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हरिनामचिन्तामणि · अध्याय 8

8.1

इति श्री- हरि-नाम-चिन्तामणौ श्रुति-निन्दा अपराध विचारो
नाम सप्तमः परिच्छेदः ।
(8)
अष्टम परिच्छेद
तथार्थ-वादो हरि-नाम्नि कल्पनम्
जय गौर गदाधर श्री-राधा-माधव ।
जय गौर-लीला-स्थली जाह्नवी वैष्णव

8.2

हरि नामे अर्थ वाद कल्पना चिन्तन ।
पञ्चमापराध प्रभो श्री शचीनन्दन

8.3

नाम महिमा
स्मृति कहे हेलाय श्रद्धाय नाम लय ।
कृष्ण तारे कृपा करि हयेन सदय

8.4

नामेर सदृश ज्ञान नाहिक निर्मल ।
नामेर सदृश व्रत नाहिक प्रबल

8.5

नामेर सदृश ध्यान नाहि ए जगते ।
नामेर सदृश फल नाहि कोन मते

8.6

नामेर सदृश त्याग कोन रूपे नय ।
नामेर सदृश सम कभु नाहि हय

8.7

नामेर सदृश पुण्य नाहि ए संसारे ।
नामेर सदृश गति ना देखि विचारे

8.8

नाम-इ परम मुक्ति नाम उच्च गति ।
नाम-इ परम शान्ति नाम उच्च स्थिति

8.9

नाम-इ परम भक्ति नाम शुद्धा मति ।
नाम-इ परम प्रीति नाम परा स्मृति

8.10

नाम-इ कारण तत्त्व नाम सर्व प्रभु ।
परम आराध्य नाम गुरु-रूपे विभु

8.11

कृष्ण-नामेर सर्वोत्तमता
सहस्र विष्णु नामेर तुल्य हय एक राम नाम ।
तिन राम नाम तुल्य एक कृष्ण नाम

8.12

नामेर अर्थ वाद नरक गमन अवश्य घटे
श्रुति गण नामेर माहात्म्य सदा गाय ।
नामेर चित्-तत्त्व बलि जगते जानाय

8.13

श्रुति स्मृति प्रदर्शित नामेर ये फल ।
ताहे अर्थ वाद करे पाषण्ड प्रबल

8.14

हरिनामे अर्थ वाद ये अधम करे ।
से पापिष्ठ नरकेते पचिऽ पचिऽ मरे

8.15

ये बले नामेर फल-श्रुति सत्य नय ।
नामे रुचि दिते मात्र तत फल कय

8.16

शास्त्रेर तात्पर्य आर जीव हिताहित ।
से अधम नाहि जाने बुझे विपरीत

8.17

नामेर फल सत्य । ताहाते अर्थ वादेर प्रयोजन नाइ
कर्म काण्ड आछे त कैतव स्वार्थ ज्ञान ।
भक्ति तत्त्वे नामे ताहा नहे विद्यमान

8.18

कर्म काण्ड फल श्रुति रोचनार्थ जानि ।
भक्ति तत्त्वे फल श्रुति नित्य सत्य मानि

8.19

नाम तत्त्वे शाठ्य नाहि पाय कभु स्थान ।
निजेर नाहिक स्वार्थ नाम करि दान

8.20

कर्म-फलेर अर्थ-वाद अपरित्याज्य
नाम दान श्रद्दावाने येइ जन करे ।
कृष्ण दास्य करे सेइ स्वार्थ परिहारे

8.21

कर्म कराइले याजकेर अर्थ लाभ ।
अतएव ताहे कैतवेर त प्रभाव

8.22

वेद स्मृति नाम फल अनन्त बाखाने ।
स्वार्थ बुद्धि शून्य से ये ताहा नाहि माने

8.23

कर्म सब शुभाशुभ जडेर आश्रये ।
जड-मय-फल याचे यजमान चये

8.24

कर्म फल दूरे फेलिऽ येबा करे कर्म ।
हृदय विशुद्ध तार हय एइ मर्म

8.25

विशुद्ध हृदये आत्म रति सुनिर्मल ।
उदय ह-इया हय क्रमशः प्रबल

8.26

नाम चिन्मय, ताहाते अर्थ-वाद ह-इते पारे ना
नाम सेइ आत्म-रति निजे उपस्थित ।
साधन कालेते साध्य वस्तुर विहित

8.27

कर्मेर चरम फल नाम-रस हय ।
साधु-रूपे अनुष्ठित कर्मेते निश्चय

8.28

अतएव चौद्द लोक भ्रमिया ब्राह्मण ।
येइ फल नाहि पान नाम ताहा हन

8.29

नाम फल सर्वोपरि अवश्य ह-इबे ।
कर्मी ज्ञानी हिंसा करिऽ नामे कि करिबे

8.30

नामाभासे सर्व कर्म ओ ब्रह्म-ज्ञानेर फल ह-इया थाके
सर्व-कर्म-फल नामाभासे लब्ध हय ।
सर्व-ज्ञान-फल नामाभासेते मिलय

8.31

आभासे मिलिल यदि एत उच्च फल ।
नाम वस्तु ततोऽधिक प्रदाने प्रबल

8.32

अतएव शास्त्रे यत नाम फल गाय ।
शुद्ध नामाश्रित जन निश्चय ता पाय

8.33

नाम फले याहार सन्देह, ताहार मङ्गल नाइ
इहाते सन्देह यार से अधम जन ।
नाम अपराधे तार अवश्य पतन

8.34

वेदे रामायणे आर भारते पुराणे ।
आदि अन्त्ये मध्ये हरिनामेरे बाखाने

8.35

नाम फल श्रुति वाक्य अनादि निश्चल ।
ताहे अर्थ वाद कल्पनार किबा फल

8.36

कर्म-ज्ञानेर शक्ति अपेक्षा नामे अनन्त-गुण शक्ति आछे
नाम नामी एक नामे दिया सर्व शक्ति ।
सर्वोपरि करियाछ तव नाम शक्ति

8.37

तुमि त स्वतन्त्र तत्त्व सर्व शक्तिमान् ।
तोमार इच्छाय यत विधिर विधान

8.38

कर्मके करेछ जड आर ब्रह्म ज्ञाने ।
दियाछ निर्वाण शक्ति स्वतन्त्र विधाने

8.39

इच्छामय तुमि प्रभु स्वीय नामाक्षरे ।
अर्पियाछ सब शक्ति आर के कि करे

8.40

अतएव तव नाम सर्व शक्तिमान् ।
नामे अर्थ-वाद नाहि करिबे विद्वान्

8.41

तद्-अपराधेर प्रतिकार
नामे अर्थ-वाद अपराध घटे यदि ।
दन्ते तृण धरि याइ वैष्णव-संसदि

8.42

अपराध जानाइया वैष्णव-चरणे ।
क्षमा मागि काकुति करिया ऋजु-मने

8.43

नामेर महिमा ज्ञाता भागवत जन ।
क्षमा करि कृपा करि दिबे आलिङ्गन

8.44

नामे अर्थ वाद आर कल्पन-मनन ।
कभु नाहि हबे चित्ते माया विडम्बन

8.45

अर्थ-वाद-कारी सह हैले सम्भाषण ।
स-चेले जाह्नवी-जले करिब मज्जन

8.46

कृष्ण प्रिया वंशी कृपा भरसा याहार ।
हरिनाम चिन्तामणि तार अलङ्कार

मूल पाठ: Harināmacintāmaṇi · Data entry n.n. · GRETIL (Göttingen) · CC BY-NC-SA 4.0

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