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व्याकरणमहाभाष्य · भाग 521540

(प्_3,1.13.2) क_इइ,24.20-25 रो_इइइ,66 {3।8} लोहितायति लोहितायते पटपटायति पटपटायते .
(प्_3,1.13.2) क_इइ,24.20-25 रो_इइइ,66 {4।8} अथ अन्यानि लोहितादीनि .
(प्_3,1.13.2) क_इइ,24.20-25 रो_इइइ,66 {5।8} भृशादिषु इतराणि .
(प्_3,1.13.2) क_इइ,24.20-25 रो_इइइ,66 {6।8} भृशादिषु इतराणि पठितव्यानि .
(प्_3,1.13.2) क_इइ,24.20-25 रो_इइइ,66 {7।8} किम् प्रयोजनम् .
(प्_3,1.13.2) क_इइ,24.20-25 रो_इइइ,66 {8।8} ङितः इति आत्मनेपदम् यथा स्यात् इति .
(प्_3,1.14) क_इइ,215.2-11 रो_इइइ,67-68 {1।26} कष्टाय इति किम् निपात्यते .
(प्_3,1.14) क_इइ,215.2-11 रो_इइइ,67-68 {2।26} कष्टशब्दात् चतुर्थीसमर्थात् क्रमणे अनार्जवे क्य्ङ् निपात्यते .
(प्_3,1.14) क_इइ,215.2-11 रो_इइइ,67-68 {3।26} कष्टाय कर्मणे क्रामति कष्टायते .
(प्_3,1.14) क_इइ,215.2-11 रो_इइइ,67-68 {4।26} अत्यल्पम् इदम् उच्यते : कष्टाय इति .
(प्_3,1.14) क_इइ,215.2-11 रो_इइइ,67-68 {5।26} सत्त्रकक्षकष्टगहनेभ्यः कण्वचिकीर्षायाम् .
(प्_3,1.14) क_इइ,215.2-11 रो_इइइ,67-68 {6।26} सत्त्रकक्षकष्टगहनेभ्यः कण्वचिकीर्षायाम् इति वक्तव्यम् .
(प्_3,1.14) क_इइ,215.2-11 रो_इइइ,67-68 {7।26} सत्त्रायते .
(प्_3,1.14) क_इइ,215.2-11 रो_इइइ,67-68 {8।26} सत्त्र. ककष. कक्षायते .
(प्_3,1.14) क_इइ,215.2-11 रो_इइइ,67-68 {9।26} कष्ट .
(प्_3,1.14) क_इइ,215.2-11 रो_इइइ,67-68 {10।26} कष्टायते .
(प्_3,1.14) क_इइ,215.2-11 रो_इइइ,67-68 {11।26} कष्ट .
(प्_3,1.14) क_इइ,215.2-11 रो_इइइ,67-68 {12।26} गहन .
(प्_3,1.14) क_इइ,215.2-11 रो_इइइ,67-68 {13।26} गहनायते .
(प्_3,1.14) क_इइ,215.2-11 रो_इइइ,67-68 {14।26} अपरः आह:. सत्त्रादिभ्यः चतुर्थ्यन्तेभ्यः क्रमणे अनार्जवे क्यङ् वक्तव्यः .
(प्_3,1.14) क_इइ,215.2-11 रो_इइइ,67-68 {15।26} एतानि एव उदाहरणानि .
(प्_3,1.14) क_इइ,215.2-11 रो_इइइ,67-68 {16।26} सत्त्रादिभ्यः इति किमर्थम् .
(प्_3,1.14) क_इइ,215.2-11 रो_इइइ,67-68 {17।26} कुटिलाय क्रामति अनुवाकाय .
(प्_3,1.14) क_इइ,215.2-11 रो_इइइ,67-68 {18।26} चतुर्थ्यन्तेभ्यः इति किमर्थम् .
(प्_3,1.14) क_इइ,215.2-11 रो_इइइ,67-68 {19।26} अजः कष्टम् क्रामति .
(प्_3,1.14) क_इइ,215.2-11 रो_इइइ,67-68 {20।26} तत् तर्हि वक्तव्यम् .
(प्_3,1.14) क_इइ,215.2-11 रो_इइइ,67-68 {21।26} न वक्तव्यम् .
(प्_3,1.14) क_इइ,215.2-11 रो_इइइ,67-68 {22।26} न एतत् प्रत्ययान्तनिपातनम् .
(प्_3,1.14) क_इइ,215.2-11 रो_इइइ,67-68 {23।26} किम् तर्हि .
(प्_3,1.14) क_इइ,215.2-11 रो_इइइ,67-68 {24।26} तादर्थ्ये एषा चतुर्थी .
(प्_3,1.14) क_इइ,215.2-11 रो_इइइ,67-68 {25।26} कष्टाय यत् प्रातिपदिकम् .
(प्_3,1.14) क_इइ,215.2-11 रो_इइइ,67-68 {26।26} कष्टार्थे यत् प्रातिपदिकम् इति .
(प्_3,1.15) क_इइ,25.13-20 रो_इइइ,68 {1।16} रोमन्थे इति उच्यते .
(प्_3,1.15) क_इइ,25.13-20 रो_इइइ,68 {2।16} कः रोमन्थः नाम .
(प्_3,1.15) क_इइ,25.13-20 रो_इइइ,68 {3।16} उद्गीर्णस्य वा अवगीर्णस्य वा मन्थः रोमन्थः इति .
(प्_3,1.15) क_इइ,25.13-20 रो_इइइ,68 {4।16} यदि एवम् हनुचलने इति वक्तव्यम् .
(प्_3,1.15) क_इइ,25.13-20 रो_इइइ,68 {5।16} इह मा भूत् .
(प्_3,1.15) क_इइ,25.13-20 रो_इइइ,68 {6।16} कीटः रोमथम् वर्तयति .
(प्_3,1.15) क_इइ,25.13-20 रो_इइइ,68 {7।16} तत् तर्हि वक्तव्यम् .
(प्_3,1.15) क_इइ,25.13-20 रो_इइइ,68 {8।16} न वक्तव्यम् .

(प्_3,1.15) क_इइ,25.13-20 रो_इइइ,68 {9।16} कस्मात् न भवति .
(प्_3,1.15) क_इइ,25.13-20 रो_इइइ,68 {10।16} कीटः रोमथम् वर्तयति इति .
(प्_3,1.15) क_इइ,25.13-20 रो_इइइ,68 {11।16} अनभिधानात् .
(प्_3,1.15) क_इइ,25.13-20 रो_इइइ,68 {12।16} तपसः परस्मैपदम् च .
(प्_3,1.15) क_इइ,25.13-20 रो_इइइ,68 {13।16} तपसः परस्मैपदम् च इति वक्तव्यम् .
(प्_3,1.15) क_इइ,25.13-20 रो_इइइ,68 {14।16} तपः चरति तपस्यति .
(प्_3,1.15) क_इइ,25.13-20 रो_इइइ,68 {15।16} कथम् तपस्यते लोकजिगीषुः अग्नेः .
(प्_3,1.15) क_इइ,25.13-20 रो_इइइ,68 {16।16} छान्दसत्वात् भविष्यति .
(प्_3,1.16) क_इइ,25.22 रो_इइइ,69 {1।2} फेनात् च इति वक्तव्यम् .
(प्_3,1.16) क_इइ,25.22 रो_इइइ,69 {2।2} फेनायते .
(प्_3,1.17) क_इइ,26.2-8 रो_इइइ,69 {1।24} अटाट्ताशीकाकोटापोटासोटाप्रुष्टाप्लुष्टाग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_3,1.17) क_इइ,26.2-8 रो_इइइ,69 {2।24} अटा .
(प्_3,1.17) क_इइ,26.2-8 रो_इइइ,69 {3।24} अटायते .
(प्_3,1.17) क_इइ,26.2-8 रो_इइइ,69 {4।24} अट्टा .
(प्_3,1.17) क_इइ,26.2-8 रो_इइइ,69 {5।24} अट्टायते .
(प्_3,1.17) क_इइ,26.2-8 रो_इइइ,69 {6।24} शीका .
(प्_3,1.17) क_इइ,26.2-8 रो_इइइ,69 {7।24} शीकायते .
(प्_3,1.17) क_इइ,26.2-8 रो_इइइ,69 {8।24} कोटा .
(प्_3,1.17) क_इइ,26.2-8 रो_इइइ,69 {9।24} कोटायते .
(प्_3,1.17) क_इइ,26.2-8 रो_इइइ,69 {10।24} पोटा .
(प्_3,1.17) क_इइ,26.2-8 रो_इइइ,69 {11।24} पोटायते .
(प्_3,1.17) क_इइ,26.2-8 रो_इइइ,69 {12।24} सोटा .
(प्_3,1.17) क_इइ,26.2-8 रो_इइइ,69 {13।24} सोटायते .
(प्_3,1.17) क_इइ,26.2-8 रो_इइइ,69 {14।24} प्रुष्टा .
(प्_3,1.17) क_इइ,26.2-8 रो_इइइ,69 {15।24} प्रुष्टयते .
(प्_3,1.17) क_इइ,26.2-8 रो_इइइ,69 {16।24} प्लुष्टा .
(प्_3,1.17) क_इइ,26.2-8 रो_इइइ,69 {17।24} प्लुष्टायते .
(प्_3,1.17) क_इइ,26.2-8 रो_इइइ,69 {18।24} सुदिनदुर्दिनाभ्याम् च .
(प्_3,1.17) क_इइ,26.2-8 रो_इइइ,69 {19।24} सुदिनदुर्दिनाभ्याम् च इति वक्तव्यम् .
(प्_3,1.17) क_इइ,26.2-8 रो_इइइ,69 {20।24} सुदिनायते .
(प्_3,1.17) क_इइ,26.2-8 रो_इइइ,69 {21।24} दुर्दिनायते .
(प्_3,1.17) क_इइ,26.2-8 रो_इइइ,69 {22।24} नीहारात् च .
(प्_3,1.17) क_इइ,26.2-8 रो_इइइ,69 {23।24} नीहारात् च इति वक्तव्यम् .
(प्_3,1.17) क_इइ,26.2-8 रो_इइइ,69 {24।24} नीहारायते .
(प्_3,1.18) क_इइ,26.10-14 रो_इइइ,69 {1।12} कर्तृवेदनायाम् इति किमर्थम् .
(प्_3,1.18) क_इइ,26.10-14 रो_इइइ,69 {2।12} इह मा भूत् .
(प्_3,1.18) क_इइ,26.10-14 रो_इइइ,69 {3।12} सुखम् वेदयते प्रसाधकः देवदत्तस्य .
(प्_3,1.18) क_इइ,26.10-14 रो_इइइ,69 {4।12} कर्तृवेदनायाम् इति उच्यमाने अपि अत्र प्राप्नोति .
(प्_3,1.18) क_इइ,26.10-14 रो_इइइ,69 {5।12} किम् कारणम् .
(प्_3,1.18) क_इइ,26.10-14 रो_इइइ,69 {6।12} कर्तुः इति इयम् कर्तरि षष्ठी .

(प्_3,1.18) क_इइ,26.10-14 रो_इइइ,69 {7।12} वेदनायाम् इति च अनः भावे .
(प्_3,1.18) क_इइ,26.10-14 रो_इइइ,69 {8।12} सः यदि एव आत्मनः वेदयते अथ अपि परस्य कर्तृवेदना एव असौ भवति .
(प्_3,1.18) क_इइ,26.10-14 रो_इइइ,69 {9।12} न कर्तृग्रहणेन वेदना अभिसम्बध्यते .
(प्_3,1.18) क_इइ,26.10-14 रो_इइइ,69 {10।12} किम् तर्हि .
(प्_3,1.18) क_इइ,26.10-14 रो_इइइ,69 {11।12} सुखादीनि अभिसम्बध्यन्ते .
(प्_3,1.18) क_इइ,26.10-14 रो_इइइ,69 {12।12} कर्तुः यानि सुखादीनि .
(प्_3,1.19.1) क_इइ,16-23 रो_इइइ,70 {1।14} नमसः क्यचि द्वितीयानुपपत्तिः .
(प्_3,1.19.1) क_इइ,16-23 रो_इइइ,70 {2।14} नमसः क्यचि द्वितीया न उपपद्यते .
(प्_3,1.19.1) क_इइ,16-23 रो_इइइ,70 {3।14} नमस्यति देवान् .
(प्_3,1.19.1) क_इइ,16-23 रो_इइइ,70 {4।14} किम् कारणम् .
(प्_3,1.19.1) क_इइ,16-23 रो_इइइ,70 {5।14} नमःशब्देन योगे चतुर्थी विधीयते .
(प्_3,1.19.1) क_इइ,16-23 रो_इइइ,70 {6।14} सा प्राप्नोति .
(प्_3,1.19.1) क_इइ,16-23 रो_इइइ,70 {7।14} प्रकृत्यन्तरत्वात् सिद्धम् .
(प्_3,1.19.1) क_इइ,16-23 रो_इइइ,70 {8।14} नमःशब्देन योगे चतुर्थी विधीयते नमस्यतिशब्दः च अयम् .
(प्_3,1.19.1) क_इइ,16-23 रो_इइइ,70 {9।14} ननु च नमस्यतिशब्दे नमःशब्दः अस्ति .
(प्_3,1.19.1) क_इइ,16-23 रो_इइइ,70 {10।14} तेन योगे प्राप्नोति .
(प्_3,1.19.1) क_इइ,16-23 रो_इइइ,70 {11।14} न एषः दोषः .
(प्_3,1.19.1) क_इइ,16-23 रो_इइइ,70 {12।14} अर्थवतः नमःसाब्दस्य ग्रहणम् .
(प्_3,1.19.1) क_इइ,16-23 रो_इइइ,70 {13।14} न च नमस्यतिशब्दे नमःशब्दः अर्थवान् .
(प्_3,1.19.1) क_इइ,16-23 रो_इइइ,70 {14।14} अथ वा उपपदविभक्तेः कारकविभक्तिः बलीयसी इति द्वितीया भविष्यति .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {1।43} क्यजादिषु प्रत्ययार्थनिर्देशः .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {2।43} क्यजादिषु प्रत्ययार्थनिर्देशः कर्तव्यः .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {3।43} नमसः पूजायाम् .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {4।43} वरिवसः परिचर्यायाम् .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {5।43} चित्रङः आश्चर्ये .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {6।43} भाण्डात् समाचयने .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {7।43} चीवरात् अर्जने परिधाने वा .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {8।43} पुच्छात् उदसने व्य्ससने च इति .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {9।43} किम् प्रयोजनम् .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {10।43} क्रियावचनता यथा स्यात् .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {11।43} न एतत् अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {12।43} आचार्यप्रवृत्तिः ज्ञापयति क्रियावचनाः क्यजादयः इति यत् अयम् सनाद्यन्ताः धातवः इति धातुसञ्ज्ञाम् शास्ति .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {13।43} धातुसञ्ज्ञावचने एतत् प्रयोजनम् : धातोः इति तव्यदादीनाम् उत्पत्तिः यथा स्यात् .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {14।43} यदि च अत्र क्रियावचनता न स्यात् धातुसञ्ज्ञावचनम् अनर्थकम् स्यात् .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {15।43} सत्याम् अपि धातुसञ्ज्ञायाम् तव्यदादयः न स्युः .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {16।43} किम् कारणम् .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {17।43} साधने ताव्यादयः विधीयन्ते साधनम् च क्रियायाः .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {18।43} क्रियाभावात् साधनाभावः .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {19।43} साधनाभावात् सत्याम् अपि धातुसञ्ज्ञायाम् तव्यदादयः न स्युः .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {20।43} पश्यति तु आचार्यः क्रियावचनाः क्यजादयः इति ततः सनाद्यन्ताः धातवः इति धातुसञ्ज्ञाम् शास्ति .

(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {21।43} ननु च इदम् प्रयोजनम् स्यात् .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {22।43} परसाधने उत्पत्तिम् वक्ष्यामि इति .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {23।43} न परसाधने उत्पत्त्या भवितव्यम् .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {24।43} किम् कारणम् .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {25।43} साधनम् इति सम्बन्धिशब्दः अयम् .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {26।43} सम्बन्धिशब्दाः च पुनः एवमात्मकाः यत् उत सम्बन्धिनम् आक्षिपन्ति .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {27।43} तत् यथा .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {28।43} मातरि वर्तितत्व्यम् , पितरि शुश्रूषितव्यम् इति .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {29।43} न च उच्यते स्वस्याम् मातरि स्वस्मिन् वा पितरि इति , सम्बन्धात् च एतत् गम्यते या यस्य माता यः च यस्य पिता इति .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {30।43} एवम् इह अपि सम्बन्धात् एतत् गन्तव्यम् यस्य धातोः यत् साधनम् इति .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {31।43} अथ वा धातवः एव क्यजादयः .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {32।43} न च एव हि अर्थाः आदिश्यन्ते .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {33।43} क्रियावचनता च गम्यते .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {34।43} कः खलु अपि पचादीनाम् क्रियावचनत्वे यत्नम् करोति .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {35।43} येन एव खलु अपि हेतुना पचादयः क्रियावचनाः तेन एव क्यजादयः अपि .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {36।43} एवमर्थम् आचार्यः चित्रयति .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {37।43} क्व चित् अर्थान् आदिशति क्व चित् न .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {38।43} एवम् अपि अर्थादेशनम् कर्तव्यम् .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {39।43} कथम् इमे अबुधाः बुध्येरन् इति .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {40।43} अथ वा शक्यम् आदेशनम् अकर्तुम् .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {41।43} कथम् .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {42।43} करणे इति वर्तते .
(प्_3,1.19.2) क_इइ,27.1-22 रो_इइइ,70-72 {43।43} करणम् च करोतेः करोतिः च क्रियासामान्ये वर्तते .
(प्_3,1.21) क_इइ,27.25-28.11 रो_इइइ,72-74 {1।29} इमौ हलिकली स्तः इकारान्तौ .
(प्_3,1.21) क_इइ,27.25-28.11 रो_इइइ,72-74 {2।29} अस्ति हलशब्दः कलशब्दः च अकारान्तः .
(प्_3,1.21) क_इइ,27.25-28.11 रो_इइइ,72-74 {3।29} कयोः इदम् ग्रहणम् .
(प्_3,1.21) क_इइ,27.25-28.11 रो_इइइ,72-74 {4।29} यौ इकारान्तौ तयोः अत्वम् निपात्यते .
(प्_3,1.21) क_इइ,27.25-28.11 रो_इइइ,72-74 {5।29} किम् प्रयोजनम् .
(प्_3,1.21) क_इइ,27.25-28.11 रो_इइइ,72-74 {6।29} हलिकल्योः अत्वनिपातनम् सन्वद्भावप्रतिषेधार्थम् .
(प्_3,1.21) क_इइ,27.25-28.11 रो_इइइ,72-74 {7।29} हलिकल्योः अत्वनिपातनम् क्रियते सन्वद्भावः मा भूत् इति .
(प्_3,1.21) क_इइ,27.25-28.11 रो_इइइ,72-74 {8।29} अजहलत् अचकलत् .
(प्_3,1.21) क_इइ,27.25-28.11 रो_इइइ,72-74 {9।29} न एतत् अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_3,1.21) क_इइ,27.25-28.11 रो_इइइ,72-74 {10।29} इकारलोपे कृते अग्लोपिनाम् न इति प्रतिषेधः भविष्यति .
(प्_3,1.21) क_इइ,27.25-28.11 रो_इइइ,72-74 {11।29} वृद्धौ कृतायाम् लोपः .
(प्_3,1.21) क_इइ,27.25-28.11 रो_इइइ,72-74 {12।29} तत् न अग्लोपि अङ्गम् भवति .
(प्_3,1.21) क_इइ,27.25-28.11 रो_इइइ,72-74 {13।29} इदम् इह सम्प्रधार्यम् .
(प्_3,1.21) क_इइ,27.25-28.11 रो_इइइ,72-74 {14।29} वृद्धिः क्रियताम् अग्लोपः इति .
(प्_3,1.21) क_इइ,27.25-28.11 रो_इइइ,72-74 {15।29} किम् अत्र कर्तव्यम् .
(प्_3,1.21) क_इइ,27.25-28.11 रो_इइइ,72-74 {16।29} परत्वात् वृद्धिः .
(प्_3,1.21) क_इइ,27.25-28.11 रो_इइइ,72-74 {17।29} नित्यः लोपः .

(प्_3,1.21) क_इइ,27.25-28.11 रो_इइइ,72-74 {18।29} कृतायाम् अपि वृद्धौ प्राप्नोति अकृतायाम् अपि प्राप्नोति .
(प्_3,1.21) क_इइ,27.25-28.11 रो_इइइ,72-74 {19।29} अनित्यः लोपः .
(प्_3,1.21) क_इइ,27.25-28.11 रो_इइइ,72-74 {20।29} अन्यस्य कृतायाम् वृद्धौ प्राप्नोति अन्यस्य अकृतायाम् .
(प्_3,1.21) क_इइ,27.25-28.11 रो_इइइ,72-74 {21।29} शब्दान्तरस्य च प्राप्नुवन् विधिः अनित्यः भवति .
(प्_3,1.21) क_इइ,27.25-28.11 रो_इइइ,72-74 {22।29} वृद्धिः अपि अनित्या .
(प्_3,1.21) क_इइ,27.25-28.11 रो_इइइ,72-74 {23।29} अन्यस्य कृते लोपे प्राप्नोति अन्यस्य अकृते .
(प्_3,1.21) क_इइ,27.25-28.11 रो_इइइ,72-74 {24।29} शब्दान्तरस्य च प्राप्नुवन् विधिः अनित्यः भवति .
(प्_3,1.21) क_इइ,27.25-28.11 रो_इइइ,72-74 {25।29} उभयोः अनित्ययोः परत्वात् वृद्धिः .
(प्_3,1.21) क_इइ,27.25-28.11 रो_इइइ,72-74 {26।29} वृद्धौ कृतायाम् लोपः .
(प्_3,1.21) क_इइ,27.25-28.11 रो_इइइ,72-74 {27।29} तत् न अग्लोपि अङ्गम् भवति .
(प्_3,1.21) क_इइ,27.25-28.11 रो_इइइ,72-74 {28।29} अत्वे पुनः सति वृद्धिः क्रियताम् लोपः इति यदि अपि परत्वात् वृद्धिः वृद्धौ कृतायाम् अपि अक् एव लुप्यते .
(प्_3,1.21) क_इइ,27.25-28.11 रो_इइइ,72-74 {29।29} तस्मात् सुष्ठु उच्यते हलिकल्योः अत्वनिपातनम् सन्वद्भावप्रतिषेधार्थम् .
(प्_3,1.22.1) क_इइ,28.13-18 रो_इइइ,74-75 {1।12} समभिहारः इति कः अयम् शब्दः .
(प्_3,1.22.1) क_इइ,28.13-18 रो_इइइ,74-75 {2।12} समभिपूर्वात् हरतेः भावसाधनः घञ् .
(प्_3,1.22.1) क_इइ,28.13-18 रो_इइइ,74-75 {3।12} समभिहरणम् समभिहारः .
(प्_3,1.22.1) क_इइ,28.13-18 रो_इइइ,74-75 {4।12} तत् यथ पुष्पाभिहारः फलाभिहारः इति .
(प्_3,1.22.1) क_इइ,28.13-18 रो_इइइ,74-75 {5।12} विषमः उपन्यासः .
(प्_3,1.22.1) क_इइ,28.13-18 रो_इइइ,74-75 {6।12} बह्व्यः हि ताः सुमनसः .
(प्_3,1.22.1) क_इइ,28.13-18 रो_इइइ,74-75 {7।12} तत्र युक्तः समभिहारः .
(प्_3,1.22.1) क_इइ,28.13-18 रो_इइइ,74-75 {8।12} इह पुनः एका क्रिया .
(प्_3,1.22.1) क_इइ,28.13-18 रो_इइइ,74-75 {9।12} यदि अपि एका सामान्यक्रिया अवयवक्रियाः तु बह्व्यः अधिश्रयणोदकासेचनतण्डुलावपनैध्कोपकर्षण्क्रियाः .
(प्_3,1.22.1) क_इइ,28.13-18 रो_इइइ,74-75 {10।12} ताः कः चित् कार्त्स्न्येन करोति कः चित् अकार्त्स्न्येन .
(प्_3,1.22.1) क_इइ,28.13-18 रो_इइइ,74-75 {11।12} यः कार्त्स्न्येन करोति सः उच्यते पापच्यते इति .
(प्_3,1.22.1) क_इइ,28.13-18 रो_इइइ,74-75 {12।12} पुनः पुनः वा पचति पापच्यते इति .
(प्_3,1.22.2) क_इइ,28.19-29.12 रो_इइइ,75-76 {1।28} अथ धातुग्रहणम् किमर्थम् .
(प्_3,1.22.2) क_इइ,28.19-29.12 रो_इइइ,75-76 {2।28} इह मा भूत् प्राटति भृशम् इति .
(प्_3,1.22.2) क_इइ,28.19-29.12 रो_इइइ,75-76 {3।28} अतः उत्तरम् पठति .
(प्_3,1.22.2) क_इइ,28.19-29.12 रो_इइइ,75-76 {4।28} यङ्विधौ धातुग्रहणे उक्तम् .
(प्_3,1.22.2) क_इइ,28.19-29.12 रो_इइइ,75-76 {5।28} किम् उक्तम् .
(प्_3,1.22.2) क_इइ,28.19-29.12 रो_इइइ,75-76 {6।28} तत्र तावत् उक्तम् कर्मग्रहणात् सन्विधौ धातुग्रहणानर्थक्यम् .
(प्_3,1.22.2) क_इइ,28.19-29.12 रो_इइइ,75-76 {7।28} सोपसर्गम् कर्म इति चेत् कर्मविशेषकत्वात् उपसर्गस्य अनुपसर्गम् कर्म .
(प्_3,1.22.2) क_इइ,28.19-29.12 रो_इइइ,75-76 {8।28} सोपसर्गस्य हि कर्मत्वे धात्वधिकारे अपि सनः अविधानम् अकर्मत्वात् इति .
(प्_3,1.22.2) क_इइ,28.19-29.12 रो_इइइ,75-76 {9।28} एवम् इह अपि क्रियासमभिहारग्रहणात् यङ्विधौ धातुग्रहणानर्थक्यम् .
(प्_3,1.22.2) क_इइ,28.19-29.12 रो_इइइ,75-76 {10।28} सोपसर्गः क्रियासमभिहारः इति चेत् क्रियासमभिहारविशेषकत्वात् उपसर्गस्य अनुपसर्गः क्रियासमभिहारः .
(प्_3,1.22.2) क_इइ,28.19-29.12 रो_इइइ,75-76 {11।28} सोपसर्गस्य हि क्रियासमहिभारत्वे धात्वधिकारे अपि यङः अविधानम् अक्रियासमभिहारत्वात् इति .
(प्_3,1.22.2) क_इइ,28.19-29.12 रो_इइइ,75-76 {12।28} अथ एकाज्झलादिग्रहणम् किमर्थम् .
(प्_3,1.22.2) क_इइ,28.19-29.12 रो_इइइ,75-76 {13।28} इह मा भूत् : जागर्ति भृशम् .
(प्_3,1.22.2) क_इइ,28.19-29.12 रो_इइइ,75-76 {14।28} ईक्षते भृशम् .
(प्_3,1.22.2) क_इइ,28.19-29.12 रो_इइइ,75-76 {15।28} एकाज्झलादिग्रहणे च .
(प्_3,1.22.2) क_इइ,28.19-29.12 रो_इइइ,75-76 {16।28} एकाज्झलादिग्रहणे च उक्तम् .

(प्_3,1.22.2) क_इइ,28.19-29.12 रो_इइइ,75-76 {17।28} किम् उक्तम् .
(प्_3,1.22.2) क_इइ,28.19-29.12 रो_इइइ,75-76 {18।28} तत्र तावत् उक्तम् कर्मसमानकर्तृकग्रहणानर्थक्यम् च इच्छाभिधाने प्रत्ययविधानात् .
(प्_3,1.22.2) क_इइ,28.19-29.12 रो_इइइ,75-76 {19।28} अकर्मणः हि असमानकर्तृकात् वा अनभिधानम् इति .
(प्_3,1.22.2) क_इइ,28.19-29.12 रो_इइइ,75-76 {20।28} इह अपि एकाज्झलादिग्रहणानर्थक्यम् क्रियासमभिहारे यङ्वचनात् अनेकाचः अहलादेः हि अनभिधानम् इति .
(प्_3,1.22.2) क_इइ,28.19-29.12 रो_इइइ,75-76 {21।28} तत् च अवश्यम् अनभिदानम् आश्रयितव्यम् .
(प्_3,1.22.2) क_इइ,28.19-29.12 रो_इइइ,75-76 {22।28} क्रियमाणे अपि हि एकाज्झलादिग्रहणे यत्र एकाचः हलादेः च उत्पद्यमानेन यङा अर्थस्य अभिधानम् न भवति न भवति तत्र उत्पत्तिः .
(प्_3,1.22.2) क_इइ,28.19-29.12 रो_इइइ,75-76 {23।28} तत् यथा .
(प्_3,1.22.2) क_इइ,28.19-29.12 रो_इइइ,75-76 {24।28} भृशम् शोभते .
(प्_3,1.22.2) क_इइ,28.19-29.12 रो_इइइ,75-76 {25।28} भृशम् रोचते .
(प्_3,1.22.2) क_इइ,28.19-29.12 रो_इइइ,75-76 {26।28} यत्र च अनेकाचः अहलादेः वो उत्पद्यमानेन यङा अर्थस्य अभिधानम् भवति भवति तत्र उत्पत्तिः .
(प्_3,1.22.2) क_इइ,28.19-29.12 रो_इइइ,75-76 {27।28} तत् यथा .
(प्_3,1.22.2) क_इइ,28.19-29.12 रो_इइइ,75-76 {28।28} अटाट्यते अरार्यते अशाश्यते सोसूच्यते सोसूत्र्यते मोमूत्र्यते .
(प्_3,1.22.3) क_इइ,29.13-21 रो_इइइ,76-77 {1।11} ऊर्णोतेः च उपसङ्ख्यानम् .
(प्_3,1.22.3) क_इइ,29.13-21 रो_इइइ,76-77 {2।11} ऊर्णोतेः च उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_3,1.22.3) क_इइ,29.13-21 रो_इइइ,76-77 {3।11} प्रोर्णोनूयते .
(प्_3,1.22.3) क_इइ,29.13-21 रो_इइइ,76-77 {4।11} अत्यल्पम् इदम् उच्यते : ऊर्णोतेः इति .
(प्_3,1.22.3) क_इइ,29.13-21 रो_इइइ,76-77 {5।11} सूचिसूत्रिमूत्र्यट्यर्त्यश्यूर्णुग्रहणम् यङ्विधौ अनेकाजहलाद्यर्थम् .
(प्_3,1.22.3) क_इइ,29.13-21 रो_इइइ,76-77 {6।11} सूचिसूत्रिमूत्र्यट्यर्त्यश्यूर्णोतीनाम् ग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_3,1.22.3) क_इइ,29.13-21 रो_इइइ,76-77 {7।11} किम् प्रयोजनम् .
(प्_3,1.22.3) क_इइ,29.13-21 रो_इइइ,76-77 {8।11} यङ्विधौ अनेकाजहलाद्यर्थम् .
(प्_3,1.22.3) क_इइ,29.13-21 रो_इइइ,76-77 {9।11} सोसूच्यते सोसूत्र्यते मोमूत्र्यते अटाट्यते अरार्यते अशाश्यते प्रोर्णोनूयते .
(प्_3,1.22.3) क_इइ,29.13-21 रो_इइइ,76-77 {10।11} वाच्यः ऊर्णोर्णुवद्भावः यङ्प्रसिद्धिः प्रयोजनम् .
(प्_3,1.22.3) क_इइ,29.13-21 रो_इइइ,76-77 {11।11} आमः च प्रतिषेधार्थम् एकाचः च इडुपग्रहात् .
(प्_3,1.22.4) क_इइ,29.22-30.8 रो_इइइ,77-78 {1।24} क्रियासमभिहारे यङः विप्रतिषेधेन लोड्विधानम् .
(प्_3,1.22.4) क_इइ,29.22-30.8 रो_इइइ,77-78 {2।24} क्रियासमभिहारे लोट् भवति यङः विप्रतिषेधेन .
(प्_3,1.22.4) क_इइ,29.22-30.8 रो_इइइ,77-78 {3।24} क्रियासमभिहारे यङ् भवति इति अस्य अवकाशः धातुः यः एकाच् हलादिः क्रियासमभिहारे वर्तते अधातुसम्बन्धः : लोलूयते .
(प्_3,1.22.4) क_इइ,29.22-30.8 रो_इइइ,77-78 {4।24} लोटः अवकाशः धातुः यः अनेकाच् अहलादिः क्रियासमभिहारे वर्तते धातुसम्बन्धः : सः भवान् जागृहि जागृहि इति एव अयम् जागर्ति .
(प्_3,1.22.4) क_इइ,29.22-30.8 रो_इइइ,77-78 {5।24} सः भवान् ईहस्व ईहस्व इति एव अयम् ईहते .
(प्_3,1.22.4) क_इइ,29.22-30.8 रो_इइइ,77-78 {6।24} धातुः यः एकाच् हलादिः क्रियासमभिहारे वर्तते धातुसम्बन्धः च तस्मात् उभयम् प्राप्नोति : सः भवान् लुनीहि लुनीहि इति एव अयम् लुनाति .
(प्_3,1.22.4) क_इइ,29.22-30.8 रो_इइइ,77-78 {7।24} लोट् भवति विप्रतिषेधेन .
(प्_3,1.22.4) क_इइ,29.22-30.8 रो_इइइ,77-78 {8।24} न तर्हि इदानीम् इदम् भवति : सः भवान् लोलूयस्व लोलूयस्व इति एव अयम् लोलूयते .
(प्_3,1.22.4) क_इइ,29.22-30.8 रो_इइइ,77-78 {9।24} भवति च .
(प्_3,1.22.4) क_इइ,29.22-30.8 रो_इइइ,77-78 {10।24} न वा नानार्थत्वात् .
(प्_3,1.22.4) क_इइ,29.22-30.8 रो_इइइ,77-78 {11।24} कर्तृकर्मणोः हि लविधानम् क्रियाविशेषे स्वार्थे यङ् .
(प्_3,1.22.4) क_इइ,29.22-30.8 रो_इइइ,77-78 {12।24} न वा अर्थः विप्रतिषेधेन .
(प्_3,1.22.4) क_इइ,29.22-30.8 रो_इइइ,77-78 {13।24} किम् कारणम् .
(प्_3,1.22.4) क_इइ,29.22-30.8 रो_इइइ,77-78 {14।24} नानार्थत्वात् .
(प्_3,1.22.4) क_इइ,29.22-30.8 रो_इइइ,77-78 {15।24} का नानार्थता .
(प्_3,1.22.4) क_इइ,29.22-30.8 रो_इइइ,77-78 {16।24} कर्तृकर्मणोः हि लविधानम् .
(प्_3,1.22.4) क_इइ,29.22-30.8 रो_इइइ,77-78 {17।24} कर्तृकर्मणोः हि लोट् विधीयते .

(प्_3,1.22.4) क_इइ,29.22-30.8 रो_इइइ,77-78 {18।24} क्रियाविशेषे स्वार्थे यङ् .
(प्_3,1.22.4) क_इइ,29.22-30.8 रो_इइइ,77-78 {19।24} तत्र अन्तरङ्गत्वात् यङा भवितव्यम् .
(प्_3,1.22.4) क_इइ,29.22-30.8 रो_इइइ,77-78 {20।24} न तर्हि इदम् इदानीम् भवति .
(प्_3,1.22.4) क_इइ,29.22-30.8 रो_इइइ,77-78 {21।24} सः भवान् लुनीहि लुनीहि इति एव अयम् लुनाति .
(प्_3,1.22.4) क_इइ,29.22-30.8 रो_इइइ,77-78 {22।24} भवति च .
(प्_3,1.22.4) क_इइ,29.22-30.8 रो_इइइ,77-78 {23।24} विभाषा यङ् .
(प्_3,1.22.4) क_इइ,29.22-30.8 रो_इइइ,77-78 {24।24} यदा न यङ् तदा लोट् .
(प्_3,1.24) क_इइ,30.9-14 रो_इइइ,78-79 {1।8} उत्तरयोः विग्रहेण विशेषासम्प्रत्ययात् नित्यग्रहणानर्थक्यम् .
(प्_3,1.24) क_इइ,30.9-14 रो_इइइ,78-79 {2।8} उत्तरयोः योगयोः विग्रहेण विशेषासम्प्रत्ययात् नित्यग्रहणानर्थक्यम् .
(प्_3,1.24) क_इइ,30.9-14 रो_इइइ,78-79 {3।8} न हि कुटिलम् क्रामति इति चङ्क्रम्यते इति गम्यते .
(प्_3,1.24) क_इइ,30.9-14 रो_इइइ,78-79 {4।8} अथे एतेभ्यः क्रियासमभिहारे यङा भवितव्यम् .
(प्_3,1.24) क_इइ,30.9-14 रो_इइइ,78-79 {5।8} क्रियासमभिहारे च न एतेभ्यः .
(प्_3,1.24) क_इइ,30.9-14 रो_इइइ,78-79 {6।8} क्रियासमभिहारे च न एतेभ्यः यङा भवितव्यम् .
(प्_3,1.24) क_इइ,30.9-14 रो_इइइ,78-79 {7।8} भृशम् जपति ब्राह्मणः .
(प्_3,1.24) क_इइ,30.9-14 रो_इइइ,78-79 {8।8} भृशम् समिदः दहति इति एव.
(प्_3,1.25) क_इइ,30.17-31.5 रो_इइइ,79-80 {1।25} सत्याप इति किम् निपात्यते .
(प्_3,1.25) क_इइ,30.17-31.5 रो_इइइ,79-80 {2।25} सत्यस्य कृञि आपुक् च . सत्यस्य कृञि आपुक् च निपात्यते णिच् च .
(प्_3,1.25) क_इइ,30.17-31.5 रो_इइइ,79-80 {3।25} सत्यम् करोति सत्यापयति .
(प्_3,1.25) क_इइ,30.17-31.5 रो_इइइ,79-80 {4।25} अत्यल्पम् इदम् उच्यते .
(प्_3,1.25) क_इइ,30.17-31.5 रो_इइइ,79-80 {5।25} णिविदौ अर्थवेदसत्यानाम् अपुक् च .
(प्_3,1.25) क_इइ,30.17-31.5 रो_इइइ,79-80 {6।25} णिविदौ अर्थवेदसत्यानाम् अपुक् च इति वक्तव्यम् .
(प्_3,1.25) क_इइ,30.17-31.5 रो_इइइ,79-80 {7।25} अर्थापयति वेदापयति सत्यापयति .
(प्_3,1.25) क_इइ,30.17-31.5 रो_इइइ,79-80 {8।25} यदि आपुक् क्रियते टिलोपः प्राप्नोति .
(प्_3,1.25) क_इइ,30.17-31.5 रो_इइइ,79-80 {9।25} एवम् तर्हि पुक् करिष्यते .
(प्_3,1.25) क_इइ,30.17-31.5 रो_इइइ,79-80 {10।25} एवम् अपि टिलोपः प्राप्नोति .
(प्_3,1.25) क_इइ,30.17-31.5 रो_इइइ,79-80 {11।25} एवम् तर्हि आक् करिष्यते .
(प्_3,1.25) क_इइ,30.17-31.5 रो_इइइ,79-80 {12।25} एवम् अपि टिलोपः प्राप्नोति .
(प्_3,1.25) क_इइ,30.17-31.5 रो_इइइ,79-80 {13।25} एवम् तर्हि अक् करिष्यते .
(प्_3,1.25) क_इइ,30.17-31.5 रो_इइइ,79-80 {14।25} एवम् अपि अनाकारान्तत्वात् पुक् न प्राप्नोति .
(प्_3,1.25) क_इइ,30.17-31.5 रो_इइइ,79-80 {15।25} एवम् तर्हि अपुट् करिष्यते .
(प्_3,1.25) क_इइ,30.17-31.5 रो_इइइ,79-80 {16।25} अथ वा पुनः अस्तु आपुक् एव .
(प्_3,1.25) क_इइ,30.17-31.5 रो_इइइ,79-80 {17।25} ननु च उक्तम् .
(प्_3,1.25) क_इइ,30.17-31.5 रो_इइइ,79-80 {18।25} टिलोपः प्राप्नोति इति .
(प्_3,1.25) क_इइ,30.17-31.5 रो_इइइ,79-80 {19।25} आपुग्वचनसामर्थ्यात् न भविष्यति .
(प्_3,1.25) क_इइ,30.17-31.5 रो_इइइ,79-80 {20।25} अथ वा पुनः अस्तु पुक् एव .
(प्_3,1.25) क_इइ,30.17-31.5 रो_इइइ,79-80 {21।25} ननु च उक्तम् एवम् अपि टिलोपः प्राप्नोति इति .
(प्_3,1.25) क_इइ,30.17-31.5 रो_इइइ,79-80 {22।25} पुग्वचनसामर्थ्यात् न भविष्यति .
(प्_3,1.25) क_इइ,30.17-31.5 रो_इइइ,79-80 {23।25} अथ वा पुनः अस्तु आक् एव .
(प्_3,1.25) क_इइ,30.17-31.5 रो_इइइ,79-80 {24।25} ननु च उक्तम् एवम् अपि टिलोपः प्राप्नोति इति .
(प्_3,1.25) क_इइ,30.17-31.5 रो_इइइ,79-80 {25।25} आग्वचनसामर्थ्यात् न भविष्यति .

(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {1।70} कथम् इदम् विज्ञायते .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {2।70} हेतुमति अभिधेये णिच् भवति इति .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {3।70} आहोस्वित् हेतुमति यः धातुः वर्तते इति .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {4।70} युक्तम् पुनः इदम् विचारयितुम् .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {5।70} ननु अनेन असन्दिग्धेन प्रत्ययार्थविशेषणेन भवितव्यम् यावता हेतुमति इति उच्यते .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {6।70} यदि हि प्रकृतर्थविशेषणम् स्यात् हेतुमतः इति एवम् ब्रूयात् .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {7।70} न एतत् अस्ति .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {8।70} भवन्ति इह हि विषयसप्तम्यः अपि .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {9।70} तत् यथा .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {10।70} प्रमाणे यत् प्रातिपदिकम् वर्तते स्त्रियाम् यत् प्रातिपदिकम् वर्तते इति .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {11।70} एवम् इह अपि हेतुमति अभिधेये णिच् भवति हेतुमति यः धातुः वर्तते इति जायते विचारणा .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {12।70} अत उत्तरम् पठति .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {13।70} हेतुमति इति कारकोपादानम् प्रत्ययार्थपरिग्रहार्थम् यथा तनूकरणे तक्षः .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {14।70} हेतुमति इति कारकम् उपादीयते .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {15।70} किम् प्रयोजनम् .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {16।70} प्रत्ययार्थपरिग्रहार्थम् .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {17।70} एवम् सति प्रत्ययार्थः सुपरिगृहीतः भवति .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {18।70} यथा तनूकरणे तक्षः इति तनूकरणम् उपादीयते .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {19।70} यदि तर्हि तद्वत् प्रकृत्यर्थविशेषणम् भवति .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {20।70} प्रकृत्यर्थविशेषणम् हि तत् तत्र विज्ञायते .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {21।70} तनूकरणक्रियायाम् तक्षः इति .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {22।70} अस्तु प्रकृत्यर्थविशेषणम् .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {23।70} कः दोषः .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {24।70} इह हि उक्तः करोति प्रेषितः करोति इति णिच् प्राप्नोति .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {25।70} प्रत्ययार्थविशेषणे पुनः सति न एषः दोषः .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {26।70} स्वशब्देन उक्तत्वात् न भविष्यति .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {27।70} प्रकृत्यर्थविशेषणे अपि सति न एषः दोषः .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {28।70} यत्र न अन्तरेण शब्दम् अर्थस्य गतिः भवति तत्र शब्दः प्रयुज्यते .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {29।70} यत्र हि अन्तरेण अपि शब्दम् अर्थस्य गतिः भवति न तत्र शब्दः प्रयुज्यते .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {30।70} इह तर्हि पाचयति ओदनम् देवदत्तः यज्ञदत्तेन इति उभयोः कर्त्रोः लेन अभिधानम् प्राप्नोति .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {31।70} प्रत्ययार्थविशेषणे पुनः सति न दोषः .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {32।70} प्रधानकर्तरि लादयः भवन्ति इति प्रधानकर्ता लेन अभिधीयते .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {33।70} यः च अप्रधानम् सिद्ध तत्र कर्तरि इति एव तृतीया .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {34।70} इह च गमितः ग्रामम् देवदत्तः यज्ञदत्तनेअ इति अव्यतिरिक्तः गत्यर्थः इति कृत्वा गत्यर्थानाम् कर्तरि इति कर्तरि क्तः प्राप्नोति .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {35।70} इह च व्यतिभेदयन्ते व्यतिच्छेदयन्ते इति अव्यतिरिक्तः हिंसार्थः इति कृत्वा न गतिहिंसार्थेभ्यः इति प्रतिषेधः प्राप्नोति .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {36।70} अस्तु तर्हि प्रत्ययार्थविशेषणम् .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {37।70} यदि प्रत्ययार्थविशेषणम् पाचयति ओदनम् देवदत्तः यज्ञदत्तेन इति प्रयोज्ये कर्तरि कर्मसञ्ज्ञा प्राप्नोति .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {38।70} भवति हि तस्य तस्मिन् ईप्सा .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {39।70} इह च ग्रामम् गमयति ग्रामाय गमयति इति व्यतिरिक्तः गत्यर्थः इति कृत्वा गत्यर्थकर्मणि द्वितीयाचतुर्थ्यौ न प्राप्नुतः .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {40।70} इह च एधोदकस्य उपस्कारयति इति व्यतिरिक्तः करोत्यर्थः इति कृत्वा कृञः प्रतियत्ने इति षष्ठी न प्राप्नोति .

(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {41।70} इह च भेदिका देवदत्तस्य यज्ञदत्तस्य काष्ठानाम् इति प्रयोज्ये कर्तरि षष्ठी न प्राप्नोति .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {42।70} इह च अभिषावयति परिषावयति इति व्यतिरिक्तः सुनोत्यर्थः इति कृत्वा उपसर्गात् सुनोत्यादीनाम् इति षत्वम् न प्राप्नोति .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {43।70} न एषः दोषः .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {44।70} यत् तावत् उच्यते पाचयति ओदनम् देवदत्तः यज्ञदत्तेन इति प्रयोज्ये कर्तरि कर्मसञ्ज्ञा प्राप्नोति इति .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {45।70} गतिबुद्धिप्रत्यवसानार्थशब्दकर्माकर्मकाणाम् अणि इति एतत् नियमार्थम् भविष्यति .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {46।70} एतेषाम् एव अण्यन्तानाम् यः कर्ता सः णौ कर्मसञ्ज्ञः भवति न अन्येषाम् इति .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {47।70} यत् अपि उच्यते इह च ग्रामम् गमयति ग्रामाय गमयति इति व्यतिरिक्तः गत्यर्थः इति कृत्वा गत्यर्थकर्मणि द्वितीयाचतुर्थ्यौ न प्राप्नुतः इति .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {48।70} न असौ एवम् प्रेष्यते गच्छ ग्रामम् इति .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {49।70} कथम् तर्हि .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {50।70} साधनविशिष्टाम् असौ क्रियाम् प्रेष्यते .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {51।70} ग्रामम् गच्छ .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {52।70} ग्रामाय गच्छ इति .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {53।70} यत् अपि उच्यते इह च एधोदकस्य उपस्कारयति इति व्यतिरिक्तः करोत्यर्थः इति कृत्वा कृञः प्रतियत्ने इति षष्ठी न प्राप्नोति इति .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {54।70} न असौ एवम् प्रेष्यते उपस्कुरुष्व एधोदकस्य इति .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {55।70} कथम् तर्हि .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {56।70} साधनविशिष्टाम् असौ क्रियाम् प्रेष्यते .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {57।70} एधोदकस्य उपस्कुरुष्व इति .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {58।70} यत् अपि उच्यते इह च भेदिका देवदत्तस्य यज्ञदत्तस्य काष्ठानाम् इति प्रयोज्ये कर्तरि षष्ठी न प्राप्नोति इति .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {59।70} उक्तम् तत्र कृद्ग्रहणस्य प्रयोजनम् कर्तृभूतपूर्वमात्रे अपि षष्ठी यथा स्यात् इति .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {60।70} यत् अपि उच्यते इह च अभिषावयति परिषावयति इति व्यतिरिक्तः सुनोत्यर्थः इति कृत्वा उपसर्गात् सुनोत्यादीनाम् इति षत्वम् न प्राप्नोति इति .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {61।70} न असौ एवम् प्रेष्यते सुनु अभि इति .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {62।70} कथम् तर्हि उपसर्गविशिष्टाम् असौ क्रियाम् प्रेष्यते .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {63।70} अभिषुनु इति .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {64।70} युक्तम् पुनः इदम् विचारयितुम् .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {65।70} ननु अनेन असन्दिग्धेन प्रत्ययार्थविशेषणेन भवितव्यम् यावता व्यक्तम् अर्थान्तरम् गम्यते पचति पाचयति इति च .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {66।70} बाढम् युक्तम् .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {67।70} इह पचेः कः प्रधानार्थः .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {68।70} या असौ तण्डुलानाम् विक्लित्तिः .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {69।70} अथ इदानीम् तदभिसन्धिपूर्वकम् प्रेषणम् अध्येषणम् वा .
(प्_3,1.26.1) क_इइ,31.7-32.26 रो_इइइ,80-86 {70।70} युक्तम् यत् सर्वम् पच्यर्थः स्यात् .
(प्_3,1.26.2) क_इइ,33.1-8 रो_इइइ,87-88 {1।16} हेतुनिर्देशः च निमित्तमात्रम् बिक्षादिषु दर्शनात् .
(प्_3,1.26.2) क_इइ,33.1-8 रो_इइइ,87-88 {2।16} हेतुनिर्देशः च निमित्तमात्रम् द्रष्टव्यम् .
(प्_3,1.26.2) क_इइ,33.1-8 रो_इइइ,87-88 {3।16} यावत् ब्रूयात् निमित्तम् कारणम् इति ताव्त् हेतुः इति .
(प्_3,1.26.2) क_इइ,33.1-8 रो_इइइ,87-88 {4।16} किम् प्रयोजनम् .
(प्_3,1.26.2) क_इइ,33.1-8 रो_इइइ,87-88 {5।16} बिक्षादिषु दर्शनात् .
(प्_3,1.26.2) क_इइ,33.1-8 रो_इइइ,87-88 {6।16} भिक्षादिषु हि णिच् दृश्यते .
(प्_3,1.26.2) क_इइ,33.1-8 रो_इइइ,87-88 {7।16} भिक्षाः वासयन्ति .कारिषः अग्निः अध्यापयति इति .
(प्_3,1.26.2) क_इइ,33.1-8 रो_इइइ,87-88 {8।16} किम् पुनः कारणम् पारिभाषिके हेतौ न सिध्यति .
(प्_3,1.26.2) क_इइ,33.1-8 रो_इइइ,87-88 {9।16} एवम् मन्यते .
(प्_3,1.26.2) क_इइ,33.1-8 रो_इइइ,87-88 {10।16} चेतनावतः एतत् भवति प्रेषणम् अध्येषणम् च इति .

(प्_3,1.26.2) क_इइ,33.1-8 रो_इइइ,87-88 {11।16} भिक्षाः च अचेतनाः .
(प्_3,1.26.2) क_इइ,33.1-8 रो_इइइ,87-88 {12।16} न एषः दोषः .
(प्_3,1.26.2) क_इइ,33.1-8 रो_इइइ,87-88 {13।16} न अवश्यम् सः एव वासम् प्रयोजयति यः आह उष्यताम् इति .
(प्_3,1.26.2) क_इइ,33.1-8 रो_इइइ,87-88 {14।16} तूष्णीम् आसीनः यः तत्समर्थानि आचरति सः अपि वासम् प्रयोजयति .
(प्_3,1.26.2) क_इइ,33.1-8 रो_इइइ,87-88 {15।16} भिक्षाः च अपि प्रचुराः व्यञ्जनवत्यः लभ्यमानाः वासम् प्रयोजयन्ति .
(प्_3,1.26.2) क_इइ,33.1-8 रो_इइइ,87-88 {16।16} तथा कारीषः अग्निः निर्वाते एकान्ते सुप्रज्वलितः अध्ययनम् प्रयोजयति .
(प्_3,1.26.3) क_इइ,33.9-20 रो_इइइ,88-89 {1।28} इह कः चित् कम् चित् आह .
(प्_3,1.26.3) क_इइ,33.9-20 रो_इइइ,88-89 {2।28} पृच्छतु मा भवान् .
(प्_3,1.26.3) क_इइ,33.9-20 रो_इइइ,88-89 {3।28} अनुयुङ्क्ताम् मा भवान् इति .
(प्_3,1.26.3) क_इइ,33.9-20 रो_इइइ,88-89 {4।28} अत्र णिच् कस्मात् न भवति .
(प्_3,1.26.3) क_इइ,33.9-20 रो_इइइ,88-89 {5।28} अकर्तृत्वात् .
(प्_3,1.26.3) क_इइ,33.9-20 रो_इइइ,88-89 {6।28} न हि असौ सम्प्रति पृच्छति .
(प्_3,1.26.3) क_इइ,33.9-20 रो_इइइ,88-89 {7।28} तूष्णीम् आस्ते .
(प्_3,1.26.3) क_इइ,33.9-20 रो_इइइ,88-89 {8।28} किम् च भोः वर्तमानकालायाः एव क्रियायाः कर्त्रा भवितव्यम् न भूतभविष्यत्कालायाः .
(प्_3,1.26.3) क_इइ,33.9-20 रो_इइइ,88-89 {9।28} भूतभविष्यत्कालायाः अपि भवितव्यम् .
(प्_3,1.26.3) क_इइ,33.9-20 रो_इइइ,88-89 {10।28} अभिसम्बन्धः तत्र क्रियते .
(प्_3,1.26.3) क_इइ,33.9-20 रो_इइइ,88-89 {11।28} इमाम् क्रियाम् अकार्षीत् .
(प्_3,1.26.3) क_इइ,33.9-20 रो_इइइ,88-89 {12।28} इमाम् क्रियाम् करिष्यति इति .
(प्_3,1.26.3) क_इइ,33.9-20 रो_इइइ,88-89 {13।28} इह पुनः न कः चित् अभिसम्बन्धः क्रियते न च असौ सम्प्रति पृच्छति .
(प्_3,1.26.3) क_इइ,33.9-20 रो_इइइ,88-89 {14।28} तूष्णीम् आस्ते .
(प्_3,1.26.3) क_इइ,33.9-20 रो_इइइ,88-89 {15।28} यदि तर्हि कर्ता न अस्ति कथम् तर्हि कर्तृप्रत्ययेन लोटा अभिधीयते .
(प्_3,1.26.3) क_इइ,33.9-20 रो_इइइ,88-89 {16।28} अथम् कथम् अस्मिन् अपृच्छति अयम् प्रच्छिः वर्तते .
(प्_3,1.26.3) क_इइ,33.9-20 रो_इइइ,88-89 {17।28} अभिसम्बन्धः तत्र क्रियते .
(प्_3,1.26.3) क_इइ,33.9-20 रो_इइइ,88-89 {18।28} इमाम् क्रियाम् कुरु इति .
(प्_3,1.26.3) क_इइ,33.9-20 रो_इइइ,88-89 {19।28} कर्त्रा अपि तर्हि अभिसम्बन्धः क्रियते .
(प्_3,1.26.3) क_इइ,33.9-20 रो_इइइ,88-89 {20।28} कथम् .
(प्_3,1.26.3) क_इइ,33.9-20 रो_इइइ,88-89 {21।28} कर्ता च अस्याः क्रियायाः भव इति .
(प्_3,1.26.3) क_इइ,33.9-20 रो_इइइ,88-89 {22।28} एवम् न च कर्ता कर्तृप्रत्ययेन च लोटा अभिधीयते .
(प्_3,1.26.3) क_इइ,33.9-20 रो_इइइ,88-89 {23।28} अथ अपि कथम् चित् कर्ता स्यात् .
(प्_3,1.26.3) क_इइ,33.9-20 रो_इइइ,88-89 {24।28} एवम् अपि न दोषः .
(प्_3,1.26.3) क_इइ,33.9-20 रो_इइइ,88-89 {25।28} लोटा उक्तत्वात् प्रेषणस्य णिच् न भविष्यति .
(प्_3,1.26.3) क_इइ,33.9-20 रो_इइइ,88-89 {26।28} विधीयन्ते हि एतेषु अर्थेषु प्रैषादिषु लोडादयः .
(प्_3,1.26.3) क_इइ,33.9-20 रो_इइइ,88-89 {27।28} यत्र च द्वितीयः प्रयोज्यः अर्थः भवति भवति तत्र णिच् .
(प्_3,1.26.3) क_इइ,33.9-20 रो_इइइ,88-89 {28।28} तत् यथा आसय शायय इति .
(प्_3,1.26.4) क_इइ,33.21-34.7 रो_इइइ,89-90 {1।33} कृष्यादिषु च अनुत्पत्तिः .
(प्_3,1.26.4) क_इइ,33.21-34.7 रो_इइइ,89-90 {2।33} कृष्यादिषु च अनुत्पत्तिः वक्तव्या .
(प्_3,1.26.4) क_इइ,33.21-34.7 रो_इइइ,89-90 {3।33} एकान्ते तूष्णीम् आसीनः उच्यते पञ्चभिः हलैः कृषति इति .
(प्_3,1.26.4) क_इइ,33.21-34.7 रो_इइइ,89-90 {4।33} तत्र भवितव्यम् .
(प्_3,1.26.4) क_इइ,33.21-34.7 रो_इइइ,89-90 {5।33} पञ्चभिः हलैः कर्षयति इति .
(प्_3,1.26.4) क_इइ,33.21-34.7 रो_इइइ,89-90 {6।33} कृष्यादिषु च अनुत्पत्तिः नानाक्रियाणाम् कृष्यर्थत्वात् .

(प्_3,1.26.4) क_इइ,33.21-34.7 रो_इइइ,89-90 {7।33} कृष्यादिषु च अनुत्पत्तिः सिद्धा .
(प्_3,1.26.4) क_इइ,33.21-34.7 रो_इइइ,89-90 {8।33} कुतः .
(प्_3,1.26.4) क_इइ,33.21-34.7 रो_इइइ,89-90 {9।33} नानाक्रियाणाम् कृष्यर्थत्वात् .
(प्_3,1.26.4) क_इइ,33.21-34.7 रो_इइइ,89-90 {10।33} नानाक्रियाः कृषेः अर्थाः .
(प्_3,1.26.4) क_इइ,33.21-34.7 रो_इइइ,89-90 {11।33} न अवश्यम् कृषिः विलेखने एव वर्तते .
(प्_3,1.26.4) क_इइ,33.21-34.7 रो_इइइ,89-90 {12।33} किम् तर्हि. प्रतिविधाने अपि वर्तते .
(प्_3,1.26.4) क_इइ,33.21-34.7 रो_इइइ,89-90 {13।33} यत् असौ भक्तबीजबलीवर्दैः प्रतिविधानम् करोति सः कृष्यर्थः .
(प्_3,1.26.4) क_इइ,33.21-34.7 रो_इइइ,89-90 {14।33} आतः च प्रतिविधाने वर्तते .
(प्_3,1.26.4) क_इइ,33.21-34.7 रो_इइइ,89-90 {15।33} यदहः एव असौ न प्रतिविधत्ते तदहः तत् कर्म न प्रवर्तते .
(प्_3,1.26.4) क_इइ,33.21-34.7 रो_इइइ,89-90 {16।33} यज्यादिषु च अविपर्यासः .
(प्_3,1.26.4) क_इइ,33.21-34.7 रो_इइइ,89-90 {17।33} यज्यादिषु च अविपर्यासः वक्तव्यः .
(प्_3,1.26.4) क_इइ,33.21-34.7 रो_इइइ,89-90 {18।33} पुष्यमित्रः यजते .
(प्_3,1.26.4) क_इइ,33.21-34.7 रो_इइइ,89-90 {19।33} याजकाः याजयन्ति इति .
(प्_3,1.26.4) क_इइ,33.21-34.7 रो_इइइ,89-90 {20।33} तत्र भवितव्यम् .
(प्_3,1.26.4) क_इइ,33.21-34.7 रो_इइइ,89-90 {21।33} पुष्यमित्रः याजयते .
(प्_3,1.26.4) क_इइ,33.21-34.7 रो_इइइ,89-90 {22।33} याजकाः यजन्ति इति .
(प्_3,1.26.4) क_इइ,33.21-34.7 रो_इइइ,89-90 {23।33} यज्यादिषु च अविपर्यासः नानाक्रियाणाम् यज्यर्थत्वात् .
(प्_3,1.26.4) क_इइ,33.21-34.7 रो_इइइ,89-90 {24।33} यज्यादिषु च अविपर्यासः सिद्धः .
(प्_3,1.26.4) क_इइ,33.21-34.7 रो_इइइ,89-90 {25।33} कुतः .
(प्_3,1.26.4) क_इइ,33.21-34.7 रो_इइइ,89-90 {26।33} नानाक्रियाणाम् यज्यर्थत्वात् .
(प्_3,1.26.4) क_इइ,33.21-34.7 रो_इइइ,89-90 {27।33} नानाक्रियाः यजेः अर्थाः .
(प्_3,1.26.4) क_इइ,33.21-34.7 रो_इइइ,89-90 {28।33} न अवश्यम् यजिः हविष्प्रक्षेपणे एव वर्तते .
(प्_3,1.26.4) क_इइ,33.21-34.7 रो_इइइ,89-90 {29।33} किम् तर्हि .
(प्_3,1.26.4) क_इइ,33.21-34.7 रो_इइइ,89-90 {30।33} त्यागे अपि वर्तते .
(प्_3,1.26.4) क_इइ,33.21-34.7 रो_इइइ,89-90 {31।33} अहो यजते इति उच्यते यः सुष्ठु त्यागम् करोति .
(प्_3,1.26.4) क_इइ,33.21-34.7 रो_इइइ,89-90 {32।33} तम् च पुष्यमित्रः करोति .
(प्_3,1.26.4) क_इइ,33.21-34.7 रो_इइइ,89-90 {33।33} याजकाः प्रयोजयन्ति .
(प्_3,1.26.5) क_इइ,34.8-13 रो_इइइ,91-92 {1।12} तत् करोति इति उपसङ्ख्यानम् सूत्रयत्याद्यर्थम् .
(प्_3,1.26.5) क_इइ,34.8-13 रो_इइइ,91-92 {2।12} तत् करोति इति उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_3,1.26.5) क_इइ,34.8-13 रो_इइइ,91-92 {3।12} किम् प्रयोजनम् .
(प्_3,1.26.5) क_इइ,34.8-13 रो_इइइ,91-92 {4।12} सूत्रयत्याद्यर्थम् .
(प्_3,1.26.5) क_इइ,34.8-13 रो_इइइ,91-92 {5।12} सूत्रम् करोति .
(प्_3,1.26.5) क_इइ,34.8-13 रो_इइइ,91-92 {6।12} सूत्रयति .
(प्_3,1.26.5) क_इइ,34.8-13 रो_इइइ,91-92 {7।12} इह व्याकरणस्य सूत्रम् करोति .
(प्_3,1.26.5) क_इइ,34.8-13 रो_इइइ,91-92 {8।12} व्याकरणम् सूत्रयति इति .
(प्_3,1.26.5) क_इइ,34.8-13 रो_इइइ,91-92 {9।12} वाक्ये षष्ठी उत्पन्ने च प्रत्यये द्वितीया .
(प्_3,1.26.5) क_इइ,34.8-13 रो_इइइ,91-92 {10।12} केन एतत् एवम् भवति .
(प्_3,1.26.5) क_इइ,34.8-13 रो_इइइ,91-92 {11।12} यः असौ सूत्रव्याकरणयोः अभिसम्बन्धः सः उत्पन्ने प्रत्यये निवर्तते .
(प्_3,1.26.5) क_इइ,34.8-13 रो_इइइ,91-92 {12।12} अस्ति च करोतेः व्याकरणेन सामर्थ्यम् इति कृत्वा द्वितीया भविष्यति .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {1।80} आख्यानात् कृतः तत् आचष्टे इति कृल्लुक् प्रकृतिप्रत्यापत्तिः प्रकृतिवत् च कारकम् . आख्यानात् कृदन्तात् तत् आचष्टे इति एतस्मिन् अर्थे कृल्लुक् प्रकृतिप्रत्यापत्तिः प्रकृतिवत् च कारकम् भवति इति वक्तव्यम् .

(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {2।80} कंसवधम् आचष्टे कंसम् घातयति .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {3।80} बलिबन्धम् आचष्टे बलिम् बन्धयति .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {4।80} आख्यानात् च प्रतिषेधः .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {5।80} आख्यानशब्दात् च प्रतिषेधः वक्तव्यः .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {6।80} आख्यानम् आचष्टे .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {7।80} किम् पुनः यानि एतानि सञ्ज्ञाभूतानि आख्यानानि ततः उत्पत्त्या भवितव्यम् आहोस्वित् क्रियान्वाख्यानमात्रात् .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {8।80} किम् च अतः .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {9।80} यदि सञ्ज्ञाभूतेभ्यः इह न प्राप्नोति .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {10।80} राजागमनम् आचष्टे ऋअजानम् आगमयति .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {11।80} अथ क्रियान्वाख्यानमात्रात् न दोषः भवति .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {12।80} यथा न दोषः तथा अस्तु .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {13।80} दृश्यर्थानाम् च प्रवृत्तौ .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {14।80} दृश्यर्थानाम् च प्रवृत्तौ कृदन्तात् णिच् वक्तयः तत् आचष्टे इति एतस्मिन् अर्थे कृल्लुक् प्रकृतिप्रत्यापत्तिः प्रकृतिवत् च कारकम् भवति इति .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {15।80} मृगरमणम् आचष्टे मृगान् रमयति इति .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {16।80} दृश्यर्थानाम् इति किमर्थम् .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {17।80} यदा हि ग्रामे मृगरमणम् आचष्टे मृगरमणम् आचष्टे इति एव तदा भवति इति .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {18।80} आङ्लोपः च कालात्यन्तसंयोगे मर्यादायाम् .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {19।80} कालात्यन्तसंयोगे मर्यादयाम् कृदन्तात् णिच् वक्तयः तत् आचष्टे इति एतस्मिन् अर्थे आङ्लोपः च कृल्लुक् प्रकृतिप्रत्यापत्तिः प्रकृतिवत् च कारकम् भवति इति .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {20।80} आरात्रिम्विवासम् आचष्टे रात्रिम् विवासयति इति .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {21।80} चित्रीकरणे प्रापि .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {22।80} चित्रीकरणे प्राप्यर्थे कृदन्तात् णिच् वक्तयः कृल्लुक् प्रकृतिप्रत्यापत्तिः प्रकृतिवत् च कारकम् भवति इति .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {23।80} उज्जयिन्याः प्रस्थितः माहिष्मत्याम् सुर्योद्गमनम् सम्भावयते सूर्यम् उद्गमयति .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {24।80} नक्षत्रयोगे ज्ञि .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {25।80} नक्षत्रयोगे जानात्यर्थे कृदन्तात् णिच् वक्तयः कृल्लुक् प्रकृतिप्रत्यापत्तिः प्रकृतिवत् च कारकम् भवति इति .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {26।80} पुष्ययोगम् जानाति पुष्येण योजयति .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {27।80} मघाभिः योजयति .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {28।80} तत् तर्हि बहु वक्तव्यम् .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {29।80} न वा सामान्यकृतत्वात् हेतुतः हि अविशिष्टम् .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {30।80} न वा वक्तव्यम् .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {31।80} किम् कारणम् .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {32।80} सामान्यकृतत्वात् .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {33।80} सामान्येन एव अत्र णिच् भविष्यति .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {34।80} हेतुमति इति .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {35।80} किम् कारणम् .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {36।80} हेतुतः हि अविशिष्टम् .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {37।80} हेतुतः हि अविशिष्टम् भवति .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {38।80} तुल्या हि हेतुता देवदत्ते च आदित्ये च .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {39।80} न सिध्यति .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {40।80} स्वतन्त्रप्रयोजकः हेतुसञ्ज्ञः भवति इति उच्यते .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {41।80} न च असौ आदित्यम् प्रयोजयति .

(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {42।80} स्वतन्त्रप्रयोजकत्वात् अप्रयोजकः इति चेत् मुक्तसंशयेन तुल्यम् .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {43।80} यम् भवान् स्वत्रन्त्रप्रयोजकम् मुक्तसंशयम् न्याय्यम् मन्यते पाचयति ओदनम् देवदत्तः यज्ञदत्तेन इति तेन एतत् तुल्यम् .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {44।80} कथम् .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {45।80} प्रवृत्तिः हि उभयत्र अनपेक्ष्य .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {46।80} प्रवृत्तिः हि उभयत्र अनपेक्ष्य एव किम् चित् भवति देवदत्ते च आदित्ये च .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {47।80} न इह कः चित् परः अनुग्रहीतव्यः इति प्रवर्तते .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {48।80} सर्वे इमे स्वभूत्यर्थम् प्रवर्तन्ते .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {49।80} ये तावत् एते गुरुशुश्रूषवः ते अपि स्वभूत्यर्थम् एव प्रवर्तन्ते पारलौकिकम् च नः भविष्यति इह च नः प्रीतः गुरुः अध्यापयिष्यति इति .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {50।80} तथा यत् एतत् दासकर्मकरम् नाम एते अपि स्वभूत्यर्थम् एव प्रवर्तन्तेभक्तम् चेलम् च लप्स्यामहे परिभाषाः च न नः भविष्यन्ति इति .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {51।80} तथा ये एते शिल्पिनः नामे ते अपि स्वभूत्यर्थम् एव प्रवर्तन्ते वेतनम् च लप्स्यामहे मित्राणि च नः भविष्यन्ति इति .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {52।80} एवम् एतेषु सर्वेषु स्वभूत्यर्थम् प्रवर्तमानेषु कुर्वतः प्रयोजकः इति चेत् तुल्यम् .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {53।80} यदि कः चित् कुर्वतः प्रयोजकः नाम भवति तेन एतत् तुल्यम् .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {54।80} यदि तर्हि सर्वे इमे स्वभूत्यर्थम् प्रवर्तन्तेकः प्रयोज्यार्थः .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {55।80} यत् अभिप्रायेषु सज्जन्ते .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {56।80} ईदृशौ वध्रौ कुरु .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {57।80} ईदृशौ पटुकौ कुरु .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {58।80} आदित्यः च अस्य अभिप्राये सज्जते .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {59।80} एषः तस्य अभिप्रायः .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {60।80} उज्जयिन्याः प्रस्थितः माहिष्मत्याम् सुर्योद्गमनम् सम्भावयेय इति .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {61।80} तम् च अस्य अभिप्रायम् आदित्यः निर्वर्तयति .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {62।80} भवेत् इह वर्तमानकालता युक्ता .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {63।80} उज्जयिन्याः प्रस्थितः माहिष्मत्याम् सुर्योद्गमनम् सम्भावयते सूर्यम् उद्गमयति इति .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {64।80} तत्रस्थस्य हि तस्य आदित्यः उदेति .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {65।80} इह तु कथम् वर्तमानकालताम् कंसम् घातयति बलिम् बन्धयति इति चिरहते कंसे चिरबद्धे च बलौ .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {66।80} अत्र अपि युक्ता .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {67।80} कथम् .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {68।80} ये तावत् एते शोभिकाः नाम एते प्रत्यक्षम् कंसम् घातयन्ति प्रत्यक्षम् च बलिम् बन्धयन्ति इति .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {69।80} चित्रेषु कथम् .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {70।80} चित्रेषु अपि उद्गूर्णाः निपतिताः च प्रहाराः दृश्यन्ते कंसकर्षण्यः च .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {71।80} ग्रन्थिकेषु कथम् यत्र शब्दगडुमात्रम् लक्ष्यते .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {72।80} ते अपि हि तेषाम् उत्पत्तिप्रभृति आ विनाशात् ऋद्धीः व्याचक्षाणाः सतः बुद्धिविषयान् प्रकाशयन्ति .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {73।80} आतः च सतः व्यामिश्राः हि दृश्यन्ते .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {74।80} के चित् कंसभक्ताः भवन्ति के चित् वासुदेवभक्ताः .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {75।80} वर्णान्यत्वम् खलु अपि पुष्यन्ति .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {76।80} के चित् रक्तमुखाः भवन्ति के चित् कालमुखाः .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {77।80} त्रैकाल्यम् खलु अपि लोके लक्ष्यते .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {78।80} गच्छ हन्यते कंसः .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {79।80} गच्छ घानिष्यते कंसः .
(प्_3,1.26.6) क_इइ,34.14-36.21 रो_इइइ,92-97 {80।80} किम् गतेन हतः कंसः इति .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {1।59} किमर्थः ककारः .

(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {2।59} क्ङिति इति गुणप्रतिषेधः यथा स्यात् .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {3।59} न एतत् अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {4।59} सार्वधातुकार्धधातुकयोः अङ्गस्य गुणः उच्यते .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {5।59} धातोः च विहितः प्रत्ययः शेषः आर्धधातुकसञ्ज्ञाम् लभते .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {6।59} न च अयम् धातोः विधीयते .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {7।59} कण्ड्वादीनि हि प्रातिपदिकानि .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {8।59} कण्ड्वादिभ्यः वावचनम् .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {9।59} कण्ड्वादिभ्यः वा इति वक्तव्यम् .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {10।59} अवचने हि नित्यप्रत्ययत्वम् .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {11।59} अक्रियमाणे हि वावचने नित्यः प्रत्ययविधिः प्रसज्येत .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {12।59} तत्र कः दोषः .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {13।59} तत्र धातुविधितुक्प्रतिषेधः .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {14।59} तत्र धातुविधेः तुकः च प्रतिषेधः वक्तव्यः स्यात् .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {15।59} कण्ड्वौ कण्ड्वः .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {16।59} अचि श्नुधातुभ्रुवाम् य्वोः इयङुवङौ इति उवङदेशः प्रसज्येत .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {17।59} इह च कण्ड्वा कण्ड्वे न ऊङ्धात्वोः इति प्रतिषेधः प्रसज्येत .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {18।59} तुक् च प्रतिषेध्यः .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {19।59} वल्गुः मन्तुः इति .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {20।59} ह्रस्वस्य पिति कृति तुक् प्राप्नोति .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {21।59} ह्रस्वयलोपौ च वक्तव्यौ .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {22।59} ह्रस्वयलोपौ च वक्तव्यौ स्याताम् .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {23।59} वल्गुः मन्तुः इति .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {24।59} किमर्थम् इदम् न ह्रस्वः एव अयम् .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {25।59} अन्तरङ्गत्वात् अकृद्यकारे इति दीर्घत्वम् प्राप्नोति .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {26।59} यलोपः .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {27।59} यलोपः च वक्तव्यः .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {28।59} कण्डूः वल्गुः मन्तुः इति .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {29।59} किमर्थम् इदम् न वलि इति एव सिद्धम् .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {30।59} वलि इति उच्यते .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {31।59} न च अत्र वलिम् पश्यामः .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {32।59} ननु चल् क्विप् वलादिः .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {33।59} क्विब्लोपे कृते वलाद्यभावात् न प्राप्नोति .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {34।59} इदम् इह सम्प्रधार्यम् .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {35।59} क्विब्लोपः क्रियताम् वलि लोपः इति .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {36।59} किम् अत्र कर्तव्यम् .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {37।59} परत्वात् क्विब्लोपः .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {38।59} नित्यः खलु अपि क्विब्लोपः .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {39।59} कृते अपि यलोपे प्राप्नोति अकृते अपि प्राप्नोति .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {40।59} नित्यत्वात् परत्वात् च क्विलोपे कृते वलाद्यभावात् न प्राप्नोति .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {41।59} एवम् तर्हि प्रत्ययलक्षणेन भविष्यति .

(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {42।59} वर्णाश्रये न अस्ति प्रत्ययलक्षणम् .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {43।59} अथ क्रियमाणे अपि वावचने यदा यगन्तात् क्विप् तदा एते दोषाः कस्मात् न भवन्ति .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {44।59} न एतेभ्यः तदा क्विप् द्रक्ष्यते .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {45।59} किम् कारणम् .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {46।59} अन्येभ्यः अपि दृश्यते इति उच्यते .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {47।59} न च एतेभ्यः तदा क्विप् दृश्यते .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {48।59} यथा एव तर्हि क्रियमाणे वावचने अन्येभ्यः अपि दृश्यते इति एवम् अत्र क्विप् न भवति एवम् अक्रियमाणे अपि न भविष्यति .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {49।59} अवश्यम् एतेभ्यः तदा क्विप् एषितव्यः .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {50।59} किम् प्रयोजनम् .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {51।59} एतानि रूपाणि यथा स्युः इति .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {52।59} तत् तर्हि वावचनम् कर्तव्यम् .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {53।59} न कर्तव्यम् .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {54।59} उभयम् कण्ड्वादीनि धातवः च प्रातिपदिकानि च .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {55।59} आतः च उभयम् .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {56।59} कण्डूयति इति क्रियाम् कुर्वाणे प्रयुज्यते अस्ति मे कण्डूः इति वेदनामात्रस्य सान्निध्ये .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {57।59} अपरः आह : धातुप्रकरणात् धातुः कस्य आसञ्जनात् अपि .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {58।59} आह च अयम् इमम् दीर्घम् .
(प्_3,1.27) क_इइ,37.2-38.11 रो_इइइ,97-101 {59।59} मन्ये धातुः विभाषितः .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {1।84} किमर्थः अयम् णकारः .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {2।84} वृद्ध्यर्थः .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {3।84} ञ्णिति इति वृद्धिः यथा स्यात् .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {4।84} क्रियमाणे अपि वै णकारे वृद्धिः न प्राप्नोति .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {5।84} किम् कारणम् .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {6।84} क्ङिति च इति प्रतिषेधात् .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {7।84} णित्करणसामर्थ्यात् भविष्यति .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {8।84} अतः उत्तरम् पठति .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {9।84} णिङि णित्करणस्य सावकाशत्वात् वृद्धिप्रतिषेधप्रसङ्गः .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {10।84} णिङि णित्करणम् सावकाशम् .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {11।84} कः अवकाशः .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {12।84} सामान्यग्रहणार्थः णकारः .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {13।84} क्व सामान्यग्रहणार्थेन अर्थः .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {14।84} णेः अनिटि इति .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {15।84} णिङि णित्करणस्य सावकाशत्वात् वृद्धिप्रतिषेधः प्राप्नोति .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {16।84} ङित्करणम् अपि तर्हि सावकाशम् .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {17।84} कः अवकाशः .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {18।84} सामान्यग्रहणाविघातार्थः ङकारः .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {19।84} क्व सामान्यग्रहणाविघातार्थेन अर्थः .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {20।84} अत्र एव .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {21।84} शक्यः अत्र सामान्यग्रहणाविघातार्थः अन्यः अनुबन्धः आसङ्क्तुम् .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {22।84} तत्र ङकारानुरोधात् वृद्धिप्रतिषेधः प्राप्नोति .

(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {23।84} अवशयम् अत्र आत्मनेपदार्थः ङकारः अनुबन्धः आसङ्क्तव्यः ङितः इति आत्मनेपदम् यथा स्यात् .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {24।84} एवम् उभयोः सावकशयोः प्रतिषेधबलीयस्त्वात् प्रतिषेधः प्राप्नोति .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {25।84} एवम् तर्हि आचार्यप्रवृत्तिः ज्ञापयति न कमेः वृद्धिप्रतिषेधः भवति इति यत् अयम् न कम्यमिचमाम् इति मित्सञ्ज्ञाया प्रतिषेधम् शास्ति .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {26।84} मित्प्रतिषेधस्य च अर्थवत्त्वात् .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {27।84} मित्प्रतिषेधस्य च अर्थवत्त्वात् प्रतिषेधः प्राप्नोति .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {28।84} अर्थवान् मित्प्रतिषेधः .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {29।84} कः अर्थः .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {30।84} णिङन्तस्य णिचि या वृद्धिः तस्याः ह्रस्वत्वम् मा भूत् इति .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {31।84} ननु एतस्याः अपि क्ङिति च इति प्रतिषेधेन भवितव्यम् .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {32।84} न भवितव्यम् .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {33।84} उक्तम् एतत् क्ङिति प्रतिषेधे तन्निमित्तग्रहणम् इति .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {34।84} एवम् तर्हि न णिङन्तस्य णिचि या वृद्धिः तस्याः ह्रस्वत्वम् प्राप्नोति .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {35।84} किम् कारणम् .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {36।84} णिङा व्यवहितत्वात् .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {37।84} लोपे कृते न अस्ति व्यवधानम् .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {38।84} स्थानिवद्भावात् व्यवधानम् एव .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {39।84} णिङि एव तर्हि मा भूत् इति .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {40।84} णिङि च न प्राप्नोति .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {41।84} किम् कारणम् .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {42।84} असिद्धम् बहिरङ्गलक्षणम् अन्तरङ्गलक्षणे इति .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {43।84} न एव वा पुनः णिङन्तस्य णिचि वृद्धिः प्राप्नोति .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {44।84} किम् कारणम् .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {45।84} णिङा व्यवहितत्वात् .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {46।84} लोपे कृते न अस्ति व्यवधानम् .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {47।84} स्थानिवद्भावात् व्यवधानम् एव .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {48।84} इदम् तर्हि प्रयोजनम् .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {49।84} यत् तत् चिण्णमुलोः दीर्घः अन्यतरस्याम् इति दीर्घत्वम् तत् कमेः णिङि मा भूत् इति .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {50।84} किम् पुनः कारणम् तत्र दीर्घः अन्यतरस्याम् इति उच्यते .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {51।84} न ह्रस्वः अन्यतरस्याम् इति एव उच्येत .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {52।84} यथाप्राप्तम् च अपि कमेः ह्रस्वत्वम् एव .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {53।84} तत्र अयम् अपि अर्थः .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {54।84} ह्रस्वग्रहणम् न कर्तव्यम् भवति .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {55।84} प्रकृतम् अनुवर्तते .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {56।84} क्व प्रकृतम् .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {57।84} मिताम् ह्रस्वः इति .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {58।84} का रूपसिद्धिः : अशमि अशामि शमम् शमम् शामम् शामम् .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {59।84} वृद्ध्या सिद्धम् .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {60।84} न सिध्यति .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {61।84} न सिध्यति .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {62।84} न उदात्तोपदेशस्य मान्तस्य अनाचमेः इति वृद्धिप्रतिषेधः प्राप्नोति .

(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {63।84} चिण्कृतोः सः प्रतिषेधः न णिचि .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {64।84} इदम् तर्हि .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {65।84} अजनि अजानि जनम् जनम् जानम् जानम् .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {66।84} जनिवध्योः च इति वृद्धिप्रतिषेधः प्राप्नोति .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {67।84} सः अपि चिण्कृतोः एव .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {68।84} णिज्व्यवहितेषु तर्हि यङ्लोपे च उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् स्यात् .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {69।84} शमयन्तम् प्रयोजितवान् अशमि अशामि शमम् शमम् शामम् शामम् .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {70।84} शंशमयतेः अशंसमि अशंशामि शंशमम् शंशमम् शंशामम् शंशामम् .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {71।84} किम् पुनः कारणम् न सिध्यति .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {72।84} चिण्णमुल्परे णौ मिताम् अङ्गानाम् ह्रस्वः भवति इति उच्यते .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {73।84} यः च अत्र णिः चिण्णमुल्परः न तस्मिन् मित् अङ्गम् यस्मिन् च मित् अङ्गम् न असौ णिः णमुल्परः .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {74।84} णिलोपे कृते चिण्णमुल्परः .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {75।84} स्थानिवद्भावात् न चिण्णमुल्परः .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {76।84} अथ दीर्घः अन्यतरस्याम् इति उच्यमाने यावता स्थानिवद्भावः कथम् एव एतत् सिध्यति .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {77।84} एतत् इदानीम् दीर्घग्रहणस्य प्रयोजनम् .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {78।84} दीर्घविधिम् प्रति अजादेशः न स्थानिवत् इति स्थानिवद्भावप्रतिषेधः सिद्धः भवति .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {79।84} यदा खलु अपि आयादयः आर्धधातुके वा भवन्ति तदा णिचि णिङ् न भवति .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {80।84} तदर्थम् च मित्प्रतिषेधः स्यात् .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {81।84} तस्मात् प्रतिषेधः प्राप्नोति .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {82।84} उक्तम् वा .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {83।84} किम् उक्तम् .
(प्_3,1.30) क_इइ,38.13-40.2 रो_इइइ,101-104 {84।84} तद्धितकाम्योः इक्प्रकरणात् इति .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {1।68} कथम् इदम् विज्ञायते .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {2।68} आयादिभ्यः यत् आर्धधातुकम् तस्मिन् अवस्थिते वा आयादीनाम् निवृत्तिः भवति .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {3।68} आहोस्वित् आयादिप्रकृतेः यत् आर्धधातुकम् तस्मिन् अवस्थिते वा आयादीनाम् उत्पत्तिः भवति इति .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {4।68} किम् गतम् एतत् इयता सूत्रेणा आहोस्वित् अन्यतरस्मिन् पक्षे भूयः सूत्रम् कर्तव्यम् .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {5।68} गतम् इति आह .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {6।68} कथम् .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {7।68} यदा तावत् आयादिभ्यः यत् आर्धधातुकम् तस्मिन् अवस्थिते वा आयादीनाम् निवृत्तिः भवति इति तदा अविशेषेण सर्वम् आयादिप्रकरणम् अनुक्रम्य आयादयः आर्धधातुके वा इति उच्यते .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {8।68} यदा अपि आयादिप्रकृतेः यत् आर्धधातुकम् तस्मिन् अवस्थिते वा आयादीनाम् उत्पत्तिः भवति इति तदा एकम् वाक्यम् तत् च इदम् च .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {9।68} गुपूधूपविच्छिपणिपनिभ्यः आयः आर्धधातुके वा .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {10।68} ऋतेः ईयङ् आर्धधातुके वा .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {11।68} कमेः णिङ् आर्धधातुके वा इति .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {12।68} कः च अत्र विशेषः .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {13।68} आयादिभ्यः यत् आर्धधातुकम् आयादिप्रकृतेः यत् आर्धधातुकम् इति च उभयथा अनिष्टप्रसङ्गः . आयादिभ्यः यत् आर्धधातुकम् आयादिप्रकृतेः यत् आर्धधातुकम् इति च उभयथा अनिष्टम् प्राप्नोति .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {14।68} यदि विज्ञायते आयादिभ्यः यत् आर्धधातुकम् तस्मिन् अवस्थिते वा आयादीनाम् निवृत्तिः भवति इति गुप्तिः जुगोप इति च इष्टम् न सिध्यति इदम् च अनिष्टम् प्राप्नोति .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {15।68} गोपाम् चकार गोपा इति च .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {16।68} इदम् तावत् इष्टम् सिद्धम् भवति .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {17।68} गोपायाम् चकार गोपाय इति .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {18।68} अथ विज्ञायते आयादिप्रकृतेः यत् आर्धधातुकम् तस्मिन् अवस्थिते वा आयादीनाम् उत्पत्तिः भवति इति गुप्तिः जुगोप इति च इष्टम् सिद्धम् भवति .

(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {19।68} इदम् च अनिष्टम् न प्राप्नोति .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {20।68} गोपायाम् चकार गोपाय इति .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {21।68} इदम् तु इष्टम् न सिध्यति .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {22।68} गोपयाम् चकार गोपाय इति .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {23।68} इदम् तावत् इष्टम् सिध्यति .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {24।68} गोपयाम् चकार इति .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {25।68} कथम् .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {26।68} अस्तु अत्र आयादिप्रकृतेः यत् आर्धधातुकम् लिट् .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {27।68} तस्मिन् अवस्थिते वा आयादयः .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {28।68} आम् मध्ये पतिष्यति यथा विकरणाः तद्वत् .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {29।68} इदम् तर्हि इष्टम् न सिध्यति गोपाया इति .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {30।68} सिद्धम् तु सार्वधातुके नित्यवचनात् अनाश्रित्य वाविधानम् .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {31।68} सिद्धम् एतत् .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {32।68} कथम्. अविशेषेण आयादीनाम् वाविधानम् उक्त्वा सार्वधातुके नित्यम् इति वक्ष्यामि .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {33।68} स्यादिबलीयस्त्वम् तु विप्रतिषेधेन तुल्यनिमित्तत्वात् .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {34।68} स्यादिभिः तु आयादीनाम् बाधनम् प्राप्नोति विप्रतिषेधेन .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {35।68} किम् कारणम् .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {36।68} तुल्यनिमित्तत्वात् .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {37।68} तुल्यम् निमित्तम् स्यादीनाम् आयादीनाम् च .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {38।68} स्यादीनाम् अवकाशः करिष्यति हरिष्यति .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {39।68} आयादीनाम् अवकाशः गोपायति धूपायति .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {40।68} इह उभयम् प्राप्नोति .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {41।68} गोपायिष्यति धूपायिष्यति इति .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {42।68} परत्वात् स्यादयः प्राप्नुवन्ति .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {43।68} न वा आयादिविधानस्य अनवकाशत्वात् .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {44।68} न वा एषः दोषः .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {45।68} किम् कारणम् .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {46।68} आयादिविधानस्य अनवकाशत्वात् .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {47।68} अनवकाशाः आयादयः उच्यन्ते च .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {48।68} ते वचनात् भविष्यन्ति .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {49।68} ननु च इदानीम् एव अवकाशः प्रकॢप्तः गोपायति धूपायति इति .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {50।68} अत्र अपि शप् स्यादिः भवति .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {51।68} यदि अपि अत्र अपि भवति न तु अत्र अस्ति विशेषः सति वा शपि असति वा .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {52।68} अन्यत् इदानीम् एतत् उच्यते न अस्ति विशेषः इति .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {53।68} यत् तु तत् उक्तम् आयादीनाम् स्यादिभिः अव्याप्तः अवकाशः इत् स न अस्ति अवकाशः .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {54।68} अवश्यम् खलु अपि अत्र शप् स्यादिः एषितव्यः .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {55।68} किम् कारणम् .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {56।68} गोपायन्ती धूपायन्ती इति : शप्श्यनोः नित्यम् इति नुम् यथा स्यात् इति .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {57।68} यदि तर्हि अनवकाशाः आयादयः आयादिभिः स्यादीनाम् बाधनम् प्राप्नोति .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {58।68} यथा पुनः अयम् सूत्रेभेदेन परिहारः यदि पुनः शपि नित्यम् इति उच्येत .

(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {59।68} सिध्यति .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {60।68} सूत्रम् तर्हि भिद्यते .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {61।68} यथान्यासम् एव अस्तु .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {62।68} ननु च उक्तम् आयादिभ्यः यत् आर्धधातुकम् आयादिप्रकृतेः यत् आर्धधातुकम् इति च उभयथा अनिष्टप्रसङ्गः इति .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {63।68} न एषः दोषः .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {64।68} आर्धधातुके इति न एषा परसप्तमी .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {65।68} का तर्हि .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {66।68} विषयसप्तमी .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {67।68} आर्धधातुकविषये इति .
(प्_3,1.31) क_इइ,40.4-41.19 रो_इइइ,104-107 {68।68} तत्र आर्धधातुकविषये आयादिप्रकृतेः आयादिषु कृतेषु यः यतः प्रत्ययः प्राप्नोति सः ततः भविष्यति .
(प्_3,1.32) क_इइ,41.21-42.12 रो_इइइ,107-109 {1।34} अन्तग्रहणम् किमर्थम् न सनादयः धातवः इति एव उच्येत .
(प्_3,1.32) क_इइ,41.21-42.12 रो_इइइ,107-109 {2।34} केन इदानीम् तदन्तानाम् भविष्यति .
(प्_3,1.32) क_इइ,41.21-42.12 रो_इइइ,107-109 {3।34} तदन्तविधिना .
(प्_3,1.32) क_इइ,41.21-42.12 रो_इइइ,107-109 {4।34} अतः उत्तरम् पठति .
(प्_3,1.32) क_इइ,41.21-42.12 रो_इइइ,107-109 {5।34} सनादिषु अन्तग्रहणे उक्तम् .
(प्_3,1.32) क_इइ,41.21-42.12 रो_इइइ,107-109 {6।34} किम् उक्तम् .
(प्_3,1.32) क_इइ,41.21-42.12 रो_इइइ,107-109 {7।34} पदसञ्ज्ञायाम् अन्तग्रहणम् अन्यत्र सञ्ज्ञाविधौ प्रत्ययग्रहणे तदन्तविधिप्रतिषेधार्थम् इति .
(प्_3,1.32) क_इइ,41.21-42.12 रो_इइइ,107-109 {8।34} इदम् च अपि प्रत्ययग्रहणम् .
(प्_3,1.32) क_इइ,41.21-42.12 रो_इइइ,107-109 {9।34} अयम् च अपि सञ्ज्ञाविधिः .
(प्_3,1.32) क_इइ,41.21-42.12 रो_इइइ,107-109 {10।34} किमर्थम् पुनः इदम् उच्यते न भूवादयः धातवः इति एव सिद्धम् .
(प्_3,1.32) क_इइ,41.21-42.12 रो_इइइ,107-109 {11।34} न सिध्यति .
(प्_3,1.32) क_इइ,41.21-42.12 रो_इइइ,107-109 {12।34} पाठेन धातुसञ्ज्ञा क्रियते न च इमे तत्र पठ्यन्ते .
(प्_3,1.32) क_इइ,41.21-42.12 रो_इइइ,107-109 {13।34} कथम् तर्हि अन्येषाम् अपठ्यमानानाम् धातुसञ्ज्ञा भवति : अस्तेः भूः .
(प्_3,1.32) क_इइ,41.21-42.12 रो_इइइ,107-109 {14।34} ब्रुवः वचिः .
(प्_3,1.32) क_इइ,41.21-42.12 रो_इइइ,107-109 {15।34} चक्षिङः ख्याञ् इति .
(प्_3,1.32) क_इइ,41.21-42.12 रो_इइइ,107-109 {16।34} यदि अपि एते तत्र न पठ्यन्ते प्रकृतयः तु एषाम् तत्र पठ्यन्ते .
(प्_3,1.32) क_इइ,41.21-42.12 रो_इइइ,107-109 {17।34} तत्र स्थानिवद्भावात् सिद्धम् .
(प्_3,1.32) क_इइ,41.21-42.12 रो_इइइ,107-109 {18।34} इमे अपि तर्हि यदि अपि तत्र न पठ्यन्ते येषाम् तु अर्थाः आदिश्यन्ते ते तत्र पठ्यन्ते .
(प्_3,1.32) क_इइ,41.21-42.12 रो_इइइ,107-109 {19।34} तत्र स्थानिवद्भावात् सिद्धम् .
(प्_3,1.32) क_इइ,41.21-42.12 रो_इइइ,107-109 {20।34} न सिध्यति .
(प्_3,1.32) क_इइ,41.21-42.12 रो_इइइ,107-109 {21।34} आदेशः स्थानिवत् भवति इति उच्यते .
(प्_3,1.32) क_इइ,41.21-42.12 रो_इइइ,107-109 {22।34} न च इमे आदेशाः .
(प्_3,1.32) क_इइ,41.21-42.12 रो_इइइ,107-109 {23।34} इमे अपि आदेशाः .
(प्_3,1.32) क_इइ,41.21-42.12 रो_इइइ,107-109 {24।34} कथम् .
(प्_3,1.32) क_इइ,41.21-42.12 रो_इइइ,107-109 {25।34} आदिश्यते यः सः आदेशः .
(प्_3,1.32) क_इइ,41.21-42.12 रो_इइइ,107-109 {26।34} इमे च अपि आदिश्यन्ते .
(प्_3,1.32) क_इइ,41.21-42.12 रो_इइइ,107-109 {27।34} एवम् अपि षष्ठीनिर्दिष्टस्य आदेशाः स्थानिवत् भवन्ति इति उच्यते .
(प्_3,1.32) क_इइ,41.21-42.12 रो_इइइ,107-109 {28।34} न चे इमे षष्ठीनिर्दिष्टस्य आदेशाः .
(प्_3,1.32) क_इइ,41.21-42.12 रो_इइइ,107-109 {29।34} षष्ठीग्रहणम् निवर्तिष्यते .
(प्_3,1.32) क_इइ,41.21-42.12 रो_इइइ,107-109 {30।34} यदि निवर्तते अपवादे उत्सर्गकृतम् प्राप्नोति .

(प्_3,1.32) क_इइ,41.21-42.12 रो_इइइ,107-109 {31।34} कर्मणि अण् आतः अनुपसर्गे कः इति के अपि अण्कृतम् प्राप्नोति .
(प्_3,1.32) क_इइ,41.21-42.12 रो_इइइ,107-109 {32।34} न एषः दोषः .
(प्_3,1.32) क_इइ,41.21-42.12 रो_इइइ,107-109 {33।34} आचार्यप्रवृत्तिः ज्ञापयति न अपवादे उत्सर्गकृतम् भवति इति यत् अयम् श्यनादीन् कान् चित् शितः करोति .
(प्_3,1.32) क_इइ,41.21-42.12 रो_इइइ,107-109 {34।34} श्नम् श्ना श्नुः इति.
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {1।50} इमे विकरणाः पठ्यन्ते .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {2।50} तत्र न ज्ञायते कः उत्सर्गः कः अपवादः इति .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {3।50} तत्र वक्त्यम् : अयम् उत्सर्गः अयम् अपवादः इति .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {4।50} इमे ब्रूमः .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {5।50} यक् उत्सर्गः .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {6।50} अपवादः शब्दादिः स्यादयः च .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {7।50} यदि एवम् अपवादविप्रतिषेधात् शबादिबाधनम् .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {8।50} अपवाद्विप्रतिषेधात् शबादिभिः स्यादीनाम् बाधनम् प्राप्नोति .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {9।50} शबादीनाम् अवकाशः पचति यजति .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {10।50} स्यादीनाम् अवकाशः पक्ष्यते यक्ष्यते .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {11।50} इह उभयम् प्राप्नोति .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {12।50} पक्ष्यति यक्ष्यति .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {13।50} परत्वात् शबादयः प्राप्नुवन्ति .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {14।50} अपवादः नाम अनेकलक्षणप्रसङ्गः .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {15।50} अपवादः नाम भवति यत्र अनेकलक्षणप्रसङ्गः .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {16।50} तत्र भावकर्मणोः यक् विधीयते कर्तरि शप् .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {17।50} कः प्रसङ्गः यत् भावकर्मणोः यकम् कर्तरि शबादयः बाधेरन् .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {18।50} एवम् तर्हि यक्शपौ उत्सर्गौ .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {19।50} अपवादाः श्यनादय स्यादयः च .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {20।50} अपवादविप्रतिषेधात् श्यनादिबाधनम् .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {21।50} अपवाद्विप्रतिषेधात् श्यनादिभिः स्यादीनाम् बाधनम् प्राप्नोति .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {22।50} श्यनादीनाम् अवकाशः दीव्यति सीव्यति .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {23।50} स्यादीनाम् अवकाशः पक्ष्यति यक्ष्यति .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {24।50} इह उभयम् प्राप्नोति .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {25।50} देविष्यति सेविष्यति .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {26।50} परत्वात् श्यनादयः प्राप्नुवन्ति .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {27।50} न एषः दोषः .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {28।50} शबादेशाः श्यनादयः करिष्यन्ते .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {29।50} शप् च स्यादिभिः बाध्यते .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {30।50} तत्र दिवादिभ्यः स्यादिविषये शप् एव न अस्ति कुतः श्यनादयः .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {31।50} तत् तर्हि शपः ग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {32।50} न कर्तव्यम् .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {33।50} प्रकृतम् अनुवर्तते .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {34।50} क्व प्रकृतम् .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {35।50} कर्तरि शप् इति .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {36।50} तत् वै प्रथमानिर्दिष्टम् षष्ठीनिर्दिष्टेन च इह अर्थः .

मूल पाठ: Vyākaraṇamahābhāṣya · Edition: Franz Kielhorn (Bombay 1880-1885), revised by K.V. Abhyankar (Poona 1972-1996). · Data entry George Cardona · GRETIL (Göttingen) · CC BY-NC-SA 4.0

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