सर्वतथागततत्त्वसंग्रह · अध्याय 131
तत्रासां विद्याहृदयानि भवन्ति ।
ओं पद्मभूरिणी हुं
ओं विश्वकर्मेश्वरि हूं
ओं तथागतेश्वर्याभिषेककर्मविद्ये हूं
ओं धर्मकर्मेश्वरि ज्ञानपूजासमये हूं
ओं अमोघ[कर्मेश्वरि हूं]
ओं पद्मकर्मबुद्धे हूं
ओं पद्मकर्मवज्रिणि हूं
ओं पद्मकामिनि मारणपूजाकर्मसमये हूं
ओं पद्मकर्मतुष्टि हूं
ओं पद्म[कर्म भृ]कुटि हूं त्रः
ओं पद्मकर्मसूर्ये हूं
ओं पद्मकर्मध्वजे हूं
ओं पद्मकर्महासे हः
ओं पद्मकर्मतारे हूं
ओं पद्मकर्मकुमारि हूं
ओं पद्मकर्मनारायणि हूं
ओं पद्मकर्मब्राह्मि हूं
ओं पद्मकर्मनृत्येश्वरि हूं
ओं पद्मरक्षकर्मसमये हूं
ओं महाप्रचण्डि घातनि पद्मदंष्ट्राकर्मकरि हूं
ओं पद्मकर्ममुष्टि घातय हूं
ओं रतिपूजे हूं जः
ओं अभिषेकपूजे हूं होः
ओं गीतपूजे हूं धः
ओं नृत्यपूजे हूं वः
ओं धूपपूजे अः
ओं पुष्पपूजे हूं त्रः
ओं आलोकपूजे हूं धीः
ओं गन्धपूजे हूं वं
ओं हयग्रीवे आनय हूं जः
ओं अमोघपाशक्रोधे पीडय हूं फट्
ओं पद्मशङ्कलबन्धे हूं फट्
ओं पद्मघण्टावेशय हूं फट्
मूल पाठ: Sarvatathāgatatattvasaṃgraha · Edition: Lokesh Chandra: Sarva Tathāgata Tattva Saṅgraha. Delhi : Motilal Banarsidas, 1987. · Data entry Udip Shakya Anula Shakya · GRETIL (Göttingen) · CC BY-NC-SA 4.0