ऋग्वेद · अध्याय 7.017
अग्ने भव सुषमिधा समिद्ध उत बर्हिर् उर्विया वि स्तृणीताम् ॥
उत द्वार उशतीर् वि श्रयन्ताम् उत देवाँ उशत आ वहेह ॥
अग्ने वीहि हविषा यक्षि देवान् स्वध्वरा कृणुहि जातवेदः ॥
स्वध्वरा करति जातवेदा यक्षद् देवाँ अमृतान् पिप्रयच् च ॥
वंस्व विश्वा वार्याणि प्रचेतः सत्या भवन्त्व् आशिषो नो अद्य ॥
त्वाम् उ ते दधिरे हव्यवाहं देवासो अग्न ऊर्ज आ नपातम् ॥
ते ते देवाय दाशतः स्याम महो नो रत्ना वि दध इयानः ॥
मूल पाठ: Ṛgveda-Saṃhitā · Edition: Theodor Aufrecht Die Hymnen des Rigveda. Mandala I-VI Bonn Mareus Theodor Aufrecht Die Hymnen des Rigveda. Mandala VII-X Bonn Mareus · Data entry Barend A. Van Nooten Gary B. Holland · GRETIL (Göttingen) · CC BY-NC-SA 4.0