हरिनामचिन्तामणि · अध्याय 10
इति श्री- हरि-नाम-चिन्तामणौ नाम-बले पाप-बुद्धिर्
नाम नवमः परिच्छेदः ।
(10)
दशम परिच्छेद
अश्रद्दधाने विमुखे ऽप्य् अशृण्वति
यश् चोपदेशः शिव-नामापराधः
गौर गदाधर जय जाह्नवा-जीवन ।
जय जय सीताद्वैत जय भक्त-गण
कर युडिऽ हरिदास बलेन वचन ।
आर नाम अपराध करह श्रवण
नामे दृढ विश्वासके श्रद्धा बलि, ताहा ह-इले-इ नामे अधिकार हय
याहार हृदये श्रद्धा ना ह-इल उदय ।
नाम नाहि शुने बहिर्मुख दुराशय
ना जन्मे से जनार नामे अधिकार ।
श्रद्धा मात्र अधिकार एइ तत्त्व-सार
सज्जाति, सत्-कुल, ज्ञान, बल, विद्या धन ।
नामे अधिकार दिते ना हय कारण
नामेर माहात्म्य येइ सुदृढ विश्वास ।
शास्त्र-मते श्रद्धा सेइ सर्वत्र प्रकाश
श्रद्धा-हीन जनके नाम दिले नामापराधी हय
श्रद्धा नाहि जन्मे यार हरि नाम तारे ।
साधु जन नाहि देन वैष्णव आचारे
श्रद्धा हीन जन यदि हरि नाम पाय ।
अवज्ञा करिबे मात्र सर्व शास्त्रे गाय
शूकरके दिले रत्न से चूर्ण करिबे ।
बानरके दिले वस्त्र छिङ्डिया फेलिबे
श्रद्धा हीन पेये नाम अपराध मरे ।
सङ्गे सङ्गे गुरुके अभक्त शीघ्र करे
श्रद्धा हीन व्यक्ति नाम पाइते प्रार्थना करिले ताहार सहित कि रूपे व्यवहार करा उचित
श्रद्धा विरहित जन शठता करिया ।
हरि नाम मागे वैष्णवेर काछे गिया
ताहार वञ्चना वाक्य बुझि साधु जन ।
हरि नाम नाहि देन तारे कदाचन
साधु बले ओहे भाइ शाठ्य परिहर ।
प्रतिष्ठाशा दूरे राखि नामे श्रद्धा कर
नामे श्रद्धा हैले नाम अनायासे पाबे ।
नामेर प्रभावे ए संसारे तरे याबे
यत दिन नाहि तव नामे श्रद्धा भाइ ।
नाम लैते तोमार त अधिकार नाइ
श्री नाम माहात्म्य साधु शास्त्र मुखे शुन ।
प्रतिष्ठाशा छाडि दैन्य करह ग्रहण
नामे श्रद्धा हले तबे गुरु महाजन ।
नाम अर्पिबेन भाइ नाम महा धन
श्रद्धा हीन जने अर्थ लोभे नाम दिया ।
नरकेते याय नामापराध मजिया
एइ अपराधेर प्रतिकार
प्रमादे यद्यपि नाम उपदेश हय ।
श्रद्धा हीने तबे गुरु पाय महा भय
वैष्णव समाजे ताहा करि विज्ञापन ।
सेइ दुष्ट शिष्य त्याग करे महा जन
ताहा ना करिले गुरु अपराध क्रमे ।
भक्ति हीन दुराचार हय माया भ्रमे
अतएव प्रभु यारे आदेश करिले ।
नाम प्रचारिते तारे एइ आज्ञा दिले
ए विषये प्रभुर आज्ञा
श्रद्धावान् जने कर नाम उपदेश ।
नाम महिमाय पूर्ण कर सर्व-देश
उच्च सङ्कीर्तने कर श्रद्धार प्रचार ।
श्रद्धा लभि जीव करे सद् गुरु विचार
सद् गुरु निकटे करे श्री नाम ग्रहण ।
अनायासे पाय तबे कृष्ण प्रेम धन
चोर वेश्या शठ आदि पापासक्त जने ।
छाडाइया पाप मति दिबे श्रद्धा धने
सुश्रद्ध हैले दिबे नाम उपदेश ।
एइ रूपे नाम दिया तार सर्व देश
एइ रूप अपराधेर फल
इहा ना करिया यिनि देन नाम धन ।
सेइ अपराधे ताङ्र नरके पतन
नाम पेये शिष्य करे नाम अपराध ।
ताहाते गुरुर हय भक्ति रस बाध
एइ नाम अपराधे दुङ्हे शिष्य गुरु ।
नरकेते याय एइ अपराध उरु
अग्रे श्रद्धा दिया नाम उपदेश दिबे
जगा माधा प्रति तुमि महा कृपा करि ।
नामे श्रद्धा दिया नाम दिले गौर हरि
अद्भुत चरित्र तव सर्व जन गण ।
श्रद्धाय करुक अनुकरण चरण
भक्त पाद भक्तिते विनोद याहार ।
हरि-नाम-चिन्तामणि अलङ्कार तार
मूल पाठ: Harināmacintāmaṇi · Data entry n.n. · GRETIL (Göttingen) · CC BY-NC-SA 4.0