गीतगोविन्द · अध्याय 2
विहरति वने राधा साधारण-प्रणये हरौ
विगलित-निज-उत्कर्षात् ईर्ष्या-वशेन गता अन्यतः ।
क्वचित् अपि लता-कुञ्जे गुञ्जत्-मधुव्रत-मण्डली-
मुखर-शिखरे लीना दीना अपि उवाच रहः सखीम् ॥
संचरत्-अधर-सुधा-मधुर-ध्वनि-मुखरित-मोहन-वंशम् ।
चलित-दृक्-अञ्चल-चञ्चल-मौलि-कपोल-विलोल-वतंसम् ॥
रासे हरिम् इह विहित-विलासम् स्मरति मनः मम कृत-परिहासम् ॥
चन्द्रक-चारु-मयूर-शिखण्डक-मण्डल-वलयित-केशम् ।
प्रचुर-पुरन्दर-धनुः-अनुरञ्जित-मेदुर-मुदिर-सुवेशम् ॥
रासे हरिम् इह विहित-विलासम् स्मरति मनः मम कृत-परिहासम् ॥
गोप-कदम्ब-नितम्बवती-मुख-चुम्बन-लम्भित-लोभम् ।
बन्धुजीव-मधुर-अधर-पल्लवम् उल्लसित-स्मित-शोभम् ॥
रासे हरिम् इह विहित-विलासम् स्मरति मनः मम कृत-परिहासम् ॥
विपुल-पुलक-भुज-पल्लव-वलयित-बल्लव-युवति-सहस्रम् ।
कर-चरण-उरसि मणि-गण-भूषण-किरण-विभिन्न-तमिस्रम् ॥
रासे हरिम् इह विहित-विलासम् स्मरति मनः मम कृत-परिहासम् ॥
जलद-पटल-वलत्-इन्दु-विनिन्दक-चन्दन-तिलक-ललाटम् ।
पीन-घन-स्तन-मण्डल-मर्दन-निर्दय-हृदय-कपाटम् ॥
रासे हरिम् इह विहित-विलासम् स्मरति मनः मम कृत-परिहासम् ॥
मणि-मय-मकर-मनोहर-कुण्डल-मण्डित-गण्डम् उदारम् ।
पीत-वसनम् अनुगत-मुनि-मनुज-सुर-असुर-वर-परिवारम् ॥
रासे हरिम् इह विहित-विलासम् स्मरति मनः मम कृत-परिहासम् ॥
विशद-कदम्ब-तले मिलितम् कलि-कलुष-भयं शमयन्तम् ।
माम् अपि किमपि तरङ्गत्-अनङ्ग-दृशा मनसा रमयन्तम् ॥
रासे हरिम् इह विहित-विलासम् स्मरति मनः मम कृत-परिहासम् ॥
श्रीजयदेव-भणितम् अतिसुन्दर-मोहन-मधुरिपु-रूपम् ।
हरि-चरण-स्मरणम् प्रति संप्रति पुण्यवताम् अनुरूपम् ॥
रासे हरिम् इह विहित-विलासम् स्मरति मनः मम कृत-परिहासम् ॥
गणयति गुण-ग्रामम् भामम् भ्रमात् अपि न ईहते
वहति च परीतोषम् दोषम् विमुञ्चति दूरतः ।
युवतिषु वलत्-तृष्णे कृष्णे विहारिणि माम् विना
पुनः अपि मनः वामम् कामम् करोति करोमि किम् ॥
निभृत-निकुञ्ज-गृहम् गतया निशि रहसि निलीय वसन्तम् ।
चकित-विलोकित-सकल-दिशा रति-रभस-रसेन हसन्तम् ॥
सखि हे केशिमथनम् उदारम्
रमय मया सह मदन-मनोरथ-भावितया सविकारम् ॥
प्रथम-समागम-लज्जितया पटु-चाटु-शतैः अनुकूलम् ।
मृदु-मधुर-स्मित-भाषितया शिथिली-कृत-जघन-दुकूलम् ॥
सखि हे केशिमथनम् उदारम्
रमय मया सह मदन-मनोरथ-भावितया सविकारम् ॥
किसलय-शयन-निवेशितया चिरम् उरसि मम एव शयानम् ।
कृत-परिरम्भण-चुम्बनया परिरभ्य कृत-अधर-पानम् ॥
सखि हे केशिमथनम् उदारम्
रमय मया सह मदन-मनोरथ-भावितया सविकारम् ॥
अलस-निमीलित-लोचनया पुलक-आवलि-ललित-कपोलम् ।
श्रम-जल-सकल-कलेवरया वर-मदन-मदात् अतिलोलम् ॥
सखि हे केशिमथनम् उदारम्
रमय मया सह मदन-मनोरथ-भावितया सविकारम् ॥
कोकिल-कल-रव-कूजितया जित-मनसिज-तन्त्र-विचारम् ।
श्लथ-कुसुम-आकुल-कुन्तलया नख-लिखित-घन-स्तन-भारम् ॥
सखि हे केशिमथनम् उदारम्
रमय मया सह मदन-मनोरथ-भावितया सविकारम् ॥
चरण-रणित-मणि-नूपुरया परिपूरित-सुरत-वितानम् ।
मुखर-विशृङ्खल-मेखलया स-कचग्रह-चुम्बन-दानम् ॥
सखि हे केशिमथनम् उदारम्
रमय मया सह मदन-मनोरथ-भावितया सविकारम् ॥
रति-सुख-समय-रस-आलसया दर-मुकुलित-नयन-सरोजम् ।
निःसह-निपतित-तनु-लतया मधुसूदनम् उदित-मनोजम् ॥
सखि हे केशिमथनम् उदारम्
रमय मया सह मदन-मनोरथ-भावितया सविकारम् ॥
श्रीजयदेव-भणितम् इदम् अतिशय-मधुरिपु-निधुवन-शीलम् ।
सुखम् उत्कण्ठित-गोप-वधू-कथितम् वितनोतु सलीलम् ॥
सखि हे केशिमथनम् उदारम्
रमय मया सह मदन-मनोरथ-भावितया सविकारम् ॥
हस्त-स्रस्त-विलास-वंशम् अनृजु-भ्रू-वल्लिमत् बल्लवी-
वृन्द-उत्सारि-दृक्-अन्त-वीक्षितम् अतिस्वेद-आर्द्र-गण्ड-स्थलम् ।
माम् उद्वीक्ष्य विलक्षितम् स्मित-सुधा-मुग्ध-आननम् कानने
गोविन्दम् व्रज-सुन्दरी-गण-वृतम् पश्यामि हृष्यामि च ॥
दुरालोक-स्तोक-स्तबक-नवक-अशोक-लतिका-
विकासः कासार-उपवन-पवनःऽपि व्यथयति ।
अपि भ्राम्यत्-भृङ्गी-रणित-रमणीया न मुकुल-
प्रसूतिः चूतानाम् सखि शिखरिणी इयम् सुखयति ॥
मूल पाठ: Gītagovinda · Edition: Barbara Stoler-Miller (New York 1977), with occasional amendments. · Data entry Jakub Cejka · GRETIL (Göttingen) · CC BY-NC-SA 4.0