हरिनामचिन्तामणि · अध्याय 9
इति श्री- हरि-नाम-चिन्तामणौ अर्थ-वादापराध-विचारो
नाम अष्टमः परिच्छेदः ।
(9)
नवम परिच्छेद
नाम-बले पाप-बुद्धि
नाम्नो बलाद् यस्य हि पाप-बुद्धिर्
न विद्यते तस्य यमैर् हि शुद्धिः
गौर गदाधर जय जाह्नवा-जीवन ।
जय जय सीताद्वैत जय भक्त-गण
नाम-ग्रहणे समस्त अनर्थ दूर हय
हरिदास बले नाम शुद्ध सत्त्व मय ।
भाग्यवान् जीव करे नामेर आश्रय
अति शीघ्र ताहार अनर्थ दूरे याय ।
हृदय-दौर्बल्य आर स्थान नाहि पाय
नामे दृढ हैले नाहि हय पापे मति ।
पूर्व पाप दग्ध हय चित्त शुद्ध अति
पाप आर पाप-बीज पापेर वासना ।
अविद्या ताहार मूल ए तिन यन्त्रना
सर्व जीवे दया आसि ह-इबे उदय ।
जीवेर मङ्गल चेष्टा सतत करय
जीवेर सन्ताप कभु सहिते ना पारे ।
याहे पर-ताप याय तार चेष्टा करे
विषय-पिपासा अति तुच्छ मने हय ।
इन्द्रिय-लालसा तार चित्ते नाहि रय
कनक-कामिनी चेष्टा प्रति घृणा करे ।
यथा धर्म लाभे तुष्ट थाकि प्राण धरे
भक्ति अनुकूल सब करये स्वीकार ।
भक्ति प्रतिकूल नाहि करे अङ्गीकार
कृष्ण रक्षा कर्ता एक मात्र बलि जाने ।
जीवने पालन-कर्ता कृष्ण इहा माने
अहं मम बुद्ध्य्-आसक्ति ना राखे हृदये ।
दीन-भावे नाम लय सकल समये
स्वभावतः यार एइ रूप नामाश्रय ।
पापे मति पापाचार ताहार कि हय
पूर्व-पाप ओ पाप-गन्ध शीघ्र दूर हय
पूर्व दृष्ट-भाव तार क्रमे हय क्षीण ।
पवित्र स्वभाव शीघ्र ह-इबे प्रवीण
एइ सन्धि काले पूर्व पापेर सम्बन्ध ।
थाकिते-ओ पारे किछु दिन पाप गन्ध
नामेर संसर्गे यत सुमति उदय ।
हये सेइ पाप गन्ध शीघ्र करे क्षय
प्रतिज्ञा करेछ नाथ अर्जुन निकटे ।
मोर भक्त कभु नाहि पडिबे सङ्कटे
सङ्कट समये आमि ह-इब सहाय ।
अतएव पाप याय तोमार कृपाय
ज्ञान मार्गी कष्टे पाप करिया दमन ।
तवाश्रय छाडि शीघ्र हय त पतन
तव पदाश्रय यार सेइ महाजन ।
विघ्न ना पाइबे कभु सिद्धान्त वचन
प्रमादे पाप उपस्थित ह-इले ताहार प्रायश्चित्तेर प्रयोजन नाइ
यदि कभु प्रमादे घटय कोन पाप ।
भक्त तबु नाहि सहे प्रायश्चित्त ताप
से पाप क्षणिक नाहि पाय अवस्थिति ।
नाम रसे भेसे याय ना देय दुर्गति
नाम-बले पापाचरण-कारीर परिणाम
किन्तु यदि कोन जन नामे करि बल ।
आचरे नूतन पाप, से जन चञ्चल
से केवल कपटता करिया आश्रय ।
नाम-अपराध पाय शोक-मृति-भय
प्रमाद ओ विचारित कर्मेर भेद
प्रमाद घटना आर विचारित कर्मे ।
सम्पूर्ण प्रभेद आछे भक्ति-शास्त्र मर्मे
नामाश्रयीर पाप करा दूरे थाकुक, पापे मति ह-इले-इ नामापराध हय
संसारी मानव येबा आचरये पाप ।
प्रायश्चित्त आछे तार आर अनुताप
किन्तु नाम-बले यदि पापे करे मति ।
प्रायश्चित्त नाहि तार बड-इ दुर्गति
बहु यम यातनादि पाइले-ओ तार ।
सेइ अपराध ह-इते ना हय उद्धार
पाप मति-मात्रे हय ए-रूप यन्त्रना ।
पापाचारे यत दोषे तार कि गणना
प्रवञ्चक शठेर नाम-भरसाय पाप-क्रिया मर्कट-वैराग्य मात्र
शास्त्रे शुनियाछे नाम यत पाप हरे ।
कोटि जन्मे महा पापी करिते ना पारे
पञ्च विध पाप महा पातक अवधि ।
नामाभासे याय शास्त्र गाय निरवधि
सेइ त भरसा करि प्रवञ्चक जन ।
शठता करिया नाम करये ग्रहण
कष्टेर संसार छाडि वैरागीर वेशे ।
कनक कामिनी आशे फिरे देशे देशे
तुमि त बलेछ प्रभु मर्कट वैरागी ।
कामिनी सम्भाषि फिरे धर्म गृह त्यागी
निष्कपट नामाश्रय ना करिले एइ अपराध अनिर्वार्य
वैराग्येर छले केह गृहे काटे काल ।
सम्भाष्य ना हय सब विश्वेर जञ्जाल
गृहे थाकु वने याउ ताते नाहि दोष ।
निष्पापे करुक् नाम पाइया सन्तोष
नाम बले पाप मति महा अपराध ।
ताहाते मजिले हय भक्ति तत्त्वे बाध
नामाभासि-व्यक्ति-गण एइ कपट लोकेर सङ्गे अपराधी हन
नामाभासी जनेर कुसङ्ग यदि हय ।
तबे एइ अपराध घटिबे निश्चय
शुद्ध नामोदय यार हृदये ह-इबे ।
एइ नाम अपराध तार ना घटिबे
शुद्ध नामाश्रित व्यक्तिर दश विध अपराध स्पर्श करे ना
शुद्ध-नामाश्रित जने अपराध दश ।
कोन रूपे कोन काले ना करे परश
नामाश्रित जने नाम सदा रक्षा करे ।
अपराध कभु तार ना ह-इते पारे
यत दिन शुद्ध नाम ना हय उदय ।
तत दिन अपराध आक्रमणे भय
अतएव नामाभासी यदि भाल चाय ।
नाम बले पाप बुद्धि ह-इते पलाय
कत दिन सावधाने अपराध परित्याग करा चाइ ?
शुद्ध-नामाश्रित-जन-सङ्ग-बल धरिऽ ।
अपराध स-तर्कता सर्वदा आचरिऽ
शुद्ध-नाम यार मुखे तार दृढ मन ।
कृष्ण हैते विचलित नहे एक क्षण
अतएव नाम बल यत दिन नय ।
तत दिन अपराधे करिबेक भय
विशेष यतने पाप बुद्धि दूर करिऽ ।
अहर्निशि मुखे बलिबेक हरि हरि
श्री-गुरु-कृपाय हबे सुसम्बन्ध-ज्ञान ।
कृष्ण-भक्ति कृष्ण-नाम ताहाते विधान
एइ अपराध ह-इले ताहार प्रतिकार
यद्यपि प्रमादे नाम-बले पाप-बुद्धि ।
शुद्ध वैष्णवेर सङ्गे करि तार शुद्धि
पाप-स्पृहा बाटपाड पथे आसिऽ धरे ।
विशुद्ध वैष्णव गण पथ रक्षा करे
उच्चैः-स्वरे डाकि रक्षकेर नाम धरिऽ ।
पलाइबे बाटपाड आसिबे प्रहरी
आदरे बलिबे भाइ नाहि कर भय ।
आमि त रक्षक तव शुन महाशय
केवल वैष्णव-पद-दास्य-व्रत यार ।
हरिनाम-चिन्तामणि पाय सेइ छार
मूल पाठ: Harināmacintāmaṇi · Data entry n.n. · GRETIL (Göttingen) · CC BY-NC-SA 4.0