हरिनामचिन्तामणि · अध्याय 1
श्री-हरिनाम-चिन्तामणि
श्री-गोद्रुम-चन्द्राय नमः
(1)
प्रथम-परिच्छेद
श्री-नाम-माहात्म्य-सूचना
गदाइ गौराङ्ग जय जाह्नवा जीवन ।
सीताद्वैत जय श्रीवासादि भक्त गण
लवण जलधि तीरे नीलाचले श्री मन्दिरे
दारु ब्रह्म पुरुष प्रधान ।
जीवे निस्तारिते हरि अर्चा रूपे अवतरि
भोग मोक्ष करेन प्रदान
सेइ धामे श्री चैतन्य मानवे करिते धन्य
सन्न्यासी रूपेते भगवान् ।
कलिते ये युग धर्म बुझाइते तार मर्म
काशी मिश्र घरे अधिष्ठान
निज भक्त वृन्द लये निजे कल्प तरु हये
कृष्ण प्रेम देन सर्व जने ।
नाना मते भक्त मुखे भक्त कथ शुनि सुखे
जीव शिक्षा देन सुयतने
एक दिन भगवान् समुद्रे करिया स्नान
श्री सिद्ध बकुले हरि दासे ।
मिलि आनन्दित मने जिज्ञासिला स-यतने
किसे जीव तरे अनायासे
प्रभुर चरण धरिऽ अनेक विनय करिऽ
गलद्-अश्रु पुलक शरीर ।
हरि-दास महाशय काङ्दिते काङ्दिते कय
प्रभु तव लीला सुगभीर
आमि अति अकिञ्चन नाहि मोर विद्या धन
तव पद आमार सम्बल ।
ए हेन अयोग्य जने प्रश्न करिऽ अकारणे
बल प्रभु हबे किबा फल
तुमि कृष्ण स्वयं प्रभो जीव उद्धारिते विभो
नवद्वीप धामे अवतार ।
कृपा करिऽ राङ्गा पाय राख मोरे गौर राय
तबे चित्त प्रफुल्ल आमार
तोमार अनन्त नाम तवानन्त गुण ग्राम
तव रूप सुखेर सागर ।
अनन्त तोमार लीला कृपा करिऽ प्रकाशिला
ताइ आस्वादये ए पामर
चिन्मय भास्कर तुमि किरणेर कण आमि
तुमि प्रभु, आमि नित्य दास ।
चरण पीयूष तव मम सुख सुवैभव
तव नामामृते मोर आश
ए मत अधम आमि कि बलिते जानि स्वामी
तबु आज्ञा करिब पालन ।
या बलाबे मोर मुखे तोमारे बलिब सुखे
दोष गुण ना करि गणन
कृष्ण-तत्त्व
एक-मात्र इच्छामय कृष्ण सर्वेश्वर ।
नित्य शक्ति-योगे कृष्ण विभु परात्पर
कृष्ण कृष्ण-शक्ति
कृष्ण-शक्ति कृष्ण हैते ना हय स्वतन्त्र ।
येइ शक्ति सेइ कृष्ण कहे वेद-मन्त्र
कृष्ण विभु, शक्ति ताङ्र वैभव स्वरूप ।
अनन्त वैभवे कृष्ण हय एक रूप
त्रिविध वैभव
शक्तिर प्रकाश येइ सेइ त वैभव ।
विभुर वैभव मात्र हय अनुभव
वैभव त्रिविध तव गौराङ्ग सुन्दर
चिद् अचित् जीव तिन शास्त्रेर गोचर
चिद्-वैभव
अनन्त वैकुण्ठ आदि यत कृष्ण धाम ।
गोविन्द श्री-कृष्ण हरि आदि यत नाम
द्विभुज मुरलीधर आदि यत रूप ।
भक्तानन्द-प्रद आदि गुण अपरूप
व्रज रस-लीला नवद्वीपे सङ्कीर्तन ।
एइ रूप कृष्ण लीला विचित्र गणन
ए समस्त चिद्-वैभव अप्राकृत हय ।
आसिया-ओ ए प्रपञ्चे प्रापञ्चिक नय
चिद्-व्यापार समुदय विष्णु-तत्त्व-सार ।
विष्णु-पद बलि वेदे गाय बार बार
कृष्णेर चिद्-विभुता-इ विष्णु-तत्त्व शुद्ध-तत्त्व
नाहि ताहे जड-धर्म मायार विकार ।
जडातीत विष्णु-तत्त्व शुद्ध-सत्त्व-सार
शुद्ध-सत्त्व रजस्-तमो-गन्ध-विरहित ।
रजस्-तमो-मिश्र मिश्र-सत्त्व सुविदित
गोविन्द वैकुण्ठ-नाथ कारणोदशायी ।
गर्भोदशायी आर क्षीर-सिन्धु-शायी
आर यत स्वांश परिचित अवतार ।
सेइ सब शुद्ध-सत्त्व विष्णु-तत्त्व-सार
गोलोके वैकुण्ठे आर कारण-सागरे ।
अथवा ए जडे थाके, विष्णु-नाम धरे
प्रवेशि ए जड विश्व मायार अधीश ।
विष्णु-नाम प्राप्त विभु सर्व-देव ईश
मायार ईश्वर मायी शुद्ध-सत्त्व-मय ।
मिश्र-सत्त्व
मिश्र-सत्त्व ब्रह्मा शिव आदि सब हय
चिद्-वैभवेर विस्तृति
ए समस्त विष्णु-तत्त्व आर विष्णु-धाम ।
तव चिद्-वैभव नाथ तव लीला-ग्राम
अचिद्-वैभव माय-तत्त्व
विरजार एइ पारे यत वस्तु हय ।
अचित् वैभव तव चौद्द-लोक-मय
मायार वैभव बलि बले देवी-धाम ।
पञ्च-भूत मनो बुद्धि अहङ्कार नाम
ए भूर्लोक, भुवर्लोक आर स्वर्ग-लोक ।
महर्लोक, जन-तप-सत्य-ब्रह्मलोक
अतल-सुतल-आदि निम्न लोक सात ।
मायिक वैभव तव शुन जगन्नाथ
चिद्-वैभव पूर्ण-तत्त्व माया छाया तार ।
जीव-वैभव
चिद्-अणु-स्वरूप जीव वैभव प्रकार
चिद्-धर्म-वशतः जीव स्वतन्त्र गठन ।
सङ्ख्याय अनन्त सुख तार प्रयोजन
मुक्त जीव
सेइ सुख हेतु यारा कृष्णेरे बरिल ।
कृष्ण-पारिषद मुक्त-रूपेते रहिल
बद्ध वा बहिर्मुख जीव
यारा पुनः निज-सुख करिया भावना ।
पार्श्व-स्थिता माया प्रति करिल कामना
सेइ सब नित्य-कृष्ण-बहिर्मुख हैल ।
देवी-धामे माया-कृत शरीर पाइल
पुण्य पाप कर्म चक्रे पडिया एखन ।
स्थूल लिङ्ग देहे सदा करेन भ्रमण
कभु स्वर्गे उठे, कभु निरये पडिया ।
चौराशि लक्ष योनि भोगे भ्रमिया भ्रमिया
तथापि कृष्ण-दया
तुमि विभु, तोमार वैभव जीव हय ।
दासेर मङ्गल चिन्ता तोमार निश्चय
दास याहा सुख मानि करे अन्वेषण ।
तुमि ताहा कृपा करि कर वितरण
प्राकृत शुभ-कर्म कर्म-काण्ड
मायार वैभवे ये अनित्य सुख चाय
तोमार कृपाय से अनायासे पाय
सेइ सुख प्राप्त्य्-उपाय शुभ-कर्म यत ।
निरमिले धर्म-यज्ञ-योग-होम-व्रत
सेइ सब शुभ-कर्म सदा जड-मय ।
चिन्मयी प्रवृत्ति ताहे कभु ना मिलय
ताहार साधने साध्य जडमय फल ।
उच्च-लोक भोग सुख ताहाते प्रबल
सेइ सब कर्म-भोग नाहि आत्म-शान्ति ।
ताहाते प्रयास करा अतिशय भ्रान्ति
सेइ सब शुभ कर्म उपाय हैया ।
अनित्य उपेय साधे लोक सुख दिया
सेइ अवस्था हैते उद्धारेर उपाय
कभु यदि साधु सङ्गे जानिते से पारे ।
आमि जीव कृष्ण-दास, याय माया पारे
से विरल फल मात्र सुकृति-जनित ।
तुच्छ कर्म-काण्ड नाहि करिले विहित
ज्ञान-काण्ड, ब्रह्म-लय सुख
आर यिनि मायार यन्त्रणा मात्र जानि ।
मुक्ति लाभे यत्नवान् तिनि हन ज्ञानी
से सब लोकेर जन्य तुमि दयामय ।
ज्ञान-काण्ड ब्रह्म-विद्या दियाछ निश्चय
सेइ विद्या मायावाद करिया आश्रय ।
जड मुक्त हये ब्रह्मे जीव हय लय
ब्रह्म-वस्तु कि?
सेइ ब्रह्म तव अङ्ग-कान्ति ज्योतिर्मय ।
विरजार पारे स्थित ताते हय लय
ये सब असुरे विष्णु करेन संहार ।
ताहारा-ओ सेइ ब्रह्मे याय माया-पार
कृष्ण-बहिर्मुख
कर्मी ज्ञानी उभये-इ कृष्ण-बहिर्मुख ।
कभु नाहि आस्वादय कृष्ण-दास्य-सुख
भक्त्य्-उन्मुखी सुकृति
भक्तिर उन्मुखी सेइ सुकृति प्रधान ।
तार फले जीव भक्त-साधु-सङ्ग पान
श्रद्धावान् हये कृष्ण-भक्त-सङ्ग करे ।
नामे रुचि, जीवे दया, भक्ति-पथ धरे
कर्मी ओ ज्ञानीर प्रति कृपाय गौण-पथ विधान
दयार सागर तुमि जीवेर ईश्वर ।
कर्मी ज्ञानी बहिर्मुख उद्धारे तत्पर
कर्म-पथे ज्ञान-पथे पथिक ये जन ।
ताहार उद्धार लागि तोमार यतन
सेइ सेइ पथिकेर मङ्गल चिन्तिया ।
गौण-भक्ति पथ एक राखिल करिया
कर्मीर पक्षे कर्मेर गौण-भक्ति पथ
कर्मी वर्णाश्रमे थाकि साधु-सङ्ग करि ।
कर्म माझे भक्ति करे गौण-पथ धरि
तार कृत कर्म सब हृदय शोधिया ।
तिरोहित हय श्रद्धा बीजे स्थान दिया
ज्ञानीर गौण-पथ
ज्ञानी सुकृतिर बले भक्तेर कृपाय ।
अनन्य भक्तिते श्रद्धा बीजे स्थान दिया
तुमि बल मोर दास मायार विपाके ।
चाहे अन्य तुच्छ फल छाडिया आमाके
आमि जानि तार याते हय सुमङ्गल ।
भुक्ति मुक्ति छाडाइया दि-इ भक्ति फल
गौण-पथेर प्रक्रिया
तार काम अनुसारे चालाञा ताहारे
गौण-पथ भक्ति-मार्गे श्रद्धा दि-इ तारे
ए तोमार कृपा प्रभु तुमि कृपामय ।
कृपा ना करिले किसे जीव शुद्ध हय
कलिते गौण-पथेर दुर्दशा
सत्य-युगे ध्यान-योगे कत ऋषि-गणे ।
शुद्ध करिऽ दिले प्रभु निज-भक्ति-धने
त्रेता-युगे यज्ञ-कर्मे अनेक शोधिले ।
द्वापरे अर्चन-मार्गे भक्ति बिलाइले
कलि आगमने नाथ जीवेर दुर्दशा ।
देखि ज्ञान कर्म योग छाडिल भरसा
अल्प आयु, बहु पीडा, बल-बुद्धि-ह्रास ।
एइ सब उपद्रव जीवे कैल ग्रास
वर्णाश्रम धर्म आर साङ्ख्य योग ज्ञान ।
कलि-जीवे उद्धारिते नहे बलवान्
ज्ञान-कर्म-गत ये भक्तिर गौण-पथ ।
कण्टके सङ्कीर्ण हञा हैल विपथ
पृथक् उपाय धरि उपेय साधने ।
विघ्न बहुतर हैल जीवेर जीवने
नामालोचनार मुख्य-पथ
प्रभु तुमि जीवेर मङ्गल चिन्ता करि ।
कलि युगे नाम सङ्गे स्वयं अवतरि
युग धर्म प्रचारिले नाम सङ्कीर्तन ।
मुख्य पथे जीव पाय कृष्ण प्रेम धन
नामेर स्मरणे आर नाम-सङ्कीर्तन ।
एइ मात्र धर्म जीव करिबे पालन
साध्य-साधन ओ उपाय उपेयेर अभेदता-क्रमे नामेर मुख्यता
येइ त साधन सेइ साध्य यबे हैल ।
उपाय उपेय मध्ये भेद ना रहिल
साध्येर साधने आर नाहि अन्तराय ।
अनायासे तरे जीव तोमार कृपाय
आमि त अधम अति मजिया विषये ।
ना भजिनु नाम तव अति मूढ हये
दर दर धारा चक्षे ब्रह्म-हरिदास ।
पडिल प्रभुर पदे छाडिया निःश्वास
हरि भक्त भक्ति मात्रे विनोद याहार ।
हरिनाम चिन्तामणि जीवन ताहार
मूल पाठ: Harināmacintāmaṇi · Data entry n.n. · GRETIL (Göttingen) · CC BY-NC-SA 4.0