हरिनामचिन्तामणि · अध्याय 12
(12)
द्वादश परिच्छेद
नामापराध प्रमाद
प्रमादः
जय जय महाप्रभु जय भक्त-गण ।
जाङ्देर प्रसादे करि नाम-सङ्कीर्तन
प्रमाद-नामक अपराध
हरिदास बले प्रभु हेथा सनातने ।
आर त गोपाल भट्ट दक्षिण भ्रमणे
शिखाइले अप्रमादे श्री-कृष्ण-भजने ।
प्रमादके अपराधे करिले गणन
अन्य अपराध त्ज्यजि सदा नाम लय ।
तबु नामे प्रेम नाहि हय त उदय
तबे जानि प्रमाद नामेते अपराध ।
प्रेम भक्ति साधनेते करितेछे बाध
अनवधानकेइ प्रमाद बले
प्रमाद अनवधान एइ मूल अर्थ ।
इहा हैते घटे प्रभु सकल अनर्थ
तिन प्रकार अनवधान
औदासीन्य जाड्य आर विक्षेप ए तिन ।
प्रकार अनवधान बुझिबे प्रवीण
अनुराग ना हओआ पर्यन्त नाम ग्रहणे यत्नेर आवश्यक
कोन भाग्ये कोन जीवेर श्रद्धा यदि हय ।
तबे तिङ्ह हरिनाम ग्रहण करय
यत्न करि स्मरे नाम सङ्ख्यार सहित ।
तबे नामे अनुराग हय त उदित
ये पर्यन्त अनुराग ना हय उदय ।
से पर्यन्त यत्न करि नाम सदा लय
यत्नाभावे साधकेर चित्त स्थिर हय ना
निसर्गतः लोक सब विषये आसक्त ।
स्मृति-काले विषय अन्तरे अनुरक्त
रुचि याय अन्य स्थाने नामे उदासीन ।
नामे चित्त मग्न नहे जपे प्रतिदिन
चित्त एक दिके आर अन्य दिके नाम ।
ताहार मङ्गल किसे हय गुण धाम
लक्ष नाम हैले पूर्ण सङ्ख्या माला गणि ।
हृदये नहिल रस बिन्दु गुण मणि
एइ त अनवधान दोषेर प्रकार ।
विषयी हृदये प्रभु बड दुर्निवार
यत्न करिबार विधि
साधु सङ्गे स्वल्प काल छाडिया विषय ।
निर्जने ल-इले नाम एइ दोष क्षय
क्रमे क्रमे कृष्ण नामे चित्त हय स्थिर ।
निरन्तर नाम रसे हय त अधीर
तुलसीर सन्निकटे कृष्ण लीला स्थाने ।
साधु सन्निधाने बसिऽ सात्वत-विधाने
क्रमे काल वृद्धि करि सेइ नाम स्मरे ।
अति शीघ्र विषयेर छन्द ह-इते तरे
अन्य प्रक्रिया । एइ रूप करिले औदासीन्य रूप अनवधान हय ना
अथवा निर्जने बसिऽ स्मरि साधु-रीति ।
इन्द्रिय पिधान करिऽ नामे करे मति
सत्वरे नामेते निष्ठा रुचि क्रमे हय ।
औदासीन्य दोषे तार क्रमे हय क्षय
जाड्य-जनित अनवधान लक्षण
जाड्ये ये अनवधानअ अलसेर मने ।
ताहे रुचि नाहि हय श्री-नाम-ग्रहणे
स्मृति-काले पुनः शीघ्र विरामे प्रयास ।
एइ दोषे नाम-रस ना हय प्रकाश
अन्य कार्ये वृथा काल ना हय यापन ।
साधु गण इहा चिन्तिऽ स्मरे अनुक्षण
नाम स्मरे रसे मजे अन्य नाहि चाय ।
सेइ रूप साधु सङ्गे एइ दोस याय
अन्वेषिया सेइ रूप साधु-सङ्ग करे ।
तद्-अनुकरणे चित्त जाड्य परिहरे
अव्यर्थ कालत्व धर्म साधुर चरित ।
देखिले ताहाते रुचि ह-इबे निश्चित
मने हबे आहा कबे इहार समान ।
स्मरिब गाइब नाम हये भाग्यवान्
सेइ त उत्साह आसि अलसेर मने ।
जाड्य दूर करे कृष्ण-नामेर स्मरणे
मने हबे आज लक्ष नाम ये करिब ।
क्रमे क्रमे तिन लक्ष नाम ये स्मरिब
महाग्रह हबे चित्ते नामेर सङ्ख्याय ।
अचिरे याइबे जाड्य साधुर कृपाय
विक्षेप जनित अनवधान लक्षण
विक्षेप ह-इते येइ प्रमाद उदय ।
बहु यत्ने सेइ अपराध हय क्षय
कनक कामिनी आर जय पराजय ।
प्रतिष्ठाशा शाठ्य-वृत्ति ताहार निलय
ए सब आकृष्टि हृदे ह-इले उदय ।
नामेते अनवधान स्वभावतः हय
विक्षेप-त्यागेर उपाय
क्रमे क्रमे सेइ सब चिन्ता परिहारे ।
यतिबे सौभाग्यवान् वैष्णव आचारे
प्रथमेते हरि-दिने भोग-चिन्ता त्यजिऽ ।
साधु सङ्गे रात्र-दिन हरिनाम भजि
हरि-क्षेत्रे हरि दास हरि शास्त्रे लये ।
उत्सवे मजिबे सुखे परम निर्भये
क्रमे भक्ति-काल मन करिबे वर्धन ।
हरि-कथा महोत्सवे मजाइया मन
श्रेष्ठ रस क्रमे चित्ते ह-इबे उदय ।
जडेर निकृष्ट रस छाडिबे निश्चय
महाजन मुखे हरि-सङ्गीत श्रवणे ।
मुग्ध हबे मनः कर्ण रस आस्वादने
निकृष्ट विषय-स्पृहा ह-इबे विगत ।
नाम गाने चित्त स्थिर हबे अविरत
अतएव बहु यत्ने ए प्रमाद त्यजे ।
स्थिर चित्ते नाम रसे चिर दिन मजे
आग्रह
सङ्कल्पित नाम सङ्ख्या पूर्ण करिबारे ।
ना हय अयत्न नामे देखि बारे बारे
सतर्क ह-इया करि नाम सङ्कीर्तन ।
प्रमाद छाडिया करि नामेर भजन
सङ्ख्याधिक स्पृहा एकाग्र-मानसे ।
निरन्तर करिऽ नाम तव कृपा-बले
एइ कृपा कर प्रभु नामेते प्रमाद ।
ना बाधे आमार चित्ते नाम रसास्वाद
प्रक्रिया
एकाग्र मानसे निर्जनेते स्वल्प क्षण ।
नाम स्मृति अभ्यास करिबे भक्त जन
अतएव स्पष्ट नाम भाव लग्न मने ।
सदा हय ए प्रार्थना तोमार चरणे
आपन यत्नेते केह नाहि पारे ।
तोमार प्रसाद विना ए भव-संसारे
यत्नाग्रहेर आवश्यकता ।
निष्कपट नाम ग्रहणे ताहा अवश्य थाके, नतुवा अपराध
यत्न करि कृपा मागि व्याकुल अन्तरे ।
तुमि कृपामय कृपा कर अतःपरे
तव कृपा लाभे यदि ना करि यतन ।
तबे आमि भाग्य हीन हे शचीनन्दन
हरि-नाम-चिन्तामणि अलङ्कार यार ।
हरि-दास-पद-युग भरसा ताहार
मूल पाठ: Harināmacintāmaṇi · Data entry n.n. · GRETIL (Göttingen) · CC BY-NC-SA 4.0