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ग्रंथ पाठ

हरिनामचिन्तामणि · अध्याय 7

7.1

इति श्री- हरि-नाम-चिन्तामणौ गुर्व्-अवज्ञा-विचारो
नाम षष्ठः परिच्छेदः ।
(7)
सप्तम परिच्छेद
श्रुति-शास्त्र-निन्दनम्
जय जय गदाइ गौराङ्ग नित्यानन्द ।
जय सीतापति जय गौर-भक्त-वृन्द

7.2

हरिदास बले प्रभु चतुर्थापराध ।
श्रुति-शास्त्र-विनिन्दन भक्ति-रस-बाध

7.3

आम्नाय-इ एक-मात्र प्रमाण
श्रुति-शास्त्र वेद उपनिषत् पुराण ।
कृष्ण-निश्वसित हय सर्वत्र प्रमाण

7.4

विशेषतः अप्राकृत-तत्त्वे ज्ञान यत ।
सकलि आम्नाय सिद्ध ताहे ह-इ रत

7.5

जडातीत वस्तु इन्द्रियेर अगोचर ।
कृष्ण-कृपा विना ताहा ना हय गोचर

7.6

करणापटव भ्रम विप्रलिप्सा आर ।
प्रमाद सर्वत्र नर ज्ञाने दोष एइ चार

7.7

सेइ सब दोष शून्य वेद चतुष्टय ।
वेद विना परमार्थे गति नाहि हय

7.8

माया बद्ध जीवे कृष्ण बहु कृपा करि ।
वेद पुराणादि दिल आर्ष ज्ञान धरि

7.9

आम्नाय हैते दश मूल शिक्षा प्रमेय नयटा
सेइ श्रुति शास्त्रे जानि कर्म ज्ञान छार ।
निर्मल भक्तिते मात्र पाइ सर्व सार

7.10

माया मूढ जीवे कर्म ज्ञाने शुद्ध करि ।
शुद्ध भक्ति अधिकार शिखाइला हरि

7.11

प्रमाण से वेद वाक्य नयटी प्रमेय ।
शिखाय सम्बन्ध प्रयोजन अभिधेय

7.12

एइ दश मूल सार अविद्या विनाश ।
करिया जीवेर करे सुविद्या प्रकाश

7.13

1. हरि एक पर तत्त्व, 2. तिनि सर्व शक्तिमान्, 3. तिनि रस मूर्ति
प्रथमे शिखाय पर तत्त्व एक हरि ।
श्याम सर्व-शक्तिमान् रस-मूर्ति-धारी

7.14

जीवेर परमानन्द करेन विधान ।
संव्योम धामेते तार नित्य अधिष्ठान

7.15

ए तिन प्रमेय हय श्री-कृष्ण-विसये ।
वेद-शास्त्र शिक्षा देन जीवेर हृदये

7.16

4. जीव-तत्त्व
द्वितीये शिखाय विभिन्नांश जीव तत्त्व ।
अनन्त सङ्ख्यक चित् परमाणु सत्त्व

7.17

5. नित्य-बद्ध ओ 6. नित्य मुक्त भेदे जीव दुइ प्रकार
नित्य बद्ध नित्य मुक्त भेदे जीव द्वि-प्रकार ।
संव्योम ब्रह्माण्ड भरि संस्थिति ताहार

7.18

बद्ध जीव
बद्ध जीव माया भजि कृष्ण बहिर्मुख ।
अनन्त ब्रह्माण्डे भोग करे दुःख सुख

7.19

मुक्त जीव
नित्य मुक्त कृष्ण भजि कृष्ण पारिषद ।
पर व्योमे भोग करे प्रेमेर सम्पद

7.20

तिन-टी प्रमेय एइ जीवेर विषये ।
श्रुति शास्त्र शिक्षा देन कृष्ण दासी हये

7.21

7. अचिन्त्य भेदाभेद सम्बन्ध
चिद्-व्यापार आर यत जडेर व्यापार ।
सकलि अचिन्त्य भेदाभेद प्रकार

7.22

जीव जड सर्व वस्तु कृष्ण शक्ति मय ।
अविचिन्त्य भेदाभेद श्रुति शास्त्रे कय

7.23

एइ ज्ञाने जीव जाने आमि कृष्ण दास ।
कृष्ण मोर नित्य प्रभु चित् सूर्य प्रकाश

7.24

शक्ति परिणाम मात्र वेद शास्त्र बले ।
विवर्तादि दुष्ट-मते वेद निन्दे छले

7.25

सात-टी प्रमेय सम्बन्ध ज्ञान
एइ त सम्बन्ध ज्ञान सात-टी प्रमेय ।
श्रुति-शास्त्र शिक्षा देन अति उपादेय

7.26

वेद पुनः शिक्षा देन अभिधेय सार ।
नव विध कृष्ण भक्ति विधि राग आर

7.27

8. अभिधेय - नव विध भक्ति
श्रवण कीर्तन स्मृति पूजन वन्दन ।
परिचर्या दास्य सख्य आत्म-निवेदन

7.28

भक्तिर प्रकार मध्ये नाम सर्व-सार ।
प्रणव-माहात्म्य वेद करेन प्रचार

7.29

9. प्रयोजन कृष्ण प्रेम
शुद्ध भक्ति समाश्रय करिया मानव ।
कृष्ण कृपा बले पाय प्रेमेर वैभव

7.30

एइ श्रुति शिक्षा निन्दा अपराध
ए नव प्रमेय श्रुति करेन प्रमाण ।
श्रुति तत्त्वाभिज्ञ गुरु करेन सन्धान

7.31

ए हेन श्रुतिर येइ करे विनिन्दन ।
नाम अपराधी सेइ नराधम जन

7.32

वेद विरुद्ध वाद समूह
जैमिनि कपिल नग्न नास्तिक सुगत ।
गौतम - ए छय जन हेतु वादे रत

7.33

वेद माने मुखे तबु ईश नाहि माने ।
कर्म काण्ड श्रेष्ठ बलि जैमिन् बाखाने

7.34

ईश्वर असिद्ध कपिलेर कल्पनाय ।
तबु योग माने अर्थ बुझा नाहि याय

7.35

नग्न से तामस तत्त्व करय विस्तार ।
वेदेर विरुद्ध धर्म करये प्रचार

7.36

नास्तिक चार्वाक कभु वेद नाहि माने ।
सुगत बौद्धेरा एक प्रकार बाखाने

7.37

गौतम न्यायेर कर्ता ईश्वर ना भजे ।
तार हेतु वाद मते नर मात्र मजे

7.38

एइ सब मतवाद द्वारा श्रुति-निन्दा हय
एइ सब दुष्ट मते श्रुतिर निन्दन ।
कभु स्पष्ट कभु गुप्त बुझे विज्ञ जन

7.39

एइ सब मते थाकि अपराधी हय ।
अतएव एइ सबे त्यजिबे निश्चय

7.40

मायावादी अति दुष्ट मत - वेद विरुद्ध
एइ सब कुमत छाडि आर मायावाद ।
शुद्ध भक्ति अनुभवि हय निर्विवाद

7.41

मायावाद असत् शास्त्र गुप्त बौद्ध मत ।
वेदार्थ विकृति कलि कालेते सम्मत

7.42

उमापति ब्राह्मण रूपेते प्रकाशिल ।
तोमार आज्ञाय तेङ्ह आचार्य ह-इल

7.43

जैमिनि ये रूप मुखे वेद मात्र माने ।
श्रुतिर विकृत अर्थ जगते बाखाने

7.44

मायावादी गुरु सेइ रूप बौद्ध धर्म ।
वेद वाक्ये स्थापि आच्छादिल भक्ति मर्म

7.45

एइ सब मतवादे भक्ति दूरे याय ।
श्री-कृष्ण-नामेते जीव अपराध पाय

7.46

श्रुति-विचारे शुद्ध प्रक्रिया
श्रुतिर अभिधा वृत्ति करि संयोजन ।
शुद्ध भक्ति जीव पाय प्रेम धन

7.47

श्रुतिते लक्षणा करे अयथा प्रकारे ।
नित्य सत्य दूरे याय अपराधे मरे

7.48

सर्व वेद सम्मत प्रणव कृष्ण नाम ।
सेइ नामे जीव सब पाय नित्य धाम

7.49

प्रणव से महावाक्य हय कृष्ण नाम ।
ताहाते-इ श्री-भक्तेर सतत विश्राम

7.50

वेद बले नाम चित् स्वरूप जगते ।
नामेर आभासे सिद्ध हय सर्व मते

7.51

वेद केवल शुद्ध नाम भजन शिक्षा देन
एइ सब वेद शिक्षा अभागा ना माने ।
नामे अपराध करे वेदेर निन्दने

7.52

शुद्ध नाम परायण येइ महाजन ।
वेदाश्रये पाय नाम रस प्रेम धन

7.53

सर्व वेद बले गाओ हरि-नाम सार ।
पाइबे परमा प्रीति आनन्द अपार

7.54

वेद पुनः बले यत मुक्त महाजन ।
पर-व्योमे सदा करे नाम सङ्कीर्तन

7.55

तामस-तन्त्र शिक्षा वेद विरुद्ध
कलि युगे महा जन माया शक्ति भजे ।
चिद् आत्मा पुरुष कृष्ण नाम रस त्याजे

7.56

तामसिक तन्त्र धरि श्रुति निन्दा करे ।
मद्य-मांसे प्रीति करि अधर्मेते मरे

7.57

से सब निन्दुक नाहि पाय कृष्ण नाम ।
कभु नाहि पाय कृष्णेर वृन्दावन धाम

7.58

माया देवीर निष्कपट कृपा-इ प्रयोजन
माया देवी से सब पाषण्डे अधोगति ।
दिया नामामृत आर नाहि देन मति

7.59

तबे यदि साधु सेवाय तुष्ट हन माया ।
अकपटे देन तबे कृष्ण पद छाया

7.60

माया कृष्ण दासी बहिर्मुख जीवे दण्डे ।
माया पूजिले-ओ शुभ नाहि पाय भण्डे

7.61

कृष्ण नाम करे येइ माया देवी तारे ।
निष्कपटे कृपा करि लय भव पारे

7.62

अतएव श्रुति-निन्दा अपराध त्यजि ।
अहरहः नाम सङ्कीर्तन रसे मजि

7.63

तद्-अपराधेर प्रतिकार
प्रमादे यद्यपि हय से श्रुति-निन्दन ।
अनुतापे करि पुनः से श्रुति वन्दन

7.64

कुसम तुलसी दिया सेइ श्रुति गणे ।
भागवत सह सदा पूजिब यतने

7.65

भागवत श्रुति सार कृष्ण अवतार ।
अवश्य करिबे मोरे करुणा अपार

7.66

हरिदास पद रजः भरसा याहार ।
नाम-चिन्तामणि हार गलाय ताहार

मूल पाठ: Harināmacintāmaṇi · Data entry n.n. · GRETIL (Göttingen) · CC BY-NC-SA 4.0

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