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व्याकरणमहाभाष्य · भाग 821840

(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {24।61} सम्प्रसारणम् च प्राप्नोति आल्लोपः च .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {25।61} परत्वात् आल्लोपः स्यात् .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {26।61} सम्प्रसारणम् बलीयः भवति इति वक्तव्यम् सम्प्रसारणम् यथा स्यात् .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {27।61} सम्प्रसारणे कृते पूर्वत्वम् च प्राप्नोति आल्लोपः च .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {28।61} परत्वात् आल्लोपः स्यात् .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {29।61} सम्प्रसारणाश्रयम् बलीयः भवति इति वक्तव्यम् पूर्वत्वम् यथा स्यात् .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {30।61} इयङ् .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {31।61} शुशुवतुः , शुशुवुः .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {32।61} सम्प्रसारणम् च प्राप्नोति इयङादेशः च .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {33।61} परत्वात् इयङादेशः स्यात् .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {34।61} सम्प्रसारणम् बलीयः भवति इति वक्तव्यम् सम्प्रसारणम् यथा स्यात् .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {35।61} यण् .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {36।61} सम्प्रसारणे कृते पूर्वत्वम् च प्राप्नोति यणादेशः च .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {37।61} परत्वात् यणादेशः स्यात् .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {38।61} सम्प्रसारणाश्रयम् बलीयः भवति इति वक्तव्यम् पूर्वत्वम् यथा स्यात् .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {39।61} इयङ् .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {40।61} न एतानि सन्ति प्रयोजनानि .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {41।61} यत् तावत् उच्यते रम् इति इदम् इह सम्प्रधार्यम् : रम्भावः क्रियताम् सम्प्रसारणम् इति .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {42।61} किम् अत्र कर्तव्यम् .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {43।61} परत्वात् रम्भावः .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {44।61} नित्यम् सम्प्रसारणम् .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {45।61} कृते अपि रम्भाबे प्राप्नोति अकृते अपि .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {46।61} रम्भावः अपि नित्यः .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {47।61} कृते अपि सम्प्रसारणे प्राप्नोति अकृते अपि .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {48।61} कथम् .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {49।61} यः असौ ऋकारे रेफः तस्य च उपधायाः च प्राप्नोति .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {50।61} अनित्यः रम्भावः .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {51।61} न हि कृते सम्प्रसारणे प्राप्नोति .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {52।61} किम् कारणम् .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {53।61} उपदेशे इति वर्तते .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {54।61} तत् च अवश्यम् उपदेशग्रहणम् अनुवर्त्यम् बरीभृज्यते इति एवमर्थम् .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {55।61} आल्लोपेयङ्यणः इति .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {56।61} नित्यम् सम्प्रसारणम् .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {57।61} अन्तरङ्गम् पूर्वत्वम् .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {58।61} तत् एतत् अनन्यार्थम् सम्प्रसारणाश्रयम् बलीयः भवति इति वक्तव्यम् पूर्वविप्रतिषेधः वा वक्तव्यः .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {59।61} उभयम् न वक्तव्यम् .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {60।61} उक्तम् अत्र उभयेषाङ्ग्रहणस्य प्रयोजनम् उभयेषाम् अभ्यासस्य सम्प्रसारणम् एव यथा स्यात् .
(प्_6,1.17.3) क_इइइ,25.23-27.3 रो_इव्,334-336 {61।61} यत् अन्यत् प्राप्नोति तत् मा भूत् इति .
(प्_6,1.17.4) क_इइइ,27.4-7 रो_इव्,336 {1।8} व्यचेः कुटादित्वम् अनसि अञ्णिति सम्प्रसारणार्थम् .
(प्_6,1.17.4) क_इइइ,27.4-7 रो_इव्,336 {2।8} व्यचेः कुटादित्वम् अनसि इति वक्तव्यम् .

(प्_6,1.17.4) क_इइइ,27.4-7 रो_इव्,336 {3।8} किम् प्रयोजनम् .
(प्_6,1.17.4) क_इइइ,27.4-7 रो_इव्,336 {4।8} अञ्णिति सम्प्रसारणार्थम् .
(प्_6,1.17.4) क_इइइ,27.4-7 रो_इव्,336 {5।8} अञ्णिति सम्प्रसारणम् यथा स्यात् .
(प्_6,1.17.4) क_इइइ,27.4-7 रो_इव्,336 {6।8} उद्विचिता , उद्विचितुम् , उद्विचितव्यम् .
(प्_6,1.17.4) क_इइइ,27.4-7 रो_इव्,336 {7।8} अनसि इति किमर्थम् .
(प्_6,1.17.4) क_इइइ,27.4-7 रो_इव्,336 {8।8} उरुव्यचाः कण्टकः .
(प्_6,1.18) क_इइइ,27.9-10 रो_इव्,336-337 {1।3} चङ्ग्रहणम् शक्यम् अकर्तुम् .
(प्_6,1.18) क_इइइ,27.9-10 रो_इव्,336-337 {2।3} कथम् .
(प्_6,1.18) क_इइइ,27.9-10 रो_इव्,336-337 {3।3} ङिति इति वर्तते न च अन्यः स्वापेः ङित् अस्ति अन्यत् अतः चङः .
(प्_6,1.20) क_इइइ,27.12-16 रो_इव्,337 {1।11} वशेः यङि प्रतिषेधः .
(प्_6,1.20) क_इइइ,27.12-16 रो_इव्,337 {2।11} वशेः यङि प्रतिषेधः वक्तव्यः सम्प्रसारणस्य .
(प्_6,1.20) क_इइइ,27.12-16 रो_इव्,337 {3।11} वावश्यते .
(प्_6,1.20) क_इइइ,27.12-16 रो_इव्,337 {4।11} क्व मा भूत् .
(प्_6,1.20) क_इइइ,27.12-16 रो_इव्,337 {5।11} उष्टः , उशन्ति इति .
(प्_6,1.20) क_इइइ,27.12-16 रो_इव्,337 {6।11} सः तर्हि तथा प्रतिषेधः वक्तव्यः .
(प्_6,1.20) क_इइइ,27.12-16 रो_इव्,337 {7।11} न वक्तव्यः .
(प्_6,1.20) क_इइइ,27.12-16 रो_इव्,337 {8।11} यङि इति वर्तते .
(प्_6,1.20) क_इइइ,27.12-16 रो_इव्,337 {9।11} एवम् तर्हि अन्वाचष्टे यङि इति वर्तते इति .
(प्_6,1.20) क_इइइ,27.12-16 रो_इव्,337 {10।11} न एतत् अन्वाख्येयम् अधिकाराः अनुवर्तन्ते इति .
(प्_6,1.20) क_इइइ,27.12-16 रो_इव्,337 {11।11} एषः एव न्यायः यत् उत अधिकाराः अनुवर्तेरन् इति .
(प्_6,1.27) क_इइइ,27.18-28.5 रो_इव्,337-338 {1।11} किम् निपात्यते .
(प्_6,1.27) क_इइइ,27.18-28.5 रो_इव्,337-338 {2।11} श्रास्रप्योः शृभावः .
(प्_6,1.27) क_इइइ,27.18-28.5 रो_इव्,337-338 {3।11} श्रास्रप्योः शृभावः निपात्यते .
(प्_6,1.27) क_इइइ,27.18-28.5 रो_इव्,337-338 {4।11} क्षीरहविषोः इति वक्तव्यम् .
(प्_6,1.27) क_इइइ,27.18-28.5 रो_इव्,337-338 {5।11} शृतम् क्षीरम् .
(प्_6,1.27) क_इइइ,27.18-28.5 रो_इव्,337-338 {6।11} शृतम् हविः .
(प्_6,1.27) क_इइइ,27.18-28.5 रो_इव्,337-338 {7।11} क्व मा भूत् .
(प्_6,1.27) क_इइइ,27.18-28.5 रो_इव्,337-338 {8।11} श्राणा यवागूः , श्रपिता यवागूः इति .
(प्_6,1.27) क_इइइ,27.18-28.5 रो_इव्,337-338 {9।11} श्रपेः शृतम् अन्यत्र हेतोः .
(प्_6,1.27) क_इइइ,27.18-28.5 रो_इव्,337-338 {10।11} श्रपेः शृतम् अन्यत्र हेतोः इति वक्तव्यम् इह मा भूत् .
(प्_6,1.27) क_इइइ,27.18-28.5 रो_इव्,337-338 {11।11} श्रपितम् क्षीरम् देवदत्तेन यज्ञदत्तेन इति .
(प्_6,1.28) क_इइइ,28.7-12 रो_इव्,338-339 {1।14} आङ्पूर्वात् अन्धूधसोः .
(प्_6,1.28) क_इइइ,28.7-12 रो_इव्,338-339 {2।14} आङ्पूर्वात् अन्धूधसोः इति वक्तव्यम् .
(प्_6,1.28) क_इइइ,28.7-12 रो_इव्,338-339 {3।14} आपीनः अन्धुः , आपीनम् ऊधः .
(प्_6,1.28) क_इइइ,28.7-12 रो_इव्,338-339 {4।14} किम् प्रयोजनम् .
(प्_6,1.28) क_इइइ,28.7-12 रो_इव्,338-339 {5।14} नियमार्थम् .
(प्_6,1.28) क_इइइ,28.7-12 रो_इव्,338-339 {6।14} आङ्पूर्वात् अन्धूधसोः एव .
(प्_6,1.28) क_इइइ,28.7-12 रो_इव्,338-339 {7।14} क्व मा भूत् .
(प्_6,1.28) क_इइइ,28.7-12 रो_इव्,338-339 {8।14} आप्यानः चन्द्रमाः इति .
(प्_6,1.28) क_इइइ,28.7-12 रो_इव्,338-339 {9।14} उभयतः नियमः च अयम् द्रष्टव्यः .

(प्_6,1.28) क_इइइ,28.7-12 रो_इव्,338-339 {10।14} आङ्पूर्वात् एव अन्धूधसोः , अन्धूधसोः एव आङ्पूर्वात् इति .
(प्_6,1.28) क_इइइ,28.7-12 रो_इव्,338-339 {11।14} क्व मा भूत् .
(प्_6,1.28) क_इइइ,28.7-12 रो_इव्,338-339 {12।14} प्रप्यानः अन्धुः , प्रप्यानम् ऊधः .
(प्_6,1.28) क_इइइ,28.7-12 रो_इव्,338-339 {13।14} आङ्पूर्वात् च एष नियमः द्रष्टव्यः .
(प्_6,1.28) क_इइइ,28.7-12 रो_इव्,338-339 {14।14} भवति हि पीनम् मुखम् , पीनाः शम्बट्यः , श्लक्ष्णपीनमुखी कन्या इति .
(प्_6,1.30) क_इइइ,28.14-29.6 रो_इव्,339-340 {1।31} श्वेः लिटि अभ्यासलक्षणप्रतिषेधः .
(प्_6,1.30) क_इइइ,28.14-29.6 रो_इव्,339-340 {2।31} श्वेः लिटि अभ्यासलक्षणम् सम्प्रसारणम् नित्यम् प्राप्नोति .
(प्_6,1.30) क_इइइ,28.14-29.6 रो_इव्,339-340 {3।31} तस्य प्रतिषेधः वक्तव्यः .
(प्_6,1.30) क_इइइ,28.14-29.6 रो_इव्,339-340 {4।31} शिश्वियतुः , शिश्वियुः .
(प्_6,1.30) क_इइइ,28.14-29.6 रो_इव्,339-340 {5।31} किम् उच्यते लिटि अभ्यासलक्षणस्य इति न पुनः किल्लक्षणस्य अपि .
(प्_6,1.30) क_इइइ,28.14-29.6 रो_इव्,339-340 {6।31} किल्लक्षणम् अपि हि नित्यम् अत्र प्राप्नोति .
(प्_6,1.30) क_इइइ,28.14-29.6 रो_इव्,339-340 {7।31} किल्लक्षणम् श्वयतिलक्षणम् बाधिष्यते .
(प्_6,1.30) क_इइइ,28.14-29.6 रो_इव्,339-340 {8।31} यथा एव तर्हि किल्लक्षणम् श्वयतिलक्षणम् बाधते एवम् अभ्यासलक्षणम् अपि बाधेत .
(प्_6,1.30) क_इइइ,28.14-29.6 रो_इव्,339-340 {9।31} न ब्रूमः अपवादत्वात् किल्लक्षणम् श्वयतिलक्षणम् बाधिष्यते इति .
(प्_6,1.30) क_इइइ,28.14-29.6 रो_इव्,339-340 {10।31} किम् तर्हि .
(प्_6,1.30) क_इइइ,28.14-29.6 रो_इव्,339-340 {11।31} परत्वात् .
(प्_6,1.30) क_इइइ,28.14-29.6 रो_इव्,339-340 {12।31} श्वयतिलक्षणस्य अवकाशः पिति वचनानि .
(प्_6,1.30) क_इइइ,28.14-29.6 रो_इव्,339-340 {13।31} शुशाव, शुशविथ , शिश्वाय, शिश्वयिथ .
(प्_6,1.30) क_इइइ,28.14-29.6 रो_इव्,339-340 {14।31} किल्लक्षणस्य अवकाशः अन्ये कितः .
(प्_6,1.30) क_इइइ,28.14-29.6 रो_इव्,339-340 {15।31} शूनः, शूनवान् .
(प्_6,1.30) क_इइइ,28.14-29.6 रो_इव्,339-340 {16।31} इह उभयम् प्राप्नोति .
(प्_6,1.30) क_इइइ,28.14-29.6 रो_इव्,339-340 {17।31} शिश्वियतुः , शिश्वियुः इति .
(प्_6,1.30) क_इइइ,28.14-29.6 रो_इव्,339-340 {18।31} श्वयतिलक्षणम् भवति विप्रतिषेधेन .
(प्_6,1.30) क_इइइ,28.14-29.6 रो_इव्,339-340 {19।31} अभ्यासलक्षणात् अपि तर्हि श्वयतिलक्षणम् भविष्यति विप्रतिषेधेन .
(प्_6,1.30) क_इइइ,28.14-29.6 रो_इव्,339-340 {20।31} अभ्यासलक्षणस्य अवकाशः अन्ये यजादयः .
(प्_6,1.30) क_इइइ,28.14-29.6 रो_इव्,339-340 {21।31} इयाज, उवाप .
(प्_6,1.30) क_इइइ,28.14-29.6 रो_इव्,339-340 {22।31} श्वयतिलक्षणस्य अवकाशः परम् धातुरूपम् .
(प्_6,1.30) क_इइइ,28.14-29.6 रो_इव्,339-340 {23।31} शुशुवतुः , शुशुवुः , शुशुविथ .
(प्_6,1.30) क_इइइ,28.14-29.6 रो_इव्,339-340 {24।31} श्वयतेः अभ्यासस्य उभयम् प्राप्नोति .
(प्_6,1.30) क_इइइ,28.14-29.6 रो_इव्,339-340 {25।31} शिशिवियतुः , शिश्वियुः .
(प्_6,1.30) क_इइइ,28.14-29.6 रो_इव्,339-340 {26।31} श्वयतिलक्षणम् भविष्यति विप्रतिषेधेन .
(प्_6,1.30) क_इइइ,28.14-29.6 रो_इव्,339-340 {27।31} न एषः युक्तः विप्रतिषेधः .
(प्_6,1.30) क_इइइ,28.14-29.6 रो_इव्,339-340 {28।31} न हि श्वयतेः अभ्यासस्य अन्ये यजादयः अवकाशः .
(प्_6,1.30) क_इइइ,28.14-29.6 रो_इव्,339-340 {29।31} श्वयतेः यजादिषु यः पाठः सः अनवकाशः .
(प्_6,1.30) क_इइइ,28.14-29.6 रो_इव्,339-340 {30।31} तस्य अनवकाशत्वात् अयुक्तः विप्रतिषेधः .
(प्_6,1.30) क_इइइ,28.14-29.6 रो_इव्,339-340 {31।31} तस्मात् सुष्ठु उक्तम् श्वेः लिटि अभ्यासलक्षणप्रतिषेधः इति .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {1।65} ह्वः सम्प्रसारणे योगविभागः .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {2।65} ह्वः सम्प्रसारणे योगविभागः कर्तव्यः .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {3।65} ह्वः सम्प्रसारणम् भवति णौ च संश्चङोः .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {4।65} ततः अभ्यस्तस्य च .

(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {5।65} अभ्यस्तस्य च ह्वः सम्प्रसारणम् भवति इति .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {6।65} किमर्थः योगविभागः .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {7।65} णौ संश्चङ्विषयाऋथः .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {8।65} णौ च संश्चङ्विषये ह्वः सम्प्रसारणम् यथा स्यात् .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {9।65} जुहावयिषति , अजूहवत् .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {10।65} किम् पुनः कारणम् न सिध्यति .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {11।65} ह्वः अभ्यस्तस्य इति उच्यते न च एतत् ह्वः अभ्यस्तम् .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {12।65} कस्य तर्हि .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {13।65} ह्वाययतेः .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {14।65} ह्वः एतत् अभ्यस्तम् .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {15।65} कथम् .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {16।65} एकाचः द्वे प्रथमस्य .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {17।65} एवम् तर्हि ह्वयतेः अभ्यस्तस्य इति उच्यते न च अत्र ह्वयतिः अभ्यस्तः .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {18।65} कः तर्हि .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {19।65} ह्वाययतिः .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {20।65} ह्वयतिः एव अत्र अभ्यस्तः .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {21।65} कथम् .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {22।65} एकाचः द्वे प्रथमस्य इति .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {23।65} एवम् अपि अभ्यस्तिनिमित्ते अनभ्यस्तप्रसारणार्थम् .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {24।65} अभ्यस्तिनिमित्ते इति वक्तव्यम् .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {25।65} किम् प्रयोजनम् .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {26।65} अनभ्यस्तप्रसारणार्थम् .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {27।65} अनभ्यस्तस्य प्रसारणम् यथा स्यात् .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {28।65} जुहूषति , जोहूयते .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {29।65} अभ्यस्तप्रसारणे हि अभ्यासप्रसारणाप्राप्तिः .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {30।65} अभ्यस्तप्रसारणे हि अभ्यासप्रसारणस्य अप्राप्तिः स्यात् .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {31।65} न सम्प्रसारणे सम्प्रसारणम् इति प्रतिषेधः प्रसज्येत .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {32।65} न एषः दोषः .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {33।65} व्यवहितत्वात् न भविष्यति .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {34।65} समानाङ्गे प्रसारणप्रतिषेधात् प्रतिषेधः .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {35।65} समानाङ्गे प्रसारणप्रतिषेधात् प्रतिषेधः प्राप्नोति .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {36।65} समानाङ्गग्रहणम् तत्र चोदयिष्यति .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {37।65} कृदन्तप्रतिषेधार्थम् च .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {38।65} कृदन्तप्रतिषेधार्थम् च अभ्यस्तिनिमित्ते इति वक्तव्यम् .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {39।65} किम् प्रयोजनम् .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {40।65} ह्वायकम् इच्छति ह्वायकीयति .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {41।65} ह्वायकीयतेः सन् .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {42।65} जिह्वायकीयिषति .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {43।65} सः तर्हि निमित्तशब्दः उपादेयः .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {44।65} न हि अन्तरेण निमित्तशब्दम् निमित्तार्थः गम्यते .

(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {45।65} अन्तरेण अपि निमित्तशब्दम् निमित्तार्थः गम्यते .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {46।65} तत् यथा : दधित्रपुसम् प्रत्यक्षः ज्वरः .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {47।65} ज्वरनिमित्तम् इति गम्यते .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {48।65} नड्वलोदकम् पादरोगः .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {49।65} पादरोगनिमित्तम् इति गम्यते .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {50।65} आयुः घृतम् .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {51।65} आयुषः निमित्तम् इति गम्यते .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {52।65} अथ वा अकारः मत्वर्थीयः .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {53।65} अभ्यस्तम् अस्मिन् अस्ति सः अयम् अभ्यस्तः .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {54।65} अभ्यस्तस्य इति .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {55।65} अथ वा अभ्यस्तस्य इति न एषा ह्वयतिसमानाधिकरणा षष्ठी .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {56।65} का तर्हि .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {57।65} सम्बन्धषष्ठी .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {58।65} अभ्यस्तस्य यः ह्वयतिः .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {59।65} किम् च अभ्यस्तस्य ह्वयतिः .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {60।65} प्रकृतिः .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {61।65} ह्वः अभ्यस्तस्य प्रकृतेः इति .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {62।65} योगविभागः तु कर्तव्यः एव .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {63।65} न अत्र ह्वयतिः अभ्यस्तस्य प्रकृतिः .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {64।65} किम् तर्हि .
(प्_6,1.32-33) क_इइइ,29.8-30.14 रो_इव्,341-344 {65।65} ह्वाययतिः .
(प्_6,1.36) क_इइइ,30.17-31.2 रो_इव्,344-345 {1।15} अपस्पृधेथाम् इति किम् निपात्यते .
(प्_6,1.36) क_इइइ,30.17-31.2 रो_इव्,344-345 {2।15} स्पर्धेः लङि आत्मनेपदानाम् मध्यमपुरुषस्य द्विवचने आथामि द्विर्वचनम् सम्प्रसारणम् अकारलोपः च निपात्यते .
(प्_6,1.36) क_इइइ,30.17-31.2 रो_इव्,344-345 {3।15} इन्द्रः च विष्णो यत् अपस्पृधेथाम् .
(प्_6,1.36) क_इइइ,30.17-31.2 रो_इव्,344-345 {4।15} अस्पृधेथाम् इति भाषायाम् .
(प्_6,1.36) क_इइइ,30.17-31.2 रो_इव्,344-345 {5।15} अपरः आह : अपपूर्वात् स्पर्धेः लङि आत्मनेपदानाम् मध्यमपुरुषस्य द्विवचने आथामि द्विर्वचनम् सम्प्रसारणम् अकारलोपः च निपात्यते .
(प्_6,1.36) क_इइइ,30.17-31.2 रो_इव्,344-345 {6।15} इन्द्रः च विष्णो यत् अपस्पृधेथाम् .
(प्_6,1.36) क_इइइ,30.17-31.2 रो_इव्,344-345 {7।15} अपास्पृधेथाम् इति भाषायाम् .
(प्_6,1.36) क_इइइ,30.17-31.2 रो_इव्,344-345 {8।15} श्राताः श्रितम् इति किम् निपात्यते .
(प्_6,1.36) क_इइइ,30.17-31.2 रो_इव्,344-345 {9।15} श्रीणातेः क्ते श्राभावश्रिभावौ निपात्येते .
(प्_6,1.36) क_इइइ,30.17-31.2 रो_इव्,344-345 {10।15} क्व पुनः श्राभावः क्व वा श्रिभावः .
(प्_6,1.36) क_इइइ,30.17-31.2 रो_इव्,344-345 {11।15} सोमे श्राभावः अन्यत्र श्रिभावः .
(प्_6,1.36) क_इइइ,30.17-31.2 रो_इव्,344-345 {12।15} न तर्हि इदानीम् इदम् भवति : श्रितः सोमः इति .
(प्_6,1.36) क_इइइ,30.17-31.2 रो_इव्,344-345 {13।15} बहुवचने श्राभावः .
(प्_6,1.36) क_इइइ,30.17-31.2 रो_इव्,344-345 {14।15} न तर्हि इदानीम् इदम् भवति : श्रिताः नः ग्रहाः इति .
(प्_6,1.36) क_इइइ,30.17-31.2 रो_इव्,344-345 {15।15} सोमबहुत्वे श्राभावः अन्यत्र श्रिभावः .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {1।61} किमर्थम् इदम् उच्यते .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {2।61} वचिस्पवियजादीनाम् ग्रहादीनाम् च सम्प्रसारणम् उक्तम् .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {3।61} तत्र यावन्तः यणः सर्वेषाम् सम्प्रसारणम् प्राप्नोति .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {4।61} इष्यते च परस्य यथा स्यात् न पूर्वस्य तत् च अन्तरेण यत्नम् न सिध्यति इति न सम्प्रसारणे सम्प्रसारणम् .

(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {5।61} किम् अन्ये अपि एवम् विधयः भवन्ति .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {6।61} अतः दीर्घः यञि .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {7।61} सुपि च इति .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {8।61} घटाभ्याम् .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {9।61} अकारमात्रस्य दीर्घत्वम् कस्मात् न भवति .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {10।61} अस्ति अत्र विशेषः .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {11।61} इयम् अत्र परिभाषा उपतिष्ठते .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {12।61} अलः अन्त्यस्य इति .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {13।61} ननु च इदानीम् एतया परिभाषया इह (र्: इह अपि) शक्यम् उपस्थातुम् .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {14।61} न इति आह .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {15।61} न हि वचिस्पवियजादीनाम् ग्रहादीनाम् च अन्त्यः यण् अस्ति .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {16।61} एवम् तर्हि अनन्त्यविकारे अन्त्यसदेशस्य कार्यम् भवति इति अन्त्यसस्देशः यः यण् तस्य कार्यम् भविष्यति .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {17।61} न एतस्याः परिभाषायाः सन्ति प्रयोजनानि .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {18।61} एवम् तर्हि आचार्यप्रवृत्तिः ज्ञापयति न सर्वस्य यणः सम्प्रसारणम् भवति इति यत् अयम् प्यायः पीभावम् शास्ति .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {19।61} कथम् कृत्वा ज्ञापकम् .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {20।61} पीभाववचने एतत् प्रयोजनम् आपीनः अन्धुः , आपीनम् ऊधः एतत् रूपम् यथा स्यात् इति .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {21।61} यदि च अत्र सर्वस्य यणः सम्प्रसारणम् स्यात् पीभाववचनम् अनर्थकम् स्यात् .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {22।61} सम्प्रसारणे कृते सम्प्रसारणपरपूर्वत्वे च द्वयोः इकारयोः एकादेशे सिद्धम् रूपम् स्यात् आपीनः अन्धुः , आपीनम् ऊधः इति .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {23।61} पश्यति तु आचार्यः न सर्वस्य यणः सम्प्रसारणम् भवति इति .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {24।61} ततः अयम् प्यायः पीभावम् शास्ति .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {25।61} न एतत् अस्ति ज्ञापकम् .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {26।61} सिद्धे हि विधिः आरभ्यमाणः ज्ञापकार्थः भवति न च प्यायः सम्प्रसारणेन सिध्यति .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {27।61} सम्प्रसारणे हि सति अन्त्यस्य प्रसज्येत .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {28।61} एवम् अपि ज्ञापकम् एव .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {29।61} कथम् .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {30।61} प्यायः इति न एषा स्थानषष्ठी .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {31।61} का तर्हि .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {32।61} विशेषणषष्ठी .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {33।61} प्यायः यः यण् इति .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {34।61} तत् एतत् ज्ञापयति आचार्यः न सर्वस्य यणः सम्प्रसारणम् भवति इति यत् अयम् प्यायः पीभावम् शास्ति .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {35।61} एवम् अपि अनैकान्तिकम् एतत् .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {36।61} एतावत् ज्ञाप्यते न सर्वस्य यणः सम्प्रसारणम् भवति इति .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {37।61} तत्र कुतः एतत् परस्य भविष्यति न पूर्वस्य इति .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {38।61} उच्यमाने अपि एतस्मिन् कुतः एतत् परस्य भविष्यति न पूर्वस्य इति .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {39।61} एकयोगक्षणम् खलु अपि सम्प्रसारणम् .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {40।61} तत् यदि तावत् परम् अभिनिर्वृत्तम् पूर्वम् अपि अभिनिर्वृत्तम् एव .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {41।61} प्रसक्तस्य अनभिनिर्वृत्तस्य प्रतिषेधेन निवृत्तिः शक्या कर्तुम् न अभिनिर्वृत्तस्य .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {42।61} यः हि भुक्तवन्तम् ब्रूयात् मा भुक्थाः इति किम् तेन कृतम् स्यात् .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {43।61} अथ अपि पूर्वम् अनभिनिर्वृत्तम् परम् अपि अनभिनिर्वृत्तम् एव .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {44।61} तत्र निमित्तसंश्रयः अनुपपन्नः न सम्प्रसारणे सम्प्रसारणम् इति .

(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {45।61} न एषः दोषः .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {46।61} यत् तावत् उच्यते उच्यमाने अपि एतस्मिन् कुतः एतत् परस्य भविष्यति न पूर्वस्य इति .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {47।61} इह इङ्गितेन चेष्टितेन निमिषितेन महता वा सूत्रप्रबन्धेन आचार्याणाम् अभिप्रायः गम्यते .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {48।61} एतत् एव ज्ञापयति परस्य भविष्यति न पूर्वस्य इति यत् अयम् न सम्प्रसारणे सम्प्रसारणम् इति प्रतिषेधम् शास्ति .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {49।61} यत् अपि उच्यते एकयोगलक्षणम् खलु अपि सम्प्रसारणम् .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {50।61} तत् यदि तावत् परम् अभिनिर्वृत्तम् पूर्वम् अपि अभिनिर्वृत्तम् एव .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {51।61} प्रसक्तस्य अनभिनिर्वृत्तस्य प्रतिषेधेन निवृत्तिः शक्या कर्तुम् इति .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {52।61} अस्तु उभयोः अभिनिर्वृत्तिः .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {53।61} न वयम् पूर्वस्य प्रतिषेधम् शिष्मः .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {54।61} किम् तर्हि .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {55।61} सम्प्रसारणाश्रयम् यत् प्राप्नोति तस्य प्रतिषेधम् .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {56।61} ततः पूर्वत्वे प्रतिषिद्धे यणादेशेन सिद्धम् .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {57।61} यत् अपि उच्यते अथ अपि पूर्वम् अनभिनिर्वृत्तम् परम् अपि अनभिनिर्वृत्तम् एव .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {58।61} तत्र निमित्तसंश्रयः अनुपपन्नः इति .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {59।61} तादर्थ्यात् ताच्छब्द्यम् भविष्यति .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {60।61} तत् यथा इन्द्रार्था स्थूणा इन्द्रः इति एवम् इह अपि सम्प्रसारणार्थम् सम्प्रसारणम् .
(प्_6,1.37.1) क_इइइ,31.4-32.14 रो_इव्,345-347 {61।61} तत् यत् प्रसारणार्थम् प्रसारणम् तस्मिन् प्रतिषेधः भविष्यति .
(प्_6,1.37.2) क_इइइ,32.15-33.8 रो_इव्,347-349 {1।30} अथ सम्प्रसारणम् इति वर्तमाने पुनः सम्प्रसारणग्रहणम् किमर्थम् .
(प्_6,1.37.2) क_इइइ,32.15-33.8 रो_इव्,347-349 {2।30} प्रसारणप्रकरणे पुनः प्रसारणग्रहणम् अतः अन्यत्र प्रसारणप्रतिषेधार्थम् .
(प्_6,1.37.2) क_इइइ,32.15-33.8 रो_इव्,347-349 {3।30} सम्प्रसारणप्रकरणे पुनः प्रसारणग्रहणे (र्: सम्प्रसारणग्रहणे) एतत् प्रयोजनम् .
(प्_6,1.37.2) क_इइइ,32.15-33.8 रो_इव्,347-349 {4।30} विदेशस्थम् अपि यत् सम्प्रसारणम् तस्य अपि प्रतिषेधः यथा स्यात् .
(प्_6,1.37.2) क_इइइ,32.15-33.8 रो_इव्,347-349 {5।30} व्यथः लिटि .
(प्_6,1.37.2) क_इइइ,32.15-33.8 रो_इव्,347-349 {6।30} विव्यथे .
(प्_6,1.37.2) क_इइइ,32.15-33.8 रो_इव्,347-349 {7।30} न एतत् अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_6,1.37.2) क_इइइ,32.15-33.8 रो_इव्,347-349 {8।30} हलादिशेषापवादः अत्र सम्प्रसारणम् .
(प्_6,1.37.2) क_इइइ,32.15-33.8 रो_इव्,347-349 {9।30} इदम् तर्हि श्वयुवमघोनाम् अतद्धिते .
(प्_6,1.37.2) क_इइइ,32.15-33.8 रो_इव्,347-349 {10।30} यूना , यूने .
(प्_6,1.37.2) क_इइइ,32.15-33.8 रो_इव्,347-349 {11।30} उच्यमाने अपि एतस्मिन् न सिध्यति .
(प्_6,1.37.2) क_इइइ,32.15-33.8 रो_इव्,347-349 {12।30} किम् कारणम् .
(प्_6,1.37.2) क_इइइ,32.15-33.8 रो_इव्,347-349 {13।30} उकारेण व्यवधानात् .
(प्_6,1.37.2) क_इइइ,32.15-33.8 रो_इव्,347-349 {14।30} एकादेशे कृते न अस्ति व्यवधानम् .
(प्_6,1.37.2) क_इइइ,32.15-33.8 रो_इव्,347-349 {15।30} एकादेशः पूर्वविधौ स्थानिवत् भवति इति स्थानिवद्भावात् व्यवधानम् एव .
(प्_6,1.37.2) क_इइइ,32.15-33.8 रो_इव्,347-349 {16।30} एवम् तर्हि समानाङ्गग्रहणम् च .
(प्_6,1.37.2) क_इइइ,32.15-33.8 रो_इव्,347-349 {17।30} समानाङ्गग्रहणम् च कर्तव्यम् .
(प्_6,1.37.2) क_इइइ,32.15-33.8 रो_इव्,347-349 {18।30} न सम्प्रसारणे सम्प्रसारणम् समानाङ्गे इति वक्तव्यम् .
(प्_6,1.37.2) क_इइइ,32.15-33.8 रो_इव्,347-349 {19।30} तत्र उपोषुषि दोषः .
(प्_6,1.37.2) क_इइइ,32.15-33.8 रो_इव्,347-349 {20।30} तत्र उपोषुषि दोषः भवति .
(प्_6,1.37.2) क_इइइ,32.15-33.8 रो_इव्,347-349 {21।30} न वा यस्य अङ्गस्य प्रसारणप्राप्तिः तस्मिन् प्राप्तिप्रतिषेधात् .
(प्_6,1.37.2) क_इइइ,32.15-33.8 रो_इव्,347-349 {22।30} न वा एषः दोषः .
(प्_6,1.37.2) क_इइइ,32.15-33.8 रो_इव्,347-349 {23।30} किम् कारणम् यस्य अङ्गस्य प्रसारणप्राप्तिः तस्मिन् द्वितीया या प्राप्तिः सा प्रतिषिध्यते .

(प्_6,1.37.2) क_इइइ,32.15-33.8 रो_इव्,347-349 {24।30} अत्र च वसिः क्वसौ अङ्गम् क्वसन्तम् पुनः विभक्तौ .
(प्_6,1.37.2) क_इइइ,32.15-33.8 रो_इव्,347-349 {25।30} अथ वा यस्य अङ्गस्य प्रसारणप्राप्तिः इति अनेन किम् क्रियते .
(प्_6,1.37.2) क_इइइ,32.15-33.8 रो_इव्,347-349 {26।30} यावत् ब्रूयात् प्रसक्तस्य अनभिनिर्वृत्तस्य प्रतिषेधेन निवृत्तिः शक्या कर्तुम् इति .
(प्_6,1.37.2) क_इइइ,32.15-33.8 रो_इव्,347-349 {27।30} अत्र च यदा वसेः न तदा क्वसोः यदा च क्वसोः अभिनिर्वृत्तम् तदा वसेः भवति .
(प्_6,1.37.2) क_इइइ,32.15-33.8 रो_इव्,347-349 {28।30} अथ वा यस्य अङ्गस्य प्रसारणप्राप्तिः इति अनेन किम् क्रियते .
(प्_6,1.37.2) क_इइइ,32.15-33.8 रो_इव्,347-349 {29।30} यावत् ब्रूयात् असिद्धम् बहिरङ्गम् अन्तरङ्गे इति .
(प्_6,1.37.2) क_इइइ,32.15-33.8 रो_इव्,347-349 {30।30} असिद्धत्वात् बहिरङ्गलक्षणस्य वसौसम्प्रसारणस्य अन्तरङ्गलक्षणः प्रतिषेधः न भविष्यति .
(प्_6,1.37.3) क_इइइ,33.9-17 रो_इव्,349-350 {1।18} ऋचि त्रेः उत्तरपदादिलोपः छन्दसि .
(प्_6,1.37.3) क_इइइ,33.9-17 रो_इव्,349-350 {2।18} ऋचि त्रेः सम्प्रसारणम् वक्तव्यम् .
(प्_6,1.37.3) क_इइइ,33.9-17 रो_इव्,349-350 {3।18} उत्तरपदादिलोपः छन्दसि वक्तव्यः .
(प्_6,1.37.3) क_इइइ,33.9-17 रो_इव्,349-350 {4।18} तृचम् सूक्तम् .
(प्_6,1.37.3) क_इइइ,33.9-17 रो_इव्,349-350 {5।18} तृचम् साम .
(प्_6,1.37.3) क_इइइ,33.9-17 रो_इव्,349-350 {6।18} छन्दसि इति किम् .
(प्_6,1.37.3) क_इइइ,33.9-17 रो_इव्,349-350 {7।18} त्र्यृचानि .
(प्_6,1.37.3) क_इइइ,33.9-17 रो_इव्,349-350 {8।18} रयेः मतौ बहुलम् .
(प्_6,1.37.3) क_इइइ,33.9-17 रो_इव्,349-350 {9।18} रयेः मतौ सम्प्रसारणम् बहुलम् वक्तव्यम् .
(प्_6,1.37.3) क_इइइ,33.9-17 रो_इव्,349-350 {10।18} आ रेवान् एतु नः विशः .
(प्_6,1.37.3) क_इइइ,33.9-17 रो_इव्,349-350 {11।18} न च भवति .
(प्_6,1.37.3) क_इइइ,33.9-17 रो_इव्,349-350 {12।18} रयिमन् पुष्टिवर्धनः .
(प्_6,1.37.3) क_इइइ,33.9-17 रो_इव्,349-350 {13।18} कक्ष्यायाः सञ्ज्ञायाम् .
(प्_6,1.37.3) क_इइइ,33.9-17 रो_इव्,349-350 {14।18} कक्ष्यायाः सञ्ज्ञायाम् मतौ सम्प्रसारणम् वक्तव्यम् .
(प्_6,1.37.3) क_इइइ,33.9-17 रो_इव्,349-350 {15।18} कक्षीवन्तम् यः आशिजः .
(प्_6,1.37.3) क_इइइ,33.9-17 रो_इव्,349-350 {16।18} कण्वः कक्षीवान् .
(प्_6,1.37.3) क_इइइ,33.9-17 रो_इव्,349-350 {17।18} सञ्ज्ञायाम् इति किम् .
(प्_6,1.37.3) क_इइइ,33.9-17 रो_इव्,349-350 {18।18} कष्यावान् हस्ती .
(प्_6,1.39) क_इइइ,33.19-34.2 रो_इव्,350 {1।11} वश्चास्यग्रहणम् शक्यम् अकर्तुम् .
(प्_6,1.39) क_इइइ,33.19-34.2 रो_इव्,350 {2।11} अन्यतरस्याम् किति वेञः न सम्प्रसारणम् भवति इति एव सिद्धम् .
(प्_6,1.39) क_इइइ,33.19-34.2 रो_इव्,350 {3।11} कथम् .
(प्_6,1.39) क_इइइ,33.19-34.2 रो_इव्,350 {4।11} सम्प्रसारणे कृते उवङादेशे च द्विर्वचनम् सवर्णदीर्घत्वम् .
(प्_6,1.39) क_इइइ,33.19-34.2 रो_इव्,350 {5।11} तेन सिद्धम् ववतुः, ववुः , ऊवतुः, ऊवुः .
(प्_6,1.39) क_इइइ,33.19-34.2 रो_इव्,350 {6।11} वयेः अपि नित्यम् यकारस्य प्रतिषेधः सम्प्रसारणस्य ऊयतुः , ऊयुः .
(प्_6,1.39) क_इइइ,33.19-34.2 रो_इव्,350 {7।11} त्रैशब्यम् च इह साध्यम् .
(प्_6,1.39) क_इइइ,33.19-34.2 रो_इव्,350 {8।11} तत् च एवम् सति सिद्धम् भवति .
(प्_6,1.39) क_इइइ,33.19-34.2 रो_इव्,350 {9।11} यदि एवम् ववौ, वविथ इति न सिध्यति .
(प्_6,1.39) क_इइइ,33.19-34.2 रो_इव्,350 {10।11} ल्यपि च इति अनेन चकारेण लिट् अपि अनुकृष्यते .
(प्_6,1.39) क_इइइ,33.19-34.2 रो_इव्,350 {11।11} तस्मिन् नित्ये प्रसारणप्रतिषेधे प्राप्ते इयम् किति विभाषा आरभ्यते .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {1।84} कथम् इदम् विज्ञायते : एच् यः उपदेशे इति आहोस्वित् एजन्तन्तम् यत् उपदेशे इति .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {2।84} किम् च अतः .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {3।84} यदि विज्ञायते : एच् यः उपदेशे इति ढौकिता त्रौकिता इति अत्र अपि प्राप्नोति .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {4।84} अथ विज्ञायते : एजन्तन्तम् यत् उपदेशे इति न दोषः भवति .

(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {5।84} ननु च एजन्तन्तम् यत् उपदेशे इति अपि विज्ञायमाने अत्र अपि प्राप्नोति .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {6।84} एतत् अपि व्यपदेशिवद्भावेन एजन्तम् भवति उपदेशे .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {7।84} अर्थवता व्यपदेशिवद्भावः .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {8।84} ननु च एच् यः उपदेशे इति अपि विज्ञायमाने न दोषः भवति .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {9।84} अशिति इति उच्यते न च अत्र अशितम् पश्यामः .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {10।84} ननु च ककारः एव अत्र अशित् .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {11।84} न ककारे भवितव्यम् .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {12।84} किम् कारणम् .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {13।84} नञिवयुक्तम् अन्यसदृशाधिकरणे .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {14।84} तथा हि अर्थगतिः .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {15।84} नञ्युक्तम् इवयुक्तम् च अन्यस्मिन् तत्सदृशे कार्यम् विज्ञायते .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {16।84} तथा हि अर्थः गम्यते .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {17।84} तत् यथा लोके : अब्राह्मणम् आनय इति उक्ते ब्राह्मणसदृशम् आनयति .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {18।84} न असौ लोष्टम् आनीय कृती भवति .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {19।84} एवम् इह अपि अशिति इति शित्प्रतिषेधात् अन्यस्मिन् अशिति शित्सदृशे कार्यम् विज्ञास्यते .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {20।84} किम् च अन्यत् शित्सदृशम् .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {21।84} प्रत्ययः .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {22।84} इह तर्हि : ग्लै : ग्लानीयम् , म्लै : म्लानीयम् , वेञ् : वानीयम् , शो : निशामीयम् : परत्वात् आयादयः प्राप्नुवन्ति .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {23।84} ननु च एजन्तन्तम् यत् उपदेशे इति अपि विज्ञायमाने परत्वात् आयादयः प्राप्नुवन्ति .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {24।84} सन्तु .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {25।84} आयादिषु कृतेषु स्थानिवद्भावात् एज्ग्रहणेन ग्रहणात् पुनः आत्त्वम् भविष्यति .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {26।84} ननु च एच् यः उपदेशे इति अपि विज्ञायमाने परत्वात् आयादिषु कृतेषु स्थानिवद्भावात् एज्ग्रहणेन ग्रहणात् आत्त्वम् भविष्यति .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {27।84} न भविष्यति .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {28।84} अनल्विधौ स्थानिवद्भावः अल्विधिः च अयम् .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {29।84} एवम् तर्हि एजन्तन्तम् यत् उपदेशे इति अपि विज्ञायमाने हूतः , हूतवान् इति अत्र अपि प्राप्नोति .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {30।84} भवतु एव अत्र आत्त्वम् .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {31।84} श्रवणम् कस्मात् न भवति .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {32।84} पूर्वत्वम् अस्य भविष्यति .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {33।84} न सिध्यति .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {34।84} इदम् इह सम्प्रधार्यम् : आत्त्वम् क्रियताम् पूर्वत्वम् इति .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {35।84} किम् अत्र कर्तव्यम् .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {36।84} परत्वात् पूर्वत्वम् .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {37।84} एवम् तर्हि इदम् इह सम्प्रधार्यम् .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {38।84} आत्त्वम् क्रियताम् सम्प्रसारणम् इति .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {39।84} किम् अत्र कर्तव्यम् .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {40।84} परत्वात् आत्त्वम् .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {41।84} नित्यम् सम्प्रसारणम् .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {42।84} कृते अपि आत्त्वे प्राप्नोति अकृते अपि .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {43।84} आत्त्वम् अपि नित्यम् .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {44।84} कृते अपि सम्प्रसारणे प्राप्नोति अकृते अपि .

(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {45।84} अनित्यम् आत्त्वम् .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {46।84} न हि कृते सम्प्रसारणे प्राप्नोति .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {47।84} किम् कारणम् .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {48।84} अन्तरङ्गम् पूर्वत्वम् .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {49।84} तेन बाध्यते .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {50।84} यस्य लक्षणन्तरेण निमित्तम् विहन्यते न तत् अनित्यम् .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {51।84} न च सम्प्रसारणम् एव आत्त्वस्य निमित्तम् हन्ति .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {52।84} अवश्यम् लक्षणान्तरम् पूर्वत्वम् प्रतीक्ष्यम् .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {53।84} उभयोः नित्ययोः परत्वात् आत्त्वे कृते सम्प्रसारणम् सम्प्रसारणपूर्वत्वम् .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {54।84} कार्यकृतत्वात् पुनः आत्त्वम् न भविष्यति .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {55।84} अथ अपि कथम् चित् आत्त्वम् अनित्यम् स्यात् एवम् अपि न दोषः .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {56।84} उपदेशग्रहणम् न करिष्यते .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {57।84} यदि न क्रियते चेता स्तोता इति अत्र अपि प्राप्नोति .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {58।84} न एषः दोषः .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {59।84} आचार्यप्रवृत्तिः ज्ञापयति न परनिमित्तकस्य आत्त्वम् भवति इति यत् अयम् क्रीङ्जीणाम् णौ आत्त्वम् शास्ति .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {60।84} न एतत् अस्ति ज्ञापकम् .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {61।84} नियमार्थम् एतत् स्यात् .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {62।84} क्रीङ्जीणाम् णौ एव इति .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {63।84} यत् तर्हि मीनातिमिनोतिदीङाम् ल्यपि च इति अत्र एज्ग्रहणम् अनुवर्तयति .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {64।84} इह तर्हि ग्लै ग्लानीयम् , म्लै म्लानीयम् , वेञ् वानीयम् , शो निशामीयम् परत्वात् आयादयः प्राप्नुवन्ति .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {65।84} अत्र अपि आचार्यप्रवृत्तिः ज्ञापयति न आयादयः आत्त्वम् बाधन्ते इति यत् अयम् अशिति इति प्रतिषेधम् शास्ति .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {66।84} यदि हि बाधेरन् शिति अपि बाधेरन् .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {67।84} अथ वा पुनः अस्तु एच् यः उपदेशे इति .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {68।84} ननु च उक्तम् ग्लै ग्लानीयम् , म्लै म्लानीयम् , वेञ् वानीयम् , शो निशामीयम् परत्वात् आयादयः प्राप्नुवन्ति इति .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {69।84} अत्र अपि शित्प्रतिषेधः ज्ञापकः न आयादयः आत्त्वम् बाधन्ते इति .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {70।84} आत्त्वे एशि उपसङ्ख्यानम् .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {71।84} आत्त्वे एशि उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {72।84} जग्ले मम्ले .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {73।84} अशिति इति प्रतिषेधः प्राप्नोति .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {74।84} न एषः दोषः .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {75।84} न एवम् विज्ञायते .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {76।84} शकारः इत् यस्य सः अयम् शित् .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {77।84} न शित् अशित् .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {78।84} अशिति इति .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {79।84} कथम् तर्हि .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {80।84} शकारः इत् शित् .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {81।84} न शित् शित् अशित् .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {82।84} अशिति इति .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {83।84} यदि एवम् स्तनन्धयः इति अत्र अपि प्राप्नोति .
(प्_6,1.45.1) क_इइइ,34.6-35.19 रो_इव्,351-355 {84।84} अत्र अपि शप् शित् भवति .

(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {1।73} किम् पुनः अयम् पर्युदासः : यत् अन्यत् शितः इति आहोस्वित् प्रसज्य अयम् प्रतिषेधः : शिति न इति .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {2।73} कः च अत्र विशेषः .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {3।73} अशिति एकादेशे प्रतिषेधः आदिवत्त्वात् .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {4।73} अशिति एकादेशे प्रतिषेधः वक्तव्यः : ग्लायन्ति म्लयन्ति .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {5।73} किम् कारणम् .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {6।73} आदिवत्त्वात् .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {7।73} शिदशितोः एकादेशः आदिवत् स्यात् .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {8।73} अस्ति अन्यत् शितः इति कृत्वा आत्त्वम् प्राप्नोति .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {9।73} प्रत्ययविधिः .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {10।73} प्रत्ययविधिः च न सिध्यति .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {11।73} सुग्लः सुम्लः .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {12।73} आकारान्तलक्षणः प्रत्ययविधिः न प्राप्नोति .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {13।73} अनिष्टस्य प्रत्ययस्य श्रवणम् प्रसज्येत .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {14।73} अभ्यासरूपम् च .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {15।73} अभ्यासरूपम् च न सिध्यति : जग्ले मम्ले .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {16।73} इवर्णाभ्यासता प्राप्नोति .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {17।73} अयवायावाम् प्रतिषेधः च .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {18।73} अयवायावाम् च प्रतिषेधः वक्तव्यः : ग्लै : ग्लानीयम् , म्लै : म्लानीयम् , वेञ् : वानीयम् , शो : निशामीयम् : परत्वात् आयादयः प्राप्नुवन्ति .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {19।73} अस्तु तर्हि प्रसज्य प्रतिषेधः शिति न इति .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {20।73} शिति प्रतिषेधे श्लुलुकोः उपसङ्ख्यानम् ररीध्वम् त्राध्वम् शिशीते .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {21।73} शिति प्रतिषेधे श्लुलुकोः उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {22।73} दिवः नः वृष्टिम् मरुतः ररीध्वम् .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {23।73} लुक् .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {24।73} त्राध्वम् नः देवा निजुरः वृकस्य .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {25।73} शिशीते शृङ्गे रक्षसे विनिक्षे .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {26।73} न एषः दोषः .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {27।73} इह तावत् दिवः नः वृष्टिम् मरुतः ररीध्वम् इति .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {28।73} न एतत् रै इति अस्य रूपम् .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {29।73} कस्य तर्हि .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {30।73} रातेः दानकर्मणः .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {31।73} शिशीते शृङ्गे इति न एतत् श्यतेः रूपम् .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {32।73} कस्य तर्हि .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {33।73} शीङः .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {34।73} श्यत्यर्थः वै गम्यते .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {35।73} कः पुनः श्यतेः अर्थः .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {36।73} श्यतिः निशाने वर्तते .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {37।73} शीङ् अपि श्यत्यर्थे वर्तते .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {38।73} कथम् पुनः अन्यः नाम अन्यस्य अर्थे वर्तते .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {39।73} बह्वर्थाः अपि धातवः भवन्ति इति .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {40।73} तत् यथा .

(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {41।73} वपिः प्रकिरणे दृष्टः छेदने च अपि वर्तते .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {42।73} केशान् वपति इति .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {43।73} ईडिः स्तुदिचोदनायाच्ञासु दृष्टः ईरणे च अपि वर्तते .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {44।73} अग्निः वै इतः वृष्टिम् ईट्टे .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {45।73} मरुतः अमुतः च्यावयन्ति .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {46।73} करोतिः अयम् अभूतप्रादुर्भावे दृष्टः निर्मलीकरणे च अपि वर्तते .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {47।73} पृष्ठम् कुरु .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {48।73} पादौ कुरु .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {49।73} उन्मृदान इति गम्यते .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {50।73} निक्षेपणे च अपि दृश्यते .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {51।73} कटे कुरु .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {52।73} घटे कुरु .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {53।73} अश्मानम् इतः कुरु .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {54।73} स्थापय इति गम्यते .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {55।73} सर्वेषाम् एव परिहारः .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {56।73} शिति इति उच्यते न च अत्र शितम् पश्यामः .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {57।73} प्रत्ययलक्षणेन .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {58।73} न लुमता तस्मिन् इति प्रत्ययलक्षणप्रतिषेधः .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {59।73} त्राध्वम् इति लुङि एषः व्यत्ययेन भविष्यति .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {60।73} अथ वा पुनः अस्तु पर्युदासः .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {61।73} ननु च उक्तम् अशिति एकादेशे प्रतिषेधः आदिवत्त्वात् इति .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {62।73} न एषः दोषः .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {63।73} एकादेशः पूर्वविधौ स्थानिवत् भवति इति स्थानिवद्भावात् व्यवधानम् .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {64।73} यत् अपि प्रत्ययविधिः इति .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {65।73} आचार्यप्रवृत्तिः ज्ञापयति भवति एजन्तेभ्यः आकारान्तलक्षणः प्रत्ययविधिः इति यत् अयम् ह्वावामः च इति अणम् कबाधनार्थम् शास्ति .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {66।73} यत् अपि अभ्यासरूपम् इति : प्रत्याख्यायते सः योगः .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {67।73} अथ अपि क्रियते एवम् अपि न दोषः .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {68।73} कथम् .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {69।73} लिटि इति अनुवर्तते .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {70।73} द्विलकारकः च अयम् निर्देशः : लिटि लकारादौ इति .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {71।73} एवम् च कृत्वा सः अपि अदोषः भवति यत् उक्तम् आत्त्वे एशि उपसङ्ख्यानम् इति .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {72।73} यत् अपि उक्तम् अयवायावाम् प्रतिषेधः च इति .
(प्_6,1.45.2) क_इइइ,35.20-37.5 रो_इव्,355-358 {73।73} शिति प्रतिषेधः ज्ञापकः न अयादयः आत्त्वम् बाधन्ते इति .
(प्_6,1.45.3) क_इइइ,37.6-16 रो_इव्,358-359 {1।21} प्रातिपदिकप्रतिषेधः .
(प्_6,1.45.3) क_इइइ,37.6-16 रो_इव्,358-359 {2।21} प्रातिपदिकानाम् प्रतिषेधः वक्तव्यः .
(प्_6,1.45.3) क_इइइ,37.6-16 रो_इव्,358-359 {3।21} गोभ्याम् , गोभिः , नौभ्याम् , नौभिः .
(प्_6,1.45.3) क_इइइ,37.6-16 रो_इव्,358-359 {4।21} सः तर्हि वक्तव्यः .
(प्_6,1.45.3) क_इइइ,37.6-16 रो_इव्,358-359 {5।21} न वक्तव्यः .
(प्_6,1.45.3) क_इइइ,37.6-16 रो_इव्,358-359 {6।21} आचार्यप्रवृत्तिः ज्ञापयति न प्रातिपदिकानाम् आत्त्वम् भवति इति यत् अयम् रायः हलः इति आत्त्वम् शास्ति .
(प्_6,1.45.3) क_इइइ,37.6-16 रो_इव्,358-359 {7।21} न एतत् अस्ति ज्ञापकम् .

(प्_6,1.45.3) क_इइइ,37.6-16 रो_इव्,358-359 {8।21} नियमार्थम् एतत् स्यात् .
(प्_6,1.45.3) क_इइइ,37.6-16 रो_इव्,358-359 {9।21} रायः हलि एव इति .
(प्_6,1.45.3) क_इइइ,37.6-16 रो_इव्,358-359 {10।21} यत् तर्हि आ ओतः अम्शसोः इति आत्त्वम् शास्ति .
(प्_6,1.45.3) क_इइइ,37.6-16 रो_इव्,358-359 {11।21} एतस्य अपि अस्ति वचने प्रयोजनम् .
(प्_6,1.45.3) क_इइइ,37.6-16 रो_इव्,358-359 {12।21} अमि वृद्धिबाधनार्थम् एतत् स्यात् शसि प्रतिषेधार्थम् च .
(प्_6,1.45.3) क_इइइ,37.6-16 रो_इव्,358-359 {13।21} तस्मात् प्रातिपदिकानाम् प्रतिषेधः वक्तव्यः .
(प्_6,1.45.3) क_इइइ,37.6-16 रो_इव्,358-359 {14।21} न वक्तव्यः .
(प्_6,1.45.3) क_इइइ,37.6-16 रो_इव्,358-359 {15।21} धात्वधिकारात् प्रातिपदिकस्याप्राप्तिः .
(प्_6,1.45.3) क_इइइ,37.6-16 रो_इव्,358-359 {16।21} धात्वधिकारात् प्रातिपदिकस्य आत्त्वम् न भविष्यति .
(प्_6,1.45.3) क_इइइ,37.6-16 रो_इव्,358-359 {17।21} धातोः इति वर्तते .
(प्_6,1.45.3) क_इइइ,37.6-16 रो_इव्,358-359 {18।21} क्व प्रकृतम् .
(प्_6,1.45.3) क_इइइ,37.6-16 रो_इव्,358-359 {19।21} लिटि धातोः अनभ्यासस्य इति .
(प्_6,1.45.3) क_इइइ,37.6-16 रो_इव्,358-359 {20।21} अथ अपि निवृत्तम् एवम् अपि अदोषः .
(प्_6,1.45.3) क_इइइ,37.6-16 रो_इव्,358-359 {21।21} उपदेशे इति उच्यते उद्देशः च प्रातिपदिकानाम् न उपदेशः .
(प्_6,1.48) क_इइइ,37.18-22 रो_इव्,359 {1।10} आत्त्वे णौ लीयतेः उपसङ्ख्यानम् प्रलम्भनशालीनीकरणयोः .
(प्_6,1.48) क_इइइ,37.18-22 रो_इव्,359 {2।10} आत्त्वे णौ लीयतेः उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_6,1.48) क_इइइ,37.18-22 रो_इव्,359 {3।10} किम् प्रयोजनम् .
(प्_6,1.48) क_इइइ,37.18-22 रो_इव्,359 {4।10} प्रलम्भने च अर्थे शालीनीकरणे च नित्यम् आत्त्वम् यथा स्यात् .
(प्_6,1.48) क_इइइ,37.18-22 रो_इव्,359 {5।10} प्रलम्भने तावत् .
(प्_6,1.48) क_इइइ,37.18-22 रो_इव्,359 {6।10} जटाभिः आलापयते .
(प्_6,1.48) क_इइइ,37.18-22 रो_इव्,359 {7।10} श्मश्रुभिः आलापयते .
(प्_6,1.48) क_इइइ,37.18-22 रो_इव्,359 {8।10} शालीनीकरणे .
(प्_6,1.48) क_इइइ,37.18-22 रो_इव्,359 {9।10} श्येनः वार्तिकम् उल्लापयते .
(प्_6,1.48) क_इइइ,37.18-22 रो_इव्,359 {10।10} रथी रथिनम् उपलपयते .
(प्_6,1.49) क_इइइ,38.2-8 रो_इव्,360-361 {1।11} सिध्यतेः अज्ञानार्थस्य .
(प्_6,1.49) क_इइइ,38.2-8 रो_इव्,360-361 {2।11} सिध्यतेः अज्ञानार्थस्य इति वक्तव्यम् .
(प्_6,1.49) क_इइइ,38.2-8 रो_इव्,360-361 {3।11} इतरथा हि अनिष्टप्रसङ्गः .
(प्_6,1.49) क_इइइ,38.2-8 रो_इव्,360-361 {4।11} अपारलौकिके इति उच्यमाने अनिष्टम् प्रसज्येत .
(प्_6,1.49) क_इइइ,38.2-8 रो_इव्,360-361 {5।11} अन्नम् साधयति ब्राह्मणेभ्यः दास्यामि इति .
(प्_6,1.49) क_इइइ,38.2-8 रो_इव्,360-361 {6।11} अस्ति पुनः अयम् सिध्यतिः क्व चित् अन्यत्र वर्तते .
(प्_6,1.49) क_इइइ,38.2-8 रो_इव्,360-361 {7।11} अस्ति इति आह .
(प्_6,1.49) क_इइइ,38.2-8 रो_इव्,360-361 {8।11} तपः तापसम् सेधयति .
(प्_6,1.49) क_इइइ,38.2-8 रो_इव्,360-361 {9।11} ज्ञानम् अस्य प्रकाशयति .
(प्_6,1.49) क_इइइ,38.2-8 रो_इव्,360-361 {10।11} स्वानि एव एनम् कर्माणि सेधयन्ति .
(प्_6,1.49) क_इइइ,38.2-8 रो_इव्,360-361 {11।11} ज्ञानम् अस्य प्रकाशयन्ति इति अर्थः .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {1।53} मीनात्यादीनाम् आत्त्वे उपदेशवचनम् प्रत्ययविध्यर्थम् .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {2।53} मीनात्यादीनाम् आत्त्वे उपदेशिवद्भावः वक्तव्यः .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {3।53} उपदेशावस्थायाम् आत्त्वम् भवति इति वक्तव्यम् .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {4।53} किम् प्रयोजनम् .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {5।53} प्रत्ययविध्यर्थम् .

(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {6।53} उपदेशावस्थायाम् आत्त्वे कृते इष्टः प्रत्ययविधिः यथा स्यात् .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {7।53} के पुनः प्रत्ययाः उपदेशिवद्भावम् प्रयोजयन्ति .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {8।53} काः .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {9।53} काः तावत् न प्रयोजयन्ति .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {10।53} किम् कारणम् .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {11।53} एचः इति उच्यते न च केषु एच् अस्ति .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {12।53} णघञ्युज्विधयः तर्हि प्रयोजयन्ति .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {13।53} ण .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {14।53} अवदायः .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {15।53} आतः इति णः सिद्धः भवति .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {16।53} घञ् .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {17।53} अवदायः वर्तते .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {18।53} आतः इति घञ् सिद्धः भवति .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {19।53} किम् च भो आतः इति भञ् उच्यते .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {20।53} न खलु अपि आतः इति उच्यते आतः तु विज्ञायते .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {21।53} कथम् .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {22।53} अविशेषेण घञ् उत्सर्गः .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {23।53} तस्य इवर्णान्तात् उवर्णान्तात् च अजपौ अपवादौ .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {24।53} तत्र उपदेशावस्थायाम् आत्त्वे कृते अपवादस्य निमित्तम् न अस्ति इति कृत्वा उत्सर्गेण घञ् सिद्धः भवति .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {25।53} एवम् च कृत्वा न च आतः इति उच्यते आतः तु विज्ञायते .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {26।53} युच् .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {27।53} ईषदवदानम् स्ववदानम् .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {28।53} आतः इति युच् सिद्धः भवति .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {29।53} इदम् विप्रतिषिद्धम् एचः उपदेशः इति .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {30।53} यदि एचः न उपदेशे अथ उपदेशे न एचः .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {31।53} एचः च उपदेशे च इति विप्रतिषिद्धम् .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {32।53} न एतत् विप्रतिषिद्धम् .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {33।53} आह अयम् एचः उपदेशे इति .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {34।53} यदि एचः न उपदेशे अथ उपदेश न एचः .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {35।53} ते वयम् विषयम् विज्ञास्यामः .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {36।53} एज्विषये इति .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {37।53} तत् तर्हि उपदेशग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {38।53} न कर्तव्यम् .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {39।53} प्रकृतम् अनुवर्तते .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {40।53} क्व प्रकृतम् .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {41।53} आत् एचः उपदेशे इति .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {42।53} तत् वै प्रकृतिविशेषणम् विषयविशेषणेन च इह अर्थः .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {43।53} न च अन्यार्थम् प्रकृतम् अन्यार्थम् भवति .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {44।53} न खलु अपि अन्यत् प्रकृतम् अनुवर्तनात् अन्यत् भवति .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {45।53} न हि गोधा सर्पन्ती सर्पणात् अहिः भवति .

(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {46।53} यत् तावत् उच्यते न च अन्यार्थम् प्रकृतम् अन्यार्थम् भवति इति अन्यार्थम् अपि प्रकृतम् अन्यार्थम् भवति टत् यथा .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {47।53} शाल्यर्थम् कुल्याः प्रणीयन्ते ताभ्यः च पाणीयम् पीयते उपश्पृश्यते च शालयः च भाव्यन्ते .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {48।53} यत् अपि उच्यते न खलु अपि अन्यत् प्रकृतम् अनुवर्तनात् अन्यत् भवति .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {49।53} न हि गोधा सर्पन्ती सर्पणात् अहिः भवति इति .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {50।53} भवेत् द्रव्येषु एतत् एवम् स्यात् .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {51।53} शब्दः तु खलु येन येन विशेषेण अभिसम्बध्यते तस्य तस्य विशेषकः भवति .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {52।53} तत् यथ गौः शुक्लः अश्वः च .
(प्_6,1.50.1) क_इइइ,38.10-39.12 रो_इव्,361-363 {53।53} शुक्लः इति गम्यते .
(प्_6,1.50.2) क_इइइ,39.13-16 रो_इव्,364 {1।9} निमिमीलियाम् खलचोः प्रतिषेधः .
(प्_6,1.50.2) क_इइइ,39.13-16 रो_इव्,364 {2।9} निमिमीलियाम् खलचोः प्रतिषेधः वक्तव्यः .
(प्_6,1.50.2) क_इइइ,39.13-16 रो_इव्,364 {3।9} ईषन्निमयम् , सुनिमयम् , निमयः वर्तते .
(प्_6,1.50.2) क_इइइ,39.13-16 रो_इव्,364 {4।9} मि .
(प्_6,1.50.2) क_इइइ,39.13-16 रो_इव्,364 {5।9} मी .
(प्_6,1.50.2) क_इइइ,39.13-16 रो_इव्,364 {6।9} ईषप्रमयम् , सुप्रमयम् , प्रमयः वर्तते , प्रमयः .
(प्_6,1.50.2) क_इइइ,39.13-16 रो_इव्,364 {7।9} मी .
(प्_6,1.50.2) क_इइइ,39.13-16 रो_इव्,364 {8।9} ली .
(प्_6,1.50.2) क_इइइ,39.13-16 रो_इव्,364 {9।9} ईषद्विलयम् , सुविलयम् , विलयः वर्तते , विलयः .
(प्_6,1.51) क_इइइ,39.18 रो_इव्,364 {1।2} किम् इदम् लीयतेः इति .
(प्_6,1.51) क_इइइ,39.18 रो_इव्,364 {2।2} लिनातिलीयत्योः यका निर्देशः .
(प्_6,1.56) क_इइइ,39.20-23 रो_इव्,364-365 {1।12} हेतुभये इति किमर्थम् .
(प्_6,1.56) क_इइइ,39.20-23 रो_इव्,364-365 {2।12} कुञ्चिकया एनम् भाययति .
(प्_6,1.56) क_इइइ,39.20-23 रो_इव्,364-365 {3।12} अहिना एनम् भाययति .
(प्_6,1.56) क_इइइ,39.20-23 रो_इव्,364-365 {4।12} हेतुभये इति उच्यमाने अपि अत्र प्राप्नोति .
(प्_6,1.56) क_इइइ,39.20-23 रो_इव्,364-365 {5।12} एतत् अपि हि हेतुभयम् .
(प्_6,1.56) क_इइइ,39.20-23 रो_इव्,364-365 {6।12} हेतुभये इति न एवम् विज्ञायते .
(प्_6,1.56) क_इइइ,39.20-23 रो_इव्,364-365 {7।12} हेतोः भयम् हेतुभयम् .
(प्_6,1.56) क_इइइ,39.20-23 रो_इव्,364-365 {8।12} हेतुभये इति .
(प्_6,1.56) क_इइइ,39.20-23 रो_इव्,364-365 {9।12} कथम् तर्हि .
(प्_6,1.56) क_इइइ,39.20-23 रो_इव्,364-365 {10।12} हेतुः एव भयम् हेतुभयम् .
(प्_6,1.56) क_इइइ,39.20-23 रो_इव्,364-365 {11।12} हेतुभये इति .
(प्_6,1.56) क_इइइ,39.20-23 रो_इव्,364-365 {12।12} यदि सः एव हेतुः भयम् भवति इति .
(प्_6,1.58) क_इइइ,40.2-8 रो_इव्,365 {1।12} अमि सङ्ग्रहणम् .
(प्_6,1.58) क_इइइ,40.2-8 रो_इव्,365 {2।12} अमि सङ्ग्रहणम् .
(प्_6,1.58) क_इइइ,40.2-8 रो_इव्,365 {3।12} किम् इदम् सङ् इति .
(प्_6,1.58) क_इइइ,40.2-8 रो_इव्,365 {4।12} प्रत्याहारग्रहणम् .
(प्_6,1.58) क_इइइ,40.2-8 रो_इव्,365 {5।12} क्व सन्निविष्टानाम् प्रत्याहारः .
(प्_6,1.58) क_इइइ,40.2-8 रो_इव्,365 {6।12} सनः प्रभृति आ महिङः ङकारात् .
(प्_6,1.58) क_इइइ,40.2-8 रो_इव्,365 {7।12} किम् प्रयोजनम् . क्विप्प्रतिषेधाऋथम् .
(प्_6,1.58) क_इइइ,40.2-8 रो_इव्,365 {8।12} क्विबन्तस्य मा भूत् .
(प्_6,1.58) क_इइइ,40.2-8 रो_इव्,365 {9।12} रज्जुसृड्भ्याम् , रज्जुसृड्भिः , देवदृग्भ्याम् , देवदृग्भिः .

(प्_6,1.58) क_इइइ,40.2-8 रो_इव्,365 {10।12} उक्तम् वा .
(प्_6,1.58) क_इइइ,40.2-8 रो_इव्,365 {11।12} किम् उक्तम् .
(प्_6,1.58) क_इइइ,40.2-8 रो_इव्,365 {12।12} धातोः स्वरूपग्रहणे तत्प्रत्ययविज्ञानात् सिद्धम् इति .
(प्_6,1.60) क_इइइ,40.10-15 रो_इव्,365-366 {1।12} शीर्षन् छन्दसि प्रकृत्यन्तरम् .
(प्_6,1.60) क_इइइ,40.10-15 रो_इव्,365-366 {2।12} शीर्षन् छन्दसि प्रकृत्यन्तरम् द्रष्टव्यम् .
(प्_6,1.60) क_इइइ,40.10-15 रो_इव्,365-366 {3।12} किम् प्रयोजनम् .
(प्_6,1.60) क_इइइ,40.10-15 रो_इव्,365-366 {4।12} किम् प्रयोजनम् .
(प्_6,1.60) क_इइइ,40.10-15 रो_इव्,365-366 {5।12} आदेशप्रतिषेधार्थम् .
(प्_6,1.60) क_इइइ,40.10-15 रो_इव्,365-366 {6।12} आदेशः मा विज्ञायि .
(प्_6,1.60) क_इइइ,40.10-15 रो_इव्,365-366 {7।12} प्रकृत्यन्तरम् यथा विज्ञायेत .
(प्_6,1.60) क_इइइ,40.10-15 रो_इव्,365-366 {8।12} किम् च स्यात् .
(प्_6,1.60) क_इइइ,40.10-15 रो_इव्,365-366 {9।12} अस्कारान्तस्य छन्दसि श्रवणम् न स्यात् .
(प्_6,1.60) क_इइइ,40.10-15 रो_इव्,365-366 {10।12} शिरः मे शीर्यशः मुखम् (र्: शीर्यते मुखे ) .
(प्_6,1.60) क_इइइ,40.10-15 रो_इव्,365-366 {11।12} इदम् ते शिरः भिनद्मि इति .
(प्_6,1.60) क_इइइ,40.10-15 रो_इव्,365-366 {12।12} तत् वै अथर्वणः शिरः .
(प्_6,1.61) क_इइइ,40.17-41.16 रो_इव्,366-368 {1।36} ये च तद्धिते शिरसः आदेशार्थम् .
(प्_6,1.61) क_इइइ,40.17-41.16 रो_इव्,366-368 {2।36} ये च तद्धिते इति अत्र शिरसः ग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_6,1.61) क_इइइ,40.17-41.16 रो_इव्,366-368 {3।36} किम् प्रयोजनम् .आदेशार्थम् .
(प्_6,1.61) क_इइइ,40.17-41.16 रो_इव्,366-368 {4।36} आदेशः यथा विज्ञायेत .
(प्_6,1.61) क_इइइ,40.17-41.16 रो_इव्,366-368 {5।36} प्रकृत्यन्तरम् मा विज्ञायि .
(प्_6,1.61) क_इइइ,40.17-41.16 रो_इव्,366-368 {6।36} किम् च स्यात् .
(प्_6,1.61) क_इइइ,40.17-41.16 रो_इव्,366-368 {7।36} यकारादौ तद्धिते अस्कारान्तस्य श्रवणम् प्रसज्येत .
(प्_6,1.61) क_इइइ,40.17-41.16 रो_इव्,366-368 {8।36} शीर्षण्यः हि मुख्यः भवति .
(प्_6,1.61) क_इइइ,40.17-41.16 रो_इव्,366-368 {9।36} शीर्षण्यः खरः .
(प्_6,1.61) क_इइइ,40.17-41.16 रो_इव्,366-368 {10।36} वा केशेषु .
(प्_6,1.61) क_इइइ,40.17-41.16 रो_इव्,366-368 {11।36} वा केशेषु शिरसः शीर्षन्भावः वक्तव्यः .
(प्_6,1.61) क_इइइ,40.17-41.16 रो_इव्,366-368 {12।36} शीर्षण्याः केशाः , शिरस्याः .
(प्_6,1.61) क_इइइ,40.17-41.16 रो_इव्,366-368 {13।36} अचि शीर्षः .
(प्_6,1.61) क_इइइ,40.17-41.16 रो_इव्,366-368 {14।36} अचि परतः शिरसः शीर्षभावः वक्तव्यः .
(प्_6,1.61) क_इइइ,40.17-41.16 रो_इव्,366-368 {15।36} हास्तिशीर्षिः , स्थौल्यशीर्षिः, पैलुशीर्षिः .
(प्_6,1.61) क_इइइ,40.17-41.16 रो_इव्,366-368 {16।36} छन्दसि च .
(प्_6,1.61) क_इइइ,40.17-41.16 रो_इव्,366-368 {17।36} छन्दसि च शिरसः शीर्षभावः वक्तव्यः .
(प्_6,1.61) क_इइइ,40.17-41.16 रो_इव्,366-368 {18।36} द्वे शीर्षे .
(प्_6,1.61) क_इइइ,40.17-41.16 रो_इव्,366-368 {19।36} इह हास्तिशीर्ष्या पैलुशीर्ष्या इति शिरसः ग्रहणेन ग्रहणात् शीर्षन्भावः प्राप्नोति .
(प्_6,1.61) क_इइइ,40.17-41.16 रो_इव्,366-368 {20।36} अस्तु .
(प्_6,1.61) क_इइइ,40.17-41.16 रो_इव्,366-368 {21।36} नः तद्धिते इति टिलोपः भविष्यति .
(प्_6,1.61) क_इइइ,40.17-41.16 रो_इव्,366-368 {22।36} न सिध्यति .
(प्_6,1.61) क_इइइ,40.17-41.16 रो_इव्,366-368 {23।36} ये च अभावकर्मणोः इति प्रकृतिभावः प्रसज्येत .
(प्_6,1.61) क_इइइ,40.17-41.16 रो_इव्,366-368 {24।36} यदि पुनः ये अचि तद्धिते इति उच्येत .
(प्_6,1.61) क_इइइ,40.17-41.16 रो_इव्,366-368 {25।36} किम् कृतम् भवति .

(प्_6,1.61) क_इइइ,40.17-41.16 रो_इव्,366-368 {26।36} इञि शीर्षन्भावे कृते टिलोपेन सिद्धम् .
(प्_6,1.61) क_इइइ,40.17-41.16 रो_इव्,366-368 {27।36} न एवम् शक्यम् .
(प्_6,1.61) क_इइइ,40.17-41.16 रो_इव्,366-368 {28।36} इह हि स्थूलशिरसः इदम् स्थौलशीर्षम् इति अनणि इति प्रकृतिभावः प्रसज्येत .
(प्_6,1.61) क_इइइ,40.17-41.16 रो_इव्,366-368 {29।36} तस्मात् न एवम् शक्यम् .
(प्_6,1.61) क_इइइ,40.17-41.16 रो_इव्,366-368 {30।36} न चेत् एवम् शिरसः ग्रहणेन ग्रहणात् शीर्षन्भावः प्राप्नोति .
(प्_6,1.61) क_इइइ,40.17-41.16 रो_इव्,366-368 {31।36} पाक्षिकः एषः दोषः .
(प्_6,1.61) क_इइइ,40.17-41.16 रो_इव्,366-368 {32।36} कतरस्मिन् पक्षे .
(प्_6,1.61) क_इइइ,40.17-41.16 रो_इव्,366-368 {33।36} ष्यङ्विधौ द्वैतम् भवति .
(प्_6,1.61) क_इइइ,40.17-41.16 रो_इव्,366-368 {34।36} अणिञोः वा आदेशः ष्यङ् अणिञ्भ्याम् वा परः इति .
(प्_6,1.61) क_इइइ,40.17-41.16 रो_इव्,366-368 {35।36} तत् यदा तावद् अणिञोः आदेशः तदा एषः दोषः .
(प्_6,1.61) क_इइइ,40.17-41.16 रो_इव्,366-368 {36।36} यदा हि अणिञ्भ्याम् परः न तदा दोषः भवति अणिञ्भ्याम् व्यवहितत्वात् .
(प्_6,1.63) क_इइइ,41.19-42.6 रो_इव्,368-369 {1।35} शस्प्रभृतिषु इति उच्यते .
(प्_6,1.63) क_इइइ,41.19-42.6 रो_इव्,368-369 {2।35} अशस्प्रभृतिषु अपि दृश्यते .
(प्_6,1.63) क_इइइ,41.19-42.6 रो_इव्,368-369 {3।35} शला दोषणी .
(प्_6,1.63) क_इइइ,41.19-42.6 रो_इव्,368-369 {4।35} ककुत् दोषणी .
(प्_6,1.63) क_इइइ,41.19-42.6 रो_इव्,368-369 {5।35} याचते महादेवः .
(प्_6,1.63) क_इइइ,41.19-42.6 रो_इव्,368-369 {6।35} पदादिषु मांस्पृत्स्नूनाम् उपसङ्ख्यानम् .
(प्_6,1.63) क_इइइ,41.19-42.6 रो_इव्,368-369 {7।35} पदादिषु मांस्पृत्स्नूनाम् उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_6,1.63) क_इइइ,41.19-42.6 रो_इव्,368-369 {8।35} मांस् .
(प्_6,1.63) क_इइइ,41.19-42.6 रो_इव्,368-369 {9।35} यत् नीक्षणम् मांस्पचन्याः .
(प्_6,1.63) क_इइइ,41.19-42.6 रो_इव्,368-369 {10।35} मांसपचन्याः इति प्राप्ते .
(प्_6,1.63) क_इइइ,41.19-42.6 रो_इव्,368-369 {11।35} मांस् .
(प्_6,1.63) क_इइइ,41.19-42.6 रो_इव्,368-369 {12।35} पृत्. पृत्सु मर्त्यम् .
(प्_6,1.63) क_इइइ,41.19-42.6 रो_इव्,368-369 {13।35} पृतनासु मर्त्यम् इति प्राप्ते .
(प्_6,1.63) क_इइइ,41.19-42.6 रो_इव्,368-369 {14।35} पृत् .
(प्_6,1.63) क_इइइ,41.19-42.6 रो_इव्,368-369 {15।35} स्नु .
(प्_6,1.63) क_इइइ,41.19-42.6 रो_इव्,368-369 {16।35} न ते दिवः न पृथिव्यः अधि स्नुषु .
(प्_6,1.63) क_इइइ,41.19-42.6 रो_इव्,368-369 {17।35} अधि सानुषु इति प्राप्ते .
(प्_6,1.63) क_इइइ,41.19-42.6 रो_इव्,368-369 {18।35} नस् नासिकायाः यत्तस्क्षुद्रेषु .
(प्_6,1.63) क_इइइ,41.19-42.6 रो_इव्,368-369 {19।35} यत्तस्क्षुद्रेषु परतः नासिकायाः नस्भावः वक्तव्यः .
(प्_6,1.63) क_इइइ,41.19-42.6 रो_इव्,368-369 {20।35} यत् .
(प्_6,1.63) क_इइइ,41.19-42.6 रो_इव्,368-369 {21।35} नस्यम् .
(प्_6,1.63) क_इइइ,41.19-42.6 रो_इव्,368-369 {22।35} यत् .
(प्_6,1.63) क_इइइ,41.19-42.6 रो_इव्,368-369 {23।35} तस् .
(प्_6,1.63) क_इइइ,41.19-42.6 रो_इव्,368-369 {24।35} नस्तः .
(प्_6,1.63) क_इइइ,41.19-42.6 रो_इव्,368-369 {25।35} तस्. क्षुद्र .
(प्_6,1.63) क_इइइ,41.19-42.6 रो_इव्,368-369 {26।35} नःक्षुद्रः .
(प्_6,1.63) क_इइइ,41.19-42.6 रो_इव्,368-369 {27।35} अवर्णनगरयोः इति वक्तव्यम् .
(प्_6,1.63) क_इइइ,41.19-42.6 रो_इव्,368-369 {28।35} इह मा भूत् .
(प्_6,1.63) क_इइइ,41.19-42.6 रो_इव्,368-369 {29।35} नासिक्यः वर्णः , नासिक्यम् नगरम् .

(प्_6,1.63) क_इइइ,41.19-42.6 रो_इव्,368-369 {30।35} तत् तर्हि वक्तव्यम् .
(प्_6,1.63) क_इइइ,41.19-42.6 रो_इव्,368-369 {31।35} न वक्तव्यम् .
(प्_6,1.63) क_इइइ,41.19-42.6 रो_इव्,368-369 {32।35} इह तावत् नासिक्यः वर्णः इति .
(प्_6,1.63) क_इइइ,41.19-42.6 रो_इव्,368-369 {33।35} परिमुखादिषु पाठः करिष्यते .
(प्_6,1.63) क_इइइ,41.19-42.6 रो_इव्,368-369 {34।35} नासिक्यम् नगरम् इति .
(प्_6,1.63) क_इइइ,41.19-42.6 रो_इव्,368-369 {35।35} सङ्काशादिषु पाठः करिष्यते .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {1।50} धातुग्रहणम् किमर्थम् .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {2।50} इह मा भूत् : षोडन् , षण्डः , षोडिकः .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {3।50} अथ आदिग्रहणम् किमर्थम् .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {4।50} इह मा भूत् : पेष्टा पेष्टुम् .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {5।50} न एतत् अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {6।50} अस्तु अत्र सत्वम् .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {7।50} सत्वे कृते इणः उत्तरस्य आदेशसकारस्य इति षत्वम् भविष्यति .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {8।50} इदम् तर्हि : लषिता लषितुम् .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {9।50} इदम् च अपि उदार्हरणम् : पेष्टा पेष्टुम् .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {10।50} ननु च उक्तम् अस्तु अत्र सत्वम् .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {11।50} सत्वे कृते इणः उत्तरस्य आदेशसकारस्य इति षत्वम् भविष्यति इति .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {12।50} न एवम् शक्यम् .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {13।50} इह हि पेक्ष्यति इति षत्वस्य असिद्धत्वात् षढोः कः सि इति कत्वम् न स्यात् .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {14।50} सादेशे सुब्धातुष्ठिवुष्वष्कतीनाम् प्रतिषेधः .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {15।50} सादेशे सुब्धातुष्ठिवुष्वष्कतीनाम् प्रतिषेधः वक्तव्यः .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {16।50} सुब्धातु : षोडीयति षण्डीयति .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {17।50} ष्ठिवु : ष्ठीवति .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {18।50} ष्वष्क् : ष्वष्कते .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {19।50} सुब्धातूनाम् तावत् न वक्तव्यः .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {20।50} उपदेशे इति वर्तते उद्देशः च प्रातिपदिकानाम् न उपदेशः .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {21।50} यदि एवम् न अर्थः धातुग्रहणेन .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {22।50} कस्मात् न भवति षोडन् , षण्डः , षोडिकः इति .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {23।50} उपदेशे इति वर्तते उद्देशः च प्रातिपदिकानाम् न उपदेशः .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {24।50} ष्ठिवेः अपि द्वितीयः वर्णः ठकारः .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {25।50} यदि ठकारः तेष्ठीव्यते इति न सिध्यति .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {26।50} एवम् तर्हि थकारः .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {27।50} यदि थकारः टुष्ठ्यूषति टेष्ठीव्यतिए इति न सिध्यति .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {28।50} एवम् तर्हि द्वौ इमौ ष्ठिवू .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {29।50} अकस्य द्वितीयः वर्णः ठकारः अपरस्य थकारः .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {30।50} यस्य थकारः तस्य सत्वम् प्राप्नोति .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {31।50} एवम् तर्हि द्वौ इमौ द्विषकारौ ष्ठिवुष्वष्कती .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {32।50} किम् कृतम् भवति .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {33।50} पूर्वस्य सत्वे कृते परेण सन्निपाते ष्टुत्वम् भविष्यति .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {34।50} न एवम् शक्यम् .

(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {35।50} इह हि श्वलिट् ष्ठीवति मधुलिट् ष्वष्कते ष्टुत्वस्य असिद्धत्वात् डः सि धुट् इति धुट् प्रसज्येत .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {36।50} एवम् तर्हि यकारादी द्विषकारौ ष्ठिवुष्वष्कती .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {37।50} किम् यकारः न श्रूयते .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {38।50} लुप्तनिर्दिष्टः यकारः .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {39।50} अथ किमर्थम् षकारम् उपदिश्य तस्य सकारः आदेशः क्रियते न सकारः एव उपदिश्येत .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {40।50} लघ्वर्थम् इति आह .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {41।50} कथम् .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {42।50} अविशेषेण अयम् षकारम् उपदिश्य सकारम् आदेशम् उक्त्वा लघुना उपायेन षत्वम् निर्वर्तयति आदेशप्रत्यययोः इति .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {43।50} इतरथा हि येषाम् षत्वम् इष्यते तेषाम् तत्र ग्रहणम् कर्तव्यम् स्यात् .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {44।50} के पुनः षोपदेशाः धातवः .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {45।50} पठितव्याः .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {46।50} कः अत्र भवतः पुरुषकारः .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {47।50} यदि अन्तरेण पाठम् किम् चित् शक्यते वक्तुम् तत् उच्यताम् .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {48।50} अन्तरेण अपि पाठम् किम् चित् शक्यते वक्तुम् .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {49।50} कथम् .
(प्_6,1.64) क_इइइ,42.8-43.10 रो_इव्,369-371 {50।50} अज्दन्त्यपराः सादयः षोपदेशाः स्मिङ्स्वदिस्विदिस्वञ्जिस्वपयः च सृपिसृजिस्तृस्त्यासेकृसृवर्जम् .
(प्_6,1.65) क_इइइ,43.12-18 रो_इव्,372 {1।12} अथ किमर्थम् णकारम् उपदिश्य तस्य नकारः आदेशः क्रियते न नकारः एव उपदिश्येत .
(प्_6,1.65) क_इइइ,43.12-18 रो_इव्,372 {2।12} लघ्वर्थम् इति आह .
(प्_6,1.65) क_इइइ,43.12-18 रो_इव्,372 {3।12} कथम् .
(प्_6,1.65) क_इइइ,43.12-18 रो_इव्,372 {4।12} अविशेषेण अयम् णकारम् उपदिश्य नकारम् आदेशम् उक्त्वा लघुना उपायेन णत्वम् निर्वर्तयति उपसर्गात् असमासे अपि णोपदेशस्य इति .
(प्_6,1.65) क_इइइ,43.12-18 रो_इव्,372 {5।12} इतरथा हि येषाम् णत्वम् इष्यते तेषाम् तत्र ग्रहणम् कर्तव्यम् स्यात् .
(प्_6,1.65) क_इइइ,43.12-18 रो_इव्,372 {6।12} के पुनः णोपदेशाः धातवः .
(प्_6,1.65) क_इइइ,43.12-18 रो_इव्,372 {7।12} पठितव्याः .
(प्_6,1.65) क_इइइ,43.12-18 रो_इव्,372 {8।12} कः अत्र भवतः पुरुषकारः .
(प्_6,1.65) क_इइइ,43.12-18 रो_इव्,372 {9।12} यदि अन्तरेण पाठम् किम् चित् शक्यते वक्तुम् तत् उच्यताम् .
(प्_6,1.65) क_इइइ,43.12-18 रो_इव्,372 {10।12} अन्तरेण अपि पाठम् किम् चित् शक्यते वक्तुम् .
(प्_6,1.65) क_इइइ,43.12-18 रो_इव्,372 {11।12} कथम् .
(प्_6,1.65) क_इइइ,43.12-18 रो_इव्,372 {12।12} सर्वे नादयः णोपदेशाः नृतिनन्दिनर्दिनक्किनाटिनाथृनाधृनॄवर्जम् .
(प्_6,1.66.1) क_इइइ,43.20-44.7 रो_इव्,372-374 {1।25} व्योः लोपे क्वौ उपसङ्ख्यानम् .
(प्_6,1.66.1) क_इइइ,43.20-44.7 रो_इव्,372-374 {2।25} व्योः लोपे क्वौ उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् इह अपि यथा स्यात् .
(प्_6,1.66.1) क_इइइ,43.20-44.7 रो_इव्,372-374 {3।25} कण्डूयतेः अप्रत्ययः कण्डूः इति .
(प्_6,1.66.1) क_इइइ,43.20-44.7 रो_इव्,372-374 {4।25} किम् पुनः कारणम् न सिध्यति .
(प्_6,1.66.1) क_इइइ,43.20-44.7 रो_इव्,372-374 {5।25} वलि इति उच्यते न च अत्र वलादिम् पश्यामः .
(प्_6,1.66.1) क_इइइ,43.20-44.7 रो_इव्,372-374 {6।25} ननु च अयम् क्विप् एव वलादिः भवति .
(प्_6,1.66.1) क_इइइ,43.20-44.7 रो_इव्,372-374 {7।25} क्विब्लोपे कृते वलाद्यभावात् न प्राप्नोति .
(प्_6,1.66.1) क_इइइ,43.20-44.7 रो_इव्,372-374 {8।25} इदम् इह सम्प्रधार्यम् .
(प्_6,1.66.1) क_इइइ,43.20-44.7 रो_इव्,372-374 {9।25} क्विब्लोपः क्रियताम् यलोपः इति .
(प्_6,1.66.1) क_इइइ,43.20-44.7 रो_इव्,372-374 {10।25} किम् अत्र कर्तव्यम् .
(प्_6,1.66.1) क_इइइ,43.20-44.7 रो_इव्,372-374 {11।25} परत्वात् क्विब्लोपः नित्यत्वात् च .
(प्_6,1.66.1) क_इइइ,43.20-44.7 रो_इव्,372-374 {12।25} नित्यः खलु अपि क्विब्लोपः .

(प्_6,1.66.1) क_इइइ,43.20-44.7 रो_इव्,372-374 {13।25} कृते अपि यलोपे प्राप्नोति अकृते अपि प्राप्नोति .
(प्_6,1.66.1) क_इइइ,43.20-44.7 रो_इव्,372-374 {14।25} नित्यत्वात् परत्वात् च क्विब्लोपः .
(प्_6,1.66.1) क_इइइ,43.20-44.7 रो_इव्,372-374 {15।25} क्विब्लोपे कृते वलाद्यभावात् यलोपः न प्राप्नोति .
(प्_6,1.66.1) क_इइइ,43.20-44.7 रो_इव्,372-374 {16।25} एवम् तर्हि प्रत्ययलक्षणेन भविष्यति .
(प्_6,1.66.1) क_इइइ,43.20-44.7 रो_इव्,372-374 {17।25} वर्णाश्रये न अस्ति प्रत्ययलक्षणम् .
(प्_6,1.66.1) क_इइइ,43.20-44.7 रो_इव्,372-374 {18।25} यदि वा कानि चित् वर्णाश्रयाणि प्रत्ययलक्षणेन भवन्ति तथा इदम् अपि भविष्यति .
(प्_6,1.66.1) क_इइइ,43.20-44.7 रो_इव्,372-374 {19।25} अथ वा एवम् वक्ष्यामि .
(प्_6,1.66.1) क_इइइ,43.20-44.7 रो_इव्,372-374 {20।25} लोपः व्योः वलि .
(प्_6,1.66.1) क_इइइ,43.20-44.7 रो_इव्,372-374 {21।25} ततः वेः .
(प्_6,1.66.1) क_इइइ,43.20-44.7 रो_इव्,372-374 {22।25} व्यन्तयोः च व्योः लोपः भवति .
(प्_6,1.66.1) क_इइइ,43.20-44.7 रो_इव्,372-374 {23।25} ततः अपृक्तस्य .
(प्_6,1.66.1) क_इइइ,43.20-44.7 रो_इव्,372-374 {24।25} अपृक्तस्य च लोपः भवति .
(प्_6,1.66.1) क_इइइ,43.20-44.7 रो_इव्,372-374 {25।25} वेः इति एव .
(प्_6,1.66.2) क_इइइ,44.8-45.2 रो_इव्,374-375 {1।30} वलोपाप्रसिद्धिः ऊड्भाववचनात् .
(प्_6,1.66.2) क_इइइ,44.8-45.2 रो_इव्,374-375 {2।30} वलोपस्य अप्रसिद्धिः .
(प्_6,1.66.2) क_इइइ,44.8-45.2 रो_इव्,374-375 {3।30} आस्रेमाणम् , जीरदानुः इति .
(प्_6,1.66.2) क_इइइ,44.8-45.2 रो_इव्,374-375 {4।30} किम् कारणम् .
(प्_6,1.66.2) क_इइइ,44.8-45.2 रो_इव्,374-375 {5।30} ऊड्भाववचनात् .
(प्_6,1.66.2) क_इइइ,44.8-45.2 रो_इव्,374-375 {6।30} च्छ्वोः शूट् अनुनासिके च इति ऊठ् प्राप्नोति .
(प्_6,1.66.2) क_इइइ,44.8-45.2 रो_इव्,374-375 {7।30} अतिप्रसङ्गः व्रश्चादिषु .
(प्_6,1.66.2) क_इइइ,44.8-45.2 रो_इव्,374-375 {8।30} व्रश्चादिषु च अतिप्रसङ्गः भवति .
(प्_6,1.66.2) क_इइइ,44.8-45.2 रो_इव्,374-375 {9।30} इह अपि प्राप्नोति .
(प्_6,1.66.2) क_इइइ,44.8-45.2 रो_इव्,374-375 {10।30} व्रश्चनः , व्रीहिः , व्रणः इति .
(प्_6,1.66.2) क_इइइ,44.8-45.2 रो_इव्,374-375 {11।30} उपदेशसामर्थ्यात् सिद्धम् .
(प्_6,1.66.2) क_इइइ,44.8-45.2 रो_इव्,374-375 {12।30} उपदेशसामर्थ्यात् व्रश्चादिषु लोपः न भविष्यति .
(प्_6,1.66.2) क_इइइ,44.8-45.2 रो_इव्,374-375 {13।30} उपदेशसामर्थ्यात् सिद्धम् इति चेत् सम्प्रसारणहलादिशेषेषु सामर्थ्यम् .
(प्_6,1.66.2) क_इइइ,44.8-45.2 रो_इव्,374-375 {14।30} उपदेशसामर्थ्यात् सिद्धम् इति चेत् अस्ति अन्यत् उपदेशवचने प्रयोजनम् .
(प्_6,1.66.2) क_इइइ,44.8-45.2 रो_इव्,374-375 {15।30} सम्प्रसारणहलादिशेषेषु कृतेषु वकारस्य श्रवणम् यथा स्यात् .
(प्_6,1.66.2) क_इइइ,44.8-45.2 रो_इव्,374-375 {16।30} (र्: वृक्णः ) वृक्णवान् , (र् वृश्चति ) विव्रश्चिषति इति .
(प्_6,1.66.2) क_इइइ,44.8-45.2 रो_इव्,374-375 {17।30} न वा बहिरङ्गलक्षणत्वात् .
(प्_6,1.66.2) क_इइइ,44.8-45.2 रो_इव्,374-375 {18।30} न वा एतत् प्रयोजनम् अस्ति .
(प्_6,1.66.2) क_इइइ,44.8-45.2 रो_इव्,374-375 {19।30} किम् कारणम् .
(प्_6,1.66.2) क_इइइ,44.8-45.2 रो_इव्,374-375 {20।30} बहिरङ्गलक्षणत्वात् .
(प्_6,1.66.2) क_इइइ,44.8-45.2 रो_इव्,374-375 {21।30} बहिरङ्गाः सम्प्रसारणहलादिशेषाः .
(प्_6,1.66.2) क_इइइ,44.8-45.2 रो_इव्,374-375 {22।30} अन्तरङ्गः लोपः .
(प्_6,1.66.2) क_इइइ,44.8-45.2 रो_इव्,374-375 {23।30} असिद्धम् बहिरङ्गम् अन्तरङ्गे .
(प्_6,1.66.2) क_इइइ,44.8-45.2 रो_इव्,374-375 {24।30} अनारम्भः वा .
(प्_6,1.66.2) क_इइइ,44.8-45.2 रो_इव्,374-375 {25।30} अनारम्भः वा पुनः वलोपस्य न्याय्यः .
(प्_6,1.66.2) क_इइइ,44.8-45.2 रो_इव्,374-375 {26।30} कथम् आस्रेमाणम् , जीरदानुः इति .
(प्_6,1.66.2) क_इइइ,44.8-45.2 रो_इव्,374-375 {27।30} आस्रेमाणम् जीरदानुः इति वर्णलोपात् .

मूल पाठ: Vyākaraṇamahābhāṣya · Edition: Franz Kielhorn (Bombay 1880-1885), revised by K.V. Abhyankar (Poona 1972-1996). · Data entry George Cardona · GRETIL (Göttingen) · CC BY-NC-SA 4.0

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