व्याकरणमहाभाष्य · भाग 541560
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {37।50} दिवादिभ्यः इति एषा पञ्चमी शप् इति प्रथमायाः षष्ठीम् प्रकल्पयिष्यति तस्मात् इति उत्तरस्य इति .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {38।50} प्रत्ययविधिः अयम् .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {39।50} न च प्रत्ययविधौ पञ्चम्यः प्रकल्पिकाः भवन्ति .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {40।50} न अयम् प्रत्ययविधिः .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {41।50} विहितः प्रत्ययः .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {42।50} प्रकृतः च अनुवर्तते .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {43।50} अथ वा अनुवृत्तिः करिष्यते .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {44।50} सार्वधातुके यक् स्यतासी लृलुटोः च्लि लुङि च्लेः सिच् भवति .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {45।50} कर्तरि शप् स्यतासी लृलुटोः च्लि लुङि च्लेः सिच् भवति .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {46।50} दिवादिभ्यः श्यन् स्यतासी लृलुटोः च्लि लुङि च्लेः सिच् भवति .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {47।50} अथ वा अन्तरङ्गाः स्यादयः .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {48।50} का अन्तरङ्गता .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {49।50} लावस्थायाम् एव स्यादयः .
(प्_3,1.33) क_इइ,42.14-43.9 रो_इइइ,109-111 {50।50} सार्वधातुके श्यनादयः .
(प्_3,1.34.1) क_इइ,43.119-44.9 रो_इइइ,111-112 {1।13} सि प् उत्सर्गः छन्दसि .
(प्_3,1.34.1) क_इइ,43.119-44.9 रो_इइइ,111-112 {2।13} सिप् उत्सर्गः छन्दसि कर्तव्यः .
(प्_3,1.34.1) क_इइ,43.119-44.9 रो_इइइ,111-112 {3।13} सनाद्यन्ते नेषत्वाद्यर्थः .
(प्_3,1.34.1) क_इइ,43.119-44.9 रो_इइइ,111-112 {4।13} सनाद्यन्ते च कर्तव्यः .
(प्_3,1.34.1) क_इइ,43.119-44.9 रो_इइइ,111-112 {5।13} किम् प्रजोजनम् .
(प्_3,1.34.1) क_इइ,43.119-44.9 रो_इइइ,111-112 {6।13} नेषत्वाद्यर्थः .
(प्_3,1.34.1) क_इइ,43.119-44.9 रो_इइइ,111-112 {7।13} इन्द्रः नः तेन नेषतु .
(प्_3,1.34.1) क_इइ,43.119-44.9 रो_इइइ,111-112 {8।13} गा वः नेष्टात् .
(प्_3,1.34.1) क_इइ,43.119-44.9 रो_इइइ,111-112 {9।13} प्रकृत्यन्तरत्वात् सिद्धम् .
(प्_3,1.34.1) क_इइ,43.119-44.9 रो_इइइ,111-112 {10।13} प्रकृत्यन्तरत्वात् सिद्धम् एतत् .
(प्_3,1.34.1) क_इइ,43.119-44.9 रो_इइइ,111-112 {11।13} प्र्कृत्यन्तरम् नेषतिः .
(प्_3,1.34.1) क_इइ,43.119-44.9 रो_इइइ,111-112 {12।13} नेषतु नेष्टात् इति दर्शनात् .
(प्_3,1.34.1) क_इइ,43.119-44.9 रो_इइइ,111-112 {13।13} नेषतु नेष्टात् इति दृश्यते .
(प्_3,1.34.2) क_इइ,43.20-44.9 रो_इइइ,112-114 {1।29} अथ किमर्थः पकारः .
(प्_3,1.34.2) क_इइ,43.20-44.9 रो_इइइ,112-114 {2।29} स्वरार्थः .
(प्_3,1.34.2) क_इइ,43.20-44.9 रो_इइइ,112-114 {3।29} अनुदात्तौ सुप्पितौ इति एषः स्वरः यथा स्यात् .
(प्_3,1.34.2) क_इइ,43.20-44.9 रो_इइइ,112-114 {4।29} पित्करणानर्थक्यम् च अनच्कत्वात् .
(प्_3,1.34.2) क_इइ,43.20-44.9 रो_इइइ,112-114 {5।29} पित्करणम् च अनर्थकम् .
(प्_3,1.34.2) क_इइ,43.20-44.9 रो_इइइ,112-114 {6।29} किम् कारणम् .
(प्_3,1.34.2) क_इइ,43.20-44.9 रो_इइइ,112-114 {7।29} अनच्कत्वात् .
(प्_3,1.34.2) क_इइ,43.20-44.9 रो_इइइ,112-114 {8।29} अनच्कः अयम् .
(प्_3,1.34.2) क_इइ,43.20-44.9 रो_इइइ,112-114 {9।29} तत्र न अर्थः स्वरार्थेन पकारेण अनुबन्धेन .
(प्_3,1.34.2) क_इइ,43.20-44.9 रो_इइइ,112-114 {10।29} इटि कृते साच्कः भविष्यति .
(प्_3,1.34.2) क_इइ,43.20-44.9 रो_इइइ,112-114 {11।29} इटः अनुदात्तार्थम् इति चेत् आगमानुदात्तत्वात् सिद्धम् . आगमानुदात्तत्वेन इटः अनुदात्तत्वम् भविष्यति .
(प्_3,1.34.2) क_इइ,43.20-44.9 रो_इइइ,112-114 {12।29} एवम् तर्हि सप् अयम् कर्तव्यः .
(प्_3,1.34.2) क_इइ,43.20-44.9 रो_इइइ,112-114 {13।29} किम् प्रयोजनम् .
(प्_3,1.34.2) क_इइ,43.20-44.9 रो_इइइ,112-114 {14।29} यत् एव यासिषीष्ठाः .
(प्_3,1.34.2) क_इइ,43.20-44.9 रो_इइइ,112-114 {15।29} एकाज्लक्षणः इट्प्रतिषेधः मा भूत् इति .
(प्_3,1.34.2) क_इइ,43.20-44.9 रो_इइइ,112-114 {16।29} क्व अयम् अकारः श्रूयते .
(प्_3,1.34.2) क_इइ,43.20-44.9 रो_इइइ,112-114 {17।29} न क्व चित् श्रूयते .
(प्_3,1.34.2) क_इइ,43.20-44.9 रो_इइइ,112-114 {18।29} लोपः अस्य भविष्यति अतः लोपः आर्धधातुके इति .
(प्_3,1.34.2) क_इइ,43.20-44.9 रो_इइइ,112-114 {19।29} यदि न क्व चित् श्रूयते न अर्थः स्वरार्थेन पकारेण अनुबन्धेन .
(प्_3,1.34.2) क_इइ,43.20-44.9 रो_इइइ,112-114 {20।29} एवम् अपि कर्तव्यः एव .
(प्_3,1.34.2) क_इइ,43.20-44.9 रो_इइइ,112-114 {21।29} किम् प्रयोजनम् .
(प्_3,1.34.2) क_इइ,43.20-44.9 रो_इइइ,112-114 {22।29} अनुदात्तस्य लोपः यथा स्यात् .
(प्_3,1.34.2) क_इइ,43.20-44.9 रो_इइइ,112-114 {23।29} उदात्तस्य मा भूत् इति .
(प्_3,1.34.2) क_इइ,43.20-44.9 रो_इइइ,112-114 {24।29} किम् च स्यात् .
(प्_3,1.34.2) क_इइ,43.20-44.9 रो_इइइ,112-114 {25।29} उदात्तनिवृत्तिस्वरः प्रसज्येत .
(प्_3,1.34.2) क_इइ,43.20-44.9 रो_इइइ,112-114 {26।29} सि प् बहुलम् छन्दसि णित् .
(प्_3,1.34.2) क_इइ,43.20-44.9 रो_इइइ,112-114 {27।29} सिप् बहुलम् छन्दसि णित् वक्तव्यः .
(प्_3,1.34.2) क_इइ,43.20-44.9 रो_इइइ,112-114 {28।29} सविता धर्मम् दाविषत् .
(प्_3,1.34.2) क_इइ,43.20-44.9 रो_इइइ,112-114 {29।29} प्र णः आयूंषि तारिषत् .
(प्_3,1.35) क_इइ,44.11-18 रो_इइइ,114-115 {1।21} कास्ग्रहणे चकासः उपसङ्ख्यानम् .
(प्_3,1.35) क_इइ,44.11-18 रो_इइइ,114-115 {2।21} कास्ग्रहणे चकासः उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_3,1.35) क_इइ,44.11-18 रो_इइइ,114-115 {3।21} चकासाम् चकार .
(प्_3,1.35) क_इइ,44.11-18 रो_इइइ,114-115 {4।21} न कर्तव्यम् .
(प्_3,1.35) क_इइ,44.11-18 रो_इइइ,114-115 {5।21} चकास्प्रतययात् इति वक्ष्यामि .
(प्_3,1.35) क_इइ,44.11-18 रो_इइइ,114-115 {6।21} चकास्ग्रहणे कासः उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_3,1.35) क_इइ,44.11-18 रो_इइइ,114-115 {7।21} कासाम् चक्रे .
(प्_3,1.35) क_इइ,44.11-18 रो_इइइ,114-115 {8।21} सूत्रम् च भिद्यते .
(प्_3,1.35) क_इइ,44.11-18 रो_इइइ,114-115 {9।21} यथान्यासम् एव अस्तु .
(प्_3,1.35) क_इइ,44.11-18 रो_इइइ,114-115 {10।21} ननु च उक्तम् कास्ग्रहणे चकासः उपसङ्ख्यानम् इति .
(प्_3,1.35) क_इइ,44.11-18 रो_इइइ,114-115 {11।21} न एषः दोषः .
(प्_3,1.35) क_इइ,44.11-18 रो_इइइ,114-115 {12।21} चकास्शब्दे कास्शब्दः अस्ति .
(प्_3,1.35) क_इइ,44.11-18 रो_इइइ,114-115 {13।21} तत्र कास्प्रत्ययात् इति एव सिद्धम् .
(प्_3,1.35) क_इइ,44.11-18 रो_इइइ,114-115 {14।21} न सिध्यति .
(प्_3,1.35) क_इइ,44.11-18 रो_इइइ,114-115 {15।21} किम् कारणम् .
(प्_3,1.35) क_इइ,44.11-18 रो_इइइ,114-115 {16।21} अर्थवतः कास्शब्दस्य ग्रहणम् .
(प्_3,1.35) क_इइ,44.11-18 रो_इइइ,114-115 {17।21} न च चकास्शब्दे कास्शब्दः अर्थवान् .
(प्_3,1.35) क_इइ,44.11-18 रो_इइइ,114-115 {18।21} एवम् तर्हि कासि अनेकाचः इति वक्तव्यम् .
(प्_3,1.35) क_इइ,44.11-18 रो_इइइ,114-115 {19।21} किम् प्रयोजनम् .
(प्_3,1.35) क_इइ,44.11-18 रो_इइइ,114-115 {20।21} चुलुम्पाद्यर्थम् .
(प्_3,1.35) क_इइ,44.11-18 रो_इइइ,114-115 {21।21} चुलुम्पाम् चकार दरिद्राम् चकार .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {1।64} गुरुमतः आम्विधाने लिण्निमित्तात् प्रतिषेधः .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {2।64} गुरुमतः आम्विधाने लिण्निमित्तात् प्रतिषेधः वक्तव्यः .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {3।64} इयेष उवोष .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {4।64} गुणे कृते इजादेः च गुरुमतः अनृच्छः इति आम् प्राप्नोति .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {5।64} गुरुमद्वचनम् इदानीम् किमर्थम् स्यात् .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {6।64} गुरुमद्वचनम् किमर्थम् इति चेत् णलि उत्तमे यजादिप्रतिषेधाऋथम् .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {7।64} गुरुमद्वचनम् किमर्थम् इति चेत् णलि उत्तमे यजादीनाम् मा भूत् इति .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {8।64} इयज अहम् उवप अहम् .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {9।64} उपदेशवचनात् सिद्धम् .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {10।64} उपदेशे गुरुमतः इति वक्तव्यम् .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {11।64} यदि उपदेशग्रहणम् क्रियते उच्छेः आम् वक्तव्यः .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {12।64} व्युच्छाम् चकार इति .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {13।64} ऋच्छिप्रतिषेधः ज्ञापकः उच्छेः आम्भावस्य .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {14।64} यत् अयम् अनृच्छः इति प्रतिषेधम् शास्ति तत् ज्ञापयति आचार्यः तुग्निमित्ता यस्य गुरुमत्ता भवति तस्मात् आम् इति .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {15।64} स तर्हि ज्ञापकार्थः ऋच्छिप्रतिषेधः वक्तव्यः .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {16।64} ननु च अवश्यम् प्राप्त्यर्थः अपि वक्तव्यः .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {17।64} न अर्थः प्राप्त्यर्थेन .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {18।64} ऋच्छत्यॄताम् इति ऋच्छेः लिटि गुणवचनम् ज्ञापकम् न ऋच्छेः लिटि आम् भवति इति .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {19।64} न एतत् अस्ति ज्ञापकम् .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {20।64} अर्त्यर्थम् एतत् स्यात् .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {21।64} कथम् पुनः ऋच्छेः लिटि गुणः उच्यमानः अर्त्यर्थः शक्यः विज्ञातुम् .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {22।64} सामर्थ्यात् .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {23।64} ऋच्छिः लिटि न अस्ति इति कृत्वा प्रकृत्यर्थम् विज्ञायते .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {24।64} तत् यथा .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {25।64} तिष्ठतेः इत् जिघ्रतेः वा इति चङि तिष्ठतिजिघ्रती न स्तः इति कृत्वा प्रकृत्यर्थम् विज्ञायते .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {26।64} किम् पुनः अर्तेः गुणवचने प्रयोजनम् .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {27।64} आरतुः आरुः एतत् रूपम् यथा स्यात् .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {28।64} किम् पुनः कारणम् न सिध्यति .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {29।64} द्विर्वचने कृते सवर्णदीर्घत्वे च यदि तावत् धातुग्रहणेन ग्रहणम् ॠकारान्तानाम् लिटि गुणः भवति इति गुणे कृते रपरते अरतुः अरुः इति एतत् रूपम् प्रसज्येत .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {30।64} अथ अभ्यासग्रहणेन ग्रहणम् उः अत्त्वम् रपरत्वम् हलादिशेषः अतः आदेः इति दीर्घत्वम् आतः लोपः इटि च इति आकारलोपः अतुः उः इति वचनम् एव श्रूयेत .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {31।64} गुण पुनः सति गुणे कृते रपरत्वे च द्विर्वचनम् अतः आदेः इति दीर्घत्वम् .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {32।64} ततः सिद्धम् भवति यथा आटतुः आटुः इति .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {33।64} किम् पुनः सवर्णदीर्घत्वम् तावत् भवति न पुनः उः अत्त्वम् .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {34।64} परत्वात् उः अत्त्वेन भवितव्यम् .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {35।64} अन्तरङ्गत्वात् .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {36।64} अन्तरङ्गम् सवर्णदीर्घत्वम् .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {37।64} बहिरङ्गम् उः अत्त्वम् .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {38।64} का अन्तरङ्गता .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {39।64} वर्णौ आश्रित्य सवर्णदीर्घत्वम् .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {40।64} अङ्गस्य उः अत्त्वम् .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {41।64} उः अत्त्वम् अपि अन्तरङ्गम् .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {42।64} कथम् .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {43।64} वक्ष्यति एतत् .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {44।64} प्राक् अभ्यासविकारेभ्यः अङ्गाधिकारः इति .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {45।64} उभयोः अन्तरङ्गयोः परत्वात् उः अत्त्वम् .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {46।64} उः अत्त्वे कृते रपरत्वम् हलादिशेषः अतः आदेः इति दीर्घत्वम् परस्य रूपस्य यणादेशः .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {47।64} सिद्धम् भवति आरतुः आरुः इति .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {48।64} अथ अपि कथम् चित् अर्तेः लिटि गुणेन अर्थः स्यात् .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {49।64} एवम् अपि न दोषः .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {50।64} ऋच्छत्यॄताम् इति ऋकारः अपि निर्दिश्यते .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {51।64} कथम् .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {52।64} अयम् .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {53।64} ऋच्छति ऋ ऋताम् ऋच्छत्यॄताम् इति .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {54।64} इह अपि तर्हि प्राप्नोति .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {55।64} चक्रतुः चक्रुः इति .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {56।64} संयोगादिग्रहणम् नियमार्थम् भविष्यति .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {57।64} संयोगादेः एव अकेवलस्य न अन्यस्य अकेवलस्य इति .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {58।64} तत् एतत् अन्तरेण अर्तेः लिटि गुणवचनम् रूपम् सिद्धम् अन्तरेण च ऋच्छिग्रहणम् अर्तेः लिटि गुणः सिद्धः .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {59।64} सः एषः अनन्यार्थः ऋच्छिप्रतिषेधः वक्तव्यः उच्छेः वा आम् वक्तव्यः .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {60।64} उभयम् न वक्तव्यम् .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {61।64} उपदेशग्रहणम् न करिष्यते .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {62।64} कस्मात् न भवति इयेष उवोष .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {63।64} उक्तम् वा .किम् उक्तम् .
(प्_3,1.36.1) क_इइ,44.20-46.9 रो_इइइ,115-119 {64।64} सन्निपातलक्षणः विधिः अनिमित्तम् तद्विघातस्य इति .
(प्_3,1.36.2) क_इइ,46.10-15 रो_इइइ,119-120 {1।11} ऊर्णोतेः च उपसङ्ख्यानम् .
(प्_3,1.36.2) क_इइ,46.10-15 रो_इइइ,119-120 {2।11} ऊर्णोतेः च उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_3,1.36.2) क_इइ,46.10-15 रो_इइइ,119-120 {3।11} प्रोर्णुनाव .
(प्_3,1.36.2) क_इइ,46.10-15 रो_इइइ,119-120 {4।11} न वक्तव्यम् .
(प्_3,1.36.2) क_इइ,46.10-15 रो_इइइ,119-120 {5।11} वाच्यः ऊर्णोः णुवद्भावः .
(प्_3,1.36.2) क_इइ,46.10-15 रो_इइइ,119-120 {6।11} यङ्प्रसिद्धिः प्रयोजनम् .
(प्_3,1.36.2) क_इइ,46.10-15 रो_इइइ,119-120 {7।11} आमः च प्रतिषेधार्थम् .
(प्_3,1.36.2) क_इइ,46.10-15 रो_इइइ,119-120 {8।11} एकाचः च इडुपग्रहात् . अथ वा उकारः अपि अत्र निर्दिश्यते .
(प्_3,1.36.2) क_इइ,46.10-15 रो_इइइ,119-120 {9।11} कथम् .
(प्_3,1.36.2) क_इइ,46.10-15 रो_इइइ,119-120 {10।11} अविभक्तिकः निर्देशः .
(प्_3,1.36.2) क_इइ,46.10-15 रो_इइइ,119-120 {11।11} अनृच्छ उ अनृच्छो दयायासः च इति .
(प्_3,1.38) क_इइ,46.17-21 रो_इइइ,120 {1।11} विदेः आम् कित् .
(प्_3,1.38) क_इइ,46.17-21 रो_इइइ,120 {2।11} विदेः आम् कित् वक्तव्यः .
(प्_3,1.38) क_इइ,46.17-21 रो_इइइ,120 {3।11} विदाम् चकार .
(प्_3,1.38) क_इइ,46.17-21 रो_इइइ,120 {4।11} न वक्तव्यः .
(प्_3,1.38) क_इइ,46.17-21 रो_इइइ,120 {5।11} विदिः अकारान्तः .
(प्_3,1.38) क_इइ,46.17-21 रो_इइइ,120 {6।11} यदि अकारान्तः वेत्ति इति गुणः न सिध्यति .
(प्_3,1.38) क_इइ,46.17-21 रो_इइइ,120 {7।11} लिट्सन्नियोगेन .
(प्_3,1.38) क_इइ,46.17-21 रो_इइइ,120 {8।11} एवम् अपि विवेद इति न सिध्यति .
(प्_3,1.38) क_इइ,46.17-21 रो_इइइ,120 {9।11} एवम् तर्हि आम्सन्नियोगेन .
(प्_3,1.38) क_इइ,46.17-21 रो_इइइ,120 {10।11} भारद्वाजीयाः पठन्ति .
(प्_3,1.38) क_इइ,46.17-21 रो_इइइ,120 {11।11} विदेः आम् कित् निपातनात् वा अगुणत्वम् इति .
(प्_3,1.39) क_इइ,46.23-47.2 रो_इइइ,120-121 {1।3} श्लुवदतिदेशे किम् प्रयोजनम् .
(प्_3,1.39) क_इइ,46.23-47.2 रो_इइइ,120-121 {2।3} श्लुवदतिदेशे प्रयोजनम् द्वित्वेत्त्वे .
(प्_3,1.39) क_इइ,46.23-47.2 रो_इइइ,120-121 {3।3} बिभराम् चकार .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {1।76} किमर्थम् इदम् उच्यते .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {2।76} अनुप्रयोगः यथा स्यात् .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {3।76} न एतत् अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {4।76} आमन्तम् अव्यक्तपदार्थकम् .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {5।76} तेन अपरिसमाप्तः अर्थः इति कृत्वा अनुप्रयोगः भविष्यति .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {6।76} अतः उत्तरम् पठति .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {7।76} कृञः अनुप्रयोगवचनम् अस्तिभूप्रतिषेधार्थम् .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {8।76} कृञः अनुप्रयोगवचनम् क्रियते अस्तिभूप्रतिषेधार्थम् .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {9।76} अस्तिभुवोः अनुप्रयोगः मा भूत् इति .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {10।76} आत्मनेपदविध्यर्थम् च .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {11।76} आत्मनेपदविध्यर्थम् च कृञः अनुप्रयोगवचनम् क्रियते .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {12।76} आत्मनेपदम् यथा स्यात् .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {13।76} उच्यमाने अपि एतस्मिन् अवश्यम् आत्मनेपदार्थः यत्नः कर्तव्यः .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {14।76} अस्तिभूप्रतिषेधार्थेन च अपि न अर्थः .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {15।76} इष्टः सर्वानुप्रयोगः .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {16।76} सर्वेषाम् एव कृभ्वस्तीनाम् अनुप्रयोगः इष्यते .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {17।76} किम् इष्यते एव आहोस्वित् प्राप्नोति अपि .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {18।76} इष्यते च प्राप्नोति च .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {19।76} कथम् .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {20।76} कृञ् इति न एतत् धातुग्रहणम् .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {21।76} किम् तर्हि .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {22।76} प्रत्याहारग्रहणम् .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {23।76} क्व सन्निविष्टानाम् प्रत्याहारः .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {24।76} कृभ्वस्तियोगे इति अतः प्रभृति आ कृञः ञकारात् .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {25।76} सर्वानुप्रयोगः इति चेत् अशिष्यम् अर्थाभावात् .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {26।76} सर्वानुप्रयोगः इति चेत् अशिष्यम् कृञः अनुप्रयोगवचनम् .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {27।76} किम् कारणम् .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {28।76} अर्थाभावात् .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {29।76} आमन्तम् अव्यक्तपदार्थकम् .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {30।76} तेन अपरिसमाप्तः अर्थः इति कृत्वा अनुप्रयोगः भविष्यति .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {31।76} इदम् तर्हि प्रयोजनम् .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {32।76} कृभ्वस्तीनाम् एव अनुप्रयोगः यथा स्यात् पचादीनाम् मा भूत् इति .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {33।76} एतत् अपि न अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {34।76} अर्थाभावात् च अन्यस्य .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {35।76} अर्थाभावात् च अन्यस्य सिद्धम् .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {36।76} कृभ्वस्तयः क्रियासामान्यवाचिनः .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {37।76} क्रियाविशेषवाचिनः पचादयः .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {38।76} न च सामान्यवाचिनोः एव विशेषवाचिनोः एव व प्रयोगः भवति .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {39।76} तत्र विशेषवाचिनः उत्पत्तिः .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {40।76} सामान्यवाचिनः अनुप्रयोक्ष्यन्ते .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {41।76} लिट्परार्थम् वा .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {42।76} लिट्परार्थम् तर्हि कृञः अनुप्रयोगवचनम् क्रियते .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {43।76} लिट्परस्य एव अनुप्रयोगः यथा स्यात् .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {44।76} अन्यपरस्य मा भूत् इति .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {45।76} किम्परस्य पुनः प्राप्नोति .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {46।76} लट्परस्य .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {47।76} न लट्परस्य अनुप्रयोगेण भूतकालः विशेषितः स्यात् .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {48।76} निष्ठापरस्य तर्हि .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {49।76} ननिष्ठापरस्य अनुप्रयोगेण पुरुषोपग्रहौ विशेइषितौ स्याताम् .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {50।76} लुङ्परस्य तर्हि .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {51।76} न लुङ्परस्य अनुप्रयोगेण अनद्यतनः भूतकालः विशेषितः स्यात् .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {52।76} लङ्परस्य तर्हि .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {53।76} न लङ्परस्य अनुप्रयोगेण अनद्यतनः परोक्षः कालः विशेषितः स्यात् .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {54।76} अयम् तर्हि भूते परोक्षे अनद्यतने लङ् विधीयते .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {55।76} हशश्वतोः लङ् च इति .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {56।76} तत्परस्य मा भूत् इति .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {57।76} अतत् अपि न अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {58।76} एकस्याः आकृतेः चरितः प्रयोगः द्वितीयस्याः तृतीयस्याः च न भवति .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {59।76} तत् यथा गोषु स्वामि अश्वेषु च इति .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {60।76} न च भवति गोषु च अश्वानाम् च स्वामी इति .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {61।76} अर्थसमाप्तेः वा अनुप्रयोगः न स्यात् .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {62।76} अर्थसमाप्तेः तर्हि अनुप्रयोगः न स्यात् .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {63।76} आमन्तेन परिसमाप्तः अर्थः इति कृत्वा अनुप्रयोगः न स्यात् .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {64।76} एतत् अपि न अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {65।76} इदानीम् एव उक्तम् आमन्तम् अव्यक्तपदार्थकम् .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {66।76} तेन अपरिसमाप्तः अर्थः इति कृत्वा अनुप्रयोगः भविष्यति इति .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {67।76} विपर्यासनिवृत्त्यर्थम् वा .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {68।76} विपर्यासनिवृत्त्यर्थम् तर्हि कृञः अनुप्रयोगवचनम् क्रियते .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {69।76} ईहाम् चक्रे .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {70।76} चक्रे ईहाम् इति मा भूत् .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {71।76} व्यवहित्निवृत्त्यर्थम् च .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {72।76} व्यवहित्निवृत्त्यर्थम् च कृञः अनुप्रयोगवचनम् क्रियते .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {73।76} अन्व् एव च अनुप्रयोगः यथा स्यात् .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {74।76} ईहाम् चक्रे .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {75।76} व्यवहितस्य मा भूत् .
(प्_3,1.40) क_इइ,47.4-48.23 रो_इइइ,121-124 {76।76} ईहाम् देवदत्तः चक्रे इति .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {1।85} क्व अयम् च्लिः श्रूयते .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {2।85} न क्व चित् श्रूयते .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {3।85} सिजादयः आदेशाः उच्यन्ते .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {4।85} यद् न क्व चित् श्रूयते किमर्थः तर्हि च्लुः उत्सर्गः क्रियते .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {5।85} न सिच् उत्सर्गः एव कर्तव्यः .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {6।85} तस्य क्सादयः अपवादाः भविष्यन्ति .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {7।85} अत उत्तरम् पठति .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {8।85} च्ल्युत्सर्गः सामान्यग्रहणार्थः .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {9।85} च्लिः उत्सर्गः क्रियते सामान्यग्रहणार्थः .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {10।85} क्व सामान्यग्रहणार्थेन अर्थः .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {11।85} मन्त्र घसह्वरणशवृदहाद्वृच्कृगमिजनिभ्यः लेः इति .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {12।85} तत्र अवरतः त्रयाणाम् ग्रहणम् कर्तव्यम् स्यात् .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {13।85} चङङोः सिचः च .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {14।85} क्सविधाने च अनिड्वचने च्लिसम्प्रत्ययार्थः . क्सविधाने च अनिड्वचने च्लिसम्प्रत्ययार्थः च्लिः उत्सर्गः क्रियते .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {15।85} च्लेः अनिटः क्सः सिद्धः भवति .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {16।85} घसॢभावे च .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {17।85} घसॢभावे च च्लव् एव कृते लृदितः इति अङ् सिद्धः भवति .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {18।85} अथ चित्करणम् किमर्थम् .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {19।85} च्लेः चित्करणम् विशेषणाऋथम् .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {20।85} च्लेः चित्करणम् क्रियते विशेषणार्थम् .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {21।85} क्व विशेषणार्थेन अर्थः .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {22।85} च्लेः सिच् इति .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {23।85} लेः सिच् इति उच्यमाने लिङ्लिटोः अपि प्रसज्येत .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {24।85} न एतत् अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {25।85} लुङि इति उच्यते .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {26।85} न च लुङि लिङ्लिटौ भवतः .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {27।85} अथ इदित्करणम् किमर्थम् .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {28।85} इदित्करणम् सामान्यग्रहणार्थम् . इदित्करणम् क्रियते च सामान्यग्रहणार्थम् .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {29।85} क्व सामान्यग्रहणार्थेन अर्थः .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {30।85} मन्त्रे घसह्वरणशवृदहाद्वृच्कृगमिजनिभ्यः लेः इति आमः इति च .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {31।85} इकारे च इदानीम् सामान्यग्रहणार्थे क्रियमाणे अवश्यम् सामान्यग्रहणाविघातार्थः चकारः कर्तव्यः .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {32।85} क्व सामान्यग्रहणाविघातार्थेन अर्थः चकारेण .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {33।85} अत्र एव .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {34।85} यत् तावत् उच्यते च्ल्युत्सर्गः सामान्यग्रहणार्थः इति .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {35।85} क्रियमाणे अपि वै च्ल्युत्सर्गे तानि एव त्रीणि ग्रहणानि भवन्ति .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {36।85} च्लु लुङि च्लेः सिच् लेः इति .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {37।85} यत् एतत् लेः इति तत् परार्थम् भविष्यति .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {38।85} कथम् .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {39।85} यत् एतत् गातिस्थाघुपाभूभ्यः सिचः परस्मैपदेषु इति अत्र सिचः ग्रहणम् एतत् लेः इति वक्ष्यामि .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {40।85} यदि लेः इति उच्यते धेटः चातुःशब्द्यम् प्राप्नोति .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {41।85} अदधत् अधात् अधासीत् .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {42।85} अदधात् इति अपि प्राप्नोति .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {43।85} न चङः लुकि द्विर्वचनेन भवितव्यम् .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {44।85} किम् कारणम् .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {45।85} चङि इति उच्यते .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {46।85} न च अत्र चङम् पश्यामः .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {47।85} प्रत्ययलक्षणेन .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {48।85} न लुमता तस्मिन् इति प्रत्ययलक्षणप्रतिषेधः .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {49।85} बहुवचने तर्हि चातुःशब्द्यम् प्राप्नोति .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {50।85} अदधन् अधुः अधासिषुः .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {51।85} अधान् इति अपि प्राप्नोति .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {52।85} न एषः दोषः .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {53।85} आतः इति जुस्भावः भविष्यति .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {54।85} न सिध्यति .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {55।85} सिज्ग्रहणम् तत्र अनुवर्तते .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {56।85} सिज्ग्रहणम् निवर्तिष्यते .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {57।85} यदि निवर्तते अभूवन् इति प्रत्ययलक्षणेन जुस्भावः प्राप्नोति .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {58।85} एवम् तर्हि लुक् सिजपवादः विज्ञास्यते .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {59।85} यदि लुक् सिजपवादः विज्ञायते मा हि दाताम् मा हि धाताम् इति अत्र आदिः सिचः अन्यतरस्याम् इति एषः स्वरः न प्राप्नोति .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {60।85} तस्मात् न एतत् शक्यम् वक्तुम् लुक् सिजपवादः इति .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {61।85} न चेत् उच्यते अभूवन् इति प्रत्ययलक्षणेन जुस्भावः प्राप्नोति .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {62।85} तस्मात् आतः इति अत्र सिज्ग्रहणम् अनुवर्त्यम् .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {63।85} तस्मिन् च अनुवर्तमाने धेटः चातुःशब्द्यम् प्राप्नोति .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {64।85} तस्मात् गातिस्थाघुपाभूभ्यः सिचः परस्मैपदेषु इति अत्र सिचः ग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {65।85} तस्मिन् च क्रियमाणे तानि एव त्रीणि ग्रहणानि भवन्ति च्लि लुङि च्लेः सिच् लेः इति .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {66।85} यत् अपि उच्यते क्सविधाने च अनिड्वचने च्लिसम्प्रत्ययार्थः इति .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {67।85} धातुम् एव अत्र अनिट्वेन विशेषयिष्यामः .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {68।85} धातोः अनिटः इति .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {69।85} कथम् पुनः धातुः नाम अनिट् स्यात् .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {70।85} धातुः एव अनिट् .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {71।85} कथम् .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {72।85} अनिमित्तम् वा इटः अनिटः न वा तस्मात् इट् अस्ति सः अयम् अनिट् इति .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {73।85} अथ धातौ विशेष्यमाणे क्व यः अनिट् इति विशेषयिष्यसि .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {74।85} किम् च अतः .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {75।85} यदि विज्ञायते निष्ठायाम् अनिटः इति भूयिष्ठेभ्यः प्राप्नोति .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {76।85} भूयिष्ठाः हि शलन्ताः इगुपधाः निष्ठायाम् अनिटः .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {77।85} अथ विज्ञायते लिटि यः अनिट् इति न कुतः चित् प्राप्नोति .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {78।85} सर्वे हिस् शलन्ताः इगुपधाः लिटि सेटः .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {79।85} किम् पुनः कारणम् धातौ विशेष्यमाणे एतयोः विशेषयोः विशेषयिष्यते .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {80।85} न पुनः अत्र सामान्येन इटः विधिप्रतिषेधौ .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {81।85} क्व सामन्येन .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {82।85} वलादौ आर्धधातुके .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {83।85} यत् अपि उच्यते घसॢभावे च इति .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {84।85} आर्धधातुकीयाः सामान्येन भवन्ति अनवस्थितेषु प्रत्ययेषु .
(प्_3,1.43) क_इइ,49.2-50.28 रो_इइइ,125-130 {85।85} तत्र आर्धधातुकसामान्ये घसॢभावे कृते लृदितः इति अङ् भविष्यति .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {1।56} किमर्थः चकारः .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {2।56} विशेषणार्थः .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {3।56} क्व विशेषणार्थेन अर्थः .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {4।56} सिचि वृद्धिः परस्मैपदेषु इति .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {5।56} सौ वृद्धिः इति उच्यमाने अग्निः वायुः इति अत्र अपि प्रसज्येत .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {6।56} न एतत् अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {7।56} परस्मैपदेषु इति उच्यते .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {8।56} न च अत्र परस्मैपदम् पश्यामः .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {9।56} स्वरार्थः तर्हि .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {10।56} चितः अन्तः उदात्तः भवति इति अन्तोदात्तत्वम् यथा स्यात् .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {11।56} एतत् अपि न अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {12।56} अनच्कः अयम् .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {13।56} तत्र न अर्थः स्वरार्थेन चकारेण अनुबन्धेन .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {14।56} इटि कृते साच्कः भविष्यति .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {15।56} तत्र प्रत्ययाद्युदात्तत्वेन इटः उदात्तत्वम् भविष्यति .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {16।56} न सिध्यति .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {17।56} आगमाः अनुदात्ताः भवन्ति इति अनुदात्तत्वम् प्राप्नोति .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {18।56} अतः उत्तरम् पठति .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {19।56} सिचः चित्करणानर्थक्यम् स्थानिवत्वात् .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {20।56} सिचः चित्करणम् नर्थयम् .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {21।56} किम् कारणम् .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {22।56} स्थानिवत्वात् .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {23।56} स्थानिवद्भावात् चित् भविष्यति .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {24।56} अर्थवत् तु चित्करणसामर्थ्यात् हि इटः उदात्तत्वम् .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {25।56} अर्थवत् तु चित्करणम् .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {26।56} कः अर्थः .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {27।56} चित्करणसामर्थ्यात् हि इटः उदात्तत्वम् भविष्यति .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {28।56} न अप्राप्ते प्रत्ययस्वरे आगमानुदात्तत्वम् आरभ्यते .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {29।56} तत् यथा एव प्रत्ययस्वरम् बाधते एवम् स्थानिवद्भावात् अपि या प्राप्तिः ताम् अपि बाधेत .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {30।56} तस्मात् चित्करणम् .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {31।56} तस्मात् चकारः कर्तव्यः .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {32।56} अथ इदित्करणम् किमर्थम् .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {33।56} इदित्करणम् नकारलोपाभावार्थम् .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {34।56} इदित्करणम् क्रियते नकारलोपः मा भूत् इति .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {35।56} अमंस्त अमंस्थाः .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {36।56} अनिदिताम् हलः उपधायाः क्ङिति इति .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {37।56} न वा हन्तेः सिचः कित्करणम् नकारलोपाभावस्य .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {38।56} न वा एतत् प्रयोजनम् अस्ति .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {39।56} किम् कारणम् .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {40।56} यत् अयम् हनः सिच् इति हन्तेः सिचः कित्त्वम् शास्ति तत् ज्ञापयति आचार्यः न सिजन्तस्य नकार्लोपः भवति इति .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {41।56} न एतत् अस्ति ज्ञापकम् .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {42।56} अस्ति हि अन्यत् एतस्य वचने प्रयोजनम् .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {43।56} किम् .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {44।56} सिचि एव नलोपः यथा स्यात् .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {45।56} परस्मिन् निमित्ते मा भूत् इति .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {46।56} कः पुनः अत्र विशेषः सिचि वा नलोपे सति परस्मिन् वा निमित्ते .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {47।56} अयम् अस्ति विशेषः .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {48।56} सिचि नलोपे सति नलोपस्य असिद्धत्वात् अकारलोपः न भवति .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {49।56} परस्मिन् पुनः निमित्ते नलोपे सति अकारलोपः प्राप्नोति .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {50।56} समानाश्रयम् असिद्धम् व्याश्रयम् च इदम् .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {51।56} ननु च परस्मिन् अपि निमित्ते नलोपे सति अकारलोपः न भविष्यति .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {52।56} कथम् .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {53।56} असिद्धम् बहिरङ्गलक्षणम् अन्तरङ्गलक्षणे इति टत् एतत् हन्तेः सिचः कित्करणम् ज्ञापकम् एव न सिजन्तस्य नलोपः भवति इति .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {54।56} इदित्त्वात् वा स्थानिवत्त्वात् .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {55।56} अथ अपि अनेन इदिता अर्थः स्यात् .
(प्_3,1.44.1) क_इइ,51.2-52.8 रो_इइइ,130-132 {56।56} अयम् आदेशः स्थानिवद्भावात् इदित् भविष्यति.
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {1।54} स्पृशमृशकृषतृपदृपः सिच् वा .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {2।54} स्पृश्मृशकृषतृपदृपः सिच् वा इति वक्तव्यम् .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {3।54} स्पृश .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {4।54} अस्पृक्षत् अस्प्राक्षीत् .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {5।54} स्पृश .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {6।54} मृश .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {7।54} अमृक्षत् अम्राक्षीत् .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {8।54} मृश .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {9।54} कृष .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {10।54} अकृक्षत् अक्राक्षीत् .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {11।54} कृष .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {12।54} तृप .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {13।54} अतृपत् अत्राप्सीत् .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {14।54} तृप .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {15।54} दृप .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {16।54} अदृपत् अद्रप्सीत् .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {17।54} किम् प्रयोजनम् .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {18।54} सिच् यथा स्यात .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {19।54} अथ क्सः सिद्धः .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {20।54} सिद्धः शलः इगुपधात् अनिटः इति .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {21।54} सिच् अपि सिद्धः .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {22।54} कथम् .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {23।54} च्लेः चित्करणम् प्रत्याख्यायते .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {24।54} तत्र च्लौ एव झल्लक्षणे अमागमे कृते विहतनिमित्तत्वात् क्सः न भविष्यति .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {25।54} यदि एवम् अन्त्यसय सिजादयः प्राप्नुवन्ति .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {26।54} सिद्धम् तु सिचः यादित्वात् .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {27।54} सिद्धम् एतत् .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {28।54} कथम् .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {29।54} यादिः सिच् करिष्यते .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {30।54} सः अनेकाल्शित् सर्वस्य इति सर्वादेशः भविष्यति .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {31।54} किम् न श्रूयते यकारः .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {32।54} लुप्तनिर्दिष्टः यकारः .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {33।54} चङङोः कथम् .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {34।54} चङङोः प्रश्लिष्टनिर्देशात् सिद्धम् .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {35।54} चङङोः अपि प्रश्लिष्टनिर्देशः अयम् : च अङ् चङ् अ अङ् अङ् .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {36।54} सः अनेकाल्शित् सर्वस्य इति सर्वादेशः भविष्यति .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {37।54} चिणः कथम् .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {38।54} चिणः अनित्त्वात् सिद्धम् .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {39।54} चिणः अनित्त्वात् सिद्धम् .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {40।54} किम् इदम् अनित्त्वात् .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {41।54} अन्त्यस्य अयम् स्थाने भवन् न प्रत्ययः स्यात् .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {42।54} असत्यायाम् प्रत्ययसञ्ज्ञयाम् इत्सञ्ज्ञा न. असत्याम् इत्सञ्ज्ञायाम् लोपः न .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {43।54} असति लोपे अनेकाल् .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {44।54} यदा अनेकाल् तदा सर्वादेशः .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {45।54} यदा सर्वादेशः तदा प्रययः .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {46।54} यदा प्रत्ययः तदा इत्सञ्ज्ञा .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {47।54} यदा इत्सञ्ज्ञा तदा लोपः .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {48।54} एवम् च तत्र वार्त्तिककारस्य निर्णयः सप्रयोजनम् चित्करणम् इति .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {49।54} अपि च त्रैशब्द्यम् न प्रकल्पते .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {50।54} अस्पृक्षत् अस्प्राक्षीत् अस्पार्क्षीत् इति न सिध्यति .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {51।54} सिचि पुनः सति विभाषा सिच् .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {52।54} सिचि अपि झल्लक्षणः अमागमः विभाषा .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {53।54} यस्य खलु अपि अमा निमित्तम् न विहन्यते सः स्यात् एव .
(प्_3,1.44.2) क_इइ,52.9-53.5 रो_इइइ,133-135 {54।54} तस्मात् सुष्ठु उच्यते स्पृश्मृशकृषतृपदृपः सिच् वा इति
(प्_3,1.45) क_इइ,53.7-25 रो_इइइ,135-136 {1।35} क्सविधाने इगुपधाभावः च्लेः गुणनिमित्तत्वात् .
(प्_3,1.45) क_इइ,53.7-25 रो_इइइ,135-136 {2।35} क्सविधाने इगुपधाभावः .
(प्_3,1.45) क_इइ,53.7-25 रो_इइइ,135-136 {3।35} किम् कारणम् .
(प्_3,1.45) क_इइ,53.7-25 रो_इइइ,135-136 {4।35} च्लेः गुणनिमित्तत्वात् .
(प्_3,1.45) क_इइ,53.7-25 रो_इइइ,135-136 {5।35} च्लिः गुणनिमित्तम् .
(प्_3,1.45) क_इइ,53.7-25 रो_इइइ,135-136 {6।35} तत्र च्लौ एव गुणे कृते इगुपधात् इति क्सः न प्राप्नोति .
(प्_3,1.45) क_इइ,53.7-25 रो_इइइ,135-136 {7।35} न वा क्सस्य अनवकाशत्वात् अपवादः गुणस्य .
(प्_3,1.45) क_इइ,53.7-25 रो_इइइ,135-136 {8।35} न वा एषः दोषः .
(प्_3,1.45) क_इइ,53.7-25 रो_इइइ,135-136 {9।35} किम् कारणम् .
(प्_3,1.45) क_इइ,53.7-25 रो_इइइ,135-136 {10।35} क्सस्य अनवकाशत्वात् .
(प्_3,1.45) क_इइ,53.7-25 रो_इइइ,135-136 {11।35} अनवकाशः क्सः गुणम् बाधिष्यते .
(प्_3,1.45) क_इइ,53.7-25 रो_इइइ,135-136 {12।35} अनिड्वचनम् अविशेषणम् च्लेः नित्यादिष्टत्वात् .
(प्_3,1.45) क_इइ,53.7-25 रो_इइइ,135-136 {13।35} अनिड्वचनम् अविशेषणम् .
(प्_3,1.45) क_इइ,53.7-25 रो_इइइ,135-136 {14।35} किम् कारणम् .
(प्_3,1.45) क_इइ,53.7-25 रो_इइइ,135-136 {15।35} च्लेः नित्यादिष्टत्वात् .
(प्_3,1.45) क_इइ,53.7-25 रो_इइइ,135-136 {16।35} नित्यादिष्टः च्लिः न क्व चित् श्रूयते .
(प्_3,1.45) क_इइ,53.7-25 रो_इइइ,135-136 {17।35} तत्र च्लेः अनिटः इति क्सः न प्राप्नोति .
(प्_3,1.45) क_इइ,53.7-25 रो_इइइ,135-136 {18।35} न वा क्सस्य सिजपवादत्वात् तस्य च अनिडाश्रयत्वात् अनिटि प्रसिद्धे क्सविद्धिः .
(प्_3,1.45) क_इइ,53.7-25 रो_इइइ,135-136 {19।35} न वा एषः दोषः .
(प्_3,1.45) क_इइ,53.7-25 रो_इइइ,135-136 {20।35} किम् कारणम् .
(प्_3,1.45) क_इइ,53.7-25 रो_इइइ,135-136 {21।35} क्सस्य सिजपवादत्वात् .
(प्_3,1.45) क_इइ,53.7-25 रो_इइइ,135-136 {22।35} सिजपवादः क्सः .
(प्_3,1.45) क_इइ,53.7-25 रो_इइइ,135-136 {23।35} सः च अनिडाश्रयः .
(प्_3,1.45) क_इइ,53.7-25 रो_इइइ,135-136 {24।35} न च अपवादविषये उपसर्गः अभिनिविशते .
(प्_3,1.45) क_इइ,53.7-25 रो_इइइ,135-136 {25।35} पूर्वम् हि अपवादाः अभिनिविशन्ते पश्चात् उत्सर्गाः .
(प्_3,1.45) क_इइ,53.7-25 रो_इइइ,135-136 {26।35} प्रकल्प्य वा अपवादविषयम् उत्सर्गः अभिनिविशते .
(प्_3,1.45) क_इइ,53.7-25 रो_इइइ,135-136 {27।35} तत् न तावत् अत्र कदा चित् सिच् भवति .
(प्_3,1.45) क_इइ,53.7-25 रो_इइइ,135-136 {28।35} अपवादम् क्सम् प्रतीक्षते .
(प्_3,1.45) क_इइ,53.7-25 रो_इइइ,135-136 {29।35} क्सस्य सिजपवादत्वात् तस्य च अनिडाश्रयत्वात् अनिट्त्वम् प्रसिद्धम् .
(प्_3,1.45) क_इइ,53.7-25 रो_इइइ,135-136 {30।35} अनिटि प्रसिद्धे क्सविद्धिः .
(प्_3,1.45) क_इइ,53.7-25 रो_इइइ,135-136 {31।35} अनिटि प्रसिद्धे क्सः भविष्यति .
(प्_3,1.45) क_इइ,53.7-25 रो_इइइ,135-136 {32।35} सिच् इदानीम् क्व भविष्यति .
(प्_3,1.45) क_इइ,53.7-25 रो_इइइ,135-136 {33।35} शेषे सिज्विधानम् .
(प्_3,1.45) क_इइ,53.7-25 रो_इइइ,135-136 {34।35} शेषे सिज्विधानम् भविष्यति .
(प्_3,1.45) क_इइ,53.7-25 रो_इइइ,135-136 {35।35} अकोषीत् अमोषीत् इति .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {1।52} किमर्थम् इदम् उच्यते .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {2।52} नियमार्थम् .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {3।52} श्लिषः आलिङ्गने एव क्सः यथा स्यात् .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {4।52} इह मा भूत् : उपाश्लिषत् जतु च काष्ठम् च .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {5।52} समाश्लिषत् ब्राह्मणकुलम् इति .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {6।52} अतः उत्तरम् पठति .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {7।52} श्लिषः आलिङ्गने नियमानुपपत्तिः विधेयभावात् .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {8।52} श्लिषः आलिङ्गने नियमस्य अनुपपत्तिः .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {9।52} किम् कारणम् .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {10।52} विधेयभावात् .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {11।52} कैमर्थक्यात् नियमः भवति .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {12।52} विधेयम् न अस्ति इति कृत्वा .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {13।52} इह च अस्ति विधेयम् .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {14।52} किम् .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {15।52} पुषादिपाठात् अङ् प्राप्तः .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {16।52} तद्बाधनार्थः क्सः विधेयः .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {17।52} तत्र अपूर्वः विधिः अस्तु नियमः वा इति अपूर्वः एव विधिः स्यात् न नियमः .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {18।52} किम् च स्यात् यदि अयम् नियमः न स्यात् .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {19।52} आत्मनेपदेषु आलिङ्गने च क्सः प्रसज्येत .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {20।52} यथा एव च क्सः अङम् बाधते एवम् चिणम् अपि बाधेत .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {21।52} उपाश्लेषि कन्या देवदत्तेन इति .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {22।52} सिद्धम् तु श्लिषः आलिङ्गने अचिण्विषये .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {23।52} सिद्धम् एतत् .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {24।52} कथम् .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {25।52} श्लिषः आलिङ्गने अचिण्विषये क्सः भवति इति वक्तव्यम् .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {26।52} अङ्विधाने च श्लिषः अनालिङ्गने .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {27।52} अङ्विधाने च श्लिषः अनालिङ्गने इति वक्तव्यम् .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {28।52} सिध्यति .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {29।52} सूत्रम् तर्हि भिद्यते .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {30।52} यथान्यासम् एव अस्तु .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {31।52} ननु च उक्तम् श्लिषः आलिङ्गने नियमानुपपत्तिः विधेयभावात् इति .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {32।52} न एषः दोषः .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {33।52} योगविभागात् सिद्धम् .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {34।52} योगविभागः करिष्यते .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {35।52} श्लिषः .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {36।52} श्लिषः क्सः भवति .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {37।52} किमर्थम् इदम् .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {38।52} पुषादिपाठात् अङ् प्राप्नोति .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {39।52} तद्बाधनार्थम् .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {40।52} ततः आलिङ्गने .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {41।52} आलिङ्गने च श्लिषः क्सः भवति .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {42।52} इदम् इदानीम् किमर्थम् .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {43।52} नियमार्थम् .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {44।52} श्लिषः आलिङ्गने एव .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {45।52} क्व मा भूत् .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {46।52} उपाश्लिषत् जतु च काष्ठम् च .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {47।52} समाश्लिषत् ब्राह्मणकुलम् इति .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {48।52} यत् अपि उच्यते यथा एव च क्सः अङम् बाधते एवम् चिणम् अपि बाधेत इति .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {49।52} पुरस्तात् अपवादाः अनन्तरान् विधीन् बाधन्ते न उत्तरान् इति एवम् क्सः अङम् बाधिष्यते .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {50।52} चिणम् न बाधिष्यते .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {51।52} अथ वा तत्र वक्ष्यति : चिण्ग्रहणस्य प्रयोजनम् चिण् एव यथा स्यात् .
(प्_3,1.46) क_इइ,54.2-24 रो_इइइ,136-138 {52।52} यत् अन्यत् प्राप्नोति तत् मा भूत् इति .
(प्_3,1.48) क_इइ,55.2-16 रो_इइइ,138-139 {1।24} णिश्रिद्रुस्रुषु कमेः उपसङ्ख्यानम् . णिश्रिद्रुस्रुषु कमेः उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_3,1.48) क_इइ,55.2-16 रो_इइइ,138-139 {2।24} नाकम् इष्टमुखम् यान्ति सुयुक्तैः वडवारथैः .
(प्_3,1.48) क_इइ,55.2-16 रो_इइइ,138-139 {3।24} अथ पत्काषीणः यान्ति ये अचीकमतभाषिणः .
(प्_3,1.48) क_इइ,55.2-16 रो_इइइ,138-139 {4।24} कर्मकर्तरि च .
(प्_3,1.48) क_इइ,55.2-16 रो_इइइ,138-139 {5।24} कर्मकर्तरि च उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_3,1.48) क_इइ,55.2-16 रो_इइइ,138-139 {6।24} कारयति कटम् देवदत्तः .
(प्_3,1.48) क_इइ,55.2-16 रो_इइइ,138-139 {7।24} अचीकरत कटः स्वयम् एव .
(प्_3,1.48) क_इइ,55.2-16 रो_इइइ,138-139 {8।24} उच्छ्रययति कटम् देवदत्तः .
(प्_3,1.48) क_इइ,55.2-16 रो_इइइ,138-139 {9।24} औदशिश्रियत कटः स्वयम् एव .
(प्_3,1.48) क_इइ,55.2-16 रो_इइइ,138-139 {10।24} न वा कर्मणि अविधानात् कर्तृत्वात् च कर्मकर्तुः सिद्धम् .
(प्_3,1.48) क_इइ,55.2-16 रो_इइइ,138-139 {11।24} न वा कर्तव्यम् .
(प्_3,1.48) क_इइ,55.2-16 रो_इइइ,138-139 {12।24} किम् कारणम् .
(प्_3,1.48) क_इइ,55.2-16 रो_इइइ,138-139 {13।24} कर्मणि अविधानात् .
(प्_3,1.48) क_इइ,55.2-16 रो_इइइ,138-139 {14।24} न हि कः चित् कर्मणि विधीयते यः चङम् बाधेत .
(प्_3,1.48) क_इइ,55.2-16 रो_इइइ,138-139 {15।24} कर्तृत्वात् च कर्मकर्तुः सिद्धम् .
(प्_3,1.48) क_इइ,55.2-16 रो_इइइ,138-139 {16।24} अस्ति च कर्मकर्तरि कर्तृत्वम् इति कृत्वा चङ् भविष्यति .
(प्_3,1.48) क_इइ,55.2-16 रो_इइइ,138-139 {17।24} ननु च अयम् कर्मणि विधीयते .
(प्_3,1.48) क_इइ,55.2-16 रो_इइइ,138-139 {18।24} चिण् भावकर्मणोः इति .
(प्_3,1.48) क_इइ,55.2-16 रो_इइइ,138-139 {19।24} प्रतिषिध्येते तत्र यक्चिणौ .
(प्_3,1.48) क_इइ,55.2-16 रो_इइइ,138-139 {20।24} यक्चिणोः प्रतिषेधे हेतुमण्णिश्रिब्रूञाम् उपसङ्ख्यानम् इति .
(प्_3,1.48) क_इइ,55.2-16 रो_इइइ,138-139 {21।24} यः तर्हि अहेतुमण्णिच् .
(प्_3,1.48) क_इइ,55.2-16 रो_इइइ,138-139 {22।24} उदपुपुच्छत गौः स्वयम् एव .
(प्_3,1.48) क_इइ,55.2-16 रो_इइइ,138-139 {23।24} अत्र अपि यथा भारद्वाजीयाः पठन्ति तथा भवितव्यम् प्रतिषेधेन .
(प्_3,1.48) क_इइ,55.2-16 रो_इइइ,138-139 {24।24} यक्चिणोः प्रतिषेधे णिश्रिग्रन्थिब्रूञाम् आत्मनेपदाकर्मकाणाम् उपसङ्ख्यानम् इति .
(प्_3,1.52) क_इइ,55.18-24 रो_इइइ,140 {1।11} अस्यतिग्रहणम् किमर्थम् .
(प्_3,1.52) क_इइ,55.18-24 रो_इइइ,140 {2।11} अस्यतिग्रहणम् आत्मनेपदार्थम् .
(प्_3,1.52) क_इइ,55.18-24 रो_इइइ,140 {3।11} अस्यतिग्रहणम् आत्मनेपदार्थम् द्रष्टव्यम् .
(प्_3,1.52) क_इइ,55.18-24 रो_इइइ,140 {4।11} किम् उच्यते आत्मनेपदार्थम् इति .
(प्_3,1.52) क_इइ,55.18-24 रो_इइइ,140 {5।11} न पुनः परस्मैपदार्थम् अपि स्यात् .
(प्_3,1.52) क_इइ,55.18-24 रो_इइइ,140 {6।11} पुषादित्वात् .
(प्_3,1.52) क_इइ,55.18-24 रो_इइइ,140 {7।11} पुषादिपाठात् परस्मैपदेषु अङ् भविष्यति .
(प्_3,1.52) क_इइ,55.18-24 रो_इइइ,140 {8।11} कर्मकर्तरि च .
(प्_3,1.52) क_इइ,55.18-24 रो_इइइ,140 {9।11} कर्मकर्तरि च उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_3,1.52) क_इइ,55.18-24 रो_इइइ,140 {10।11} पर्यास्थेताम् कुण्डले स्वयम् एव .
(प्_3,1.52) क_इइ,55.18-24 रो_इइइ,140 {11।11} अत्र अपि न वा कर्मणि अविधानात् कर्तृत्वात् च कर्मकर्तुः सिद्धम् इति एव .
(प्_3,1.58) क_इइ,56.2-6 रो_इइइ,140 {1।9} इदम् लुचिग्रहणम् ग्लुञ्चिग्रहणम् च क्रियते .
(प्_3,1.58) क_इइ,56.2-6 रो_इइइ,140 {2।9} अन्यतरत् शक्यम् अकर्तुम् .
(प्_3,1.58) क_इइ,56.2-6 रो_इइइ,140 {3।9} कथम् .
(प्_3,1.58) क_इइ,56.2-6 रो_इइइ,140 {4।9} यदि तावत् ग्लुचिग्रहणम् क्रियते ग्लुञ्चिग्रहणम् न करिष्यते .
(प्_3,1.58) क_इइ,56.2-6 रो_इइइ,140 {5।9} तेन एव सिद्धम् न्यग्लुचत् न्यग्लोचीत् .
(प्_3,1.58) क_इइ,56.2-6 रो_इइइ,140 {6।9} इदम् इदानीम् ग्लुञ्चेः रूपम् न्यग्लुञ्चीत् .
(प्_3,1.58) क_इइ,56.2-6 रो_इइइ,140 {7।9} अथ ग्लुञ्चिग्रहणम् क्रियते ग्लुचेः ग्रहणम् न करिष्यते .
(प्_3,1.58) क_इइ,56.2-6 रो_इइइ,140 {8।9} तेन एव सिद्धम् न्यग्लुचत् न्यग्लुञ्चीत् .
(प्_3,1.58) क_इइ,56.2-6 रो_इइइ,140 {9।9} इदम् इदानीम् ग्लुचेः रूपम् न्यग्लोचीत् .
(प्_3,1.60) क_इइ,56.8-9 रो_इइइ,141 {1।5} अयम् तशब्दः अस्ति एव आत्मनेपदम् अस्ति परस्मैपदम् अस्ति एकवचनम् अस्ति बहुवचनम् .
(प्_3,1.60) क_इइ,56.8-9 रो_इइइ,141 {2।5} कस्य इदम् ग्रहणम् .
(प्_3,1.60) क_इइ,56.8-9 रो_इइइ,141 {3।5} यः पदेः अस्ति .
(प्_3,1.60) क_इइ,56.8-9 रो_इइइ,141 {4।5} कः च पदेः अस्ति .
(प्_3,1.60) क_इइ,56.8-9 रो_इइइ,141 {5।5} पदिः अयम् आत्मनेपदी .
(प्_3,1.66) क_इइ,56.11-13 रो_इइइ,141 {1।8} चिण् इति वर्तमाने पुनः चिण्ग्रहणम् किमर्थम् .
(प्_3,1.66) क_इइ,56.11-13 रो_इइइ,141 {2।8} न इति एवम् तत् अभूत् .
(प्_3,1.66) क_इइ,56.11-13 रो_इइइ,141 {3।8} विध्यर्थम् इदम् .
(प्_3,1.66) क_इइ,56.11-13 रो_इइइ,141 {4।8} अथ वा वा इति एवम् तत् अभूत् .
(प्_3,1.66) क_इइ,56.11-13 रो_इइइ,141 {5।8} नित्यार्थम् इदम् .
(प्_3,1.66) क_इइ,56.11-13 रो_इइइ,141 {6।8} अथ वा चिण् इति वर्तमाने पुनः चिण्ग्रहणस्य एतत् प्रयोजनम् .
(प्_3,1.66) क_इइ,56.11-13 रो_इइइ,141 {7।8} चिण् एव यथा स्यात् .
(प्_3,1.66) क_इइ,56.11-13 रो_इइइ,141 {8।8} यत् अन्यत् प्राप्नोति तत् मा भूत् इति .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {1।45} इह पश्यामः कर्मणि द्विवचनबहुवचनानि उदाह्रियन्ते .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {2।45} पच्येते* ओदनौ , पच्यन्ते ओदनाः इति .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {3।45} भावे पुनः एकवचनम् एव : आस्यते भवता , आस्यते भवद्भ्याम् , आस्यते भवद्भिः इति .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {4।45} केन एतत् एवम् भवति .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {5।45} कर्म अनेकम् .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {6।45} तस्य अनेकत्वात् द्विवचनबहुवचनानि भवन्ति .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {7।45} भावः पुनः एकः एव .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {8।45} कथम् तर्हि इह द्विवचनबहुवचनानि भवन्ति .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {9।45} पाकौ पाकाः इति .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {10।45} आश्रयभेदात् .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {11।45} यत् असौ द्रव्यम् श्रितः भवति भावः तस्य भेदात् द्विवचनबहुवचनानि भवन्ति .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {12।45} इह अपि तर्हि यावन्तः ताम् क्रियाम् कुर्वन्ति सर्वे ते तस्याः आश्रया भवन्ति .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {13।45} तद्भेदात् द्विवचनबहुवचनानि प्राप्नुवन्ति .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {14।45} एवम् तर्हि इदम् तावत् अयम् प्रष्टव्यः .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {15।45} किम् अभिसमीक्ष्य एतत् प्रयुज्यते .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {16।45} पाकौ पाकाः इति .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {17।45} यदि तावत् पाकविशेषान् अभिसमीक्ष्य यः च ओदनस्य पाकः यः च गुडस्य यः च तिलानाम् बहवः ते शब्दाः सरूपाः च .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {18।45} तत्र युक्तम् बहुवचनम् एकशेषः च .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {19।45} तिङभिहिते च अपि तदा भावे बहुवचनम् श्रूयते .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {20।45} तत् यथा : उष्टृआसिका आस्यन्ते .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {21।45} हतशायिकाः शय्यन्ते इति .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {22।45} अथ कालविशेषान् अभिसमीक्ष्य यः च अद्यतनः पाकः यः ह्यस्तनः यः श्वस्तनः ते अपि बहवः शब्दाः सरूपाः च .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {23।45} तत्र युक्तम् बहुवचनम् एकशेषः च .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {24।45} तिङभिहिते च अपि तदा भावे असारूप्यात् एकशेषः न भवति .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {25।45} आसि आस्यते , आसिष्यते .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {26।45} अस्ति खलु अपि विशेषः कृदभिहितस्य भावस्य तिङभिहितस्य च .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {27।45} कृदभिहितः भावः द्रव्यवत् भवति .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {28।45} किम् इदम् द्रव्यवत् इति .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {29।45} द्रव्यम् क्रियया समवायम् गच्छति .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {30।45} कम् समवायम् .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {31।45} द्रव्यम् क्रियाभिनिर्वृत्तौ साधनत्वम् उपैति .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {32।45} तद्वत् च अस्य भावस्य कृदभिहितस्य भवति .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {33।45} पाकः वर्तते इति .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {34।45} क्रियावत् न भवति .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {35।45} किम् इदम् क्रियावत् इति .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {36।45} क्रिया क्रियया समवायम् न गच्छति .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {37।45} पचति पठति इति .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {38।45} तद्वच् च अस्य कृतभिहितस्य न भवति .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {39।45} पाकः वर्तते इति .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {40।45} अस्ति खलु अपि विशेषः कृदभिहितस्य भावस्य तिङभिहितस्य च .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {41।45} तिङभिहितेन भावेन कालपुरुषोपग्रहाः अभिव्यज्यन्ते .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {42।45} कृदभिहितेन पुनः न व्यज्यन्ते .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {43।45} अस्ति खलु अपि विशेषः कृदभिहितस्य भावस्य तिङभिहितस्य च .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {44।45} तिङभिहितः भावः कर्त्रा सम्प्रयुज्यते. कृदभिहितः पुनः न सम्प्रयुज्यते .
(प्_3,1.67.1) क_इइ,56.15-57.17 रो_इइइ,141-146 {45।45} यावता किम् चित् सामान्यम् कः चित् विशेषः युक्तम् यत् अयम् अपि विशेषः स्यात् लिङ्गकृतः सङ्ख्याकृतः च इति .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {1।53} इदम् विचार्यते .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {2।53} भावकर्मकर्तारः सार्वधातुकार्थाः वा स्युः विकरणार्थाः वा इति .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {3।53} कथम् च सार्वधातुकार्थः स्युः कथम् वा विकरणार्थाः .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {4।53} भावकर्मवाचिनि सार्वधातुके यक् भवति कर्तृवाचिनि शर्वधातुके शप् भवति इति सार्वधातुकार्थाः .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {5।53} भावकर्मणोः यग् भवति सार्वधातुके कर्तरि शप् भवति सार्वधातुके इति विकरणार्थाः .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {6।53} कः च अत्र विशेषः .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {7।53} भावकर्मकर्तारः सार्वधातुकार्थाः चेत् एकद्विबहुषु नियमानुपपत्तिः अतदर्थत्वात् .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {8।53} भावकर्मकर्तारः सार्वधातुकार्थाः चेत् एकद्विबहुषु नियमस्य अनुपपत्तिः .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {9।53} किम् कारणम् .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {10।53} अतदर्थत्वात् .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {11।53} न हि तदानीम् एकत्वादयः एव विभक्त्यर्थाः .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {12।53} किम् तर्हि भावकर्मकर्तारः अपि .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {13।53} सन्तु तर्हि विकरणार्थाः .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {14।53} विकरणार्थाः इति चेत् कृता अभिहिते विकरणाभावः .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {15।53} विकरणार्थाः इति चेत् कृता अभिहिते विकरणः न प्राप्नोति .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {16।53} धारयः पारयः इति .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {17।53} किम् उच्यते कृता अभिहिते .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {18।53} न लेन अपि अभिधानम् भवति .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {19।53} अशक्यम् लेन अभिधानम् आश्रयितुम् .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {20।53} पक्षान्तरम् इदम् आस्थितम् भावकर्मकर्तारः सार्वधातुकार्थाः वा स्युः विकरणार्थाः वा इति .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {21।53} यदि च लेन अपि अभिधानम् स्यात् न इदम् पक्षान्तरम् स्यात् .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {22।53} कथम् अशक्यम् यदा भवान् एव आह लः कर्मणि च भावे च अकर्मकेभ्यः इति .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {23।53} एवम् वक्ष्यामि .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {24।53} लः कर्मणः भावात् च अकर्मकेभ्यः .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {25।53} यस्मिन् तर्हि ले विकरणाः न श्रूयन्ते कः तत्र भावकर्मकर्तॄन् अभिधास्यति .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {26।53} क्व च न श्रूयन्ते .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {27।53} ये एते लुग्विकरणाः श्लुविकरणाः च .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {28।53} अत्र अपि उक्ते कर्तृत्वे लुक् भविष्यति .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {29।53} यस्मिन् तर्हि ले विकरणाः न एव उत्पद्यन्ते कः तत्र भावकर्मकर्तॄन् अभिधास्यति .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {30।53} क्व च न एव उत्पद्यन्ते .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {31।53} लिङ्लिटोः .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {32।53} तस्मात् न एतत् शक्यम् वक्तुम् .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {33।53} न लेन अभिधानम् भवति इति .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {34।53} भवति चेत् अभिहिते विकरणाभावः एव .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {35।53} एवम् तर्हि इदम् स्यात् .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {36।53} यदा भावकर्मणोः लः तदा कर्तरि विकरणाः .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {37।53} यदा कर्तरि लः तदा भावकर्मणोः विकरणाः .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {38।53} इदम् अस्य यदि एव स्वाभाविकम् अथ अपि वाचनिकम् : प्रकृतिप्रत्ययौ प्रत्ययार्थम् सह ब्रूतः इति .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {39।53} न च अस्ति सम्भवः यत् एकस्याः प्रकृतेः द्वयोः नानार्थयोः युगपत् अनुसहायीभावः स्यात् .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {40।53} एवम् च कृत्वा एकपक्षीभूतम् इदम् भवति : सार्वधातुकार्थाः एव इति .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {41।53} ननु च उक्तम् भावकर्मकर्तारः सार्वधातुकार्थाः चेत् एकद्विबहुषु नियमानुपपत्तिः अतदर्थत्वात् इति .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {42।53} न एषः दोषः .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {43।53} सुपाम् कर्मादयः अपि अर्थाः सङ्ख्या च एव तथा तिङाम् . सुपाम् सङ्ख्या च एव अर्थः कर्मादयः च .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {44।53} तथा तिङाम् .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {45।53} प्रसिद्धः नियमः तत्र .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {46।53} प्रसिद्धः तत्र नियमः .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {47।53} नियमः प्रकृतेषु वा .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {48।53} अथ वा प्रकृतान् अर्थान् अपेक्ष्य नियमः .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {49।53} के च प्रकृताः .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {50।53} एकत्वादयः .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {51।53} एकस्मिन् एव एकवचनम् न द्वयोः न बहुषु .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {52।53} द्वयोः एव द्विवचनम् नैकस्मिन् न बहुषु .
(प्_3,1.67.2) क_इइ,57.18-58.23 रो_इइइ,146-149 {53।53} बहुषु एव बहुवचनम् न द्वयोः न एकस्मिन् इति .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {1।87} भावकर्मणोः यग्विधाने कर्मकर्तरि उपसङ्ख्यानम् . भावकर्मणोः यग्विधाने कर्मकर्तरि उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {2।87} पच्यते स्वयम् एव .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {3।87} पठ्यते स्वयम् एव .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {4।87} किम् पुनः कारणम् न सिध्यति .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {5।87} विप्रतिषेधात् हि शपः बलीयस्त्वम् . विप्रतिषेधात् हि शपः बलीयस्त्वम् प्राप्नोति .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {6।87} शपः अवकाशः .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {7।87} पचति पठति .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {8।87} यकः अवकाशः .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {9।87} पच्यते ओदनः देवदत्तेन .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {10।87} पठ्यते विद्या देवदत्तेन .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {11।87} इह उभयम् प्राप्नोति .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {12।87} पच्यते स्वयम् एव .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {13।87} पठ्यते स्वयम् एव .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {14।87} परत्वात् शप् प्राप्नोति .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {15।87} योगविभागात् सिद्धम् .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {16।87} योगविभागः करिष्यते .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {17।87} चिण् भावकर्मणोः .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {18।87} सार्वधातुके यक् भावकर्मणोः .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {19।87} ततः कर्तरि .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {20।87} कर्तरि च यक् भवति भावकर्मणोः .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {21।87} यथा एव तर्हि कर्मणि कर्तरि यक् भवति एवम् भावे कर्तरि प्राप्नोति .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {22।87} एति जीवन्तम् आनन्दः .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {23।87} न अस्य किम् चित् रुजति रोगः इति .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {24।87} द्वितीयः योगविभागः करिष्यते .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {25।87} चिण् भावे .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {26।87} ततः कर्मणि .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {27।87} कर्मणि च चिण् भवति .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {28।87} ततः सार्वधातुके यक् भवति भावे च कर्मणि च .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {29।87} ततः कर्तरि .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {30।87} कर्तरि च यक् भवति .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {31।87} कर्मणि इति अनुवर्तते .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {32।87} भावे इति निवृत्तम् .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {33।87} ततः शप् .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {34।87} शप् च भवति .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {35।87} कर्तरि इति एव .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {36।87} कर्मणि इति अपि निवृत्तम् .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {37।87} एवम् अपि उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {38।87} विप्रतिषेधात् हि श्यनः बलीयस्त्वम् प्राप्नोति .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {39।87} श्यनः अवकाशः .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {40।87} दीव्यति सीव्यति .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {41।87} यकः अवकाशः .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {42।87} पच्यते ओदनः देवदत्तेन .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {43।87} पठ्यते विद्या देवदत्तेन .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {44।87} इह उभयम् प्राप्नोति .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {45।87} दीव्यते स्वयम् एव .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {46।87} सीव्यते स्वयम् एव .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {47।87} परत्वात् श्यन् प्राप्नोति .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {48।87} ननु च एतत् अपि योगविभागात् एव सिद्धम् .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {49।87} न सिध्यति .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {50।87} अनन्तरा या प्रप्तिः सा योगविभागेन शक्या बाधितुम् .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {51।87} कुतः एतत् .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {52।87} अनन्तरस्य विधिः वा भवति प्रतिषेधः वा इति .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {53।87} परा प्राप्तिः अप्रतिषिद्धा .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {54।87} तया प्राप्नोति .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {55।87} ननु च इयम् प्राप्तिः पराम् प्राप्तिम् बाधेत .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {56।87} न उत्सहते प्रतिषिद्धा सती बाधितुम् .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {57।87} एवम् तर्हि शबादेशाः श्यनादयः करिष्यन्ते .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {58।87} शप् च स्यादिभिः बाध्यते .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {59।87} तत्र दिवादिभ्यः यग्विषये शप् एव न अस्ति कुतः श्यनादयः .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {60।87} तत् तर्हि शपः ग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {61।87} न कर्तव्यम् .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {62।87} प्रकृतम् अनुवर्तते .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {63।87} क्व प्रकृतम् .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {64।87} कर्तरि शप् इति .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {65।87} तत् वै प्रथमानिर्दिष्टम् षष्ठीनिर्दिष्टेन च इह अर्थः .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {66।87} दिवादिभ्यः इति एषा पञ्चमी शप् इति प्रथमायाः षष्ठीम् प्रकल्पयिष्यति तस्मात् इति उत्तरस्य इति .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {67।87} प्रत्ययविधिः अयम् .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {68।87} न च प्रत्ययविधौ पञ्चम्यः प्रकल्पिकाः भवन्ति .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {69।87} न अयम् प्रत्ययविधिः .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {70।87} विहितः प्रत्ययः .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {71।87} प्रकृतः च अनुवर्तते .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {72।87} अथ वा भावकर्मणोः इति अनुवृत्त्या एव सिद्धे सति अनिवृत्तिः यकः भावाय .इह सार्वधातुके यक् इति अन्तरेण भावकर्मणोः इति अनुवृत्तिम् सिद्धम् .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {73।87} सः अयम् एवम् सिद्धे सति यत् भावकर्मणोः इति अनुवर्तयति तस्य एतत् प्रयोजनम् .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {74।87} कर्मकर्तरि अपि यथा स्यात् .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {75।87} कर्तरि इति च योगविभागः श्यनः पूर्वविप्रतिषेधावचनाय .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {76।87} कर्तरि इति योगविभागः कर्तव्यः श्यनः पूर्वविप्रतिषेधम् मा वोचम् इति .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {77।87} अथ वा कर्मवद्भाववचनसामर्थ्यात् यक् भविष्यति .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {78।87} अस्ति अन्यत् कर्मवद्भाववचने प्रयोजनम् .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {79।87} किम् .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {80।87} आत्मनेपदम् यथा स्यात् .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {81।87} वचनात् आत्मनेपदम् भविष्यति .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {82।87} चिण् तर्हि यथा स्यात् .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {83।87} चिण् अपि वचनात् भविष्यति .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {84।87} चिण्वद्भावः तर्हि यथा स्यात् .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {85।87} न एकम् प्रयोजनम् योगारम्भम् प्रयोजयति .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {86।87} तत्र कर्मवद्भाववचनसामर्थ्यात् यक् भविष्यति .
(प्_3,1.67.3) क_इइ,58.24-60.11 रो_इइइ,149-153 {87।87} अथ वा आचार्यप्रवृत्तिः ज्ञापयति भवति कर्मकर्तरि यक् इति यत् अयम् न दुहस्न्नुनमाम् यक्चिणौ इति यक्चिणोः प्रतिषेधम् शास्ति .
(प्_3,1.71) क_इइ,60.13-15 रो_इइइ,153 {1।6} अनुपसर्गात् इति किमर्थम् .
(प्_3,1.71) क_इइ,60.13-15 रो_इइइ,153 {2।6} आयस्यति प्रयस्यति .
(प्_3,1.71) क_इइ,60.13-15 रो_इइइ,153 {3।6} अनुपसर्गात् इति शक्यम् अकर्तुम् .
(प्_3,1.71) क_इइ,60.13-15 रो_इइइ,153 {4।6} कथम् आयस्यति प्रयस्यति .
(प्_3,1.71) क_इइ,60.13-15 रो_इइइ,153 {5।6} संयसः च इति एतत् नियमार्थम् भविष्यति .
(प्_3,1.71) क_इइ,60.13-15 रो_इइइ,153 {6।6} सम्पूर्वात् यसः न अन्यपूर्वात् इति .
(प्_3,1.78) क_इइ,60.17-61.12 रो_इइइ,153-154 {1।64} किमर्थः शकारः .
(प्_3,1.78) क_इइ,60.17-61.12 रो_इइइ,153-154 {2।64} सार्वधातुकाऋथः .
(प्_3,1.78) क_इइ,60.17-61.12 रो_इइइ,153-154 {3।64} शित् सार्वधातुकम् इति सार्वधातुकसञ्ज्ञा .
(प्_3,1.78) क_इइ,60.17-61.12 रो_इइइ,153-154 {4।64} सार्वधातुकम् अपित् इति ङित्त्वम् .
(प्_3,1.78) क_इइ,60.17-61.12 रो_इइइ,153-154 {5।64} ङिति इति गुणप्रतिषेधः यथा स्यात् .
(प्_3,1.78) क_इइ,60.17-61.12 रो_इइइ,153-154 {6।64} भिनत्ति छिनत्ति इति .
(प्_3,1.78) क_इइ,60.17-61.12 रो_इइइ,153-154 {7।64} न एतत् अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_3,1.78) क_इइ,60.17-61.12 रो_इइइ,153-154 {8।64} सार्वधातुकार्धधातुकयोः अङ्गस्य गुणः उच्यते यस्मात् च प्रत्ययविधिः तदादि प्रत्यये अङ्गसञ्ज्ञम् भवति .
(प्_3,1.78) क_इइ,60.17-61.12 रो_इइइ,153-154 {9।64} यस्मात् च अत्र प्रत्ययविधिः न तत् प्रत्यये परतः .
(प्_3,1.78) क_इइ,60.17-61.12 रो_इइइ,153-154 {10।64} यत् च प्रत्यये परतः न तस्मात् प्रत्ययविधिः .
(प्_3,1.78) क_इइ,60.17-61.12 रो_इइइ,153-154 {11।64} इदम् तर्हि प्रयोजनम् .
(प्_3,1.78) क_इइ,60.17-61.12 रो_इइइ,153-154 {12।64} आर्धधातुकसञ्ज्ञा मा भूत् इति .
(प्_3,1.78) क_इइ,60.17-61.12 रो_इइइ,153-154 {13।64} किम् च स्यात् .
(प्_3,1.78) क_इइ,60.17-61.12 रो_इइइ,153-154 {14।64} वलादिलक्षणः इट् प्रसज्येत .
(प्_3,1.78) क_इइ,60.17-61.12 रो_इइइ,153-154 {15।64} एतत् अपि न अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_3,1.78) क_इइ,60.17-61.12 रो_इइइ,153-154 {16।64} वलादेः आर्धधातुकस्य अङ्गस्य इट् उच्यते .
(प्_3,1.78) क_इइ,60.17-61.12 रो_इइइ,153-154 {17।64} यस्मात् च प्रत्ययविधिः तदादि प्रत्यये अङ्गसञ्ज्ञम् भवति .
(प्_3,1.78) क_इइ,60.17-61.12 रो_इइइ,153-154 {18।64} यस्मात् च अत्र प्रत्ययविधिः न तत् प्रत्यये परतः .
(प्_3,1.78) क_इइ,60.17-61.12 रो_इइइ,153-154 {19।64} यत् च प्रत्यये परतः न तस्मात् प्रत्ययविधिः .
(प्_3,1.78) क_इइ,60.17-61.12 रो_इइइ,153-154 {20।64} अतः उत्तरम् पठति .
(प्_3,1.78) क_इइ,60.17-61.12 रो_इइइ,153-154 {21।64} श्नमि शित्करणम् प्वादिह्रस्वार्थम् .
(प्_3,1.78) क_इइ,60.17-61.12 रो_इइइ,153-154 {22।64} श्नमि शित्करणम् क्रियते प्वादीनाम् शिति ह्रस्वत्वम् यथा स्यात् .
(प्_3,1.78) क_इइ,60.17-61.12 रो_इइइ,153-154 {23।64} पृणसि मृणसि इति .
(प्_3,1.78) क_इइ,60.17-61.12 रो_इइइ,153-154 {24।64} न वा धात्वन्यत्वात् .
(प्_3,1.78) क_इइ,60.17-61.12 रो_इइइ,153-154 {25।64} न वा कर्तव्यम् .
(प्_3,1.78) क_इइ,60.17-61.12 रो_इइइ,153-154 {26।64} किम् कारणम् .
(प्_3,1.78) क_इइ,60.17-61.12 रो_इइइ,153-154 {27।64} धात्वन्यत्वात् .
(प्_3,1.78) क_इइ,60.17-61.12 रो_इइइ,153-154 {28।64} धात्वन्तरम् पृणिमृणी .
मूल पाठ: Vyākaraṇamahābhāṣya · Edition: Franz Kielhorn (Bombay 1880-1885), revised by K.V. Abhyankar (Poona 1972-1996). · Data entry George Cardona · GRETIL (Göttingen) · CC BY-NC-SA 4.0