हरिनामचिन्तामणि · अध्याय 14
(14)
चतुर्दश परिच्छेद
सेवापराध
जय गौर-गदाधर जाह्नवा जीवन ।
जय सीतापति श्रीवासादि-भक्त-जन
नाम-तत्त्वे श्री-हरिदास ठाकुरके आचार्य बलिया उक्ति करियाछेन्
महाप्रभु बले शुन भक्त हरिदास ।
नाम अपराध तत्त्व करिले प्रकाश
इहाते कलिर जीव लभिबे मङ्गल ।
नाम-तत्त्वे तुमि हओ आचार्य प्रबल
तव मुखे नाम-तत्त्व करिते श्रवण ।
आमार उल्लास बड शुन महाजन
आचारे आचार्य तुमि प्रचारे पण्डित ।
तोमार चरित नाम-रत्ने विभूषित
रामानन्द शिखाइल मोरे रस-तत्त्व ।
तुमि शिखाइले मोरे नामेर महत्त्व
एबे बल सेवा अपराध कि प्रकार ।
शुनिया घुचिबे जीवेर चित्त अन्धकार
हरिदास बले से सेवक जन जाने ।
आमि नामाश्रये थाकि जानिब केमने
तबु तव आज्ञा आमि लङ्घिबारे नारि ।
याहा बलाइबे ताहा बलिब विस्तारि
सेवापराध सङ्ख्या
सेवा अपराध हय अनन्त प्रकार ।
श्री-मूर्ति सम्बन्धे सब शास्त्रेर विचार
कोन शास्त्रे द्वात्रिंशत् अपराध गणि ।
कोन शास्त्रे पञ्चाशत् गञे गुण-मणि
चतुर्विध
सेइ अपराध चतुर्विधादि प्रकारे ।
विभाग करेन बुध गण शास्त्रे द्वारे
श्री-मूर्ति-सेवक निष्ठ कतगुलि तार ।
श्री मूर्ति स्थापक निष्ठ अपराध आर
श्री-मूर्ति दर्शक निष्ठ आर कतिपय ।
सर्व निष्ठ अपराध कतिविध हय
सेवापराध द्वात्रिंश प्रकार
पादुका सहित याय ईश्वर मन्दिरे ।
याने चडिऽ याय तथा स्वच्छन्द शरीरे
उत्सवे ना सेवे आर प्रगति ना करे ।
उच्छिष्ठ अशौच देहे वन्दन आचरे
एक हस्ते प्रणाम सम्मुखे प्रदक्षिण ।
देवाग्रे प्रसारे पद हय वीरासीन
देवाग्रे शयन आर भक्षण करय ।
मिथ्या कथा उच्च भाषा जल्पना निचय
निग्रहानुग्रह युद्ध अभक्ति रोदन ।
क्रूर भाषा पर निन्दा कम्बलावरण
पर स्तुति, अश्लीलता, वायु-विमोक्षण ।
शक्ति सत्त्वे गौण उपचारेर योजन
देवानिवेदित द्रव्य भक्षणे स्वीकार ।
कालोदित फलादिर अनर्पण आर
अन्य भुक्त अवशिष्ट खाद्य निवेदन ।
देव प्रति पृष्ठ करि सम्मुखे आसन
देवाग्रे अन्येर अभिवादन पूजन ।
गुरु प्रति मौन निज स्तोत्र आलोचन
देवता निन्दन एइ द्वात्रिंश प्रकार ।
सेवा अपराध महा पुराणे प्रचार
अन्य शास्त्र मते प्रकार वर्णन
अन्यत्र आछये अपराध अन्यतम ।
संक्षेपे बलिब प्रभु तव इच्छा मत
राजान्न भोजन आर अन्धकार घरे ।
प्रवेशिया देव मूर्ति संस्पर्शन करे
अविधि पूर्वक हरि मृत्यु समर्पण ।
विना वाद्ये मन्दिरेर द्वार उद्घाटन
सारमेय दृष्ट खाद्य देवे समर्पण ।
अर्चन समये मौन भङ्ग अकारणे
बहिर्देशे गमनादि पूजार समये ।
गन्ध माल्य नाहि दिया धूपन करये
अनर्ह-पुष्पेते कृष्ण पूजादि करण ।
अधौत वदने कृष्ण पूजा आरम्भन
स्त्री सङ्ग करिया किम्बा रजःस्वला नारी ।
दीप, शब स्पर्शिया, अयोग्य वस्त्र परिऽ
शब हेरिऽ, अधोवायु करिया मोक्षण ।
क्रोध करिऽ श्मशानेते करिया गमन
अजीर्ण उदरे आर कुसुम्भ पैनाक ।
सेवन करिया आर ताम्बुल गुवाक
तैल माखि करि हरि-श्री-मूर्ति-स्पर्शन ।
एरण्ड-पत्रस्थ पुष्पे करय अर्चन
आसुरिक काले पूजे पीठे भूमे बसि ।
स्नपन समये मूर्ति वाम हस्ते स्पर्शिऽ
वासि वा याचित फुले देवता अर्चन ।
पूजा काले गर्व उक्ति अयथा ष्ठीवन
तिर्यक् पुण्ड्र धरे आर अधौत चरणे ।
मन्दिरे प्रवेश करे पूजार कारणे
अवैष्णव पक्व करे देवे निवेदन ।
अवैष्णवे देखाइया करये पूजन
विश्वक्सेने ना पूजिया कापालि देखिया ।
हरि पूजे नख जले श्री मूर्ति स्मरिया
घर्माम्बु-संस्पृष्ट जले करये अर्चन ।
कृष्णेर शपथ करे निर्माल्य लङ्घन
एइ सब कार्य्ये हय सेवा अपराध ।
सेवाकारी जनेर याहाते भक्ति बाध
सेवापराध याहार पक्षे याहा, ताहा तिनि वर्ज्जन करिबेन
श्री-मूर्ति सम्बन्धे यार भजन पूजन ।
सेवा अपराध तेङ्ह करुन् वर्ज्जन
वैष्णव सर्वदा नाम सेवा अपराध ।
वर्जिया श्री-कृष्ण-सेवा करुन आस्वाद
एइ सब अपराध मध्ये याङ्र याहा ।
सम्बन्धे पडिबे ताङ्र वर्ज्जनीय ताहा
नामापराध सकल वैष्णव-मात्रेर-इ वर्ज्जनीय
किन्तु नाम अपराध सकल वैष्णव ।
सर्व काल त्यजिऽ लभे भक्तिर वैभव
भाव-सेवाय सेवापराध विचार स्वल्प
श्री-मूर्ति विरहे यिनि निर्ज्जनेते बसिऽ ।
भजन-कारणे भाव मार्गे अहर्निशि
नाम अपराध सदा वर्ज्जनीय ताङ्र ।
नाम अपराध दश सर्व क्लेशाधार
नाम अपराध गते भाव सेवा हय ।
अतएव अपराध ताहे नाहि रय
नाम स्मरण कारीदेर भाव-सेवाइ कर्तव्य
श्री नाम स्मरणे भाव सेवार उदय ।
तोमार कृपाय प्रभु जीवे भाग्योदय
भक्तिर साधन यत आछय प्रकार ।
से सब चरमे देय नामे प्रेम सार
अतएव नाम लय नाम रसे मजे ।
अन्य ये प्रकार सब ताहा नाहि भजे
हरिदास आज्ञा बले अकिञ्चन जन ।
हरि-नाम-चिन्तामणि करिला कीर्तन
मूल पाठ: Harināmacintāmaṇi · Data entry n.n. · GRETIL (Göttingen) · CC BY-NC-SA 4.0