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मार्कण्डेय पुराण

सब कुछ जानकर भी मोह क्यों नहीं छूटता: मार्कंडेय पुराण और समय का दर्शन

यह लेख इसमें बताए गए मूल ग्रंथों के आधार पर AI की सहायता से तैयार किया गया है; प्रकाशन के बाद मैं हर लेख पढ़कर सुधारता हूँ। हम AI का उपयोग कैसे करते हैं

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सब कुछ जानकर भी मोह क्यों नहीं छूटता: मार्कंडेय पुराण और समय का दर्शन

मार्कंडेय पुराण के अनुसार जानिए कि बुद्धि से मोह क्यों नहीं छूटता, काल को शक्ति का रूप क्यों माना गया है और आधुनिक विज्ञान से इसकी वास्तविक तुलना क्या है।

इस लेख में
  1. राजा सुरथ और समाधि वैश्य: जब बुद्धि भी दर्द को नहीं रोक पाती
  2. समय कोई खाली घड़ी नहीं, निरंतर बदलाव है: नारायणी स्तुति का संदेश
  3. तीन प्रलय और तीन रातें: कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि
  4. दर्शन को समझने के लिए छह आवश्यक संस्कृत शब्द
  5. पारंपरिक टीकाकारों की दृष्टि: भास्करराय और नागेश भट्ट
  6. गीता, सांख्य और काली के भयानक रूप से इसका संबंध
  7. आधुनिक विज्ञान और समय का तीर: थर्मोडायनामिक्स और न्यूरोसाइंस
  8. समानता कहाँ तक सच है और कहाँ टूट जाती है
  9. अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
  10. स्रोत

हम में से लगभग हर व्यक्ति ने जीवन में कभी न कभी यह अनुभव किया है कि हमारी सारी समझदारी धरी की धरी रह जाती है। हम भली-भांति जानते हैं कि कोई रिश्ता खत्म हो चुका है, कोई व्यापार घाटे में जाकर बंद हो चुका है, या किसी अपने ने हमारे साथ छल किया है। हम कागज़ पर लिखकर यह साबित कर सकते हैं कि उस बात से बाहर निकलना ही हमारे लिए सही है। हम अपने दोस्तों को भी बड़ी स्पष्टता से समझा सकते हैं कि अब पीछे मुड़कर देखना व्यर्थ है। लेकिन जैसे ही रात को हम अकेले बैठते हैं, मन चुपचाप उसी पुरानी बात, उसी व्यक्ति और उसी नुकसान के इर्द-गिर्द चक्कर काटने लगता है। छाती में भारीपन आ जाता है और दिमाग के सारे तर्क हवा हो जाते हैं।

आज की दुनिया में इसे अक्सर व्यक्ति की व्यक्तिगत कमजोरी मान लिया जाता है। लोग कहते हैं कि आप में अनुशासन की कमी है, आप मानसिक रूप से मजबूत नहीं हैं, या आपको अपनी सोच बदलने की कोई नई तकनीक सीखनी चाहिए।

जब मैंने पहली बार मार्कंडेय पुराण के 81वें से 93वें अध्याय तक फैले देवी महात्म्य को पढ़ा, जिसे लोकभाषा में दुर्गा सप्तशती भी कहा जाता है, तो मुझे लगा था कि इसमें केवल युद्ध की पौराणिक कथाएं होंगी। अधिकांश लोग इसे केवल मां दुर्गा द्वारा महिषासुर, शुंभ और निशुंभ के वध के रूप में जानते हैं। लेकिन यह ग्रंथ किसी रणभूमि से शुरू नहीं होता। यह जंगल में बैठे दो ऐसे टूटे हुए इंसानों से शुरू होता है, जो वही सवाल पूछ रहे हैं जो रात के सन्नाटे में हम खुद से पूछते हैं: जब बुद्धि सब कुछ जानती है, तो फिर मन उस पुरानी बात को छोड़ क्यों नहीं पाता?

राजा सुरथ और समाधि वैश्य: जब बुद्धि भी दर्द को नहीं रोक पाती

देवी महात्म्य का पहला अध्याय हमें दो पात्रों से मिलवाता है, राजा सुरथ और समाधि नाम का एक वैश्य। सुरथ एक न्यायप्रिय राजा थे, लेकिन उनके अपने ही मंत्रियों ने उनके साथ विश्वासघात किया, शत्रुओं ने उनके राज्य पर कब्जा कर लिया और उन्हें खाली हाथ अपनी राजधानी छोड़नी पड़ी। वे घोड़े पर सवार होकर एक घने जंगल में भाग गए और वहां मेधा ऋषि के शांत आश्रम में शरण ली।

उसी समय उस आश्रम में समाधि नाम का एक धनी व्यापारी पहुंचा। उसके लालची बेटों और पत्नी ने उसका सारा धन छीनकर उसे घर से बाहर निकाल दिया था। उसके पास अब कुछ भी नहीं बचा था।

दोनों एक पगडंडी पर मिले और आपस में बातचीत करने लगे। जैसे-जैसे उन्होंने अपने अनुभव साझा किए, उन्हें अपने भीतर एक अजीब अंतर्विरोध दिखाई दिया। दोनों में से कोई भी मूर्ख नहीं था। दोनों साफ-साफ जानते थे कि जिन लोगों को वे पीछे छोड़ आए हैं, वे स्वार्थी, क्रूर और धोखेबाज हैं। फिर भी उनका मन उन्हीं लोगों की चिंता में जल रहा था।

राजा सुरथ ने कहा कि यद्यपि उनके मंत्री भ्रष्ट थे, फिर भी उनका मन बार-बार सोचता है कि राजकोष सुरक्षित है या नहीं, उनका प्रिय हाथी भरपेट खा रहा है या नहीं, और उनकी प्रजा सुखी है या नहीं। व्यापारी समाधि ने अपनी व्यथा बताते हुए कहा कि उसके परिवार ने उसे लात मारकर निकाल दिया, फिर भी वह दिन-रात यही सोचता रहता है कि उसके बेटे सुखी हैं या नहीं और उसकी पत्नी ठीक से रह रही है या नहीं।

वे दोनों अपनी इस उलझन को लेकर सीधे महर्षि मेधा के पास पहुंचे:

तत्किमेतन्महाभाग यन्मोहो ज्ञानिनोरपि।
ममास्य च भवत्येषा विवेकान्धस्य मूढता॥
(मार्कण्डेय पुराण 81.33)

उन्होंने महर्षि से पूछा कि जब किसी मनुष्य के पास ज्ञान है, वह सब कुछ समझता है, तो फिर वह इस तरह अंधी आसक्ति में क्यों घिर जाता है? यदि अज्ञान से दुख होता है, तो ज्ञान होने पर भी यह दुख समाप्त क्यों नहीं होता?

महर्षि मेधा ने जो उत्तर दिया, वह मानव मन की समझ को पूरी तरह बदल देता है। उन्होंने समझाया कि मनुष्य की बौद्धिक समझ कोई परम सत्ता नहीं है। संसार के सभी जीवों के पास अपने स्तर का ज्ञान होता है। पक्षी भी जानते हैं कि दाना कहाँ है और खतरा कहाँ है। लेकिन सभी जीव बुद्धि से कहीं अधिक गहरे एक प्राकृतिक प्रवाह से बंधे हुए हैं।

ऋषि ने कहा कि यह आसक्ति कोई व्यक्तिगत दोष या इच्छाशक्ति की कमजोरी नहीं है। यह इस संसार के चलने का मूल नियम है। उन्होंने उस नियामक शक्ति को महामाया कहा, जो परम चेतना की वह सामर्थ्य है जिससे यह सारा जगत बनता है, टिकता है और निरंतर बदलता रहता है।

इसे समझाने के लिए महर्षि ने जंगल के पक्षियों का एक सरल उदाहरण दिया:

उन जंगली पक्षियों को देखिए। वे भूख से व्याकुल हैं। उनके अपने पेट खाली हैं। फिर भी वे दिन भर तिनका-तिनका और दाना चुनकर लाते हैं और अपने नन्हे बच्चों की चोंच में डालते हैं। क्या वे पक्षी यह उम्मीद करते हैं कि बुढ़ापे में उनके बच्चे उनकी सेवा करेंगे? क्या उन्हें अपने बच्चों से किसी अहसान की आशा है? बिल्कुल नहीं।

पक्षी अपने बच्चों को इसलिए नहीं खिलाते कि उन्होंने भविष्य के किसी लाभ का गणित लगाया है। वे ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि एक सहज आंतरिक वृत्ति, जिसे ग्रंथ में ममता कहा गया है, उनके भीतर काम कर रही है। मेधा ऋषि ने कहा कि जब सामान्य पशु-पक्षी इस सार्वभौमिक नियम से बंधे हैं, तो मनुष्य इससे अलग कैसे हो सकता है? हमारी बुद्धि प्रकृति के भीतर काम करने वाला एक छोटा सा औजार है, वह प्रकृति से बाहर खड़ी कोई स्वतंत्र न्यायाधीश नहीं है।

देवी महात्म्य के पहले अध्याय के 55वें श्लोक में यह स्पष्ट कहा गया है:

ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा |
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ||

भगवती महामाया ज्ञानियों के चित्त को भी अपनी शक्ति से खींचकर मोह में डाल देती हैं। आप केवल दिमागी फैसले लेकर अपने भीतर के इस गहरे नियम से खुद को अलग नहीं कर सकते।

समय कोई खाली घड़ी नहीं, निरंतर बदलाव है: नारायणी स्तुति का संदेश

मार्कंडेय पुराण केवल मन के दुख का विश्लेषण करके नहीं रुकता। वह हमारे इस आंतरिक खिंचाव को समय के मूल स्वभाव से जोड़ता है।

आम बोलचाल में हम समय को एक खाली कमरे या दीवार पर टंगी घड़ी की तरह देखते हैं, जिसके भीतर चीजें घटती हैं। हम सोचते हैं कि समय स्थिर है और घटनाएं उसमें से गुजर रही हैं। लेकिन देवी महात्म्य में समय कोई निर्जीव पैमाना नहीं है। समय एक सजीव, सक्रिय शक्ति है जो हर क्षण हर पदार्थ की अवस्था को बदल रही है।

पुराण के 91वें अध्याय में, जिसे नारायणी स्तुति कहा जाता है, सभी देवता मिलकर देवी की स्तुति करते हैं। वहां 9वें श्लोक में एक बेहद गंभीर बात कही गई है:

कलाकाष्ठादिरूपेण परिणामप्रदायिनि |
विश्वस्योपरतौ शक्ते नारायणि नमोऽस्तु ते ||

इस श्लोक में कहा गया है कि हे नारायणी, आप कला और काष्ठा जैसी समय की सूक्ष्मतम इकाइयों के रूप में पूरे संसार में निरंतर परिणाम यानी अवस्था-परिवर्तन लाती हैं, और जब यह सारा ब्रह्मांड शांत होता है, तब भी आप ही परम शक्ति के रूप में शेष रहती हैं। आपको हमारा प्रणाम है।

यहाँ प्रयुक्त शब्द परिणाम का अर्थ समझना बहुत जरूरी है। भारतीय दर्शन में परिणाम का अर्थ होता है किसी वस्तु की मूल प्रकृति का नष्ट हुए बिना उसकी अवस्था में वास्तविक बदलाव आना। जैसे दूध से दही बनना परिणाम है। बच्चे का जवान होना, या बारिश में लोहे पर जंग लगना परिणाम है।

यह श्लोक बताता है कि समय कोई काल्पनिक विचार नहीं है। समय का अर्थ है पदार्थ का लगातार बदलते रहना। देवी केवल सृष्टि बनाकर दूर नहीं बैठ गईं। वे हर कण के भीतर बदलाव की गति बनकर मौजूद हैं। प्राचीन काल-गणना में पलक झपकने को निमेष कहा जाता था, और उसके सूक्ष्म हिस्सों को काष्ठा और कला कहते थे। ग्रंथ कहता है कि समय की हर छोटी से छोटी इकाई में देवी ही वह शक्ति हैं जो किसी भी रूप को नए से पुराना, पुराने से जर्जर और जर्जर से शांत कर देती हैं।

जब हम इस दृष्टि से देखते हैं, तो हमारे व्यक्तिगत दुख का कारण साफ हो जाता है। हम जिस रिश्ते, अपनी जवानी, या जीवन के किसी सुखद दौर को हमेशा के लिए पकड़ कर रखना चाहते हैं, वह टिक नहीं सकता क्योंकि सृष्टि की पूरी व्यवस्था ही निरंतर बदलाव पर टिकी है। किसी पुरानी स्थिति को जबरन पकड़े रहने की कोशिश उस नदी को रोकने जैसी है जिसे बहते रहने के लिए ही बनाया गया है।

तीन प्रलय और तीन रातें: कालरात्रि, महारात्रि और मोहरात्रि

मार्कंडेय पुराण अपने पहले ही अध्याय में समय और प्रलय के तीन अलग-अलग स्तरों की चर्चा करता है, जिन्हें रात्रि-त्रय या तीन रातें कहा गया है।

सृष्टि के आरंभ से पहले जब केवल अथाह कारण-जल था, तब सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु शेषनाग की शैय्या पर योगनिद्रा में लीन थे। उसी समय उनके कान के मैल से मधु और कैटभ नाम के दो भयंकर असुर उत्पन्न हुए और वे कमल पर बैठे ब्रह्मा जी को मारने दौड़े।

ब्रह्मा जी अकेले थे और विष्णु सो रहे थे। ब्रह्मा जी चाहते तो विष्णु को जगा सकते थे, लेकिन विष्णु साधारण नींद में नहीं थे; वे तो योगनिद्रा के वश में थे। तब ब्रह्मा जी ने समझा कि जो शक्ति पालनकर्ता को भी शांत कर सकती है, स्तुति उसी की करनी होगी। उन्होंने योगनिद्रा की प्रार्थना की।

अध्याय 81 के 78वें श्लोक में ब्रह्मा जी कहते हैं:

प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी |
कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारुणा ||

वे कहते हैं कि आप ही सबकी मूल प्रकृति हैं, तीनों गुणों को प्रकट करने वाली हैं, और आप ही कालरात्रि, महारात्रि और अत्यंत दारुण मोहरात्रि हैं।

ये तीनों रातें वास्तव में समय के रुकने और विनाश के तीन अलग-अलग आयामों को दर्शाती हैं।

रात का नामप्रलय का स्तरअनुभव और स्वरूप
कालरात्रिमहाप्रलय (ब्रह्मांडीय अंत)ब्रह्मा के सौ वर्ष पूरे होने पर जब देश, काल और सभी लोक समाप्त हो जाते हैं। सारा पदार्थ शून्य में लौट जाता है।
महारात्रिनैमित्तिक प्रलय (दैनिक विश्राम)ब्रह्मा का एक दिन समाप्त होने पर होने वाला कल्प-प्रलय। बाहरी संसार जल में डूब जाता है, पर कर्मों के बीज योगनिद्रा में सुरक्षित रहते हैं।
मोहरात्रिनित्य प्रलय (व्यक्तिगत मानसिक रात)प्रत्येक जीव का दैनिक मानसिक अनुभव। जब मनुष्य अनित्य को नित्य मान लेता है और खोने के डर में लगातार जलता रहता है।

कालरात्रि महाप्रलय की अवस्था है। जब सृष्टि का पूरा चक्र समाप्त होता है, तब सभी लोक, ग्रह, तारे और यहां तक कि प्राकृतिक नियम भी शांत होकर मूल कारण में विलीन हो जाते हैं। यह ब्रह्मांड का वह परम विश्राम है जहाँ समय स्वयं को समेट लेता है।

महारात्रि वह मध्यवर्ती विश्राम है जो कल्प के अंत में आता है। जब ब्रह्मा जी का एक दिन समाप्त होता है, तो दृश्य जगत कुछ समय के लिए विलीन हो जाता है। लेकिन जीवों के कर्म और संस्कार नष्ट नहीं होते; वे विष्णु के साथ योगनिद्रा में सोए रहते हैं ताकि अगली सुबह नया संसार रचा जा सके।

मोहरात्रि वह रात है जिसमें आप और मैं हर दिन जीते हैं। यह हमारे मन का वह अंधकार है जहाँ हम क्षणभंगुर चीजों को स्थायी मान बैठते हैं। मोहरात्रि के कारण ही हमें लगता है कि जो आज हमारे पास है, वह कभी छूटना नहीं चाहिए। जब वह बदलता है, तो हमें ऐसा लगता है मानो हमारे साथ कोई भारी अन्याय हो गया हो, जबकि वह केवल समय का स्वाभाविक नियम था।

ब्रह्मा जी ने योगनिद्रा की प्रार्थना इसलिए की क्योंकि कार्य करने वाले से पहले वह अवस्था आती है जिसमें कार्य संभव होता है। जब तक विष्णु के ऊपर छाई नींद की अवस्था नहीं हटेगी, तब तक विष्णु स्वयं भी कुछ नहीं कर सकते। इसी तरह जब तक हमारे भीतर की मोहरात्रि शांत नहीं होगी, तब तक केवल बौद्धिक विचार हमारे मन को शांति नहीं दे सकते।

दर्शन को समझने के लिए छह आवश्यक संस्कृत शब्द

मार्कंडेय पुराण के इस गंभीर चिंतन को ठीक से समझने के लिए हमें इसके छह मुख्य संस्कृत शब्दों को उनकी मूल भावना में देखना होगा।

पहला शब्द है परिणाम-प्रदायिनी। यह दो शब्दों से मिलकर बना है: परिणाम यानी एक अवस्था से दूसरी अवस्था में वास्तविक बदलाव, और प्रदायिनी यानी उसे देने वाली या उत्पन्न करने वाली। यह शब्द महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि यह संसार को जड़ या ठहरा हुआ नहीं मानता। यहाँ समय का अर्थ कोई कैलेंडर नहीं है, बल्कि वह आंतरिक गति है जिससे बीज से अंकुर फूटता है, देह बूढ़ी होती है और तारे ठंडे पड़ते हैं।

दूसरा शब्द-युग्म है कला और काष्ठा। ये प्राचीन भारत में समय नापने की बेहद सूक्ष्म इकाइयां थीं। पलक झपकने के समय को निमेष कहते हैं, और उसके छोटे अंशों को काष्ठा तथा कला कहा जाता है। ग्रंथ में इन सूक्ष्म पैमानों का उल्लेख यह दिखाता है कि पुराण समय को केवल युगों और कल्पों में नहीं देखता। जो शक्ति पूरे ब्रह्मांड को समेटती है, वही शक्ति एक पत्ते के सूखने और एक कोशिका के बदलने में हर पल सक्रिय है।

तीसरा शब्द है कालरात्रि। काल का अर्थ समय भी है और मृत्यु भी। रात्रि शब्द संस्कृत की 'रा' धातु से बना है, जिसका अर्थ होता है विश्राम देना या अपनी ओर समेट लेना। कालरात्रि कोई डरावना राक्षस नहीं है, बल्कि ब्रह्मांड का वह अंतिम विश्राम स्थल है जहाँ थकी हुई सृष्टि अपने सारे तनाव छोड़कर फिर से परम शांति में लौट जाती है।

चौथा शब्द है मोहरात्रि। मोह का अर्थ है भ्रम, चित्त का चकरा जाना या वास्तविकता को देखने की क्षमता खो देना। जब इसके साथ रात्रि जुड़ता है, तो यह उस मानसिक अंधेरे को दिखाता है जिसमें जीव अपने क्षणिक पदों, रिश्तों और संपत्तियों को ही अपना शाश्वत स्वरूप मान लेता है और अपनी वास्तविक चेतना को भूल जाता है।

पांचवां शब्द है योगनिद्रा। इसे अक्सर केवल ईश्वरीय नींद कह दिया जाता है, लेकिन यह बेहोशी नहीं है। यह समाधि की वह शांत अवस्था है जो किसी भी हलचल के शुरू होने से पहले होती है। इस अवस्था में चेतना किसी बाहरी नाम और रूप में उलझे बिना अपने शुद्ध स्वरूप में विश्राम करती है।

छठा शब्द-युग्म है चितिरूप और भ्रान्तिरूप। अध्याय 85 में, जिसे अपराजिता स्तुति कहा जाता है, देवता देवी को सभी प्राणियों में चेतना के रूप में प्रणाम करते हैं:

या देवी सर्वभूतेषु चितिरूपेण संस्थिता |
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ||

वे उन्हें विशुद्ध चेतना के रूप में नमन करते हैं। लेकिन इसी स्तुति में कुछ श्लोक आगे जाकर देवता उन्हीं देवी को भ्रम के रूप में भी उसी आदर से नमन करते हैं:

या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता |
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ||

यह विचार साधारण नहीं है। भारतीय परंपरा में भ्रम या भूल को किसी शैतान की देन नहीं माना गया। ग्रंथ कहता है कि जब आप ध्यान में शांत होते हैं तब भी वही चेतना है, और जब आपका मन किसी सांसारिक चिंता में भटक रहा होता है तब भी वही शक्ति एक सीमित दृष्टिकोण से काम कर रही होती है। भ्रम भी परम चेतना की ही एक क्रियाशील अवस्था है।

पारंपरिक टीकाकारों की दृष्टि: भास्करराय और नागेश भट्ट

सदियों से हमारे पारंपरिक विद्वानों ने इन श्लोकों की गहराई को समझने के लिए गंभीर भाष्य लिखे हैं। इन टीकाओं से पता चलता है कि हमारे पूर्वज चेतना और भौतिक बदलाव के संबंध को कितनी सूक्ष्मता से देखते थे।

अठारहवीं सदी के महान शाक्त विद्वान भास्करराय मखिन ने देवी महात्म्य पर अपनी प्रसिद्ध 'गुप्तवती' टीका में रात्रि-त्रय की बहुत सुंदर व्याख्या की है। उन्होंने लिखा कि कालरात्रि वह अवस्था है जहाँ संसार के सारे नाम और रूप सिमटकर बिंदु में लीन हो जाते हैं। उनके अनुसार काल कोई शत्रु नहीं है जो हमसे जीवन छीनता है, बल्कि वह व्यवस्था है जो बिखरे हुए संसार को वापस एकता में ले जाती है।

मोहरात्रि की व्याख्या करते हुए भास्करराय ने इसे आवरण शक्ति से जोड़ा। उन्होंने एक बहुत व्यावहारिक बात कही कि अगर मनुष्य पर यह मोह का पर्दा न हो, तो संसार का सामान्य व्यवहार ही असंभव हो जाएगा।

यदि एक मां को अपने बच्चे में केवल निराकार ब्रह्म दिखाई दे, तो वह उसे दूध नहीं पिला पाएगी। यदि एक किसान को खेत की मिट्टी और अपनी देह में कोई अंतर न दिखे, तो वह हल नहीं चला पाएगा। इसलिए सांसारिक जीवन को संभव बनाने के लिए चेतना का कुछ अंशों में सीमित होना अनिवार्य है। जिसे हम मोह कहते हैं, वह वास्तव में सृष्टि के नाटक को चलाने के लिए जरूरी व्यवस्था है।

प्रसिद्ध वैयाकरण और दार्शनिक नागेश भट्ट ने अपनी 'दुर्गा-प्रदीप' टीका में परिणाम-प्रदायिनी शब्द का व्याकरणसम्मत विश्लेषण किया। उन्होंने परिणाम का लक्षण बताया: अवस्थांतर-गमनम्, यानी किसी वस्तु के मूल तत्व में कोई विकार आए बिना केवल उसकी अवस्था का बदल जाना।

जैसे सोने को पिघलाकर हार बना दिया जाए और फिर तोड़कर कुंडल बना दिया जाए, तो उसके रूप बदलते हैं लेकिन सोना वही रहता है। नागेश भट्ट का तर्क है कि देवी महात्म्य इस शब्द के माध्यम से सांख्य दर्शन और अद्वैत दर्शन का समन्वय करता है। पूरी सृष्टि का मूल आधार एक अखंड चेतना ही है, लेकिन उसका स्वाभाविक स्वभाव समय और पदार्थ की विभिन्न अवस्थाओं में लगातार बदलते रहना है।

यहाँ आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत और मार्कंडेय पुराण के शाक्त दृष्टिकोण का एक सुंदर अंतर सामने आता है।

शंकराचार्य के अद्वैत में समय और नाम-रूप के इस संसार को अंततः 'मिथ्या' या अनिर्वचनीय माना गया है, जिसका अर्थ है कि पारमार्थिक दृष्टि से इसका कोई स्थायी अस्तित्व नहीं है। वहां बल इस बात पर है कि इस परिवर्तनशील जगत के भ्रम को काटकर कूटस्थ ब्रह्म को जाना जाए।

लेकिन मार्कंडेय पुराण का शाक्त दर्शन समय और बदलाव को झूठा भ्रम कहकर खारिज नहीं करता। यहाँ समय और बदलाव परम चेतना का ही साक्षात स्पंदन हैं। देवी केवल समय की रचयिता नहीं हैं, वे स्वयं काल-स्वरूपा हैं। इस दृष्टि में संसार कोई त्याज्य धोखा नहीं है, बल्कि उसी पराशक्ति का नृत्य है।

गीता, सांख्य और काली के भयानक रूप से इसका संबंध

मार्कंडेय पुराण का यह विचार भारतीय वांग्मय के अन्य प्रमुख ग्रंथों के साथ गहरा संवाद स्थापित करता है।

सनातन परंपरा में समय का सबसे प्रसिद्ध वर्णन भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय में मिलता है। जब अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण से उनका विश्वरूप दिखाने की प्रार्थना करते हैं, तो वे देखते हैं कि सारे योद्धा और राजा काल के जलते हुए मुखों में तेजी से समाते जा रहे हैं। भयभीत होकर अर्जुन पूछते हैं कि आप कौन हैं।

तब भगवान कृष्ण 32वें श्लोक में कहते हैं:

कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो
लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ||

"मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ काल हूँ और इस समय इन सब लोगों का संहार करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूँ।"

गीता में समय का यह रूप मुख्य रूप से विनाशक और पुरुषोचित इच्छा के रूप में सामने आता है, जो इतिहास के पुराने ढांचे को तोड़कर नए धर्म की स्थापना करता है।

मार्कंडेय पुराण इसका दूसरा पहलू प्रस्तुत करता है। समय केवल युगों के अंत में होने वाला अचानक विनाश नहीं है। वह एक स्त्री-तत्व की तरह पोषक, नियामक और हर सूक्ष्म क्षण में चलने वाला क्रमिक बदलाव भी है। वह बीज को अंकुरित करने वाला, बच्चे को पालने वाला और ऋतुओं को बदलने वाला प्रवाह है। जहाँ गीता समय को प्रलयकारी वज्र की तरह दिखाती है, वहीं पुराण समय को उस अविरल जलधारा की तरह दिखाता है जो धीरे-धीरे पत्थरों को तराशती रहती है।

इसी तरह यह ग्रंथ सांख्य दर्शन से भी जुड़ता है। सांख्य मूलतः एक द्वैतवादी दर्शन है। वह सृष्टि को दो अलग तत्वों में बांटता है: पुरुष, जो केवल निष्क्रिय और अपरिवर्तनीय चेतना है, और प्रकृति, जो त्रिगुणात्मक और सक्रिय है लेकिन पूरी तरह अचेतन और जड़ है। सांख्य के अनुसार प्रकृति अंधी है और पुरुष पंगु है।

मार्कंडेय पुराण सांख्य के तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) को स्वीकार करता है, लेकिन उसके द्वैत को पूरी तरह उलट देता है। पुराण में प्रकृति को अचेतन नहीं कहा गया; उसे चिद्रूपिणी यानी साक्षात चेतना कहा गया है। यहाँ प्रकृति कोई अंधी मशीन नहीं है जो आत्मा को धोखे से बांध लेती है। प्रकृति स्वयं चैतन्यमयी है और यह सारा भौतिक जगत उसी का जीवित शरीर है।

इस संदर्भ में जब हम पुराण के 87वें अध्याय में देवी के ललाट से काली के प्रकट होने का प्रसंग पढ़ते हैं, तो उसका दार्शनिक अर्थ स्पष्ट हो जाता है। जब चंड और मुंड की सेनाएं देवी पर आक्रमण करती हैं, तो देवी बाहर से किसी को सहायता के लिए नहीं बुलातीं।

क्रोध से उनकी भौहें टेढ़ी हो जाती हैं और उनके ललाट की सिलवटों से अचानक काली प्रकट होती हैं। ग्रंथ में उनका जो रूप बताया गया है वह बहुत तीव्र है: उनका रंग कोयले जैसा काला है, आंखें गड्ढों में धंसी हुई हैं, गले में नरमुंडों की माला है, शरीर पर केवल हड्डियां दिख रही हैं और उनकी जीभ लपलपा रही है। वे भयानक गर्जना करती हैं और युद्ध के हाथियों, घोड़ों और हथियारों को अपने खुले मुंह में डालकर चबाने लगती हैं।

यदि इसे केवल एक कहानी की तरह देखा जाए तो यह भयावह लगता है। लेकिन दार्शनिक दृष्टि से काली समय के उस रूप का साक्षात चित्र हैं जो सब कुछ निगल जाता है। वे ललाट यानी विचार और संकल्प के स्थान से निकलती हैं, क्योंकि समय हर मानवीय योजना और अहंकार को लील लेता है। उनका सूखा हुआ शरीर दिखाता है कि समय की भूख कभी शांत नहीं होती; वह कभी तृप्त नहीं होता। उनका खुला हुआ मुख वह अनंत शून्य है जिसमें हर साम्राज्य, हर इमारत और हर शरीर को एक दिन समा जाना है।

आधुनिक विज्ञान और समय का तीर: थर्मोडायनामिक्स और न्यूरोसाइंस

जब हम इन प्राचीन विचारों को आज की वैज्ञानिक समझ के साथ रखकर देखते हैं, तो कुछ बहुत स्वाभाविक विचार मन में उठते हैं।

आधुनिक भौतिकी में, विशेष रूप से ऊष्मागतिकी यानी थर्मोडायनामिक्स में, समय का तीर एक बेहद महत्वपूर्ण सिद्धांत है। हमारे दैनिक जीवन में घटनाएं केवल एक दिशा में घटती हैं। मेज से गिरकर टूटा हुआ कांच का गिलास कभी खुद जुड़कर वापस मेज पर नहीं आता।

समय के इस एकतरफा बहाव को भौतिकी में 'एंट्रॉपी' यानी अव्यवस्था की माप से समझाया जाता है। थर्मोडायनामिक्स का दूसरा नियम कहता है कि किसी भी बंद तंत्र में एंट्रॉपी हमेशा बढ़ती है। ऊर्जा धीरे-धीरे फैलती है और व्यवस्था से अव्यवस्था की ओर जाती है।

थर्मोडायनामिक्स की भाषा में समय केवल किसी नक्शे पर बना कोई बिंदु नहीं है, बल्कि वह भौतिक अवस्थाओं के कभी न लौटने वाले बदलाव की गति है। यह विचार मार्कंडेय पुराण के परिणाम-प्रदायिनी शब्द के साथ एक गहरा वैचारिक सामंजस्य दिखाता है। पुराण ने भी समय को किसी खाली बक्से की तरह नहीं, बल्कि पदार्थ की निरंतर बदलती अवस्था के रूप में देखा था।

इसके अलावा, कालरात्रि की अवधारणा आधुनिक खगोल भौतिकी के उस सिद्धांत से काफी मिलती-जुलती लगती है जिसे ब्रह्मांड की 'ऊष्मीय मृत्यु' या हीट डेथ कहा जाता है। इस गणितीय संभावना के अनुसार, अरबों-खरबों वर्षों बाद जब सारे तारे बुझ जाएंगे, सभी ब्लैक होल धीरे-धीरे वाष्पीकृत हो जाएंगे और ऊर्जा पूरे अंतरिक्ष में एक समान रूप से फैल जाएगी, तब तापमान पूर्ण शून्य के करीब पहुंच जाएगा। जब किसी भी प्रकार का भौतिक कार्य संभव नहीं रहेगा, तब व्यावहारिक रूप से समय की गति भी थम जाएगी। कालरात्रि का वर्णन भी ठीक इसी तरह के परम विश्राम का है, जहाँ सारा रूप और रंग अपने शांत कारण में विलीन हो जाता है।

वहीं दूसरी ओर, आधुनिक न्यूरोसाइंस यानी तंत्रिका विज्ञान में यह खोज की जा रही है कि मनुष्य का मस्तिष्क समय और 'स्वयं' के अस्तित्व को कैसे महसूस करता है।

लंबे समय तक माना जाता था कि दिमाग किसी घड़ी की तरह समय को निष्पक्ष रूप से नापता है। लेकिन एंटोनियो दमासिओ जैसे आधुनिक न्यूरोसाइंटिस्टों के अनुसंधानों ने दिखाया है कि हमारे समय का अनुभव और हमारी 'मैं' की भावना सीधे-सीधे हमारी शारीरिक आवश्यकताओं, भावनाओं और जीवित रहने की वृत्तियों से जुड़ी है।

हमारा मस्तिष्क लगातार हृदय की धड़कन, आंतों की हलचल, हार्मोन के उतार-चढ़ाव और भूख-प्यास के संकेतों को पढ़ता रहता है। इन्हीं शारीरिक संवेदनाओं से वह यह कहानी बुनता है कि 'मैं' समय में आगे बढ़ रहा हूँ। हम पुरानी बातों को याद करके इसलिए दुखी होते हैं क्योंकि हमारे मस्तिष्क का विकास उन चीजों को बचाने के लिए हुआ है जिन्हें वह 'मेरा' मानता है।

यह खोज महर्षि मेधा के उस विश्लेषण से बहुत मेल खाती है जहाँ उन्होंने मोहरात्रि और ममता को समझाया था। ऋषि ने स्पष्ट कहा था कि हमारा मोह कोई बौद्धिक तर्क नहीं है, बल्कि वह जीवित रहने की एक गहरी जैविक वृत्ति है। भूखे पक्षी द्वारा अपने बच्चों को दाना खिलाने का उदाहरण यही दिखाता है कि यह खिंचाव हमारी नसों में बहुत गहरे से बैठा हुआ है।

समानता कहाँ तक सच है और कहाँ टूट जाती है

इन समानताओं को देखकर अक्सर लोग यह दावा करने लगते हैं कि हमारे ऋषियों ने हजारों साल पहले आधुनिक भौतिकी की खोज कर ली थी या देवी महात्म्य में थर्मोडायनामिक्स के समीकरण लिखे हैं।

एक गंभीर और प्रामाणिक दृष्टिकोण रखने वाले व्यक्ति के रूप में हमें ऐसे दावों से बहुत सावधान रहना चाहिए। यह अतिशयोक्ति न तो हमारी प्राचीन परंपरा का सम्मान करती है और न ही आधुनिक विज्ञान का। हमें पूरी ईमानदारी से यह समझना होगा कि यह तुलना कहाँ तक सही है और कहाँ जाकर पूरी तरह अलग हो जाती है।

सबसे पहला और बड़ा अंतर पद्धति और भाषा का है। मार्कंडेय पुराण में कोई गणितीय समीकरण, टेंसर कैलकुलस, या स्पेस-टाइम का कोई ज्यामितीय मॉडल नहीं है। आधुनिक विज्ञान प्रयोगशाला के प्रयोगों, प्रेक्षणों और सटीक गणितीय सूत्रों पर टिका है जिससे हम उपग्रहों की कक्षा तय कर सकते हैं। इसके विपरीत, पुराण एक दार्शनिक और आध्यात्मिक ग्रंथ है जो जीवन के गहरे अनुभवों और प्रतीकों की भाषा में बात करता है।

दूसरा मौलिक अंतर उद्देश्य का है। आधुनिक भौतिकी में एंट्रॉपी एक अंधी, सांख्यिकीय प्रक्रिया है। अणु बिना किसी चेतना या उद्देश्य के आपस में टकराते हैं। ब्रह्मांड में बिखराव इसलिए बढ़ता है क्योंकि अव्यवस्था की गणितीय संभावनाएं व्यवस्था से कहीं अधिक होती हैं।

लेकिन मार्कंडेय पुराण में यह बदलाव कोई अंधी या बेमकसद प्रक्रिया नहीं है। यह परम चेतना की सचेत लीला है। यहाँ समय बुद्धिहीन नहीं है; वह भगवती की नियामक शक्ति है। यहाँ प्रलय कोई दुखद दुर्घटना नहीं है, बल्कि सृष्टि को नया जीवन देने के लिए किया गया एक पवित्र विश्राम है।

इसलिए हम ईमानदारी से केवल इतना कह सकते हैं: मार्कंडेय पुराण के ऋषियों ने जीवन, प्रकृति और समय के स्वभाव को बहुत ही गहरी मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक दृष्टि से देखा था। उन्होंने यह भली-भांति समझ लिया था कि समय केवल एक दिशा में बहता है, भौतिक जगत निरंतर परिवर्तनशील है, और मनुष्य का भावनात्मक दुख उसकी जैविक बनावट से जुड़ा है जिसे केवल बौद्धिक तर्कों से नहीं काटा जा सकता।

उन्होंने इन सत्यों को अपने युग की समृद्ध दार्शनिक भाषा में व्यक्त किया। आधुनिक विज्ञान के साथ उनकी तुलना करने से हमें उनकी अंतर्दृष्टि की गहराई समझ में आती है, लेकिन हमें कभी यह भूल नहीं करनी चाहिए कि एक आध्यात्मिक दर्शन और एक आधुनिक प्रयोगशाला के प्रयोग दोनों पूरी तरह से एक ही काम कर रहे हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

महर्षि मेधा ने राजा सुरथ से क्यों कहा कि केवल बुद्धि से दुख दूर नहीं हो सकता?

महर्षि मेधा ने समझाया कि भावनात्मक लगाव या मोह केवल जानकारी के अभाव से पैदा नहीं होता। यह महामाया की उस सार्वभौमिक शक्ति से संचालित होता है जो जीवन की निरंतरता और जैविक सुरक्षा को बनाए रखती है। जैसे कोई भूखा पक्षी बिना किसी भविष्य के लाभ की उम्मीद के अपने बच्चों को दाना खिलाता है, वैसे ही मनुष्य के भीतर भी 'ममता' या अपनेपन की भावना बहुत गहरे स्तर पर स्थापित होती है। क्योंकि यह खिंचाव बुद्धि से गहरे स्तर पर काम करता है, इसलिए केवल दिमागी तर्क इसे मिटा नहीं पाते।

कालरात्रि और मोहरात्रि में मुख्य अंतर क्या है?

कालरात्रि एक समष्टिगत या ब्रह्मांडीय प्रलय की अवस्था है। जब सृष्टि का पूरा चक्र समाप्त होता है, तो सारे लोक, भौतिक नियम और रूप शांत होकर अव्यक्त शून्य में समा जाते हैं। इसके विपरीत, मोहरात्रि एक व्यक्तिगत और मानसिक अवस्था है। यह वह अज्ञान है जिसमें एक साधारण व्यक्ति अनित्य और परिवर्तनशील रिश्तों व संपत्तियों को स्थायी मान बैठता है, और उनके बदलने पर गहरे अवसाद और दुख से घिर जाता है।

क्या मार्कंडेय पुराण इस भौतिक संसार को अद्वैत वेदांत की तरह मिथ्या मानता है?

नहीं। अद्वैत वेदांत में समय और परिवर्तनशील जगत को प्रायः अनिर्वचनीय या मिथ्या माना गया है, जिसका अंतिम सत्य के स्तर पर कोई स्थायी अस्तित्व नहीं होता। इसके विपरीत, मार्कंडेय पुराण का दृष्टिकोण शाक्त अद्वैत का है। यह समय और भौतिक बदलाव को झूठा भ्रम नहीं मानता, बल्कि इसे परम चेतना का ही सजीव स्पंदन मानता है। यहाँ संसार त्याज्य नहीं है, बल्कि साक्षात भगवती का निरंतर बदलता हुआ स्वरूप है।

क्या मार्कंडेय पुराण ने थर्मोडायनामिक्स के दूसरे नियम की खोज कर ली थी?

नहीं। पुराण में कोई वैज्ञानिक प्रयोग, ताप के गणितीय सूत्र या आधुनिक प्रयोगशाला के नियम नहीं हैं। ग्रंथ में केवल यह दार्शनिक सत्य पहचाना गया है कि समय अनिवार्य रूप से निरंतर अवस्था-परिवर्तन का नाम है और भौतिक संरचनाएं अंततः विलीन होने की ओर बढ़ती हैं। इसे भौतिकी के साथ एक वैचारिक सामंजस्य कहा जा सकता है, कोई आधुनिक वैज्ञानिक खोज नहीं।

स्रोत

  • मार्कंडेय पुराण, अध्याय 81–93 (देवी महात्म्य / श्रीदुर्गा सप्तशती), मूल संस्कृत पाठ एवं पारंपरिक टीकाएं।
  • गुप्तवती टीका (देवी महात्म्य पर भाष्य), भास्करराय मखिन।
  • दुर्गा-प्रदीप टीका (देवी महात्म्य पर भाष्य), नागेश भट्ट।
  • श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 11, श्लोक 32।
  • शास्त्रीय सांख्य दर्शन (प्रकृति और त्रिगुण सिद्धांत)।
  • नॉन-इक्विलिब्रियम थर्मोडायनामिक्स एवं समय का तीर (आर्थर एडिंगटन, इल्या प्रोगोजिन)।
  • संज्ञानात्मक तंत्रिका विज्ञान एवं व्यक्तिपरक समय (एंटोनियो दमासिओ)।

यह वही दर्शाता है जो स्वयं मूल ग्रंथ कहता है; ऊपर की गई आधुनिक विज्ञान से तुलना केवल एक व्याख्या है, कोई स्थापित वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं।

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