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ग्रंथ पाठ

ऋग्वेद · अध्याय 8.029

8.029.01

बभ्रुर् एको विषुणः सूनरो युवाञ्ज्य् अङ्क्ते हिरण्ययम् ॥

8.029.02

योनिम् एक आ ससाद द्योतनो ऽन्तर् देवेषु मेधिरः ॥

8.029.03

वाशीम् एको बिभर्ति हस्त आयसीम् अन्तर् देवेषु निध्रुविः ॥

8.029.04

वज्रम् एको बिभर्ति हस्त आहितं तेन वृत्राणि जिघ्नते ॥

8.029.05

तिग्मम् एको बिभर्ति हस्त आयुधं शुचिर् उग्रो जलाषभेषजः ॥

8.029.06

पथ एकः पीपाय तस्करो यथाँ एष वेद निधीनाम् ॥

8.029.07

त्रीण्य् एक उरुगायो वि चक्रमे यत्र देवासो मदन्ति ॥

8.029.08

विभिर् द्वा चरत एकया सह प्र प्रवासेव वसतः ॥

8.029.09

सदो द्वा चक्राते उपमा दिवि सम्राजा सर्पिरासुती ॥

8.029.10

अर्चन्त एके महि साम मन्वत तेन सूर्यम् अरोचयन् ॥

मूल पाठ: Ṛgveda-Saṃhitā · Edition: Theodor Aufrecht Die Hymnen des Rigveda. Mandala I-VI Bonn Mareus Theodor Aufrecht Die Hymnen des Rigveda. Mandala VII-X Bonn Mareus · Data entry Barend A. Van Nooten Gary B. Holland · GRETIL (Göttingen) · CC BY-NC-SA 4.0

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