हरिनामचिन्तामणि · अध्याय 13
(13)
त्रयोदश परिच्छेद
श्रुतेऽपि नाम-माहात्म्ये
यः प्रीति-रहितो नरः ।
अहं-ममादि-परमो
नाम्नि सोऽप्य् अपराध-कृत् ॥ ह्न्च्_13.
गदाइ गौराङ्ग जय जाह्नवा जीवन ।
सीताद्वैत जय जय गौर-भक्त-जन
प्रेमे गद गद हरिदास महाशय ।
शेष नाम अपराध प्रभु पदे कय
शुन प्रभु एइ अपराध सर्वाधम ।
एइ दोषे नाम प्रेम ना हय उद्गम
नामे शरणापत्तिर प्रयोजनीयता
अन्य नय अपराध करिया वर्ज्जन ।
नामेते शरणापन्न ह-इबे सज्जन
षड्-विध शरणागति सर्व शास्त्रे कय ।
विस्तारित बलिते आमार साध्य नय
शरणापत्तिर प्रकार
संक्षेपे चरणे तव करि निवेदन ।
आनुकूल्ये सङ्कल्प प्रातिकूल्य विसर्जन
कृष्णे रक्षा-कारी बुद्धि पालक भावन ।
निजे दीन बुद्धि आर आत्म-निवेदन
ए जीवन ना रहिले ना हय भजन ।
जीवन रक्षाय मात्र विषय ग्रहण
भक्ति अनुकूल ये विषय अनुक्षण ।
ताहे रोचमान वृत्त्ये जीवन यापन
भक्ति प्रतिकूल ये विषये यबे हय ।
ताहाते अरुचि ताहा वर्जिबे निश्चय
कृष्ण विना रक्षा-कर्ता नाहि केह आर ।
कृष्ण से पालक मात्र जानिबे आमार
आमि दीन अकिञ्चन सकलेर छार ।
अधम दुर्गत किछु नाहिक आमार
कृष्णेर संसारे आमि आछि चिर दास ।
कृष्ण इच्छा मत क्रिया आमार प्रयास
आमि कर्ता आमि दाता आमि पालयिता ।
आमार ए देह गेह सन्तान वनिता
आमि विप्र आमि शूद्र आमि पिता पति ।
आमि राजा आमि प्रजा सन्तानेर गति
एइ सब बुद्धि छाडि कृष्णे करि मति ।
कृष्ण कर्ता कृष्ण इच्छा मात्र बलवती
कृष्णेर ये हय इच्छा ताहाइ करिब ।
निज इच्छा अनुसारे किछु ना चिन्तिब
कृष्ण इच्छा मते हय आमार संसार ।
कृष्ण इच्छा मते आमि ह-इ भव-पार
दुःखे थाकि सुखे थाकि आमि कृष्ण दास ।
कृष्णेच्छाय सर्व जीवे दयार प्रकाश
मम भोग कर्म-भोग कृष्ण इच्छा मत ।
आमार वैराग्य कृष्ण इच्छा अनुगत
शरणापत्ति ह-इले आत्म-निवेदन हय
सरल भावेते यबे एइ भाव हय ।
आत्म निवेदन तारे बलि महाशय
शरणापत्ति व्यतीत नामाश्रये याहा हय
षड्-विध शरणागति नाहिक याहार ।
से अधम अहं मम बुद्धि दोषे छार
से बले आमि त कर्ता संसार आमार ।
निज कर्म फल भोग सुख दुःख आर
आमार रक्षक आमि, आमि त पालक ।
आमार वनिता भ्राता बालिका बालक
आमि त अर्जन करि आमार चेष्टाय ।
सर्व कार्य्य सिद्ध हय सर्व शोभा पाय
अहं मम बुद्धि क्रमे बहिर्मुख जन ।
निज ज्ञान बले बहु करये मानन
सेइ ज्ञान बले शिल्प विज्ञान विस्तारे ।
ईश्वरेर ईशिता ना माने दुष्टाचारे
श्री-नाम-माहात्म्य शुनि विश्वास ना करे ।
लोक व्यवहारे कभु कृष्ण-नामोच्चारे
कृष्ण नाम करे तबु नाहि पाय प्रीति ।
धर्म ध्वजी शठ जन जीवने ए रीति
हेलाय उच्चारे नाम किछु पुण्य हय ।
प्रीति फल नाहि फले सर्व शास्त्रे कय
इहार मूल कि ?
माया बद्ध हैते एइ अपराध हय ।
इहाते निष्कृति लाभ कठिन निश्चय
शुद्ध भक्ति फले याङ्र विरक्ति ह-इल ।
संसार छाडिया सेइ नामाश्रय निल
एइ दोष त्यागेर उपाय
निष्किञ्चन भावे भजे श्री कृष्ण चरण ।
विषय छाडिया करे नाम सङ्कीर्तन
सेइ साधु जने अन्वेषिया ताङ्र सङ्ग ।
करिबे सेविबे छाडि विषय तरङ्ग
क्रमे क्रमे नामे मति ह-इबे सञ्चार ।
अहंता ममता याबे माया हबे पार
नामेर माहात्म्य शुनि अहं मम भाव ।
छाडिया शरणातै भक्तेर स्वभाव
नामेर शरणागत येइ महाजन ।
कृष्ण नाम करे पाय प्रेम महा धन
दशापराध शून्य व्यक्तिर लक्षण
अतएव साधु निन्दा यतने छाडिया ।
पर तत्त्व विष्णु शुद्ध मनेते जानिया
नाम गुरु नाम शास्त्र सर्वोत्तम जानि ।
विशुद्ध चिन्मय नाम हृदयेते मानि
पाप स्पृहा पाप बीज त्यजिया यतने ।
प्रचारिया शुद्ध नाम श्रद्धान्वित जने
अन्य शुभ कर्म हैते ल-इया विराम ।
स्मरे ये शरणागत अप्रमादे नाम
निरपराधे नामे ल-इले अल्प दिने भावोदय हय
सेइ धन्य त्रि-जगते सेइ भाग्यवान् ।
कृष्ण कृपा योग्य सेइ गुणेर निदान
अति अल्प दिने ताङ्र श्री-नाम-ग्रनणे ।
भावोदय हय आर पाय प्रेम धने
उन्नति क्रम
एवम्भूत जनेर साधन दशा प्राय ।
अति स्वल्प दिने याय कृष्णेर इच्छाय
भाव दशा हैते हैते प्रेम दशा हय ।
प्रेम दशा सर्व सिद्धि सर्व शास्त्र कय
तुमि बलियाछ नाम येइ महाजन ।
ल-इबे निरपराधे पाबे प्रेम धन
व्यतिरेक भावे इहार चिन्ता
अपराध नाहि छाडिऽ नाम यदि लय ।
सहस्र साधने तार भक्ति नाहि हय
ज्ञाने मुक्ति कर्मे भुक्ति ज्ञानी कर्मी जने ।
सुदुर्लभा कृष्ण भक्ति निर्मल साधने
भुक्ति मुक्ति भक्ति सम भक्ति मुक्ता फल ।
जीवेर महिमा भकि प्राप्ति सुनिर्मल
साधने नैपुण्य योगे अत्यल्प साधने ।
भक्ति लता प्रेम फल देन भक्त जने
भजन नैपुण्य
दश अपराध छाडि नामेर ग्रहण ।
इहाइ नैपुण्य हय साधन भजन
नामापराधेर गुरुता
अतएव भक्ति लाभे यदि लोभ हय ।
दश अपराध छाडि करि नामाश्रय
एक एक अपराध सतर्क ह-इया ।
यतनेते छाडि चित्ते विलाप करिया
नामेर चरणे करि दृढ निवेदन ।
नाम कृपा हले अपराध विध्वंसन
अन्य शुभ कर्मे नाम अपराध क्षय ।
कोन प्रायश्चित्त योगेकभु नाहि हय
नामापराध परित्यागेर उपाय
अविश्रान्त नामे नाम अपराध याय ।
ताहे अपराध कभु स्थान नाहि पाय
दिवारात्र नाम लय अनुताप करे ।
तबे अपराध याय नाम फल धरे
अपराध गते शुद्ध नामेर उदय ।
शुद्ध नाम भावमय आर प्रेम मय
दश अपराध येन हृदये ना पशे ।
कृपा कर महाप्रभु मजि नाम रसे
ए भक्तिविनोद हरिदास कृपा बले ।
हरि-नाम-चिन्तामणि गाय कुतूहले
मूल पाठ: Harināmacintāmaṇi · Data entry n.n. · GRETIL (Göttingen) · CC BY-NC-SA 4.0