हरिनामचिन्तामणि · अध्याय 4
इति श्री- हरि-नाम-चिन्तामणौ नामाभास-वर्णनं नाम
तृतीयः परिच्छेदः ।
(4)
चतुर्थ परिच्छेद
नाम अपराध-साधु निन्दा
सतां निन्दा नाम्नः परमम् अपराधं वितनुते
यतः ख्यातिं यातं कथम् उ सहते तद्-विगर्हाम् ।
गदाधर-प्राण जय जाह्नवा-जीवन ।
जय सीतानाथ श्रीवासादि भक्त-जन
प्रभु बले हरिदास एबे स-विस्तारे ।
नाम अपराध व्याख्या कर अतःपर
हरिदास बले प्रभु मोरे या बलाबे ।
ताहाइ बलिब आमि तोमार प्रभावे
दश-विध नामापराध
नाम अपराध दश-विध शास्त्रे कय ।
सेइ अपराधे मोर बड हय भय
एक एक करि आमि बलिब सकल ।
अपराधे वाङ्चि याते देह मोरे बल
साधु-निन्दा अन्य-देव स्वातन्त्र्य मनन ।
नाम तत्त्व गुरु आर शास्त्र विनिन्दन
हरिनामे अर्थ वाद कल्पित मनन ।
नाम-बले पाप श्रद्धा-हीने नामार्पण
अन्य शुभ-कर्मेर समान कृष्ण-नाम ।
ए कथा बलिले अपराध अविश्राम
नामेते अनवधान हय अपराध ।
ताहाके पुराण कर्ता बलेन प्रमाद
नामेर माहात्म्य जाने तबु नाहि भजे ।
अहं मम आसक्तिते संसारेते मजे
साधु-निन्दाइ प्रथम अपराध
साधु-निन्दा प्रथमापराध बलिऽ जानि ।
एइ अपराधे जीवेर हय सर्व हानि
स्वरूप ओ तटस्थ लक्षण भेदे साधु लक्षण द्वय विचार
साधुर लक्षण तुमि बलियाछ प्रभो ।
एकादशे उद्धवेरे कृष्ण-रूपे विभो
दयालु सहिष्णु सम द्रोह-शून्य-व्रत ।
सत्य-सार विशुद्धात्मा पर-हिते रत
कामे अक्षुभित बुद्धि दान्त अकिञ्चन ।
मृदु शुचि परिमित-भोजी शान्त-मन
अनीह धृतिमान् स्थिर कृष्णैक-शरण ।
अप्रमत्त सुगम्भीर विजित षड्-गुण
अमानी मानद दक्ष अवञ्चक ज्ञानी ।
एइ सब लक्षणेते साधु बलि जानि
एइ सब लक्षण प्रभो हय द्वि-प्रकार ।
स्वरूप तटस्थ भेदे करिब विचार
स्वरूप-लक्षण-इ प्रधान लक्षण, तद्-आश्रये तटस्थ लक्षण उदय हय
कृष्णैक-शरण हय स्वरूप-लक्षण ।
तटस्थ लक्षणे अन्य गुणेर गणन
कोन भाग्ये साधु-सङ्गे नामे रुचि हय ।
कृष्ण-नाम गाय करे कृष्ण-पादाश्रय
स्वरूप लक्षण सेइ ह-इत ह-इल ।
गाइते गाइते नाम अन्य गुण आइल
अन्य गुण-गण ताइ तटस्थ गणन ।
अवश्य वैष्णव देहे हबे सङ्घटन
वर्णाश्रम लिङ्ग, नाना-प्रकार वेष-द्वारा साधुत्व हय ना,
कृष्णैक-शरणताइ साधुर लक्षण
वर्णाश्रम चिह्न नाना-वेषेर रचना ।
साधुर लक्षणे कभु ना हय गणना
श्री-कृष्ण-शरणागति साधुर लक्षण ।
तार मुखे हय कृष्ण-नाम-सङ्कीर्तन
गृही ब्रह्मचारी वानप्रस्थ न्यासि-भेदे ।
शूद्र वैश्य क्षत्र विप्र-गणेर प्रभेदे
साधुत्व कखन नाहि ह-इबे निर्णीत ।
कृष्णैक-शरण साधु शास्त्रेर विहित
गृहि-साधु-लक्षण
रघुनाथ-दासे लक्ष्ये करिया सेवार ।
गृहि-साधु-जने शिखायेछ एइ सार
स्थिर हये घरे याओ ना हओ बातुल ।
क्रमे क्रमे पाय लोक भव-सिन्धु-कुल
मर्कट वैराग्य छाड लोक देखाइया ।
यथायोग्य विषय भुञ्ज अनासक्त हञा
अन्तरे निष्ठा कर बाह्ये लोक व्यवहार ।
अचिरे श्री-कृष्ण तोमाय करिबे उद्धार
गृह-त्यागी साधु-लक्षण
पुनः तुमि तार देखि वैराग्य ग्रहण ।
एइ मत शिक्षा दिले अपूर्व श्रवण
ग्राम्य-कथा ना शुनिबे ग्राम्य-वार्ता ना कहिबे ।
भाल ना खाइबे आर भाल ना परिबे
अमानी मानद हञा कृष्ण-नाम सदा लबे ।
व्रजे राधा-कृष्ण-सेवा मानसे करिबे
गृही ओ गृह-त्यागी - उभयेर-इ स्वरूप लक्षण
स्वरूप लक्षण एक सर्वत्र समान ।
आश्रमादि भेदे पृथक् तटस्थ विधान
अनन्य-शरणे यदि देखि दुराचार ।
तथापि से साधु बलि सेव्य सबाकार
एइ त श्री-कृष्ण-वाक्य गीता-भागवते ।
इहाके पूजिब यत्ने सदा सर्व मते
इहाते आछे त एक निगूढ सिद्धान्त ।
कृपा करि जानायेछ ताइ पाइ अन्त
पूर्व-पापेर गन्धावशेष ओ पूर्व-पाप लक्ष्य करिया यिनि कृष्णैक-शरण साधुर निन्दा करेन, तिनि नामापराधी
कृष्ण-नामे रुचि यबे ह-इबे उदय ।
एक नामे पूर्व पाप ह-इबेक क्षय
पूर्व-पाप गन्ध तबु थाके किछु दिन ।
नामेर प्रभावे क्रम हञा पडे क्षीण
शीघ्र सेइ पाप-गन्ध विदूरित हय ।
परम धर्मात्मा बलि हय परिचय
ये कयेक दिन सेइ गन्ध नाहि याय ।
साधारण जन चक्षे पाप बलि भाय
से पाप देखिया येइ साधु-निन्दा करे ।
पूर्व-पाप लक्षि पुनः अवज्ञा आचरे
सेइ त पाषण्डी वैष्णवेर निन्दा दोषे ।
नाम अपराध मजि पडे कृष्ण-रोषे
कृष्णैक-शरणताइ साधु लक्षण आपनाके साधु बलिया परिचय देओया दाम्भिकता
कृष्णैक-शरण मात्र कृष्ण-नाम गाय ।
साधु-नामे परिचित कृष्णेर कृपाय
कृष्ण-भक्त व्यतीत नाहिक साधु आर ।
आमि साधु बलि हय दम्भ अवतार
स्वल्पाक्षरे साधु-निर्णय
से बलिबे-आमि दीन कृष्णैक-शरण ।
कृष्ण-नाम यार मुखे साधु सेइ जन
तृण हैते हीन बलि आपनाके जाने ।
सहिष्णु तरुर न्याय आपनाके माने
निजे त अमानी आर सकले मानद ।
तार मुखे कृष्ण-नाम कृष्ण-रति-प्रद
नामापराध वैष्णव-इ साधु, तद्-देहे कृष्ण-शक्ति
हेन साधु-मुखे यबे शुनि एक नाम ।
वैष्णव बलिया तारे करिब प्रणाम
वैष्णव से जगद्-गुरु जगतेर बन्धु ।
वैष्णव सकल जीवे सदा कृपा सिन्धु
ए हेन वैष्णव-निन्दा येइ जन करे ।
नरके पडिबे से जन्म-जन्मान्तरे
भक्ति लभिबारे आर नाहिक उपाय ।
भक्ति लभे सर्व-जीव वैष्णव कृपाय
वैष्णव देहेते थाके श्री-कृष्णेर शक्ति ।
सेइ देह स्पर्शे अन्ये हय कृष्ण-भक्ति
वैष्णव अधरामृत आर पद जल ।
वैष्णवेर पद-रजः तिन महा-बल
वैष्णवेर शक्ति सञ्चार
वैष्णव-निकटे यदि बैसे कत-लक्षण ।
देह हैते हय कृष्ण-शक्ति निःसरण
सेइ शक्ति श्रद्धावान् हृदये पशिया ।
भक्तिर उदय करे देह काङ्पाइया
ये बसिल वैष्णवेर निकटे श्रद्धाय ।
ताहार हृदये भक्ति ह-इबे उदय
प्रथमे आसिबे तार मुखे कृष्ण-नाम ।
नामेर प्रभावे पाबे सर्व-गुण-ग्राम
वैष्णवेर कि कि दोष धरिले वैष्णव-निन्दा हय-जाति-दोष पूर्व-दोष नष्ट-प्राय अवशिष्ट दोष कादाचित्क दोष
वैष्णवेर जाति आर पूर्व दोष धरे ।
कादाचित्क दोष देखि येइ निन्दा करे
नष्ट-प्राय दोष लये करे अपमान ।
यम-दण्डे कष्ट पाय से सब अज्ञान
वैष्णवेर मुखे नाम-माहात्म्य-प्रचार ।
से वैष्णव-निन्दा कृष्ण नाहि सहे आर
धर्म योग याग ज्ञान-काण्ड परिहरि ।
ये भजिल कृष्ण-नाम सेइ सर्वोपरि
अन्य देव शास्त्र निन्दादि-शून्य नामाश्रयी साधु
अन्यदेर अन्य-शास्त्र ना करि निन्दन ।
नामेर आश्रय लय शुद्ध साधु-जन
से साधु गृहस्थ ह-उ अथवा सन्न्यासी ।
ताहार चरण-रेणु पाइते प्रयासी
याब यत नामे रति से तत वैष्णव ।
वैष्णवेर क्रम एइ मते अनुभव
इथे वर्णाश्रम धन पाण्डित्य यौवन ।
कोन कार्य नाहि करे रूप बल जन
अतएव यिनि करिलेन नामाश्रय ।
साधु-निन्दा छाडिबेन ए धर्म निश्चय
नामाश्रया शुद्धा भक्ति भक्त भक्ति-रूपा ।
भक्त भक्ति-विवर्जिता ह-इले विरूपा
याङ्हा साधु-निन्दा ताङ्हा नाहि भक्ति स्थिति ।
अतएव अपराधे तथा परिणति
साधु-निन्दा छाडि भक्त साधु-भक्ति करे ।
साधु-सङ्ग साधु-सेवा एइ धर्माचरे
असत्-सङ्ग दुइ प्रकार, तन्-मध्ये स्त्री-सङ्गी
असत्-सङ्ग-त्यागे हय वैष्णव-आचार ।
असत्-सङ्गे हय साधु-अवज्ञा अपार
असत् ये द्वि-प्रकार सर्व-शास्त्रे कय ।
सेइ दुइयेर मध्ये योषित्-सङ्गी एक हय
योषित्-सङ्गि-सङ्गी पुनः तार मध्ये गण्य ।
तार सङ्ग-त्यागे जीव ह-इबेक धन्य
योषित्-सङ्गी काहाके बले
कृष्णेरे संसारे ये दाम्पत्य धर्म थाके ।
असत् बलिया शास्त्र ना बले ताहाके
अधर्म संयोगे आर स्त्रैण भावे रत ।
योषित्-सङ्गी जन दुष्ट शास्त्रेर सम्मत
द्वितीय प्रकार असत् (कृष्णेते अभक्त) तिन प्रकार
कृष्णेते अभक्त - असत् द्वितीय प्रकार ।
मायावादी धर्म-ध्वजी निरीश्वर आर
यिनि बलेन, एइ सब लोकेर निन्दाके-ओ साधु-निन्दा बले तिनि-ओ वर्ज्य
वर्जिले ए सब सङ्ग साधु-निन्दा नय ।
इहाके ये निन्दा बले सेइ वर्ज्य हय
एइ सब सङ्ग छाडि अनन्य-शरण ।
कृष्ण-नाम करि पाय कृष्ण-प्रेम-धन
वैष्णवाभास, प्राकृत-वैष्णव, वैष्णव-प्राय ओ कनिष्ठ-वैष्णव-एइ सकल एक-इ कथा
साधु-सेवा-हीन अर्चे लौकिक श्रद्धाय ।
प्राकृत वैष्णव हय वैष्णवेर प्राय
वैष्णव-आभास सेइ नहे तऽ वैष्णव ।
केमने पाइबे साधु-सङ्गेर वैष्णव
अतएव कनिष्ठ मध्येते तारे गणि ।
तारे कृपा करिबेन वैष्णव आपनि
मध्यम वैष्णव
कृष्ण-प्रेम कृष्ण-भक्ते मैत्री आचरण ।
बालिशेते कृपा आर द्वेषी उपेक्षण
करिले मध्यम भक्त शुद्ध भक्त हन ।
कृष्ण-नाम्ने अधिकार करेन अर्जन
उत्तम वैष्णव
सर्वत्र याङ्हार हय कृष्ण-दरशन ।
कृष्णे सकलेर स्थिति कृष्ण प्राण धन
वैष्णवावैष्णव-भेद नाहि थाके ताङ्र ।
वैष्णव उत्तम तिनि कृष्ण-नाम-सार
मध्यम वैष्णव-इ साधु सेवा करेन
अतएव मध्यम वैष्णव महाशय ।
साधु सेवा रत सदा थाकेन निश्चय
प्राकृत वैष्णव नामाभासेर अधिकारी
प्राकृत वैष्णव येइ वैष्णवेर प्राय ।
नामाभासे अधिकारी सर्व-शास्त्र पाय
मध्यम वैष्णव नामाधिकारी ओ नामापराध विचार करिबेन
मध्यम वैष्णव मात्र नामे अधिकारी ।
श्री-नाम-भजने अपराधेर विचारी
उत्तम वैष्णवे अपराध असम्भव ।
सर्वत्र देखेन तिनि कृष्णेर वैभव
निज निज अधिकार करिया विचार ।
साधु-निन्दा अपराध करि परिहार
साधु सङ्ग साधु सेवा नाम सङ्कीर्तन ।
सर्व जीवे दया एइ भक्त आचरण
साधु निन्दा घटिले कि करा कर्तव्य ?
प्रमादे यद्यपि घटे साधु-विगर्हण ।
तबे अनुतापे धरि से साधु-चरण
काङ्दिया बलिब प्रभो क्षमि अपराध ।
ए दुष्ट-निन्दके कर वैष्णव-प्रसाद
साधु बड दयामय तबे आर्द्र-मने ।
क्षमिबेन अपराध कृपा आलिङ्गने
एइ त प्रथम अपराधेर विचार ।
श्री-चरणे निवेदिनु आज्ञा अनुसार
हरि-दास पाद-पद्मे भ्रर ये जन ।
हरि-नाम-चिन्तामणि ताहार जीवन
मूल पाठ: Harināmacintāmaṇi · Data entry n.n. · GRETIL (Göttingen) · CC BY-NC-SA 4.0