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ग्रंथ पाठ

सर्वतथागततत्त्वसंग्रह · अध्याय 165

165.1

अथात्र महामण्डले ज्ञानहृदयानि भवन्ति ।
ओं सर्वार्थसिद्धिज्ञान हूं

165.2

ओं मणिज्ञान हूं

165.3

ओं मणिज्ञानाङ्कुश

165.4

ओं मणिज्ञानराग

165.5

ओं मणिज्ञानतुष्टि

165.6

ओं ज्ञानदृष्टिमणि हूं

165.7

ओं ज्ञानाभिषेक

165.8

ओं मणिज्ञानसूर्य

165.9

ओं मणिज्ञानध्वज

165.10

ओं मणिज्ञानाट्टहास

165.11

ओं मणिज्ञान पद्म हूं

165.12

ओं ज्ञानमणित्याग

165.13

ओं ज्ञानमणिकोश

165.14

ओं ज्ञानमणिचक्र

165.15

ओं ज्ञानमणिभाष

165.16

ओं ज्ञानमणिरत्नवर्ष

165.17

ओं मणिज्ञाननृत्यपूजासमय हूं

165.18

ओं मणिज्ञानरक्ष

165.19

ओं मणिज्ञानयक्ष

165.20

ओं मणिज्ञानमुष्टि

मूल पाठ: Sarvatathāgatatattvasaṃgraha · Edition: Lokesh Chandra: Sarva Tathāgata Tattva Saṅgraha. Delhi : Motilal Banarsidas, 1987. · Data entry Udip Shakya Anula Shakya · GRETIL (Göttingen) · CC BY-NC-SA 4.0

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