँ। राम-सप्रेम-विनय-बस रहहीँ॥
दिन दिन सयगुन भूपति भाऊ। देखि सराह महा-मुनि-राज॥२॥

1.1808

माँगत बिदा राउ अनुरागे। सुतन्ह समेत ठाढ भये आगे॥
नाथ सकल सम्पदा तुम्हारी। मैं सेवक समेत सुत नारी॥३॥

1.1809

करब सदा लरिकन पर छोहू। दरसन देत रहब मुनि मोहू॥
अस कहि राउ सहित सुत रानी। परेउ चरन मुख आव न बानी॥४॥

1.1810

दीन्हि असीस बिप्र बहु भाँती। चले न प्रीति रीति-कहि जाती॥
राम सप्रेम सङ्ग सब भाई। आयसु पाई फिरे फिरे पहुँचाई॥५॥

1.1811

राम-रूप भूपति-भगति, ब्याह-उछाह-अनन्द।
जात सराहत मनहिं मन, मुदित गाधि-कुल-चन्द॥३६०॥

1.1812

बामदेव-रघुकुल गुरु ज्ञानी। बहुरि गाधि-सुत कथा बखानी॥
सुनि सुनि सुजस मनहिँ मन राऊ। बरनत आपन पुन्य प्रभाऊ॥१॥

1.1813

बहुरे लोग राजयसु भयऊ। सुतन्ह समेत नृपति गृह गयऊ॥
जहँ तहँ राम ब्याह सब गावा। सुजस पुनीत लोक तिहुँ छावा॥२॥

1.1814

आये ब्याहि राम घर जन तें। बसे अनन्द अवध सब तब तें॥
प्रभु बिबाह जस भयौ उछाहू। सकहिँ न बरनि गिरा अहिनाहू॥३॥

1.1815

कबि-कुल-जीवन पावन जानी। राम-सीय-जस मंगल-खानी॥
तेहि तैं मैं कछु कहा बखानी। करन पुनीत हेतु निज बानी॥४॥

1.1816

निज गिरा पावनि करन कारन, राम-जस तुलसी कह्यो।
रघुबीर चरित अपार बारिधि, पार कबि कवने लह्यो॥
उपबीत ब्याह उछाह मङ्गल, सुनि जे सादर गावहीँ।
वैदेहि राम-प्रसाद तें जन, सर्बदा सुख पावहीं॥४७॥

1.1817

सिय रघुबीर बिबाह, जे सप्रेम गावहिँ सुनहि।
तिन्ह कहँ सदा उछाह, मङ्गलायतन राम जस॥३६१॥

1.1818

इति श्रीरामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने<ब्र्>बिमल सन्तोषसम्पादनो नाम प्रथमः<ब्र्>सोपानः समाप्तः।
वामाङ्के च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके।
भाले बाल-विधुर्गले च गरलं यस्योरसि ब्यालराट्॥
यं भूतिविभूषणः सुरवरः सर्वाधिपः सर्बदा।
शर्वः सर्वगतः शिवः शशिनिमः श्रीशङ्करः पातुमाम्॥१॥

मूल पाठ: rāmacaritamānasa · Hindi Wikisource contributors · Sanskrit Wikisource · CC BY-SA 4.0

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