हरिनामचिन्तामणि · अध्याय 5
इति श्री-हरि-नाम-चिन्तामणौ साधु-निन्दापराध-विचारो
नाम चतुर्थः परिच्छेदः ।
(5)
पञ्चम परिच्छेद
देवान्तरे स्वातन्त्र्य-ज्ञानापराध
शिवस्य श्री-विष्णोर् य इह गुण-नामादि-सकलं
धिया भिन्नं पश्येत् स खलु हरि-नामाहित-करः
जय गदाधर-प्राण जाह्नवा-जीवन ।
जय सीतानाथ जय गौर भक्त-जन
हरिदास बले तबे करि योड-हात ।
द्वितीयापराध एबे शुन जगन्नाथ
विष्णु-तत्त्व
परम अद्वय ज्ञान विष्णु पर-तत्त्व ।
चित्-स्वरूप जगदीश सदा शुद्ध-सत्त्व
गोलोक-विहारी कृष्ण से तत्त्वेर सार ।
चतुः-षष्ठि गुणे अलङ्कृत रसाधार
षष्ठि-गुण नारायण स्वरूपे प्रकाश ।
सेइ षष्ठि-गुण विष्णु-सामान्य-विलास
पुरुषावतारे आर स्वांश अवतारे ।
सेइ षष्ठि-गुण स्पष्ट कार्य अनुसारे
विष्णुर विभिन्नांशेर प्रकार भेद जीवेर पञ्चाशद्-गुण
विष्णुर ये विभिन्नांश दुइ त प्रकार ।
पञ्चाशत् गुण जीवे बिन्दु बिन्दु आर
गिरिशादि देवता विभिन्नांश हैया-ओ सामान्य जीव नन् ताङ्हारा पञ्चाशत्-गुण-विशिष्ट
गिरिशादि देवे एइ गुण पञ्चाशत् ।
तद्-अधिक परिमाणे सर्वदा संयुत
तद्-व्यतीत आर पञ्च गुण अंश माने ।
प्रकाशित आछे तबे विचित्र-विधाने
षष्ठि-गुणे विष्णुत्व
सेइ पञ्च पञ्चाशत् गुण-पूर्ण ताय ।
विष्णुते विराजमान सर्व शास्त्रे गाय
तद्-व्यतीत आर पञ्च-गुण नारायणे ।
आछे तार सत्ता कभु नाहि अन्य जने
षष्ठि-गुणे विष्णु-तत्त्व परम ईश्वर ।
गिरिश आदि अन्य-देव ताङ्हार किङ्कर
विभिन्नांश गिरिशादि जीव श्रेष्ठतर ।
विष्णु सर्व-जीवेश्वर सर्व-देवेश्वर
अज्ञान-व्यक्ति अन्य देवतार सहित विष्णुके समान मने करे
अन्य-देव सह सम विष्णुके ये माने ।
से बड अज्ञान ईश-तत्त्व नाहि जाने
ए जड जगते विष्णु परम ईश्वर ।
गिरिशादि यत देव ताङ्र विधिकर
केह बले मायार त्रि-गुणे त्रिदिवेश ।
सर्वदा समान ब्रह्म तत्त्व सविशेष
नानाविध वादानुवादेर सिद्धान्त
शास्त्रेर सिद्धान्ते तबु पूज्य नारायण ।
ब्रह्मा शिव सृष्टि-लय कार्येर कारण
वासुदेव छाडि येइ अन्य-देवे भजे ।
ईश्वर छाडिया सेइ संसारेते मजे
केह बले, ष् विष्णु पर-तत्त्व बटे जानि ।
सर्व-विष्णुमय विश्व वेद-वाक्य मानि
अतएव सर्व-देवे विष्णु अधिष्ठान ।
सर्व देवार्चने हय विष्णुर समान
एइ त निषेध-पर वाक्य विधि नय ।
अन्य देव पूजार निषेध एइ हय
सर्व विष्णु-मय विश्व ए कथा बलिले ।
विष्णु-पूजा कैले सब देवे पूजा मिले
तरु-मूले जल दिले शाखार उल्लास ।
पल्लवे ढालिले जल वृक्षेर विनाश
अतएव पूजि विष्णु अन्य-देव त्यजि ।
ताहातेइ अन्यदेव काजे काजे पूजि
एइ विधि - देवेर सम्मत चिर-दिन ।
दुर्विपाके एइ विधि छाडे अर्वाचीन
मायावाद-दोषे जीव कलि आगमने ।
बहु-देव पूजे विष्णु-सामान्य-दर्शने
एक एक देव एक एक फल दाता ।
सर्व फल दाता विष्णु सकलेर पाता
कामि जन यदि तत्त्व जानिबारे पारे ।
विष्णु पूजि फल पाय छाडे देवान्तरे
गृहस्थ वैष्णवेर कर्तव्य विधान
गृहस्थ ह-इया येइ विष्णु-भक्त हय ।
सर्व-कार्ये कृष्ण पूजे छाडिया संशय
निषेकादि श्मशानान्त संस्कार यत ।
ताहाते पूजये कृष्ण वेद मन्त्र मत
विष्णु वैष्णवेर पूजा वेदेते विधान ।
देव-पितृ-गणे कृष्ण निर्माल्य प्रदान
मायावादि-मते पितृ-श्राद्ध येइ करे ।
येवा अन्यदेव पूजे अपराधे मरे
विष्णु-तत्त्वे द्वैत-बुद्धि नाम अपराध ।
सेइ अपराधे तार हय भक्ति बाध
शिवादि देवता गणे पृथक् ईश्वर ।
मानिले नामापराध हय भयङ्कर
विष्णु-शक्ति परा शक्ति हैते देव यत ।
भिन्न शक्ति सिद्ध नय वेदेर सम्मत
शिव-ब्रह्मा-गणपति-सूर्य-दिक्पाल ।
कृष्ण-शक्ति-बलेते ईश्वर चिर-काल
अतएव परेश्वर एक-मात्र जानि ।
आर सब देवे ताङ्र शक्ति-मध्ये गणि
अतएव सर्व-कार्ये कर्म जड भाव ।
छाडिया गृहस्थ पाय भक्तिर सद्-भाव
कि रूप वैष्णव गार्हस्थ्य धर्म करिबेन्
भक्तिर सद्-भावे थाकि सत्-क्रिया करणे ।
देव-पितृ-गणे तुषे निर्माल्य अर्पणे
बहु देव-देवी पूजा करिबे वर्जन ।
कृष्ण-भक्त बलि सबे करिबे तर्पण
श्री-कृष्ण वैष्णवार्चने सर्व फल पाय ।
नामे अपराध नहे सदा नाम गाय
वर्ण-चतुष्टयेर जीवन यात्रा विधि
जगते मानव-गण वर्ण-धर्माचरि ।
करिबेक जीवन-यात्रा धर्म पथ धरि
अन्त्यजेर विधि
सङ्कर अन्त्यज सबे त्यजि नीच-धर्म ।
शूद्राचार करे सदा संसारेर कर्म
सङ्कर अन्त्यज थाकिबेक शूद्राचारे ।
चातुर्वर्ण विना धर्म नाहिक संसारे
वर्ण-धर्मेर द्वारा जीवन-यात्रा करिया संसारि व्यक्ति भक्ति-पथे भावार्जन करिबेन्
चातुर्-वर्ण वर्ण-धर्मे करिबे संसार ।
शुद्ध कृष्ण-भक्ति बले हबे सदाचार
चातुर्-वर्ण यद्यपि श्री-कृष्ण नाहि भजे ।
वर्ण-धर्माचारे थाकि रौरवेते मजे
वर्ण विना गृहस्थेर नाहि आर धर्म ।
वर्ण धर्माचारे गृहस्थेर सब कर्म
वर्ण-धर्मे ए संसार निर्वाह करिबे ।
यावद् अर्थ परिग्रहे श्री-कृष्ण भजिबे
निसर्गतः विधि-वाक्य ये पर्यन्त नर ।
वर्ण-धर्म स्व-निर्वाहे करिबे आदर
भक्ति-योग-नामे एइ तत्त्व-निरूपण ।
भक्ति-योगे भावोदय सिद्धान्त-वचन
भावोदये विधिर प्रवृत्ति नाहि रय ।
भावोदित कार्ये देह-यात्रा सिद्ध हय
गृहि-वैष्णवेर एइ अद्वय-साधन ।
श्री-विष्णु अद्वय-तत्त्वे द्वैत-निवर्तन
नाम-नामी ओ गुण-गुणीर अभेदे विष्णु-ज्ञान शुद्ध हय
आर एक कथा आछे द्वैत-निवर्तने ।
विष्णु-नाम विष्णु-रूप विष्णु-गुण-गणे
विष्णु हैते पृथग् रूपे ना मानिबे कभु ।
अद्वय अखण्ड विष्णु चिन्मयत्वे विभु
अज्ञानेते यदि हय द्वैत उपद्रव ।
नामाभास हय तार प्रेम असम्भव
सद्-गुरु-कृपाय सेइ अनर्थ विनाश ।
भजिते भजिते शुद्ध-नामेर प्रकाश
मायावादीर कुतर्क ओ अपराध
मत-वाद-ज्ञाने द्वैत हैल प्रवर्तन ।
अपराध हय आर नहे निवर्तन
मायावादी बले ब्रह्म हय पर-तत्त्व ।
निर्विशेष निर्विकार निराकार सत्त्व
विष्णु-रूप विष्णु-नाम मायाय कल्पित ।
माया अन्तर्धाने विष्णु हन ब्रह्म-गत
ए सब कुतर्क मात्र सत्य शून्यवाद ।
पर-तत्त्वे सर्व-शक्ति अभाव-प्रमाद
शक्तिमान् ब्रह्म येइ सेइ विष्णु हय ।
नामेर विवाद-मात्र वेदेर निर्णय
विष्णु ओ ब्रह्म-तत्त्वेर सम्बन्ध
विष्णु पर-तत्त्व ताङ्र निर्विशेष धर्म ।
सविशेष धर्म सह हय एक मर्म
विष्णुर अचिन्त्य-शक्ति विरोध-भञ्जन ।
अनायासे करि करे सौन्दर्य स्थापन
जीव-बुद्धि सहजेते अति अल्पतर ।
अचिन्त्य-शक्तिर भाव ना करे गोचर
निज-बुद्ध्ये चाहे एक स्थापिते ईश्वर ।
खण्ड-ज्ञाने पाय ब्रह्म-तत्त्वेते अवर
विष्णुर परम पद छाडि देवार्चित ।
ब्रह्मे बद्ध हय नाहि बुझे हिताहित
चिन्मय-स्वरूप-ज्ञान ये बुझिते जाने ।
विष्णु विष्णु-नाम-गुण एक करि माने
एइ त विशुद्ध ज्ञान श्री-कृष्ण-स्वरूप ।
सम्बन्ध बुद्धिते लभि भजे नाम-रूप
शिव ओ विष्णुर कि रूपे अभेद-बुद्धि करिबे
जड-नाम जड-रूप-गुणे येइ भेद ।
से भेद चित्-तत्त्वे नाइ एइ त प्रभेद
विष्णु-तत्त्वे भेद-ज्ञान अनर्थ विकार ।
शिवेते विष्णुते भेद अति अविचार
भक्त ओ मायावादीर आचार ओ प्रवृत्ति भेद
नामैक-शरण येइ भक्ति महाजन ।
एकेश्वर कृष्णे भजि छाडे अन्य जन
अन्य-देव अन्य-शास्त्र निन्दा नाहि करे ।
कृष्ण-दास बलि अन्ये पूजे समादरे
प्रतिदिन गृहि-भक्त निर्माल्य अर्पणे ।
देव पितृ सर्व जीवे करेन तर्पणे
यथा यथा अन्य देवे करेन दर्शन ।
कृष्ण-दास बलि ताङ्रे करेन वन्दन
मायावादि-गण यदि विष्णु-पूजा करे ।
प्रसाद निर्माल्य भक्त नाहि लय डरे
मायावादी हरि-नामे अपराधी हय ।
ताहार प्रदत्त पूजा हरि नाहि लय
अन्य-देव-निर्माल्य ग्रहणे अपराध ।
शुद्ध भक्ति साधने सर्वदा साधे बाध
तबे यदि शुद्ध भक्त श्री-कृष्ण पूजिया ।
अन्य देवे पूजा करे तत्-प्रसाद दिया
से प्रसाद ग्रहणेते नाहि अपराध ।
सेइ रूप देवार्चने नाहि भक्ति-बाध
शुद्ध-भक्त नाम अपराधी नाहि हय ।
नाम करिऽ प्रेम पाय नामे देय जय
एइ अपराधेर प्रतिकार
प्रमादे यद्यपि हय अन्ये विष्णु-ज्ञान ।
तबे अनुतापे करि विष्णु-तत्त्व-ध्यान
श्री-विष्णु स्मरिया करि अपराध क्षय ।
यत्ने देखि आर ना से अपराध हय
पूर्व दोष क्षमा शील भक्तेर बान्धव ।
दयार सागर कृष्ण क्षमार अर्णव
बहु देव सेवि सङ्ग करिब वर्जन ।
एकेश्वर वैष्णवेर करिब पूजन
हरि-दास पदे भक्तिविनोद ये जन ।
हरिनाम-चिन्तामणि ताहार जीवन
मूल पाठ: Harināmacintāmaṇi · Data entry n.n. · GRETIL (Göttingen) · CC BY-NC-SA 4.0