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ग्रंथ पाठ

हरिनामचिन्तामणि · अध्याय 15

15.1

(15)
पञ्चदश परिच्छेद
भजन-प्रणाली
गदाइ गौराङ्ग जय जय नित्यानन्द ।
जय सीतानाथ जय गौर-भक्त-वृन्द

15.2

सब छाडि हरि-नाम जे करे भजन ।
जय जय भाग्यवान् सेइ महाजन

15.3

प्रभु बले हरि-दास तुमि भक्ति-बले ।
पेयेछ सकल ज्ञान ए जगती-तले

15.4

सर्व-वेद नाचे देखि तोमार जिह्वाय ।
सकल सिद्धान्त देखि तोमार कथाय

15.5

नाम-रस-जिज्ञासा
एबे स्पष्ट बल नाम-रस कि प्रकार ।
कि रूपे लभिबे जीव ताहे अधिकार

15.6

हरिदास महा-प्रेमे करे निवेदन ।
तोमार प्रेरणा-बले करिब वर्णन

15.7

रस-तत्त्व
शुद्ध-तत्त्व पर-तत्त्व येइ वस्तु सिद्ध ।
रस नामे सर्व-वेदे ताहाइ प्रसिद्ध

15.8

सेइ से अखण्ड रस पर-ब्रह्म तत्त्व ।
अनन्त आनन्द-धाम चरम महत्त्व

15.9

शक्ति शक्तिमान् रूपे विशेष ताहाय ।
भेद नाइ भेद सम दर्शनेते भाय

15.10

शक्तिमान् सुदुर्लक्ष्य शक्ति प्रकाशिनी ।
त्रिविध शक्तिर क्रिया विश्व-विकाशिनी

15.11

चिच्-छक्ति-द्वारा वस्तु-प्रकाश
चिच्-छक्ति-स्वरूपे प्रकाशये वस्तु रूप ।
वस्तु नाम वस्तु धाम तत्-क्रिया स्वरूप

15.12

कृष्ण से परम वस्तु श्याम तार रूप ।
कृष्ण-धाम गोलोकादि लीलार स्वरूप

15.13

नाम धाम रूप गुण लीला आदि यत ।
सकल-इ अखण्डाद्वय ज्ञान अन्तर्गत

15.14

विचित्रता यत सब परा शक्ति कर्म ।
कृष्ण धर्मी परा शक्ति कृष्ण नित्य कर्म

15.15

धर्म-धर्मी भेद नाइ अखण्ड अद्वये ।
विचित्र विशेष मात्र सच्-चिन्-निलये

15.16

माया-शक्तिर स्वरूप
सेइ शक्ति-छाया एक माया संज्ञा पाय ।
बहिरङ्ग विश्व सृजे कृष्णेर इच्छाय

15.17

जीव-शक्ति
भेदाभेद-मयी जीव-शक्ति जीव-गणे ।
ताटस्थ्ये प्रकाशे कृष्ण सेवार कारणे

15.18

दुइ प्रकार दशा विशिष्ट जीव
नित्य-बद्ध नित्य-मुक्त जीव द्वि-प्रकार ।
नित्य मुक्ते नित्य कृष्ण सेवा अधिकार

15.19

नित्य बद्ध माया गुणे करये संसार ।
बहिर्मुख अन्तर्मुख भेदे द्वि-प्रकार

15.20

अन्तर्मुख साधु-सङ्गे कृष्ण-नाम पाय ।
कृष्ण-नाम-प्रभावेते कृष्ण-धामे याय

15.21

रस नाम-स्वरूप
नाम त अखण्ड रस कलिका ताहार ।
कृष्ण आदि संज्ञा-रूपे विश्वेते प्रचार

15.22

रस रूप-स्वरूप
स्वल्प स्फुट कलिका से रूप मनोहर ।
श्री-गोलोके वृन्दावने श्री-श्यामसुन्दर

15.23

रस गुण-स्वरूप
सौरभित कलिका से चतुः-षष्ठि-गुण ।
प्रकाशे नामेर तत्त्व जानेन निपुण

15.24

रस लीला-स्वरूप
पूर्ण प्रस्फुटित नाम कुसुम सुन्दर ।
अष्ट-काल नित्य-लीला प्रकृतिर पर

15.25

भक्ति-स्वरूप
जीवे नाम कृपोदये स्वरूप ह्लादिनी ।
संवितेर सार-युता भक्ति-स्वरूपिणी

15.26

भक्ति-क्रिया
आविर्भूत हये नामे प्रस्फुटित करि ।
रसेर सामग्री प्रकाशये सर्वेश्वरी

15.27

विशुद्ध चिन्मय जीव लभिया स्वरूप ।
सेइ रसे प्रवेशे एइ अपरूप

15.28

रसेर विभाव आलम्बन
रसेर विभाव सेइ तत्त्व आलम्बन ।
तद्-आश्रय भक्त, तद्-विषय कृष्ण-धन

15.29

नाम करे अविरत भक्त महाशय ।
कृपा करि रूप-गुण-लीलार उदय

15.30

रसेर विभाव उद्दीपन
उद्दीपन कृष्ण-रूप गुणादिक यत ।
आलम्बन उद्दीपन विभावे संयुत

15.31

विभाव हैते अनुभाव
विभाव सम्पूर्ण हैले अनुभाव हय ।
प्रेमेर विकार सब शुद्ध प्रेम-मय

15.32

सञ्चारि-भाव ओ सात्त्विक-मिश्रे विभाव क्रिया करे, स्थायी-भाव-इ रस हय
सञ्चारी सात्त्विक क्रमे उदित ह-इले ।
स्थायीभाव रस हय सर्व-शास्त्र बले

15.33

ताहा पाइबार क्रम
सेइ रस सर्व-सार सिद्धि-सार जानि ।
परम पुरुष अर्थ सर्व-शास्त्रे मानि

15.34

भक्त्य्-उन्मुख जीव शुद्ध-गुरुर कृपाय ।
श्री-युगल ब्रह्म-नाम सौभाग्येते पाय

15.35

तुलसी-मालाय नाम सङ्ख्या करि स्मरे ।
अथवा कीर्तन करे परम आदरे

15.36

एक ग्रन्थ सङ्ख्या करि आरम्भिबे नाम ।
क्रमे तिन लक्ष स्मरि पूरे मनस्काम

15.37

सङ्ख्या मध्ये किछु नाम करिबे कीर्तन ।
ताते सर्वेन्द्रिय स्फूर्ति आनन्द-नर्तन

15.38

नाम नव-विध अङ्ग करय आश्रय ।
तथापि कीर्तन स्मृति सर्व-श्रेष्ठ हय

15.39

अर्चन-मार्ग ओ श्रवण-कीर्तनेर अधिकार-भेदे क्रिया-भेद
अर्चन-मार्गेते गाढतर रुचि याङ्र ।
श्रवण-कीर्तन-सिद्धि ताहाते ताङ्हार

15.40

नामे ऐकान्तिकी रति ह-इबे याङ्हार ।
श्रवण-कीर्तन-स्मृति केवल ताङ्हार

15.41

नाम श्रवण-कीर्तन-स्मरणे ये क्रम
सेवा नति दास्य सख्य आत्म-निवेदन ।
सहजे नामेर सङ्गे हय प्रवर्तन

15.42

नाम-नामी एक तत्त्व विश्वास करिया ।
दश अपराध छाडि निर्जने बसिया

15.43

अति स्वल्प दिने नाम ह-इया सदय ।
श्री-श्यामसुन्दर-रूपे हयेन उदय

15.44

यबे नाम-रूपे ऐक्य हयत साधने ।
नाम लैते रूप आइसे चित्ते सर्व-क्षणे

15.45

तार किछु दिने रूपे गुण करि योग ।
श्री-नाम स्मरणे गुण करय सम्भोग

15.46

नाम-रूप-गुणेर एकता
स्वल्प-दिने नाम रूप गुण एक हय ।
नाम लैते सर्व-क्षणे तिनेर उदय

15.47

उपासना मन्त्र ध्यान मयी
मन्त्र ध्यान मयी एइ नाम उपासना ।
प्राथमिक धारा जानि करे विभावना

15.48

स्मृति काले योग पीठे कल्प-द्रुम-तले ।
गोप-गोपी-वृते कृष्णे देखे कुतूहले

15.49

सात्त्विक-विकार सब हय प्रस्फुटित ।
भजन आनन्दे भक्त हय पुलकित

15.50

क्रमे यबे नाम स्व-सौरभे प्रफुल्लित ।
अष्ट-काल कृष्ण-लीला ह-इबे उदित

15.51

स्वारसिकी उपासना
स्वारसिकी उपासना ह-इबे उदय ।
लीलोचित पीठे कृष्णे दर्शन करय

15.52

सङ्गे सङ्गे गुरु-कृपा सिद्ध-स्वरूपेते ।
लीलाय प्रवेशे भक्त सखीर सङ्गेते

15.53

महाभाव स्वरूपिणी वृषभानु-सुता ।
ताङ्र अनुगत भक्ति सदा प्रेम-युता

15.54

सखी आज्ञा मते करे युगल-सेवन ।
महा-प्रेमे मग्न हय से रसिक जन

15.55

लिङ्ग-भङ्गे वस्तु-सिद्धि
साधन-भजन-सिद्धि लागालागि ताय ।
लिङ्ग-भङ्गे वस्तु-सिद्धि तोमार कृपाय

15.56

तद्-उत्तरावस्था वर्णन हय ना, केवल अनुभूत हय
इहार अधिक आर वाक्य नाहि चले ।
तद् उत्तर अनुभव लभि कृपा-बले

15.57

एइ त उज्ज्वल रस परम साधन ।
इहाते निश्चय मिले कृष्ण प्रेम धन

15.58

साधने एकादश भाव
साधिते उज्ज्वल-रस आछे भाव एकादश
सम्बन्ध वयस नाम रूप ।
यूथ वेश आज्ञा-वास सेवा पराकाष्ठाश्वास
पाल्य-दासी एइ अपरूप

15.59

भाव साधने पञ्च-दशा
एइ एकादश भाव सम्पूर्ण साधने ।
पञ्च दशा लक्ष्य हय साधक जीवने

15.60

श्रवण वरण आर स्मरण आपन ।
सम्पत्ति ए पञ्च-विध दशाय गणन

15.61

प्रथम श्रवण दशा
निजापेक्षा श्रेष्ठ शुद्ध-भावुक ये जन ।
भाव-मार्गे गुरुदेव सेइ महाजन

15.62

ताङ्हार श्रीमुखे भाव-तत्त्वेर श्रवण ।
ह-इले श्रवण-दशा हय प्रकटन

15.63

भाव-तत्त्व
भाव-तत्त्व द्वि-प्रकार करह विचार ।
निज एकादश भाव कृष्ण-लीला आर

15.64

क्रमे वरण दशा प्राप्ति
राधा-कृष्ण अष्ट-काल येइ लीला करे ।
ताहार श्रवणे लोभ हय अतःपरे

15.65

लोभ ह-इले गुरु-पदे जिज्ञासा उदय ।
केमने पाइब लीला कह महाशय

15.66

गुरुदेव कृपा करि करिबे वर्णन ।
लीला-तत्त्वे एकादश भाव-सङ्घटन

15.67

प्रसन्न ह-इया प्रभु करिबे आदेश ।
एइ भावे लीला-मध्ये करह प्रवेश

15.68

शुद्ध रूपे सिद्ध भाव करिया श्रवण ।
सेइ भाव स्वीय चित्ते करिबे वरण

15.69

निज-रुचि श्री-गुरु-देवके बलिबे
वरण कालेते निज रुचि विचारिया ।
गुरु-पदे जानाइबे सरल ह-इया

15.70

प्रभु तुमि कृपा करि येइ परिचय ।
दिले मोरे ताहे मोर पूर्ण प्रीति हय

15.71

स्वभावतः मोर एइ भावे आछे रुचि ।
अतएव आज्ञा शिरे धरि ह्ये शुचि

15.72

अन्य-रुचि ह-इले गुरुदेव अन्य-भाव दिबेन
रुचि यदि नहे तबे अकपट मने ।
निवेदिबे निज-रुचि श्री-गुरु-चरणे

15.73

विचारिया गुरुदेव दिबे अन्य-भाव ।
ताहे रुचि ह-इले प्रकाशिबे निज-भाव

15.74

निज-सिद्ध-भाव गुरु-देवके जानाइबे
एइ रूपे गुरु शिष्य संवादे घटने ।
निज-सिद्ध-भाव स्थिर ह-इबे ये क्षणे

15.75

शिष्य गुरु-पदे पडि करिबे मिनति ।
मागिबे भावेर सिद्धि करिया काकुति

15.76

कृपा करि गुरुदेव करिबे आदेश ।
शिष्य सेइ भावे तबे करिबे प्रवेश

15.77

दृढ वरण
श्री-गुरु-चरणे पडि बलिबे तखन ।
तवादिष्ट भाव आमि करिमु वरण

15.78

ए भाव कखन आमि ना छाडिब आर ।
जीवने मरणे एइ सङ्गी ये आमार

15.79

भजने प्रतिबन्धक विचार
निज सिद्ध एकादश भावे व्रती हये ।
स्मरिबे सुदृढ-चित्ते निज-भाव-चये

15.80

स्मरणे विचार एक आछे त सुन्दर ।
आपनेर योग्य-स्मृति कर निरन्तर

15.81

आपनेर अयोग्य स्मरण यदि हय ।
बहु युग साधिले-ओ सिद्धि कभु नय

15.82

आपन-दशा
आपन-साधने स्मृति यबे हये व्रती ।
अचिरे आपन-दशा हय शुद्ध अति

15.83

निज शुद्ध-भावेर ये निरन्तर स्मृति ।
ताहे दूर हय शीघ्र जड-बद्ध-मति

15.84

बद्ध-जीव ये क्रमे भाव प्राप्त हन
जड-बद्धजीव भुलि निज सिद्ध-सत्त्व ।
जड अभिमाने हय जड-देहे मत्त

15.85

तबे यदि कृष्ण-लीला करिया श्रवण ।
लोभ हय पाइबारे निज सिद्ध-धन

15.86

तबे भाव-तत्त्व-स्मृति अनुक्षण करे ।
भाव यत बाडे तार भ्रान्ति तत हरे

15.87

स्मरण दशा । ताहाते वैध ओ रागानुगता भावेर भेद । शेषटीर-इ प्रयोजन
स्मरण द्विविध वैध रागानुग आर ।
रागानुगा स्मृति युक्ति-शास्त्र हैते पार

15.88

माधुर्य आकृष्ट हये करये स्मरण ।
अचिराते प्राप्त हय दशा भावापन

15.89

वैध-भक्तेर उन्नति-क्रमे
वैध-भक्त स्मृति-काले सदा विचारय ।
अनुकूल युक्ति-शास्त्र यखन ये हय

15.90

भावापने हय भाव आविर्भाव-काल ।
शास्त्र-युक्ति छाडे तबे जानिया जञ्जाल

15.91

श्रद्धा निष्ठा रुच्य्-आसक्ति-क्रमे येइ भाव ।
आपन समये ताहा हय आविर्भाव

15.92

आपन-दशाय रागानुग ओ वैध-भक्तेर भेद नाइ
भावापने रागानुगा वैध-भक्त भेद ।
नाहि थाके कोन मते गाय स्मृति वेद

15.93

पञ्च-विध स्मरण
स्मरण धारणा ध्यान अनुस्मृति आर ।
समाधि ए पञ्चविध स्मरण प्रकार

15.94

भावापन दशार उदय काल
समाधि स्वरूप स्मृति ये समये हय ।
भावापन दशा आसि ह-इबे उदय

15.95

से समये ये अवस्था हय
सेइ काले निज सिद्ध-देह अभिमान ।
पराजिया जड-देह हबे अधिष्ठान

15.96

तखन स्वरूपे व्रज-वास क्षणे क्षण ।
भावापने स्व-स्वरूपे हेरि व्रज-वन

15.97

आपने स्वरूप-सिद्धि, वस्तु-सिद्धि लिङ्ग-भङ्गे
आपने स्वरूप-सिद्धि लभे भाग्यवान् ।
लिङ्ग-भङ्गे वस्तु-सिद्धि सम्पत्ति विधान

15.98

साधन-सिद्धिर फल
ह-इया साधन-सिद्धा नित्य-सिद्धा सह ।
समता लभिया कृष्ण-सेवे अहरहः

15.99

नाम-द्वारा सिद्धि-लाभ
सेवा-भङ्ग आर तार कभु नाहि हय ।
परम उज्ज्वल रसे सतत मातय

15.100

नाम से परम धन नामेर आश्रये ।
एत सिद्धि पाय जीव शुद्ध-सत्त्व हये

15.101

संक्षेपे क्रम परिचय
अतएव भक्त्य्-उन्मुख-जन साधु-सङ्गे ।
निर्जने करिबे नाम क्रमेर अभङ्गे

15.102

क्रमे क्रमे अल्प-काले सर्व-सिद्धि हय ।
कुसङ्ग वर्जिया साधु-सङ्गे फलोदय

15.103

(1) साधु-सङ्ग, (2) सुनिर्जन, (3) दृढ-भाव
साधु-सङ्ग सुनिर्जन निज दृढ-भाव ।
एइ तिन बले लभि महिमा स्वभाव

15.104

आमि हीन क्षुद्र-मति विषये विभोर ।
साधु-सङ्ग विवर्जित सदा आत्म-चोर

15.105

अहैतुकी कृपा कभु करिया विस्तार ।
भक्ति-रसे गति देह प्रार्थना आमार

15.106

एत बलि हरिदास प्रेमे अचेतन ।
श्री-गौराङ्ग पदे करे देह समर्पण

15.107

प्रेमे गद्गद प्रभु ताङ्हारे उठाय ।
आलिङ्गन दिया चित्त-कथा बले ताय

15.108

प्रभुर आज्ञा
शुन हरिदास एइ लीला संगोपने ।
विश्व अन्धकार करिबेक दुष्ट जने

15.109

सेइ काले तोमार ए चरमोपदेश ।
अवशिष्ट साधु-जने बुझिबे विशेष

15.110

एइ तत्त्व नामाश्रये निष्किञ्चन जन ।
निर्जने बसिया कृष्ण करिबे भजन

15.111

निज निज भाग्य-बले जीव पाय भक्ति ।
भक्ति लभिबारे सकलेर नाहि शक्ति

15.112

सुकृति जनेर भक्ति दृढ करिबारे ।
आइलाम युग-धर्म नामेर प्रचारे

15.113

हरिदास ठाकुर नाम-प्रचारेर सहाय
तुमि त सहाय मोर ए कार्य साधने ।
तव मुखे नाम-तत्त्व शुनि ए कारणे

15.114

हरिनाम चिन्तामणि अखिल अमृत खनि
कृष्ण-कृपा बले ये पाइल ।
कृतार्थ से महाशय सदा पूर्णानन्द-मय
राग-भावे श्री-कृष्ण भजिल

15.115

ताङ्हार चरण धरि सदा काकुति करि
काङ्दे एइ अकिञ्चन छार ।
ए अमृत-रस-लेश पियाइया अवशेष
कर सार आनन्द विस्तार

मूल पाठ: Harināmacintāmaṇi · Data entry n.n. · GRETIL (Göttingen) · CC BY-NC-SA 4.0

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