वास्तव में कर्म कौन कर रहा है? सांख्य सूत्र अध्याय 6 में चेतना, अहंकार और भौतिक संसार का यथार्थ
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कपिल मुनि के सांख्य सूत्र अध्याय 6 से समझें कि चेतना अकर्ता क्यों है, अहंकार कैसे कर्म करता है, और आधुनिक न्यूरोसाइंस के साथ इसके वास्तविक संबंध क्या हैं।
इस लेख में
- स्फटिक, ऊंट और अहंकार: कपिल मुनि ने वास्तव में क्या लिखा
- प्रमुख संस्कृत शब्दों की वास्तविक समझ
- परंपरागत व्याख्याएं और प्राचीन आचार्यों के मतभेद
- सनातन परंपरा के अन्य ग्रंथों से जुड़ाव
- आधुनिक संज्ञान विज्ञान और न्यूरोसाइंस के वास्तविक शोध
- कहाँ समानता टिकती है और कहाँ भ्रांतियाँ शुरू होती हैं
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
- ग्रंथ और संदर्भ
आजकल जब हम अध्यात्म से जुड़ी सामान्य चर्चाएं सुनते हैं, तो अक्सर दो अजीब और परस्पर विरोधी बातें सामने आती हैं। एक तरफ आधुनिक दौर के कुछ वक्ता यह दावा करते हैं कि यह पूरा भौतिक संसार केवल मन का भ्रम है, एक छलावा है, और आपकी अपनी चेतना ही हर बाहरी घटना को जन्म देती है। यदि कोई व्यक्ति बीमार पड़ जाए या व्यापार में घाटा उठा ले, तो अप्रत्यक्ष रूप से उसी को दोषी ठहरा दिया जाता है कि उसके विचारों में ही नकारात्मकता रही होगी।
दूसरी तरफ, पूरी तरह से भौतिकवादी सोच यह कहती है कि मनुष्य केवल रासायनिक प्रक्रियाओं और मस्तिष्क की नसों का एक पुतला है, और उसकी चेतना जैविक विकास की एक तुच्छ उपज मात्र है।
ये दोनों ही विचार मन को भारी करते हैं। पहला विचार व्यक्ति को अकारण अपराधबोध से भर देता है, और दूसरा विचार मनुष्य के भीतर की जीवित अनुभूति और आत्मसम्मान को छीन लेता है।
जब हम महर्षि कपिल द्वारा रचित सांख्य सूत्र के छठे अध्याय को ध्यान से पढ़ते हैं, तो इस उलझन का एक बहुत संतुलित और स्पष्ट समाधान मिलता है। इस अध्याय को 'तन्त्राध्याय' कहा जाता है, जहां कपिल मुनि अपने समय के विभिन्न दार्शनिकों के तर्कों का उत्तर देते हुए सांख्य दर्शन के मूलभूत सत्यों को स्थापित करते हैं।
कपिल मुनि न तो संसार को झूठा सपना कहते हैं, और न ही चेतना को मस्तिष्क का रासायनिक कचरा मानते हैं। वे बहुत साफ़ शब्दों में बताते हैं कि यह भौतिक संसार पूरी तरह से वास्तविक है, शरीर और अहंकार सारे कार्य करते हैं, और आपकी मूल चेतना कभी कोई भौतिक कार्य नहीं करती।
स्फटिक, ऊंट और अहंकार: कपिल मुनि ने वास्तव में क्या लिखा
सांख्य दर्शन को समझने के लिए हमें छठे अध्याय के मुख्य सूत्रों और उनके प्रमाणों को देखना होगा। कपिल मुनि किसी भी बात को बिना प्रमाण के स्वीकार करने के लिए नहीं कहते। वे दैनिक जीवन के प्रत्यक्ष अनुभवों के आधार पर अपने विचार प्रस्तुत करते हैं।
सबसे पहले कपिल मुनि इस भ्रांति को दूर करते हैं कि यह दुनिया केवल एक मानसिक कल्पना है। सूत्र 6.52 में वे संसार की वास्तविकता को प्रमाणित करते हैं:
जगत्सत्यत्वमदुष्टकारणजन्यत्वं बाधकाभावात्
कपिल मुनि कहते हैं कि यह संसार वस्तुगत रूप से सत्य है, क्योंकि यह बिना किसी दोष वाले साधनों से उत्पन्न होता है और इसे झुठलाने वाला कोई विरोधी अनुभव मौजूद नहीं है।
जब हम मंद रोशनी में किसी रस्सी को सांप समझ बैठते हैं, तो वह भ्रम इसलिए होता है क्योंकि रोशनी कमजोर थी या आंखें थकी हुई थीं। जैसे ही पास जाकर दीया जलाया जाता है, रस्सी का दिखना उस भ्रम को तुरंत मिटा देता है। लेकिन जब हम पूरी तरह स्वस्थ आंखों से किसी पेड़, नदी या पहाड़ को देखते हैं, तो कोई भी बाद का अनुभव उनके अस्तित्व को रद्द नहीं करता। भौतिक संसार कोई कपोल-कल्पना नहीं है।
इसके साथ ही, सांख्य दर्शन का सुप्रसिद्ध सत्कार्यवाद यह स्पष्ट करता है कि कोई भी कार्य अपने उपादान कारण में पहले से विद्यमान होता है। सूत्र 6.53 में कहा गया है:
प्रकारान्तरासंभवात्सदुत्पत्तिः
किसी अन्य प्रकार से उत्पत्ति संभव नहीं है, इसलिए जो पहले से सत्य और उपस्थित है, उसी का प्राकट्य होता है। दूध से ही दही बनता है क्योंकि दही बनने की शक्ति दूध में पहले से उपस्थित है। रेत को कितना भी पेर लिया जाए, उसमें से कभी तेल नहीं निकल सकता। प्रकृति कोई शून्य या भ्रम नहीं है, बल्कि एक वास्तविक और निरंतर रूपांतरित होने वाली शक्ति है।
संसार को सत्य सिद्ध करने के बाद, कपिल मुनि एक ऐसी बात कहते हैं जो आज के बहुत से लोगों को हैरान कर देती है। सूत्र 6.54 में वे वास्तविक कर्ता का निर्धारण करते हैं:
अहङ्कारः कर्ता न पुरुषः
अहंकार ही वास्तविक कर्ता है, पुरुष अर्थात शुद्ध चेतना कभी कर्ता नहीं होती।
सूत्र 6.50 में कपिल मुनि बताते हैं कि चेतना जड़ पदार्थों से सर्वथा भिन्न है और केवल उन्हें प्रकाशित करने का स्वभाव रखती है:
जडव्यावृत्तो जडं प्रकाशयति चिद्रूपः
चेतना न तो विचार करती है, न नसों में रक्त संचार करती है, न कोई निर्णय लेती है, और न ही क्रोध या भय महसूस करती है। यह सारे कार्य प्रकृति से उत्पन्न हमारी आंतरिक व्यवस्था, विशेष रूप से अहंकार द्वारा किए जाते हैं। मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र जानकारी का विश्लेषण करते हैं और हाथ-पैर हिलाने का निर्देश देते हैं। चेतना केवल उस पूरी प्रक्रिया की मूक साक्षी बनी रहती है।
अब स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि यदि हमारी मूल चेतना कुछ करती ही नहीं और उसे कोई चोट नहीं लग सकती, तो फिर मनुष्य जीवन में तनाव, दुख और भय का अनुभव क्यों करता है?
इसका उत्तर कपिल मुनि ने भारतीय दर्शन के सबसे सुंदर उदाहरण के माध्यम से दिया है। सूत्र 6.27 और 6.28 में वे इस भ्रांति को समझाते हैं:
निस्सङ्गेऽप्युपरागोऽविवेकात्
जपास्फटिकयोरिव नोपरागः किन्त्वभिमानः
सर्वथा असंग होने पर भी चेतना पर अविवेक के कारण रंग चढ़ा हुआ प्रतीत होता है। जैसे लाल गुड़हल के फूल और पारदर्शी स्फटिक मणि के बीच वास्तव में कोई रंग का आदान-प्रदान नहीं होता, केवल वैसा मान लेना होता है।
आप एक बिल्कुल स्वच्छ और पारदर्शी स्फटिक की कल्पना कीजिए। यदि उस स्फटिक के ठीक पीछे एक चमकीला लाल गुड़हल का फूल रख दिया जाए, तो वह स्फटिक बाहर से देखने वाले को पूरी तरह लाल दिखाई देने लगता है। कोई नासमझ व्यक्ति यह सोच सकता है कि स्फटिक जल रहा है या स्फटिक लाल हो चुका है। लेकिन यदि उस फूल को वहां से हटा दिया जाए, तो स्फटिक पहले की तरह ही निर्मल रहता है। लाल रंग का एक भी कण स्फटिक के भीतर प्रवेश नहीं करता।
ठीक इसी प्रकार, जब हमारी बुद्धि चिंता, भय या उत्तेजना से भर जाती है, तो अविवेक के कारण हम बुद्धि की उस हलचल को अपनी चेतना पर आरोपित कर लेते हैं। हम यह कहने लगते हैं कि मैं दुखी हूँ या मैं तनाव में हूँ। वास्तव में तनाव तंत्रिका तंत्र और मन में होता है, चेतना तो केवल उस अवस्था को देख रही होती है।
यदि प्रकृति स्वयं अचेतन है, तो वह इतना जटिल शरीर, आंखें और सोचने वाला मस्तिष्क क्यों बनाती है? इसके उत्तर में सूत्र 6.40 में कपिल मुनि एक बहुत व्यावहारिक दृष्टांत देते हैं:
अनुपभोगेऽपि पुमर्थं सृष्टिः प्रधानस्योष्ट्रकुङ्कुमवहनवत्
स्वयं कोई उपभोग न करने पर भी, प्रकृति की यह सारी रचना केवल पुरुष के प्रयोजन के लिए है, ठीक वैसे ही जैसे कोई ऊंट केसर का भार ढोता है।
एक ऊंट तपते हुए मरुस्थल में अपनी पीठ पर बहुमूल्य केसर की बोरियां लादकर चलता है। ऊंट पसीना बहाता है, भारी वजन उठाता है, लेकिन वह न तो केसर की सुगंध का आनंद ले सकता है और न ही उसे भोजन में उपयोग कर सकता है। उसके लिए उस केसर का कोई व्यक्तिगत उपयोग नहीं है। वह सारा परिश्रम केवल उस व्यापारी के लिए होता है जो यात्रा के अंत में उस माल को प्राप्त करता है। उसी प्रकार हमारा शरीर और मस्तिष्क निरंतर कार्य करते हैं, ताकि चेतन साक्षी को अनुभव और अंततः मुक्ति प्राप्त हो सके।
तो फिर एक जीवित मनुष्य क्या है? सूत्र 6.63 में कपिल मुनि स्पष्ट करते हैं:
विशिष्टस्य जीवत्वमन्वयव्यतिरेकात्
जीव का भाव एक विशिष्ट अर्थात मिले-जुले संघात का होता है। मनुष्य न तो केवल हवा में उड़ती हुई अमूर्त चेतना है और न ही केवल मिट्टी का एक बेजान ढेर है। वह जैविक यंत्र और उस पर पड़ने वाले चेतना के प्रतिबिंब का एक संयुक्त रूप है।
क्योंकि हमारी मूल चेतना कभी अशुद्ध हुई ही नहीं थी, इसलिए मोक्ष का अर्थ कहीं बाहर से कोई नई शक्ति प्राप्त करना नहीं है। सूत्र 6.20 में कपिल मुनि कहते हैं:
मुक्तिरन्तरायध्वस्तेर्न परः
मुक्ति केवल बाधा के नष्ट हो जाने का नाम है, उससे अधिक कुछ नहीं।
जैसे सूत्र 6.14 में कहा गया है कि दीपक जलते ही अंधकार स्वयं समाप्त हो जाता है, वैसे ही यह समझ आते ही कि स्फटिक कभी लाल नहीं हुआ था, सारा भ्रम समाप्त हो जाता है। सूत्र 6.16 में कपिल मुनि साफ कहते हैं कि किसी अन्य कारण की संभावना न होने से केवल अविवेक ही बंधन है।
प्रमुख संस्कृत शब्दों की वास्तविक समझ
सांख्य दर्शन के मूल भाव को समझने के लिए उसके तकनीकी शब्दों को उनके वास्तविक अर्थ में जानना आवश्यक है:
- अहङ्कार: आम बोलचाल में अहंकार का अर्थ घमंड या दंभ समझा जाता है। लेकिन सांख्य में इसका अर्थ है 'मैं का निर्माण करने वाला' तत्व। यह बुद्धि का वह भाग है जो इंद्रियों से आने वाली सूचनाओं पर अपने स्वामित्व की मुहर लगाता है। जब आंखें आग को देखती हैं, तो अहंकार कहता है कि यह आग मुझे जला सकती है। यह प्रकृति से बना एक आंतरिक उपकरण है, आत्मा नहीं।
- उपराग: इसका शाब्दिक अर्थ है रंग का चढ़ना या किसी प्रभाव का झलकना। प्राचीन खगोलशास्त्र में ग्रहण के लिए भी इस शब्द का प्रयोग होता था, जहां प्रकाश नष्ट नहीं होता बल्कि एक छाया मात्र पड़ती है। यहाँ इसका अर्थ चेतना पर मन की वृत्तियों का आभासी प्रभाव है।
- अभिमान: इसका अर्थ है किसी वस्तु को भूलवश अपना मान लेना। स्फटिक में दिख रहे लाल रंग को देखकर यह मान बैठना कि स्फटिक ही लाल हो गया है, अभिमान कहलाता है।
- जगत्सत्यत्व: दृश्यमान जगत का वस्तुगत यथार्थ। सांख्य दर्शन जगत को माया या अवास्तविक कहकर खारिज नहीं करता। भौतिक नियम, शारीरिक व्याधियां और प्रकृति के बल पूरी तरह सत्य हैं।
- सत्कार्यवाद: यह सिद्धांत बताता है कि कोई भी प्रभाव अपने कारण में पहले से छिपा रहता है। प्रकृति में नया कुछ भी अचानक शून्य से पैदा नहीं होता, केवल रूप बदलते हैं।
- अविवेक: भेद न कर पाने की असमर्थता। दृष्टा और दृश्य के बीच के अंतर को न समझ पाना ही अविवेक है, और यही सारे दुखों की जड़ है।
- विशिष्ट: विशेष गुणों से युक्त या संघात रूप। यह शब्द जीव के लिए प्रयुक्त हुआ है, जो चेतना और भौतिक उपाधियों का मिला-जुला रूप है।
- अन्तरायध्वंस: रुकावट का पूरी तरह समाप्त हो जाना। ज्ञान कोई नया गुण पैदा नहीं करता, केवल अज्ञान की दीवार को गिरा देता है।
- व्यवस्था: जीवन की परिस्थितियों का निश्चित और अलग-अलग वितरण। सभी प्राणी अलग समय पर जन्म लेते हैं, अलग समय पर सोते हैं और अलग कर्मफल भोगते हैं। कपिल मुनि इसी व्यवस्था के आधार पर सिद्ध करते हैं कि चेतना के केंद्र अनेक हैं।
परंपरागत व्याख्याएं और प्राचीन आचार्यों के मतभेद
सांख्य सूत्र का छठा अध्याय केवल निर्विवाद नियमों की सूची नहीं है, बल्कि इसमें प्राचीन आचार्यों के बीच हुए गहरे विचार-विमर्श और मतभेदों को भी दर्ज किया गया है।
एक प्रमुख विवाद इस बात पर रहा कि चेतना और बुद्धि के बीच का यह संबंध किस प्रकार काम करता है। सूत्र 6.26 से 6.28 और 6.55 के संदर्भ में दो प्रसिद्ध टीकाकारों के मत अलग रहे:
अनिरुद्ध ने अपनी 'सांख्यसूत्रवृत्ति' में 'एक-प्रतिबिम्बवाद' का समर्थन किया। उनका कहना था कि बुद्धि विचार और भावनाओं के रूप में बदलती है, और चूंकि बुद्धि सत्व गुण के कारण अत्यंत निर्मल होती है, इसलिए उसके भाव अचल चेतना में प्रतिबिंबित होते हैं। पुरुष सूत्र 6.59 के अनुसार आकाश की भांति शांत और अपरिवर्तनीय रहता है।
दूसरी तरफ, विज्ञानभिक्षु ने अपने 'सांख्यप्रवचनभाष्य' में इस पर आपत्ति उठाई। उनका तर्क था कि यदि केवल बुद्धि के भाव चेतना पर पड़ेंगे, तो चेतना में परिवर्तन आ जाएगा और वह नश्वर हो जाएगी। इसलिए उन्होंने 'अन्योन्य-प्रतिबिम्बवाद' अर्थात परस्पर प्रतिबिंब का सिद्धांत रखा। पहले पुरुष का प्रकाश बुद्धि के दर्पण पर पड़ता है जिससे अचेतन बुद्धि जीवित जैसी प्रतीत होने लगती है। फिर उस प्रकाशित बुद्धि के सुख-दुख वापस चेतना में झलकते हैं, जिससे यह भ्रम होता है कि मैं दुखी हूँ।
इसी प्रकार, ग्रंथ में दो प्राचीन ऋषियों के मतभेदों का भी स्पष्ट उल्लेख मिलता है:
सूत्र 6.68 में महर्षि पञ्चशिख का मत दिया गया है कि पुरुष और प्रकृति का संबंध केवल और केवल अविवेक के कारण है। उनके अनुसार यह पूरी तरह से दृष्टि का दोष है, जिसे ज्ञान होते ही तुरंत दूर किया जा सकता है।
वहीं सूत्र 6.69 में आचार्य सनन्दन का मत दर्ज है कि यह संबंध सूक्ष्म शरीर के कारण बना रहता है। सूक्ष्म शरीर जन्म-जन्मांतरों के संस्कारों को संजोकर रखने वाला एक माध्यम है, इसलिए केवल मौखिक समझ से काम नहीं चलता, बल्कि संस्कारों को शांत करने की निरंतर साधना आवश्यक होती है।
कपिल मुनि ने अद्वैत वेदांत के उन आक्षेपों का भी बहुत निर्भीकता से उत्तर दिया जो उपनिषदों के 'एकमेवाद्वितीयम्' वाक्य का हवाला देकर प्रकृति और अनेक पुरुषों के सिद्धांत का विरोध करते थे।
सूत्र 6.51 में कपिल मुनि बहुत स्पष्ट बात कहते हैं:
न श्रुतिविरोधो रागिणां वैराग्याय तत्सिद्धेः
वेदों के अद्वैत परक वचनों से कोई विरोध नहीं है, क्योंकि वे वचन सांसारिक आसक्ति से भरे लोगों में वैराग्य जगाने के उद्देश्य से कहे गए हैं।
कपिल मुनि का तर्क है कि जब शास्त्र यह कहते हैं कि सब कुछ एक ही है, तो उसका उद्देश्य व्यक्ति के स्वार्थ, लोभ और अहंकार को चोट पहुंचाना होता है। जब मनुष्य यह सोचता है कि सब कुछ एक है, तो उसका संकीर्ण स्वार्थ ढीला पड़ता है। लेकिन यह उपदेश भौतिक संसार की सत्यता और अलग-अलग जीवों की वास्तविकता को मिटाने के लिए नहीं था।
वे सूत्र 6.45 में कहते हैं कि यदि सभी शरीरों में केवल एक ही चेतना होती, तो एक व्यक्ति के सोने पर पूरी सृष्टि सो जाती और एक के मुक्त होने पर सभी मुक्त हो जाते।
सूत्र 6.46 में वे एक सीधा तर्क रखते हैं कि जो लोग यह मानते हैं कि एक ही आत्मा शरीर रूपी उपाधियों से अलग दिखाई देती है, वे बताएं कि वह उपाधि सत्य है या असत्य। यदि वह उपाधि सत्य है, तो आपने चेतना के अतिरिक्त दूसरी वस्तु को सत्य मान ही लिया। और यदि वह असत्य है, तो कोई झूठी वस्तु वास्तविक चेतना को बांध या बांट नहीं सकती।
सनातन परंपरा के अन्य ग्रंथों से जुड़ाव
कपिल मुनि का यह विश्लेषण केवल सांख्य दर्शन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने सनातन धर्म के अन्य प्रमुख ग्रंथों को भी वैचारिक आधार दिया।
इसका सबसे प्रत्यक्ष उदाहरण श्रीमद्भगवद्गीता के तीसरे अध्याय के 27वें श्लोक में मिलता है, जहां भगवान श्रीकृष्ण कपिल मुनि के सूत्र 6.54 का ही विस्तार करते हैं:
प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ॥
सारे कर्म वास्तव में प्रकृति के गुणों द्वारा ही किए जाते हैं। लेकिन जिसका अंतःकरण अहंकार से मोहित है, वह अज्ञानी मनुष्य मानता है कि मैं कर्ता हूँ।
गीता का निष्काम कर्मयोग इसी सिद्धांत पर टिका है। जब आपको यह बोध होता है कि आपका चेतन स्वरूप कोई शारीरिक दबाव नहीं बनाता, तो आप अपने शरीर और मन को बिना किसी व्यर्थ के अहंकार के अपने कर्तव्य निभाने देते हैं।
इसी तरह पतंजलि का योग दर्शन वस्तुतः सांख्य दर्शन का ही व्यावहारिक रूप है। छठे अध्याय में कपिल मुनि ने योग के सूत्रों को सीधे समाहित किया है।
सूत्र 6.24 में वे आसन के विषय में कहते हैं:
स्थिरसुखमासनमिति न नियमः
स्थिर और सुखपूर्वक बैठना ही आसन है, इसमें शरीर को हठपूर्वक कष्ट देने का कोई कठोर नियम नहीं है। यह सीधे पतंजलि के योगसूत्र का स्मरण कराता है।
फिर सूत्र 6.25 में वे ध्यान की परिभाषा देते हैं:
ध्यानं निर्विषयं मनः
मन का किसी भी बाहरी विषय से रहित हो जाना ही ध्यान है।
यह पतंजलि के उस सिद्धांत से पूरी तरह मेल खाता है जहाँ दृष्टा अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित होता है और वृत्तियों के साथ अपनी पहचान बनाना छोड़ देता है।
कठोपनिषद् में भी रथ का जो रूपक दिया गया है, वह इसी व्यवस्था को दर्शाता है। शरीर रथ है, बुद्धि सारथी है, मन लगाम है, और इंद्रियां उस रथ को खींचने वाले घोड़े हैं। आत्मा उस रथ में पीछे बैठा हुआ शांत यात्री है।
यात्री न तो चाबुक चलाता है और न ही घोड़ों की लगाम खींचता है। यदि सारथी असावधान हो जाए और रथ खड्ड में गिर जाए, तो दोष सारथी का होता है, यात्री का नहीं। यह वही बात है जो कपिल मुनि ऊंट और अहंकार के संदर्भ में समझाते हैं।
आधुनिक संज्ञान विज्ञान और न्यूरोसाइंस के वास्तविक शोध
यदि हम आधुनिक विज्ञान की बात करें और किसी भी प्रकार के अतिशयोक्तिपूर्ण दावों से बचें, तो हम पाएंगे कि आधुनिक संज्ञान विज्ञान के कुछ वास्तविक अध्ययन कपिल मुनि के दृष्टिकोण से बहुत मिलते-जुलते हैं।
मन के आधुनिक दर्शन में डेविड चाल्मर्स ने चेतना के अध्ययन को दो भागों में बांटा है: सरल समस्याएं और कठिन समस्या।
सरल समस्याओं के अंतर्गत वे सभी कार्य आते हैं जो मस्तिष्क सूचनाओं के आधार पर करता है, जैसे आंखों से रोशनी ग्रहण करना, स्मृति को खंगालना, शब्दों को समझना, और किसी खतरे को देखकर पीछे हटना। विज्ञान समझता है कि मस्तिष्क की नसें और न्यूरॉन्स इन गणनाओं को कैसे अंजाम देते हैं।
कठिन समस्या यह है कि इन सभी भौतिक और रासायनिक गणनाओं के साथ-साथ भीतर एक सजीव व्यक्तिगत अनुभव क्यों जुड़ा होता है? किसी रंग को देखकर भीतर लालिमा का जो अहसास होता है, वह विशुद्ध रूप से भौतिक गणना से अलग क्यों महसूस होता है?
कपिल मुनि ने ठीक यही विभाजन ढाई हजार वर्ष पूर्व किया था। उन्होंने सोचने, निर्णय लेने, याद रखने और भावनाओं की सारी रासायनिक व भौतिक प्रक्रियाओं को प्रकृति, बुद्धि और अहंकार के हवाले किया। मस्तिष्क एक जैविक यंत्र है। शुद्ध चेतना कोई गणना नहीं करती, वह केवल उस यंत्र में चलने वाली गतिविधियों को प्रकाशित करती है।
इस बात का एक बहुत ठोस प्रमाण निर्णय लेने से जुड़े आधुनिक न्यूरोसाइंस के प्रयोगों में देखने को मिला। 1980 के दशक में बेंजामिन लिबेट ने मस्तिष्क की विद्युत तरंगों की जांच करते हुए एक ऐतिहासिक प्रयोग किया। उन्होंने देखा कि जब कोई व्यक्ति अपनी उंगली हिलाने का सचेत निर्णय लेता है, तो उस निर्णय के प्रति जागरूक होने से कुछ सौ मिलीसेकंड पहले ही मस्तिष्क के मोटर कॉर्टेक्स में एक विद्युत हलचल शुरू हो चुकी होती है, जिसे 'रेडीनेस पोटेंशियल' कहा गया।
वर्ष 2008 में चून सिओंग सून और उनके साथियों ने आधुनिक एमआरआई तकनीकों के सहारे यह दिखाया कि कुछ सरल निर्णयों के संकेत व्यक्ति के जागरूक होने से कई सेकंड पहले ही मस्तिष्क में दिखाई देने लगते हैं।
जब ये प्रयोग सामने आए, तो आधुनिक जगत में यह बहस छिड़ गई कि क्या मनुष्य का अपनी इच्छाओं पर कोई नियंत्रण नहीं है? लेकिन सांख्य दर्शन के दृष्टिकोण से यह बात बहुत स्वाभाविक है। सूत्र 6.54 में पहले ही कहा गया है कि कर्म अहंकार करता है, पुरुष नहीं। भौतिक मस्तिष्क निर्णय की प्रक्रिया शुरू करता है और चेतन जागरूकता केवल उस घटित होते हुए कार्य का साक्षी बनती है।
एक और रोचक विचार संज्ञान वैज्ञानिक डोनाल्ड हॉफमैन के प्रत्यक्षीकरण के इंटरफ़ेस सिद्धांत में मिलता है। हॉफमैन का गणितीय विश्लेषण बताता है कि जैविक विकास ने हमारी इंद्रियों को वस्तुगत सत्य देखने के लिए नहीं, बल्कि केवल जीवित रहने और लाभ प्राप्त करने के लिए गढ़ा है।
हमारा अनुभव कंप्यूटर की स्क्रीन पर दिखने वाले आइकन की तरह है। जब आप स्क्रीन पर किसी फाइल का नीला फोल्डर देखते हैं, तो वह वास्तव में कोई फोल्डर नहीं होता, बल्कि सिलिकॉन चिप में बहने वाले सूक्ष्म विद्युत संकेत होते हैं। लेकिन वह नीला आइकन हमें जटिल गणनाओं में उलझे बिना काम करने की सुविधा देता है।
यह ठीक वैसा ही है जैसा कपिल मुनि ने सूत्र 6.63 में जीव को एक विशिष्ट संघात और सूत्र 6.40 में प्रकृति को चेतना के लिए जानकारी तैयार करने वाला साधन बताया है।
कहाँ समानता टिकती है और कहाँ भ्रांतियाँ शुरू होती हैं
वैज्ञानिक समानताओं का अध्ययन करते समय हमें अपनी सीमाएं बहुत स्पष्ट रखनी चाहिए। अक्सर इंटरनेट पर प्राचीन विचारों को आधुनिक विज्ञान से जोड़ते समय बहुत झूठे और आधारहीन दावे किए जाते हैं।
सबसे बड़ी भ्रांति क्वांटम भौतिकी के ऑब्जर्वर इफेक्ट को लेकर फैलाई जाती है। बहुत से लोग यह प्रचारित करते हैं कि भौतिकी के प्रयोग यह सिद्ध करते हैं कि मनुष्य की चेतना ही कणों को उत्पन्न करती है और विचार से पदार्थ बनता है।
यह बात वैज्ञानिक और दार्शनिक दोनों दृष्टियों से पूरी तरह असत्य है। क्वांटम भौतिकी में किसी कण को देखने वाला ऑब्जर्वर कोई मनुष्य की आत्मा नहीं होता, बल्कि वह कोई भौतिक उपकरण या सेंसर होता है जो किसी तरंग की स्थिति को दर्ज करता है।
इसके अतिरिक्त, यह दावा सांख्य दर्शन के भी बिल्कुल विपरीत है। कपिल मुनि सूत्र 6.52 में स्पष्ट कह चुके हैं कि भौतिक संसार अपनी स्वतंत्र सत्ता में सत्य है। चेतना किसी भौतिक वस्तु का निर्माण नहीं करती। सूत्र 6.33 में कपिल मुनि ने स्पष्ट लिखा है:
नित्यत्वेऽपि नात्मनो योग्यत्वाभावात्
चेतना नित्य होने पर भी किसी भी कार्य का उपादान कारण बनने की योग्यता नहीं रखती। चेतना किसी भी भौतिक कण पर कोई भौतिक बल नहीं लगा सकती। प्रकृति अपने नियमों के अनुसार स्वतंत्र रूप से गति करती है।
दूसरी भ्रांति यह फैलाई जाती है कि सांख्य दर्शन आधुनिक सिमुलेशन थ्योरी जैसा है, जिसमें यह माना जाता है कि हम किसी कंप्यूटर प्रोग्राम के अंदर जी रहे हैं।
सिमुलेशन का विचार यह मानता है कि किसी बाहरी भौतिक संसार में रहने वाले वैज्ञानिकों ने हमारे लिए यह कृत्रिम कोड बनाया है। जबकि सांख्य दर्शन अनादि काल से चली आ रही प्रकृति और चेतना का गंभीर सत्य है। इसे किसी साइंस फिक्शन फिल्म की कहानी की तरह देखना इसके वास्तविक दार्शनिक मूल्य को गिराना है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
यदि चेतना कुछ नहीं करती, तो इस लेख को पढ़ने का निर्णय किसने लिया?
यह निर्णय आपके आंतरिक उपकरणों ने लिया है। सांख्य के अनुसार, आपकी बुद्धि ने जानकारी को समझा, आपके अहंकार ने दर्शन में रुचि दिखाई, और आपके मस्तिष्क ने आंखों तथा हाथों को लेख पढ़ने का निर्देश दिया। चेतना वह स्थिर प्रकाश है जिसकी उपस्थिति में यह सारी प्रक्रिया जानी गई।
क्या सांख्य दर्शन इस भौतिक जगत को पूरी तरह भ्रम मानता है?
नहीं। सांख्य दर्शन जगत को पूर्णतः सत्य और वास्तविक मानता है। दुख का कारण संसार का होना नहीं है, बल्कि दुख का कारण यह है कि हम अपने शरीर और मन के सुख-दुख को अपनी मूल चेतना का सुख-दुख मान बैठते हैं।
कपिल मुनि एक के बजाय अनेक चेतन तत्वों की बात क्यों करते हैं?
कपिल मुनि प्रत्यक्ष संसार की व्यवस्था को देखते हैं। संसार में सभी लोग एक साथ जन्म नहीं लेते, एक साथ नहीं सोते और न ही एक साथ मुक्त होते हैं। यदि सभी में केवल एक ही चेतना बंधी होती, तो एक व्यक्ति को नींद आने पर पूरी दुनिया सो जाती। यह विविधता सिद्ध करती है कि चेतना के केंद्र अनेक हैं।
अहंकार को कर्ता मानने से मानसिक तनाव कैसे कम होता है?
इससे मनुष्य अनावश्यक आत्मग्लानि और अपराधबोध से बच जाता है। जब आप यह समझ जाते हैं कि शारीरिक व्याधियां, मानसिक उतार-चढ़ाव और घबराहट प्रकृति की स्वचालित व्यवस्था का हिस्सा हैं, तो आप उन्हें अपनी चेतना की विफलता नहीं मानते। आप एक सजग रखवाले की तरह अपने शरीर और मन की देखभाल करते हैं, बिना यह सोचे कि आपकी आंतरिक सत्ता दूषित हो गई है।
ग्रंथ और संदर्भ
- कपिल मुनि कृत सांख्य सूत्र, अध्याय 6 (तन्त्राध्याय), विज्ञानभिक्षु कृत 'सांख्यप्रवचनभाष्य' और अनिरुद्ध कृत 'सांख्यसूत्रवृत्ति' टीका सहित।
- कपिल के सांख्य सूत्र — मूल संस्कृत पाठ
- श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 3, श्लोक 27।
- पतंजलि योगसूत्र, समाधि पाद और साधन पाद।
- कठोपनिषद्, अध्याय 1, वल्ली 3।
- संज्ञान विज्ञान: डेविड चाल्मर्स द्वारा चेतना की सरल और कठिन समस्याओं का विवेचन।
- न्यूरोसाइंस: बेंजामिन लिबेट (1983) तथा चून सिओंग सून एवं अन्य (2008) द्वारा निर्णय प्रक्रिया और मस्तिष्क तरंगों पर किए गए अध्ययन।
- विकासवादी संज्ञान विज्ञान: डोनाल्ड हॉफमैन का प्रत्यक्षीकरण का इंटरफ़ेस सिद्धांत।
यह वही दर्शाता है जो मूल ग्रंथ कहता है; आधुनिक विज्ञान के साथ की गई तुलना एक व्याख्या है, कोई स्थापित निष्कर्ष नहीं।
