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ग्रंथ पाठ

हरिनामचिन्तामणि · अध्याय 4

4.1

इति श्री- हरि-नाम-चिन्तामणौ नामाभास-वर्णनं नाम
तृतीयः परिच्छेदः ।
(4)
चतुर्थ परिच्छेद
नाम अपराध-साधु निन्दा
सतां निन्दा नाम्नः परमम् अपराधं वितनुते
यतः ख्यातिं यातं कथम् उ सहते तद्-विगर्हाम् ।
गदाधर-प्राण जय जाह्नवा-जीवन ।
जय सीतानाथ श्रीवासादि भक्त-जन

4.2

प्रभु बले हरिदास एबे स-विस्तारे ।
नाम अपराध व्याख्या कर अतःपर

4.3

हरिदास बले प्रभु मोरे या बलाबे ।
ताहाइ बलिब आमि तोमार प्रभावे

4.4

दश-विध नामापराध
नाम अपराध दश-विध शास्त्रे कय ।
सेइ अपराधे मोर बड हय भय

4.5

एक एक करि आमि बलिब सकल ।
अपराधे वाङ्चि याते देह मोरे बल

4.6

साधु-निन्दा अन्य-देव स्वातन्त्र्य मनन ।
नाम तत्त्व गुरु आर शास्त्र विनिन्दन

4.7

हरिनामे अर्थ वाद कल्पित मनन ।
नाम-बले पाप श्रद्धा-हीने नामार्पण

4.8

अन्य शुभ-कर्मेर समान कृष्ण-नाम ।
ए कथा बलिले अपराध अविश्राम

4.9

नामेते अनवधान हय अपराध ।
ताहाके पुराण कर्ता बलेन प्रमाद

4.10

नामेर माहात्म्य जाने तबु नाहि भजे ।
अहं मम आसक्तिते संसारेते मजे

4.11

साधु-निन्दाइ प्रथम अपराध
साधु-निन्दा प्रथमापराध बलिऽ जानि ।
एइ अपराधे जीवेर हय सर्व हानि

4.12

स्वरूप ओ तटस्थ लक्षण भेदे साधु लक्षण द्वय विचार
साधुर लक्षण तुमि बलियाछ प्रभो ।
एकादशे उद्धवेरे कृष्ण-रूपे विभो

4.13

दयालु सहिष्णु सम द्रोह-शून्य-व्रत ।
सत्य-सार विशुद्धात्मा पर-हिते रत

4.14

कामे अक्षुभित बुद्धि दान्त अकिञ्चन ।
मृदु शुचि परिमित-भोजी शान्त-मन

4.15

अनीह धृतिमान् स्थिर कृष्णैक-शरण ।
अप्रमत्त सुगम्भीर विजित षड्-गुण

4.16

अमानी मानद दक्ष अवञ्चक ज्ञानी ।
एइ सब लक्षणेते साधु बलि जानि

4.17

एइ सब लक्षण प्रभो हय द्वि-प्रकार ।
स्वरूप तटस्थ भेदे करिब विचार

4.18

स्वरूप-लक्षण-इ प्रधान लक्षण, तद्-आश्रये तटस्थ लक्षण उदय हय
कृष्णैक-शरण हय स्वरूप-लक्षण ।
तटस्थ लक्षणे अन्य गुणेर गणन

4.19

कोन भाग्ये साधु-सङ्गे नामे रुचि हय ।
कृष्ण-नाम गाय करे कृष्ण-पादाश्रय

4.20

स्वरूप लक्षण सेइ ह-इत ह-इल ।
गाइते गाइते नाम अन्य गुण आइल

4.21

अन्य गुण-गण ताइ तटस्थ गणन ।
अवश्य वैष्णव देहे हबे सङ्घटन

4.22

वर्णाश्रम लिङ्ग, नाना-प्रकार वेष-द्वारा साधुत्व हय ना,
कृष्णैक-शरणताइ साधुर लक्षण
वर्णाश्रम चिह्न नाना-वेषेर रचना ।
साधुर लक्षणे कभु ना हय गणना

4.23

श्री-कृष्ण-शरणागति साधुर लक्षण ।
तार मुखे हय कृष्ण-नाम-सङ्कीर्तन

4.24

गृही ब्रह्मचारी वानप्रस्थ न्यासि-भेदे ।
शूद्र वैश्य क्षत्र विप्र-गणेर प्रभेदे

4.25

साधुत्व कखन नाहि ह-इबे निर्णीत ।
कृष्णैक-शरण साधु शास्त्रेर विहित

4.26

गृहि-साधु-लक्षण
रघुनाथ-दासे लक्ष्ये करिया सेवार ।
गृहि-साधु-जने शिखायेछ एइ सार

4.27

स्थिर हये घरे याओ ना हओ बातुल ।
क्रमे क्रमे पाय लोक भव-सिन्धु-कुल

4.28

मर्कट वैराग्य छाड लोक देखाइया ।
यथायोग्य विषय भुञ्ज अनासक्त हञा

4.29

अन्तरे निष्ठा कर बाह्ये लोक व्यवहार ।
अचिरे श्री-कृष्ण तोमाय करिबे उद्धार

4.30

गृह-त्यागी साधु-लक्षण
पुनः तुमि तार देखि वैराग्य ग्रहण ।
एइ मत शिक्षा दिले अपूर्व श्रवण

4.31

ग्राम्य-कथा ना शुनिबे ग्राम्य-वार्ता ना कहिबे ।
भाल ना खाइबे आर भाल ना परिबे

4.32

अमानी मानद हञा कृष्ण-नाम सदा लबे ।
व्रजे राधा-कृष्ण-सेवा मानसे करिबे

4.33

गृही ओ गृह-त्यागी - उभयेर-इ स्वरूप लक्षण
स्वरूप लक्षण एक सर्वत्र समान ।
आश्रमादि भेदे पृथक् तटस्थ विधान

4.34

अनन्य-शरणे यदि देखि दुराचार ।
तथापि से साधु बलि सेव्य सबाकार

4.35

एइ त श्री-कृष्ण-वाक्य गीता-भागवते ।
इहाके पूजिब यत्ने सदा सर्व मते

4.36

इहाते आछे त एक निगूढ सिद्धान्त ।
कृपा करि जानायेछ ताइ पाइ अन्त

4.37

पूर्व-पापेर गन्धावशेष ओ पूर्व-पाप लक्ष्य करिया यिनि कृष्णैक-शरण साधुर निन्दा करेन, तिनि नामापराधी
कृष्ण-नामे रुचि यबे ह-इबे उदय ।
एक नामे पूर्व पाप ह-इबेक क्षय

4.38

पूर्व-पाप गन्ध तबु थाके किछु दिन ।
नामेर प्रभावे क्रम हञा पडे क्षीण

4.39

शीघ्र सेइ पाप-गन्ध विदूरित हय ।
परम धर्मात्मा बलि हय परिचय

4.40

ये कयेक दिन सेइ गन्ध नाहि याय ।
साधारण जन चक्षे पाप बलि भाय

4.41

से पाप देखिया येइ साधु-निन्दा करे ।
पूर्व-पाप लक्षि पुनः अवज्ञा आचरे

4.42

सेइ त पाषण्डी वैष्णवेर निन्दा दोषे ।
नाम अपराध मजि पडे कृष्ण-रोषे

4.43

कृष्णैक-शरणताइ साधु लक्षण आपनाके साधु बलिया परिचय देओया दाम्भिकता
कृष्णैक-शरण मात्र कृष्ण-नाम गाय ।
साधु-नामे परिचित कृष्णेर कृपाय

4.44

कृष्ण-भक्त व्यतीत नाहिक साधु आर ।
आमि साधु बलि हय दम्भ अवतार

4.45

स्वल्पाक्षरे साधु-निर्णय
से बलिबे-आमि दीन कृष्णैक-शरण ।
कृष्ण-नाम यार मुखे साधु सेइ जन

4.46

तृण हैते हीन बलि आपनाके जाने ।
सहिष्णु तरुर न्याय आपनाके माने

4.47

निजे त अमानी आर सकले मानद ।
तार मुखे कृष्ण-नाम कृष्ण-रति-प्रद

4.48

नामापराध वैष्णव-इ साधु, तद्-देहे कृष्ण-शक्ति
हेन साधु-मुखे यबे शुनि एक नाम ।
वैष्णव बलिया तारे करिब प्रणाम

4.49

वैष्णव से जगद्-गुरु जगतेर बन्धु ।
वैष्णव सकल जीवे सदा कृपा सिन्धु

4.50

ए हेन वैष्णव-निन्दा येइ जन करे ।
नरके पडिबे से जन्म-जन्मान्तरे

4.51

भक्ति लभिबारे आर नाहिक उपाय ।
भक्ति लभे सर्व-जीव वैष्णव कृपाय

4.52

वैष्णव देहेते थाके श्री-कृष्णेर शक्ति ।
सेइ देह स्पर्शे अन्ये हय कृष्ण-भक्ति

4.53

वैष्णव अधरामृत आर पद जल ।
वैष्णवेर पद-रजः तिन महा-बल

4.54

वैष्णवेर शक्ति सञ्चार
वैष्णव-निकटे यदि बैसे कत-लक्षण ।
देह हैते हय कृष्ण-शक्ति निःसरण

4.55

सेइ शक्ति श्रद्धावान् हृदये पशिया ।
भक्तिर उदय करे देह काङ्पाइया

4.56

ये बसिल वैष्णवेर निकटे श्रद्धाय ।
ताहार हृदये भक्ति ह-इबे उदय

4.57

प्रथमे आसिबे तार मुखे कृष्ण-नाम ।
नामेर प्रभावे पाबे सर्व-गुण-ग्राम

4.58

वैष्णवेर कि कि दोष धरिले वैष्णव-निन्दा हय-जाति-दोष पूर्व-दोष नष्ट-प्राय अवशिष्ट दोष कादाचित्क दोष
वैष्णवेर जाति आर पूर्व दोष धरे ।
कादाचित्क दोष देखि येइ निन्दा करे

4.59

नष्ट-प्राय दोष लये करे अपमान ।
यम-दण्डे कष्ट पाय से सब अज्ञान

4.60

वैष्णवेर मुखे नाम-माहात्म्य-प्रचार ।
से वैष्णव-निन्दा कृष्ण नाहि सहे आर

4.61

धर्म योग याग ज्ञान-काण्ड परिहरि ।
ये भजिल कृष्ण-नाम सेइ सर्वोपरि

4.62

अन्य देव शास्त्र निन्दादि-शून्य नामाश्रयी साधु
अन्यदेर अन्य-शास्त्र ना करि निन्दन ।
नामेर आश्रय लय शुद्ध साधु-जन

4.63

से साधु गृहस्थ ह-उ अथवा सन्न्यासी ।
ताहार चरण-रेणु पाइते प्रयासी

4.64

याब यत नामे रति से तत वैष्णव ।
वैष्णवेर क्रम एइ मते अनुभव

4.65

इथे वर्णाश्रम धन पाण्डित्य यौवन ।
कोन कार्य नाहि करे रूप बल जन

4.66

अतएव यिनि करिलेन नामाश्रय ।
साधु-निन्दा छाडिबेन ए धर्म निश्चय

4.67

नामाश्रया शुद्धा भक्ति भक्त भक्ति-रूपा ।
भक्त भक्ति-विवर्जिता ह-इले विरूपा

4.68

याङ्हा साधु-निन्दा ताङ्हा नाहि भक्ति स्थिति ।
अतएव अपराधे तथा परिणति

4.69

साधु-निन्दा छाडि भक्त साधु-भक्ति करे ।
साधु-सङ्ग साधु-सेवा एइ धर्माचरे

4.70

असत्-सङ्ग दुइ प्रकार, तन्-मध्ये स्त्री-सङ्गी
असत्-सङ्ग-त्यागे हय वैष्णव-आचार ।
असत्-सङ्गे हय साधु-अवज्ञा अपार

4.71

असत् ये द्वि-प्रकार सर्व-शास्त्रे कय ।
सेइ दुइयेर मध्ये योषित्-सङ्गी एक हय

4.72

योषित्-सङ्गि-सङ्गी पुनः तार मध्ये गण्य ।
तार सङ्ग-त्यागे जीव ह-इबेक धन्य

4.73

योषित्-सङ्गी काहाके बले
कृष्णेरे संसारे ये दाम्पत्य धर्म थाके ।
असत् बलिया शास्त्र ना बले ताहाके

4.74

अधर्म संयोगे आर स्त्रैण भावे रत ।
योषित्-सङ्गी जन दुष्ट शास्त्रेर सम्मत

4.75

द्वितीय प्रकार असत् (कृष्णेते अभक्त) तिन प्रकार
कृष्णेते अभक्त - असत् द्वितीय प्रकार ।
मायावादी धर्म-ध्वजी निरीश्वर आर

4.76

यिनि बलेन, एइ सब लोकेर निन्दाके-ओ साधु-निन्दा बले तिनि-ओ वर्ज्य
वर्जिले ए सब सङ्ग साधु-निन्दा नय ।
इहाके ये निन्दा बले सेइ वर्ज्य हय

4.77

एइ सब सङ्ग छाडि अनन्य-शरण ।
कृष्ण-नाम करि पाय कृष्ण-प्रेम-धन

4.78

वैष्णवाभास, प्राकृत-वैष्णव, वैष्णव-प्राय ओ कनिष्ठ-वैष्णव-एइ सकल एक-इ कथा
साधु-सेवा-हीन अर्चे लौकिक श्रद्धाय ।
प्राकृत वैष्णव हय वैष्णवेर प्राय

4.79

वैष्णव-आभास सेइ नहे तऽ वैष्णव ।
केमने पाइबे साधु-सङ्गेर वैष्णव

4.80

अतएव कनिष्ठ मध्येते तारे गणि ।
तारे कृपा करिबेन वैष्णव आपनि

4.81

मध्यम वैष्णव
कृष्ण-प्रेम कृष्ण-भक्ते मैत्री आचरण ।
बालिशेते कृपा आर द्वेषी उपेक्षण

4.82

करिले मध्यम भक्त शुद्ध भक्त हन ।
कृष्ण-नाम्ने अधिकार करेन अर्जन

4.83

उत्तम वैष्णव
सर्वत्र याङ्हार हय कृष्ण-दरशन ।
कृष्णे सकलेर स्थिति कृष्ण प्राण धन

4.84

वैष्णवावैष्णव-भेद नाहि थाके ताङ्र ।
वैष्णव उत्तम तिनि कृष्ण-नाम-सार

4.85

मध्यम वैष्णव-इ साधु सेवा करेन
अतएव मध्यम वैष्णव महाशय ।
साधु सेवा रत सदा थाकेन निश्चय

4.86

प्राकृत वैष्णव नामाभासेर अधिकारी
प्राकृत वैष्णव येइ वैष्णवेर प्राय ।
नामाभासे अधिकारी सर्व-शास्त्र पाय

4.87

मध्यम वैष्णव नामाधिकारी ओ नामापराध विचार करिबेन
मध्यम वैष्णव मात्र नामे अधिकारी ।
श्री-नाम-भजने अपराधेर विचारी

4.88

उत्तम वैष्णवे अपराध असम्भव ।
सर्वत्र देखेन तिनि कृष्णेर वैभव

4.89

निज निज अधिकार करिया विचार ।
साधु-निन्दा अपराध करि परिहार

4.90

साधु सङ्ग साधु सेवा नाम सङ्कीर्तन ।
सर्व जीवे दया एइ भक्त आचरण

4.91

साधु निन्दा घटिले कि करा कर्तव्य ?
प्रमादे यद्यपि घटे साधु-विगर्हण ।
तबे अनुतापे धरि से साधु-चरण

4.92

काङ्दिया बलिब प्रभो क्षमि अपराध ।
ए दुष्ट-निन्दके कर वैष्णव-प्रसाद

4.93

साधु बड दयामय तबे आर्द्र-मने ।
क्षमिबेन अपराध कृपा आलिङ्गने

4.94

एइ त प्रथम अपराधेर विचार ।
श्री-चरणे निवेदिनु आज्ञा अनुसार

4.95

हरि-दास पाद-पद्मे भ्रर ये जन ।
हरि-नाम-चिन्तामणि ताहार जीवन

मूल पाठ: Harināmacintāmaṇi · Data entry n.n. · GRETIL (Göttingen) · CC BY-NC-SA 4.0

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