व्याकरणमहाभाष्य · भाग 10011020
(प्_6,4.74) क_इइइ,208.7-209.17 रो_इव्,745-748 {43।66} पररूपम् गुणे न अटः .
(प्_6,4.74) क_इइइ,208.7-209.17 रो_इव्,745-748 {44।66} पररूपम् गुणे अटः न इति वक्ष्यामि .
(प्_6,4.74) क_इइइ,208.7-209.17 रो_इव्,745-748 {45।66} ओमाङोः उसि तत् समम् .
(प्_6,4.74) क_इइइ,208.7-209.17 रो_इव्,745-748 {46।66} यदि अपि एतत् उच्यते अथ वा एतर्हि उसि ओमाङ्क्षु आटः पररूपप्रतिषेधः चोदितः स न वक्तव्यः भवति .
(प्_6,4.74) क_इइइ,208.7-209.17 रो_इव्,745-748 {47।66} छन्दोर्थम् तर्हि आट् वक्तव्यः .
(प्_6,4.74) क_इइइ,208.7-209.17 रो_इव्,745-748 {48।66} अरैक् उ कृष्णाः .
(प्_6,4.74) क_इइइ,208.7-209.17 रो_इव्,745-748 {49।66} त्रितः एनम् आयुनक् .
(प्_6,4.74) क_इइइ,208.7-209.17 रो_इव्,745-748 {50।66} सुरुचः वेन् आवः .
(प्_6,4.74) क_इइइ,208.7-209.17 रो_इव्,745-748 {51।66} छन्दोर्थम् बहुलम् दीर्घम् .
(प्_6,4.74) क_इइइ,208.7-209.17 रो_इव्,745-748 {52।66} बहुलम् छन्दसि दीर्घत्वम् दृश्यते .
(प्_6,4.74) क_इइइ,208.7-209.17 रो_इव्,745-748 {53।66} तत् यथा : पूरुषः , नारकः इति .
(प्_6,4.74) क_इइइ,208.7-209.17 रो_इव्,745-748 {54।66} एवम् तर्हि आयन् , आसन् .
(प्_6,4.74) क_इइइ,208.7-209.17 रो_इव्,745-748 {55।66} इणस्त्योः यण्लोपयोः कृतयोः अनजादित्वात् वृद्धिः न प्राप्नोति .
(प्_6,4.74) क_इइइ,208.7-209.17 रो_इव्,745-748 {56।66} इणस्त्योः अन्तरङ्गतः .
(प्_6,4.74) क_इइइ,208.7-209.17 रो_इव्,745-748 {57।66} अन्तरङ्गत्वात् वृद्धिः भविष्यति .
(प्_6,4.74) क_इइइ,208.7-209.17 रो_इव्,745-748 {58।66} तस्मात् न अर्थः आड्ग्रहणेन .
(प्_6,4.74) क_इइइ,208.7-209.17 रो_इव्,745-748 {59।66} अजादीनाम् अटा सिद्धम् .
(प्_6,4.74) क_इइइ,208.7-209.17 रो_इव्,745-748 {60।66} वृद्ध्यर्थम् इति चेत् अटः .
(प्_6,4.74) क_इइइ,208.7-209.17 रो_इव्,745-748 {61।66} अस्ववः हसति इति अत्र .
(प्_6,4.74) क_इइइ,208.7-209.17 रो_इव्,745-748 {62।66} धातौ वृद्धिम् अटः स्मरेत् .
(प्_6,4.74) क_इइइ,208.7-209.17 रो_इव्,745-748 {63।66} पररूपम् गुणे न अटः .
(प्_6,4.74) क_इइइ,208.7-209.17 रो_इव्,745-748 {64।66} ओमाङोः उसि तत् समम् .
(प्_6,4.74) क_इइइ,208.7-209.17 रो_इव्,745-748 {65।66} छन्दोर्थम् बहुलम् दीर्घम् .
(प्_6,4.74) क_इइइ,208.7-209.17 रो_इव्,745-748 {66।66} इणस्त्योः अन्तरङ्गतः .
(प्_6,4.77) क_इइइ,209.19-22 रो_इव्,748-749 {1।10} इयङादिप्रकरणे तन्वादीनाम् छन्दसि बहुलम् .
(प्_6,4.77) क_इइइ,209.19-22 रो_इव्,748-749 {2।10} इयङादिप्रकरणे तन्वादीनाम् छन्दसि बहुलम् उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_6,4.77) क_इइइ,209.19-22 रो_इव्,748-749 {3।10} तन्वम् पुषेम .
(प्_6,4.77) क_इइइ,209.19-22 रो_इव्,748-749 {4।10} तनुवम् पुषेम .
(प्_6,4.77) क_इइइ,209.19-22 रो_इव्,748-749 {5।10} विष्वम् पश्य .
(प्_6,4.77) क_इइइ,209.19-22 रो_इव्,748-749 {6।10} विषुवम् पश्य .
(प्_6,4.77) क_इइइ,209.19-22 रो_इव्,748-749 {7।10} स्वर्गम् लोकम् .
(प्_6,4.77) क_इइइ,209.19-22 रो_इव्,748-749 {8।10} सुवर्गम् लोकम् .
(प्_6,4.77) क_इइइ,209.19-22 रो_इव्,748-749 {9।10} त्र्यम्बकम् यजामहे .
(प्_6,4.77) क_इइइ,209.19-22 रो_इव्,748-749 {10।10} त्रियम्बकम् यजामहे .
(प्_6,4.82) क_इइइ,209.24-210.15 रो_इव्,749-751 {1।26} अथ इह कस्मात् न भवति : ब्राह्मणस्य नियौ , ब्राह्मणस्य नियः .
(प्_6,4.82) क_इइइ,209.24-210.15 रो_इव्,749-751 {2।26} अङ्गाधिकारात् .
(प्_6,4.82) क_इइइ,209.24-210.15 रो_इव्,749-751 {3।26} अङ्गस्य इति अनुवर्तते .
(प्_6,4.82) क_इइइ,209.24-210.15 रो_इव्,749-751 {4।26} एवम् अपि परमनियौ परमनियः इति अत्र प्राप्नोति .
(प्_6,4.82) क_इइइ,209.24-210.15 रो_इव्,749-751 {5।26} गतिकारकपूर्वस्य इष्यते .
(प्_6,4.82) क_इइइ,209.24-210.15 रो_इव्,749-751 {6।26} यणादेशः स्वरपदपूर्वोपधस्य च .
(प्_6,4.82) क_इइइ,209.24-210.15 रो_इव्,749-751 {7।26} यणादेशः स्वरपूर्वोपधस्य पदपूर्वोपधस्य च इति वक्तव्यम् .
(प्_6,4.82) क_इइइ,209.24-210.15 रो_इव्,749-751 {8।26} स्वरपूर्वोपधस्य : निन्यतुः , निन्युः .
(प्_6,4.82) क_इइइ,209.24-210.15 रो_इव्,749-751 {9।26} पदपूर्वोपधस्य : उन्न्यौ , उन्न्यः , उद्ध्यौ , उद्ध्यः .
(प्_6,4.82) क_इइइ,209.24-210.15 रो_इव्,749-751 {10।26} उभयकृतम्: ग्रामण्यौ , ग्रामण्यः , सेनान्यौ , सेनान्यः .
(प्_6,4.82) क_इइइ,209.24-210.15 रो_इव्,749-751 {11।26} असंयोगपूर्वे हि अनिष्टप्रसङ्गः .
(प्_6,4.82) क_इइइ,209.24-210.15 रो_इव्,749-751 {12।26} असंयोगपूर्वस्य इति हि उच्यमाने अनिष्टम् प्रसज्येत .
(प्_6,4.82) क_इइइ,209.24-210.15 रो_इव्,749-751 {13।26} उद्ध्यौ , उद्ध्यः , उन्न्यौ , उन्न्यः .
(प्_6,4.82) क_इइइ,209.24-210.15 रो_इव्,749-751 {14।26} असंयोगपूर्वस्य इति प्रतिषेधः प्रसज्येत .
(प्_6,4.82) क_इइइ,209.24-210.15 रो_इव्,749-751 {15।26} तत् तर्हि वक्तव्यम् .
(प्_6,4.82) क_इइइ,209.24-210.15 रो_इव्,749-751 {16।26} न वक्तव्यम् .
(प्_6,4.82) क_इइइ,209.24-210.15 रो_इव्,749-751 {17।26} धातोः इति वर्तते .
(प्_6,4.82) क_इइइ,209.24-210.15 रो_इव्,749-751 {18।26} तत्र धातुना संयोगम् विशेषयिष्यामः .
(प्_6,4.82) क_इइइ,209.24-210.15 रो_इव्,749-751 {19।26} धातोः यः संयोगः तत्पूर्वस्य न इति .
(प्_6,4.82) क_इइइ,209.24-210.15 रो_इव्,749-751 {20।26} उपसर्जनम् वै संयोगः न च उपसर्जनस्य विशेषणम् अस्ति .
(प्_6,4.82) क_इइइ,209.24-210.15 रो_इव्,749-751 {21।26} धातोः इति अनुवर्तनसामर्थ्यात् उपसर्जनस्य अपि विशेषणम् भविष्यति .
(प्_6,4.82) क_इइइ,209.24-210.15 रो_इव्,749-751 {22।26} अस्ति अन्यत् धातोः इति अनुवर्तनस्य प्रयोजनम् .
(प्_6,4.82) क_इइइ,209.24-210.15 रो_इव्,749-751 {23।26} किम् .
(प्_6,4.82) क_इइइ,209.24-210.15 रो_इव्,749-751 {24।26} इवर्णम् विशेषयिष्यामः .
(प्_6,4.82) क_इइइ,209.24-210.15 रो_इव्,749-751 {25।26} न एतत् अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_6,4.82) क_इइइ,209.24-210.15 रो_इव्,749-751 {26।26} यत् हि अधातोः इवर्णम् भवितव्यम् एव तस्य यणादेशेन इकः यण् अचि इति एव .
(प्_6,4.84) क_इइइ,210.17-20 रो_इव्,751 {1।4} वर्षाभूपुनर्भ्वः च .
(प्_6,4.84) क_इइइ,210.17-20 रो_इव्,751 {2।4} वर्षाभू इति अत्र पुनर्भ्वः च इति वक्तव्यम् : पुनर्भ्वौ , पुनर्भ्वः .
(प्_6,4.84) क_इइइ,210.17-20 रो_इव्,751 {3।4} अत्यल्पम् इदम् उच्यते .
(प्_6,4.84) क_इइइ,210.17-20 रो_इव्,751 {4।4} वर्षादृन्कारपुनःपूर्वस्य भुवः इति वक्तव्यम् : वर्षाभ्वौ , वर्षाभ्वः , दृन्भ्वौ , दृन्भ्वः , कारभ्वौ , कारभ्वः , पुनर्भ्वौ , पुनर्भ्वः .
(प्_6,4.87) क_इइइ,22-211.14 रो_इव्,751-752 {1।33} हुश्नुग्रहणम् अनर्थकम् .
(प्_6,4.87) क_इइइ,22-211.14 रो_इव्,751-752 {2।33} किम् कारणम् .
(प्_6,4.87) क_इइइ,22-211.14 रो_इव्,751-752 {3।33} अन्यस्य अभावात् .
(प्_6,4.87) क_इइइ,22-211.14 रो_इव्,751-752 {4।33} न हि अन्यत् सार्वधातुके अस्ति यस्य यणादेशः स्यात् .
(प्_6,4.87) क_इइइ,22-211.14 रो_इव्,751-752 {5।33} ननु च अयम् अस्ति : याति , वाति इति .
(प्_6,4.87) क_इइइ,22-211.14 रो_इव्,751-752 {6।33} क्ङिति अनुवर्तते .
(प्_6,4.87) क_इइइ,22-211.14 रो_इव्,751-752 {7।33} इह तर्हि : यातः , वातः इति .
(प्_6,4.87) क_इइइ,22-211.14 रो_इव्,751-752 {8।33} अचि इति वर्तते .
(प्_6,4.87) क_इइइ,22-211.14 रो_इव्,751-752 {9।33} इह तर्हि : यान्ति , वान्ति .
(प्_6,4.87) क_इइइ,22-211.14 रो_इव्,751-752 {10।33} य्वोः इति वर्तते .
(प्_6,4.87) क_इइइ,22-211.14 रो_इव्,751-752 {11।33} एवम् अपि धियन्ति , पियन्ति इति अत्र प्राप्नोति .
(प्_6,4.87) क_इइइ,22-211.14 रो_इव्,751-752 {12।33} ओः इति वर्तते .
(प्_6,4.87) क_इइइ,22-211.14 रो_इव्,751-752 {13।33} एवम् अपि सुवन्ति , रुवन्ति इति अत्र प्राप्नोति .
(प्_6,4.87) क_इइइ,22-211.14 रो_इव्,751-752 {14।33} अनेकाचः इति वर्तते .
(प्_6,4.87) क_इइइ,22-211.14 रो_इव्,751-752 {15।33} एवम् अपि असुवन् , अरुवन् इति अत्र प्राप्नोति .
(प्_6,4.87) क_इइइ,22-211.14 रो_इव्,751-752 {16।33} एतत् अपि अटः असिद्धत्वात् एकाच् भवति .
(प्_6,4.87) क_इइइ,22-211.14 रो_इव्,751-752 {17।33} एवम् अपि प्रोर्णुवन्ति इति अत्र प्राप्नोति .
(प्_6,4.87) क_इइइ,22-211.14 रो_इव्,751-752 {18।33} असंयोगपूर्वस्य इति वर्तते .
(प्_6,4.87) क_इइइ,22-211.14 रो_इव्,751-752 {19।33} यङ्लुगर्थम् तर्हि हुश्नुग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_6,4.87) क_इइइ,22-211.14 रो_इव्,751-752 {20।33} यङ्लुगन्तम् अनेकाच् असंयोगपूर्वम् उवर्णान्तम् अस्ति .
(प्_6,4.87) क_इइइ,22-211.14 रो_इव्,751-752 {21।33} तदर्थम् इदम् .
(प्_6,4.87) क_इइइ,22-211.14 रो_इव्,751-752 {22।33} नदम् योयुवतीनाम् .
(प्_6,4.87) क_इइइ,22-211.14 रो_इव्,751-752 {23।33} वृषभम् रोरुवतीनाम् .
(प्_6,4.87) क_इइइ,22-211.14 रो_इव्,751-752 {24।33} यङ्लुगर्थम् इति चेत् आर्धधातुकत्वात् सिद्धम् .
(प्_6,4.87) क_इइइ,22-211.14 रो_इव्,751-752 {25।33} यङ्लुगर्थम् इति चेत् तत् न .
(प्_6,4.87) क_इइइ,22-211.14 रो_इव्,751-752 {26।33} किम् कारणम् .
(प्_6,4.87) क_इइइ,22-211.14 रो_इव्,751-752 {27।33} आर्धधातुकत्वात् सिद्धम् .
(प्_6,4.87) क_इइइ,22-211.14 रो_इव्,751-752 {28।33} कथम् आर्धधातुकत्वम् .
(प्_6,4.87) क_इइइ,22-211.14 रो_इव्,751-752 {29।33} उभयथा छन्दसि इति वचनात् .
(प्_6,4.87) क_इइइ,22-211.14 रो_इव्,751-752 {30।33} अन्ये अपि हि धातुप्रत्ययाः उभयथा छन्दसि दृश्यन्ते .
(प्_6,4.87) क_इइइ,22-211.14 रो_इव्,751-752 {31।33} एवम् तर्हि सिद्धे सति यत् हुश्नुग्रहणम् करोति तत् ज्ञापयति आचार्यः यङ्लुक् भाषायाम् भवति इति .
(प्_6,4.87) क_इइइ,22-211.14 रो_इव्,751-752 {32।33} किम् एतस्य ज्ञापने प्रयोजनम् .
(प्_6,4.87) क_इइइ,22-211.14 रो_इव्,751-752 {33।33} बेभिदीति , चेच्छिदीति एतत् सिद्धम् भवति भाषायाम् अपि .
(प्_6,4.89) क_इइइ,211.16-212.8 रो_इव्,753-754 {1।28} अथ किमर्थम् गुहेः विकृतस्य ग्रहणम् क्रियते न पुनः गुहः इति एव उच्येत .
(प्_6,4.89) क_इइइ,211.16-212.8 रो_इव्,753-754 {2।28} गोहिग्रहणम् विषयार्थम् .
(प्_6,4.89) क_इइइ,211.16-212.8 रो_इव्,753-754 {3।28} गोहिग्रहणम् क्रियते विषयार्थम् .
(प्_6,4.89) क_इइइ,211.16-212.8 रो_इव्,753-754 {4।28} विषयः प्रतिनिर्दिश्यते .
(प्_6,4.89) क_इइइ,211.16-212.8 रो_इव्,753-754 {5।28} यत्र अस्य एतत् रूपम् तत्र यथा स्यात् .
(प्_6,4.89) क_इइइ,211.16-212.8 रो_इव्,753-754 {6।28} इह मा भूत् : निजुगुहतुः , निजुगुहुः इति .
(प्_6,4.89) क_इइइ,211.16-212.8 रो_इव्,753-754 {7।28} अयादेशप्रतिषेधार्थम् च .
(प्_6,4.89) क_इइइ,211.16-212.8 रो_इव्,753-754 {8।28} अयादेशप्रतिषेधार्थम् च विकृतग्रहणम् क्रियते .
(प्_6,4.89) क_इइइ,211.16-212.8 रो_इव्,753-754 {9।28} ह्रस्वादेशे हि अयादेशप्रसङ्गः ऊत्त्वस्य असिद्धत्वात् .
(प्_6,4.89) क_इइइ,211.16-212.8 रो_इव्,753-754 {10।28} ह्रस्वादेशे हि सति अयादेशः प्रसज्येत .
(प्_6,4.89) क_इइइ,211.16-212.8 रो_इव्,753-754 {11।28} प्रगूह्य गतः .
(प्_6,4.89) क_इइइ,211.16-212.8 रो_इव्,753-754 {12।28} किम् कारणम् .
(प्_6,4.89) क_इइइ,211.16-212.8 रो_इव्,753-754 {13।28} ऊत्त्वस्य असिद्धत्वात् .
(प्_6,4.89) क_इइइ,211.16-212.8 रो_इव्,753-754 {14।28} असिद्धम् ऊत्त्वम् .
(प्_6,4.89) क_इइइ,211.16-212.8 रो_इव्,753-754 {15।28} तस्य असिद्धत्वात् ल्यपि लघुपूर्वात् इति अयादेशः प्रसज्येत .
(प्_6,4.89) क_इइइ,211.16-212.8 रो_इव्,753-754 {16।28} विषयार्थेन तावत् न अर्थः गोहिग्रहणेन .
(प्_6,4.89) क_इइइ,211.16-212.8 रो_इव्,753-754 {17।28} प्रश्लिष्टनिर्देशात् सिद्धम् .
(प्_6,4.89) क_इइइ,211.16-212.8 रो_इव्,753-754 {18।28} प्रश्लिष्टनिर्देशः अयम् .
(प्_6,4.89) क_इइइ,211.16-212.8 रो_इव्,753-754 {19।28} उ-ऊत् : ऊत् इति .
(प्_6,4.89) क_इइइ,211.16-212.8 रो_इव्,753-754 {20।28} तत्र ह्रस्वस्य अवकाशः : निजुगुहतुः , निजुगुहुः .
(प्_6,4.89) क_इइइ,211.16-212.8 रो_इव्,753-754 {21।28} गुणस्य अवकाशः : निगोढा , नोगोढुम् .
(प्_6,4.89) क_इइइ,211.16-212.8 रो_इव्,753-754 {22।28} इह उभयम् प्राप्नोति : निगूहयति , निगूहकः .
(प्_6,4.89) क_इइइ,211.16-212.8 रो_इव्,753-754 {23।28} परत्वात् गुणे कृते आन्तर्यतः दीर्घस्य दीर्घः भविष्यति .
(प्_6,4.89) क_इइइ,211.16-212.8 रो_इव्,753-754 {24।28} अयादेशप्रतिषेधार्थेन अपि न अर्थः .
(प्_6,4.89) क_इइइ,211.16-212.8 रो_इव्,753-754 {25।28} समानाश्रयवचनात् सिद्धम् .
(प्_6,4.89) क_इइइ,211.16-212.8 रो_इव्,753-754 {26।28} समानाश्रयम् असिद्धम् भवति व्याश्रयम् च एतत् .
(प्_6,4.89) क_इइइ,211.16-212.8 रो_इव्,753-754 {27।28} कथम् .
(प्_6,4.89) क_इइइ,211.16-212.8 रो_इव्,753-754 {28।28} णौ ऊत्त्वम् णेः ल्यपि अयादेशः .
(प्_6,4.90) क_इइइ,212.10-15 रो_इव्,754 {1।11} अथ किमर्थम् दुषेः विकृतस्य ग्रहणम् क्रियते न पुनः दुषः इति एव उच्येत .
(प्_6,4.90) क_इइइ,212.10-15 रो_इव्,754 {2।11} दोषिग्रहणम् च .
(प्_6,4.90) क_इइइ,212.10-15 रो_इव्,754 {3।11} किम् .
(प्_6,4.90) क_इइइ,212.10-15 रो_इव्,754 {4।11} अयादेशप्रतिषेधार्थम् ह्रस्वादेशे हि अयादेशप्रसङ्गः ऊत्त्वस्य असिद्धत्वात् .
(प्_6,4.90) क_इइइ,212.10-15 रो_इव्,754 {5।11} ह्रस्वादेशे हि सति अयादेशः प्रसज्येत .
(प्_6,4.90) क_इइइ,212.10-15 रो_इव्,754 {6।11} प्रदूष्य गतः .
(प्_6,4.90) क_इइइ,212.10-15 रो_इव्,754 {7।11} किम् कारणम् .
(प्_6,4.90) क_इइइ,212.10-15 रो_इव्,754 {8।11} ऊत्त्वस्य असिद्धत्वात् .
(प्_6,4.90) क_इइइ,212.10-15 रो_इव्,754 {9।11} असिद्धम् ऊत्त्वम् .
(प्_6,4.90) क_इइइ,212.10-15 रो_इव्,754 {10।11} तस्य असिद्धत्वात् ल्यपि लघुपूर्वात् इति अयादेशः प्रसज्येत .
(प्_6,4.90) क_इइइ,212.10-15 रो_इव्,754 {11।11} अत्र अपि समानाश्रयवचनात् सिद्धम् इति एव .
(प्_6,4.93) क_इइइ,212.17-213.4 रो_इव्,754-755 {1।16} चिण्णमुलोः णिज्व्यवेतानाम् यङ्लोपे च उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_6,4.93) क_इइइ,212.17-213.4 रो_इव्,754-755 {2।16} शमयन्तम् प्रयोजितवान् , अशमि , अशामि , शमम् शमम् , शामम् शामम् .
(प्_6,4.93) क_इइइ,212.17-213.4 रो_इव्,754-755 {3।16} शंशमयतेः : अशंशमि , अशंशामि , शंशमम् शंशमम् , शंशामम् शंशामम् .
(प्_6,4.93) क_इइइ,212.17-213.4 रो_इव्,754-755 {4।16} किम् पुनः कारणम् न सिध्यति .
(प्_6,4.93) क_इइइ,212.17-213.4 रो_इव्,754-755 {5।16} चिण्णमुल्परे णौ मिताम् अङ्गानाम् दीर्घः भवति इति उच्यते .
(प्_6,4.93) क_इइइ,212.17-213.4 रो_इव्,754-755 {6।16} यः च अत्र चिण्णमुल्परः न तस्मिन् मित् अङ्गम् यस्मिन् च मित् अङ्गम् न असौ चिण्णमुल्परः इति .
(प्_6,4.93) क_इइइ,212.17-213.4 रो_इव्,754-755 {7।16} लोपे कृते चिण्णमुल्परः भवति .
(प्_6,4.93) क_इइइ,212.17-213.4 रो_इव्,754-755 {8।16} स्थानिवद्भावात् न चिण्णमुल्परः .
(प्_6,4.93) क_इइइ,212.17-213.4 रो_इव्,754-755 {9।16} ननु च प्रतिषिध्यते अत्र स्थानिवद्भावः दीर्घविधिम् प्रति न स्थानिवत् इति .
(प्_6,4.93) क_इइइ,212.17-213.4 रो_इव्,754-755 {10।16} एवम् अपि असिद्धत्वात् न प्राप्नोति .
(प्_6,4.93) क_इइइ,212.17-213.4 रो_इव्,754-755 {11।16} एवम् तर्हि चिण्णमुलोः णिज्व्यवेतानाम् यङ्लोपे च अन्तरङ्गलक्षणत्वात् सिद्धम् .
(प्_6,4.93) क_इइइ,212.17-213.4 रो_इव्,754-755 {12।16} किम् इदम् अन्तरङ्गलक्षणत्वात् इति .
(प्_6,4.93) क_इइइ,212.17-213.4 रो_इव्,754-755 {13।16} यावत् ब्रूयात् समानाश्रयवचनात् सिद्धम् इति एव व्याश्रयम् च एतत् .
(प्_6,4.93) क_इइइ,212.17-213.4 रो_इव्,754-755 {14।16} कथम् .
(प्_6,4.93) क_इइइ,212.17-213.4 रो_इव्,754-755 {15।16} णेः णौ लोपः णौ चिण्णमुल्परे मिताम् अङ्गानाम् दीर्घत्वम् उच्यते .
(प्_6,4.93) क_इइइ,212.17-213.4 रो_इव्,754-755 {16।16} तस्मात् न अर्थः उपसङ्ख्यानेन इति .
(प्_6,4.96) क_इइइ,213.6-9 रो_इव्,756 {1।8} अद्विप्रभृत्युपसर्गस्य इति वक्तव्यम् इह अपि यथा स्यात् : समुपाभिच्छादः इति .
(प्_6,4.96) क_इइइ,213.6-9 रो_इव्,756 {2।8} तत् तर्हि वक्तव्यम् .
(प्_6,4.96) क_इइइ,213.6-9 रो_इव्,756 {3।8} न वक्तव्यम् .
(प्_6,4.96) क_इइइ,213.6-9 रो_इव्,756 {4।8} यत्र त्रिप्रभृतयः सन्ति द्वौ अपि तत्र स्तः .
(प्_6,4.96) क_इइइ,213.6-9 रो_इव्,756 {5।8} तत्र अद्व्युपसर्गस्य इति एव सिद्धम् .
(प्_6,4.96) क_इइइ,213.6-9 रो_इव्,756 {6।8} न वै एषः लोके सम्प्रत्ययः .
(प्_6,4.96) क_इइइ,213.6-9 रो_इव्,756 {7।8} न हि द्विपुत्रः आनीयताम् इति उक्ते त्रिपुत्रः आनीयते .
(प्_6,4.96) क_इइइ,213.6-9 रो_इव्,756 {8।8} तस्मात् अद्विप्रभृत्युपसर्गस्य इति वक्तव्यम् .
(प्_6,4.100) क_इइइ,213.11-13 रो_इव्,756-757 {1।7} हल्ग्रहणम् अनर्थकम् अन्यत्र अपि दर्शनात् .
(प्_6,4.100) क_इइइ,213.11-13 रो_इव्,756-757 {2।7} हल्ग्रहणम् अनर्थकम् .
(प्_6,4.100) क_इइइ,213.11-13 रो_इव्,756-757 {3।7} किम् कारणम् .
(प्_6,4.100) क_इइइ,213.11-13 रो_इव्,756-757 {4।7} अन्यत्र अपि दर्शनात् .
(प्_6,4.100) क_इइइ,213.11-13 रो_इव्,756-757 {5।7} अन्यत्र अपि लोपः दृश्यते .
(प्_6,4.100) क_इइइ,213.11-13 रो_इव्,756-757 {6।7} अग्निः तृणानि बब्सति .
(प्_6,4.100) क_इइइ,213.11-13 रो_इव्,756-757 {7।7} शरावे बप्सति चरुः .
(प्_6,4.101) क_इइइ,213.15-214.7 रो_इव्,757-758 {1।29} इटः प्रतिषेधः वक्तव्यः .
(प्_6,4.101) क_इइइ,213.15-214.7 रो_इव्,757-758 {2।29} रुदिहि स्वपिहि .
(प्_6,4.101) क_इइइ,213.15-214.7 रो_इव्,757-758 {3।29} झलः इति धित्वम् प्राप्नोति .
(प्_6,4.101) क_इइइ,213.15-214.7 रो_इव्,757-758 {4।29} हेः धित्वे हलधिकारात् इटः अप्रतिषेधः .
(प्_6,4.101) क_इइइ,213.15-214.7 रो_इव्,757-758 {5।29} हेः धित्वे हलधिकारात् इटः अप्रतिषेधः .
(प्_6,4.101) क_इइइ,213.15-214.7 रो_इव्,757-758 {6।29} अनर्थकः प्रतिषेधः अप्रतिषेधः .
(प्_6,4.101) क_इइइ,213.15-214.7 रो_इव्,757-758 {7।29} धित्वम् कस्मात् न भवति .
(प्_6,4.101) क_इइइ,213.15-214.7 रो_इव्,757-758 {8।29} हलधिकारात् .
(प्_6,4.101) क_इइइ,213.15-214.7 रो_इव्,757-758 {9।29} प्रकृतम् हल्ग्रहणम् अनुवर्तते .
(प्_6,4.101) क_इइइ,213.15-214.7 रो_इव्,757-758 {10।29} क्व प्रकृतम् .
(प्_6,4.101) क_इइइ,213.15-214.7 रो_इव्,757-758 {11।29} घसिभसोः हलि इति .
(प्_6,4.101) क_इइइ,213.15-214.7 रो_इव्,757-758 {12।29} तत् वै सप्तमीनिर्दिष्टम् षष्ठीनिर्दिष्टेन च इह अर्थः .
(प्_6,4.101) क_इइइ,213.15-214.7 रो_इव्,757-758 {13।29} तत् वै तत्र प्रत्याख्यायते .
(प्_6,4.101) क_इइइ,213.15-214.7 रो_इव्,757-758 {14।29} तत्र प्रत्याख्यातम् सत् यया विभक्त्या निर्दिश्यमानम् अर्थवत्तया निर्दिष्टम् इह अनुवर्तिष्यते .
(प्_6,4.101) क_इइइ,213.15-214.7 रो_इव्,757-758 {15।29} अथ वा हुझल्भयः इति एषा पञ्चमी हलि इति सप्तम्याः षष्ठीम् प्रकल्पयिष्यति तस्मात् इति उत्तरस्य इति .
(प्_6,4.101) क_इइइ,213.15-214.7 रो_इव्,757-758 {16।29} अथ वा निर्दिश्यमानस्य आदेशाः भवन्ति इति एवम् न भविष्यति .
(प्_6,4.101) क_इइइ,213.15-214.7 रो_इव्,757-758 {17।29} यः तर्हि निर्दिश्यते तस्य कस्मात् न भवति .
(प्_6,4.101) क_इइइ,213.15-214.7 रो_इव्,757-758 {18।29} इटा व्यवहितत्वात् .
(प्_6,4.101) क_इइइ,213.15-214.7 रो_इव्,757-758 {19।29} यदि एवम् छिन्धकि भिन्धकि इति अत्र धित्वम् न प्राप्नोति .
(प्_6,4.101) क_इइइ,213.15-214.7 रो_इव्,757-758 {20।29} धित्वे कृते अकच् भविष्यति .
(प्_6,4.101) क_इइइ,213.15-214.7 रो_इव्,757-758 {21।29} इदम् इह सम्प्रधार्यम् .
(प्_6,4.101) क_इइइ,213.15-214.7 रो_इव्,757-758 {22।29} धित्वम् क्रियताम् अकच् इति किम् अत्र कर्तव्यम् .
(प्_6,4.101) क_इइइ,213.15-214.7 रो_इव्,757-758 {23।29} परत्वात् धित्वम् .
(प्_6,4.101) क_इइइ,213.15-214.7 रो_इव्,757-758 {24।29} नित्यः अकच् .
(प्_6,4.101) क_इइइ,213.15-214.7 रो_इव्,757-758 {25।29} कृते अपि धित्वे प्राप्नोति अकृते अपि .
(प्_6,4.101) क_इइइ,213.15-214.7 रो_इव्,757-758 {26।29} अकच् अपि अनित्यः .
(प्_6,4.101) क_इइइ,213.15-214.7 रो_इव्,757-758 {27।29} अन्यस्य कृते धित्वे प्राप्नोति अन्यस्य अकृते शब्दान्तरस्य च प्राप्नुवन् विधिः अनित्यः भवति .
(प्_6,4.101) क_इइइ,213.15-214.7 रो_इव्,757-758 {28।29} उभयोः अनित्ययोः परत्वात् धित्वे कृते अकच् भविष्यति .
(प्_6,4.101) क_इइइ,213.15-214.7 रो_इव्,757-758 {29।29} अथ वा हकारस्य एव अशक्तिजेन इकारेण ग्रहणम् .
(प्_6,4.104) क_इइइ,214.9-25 रो_इव्,759-760 {1।26} चिणः लुकि तग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_6,4.104) क_इइइ,214.9-25 रो_इव्,759-760 {2।26} किम् प्रयोजनम् .
(प्_6,4.104) क_इइइ,214.9-25 रो_इव्,759-760 {3।26} इह मा भूत् : अकारितराम् , अहारितराम् इति .
(प्_6,4.104) क_इइइ,214.9-25 रो_इव्,759-760 {4।26} चिणः लुकि तग्रहणानर्थक्यम् सङ्घातस्य अप्रत्ययत्वात् . चिणः लुकि तग्रहणम् अनर्थकम् .
(प्_6,4.104) क_इइइ,214.9-25 रो_इव्,759-760 {5।26} किम् कारणम् .
(प्_6,4.104) क_इइइ,214.9-25 रो_इव्,759-760 {6।26} सङ्घातस्य अप्रत्ययत्वात् .
(प्_6,4.104) क_इइइ,214.9-25 रो_इव्,759-760 {7।26} सङ्घातस्य लुक् कस्मात् न भवति .
(प्_6,4.104) क_इइइ,214.9-25 रो_इव्,759-760 {8।26} अप्रत्ययत्वात् .
(प्_6,4.104) क_इइइ,214.9-25 रो_इव्,759-760 {9।26} प्रत्ययस्य लुक्श्लुलुपः भवन्ति इति उच्यते न च सङ्घातः प्रत्ययः .
(प्_6,4.104) क_इइइ,214.9-25 रो_इव्,759-760 {10।26} तलोपे तर्हि कृते परस्य प्राप्नोति .
(प्_6,4.104) क_इइइ,214.9-25 रो_इव्,759-760 {11।26} तलोपस्य च असिद्धत्वात् .
(प्_6,4.104) क_इइइ,214.9-25 रो_इव्,759-760 {12।26} असिद्धः तलोपः .
(प्_6,4.104) क_इइइ,214.9-25 रो_इव्,759-760 {13।26} तस्य असिद्धत्वात् न भविष्यति .
(प्_6,4.104) क_इइइ,214.9-25 रो_इव्,759-760 {14।26} कार्यकृतत्वात् वा .
(प्_6,4.104) क_इइइ,214.9-25 रो_इव्,759-760 {15।26} अथ वा कृतः चिणः लुक् इति कृत्वा पुनः न भविष्यति लुक् .
(प्_6,4.104) क_इइइ,214.9-25 रो_इव्,759-760 {16।26} तत् यथा वसन्ते ब्राह्मणः अग्नीन् आदधीत इति सकृत् आधाय कृतः शास्त्रार्थः इति कृत्वा पुनः प्रवृत्तिः न भवति .
(प्_6,4.104) क_इइइ,214.9-25 रो_इव्,759-760 {17।26} विषमः उपन्यासः .
(प्_6,4.104) क_इइइ,214.9-25 रो_इव्,759-760 {18।26} युक्तम् यत् तस्य एव पुनः प्रवृत्तिः न स्यात् .
(प्_6,4.104) क_इइइ,214.9-25 रो_इव्,759-760 {19।26} यत् तु तदाश्रयम् प्राप्नोति न तत् शक्यम् बाधितुम् .
(प्_6,4.104) क_इइइ,214.9-25 रो_इव्,759-760 {20।26} तत् यथा वसन्ते ब्राह्मणः अग्निष्टोमादिभिः क्रतुभिः यजेत इति अग्न्याधाननिमित्तम् वसन्ते वसन्ते इज्यते .
(प्_6,4.104) क_इइइ,214.9-25 रो_इव्,759-760 {21।26} तस्मात् पूर्वोक्तौ एव परिहारौ .
(प्_6,4.104) क_इइइ,214.9-25 रो_इव्,759-760 {22।26} अथ वा क्ङिति इति वर्तते .
(प्_6,4.104) क_इइइ,214.9-25 रो_इव्,759-760 {23।26} क्व प्रकृतम् .
(प्_6,4.104) क_इइइ,214.9-25 रो_इव्,759-760 {24।26} गमहनजनखनघसाम् लोपः क्ङिति अनङि इति .
(प्_6,4.104) क_इइइ,214.9-25 रो_इव्,759-760 {25।26} तत् वै सप्तमीनिर्दिष्टम् षष्ठीनिर्दिष्टेन च इह अर्थः .
(प्_6,4.104) क_इइइ,214.9-25 रो_इव्,759-760 {26।26} चिणः लुक् इति एषा पञ्चमी क्ङिति इति सप्तम्याः षष्ठीम् प्रकल्पयिष्यति तस्मात् इति उत्तरस्य इति .
(प्_6,4.106.1) क_इइइ,215.2-11 रो_इव्,760-761 {1।22} कथम् इदम् विज्ञायते .
(प्_6,4.106.1) क_इइइ,215.2-11 रो_इव्,760-761 {2।22} उकारात् प्रत्ययात् इति आहोस्वित् उकारान्तात् प्रत्ययात् इति .
(प्_6,4.106.1) क_इइइ,215.2-11 रो_इव्,760-761 {3।22} किम् च अतः .
(प्_6,4.106.1) क_इइइ,215.2-11 रो_इव्,760-761 {4।22} यदि विज्ञायते उकारात् प्रत्ययात् इति सिद्धम् तनु कुरु .
(प्_6,4.106.1) क_इइइ,215.2-11 रो_इव्,760-761 {5।22} चिनु सुनु इति न सिध्यति .
(प्_6,4.106.1) क_इइइ,215.2-11 रो_इव्,760-761 {6।22} अथ विज्ञायते उकारान्तात् प्रत्ययात् इति सिद्धम् चिनु सुनु इति .
(प्_6,4.106.1) क_इइइ,215.2-11 रो_इव्,760-761 {7।22} तनु कुरु न सिध्यति .
(प्_6,4.106.1) क_इइइ,215.2-11 रो_इव्,760-761 {8।22} तथा असंयोगपूर्वग्रहणेन इह एव पर्युदासः स्यात् : तक्ष्णुहि , अक्ष्णुहि .
(प्_6,4.106.1) क_इइइ,215.2-11 रो_इव्,760-761 {9।22} आप्नुहि शक्नुहि इति अत्र न स्यात् .
(प्_6,4.106.1) क_इइइ,215.2-11 रो_इव्,760-761 {10।22} यथा इच्छसि तथा अस्तु .
(प्_6,4.106.1) क_इइइ,215.2-11 रो_इव्,760-761 {11।22} अस्तु तावत् उकारात् प्रत्ययात् इति .
(प्_6,4.106.1) क_इइइ,215.2-11 रो_इव्,760-761 {12।22} कथम् चिनु सुनु इति .
(प्_6,4.106.1) क_इइइ,215.2-11 रो_इव्,760-761 {13।22} तदन्तविधिना भविष्यति .
(प्_6,4.106.1) क_इइइ,215.2-11 रो_इव्,760-761 {14।22} अथ वा पुनः अस्तु उकारान्तात् प्रत्ययात् इति .
(प्_6,4.106.1) क_इइइ,215.2-11 रो_इव्,760-761 {15।22} कथम् तनु कुरु इति .
(प्_6,4.106.1) क_इइइ,215.2-11 रो_इव्,760-761 {16।22} व्यप्देशिवद्भावेन भविष्यति .
(प्_6,4.106.1) क_इइइ,215.2-11 रो_इव्,760-761 {17।22} यत् अपि उच्यते तथा असंयोगपूर्वग्रहणेन इह एव पर्युदासः स्यात् : तक्ष्णुहि , अक्ष्णुहि .
(प्_6,4.106.1) क_इइइ,215.2-11 रो_इव्,760-761 {18।22} आप्नुहि शक्नुहि इति अत्र न स्यात् इति .
(प्_6,4.106.1) क_इइइ,215.2-11 रो_इव्,760-761 {19।22} न अस्माभिः असंयोगपूर्वग्रहणेन उकारान्तम् विशेष्यते .
(प्_6,4.106.1) क_इइइ,215.2-11 रो_इव्,760-761 {20।22} किम् तर्हि .
(प्_6,4.106.1) क_इइइ,215.2-11 रो_इव्,760-761 {21।22} उकारः .
(प्_6,4.106.1) क_इइइ,215.2-11 रो_इव्,760-761 {22।22} उकारः यः असंयोगपूर्वः तदन्तात् प्रत्ययात् इति .
(प्_6,4.106.2) क_इइइ,215.12-17 रो_इव्,760-762 {1।9} उतः च प्रत्ययात् छन्दोवावचनम् .
(प्_6,4.106.2) क_इइइ,215.12-17 रो_इव्,760-762 {2।9} उतः च प्रत्ययात् इति अत्र छन्दसि वा इति वक्तव्यम् .
(प्_6,4.106.2) क_इइइ,215.12-17 रो_इव्,760-762 {3।9} अव स्थिर तनुहि यातुजुनाम् .
(प्_6,4.106.2) क_इइइ,215.12-17 रो_इव्,760-762 {4।9} धिनुहि यज्ञम् धिनुहि यज्ञपतिम् .
(प्_6,4.106.2) क_इइइ,215.12-17 रो_इव्,760-762 {5।9} तेन मा भागिनम् कृणुहि .
(प्_6,4.106.2) क_इइइ,215.12-17 रो_इव्,760-762 {6।9} उत्तरार्थम् च .
(प्_6,4.106.2) क_इइइ,215.12-17 रो_इव्,760-762 {7।9} के चित् तावत् आहुः छन्दोग्रहणम् कर्तव्यम् इति .
(प्_6,4.106.2) क_इइइ,215.12-17 रो_इव्,760-762 {8।9} अपरे आहुः : वावचनम् कर्तव्यम् इति .
(प्_6,4.106.2) क_इइइ,215.12-17 रो_इव्,760-762 {9।9} लोपः च अस्य अन्यरतस्याम् म्वोः इति अत्र अन्यरतस्याङ्ग्रहणम् न कर्तव्यम् भवति .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {1।75} सार्वधातुके इति किमर्थम् .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {2।75} इह मा भूत् : सञ्चस्करतुः , सञ्चस्करुः .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {3।75} स्यान्तस्य प्रतिषेधः वक्तव्यः : करिष्यति करिष्यतः .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {4।75} कृञः उत्त्वे उकारान्तनिर्देशात् स्यान्तस्य अप्रतिषेधः .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {5।75} कृञः उत्त्वे उकारान्तनिर्देशात् स्यान्तस्य अप्रतिषेधः .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {6।75} अनर्थकः प्रतिषेधः अप्रतिषेधः .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {7।75} उत्त्वम् कस्मात् न भवति .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {8।75} उकारान्तनिर्देशात् .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {9।75} अशक्यः करोतौ उकारान्तनिर्देशः तन्त्रम् आश्रयितुम् .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {10।75} इह सम्परिभ्याम् भूषणसमवाययोः क्रोतौ इह एव स्यात् : संस्करोति .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {11।75} संस्कर्ता संसक्र्तुम् इति अत्र न स्यात् .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {12।75} न ब्रूमः अस्मात् उकारान्तनिर्देशात् यः अयम् करोति इति .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {13।75} किम् तर्हि .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {14।75} उकारप्रकरणात् उकारान्तम् अङ्गम् अभिसम्बध्यते .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {15।75} उतः इति वर्तते .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {16।75} यदि एवम् न अर्थः सार्वधातुकग्रहणेन .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {17।75} कस्मात् न भवति सञ्चस्करतुः , सञ्चस्करुः इति .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {18।75} उतः इति वर्तते .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {19।75} उत्तरार्थम् तर्हि सार्वधातुकग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {20।75} श्नसोः अल्लोपः इति .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {21।75} श्नम् सार्वधातुके एव .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {22।75} अस्तेः अपि आर्धधातुके भूभावेन भवितव्यम् .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {23।75} उत्तरार्थम् एव तर्हि .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {24।75} श्नाभ्यस्तयोः आतः इति .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {25।75} श्ना सार्वधातुके एव .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {26।75} अभ्यस्तम् अपि आकारान्तम् आर्धधातुके न अस्ति .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {27।75} ननु च इदम् अस्ति : अप्सु यायावरः प्रवपेत पिण्डान् इति .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {28।75} न एतत् आकारान्तम् .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {29।75} यकारान्तम् एतत् .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {30।75} उत्तरार्थम् एव तर्हि .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {31।75} ई हलि अघोः इति .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {32।75} तत्र अपि श्नाभ्यस्तयोः इति एव .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {33।75} अतः अपि उत्तरार्थम् एव तर्हि .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {34।75} इद् दरिद्रस्य इति .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {35।75} वक्ष्यति एतत् : दरिद्रातेः आर्धधातुके लोपः सिद्धः च प्रत्ययविधौ इति .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {36।75} अतः अपि उत्तरार्थम् .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {37।75} भियः अन्यतरस्याम् .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {38।75} अभ्यस्तस्य इति एव .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {39।75} अतः अपि उत्तरार्थम् एव .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {40।75} जहातेः च .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {41।75} अभ्यस्तस्य इति एव .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {42।75} अतः अपि उत्तरार्थम् .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {43।75} आ च हौ .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {44।75} हौ इति उच्यते .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {45।75} अभ्यस्तस्य इति एव .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {46।75} अतः अपि उत्तरार्थम् .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {47।75} लोपः यि .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {48।75} अभ्यस्तस्य इति एव .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {49।75} अतः अपि उत्तरार्थम् .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {50।75} घव्सोः एत् हौ अभ्यासलोपः च इति .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {51।75} हौ इति उच्यते .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {52।75} तत् एव तर्हि प्रयोजनम् .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {53।75} श्नसोः अल्लोपः इति .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {54।75} ननु च उक्तम् श्नम् सार्वधातुके एव .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {55।75} अस्तेः अपि आर्धधातुके भूभावेन भवितव्यम् इति .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {56।75} अनुप्रयोगे तु भुवा अस्त्यबाधनम् स्मरन्ति कर्तुः वचनात् मनीषिणः .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {57।75} अनुप्रयोगे तु भुवा अस्तेः अबाधनम् इष्यते : ईहाम् आस , ईहाम् आसतुः , ईहाम् आसुः इति .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {58।75} किम् च स्यात् यदि अत्र लोपः स्यात् .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {59।75} लोपे द्विर्वचनासिद्धिः .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {60।75} लोपे कृते अनच्कत्वात् द्विर्वचनम् स्यात् .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {61।75} स्थानिवद्भादात् भविष्यति .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {62।75} स्थानिवत् इति चेत् कृते भवेत् द्वित्वे .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {63।75} कृते द्वित्वे लोपः प्राप्नोति .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {64।75} अस्ति तर्हि परस्य लोपः .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {65।75} अभ्यासस्य यः अकारः तस्य दीर्घत्वम् भविष्यति .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {66।75} न एवम् सिध्यति कस्मात् प्रत्यङ्गत्वात् भवेत् हि पररूपम् .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {67।75} न एवम् सिध्यति .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {68।75} कस्मात् .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {69।75} प्रत्यङ्गत्वात् पररूपम् प्राप्नोति .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {70।75} तस्मिन् च कृते लोपः .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {71।75} पररूपे च कृते लोपः प्राप्नोति .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {72।75} दीर्घत्वम् बाधकम् भवेत् तत्र .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {73।75} अतः आदेः इति दीर्घत्वम् बाधकम् भविष्यति .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {74।75} इदम् तर्हि प्रयोजनम् .
(प्_6,4.110) क_इइइ,215.19-217.5 रो_इव्,762-765 {75।75} सार्वधातुके भूतपूर्वमात्रे अपि यथा स्यात् : कुरु इति .
(प्_6,4.111) क_इइइ,217.7-8 रो_इव्, 765-766 {1।4} अथ अत्र तपरकरणम् किमर्थम् .
(प्_6,4.111) क_इइइ,217.7-8 रो_इव्, 765-766 {2।4} इह मा भूत् : आस्ताम् , आसन् .
(प्_6,4.111) क_इइइ,217.7-8 रो_इव्, 765-766 {3।4} न एतत् अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_6,4.111) क_इइइ,217.7-8 रो_इव्, 765-766 {4।4} आटः असिद्धत्वात् न भविष्यति .
(प्_6,4.114) क_इइइ,217.10-18 रो_इव्,766 {1।10} दरिद्रातेः आर्धधातुके लोपः .
(प्_6,4.114) क_इइइ,217.10-18 रो_इव्,766 {2।10} दरिद्रातेः आर्धधातुके लोपः वक्तव्यः .
(प्_6,4.114) क_इइइ,217.10-18 रो_इव्,766 {3।10} सिद्धः च प्रत्ययविधौ .
(प्_6,4.114) क_इइइ,217.10-18 रो_इव्,766 {4।10} सः च सिद्धः प्रत्ययविधौ .
(प्_6,4.114) क_इइइ,217.10-18 रो_इव्,766 {5।10} किम् प्रयोजनम् .
(प्_6,4.114) क_इइइ,217.10-18 रो_इव्,766 {6।10} दरिद्राति इति दरिद्रः .
(प्_6,4.114) क_इइइ,217.10-18 रो_इव्,766 {7।10} आकारान्तलक्षणः प्रत्ययविधिः मा भूत् इति . न दरिद्रायके लोपः दरिद्राणे च न इष्यते .
(प्_6,4.114) क_इइइ,217.10-18 रो_इव्,766 {8।10} दिदरिद्रासस्ति इति एके दिदरिद्रिषति इति वा .
(प्_6,4.114) क_इइइ,217.10-18 रो_इव्,766 {9।10} वा अद्यतन्याम् . अद्यतन्याम् वा इति वक्तव्यम् .
(प्_6,4.114) क_इइइ,217.10-18 रो_इव्,766 {10।10} अदरिद्रीत् , अदरिद्रासीत् .
(प्_6,4.120.1) क_इइइ,217.20-218.20 रो_इव्,767-768 {1।36} णकारषकारादेशादेः एत्त्ववचनम् लिटि .
(प्_6,4.120.1) क_इइइ,217.20-218.20 रो_इव्,767-768 {2।36} णकारषकारादेशादेः एत्त्वम् लिटि वक्तव्यम् .
(प्_6,4.120.1) क_इइइ,217.20-218.20 रो_इव्,767-768 {3।36} नेमतुः , नेमुः , सेहे, सेहाते , सेहिरे .
(प्_6,4.120.1) क_इइइ,217.20-218.20 रो_इव्,767-768 {4।36} किम् पुनः कारणम् न सिध्यति .
(प्_6,4.120.1) क_इइइ,217.20-218.20 रो_इव्,767-768 {5।36} अनादेशादेः इति ल्प्रतिषेधः प्राप्नोति .
(प्_6,4.120.1) क_इइइ,217.20-218.20 रो_इव्,767-768 {6।36} तत् तर्हि वक्तव्यम् .
(प्_6,4.120.1) क_इइइ,217.20-218.20 रो_इव्,767-768 {7।36} न वक्तव्यम् .
(प्_6,4.120.1) क_इइइ,217.20-218.20 रो_इव्,767-768 {8।36} लिटा अत्र आदेशादिम् विशेषयिष्यामः .
(प्_6,4.120.1) क_इइइ,217.20-218.20 रो_इव्,767-768 {9।36} लिटि यः आदेशादिः तदादेः न इति .
(प्_6,4.120.1) क_इइइ,217.20-218.20 रो_इव्,767-768 {10।36} अस्ति अन्यत् लिड्ग्रहणस्य प्रयोजनम् .
(प्_6,4.120.1) क_इइइ,217.20-218.20 रो_इव्,767-768 {11।36} किम् .
(प्_6,4.120.1) क_इइइ,217.20-218.20 रो_इव्,767-768 {12।36} इह मा भूत् : पक्ता पक्तुम् .
(प्_6,4.120.1) क_इइइ,217.20-218.20 रो_इव्,767-768 {13।36} न एतत् अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_6,4.120.1) क_इइइ,217.20-218.20 रो_इव्,767-768 {14।36} क्ङिति इति वर्तते .
(प्_6,4.120.1) क_इइइ,217.20-218.20 रो_इव्,767-768 {15।36} एवम् अपि पक्वः पक्ववान् इति अत्र प्राप्नोति .
(प्_6,4.120.1) क_इइइ,217.20-218.20 रो_इव्,767-768 {16।36} अभ्यासलोपसन्नियोगेन एत्त्वम् उच्यते न च अत्र अभ्यासलोपसम् पश्यामः .
(प्_6,4.120.1) क_इइइ,217.20-218.20 रो_इव्,767-768 {17।36} एवम् अपि पापच्यते अत्र प्राप्नोति .
(प्_6,4.120.1) क_इइइ,217.20-218.20 रो_इव्,767-768 {18।36} दीर्घत्वम् अत्र बाधकम् भविष्यति .
(प्_6,4.120.1) क_इइइ,217.20-218.20 रो_इव्,767-768 {19।36} न अप्राप्ते अभ्यासविकारे एत्तम् अरभ्यते .
(प्_6,4.120.1) क_इइइ,217.20-218.20 रो_इव्,767-768 {20।36} तत् यथ अन्यान् अभ्यासविकारान् बाधते एवम् दीर्घत्वम् अपि बाधेत .
(प्_6,4.120.1) क_इइइ,217.20-218.20 रो_इव्,767-768 {21।36} सत्यम् एवम् एतत् .
(प्_6,4.120.1) क_इइइ,217.20-218.20 रो_इव्,767-768 {22।36} अभ्यासविकारेषु तु ज्येष्ठमध्यमकनीयांसः प्रकाराः भवन्ति .
(प्_6,4.120.1) क_इइइ,217.20-218.20 रो_इव्,767-768 {23।36} तत्र ह्रस्वहलादिशेषौ उत्सर्गौ .
(प्_6,4.120.1) क_इइइ,217.20-218.20 रो_इव्,767-768 {24।36} तयोः दीर्घत्वम् अपवादः एत्त्वम् च .
(प्_6,4.120.1) क_इइइ,217.20-218.20 रो_इव्,767-768 {25।36} अपवादविप्रतिषेधात् दीर्घत्वम् भविष्यति .
(प्_6,4.120.1) क_इइइ,217.20-218.20 रो_इव्,767-768 {26।36} इह तर्हि बभणतुः , बभणुः इति अभ्यासादेशस्य असिद्धत्वात् एत्त्वम् प्राप्नोति .
(प्_6,4.120.1) क_इइइ,217.20-218.20 रो_इव्,767-768 {27।36} फलिभजिग्रहणम् तु ज्ञापकम् अभ्यासादेशसिद्धत्वस्य .
(प्_6,4.120.1) क_इइइ,217.20-218.20 रो_इव्,767-768 {28।36} यत् अयम् फलिभज्योः ग्रहणम् करोति तत् ज्ञापयति आचार्यः सिद्धः अभ्यासादेशः एत्त्वे इति .
(प्_6,4.120.1) क_इइइ,217.20-218.20 रो_इव्,767-768 {29।36} यदि एवम् प्रथमतृतीयादीनाम् आदेशादित्वात् एत्त्वाभावः .
(प्_6,4.120.1) क_इइइ,217.20-218.20 रो_इव्,767-768 {30।36} प्रथमतृतीयादीनाम् तर्हि आदेशादित्वात् एत्त्वम् न प्राप्नोति .
(प्_6,4.120.1) क_इइइ,217.20-218.20 रो_इव्,767-768 {31।36} पेचतुः , पेचुः , देभतुः , देभुः .
(प्_6,4.120.1) क_इइइ,217.20-218.20 रो_इव्,767-768 {32।36} न वा शसिदद्योः प्रतिषेधः ज्ञापकः रूपाभेदे एत्त्वविज्ञानस्य .
(प्_6,4.120.1) क_इइइ,217.20-218.20 रो_इव्,767-768 {33।36} न वा एषः दोषः .
(प्_6,4.120.1) क_इइइ,217.20-218.20 रो_इव्,767-768 {34।36} किम् कारणम् .
(प्_6,4.120.1) क_इइइ,217.20-218.20 रो_इव्,767-768 {35।36} शसिदद्योः प्रतिषेधः ज्ञापकः रूपाभेदे एत्त्वविज्ञानस्य .
(प्_6,4.120.1) क_इइइ,217.20-218.20 रो_इव्,767-768 {36।36} यत् अयम् शसिदद्योः प्रतिषेधम् शास्ति तत् ज्ञापयति आचार्यः रूपाभेदेन यः आदेशादयः न तेषाम् प्रतिषेधः इति .
(प्_6,4.120.2) क_इइइ,218.21-219.7 रो_इव्,768-769 {1।16} दम्भः एत्त्वम् .
(प्_6,4.120.2) क_इइइ,218.21-219.7 रो_इव्,768-769 {2।16} दम्भः एत्त्वम् वक्तव्यम् .
(प्_6,4.120.2) क_इइइ,218.21-219.7 रो_इव्,768-769 {3।16} देभतुः , देभुः .
(प्_6,4.120.2) क_इइइ,218.21-219.7 रो_इव्,768-769 {4।16} किम् पुनः कारणम् न सिध्यति .
(प्_6,4.120.2) क_इइइ,218.21-219.7 रो_इव्,768-769 {5।16} नलोपस्य असिद्धत्वात् . असिद्धः नलोपः .
(प्_6,4.120.2) क_इइइ,218.21-219.7 रो_इव्,768-769 {6।16} तस्य असिद्धत्वात् एत्त्वम् न प्राप्नोति .
(प्_6,4.120.2) क_इइइ,218.21-219.7 रो_इव्,768-769 {7।16} नशिमन्योः अलिटि एत्त्वम् .
(प्_6,4.120.2) क_इइइ,218.21-219.7 रो_इव्,768-769 {8।16} नशिमन्योः अलिटि एत्त्वम् वक्तव्यम् .
(प्_6,4.120.2) क_इइइ,218.21-219.7 रो_इव्,768-769 {9।16} छन्दसि अमिपच्योः अपि .
(प्_6,4.120.2) क_इइइ,218.21-219.7 रो_इव्,768-769 {10।16} छन्दसि अमिपच्योः अपि इति वक्तव्यम् .
(प्_6,4.120.2) क_इइइ,218.21-219.7 रो_इव्,768-769 {11।16} किम् प्रयोजनम् .
(प्_6,4.120.2) क_इइइ,218.21-219.7 रो_इव्,768-769 {12।16} अनेशम् मेनका इति एतत् व्येमानम् लिङि पेचिरन् .
(प्_6,4.120.2) क_इइइ,218.21-219.7 रो_इव्,768-769 {13।16} यज् आयेजे वप् आवेपे दम्भः एत्त्वम् अलक्षणम् .
(प्_6,4.120.2) क_इइइ,218.21-219.7 रो_इव्,768-769 {14।16} असिद्धत्वात् नलोपस्य दम्भः एत्त्वम् न सिध्यति .
(प्_6,4.120.2) क_इइइ,218.21-219.7 रो_इव्,768-769 {15।16} श्नसोः अत्त्वे तकारेण ज्ञाप्यते तु एत्त्वशासनम् .
(प्_6,4.120.2) क_इइइ,218.21-219.7 रो_इव्,768-769 {16।16} अनित्यः अयम् विधिः इति .
(प्_6,4.121) क_इइइ,219.9-19 रो_इव्,770-771 {1।22} थल्ग्रहणम् किमर्थम् .
(प्_6,4.121) क_इइइ,219.9-19 रो_इव्,770-771 {2।22} थल्ग्रहणम् अक्ङिदर्थम् .
(प्_6,4.121) क_इइइ,219.9-19 रो_इव्,770-771 {3।22} थल्ग्रहणम् क्रियते अक्ङिदर्थम् .
(प्_6,4.121) क_इइइ,219.9-19 रो_इव्,770-771 {4।22} अक्ङिति एत्त्वम् यथा स्यात् .
(प्_6,4.121) क_इइइ,219.9-19 रो_इव्,770-771 {5।22} पेचिथ शेकिथ .
(प्_6,4.121) क_इइइ,219.9-19 रो_इव्,770-771 {6।22} न एतत् अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_6,4.121) क_इइइ,219.9-19 रो_इव्,770-771 {7।22} सेड्ग्रहणम् एवे अत्र अक्ङिदर्थम् भविष्यति .
(प्_6,4.121) क_इइइ,219.9-19 रो_इव्,770-771 {8।22} इदम् तर्हि प्रयोजनम् .
(प्_6,4.121) क_इइइ,219.9-19 रो_इव्,770-771 {9।22} समुच्चयः यथा विज्ञायेत .
(प्_6,4.121) क_इइइ,219.9-19 रो_इव्,770-771 {10।22} थलि च सेटि क्ङिति च सेटि इति .
(प्_6,4.121) क_इइइ,219.9-19 रो_इव्,770-771 {11।22} किम् प्रयोजनम् .
(प्_6,4.121) क_इइइ,219.9-19 रो_इव्,770-771 {12।22} पेचिव पेचिम. तत्र पचादिभ्यः इड्वचनम् इति वक्ष्यति .
(प्_6,4.121) क_इइइ,219.9-19 रो_इव्,770-771 {13।22} तत् न वक्तव्यम् भवति .
(प्_6,4.121) क_इइइ,219.9-19 रो_इव्,770-771 {14।22} इह कस्मात् न भवति : लुलविथ .
(प्_6,4.121) क_इइइ,219.9-19 रो_इव्,770-771 {15।22} गुणस्य प्रतिषेधात् .
(प्_6,4.121) क_इइइ,219.9-19 रो_इव्,770-771 {16।22} इह अपि तर्हि न प्राप्नोति : पेचिथ शेकिथ .
(प्_6,4.121) क_इइइ,219.9-19 रो_इव्,770-771 {17।22} गुणस्य यः अकारः इति एवम् एतत् विज्ञास्यते .
(प्_6,4.121) क_इइइ,219.9-19 रो_इव्,770-771 {18।22} एवम् अपि शशरिथ , अत्र प्राप्नोति .
(प्_6,4.121) क_इइइ,219.9-19 रो_इव्,770-771 {19।22} गुणस्य एषः अकारः .
(प्_6,4.121) क_इइइ,219.9-19 रो_इव्,770-771 {20।22} कथम् .
(प्_6,4.121) क_इइइ,219.9-19 रो_इव्,770-771 {21।22} वृद्धिः भवति गुणः भवति इति रेफशिराः गुणवृद्धिसञ्ज्ञकः अभिनिर्वर्तते .
(प्_6,4.121) क_इइइ,219.9-19 रो_इव्,770-771 {22।22} अथ वा आचार्यप्रवृत्तिः ज्ञापयति ने एवञ्जातीयकानाम् एत्त्वम् भवति इति यत् अयम् तॄफलभजत्रपः च इति तॄग्रहणम् करोति .
(प्_6,4.123) क_इइइ,219.21-220.8 रो_इव्,771-772 {1।21} राधादिषु स्थानिनिर्देशः .
(प्_6,4.123) क_इइइ,219.21-220.8 रो_इव्,771-772 {2।21} राधादिषु स्थानिनिर्देशः कर्तव्यः .
(प्_6,4.123) क_इइइ,219.21-220.8 रो_इव्,771-772 {3।21} न कर्तव्यः .
(प्_6,4.123) क_इइइ,219.21-220.8 रो_इव्,771-772 {4।21} एकहल्मध्ये इति वर्तते .
(प्_6,4.123) क_इइइ,219.21-220.8 रो_इव्,771-772 {5।21} यदि एवम् त्रेसतुः , त्रेसुः , र शब्दस्य एत्त्वम् प्राप्नोति .
(प्_6,4.123) क_इइइ,219.21-220.8 रो_इव्,771-772 {6।21} अस्तु .
(प्_6,4.123) क_इइइ,219.21-220.8 रो_इव्,771-772 {7।21} अलः अन्त्यस्य विधयः भवन्ति इति अकारस्य भविष्यति .
(प्_6,4.123) क_इइइ,219.21-220.8 रो_इव्,771-772 {8।21} अनर्थके अलः अन्त्यविधिः न इति एवम् न प्राप्नोति .
(प्_6,4.123) क_इइइ,219.21-220.8 रो_इव्,771-772 {9।21} न एतस्याः परिभाषायाः सन्ति प्रयोजनानि .
(प्_6,4.123) क_इइइ,219.21-220.8 रो_इव्,771-772 {10।21} अथ वा अतः इति वर्तते .
(प्_6,4.123) क_इइइ,219.21-220.8 रो_इव्,771-772 {11।21} एवम् अपि राधेः न प्राप्नोति .
(प्_6,4.123) क_इइइ,219.21-220.8 रो_इव्,771-772 {12।21} आकारग्रहणम् अपि प्रकृतम् अनुवर्तते .
(प्_6,4.123) क_इइइ,219.21-220.8 रो_इव्,771-772 {13।21} क्व प्रकृतम् .
(प्_6,4.123) क_इइइ,219.21-220.8 रो_इव्,771-772 {14।21} श्नाभ्यास्तयोः आतः इति .
(प्_6,4.123) क_इइइ,219.21-220.8 रो_इव्,771-772 {15।21} अथ वा श्नसोः अल्लोपः इति अत्र तपरकरणम् प्रत्याख्यायते .
(प्_6,4.123) क_इइइ,219.21-220.8 रो_इव्,771-772 {16।21} तत् प्रकृतम् इह अनुवर्तिष्यते .
(प्_6,4.123) क_इइइ,219.21-220.8 रो_इव्,771-772 {17।21} यदि तत् अनुवर्तते अतः एकहल्मध्ये अनादेशादेः लिटि अस्य च इति अवर्णमात्रस्य एत्त्वम् प्राप्नोति .
(प्_6,4.123) क_इइइ,219.21-220.8 रो_इव्,771-772 {18।21} बबाधे .
(प्_6,4.123) क_इइइ,219.21-220.8 रो_इव्,771-772 {19।21} अकारेण तपरेण अवर्णम् विशेषयिष्यामः .
(प्_6,4.123) क_इइइ,219.21-220.8 रो_इव्,771-772 {20।21} अस्य आतः इति .
(प्_6,4.123) क_इइइ,219.21-220.8 रो_इव्,771-772 {21।21} इह इदानीम् अस्य इति अनुवर्तते अतः इति निवृत्तम् .
(प्_6,4.127-128) क_इइइ,220.11-18 रो_इव्,772-773 {1।11} अर्वणस् तृ मघोनः च न शिष्यम् छान्दसम् हि तत् .
(प्_6,4.127-128) क_इइइ,220.11-18 रो_इव्,772-773 {2।11} अर्वणस् तृ मघोनः च न शिष्यम् .
(प्_6,4.127-128) क_इइइ,220.11-18 रो_इव्,772-773 {3।11} किम् कारणम् .
(प्_6,4.127-128) क_इइइ,220.11-18 रो_इव्,772-773 {4।11} छान्दसम् हि तत् .
(प्_6,4.127-128) क_इइइ,220.11-18 रो_इव्,772-773 {5।11} दृष्टानुविधिः छन्दसि भवति .
(प्_6,4.127-128) क_इइइ,220.11-18 रो_इव्,772-773 {6।11} मतुब्वन्योः विधानात् च .
(प्_6,4.127-128) क_इइइ,220.11-18 रो_इव्,772-773 {7।11} मतुब्वनी खलु अपि छन्दसि विधीयेते .
(प्_6,4.127-128) क_इइइ,220.11-18 रो_इव्,772-773 {8।11} छन्दसि उभयदर्शनात् .
(प्_6,4.127-128) क_इइइ,220.11-18 रो_इव्,772-773 {9।11} उभयम् खलु अपि छन्दसि दृश्यते .
(प्_6,4.127-128) क_इइइ,220.11-18 रो_इव्,772-773 {10।11} इमानि अर्वणः पदानि .
(प्_6,4.127-128) क_इइइ,220.11-18 रो_इव्,772-773 {11।11} अनर्वणम् वृषभम् मन्द्रजिह्वम् .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {1।74} पादः उपधाह्रस्वत्वम् .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {2।74} पादः उपधाह्रस्वत्वम् वक्तव्यम् .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {3।74} द्विपदः पश्य .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {4।74} आदेशे हि सर्वादेशप्रसङ्गः .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {5।74} आदेशे हि सति सर्वादेशः प्रसज्येत .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {6।74} सर्वस्य द्विपाच्छब्दस्य त्रिपाच्छब्दस्य च पच्छब्दादेशः प्रसज्येत येन विधिः तदन्तस्य इति .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {7।74} तत् तर्हि वक्तव्यम् .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {8।74} न वा निर्दिश्यमानस्य आदेशत्वात् .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {9।74} न वा वक्तव्यम् .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {10।74} किम् कारणम् .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {11।74} निर्दिश्यमानस्य आदेशाः भवन्ति इति एषा परिभाषा कर्तव्या .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {12।74} कः पुनः अत्र विशेषः एषा वा परिभाषा क्रियेत उपधाह्रस्वत्वम् वा उच्येत .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {13।74} अवश्यम् एषा परिभाषा कर्तव्या .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {14।74} बहूनि एतस्याः परिभाषायाः प्रयोजनानि कानि .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {15।74} प्रयोजनम् सुप्तिङादेशे .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {16।74} सुप् .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {17।74} कुमार्याम् , कोशोर्याम् , खट्वायाम् , मालायाम् , तस्याम् , यस्याम् .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {18।74} आड्याट्स्याट्सु कृतेषु साड्याट्स्याट्कस्य आम् प्राप्नोति .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {19।74} निर्दिश्यमानस्य आदेशाः भवन्ति इति न दोषः भवति .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {20।74} इदम् इह सम्प्रधार्यम् .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {21।74} आड्याट्स्याटः क्रियन्ताम् आम् इति किम् अत्र कर्तव्यम् .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {22।74} परत्वात् आम् .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {23।74} नित्याः आड्याट्स्याटः .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {24।74} कृते अपि आमि प्रप्नुवन्ति अकृते अपि .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {25।74} अनित्याः आड्याट्स्याटः .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {26।74} अन्यस्य कृते आमि प्रप्नुवन्ति अन्यस्य अकृते शब्दान्तरस्य च प्राप्नुवन्तः अनित्याः भवन्ति .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {27।74} उभयोः अनित्ययोः परत्वात् आम् .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {28।74} इदम् तर्हि .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {29।74} तस्यै यस्यै .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {30।74} स्याटि कृते सस्याट्कस्य स्मैभावः प्राप्नोति .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {31।74} निर्दिश्यमानस्य आदेशाः भवन्ति इति न दोषः भवति .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {32।74} यः तर्हि निर्दिश्यते तस्य कस्मात् न भवति .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {33।74} स्याटा व्यवहितत्वात् .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {34।74} सुप् .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {35।74} तिङ्. अरुदिताम् अरुदितम् अरुदित इति .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {36।74} इटि कृते सेट्कस्य ताम्तम्तामादेशाः प्राप्नुवन्ति .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {37।74} निर्दिश्यमानस्य आदेशाः भवन्ति इति न दोषः भवति .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {38।74} इदम् इह सम्प्रधार्यम् .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {39।74} इट् क्रियताम् ताम्तम्तामः इति किम् अत्र कर्तव्यम् .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {40।74} परत्वात् इडागमः .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {41।74} अन्तरङ्गाः ताम्तम्तामः .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {42।74} इदम् तर्हि क्रियास्ताम् , क्रियास्तम् , क्रियास्त .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {43।74} यासुटि कृते सयासुट्कस्य ताम्तम्तामादेशाः प्राप्नुवन्ति .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {44।74} निर्दिश्यमानस्य आदेशाः भवन्ति इति न दोषः भवति .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {45।74} ल्यब्भावे च .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {46।74} ल्यब्भावे च प्रयोजनम् .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {47।74} प्रकृत्य प्रहृत्य .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {48।74} क्त्वान्तस्य ल्यप् प्राप्नोति .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {49।74} निर्दिश्यमानस्य आदेशाः भवन्ति इति न दोषः भवति .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {50।74} त्रिचतुर्युष्मदस्मत्त्यदादिविकारेषु च .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {51।74} त्रिचतुर्युष्मदस्मत्त्यदादिविकारेषु च प्रयोजनम् .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {52।74} अतितिस्रः , अतिचतस्रः .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {53।74} त्रिचतुरन्तस्य तिसृचतसृभावः प्राप्नोति .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {54।74} निर्दिश्यमानस्य आदेशाः भवन्ति इति न दोषः भवति .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {55।74} युष्मत् , अस्मत् .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {56।74} अतियूयम् अतिवयम् .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {57।74} युष्मदस्मदन्तस्य यूयवयौ प्राप्नुतः .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {58।74} निर्दिश्यमानस्य आदेशाः भवन्ति इति न दोषः भवति .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {59।74} त्यदादिविकार .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {60।74} अतिस्यः , उत्तमस्यः , अत्यसौ , उत्तमासौ .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {61।74} त्यदाद्यन्तस्य त्यदादिविकाराः प्राप्नुवन्ति .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {62।74} किमन्तस्य कादेशः प्राप्नोति .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {63।74} अतिकः , परमकः .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {64।74} निर्दिश्यमानस्य आदेशाः भवन्ति इति न दोषः भवति .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {65।74} उदः पूर्वत्वे .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {66।74} उदः पूर्वत्वे प्रयोजनम् .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {67।74} उदस्थाताम् .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {68।74} अटि कृते साट्कस्य पूर्वसवर्णः प्राप्नोति उदः स्थास्तम्भोः इति .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {69।74} निर्दिश्यमानस्य आदेशाः भवन्ति इति न दोषः भवति .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {70।74} यः तर्हि निर्दिश्यते तस्य कस्मात् न भवति .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {71।74} अटा व्यवहितत्वात् .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {72।74} सा तर्हि परिभाषा कर्तव्या .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {73।74} न कर्तव्या .
(प्_6,4.130) क_इइइ,221.2-222.17 रो_इव्,773-777 {74।74} उक्तम् षष्ठी स्थानेयोगा इति एतस्य योगस्य वचने प्रयोजनम् षष्ठ्यन्तम् स्थानेन यथा युज्येत यतः षष्ठी उच्चारिता इति .
(प्_6,4.132) क_इइइ,22219-223.7 रो_इव्,777-778 {1।18} ऊट् आदिः कास्मात् न भवति .
(प्_6,4.132) क_इइइ,22219-223.7 रो_इव्,777-778 {2।18} आदिः टित् भवति इति आदिः प्राप्नोति .
(प्_6,4.132) क_इइइ,22219-223.7 रो_इव्,777-778 {3।18} सम्प्रसारणम् इति अनेन यणः स्थानम् ह्रियते .
(प्_6,4.132) क_इइइ,22219-223.7 रो_इव्,777-778 {4।18} यदि एवम् वाहः ऊड्वचनानर्थक्यम् सम्प्रसारणेन कृतत्वात् .
(प्_6,4.132) क_इइइ,22219-223.7 रो_इव्,777-778 {5।18} वाहः ऊड्वचनम् अनर्थकम् .
(प्_6,4.132) क_इइइ,22219-223.7 रो_इव्,777-778 {6।18} किम् कारणम् .
(प्_6,4.132) क_इइइ,22219-223.7 रो_इव्,777-778 {7।18} सम्प्रसारणेन कृतत्वात् .
(प्_6,4.132) क_इइइ,22219-223.7 रो_इव्,777-778 {8।18} सम्प्रसारणेन एव सिद्धम् .
(प्_6,4.132) क_इइइ,22219-223.7 रो_इव्,777-778 {9।18} का रूपसिद्धिः .
(प्_6,4.132) क_इइइ,22219-223.7 रो_इव्,777-778 {10।18} प्रष्ठौहः पश्य .
(प्_6,4.132) क_इइइ,22219-223.7 रो_इव्,777-778 {11।18} गुणः प्रत्ययलक्षणत्वात् .
(प्_6,4.132) क_इइइ,22219-223.7 रो_इव्,777-778 {12।18} प्रत्ययलक्षणेन गुणः भविष्यति .
(प्_6,4.132) क_इइइ,22219-223.7 रो_इव्,777-778 {13।18} एज्ग्रहणात् वृद्धिः .
(प्_6,4.132) क_इइइ,22219-223.7 रो_इव्,777-778 {14।18} एज्ग्रहणात् वृद्धिः भविष्यति .
(प्_6,4.132) क_इइइ,22219-223.7 रो_इव्,777-778 {15।18} एवम् तर्हि सिद्धे सति यत् वाहः ऊठम् शास्ति शास्ति तत् ज्ञापयति आचार्यः भवति एषा परिभाषा असिद्धम् बहिरङ्गलक्षणम् अन्तरङ्गलक्षणे इति .
(प्_6,4.132) क_इइइ,22219-223.7 रो_इव्,777-778 {16।18} किम् एतस्य ज्ञापने प्रयोजनम् .
(प्_6,4.132) क_इइइ,22219-223.7 रो_इव्,777-778 {17।18} पचाव इदम् , पचाम इदम् .
(प्_6,4.132) क_इइइ,22219-223.7 रो_इव्,777-778 {18।18} असिद्धत्वात् बहिरङ्गलक्षणस्य आत् गुणस्य अन्तरङ्गलक्षणम् ऐत्त्वम् न भवति इति .
(प्_6,4.133) क_इइइ,223.9-20 रो_इव्,778-779 {1।21} श्वादीनाम् प्रसारणे नकारान्तग्रहणम् अनकारान्तप्रतिषेधार्थम् .
(प्_6,4.133) क_इइइ,223.9-20 रो_इव्,778-779 {2।21} श्वादीनाम् प्रसारणे नकारान्तग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_6,4.133) क_इइइ,223.9-20 रो_इव्,778-779 {3।21} किम् प्रयोजनम् .
(प्_6,4.133) क_इइइ,223.9-20 रो_इव्,778-779 {4।21} अनकारान्तप्रतिषेधार्थम् .
(प्_6,4.133) क_इइइ,223.9-20 रो_इव्,778-779 {5।21} अनकारान्तस्य मा भूत् .
(प्_6,4.133) क_इइइ,223.9-20 रो_इव्,778-779 {6।21} मभवा मघवते .
(प्_6,4.133) क_इइइ,223.9-20 रो_इव्,778-779 {7।21} तथा प्रातिपदिकग्रहणे लिङ्गविशिष्टस्य अपि ग्रहणम् भवति इति यथा इह भवति , यूनः पश्ये इति एवम् युवतीः ल्पश्य इति अत्र अपि स्यात् इति .
(प्_6,4.133) क_इइइ,223.9-20 रो_इव्,778-779 {8।21} यत् तावत् उच्यते नकारान्तग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_6,4.133) क_इइइ,223.9-20 रो_इव्,778-779 {9।21} न कर्तव्यम् .
(प्_6,4.133) क_इइइ,223.9-20 रो_इव्,778-779 {10।21} उक्तम् वा .
(प्_6,4.133) क_इइइ,223.9-20 रो_इव्,778-779 {11।21} किम् उक्तम् .
(प्_6,4.133) क_इइइ,223.9-20 रो_इव्,778-779 {12।21} अर्वणस् तृ मघोनः च न शिष्यम् छान्दसम् हि तत् इति .
(प्_6,4.133) क_इइइ,223.9-20 रो_इव्,778-779 {13।21} यत् अपि उच्यते प्रातिपदिकग्रहणे लिङ्गविशिष्टस्य अपि ग्रहणम् भवति इति यथा इह भवति , यूनः पश्ये इति एवम् युवतीः ल्पश्य इति अत्र अपि स्यात् इति लिङ्गविशिष्टग्रहणे च उक्तम् .
(प्_6,4.133) क_इइइ,223.9-20 रो_इव्,778-779 {14।21} किम् उक्तम् .
(प्_6,4.133) क_इइइ,223.9-20 रो_इव्,778-779 {15।21} न वा विभक्तौ लिङ्गविशिष्टाग्रहणात् इति .
(प्_6,4.133) क_इइइ,223.9-20 रो_इव्,778-779 {16।21} अथ वा उपरिष्टात् योगविभागः करिष्यते .
(प्_6,4.133) क_इइइ,223.9-20 रो_इव्,778-779 {17।21} श्वयुवमघोनाम् अतद्धिते .
(प्_6,4.133) क_इइइ,223.9-20 रो_इव्,778-779 {18।21} ततः अल्लोपः .
(प्_6,4.133) क_इइइ,223.9-20 रो_इव्,778-779 {19।21} अकारस्य च लोपः भवति .
(प्_6,4.133) क_इइइ,223.9-20 रो_इव्,778-779 {20।21} ततः अनः .
(प्_6,4.133) क_इइइ,223.9-20 रो_इव्,778-779 {21।21} अनः इति उभयोः शेषः .
(प्_6,4.135) क_इइइ,223.22-224.12 रो_इव्,780-781 {1।15} अथ किम् इदम् षपूर्वादीनाम् पुनर्वचनम् अल्लोपार्थम् आहोस्वित् नियमार्थम् .
(प्_6,4.135) क_इइइ,223.22-224.12 रो_इव्,780-781 {2।15} कथ च अल्लोपार्थम् स्यात् कथम् वा नियमार्थम् .
(प्_6,4.135) क_इइइ,223.22-224.12 रो_इव्,780-781 {3।15} यदि अविशेषेण अल्लोपटिलोपयोः सः प्रकृतिभावः ततः अल्लोपार्थम् .
(प्_6,4.135) क_इइइ,223.22-224.12 रो_इव्,780-781 {4।15} अथ हि अणि टिलोपस्य एव प्रकृतिभावः ततः नियमार्थम् .
(प्_6,4.135) क_इइइ,223.22-224.12 रो_इव्,780-781 {5।15} षपूर्वादीनाम् पुनर्वचनम् अल्लोपार्थम् .
(प्_6,4.135) क_इइइ,223.22-224.12 रो_इव्,780-781 {6।15} षपूर्वादीनाम् पुनर्वचनम् क्रियते अल्लोपार्थम् .
(प्_6,4.135) क_इइइ,223.22-224.12 रो_इव्,780-781 {7।15} अविशेषेण अल्लोपटिलोपयोः सः प्रकृतिभावः .
(प्_6,4.135) क_इइइ,223.22-224.12 रो_इव्,780-781 {8।15} अवधारणे हि अन्यत्र प्रकृतिभावे उपधालोपप्रसङ्गः . अवधारणे हि सति अन्यत्र प्रकृतिभावे उपधालोपः प्रसज्येत .
(प्_6,4.135) क_इइइ,223.22-224.12 रो_इव्,780-781 {9।15} कथम् .
(प्_6,4.135) क_इइइ,223.22-224.12 रो_इव्,780-781 {10।15} यदि तावत् एवम् नियमः स्यात् षपूर्वादीनाम् एव अणि इति भवेत् इह नियमात् न स्यात् सामनः , वैमनः इति .
(प्_6,4.135) क_इइइ,223.22-224.12 रो_इव्,780-781 {11।15} ताक्षण्यः इति प्राप्नोति .
(प्_6,4.135) क_इइइ,223.22-224.12 रो_इव्,780-781 {12।15} अथ अपि एवम् नियमः स्यात् षपूर्वादीनाम् अणि एव इति एवम् अपि भवेत् इह नियमात् न स्यात् ताक्षण्यः इति , सामनः , वैमनः इति तु प्राप्नोति .
(प्_6,4.135) क_इइइ,223.22-224.12 रो_इव्,780-781 {13।15} अथ अपि उभयतः नियमः स्यात् षपूर्वादीनाम् एव अणि , अणि एव षपूर्वादीनाम् इति एवम् अपि सामन्यः , वेमन्यः इति प्राप्नोति .
(प्_6,4.135) क_इइइ,223.22-224.12 रो_इव्,780-781 {14।15} तस्मात् सुष्थु उच्यते षपूर्वादीनाम् पुनर्वचनम् अल्लोपार्थम् .
(प्_6,4.135) क_इइइ,223.22-224.12 रो_इव्,780-781 {15।15} अवधारणे हि अन्यत्र प्रकृतिभावे उपधालोपप्रसङ्गः इति .
(प्_6,4.140) क_इइइ,224.14-21 रो_इव्,781 {1।17} आतः अनापः .
(प्_6,4.140) क_इइइ,224.14-21 रो_इव्,781 {2।17} आतः अनापः इति वक्तव्यम् .
(प्_6,4.140) क_इइइ,224.14-21 रो_इव्,781 {3।17} इह अपि यथा स्यात् : समासे अनञ्पूर्वे क्त्वः ल्यप् इति .
(प्_6,4.140) क_इइइ,224.14-21 रो_इव्,781 {4।17} अनापः इति किमर्थम् .
(प्_6,4.140) क_इइइ,224.14-21 रो_इव्,781 {5।17} खट्वायाम् , मालायाम् .
(प्_6,4.140) क_इइइ,224.14-21 रो_इव्,781 {6।17} यदि अनापः इति उच्यते कथम् क्त्वायाम् .
(प्_6,4.140) क_इइइ,224.14-21 रो_इव्,781 {7।17} निपातनात् एतत् सिद्धम् .
(प्_6,4.140) क_इइइ,224.14-21 रो_इव्,781 {8।17} किम् निपातनम् .
(प्_6,4.140) क_इइइ,224.14-21 रो_इव्,781 {9।17} क्त्वायाम् व प्रतिषेधः इति .
(प्_6,4.140) क_इइइ,224.14-21 रो_इव्,781 {10।17} यदि एवम् न अर्थः अनापः इति अनेन .
(प्_6,4.140) क_इइइ,224.14-21 रो_इव्,781 {11।17} कथम् समासे अनञ्पूर्वे क्त्वः ल्यप् इति .
(प्_6,4.140) क_इइइ,224.14-21 रो_इव्,781 {12।17} निपातनात् एतत् सिद्धम् .
(प्_6,4.140) क_इइइ,224.14-21 रो_इव्,781 {13।17} कथम् हलः श्नः शानच् हौ इति .
(प्_6,4.140) क_इइइ,224.14-21 रो_इव्,781 {14।17} एतत् अपि निपातनात् सिद्धम् .
(प्_6,4.140) क_इइइ,224.14-21 रो_इव्,781 {15।17} अथ वा योगविभागः करिष्यते .
(प्_6,4.140) क_इइइ,224.14-21 रो_इव्,781 {16।17} आतः : आकारलोपः भवति .
(प्_6,4.140) क_इइइ,224.14-21 रो_इव्,781 {17।17} ततः धातोः : धातोः च आकारस्य लोपः भवति इति .
(प्_6,4.141) क_इइइ,224.23-225.5 रो_इव्,782 {1।16} मन्त्रेषु आत्मनः प्रत्ययमात्रप्रसङ्गः .
(प्_6,4.141) क_इइइ,224.23-225.5 रो_इव्,782 {2।16} मन्त्रेषु आत्मनः प्रत्ययमात्रे लोपः प्रसङ्क्तव्यः .
(प्_6,4.141) क_इइइ,224.23-225.5 रो_इव्,782 {3।16} इह अपि यथा स्यात् : त्मन्या समञ्जन् .
(प्_6,4.141) क_इइइ,224.23-225.5 रो_इव्,782 {4।16} त्मनोः अन्तः अस्थः इति .
(प्_6,4.141) क_इइइ,224.23-225.5 रो_इव्,782 {5।16} यदि प्रत्ययमात्रे लोपः उच्यते कथम् आत्मनः एव निर्मिमीष्व इति .
(प्_6,4.141) क_इइइ,224.23-225.5 रो_इव्,782 {6।16} तस्मात् न अर्थः प्रत्ययमात्रे लोपेन .
(प्_6,4.141) क_इइइ,224.23-225.5 रो_इव्,782 {7।16} कथम् त्मन्या समञ्जन् .
(प्_6,4.141) क_इइइ,224.23-225.5 रो_इव्,782 {8।16} त्मनोः अन्तः अस्थः इति .
(प्_6,4.141) क_इइइ,224.23-225.5 रो_इव्,782 {9।16} छान्दसत्वात् सिद्धम् .
(प्_6,4.141) क_इइइ,224.23-225.5 रो_इव्,782 {10।16} छान्दसम् एतत् .
(प्_6,4.141) क_इइइ,224.23-225.5 रो_इव्,782 {11।16} दृष्टानुविधिः छन्दसि भवति .
(प्_6,4.141) क_इइइ,224.23-225.5 रो_इव्,782 {12।16} आदिग्रहणानर्थक्यम् च आकारप्रकरणात् .
(प्_6,4.141) क_इइइ,224.23-225.5 रो_इव्,782 {13।16} आदिग्रहणम् च अनर्थकम् .
(प्_6,4.141) क_इइइ,224.23-225.5 रो_इव्,782 {14।16} किम् कारणम् .
(प्_6,4.141) क_इइइ,224.23-225.5 रो_इव्,782 {15।16} आकारप्रकरणात् .
(प्_6,4.141) क_इइइ,224.23-225.5 रो_इव्,782 {16।16} आतः इति वर्तते .
(प्_6,4.142) क_इइइ,225.7-11 रो_इव्,782-783 {1।9} तिग्रहणम् किमर्थम् न विंशतेः डिति लोपः इति एव उच्येत .
(प्_6,4.142) क_इइइ,225.7-11 रो_इव्,782-783 {2।9} न एवम् शक्यम् .
(प्_6,4.142) क_इइइ,225.7-11 रो_इव्,782-783 {3।9} विंशतेः डिति लोपः इति उच्यमाने अन्त्यस्य प्रसज्येत .
(प्_6,4.142) क_इइइ,225.7-11 रो_इव्,782-783 {4।9} सिद्धः अन्त्यस्य यस्येत लोपेन .
(प्_6,4.142) क_इइइ,225.7-11 रो_इव्,782-783 {5।9} तत्र आरम्भसामर्थ्यात् तिशब्दस्य भविष्यति .
(प्_6,4.142) क_इइइ,225.7-11 रो_इव्,782-783 {6।9} कुतः नु खलु एतत् अनन्यार्थे आरम्भे तिशब्दस्य भविष्यति न पुनः अङ्गस्य इति .
(प्_6,4.142) क_इइइ,225.7-11 रो_इव्,782-783 {7।9} तस्मात् तिग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_6,4.142) क_इइइ,225.7-11 रो_इव्,782-783 {8।9} अथ क्रियमाणे अपि तिग्रहणे अन्त्यस्य कस्मात् न भवति .
(प्_6,4.142) क_इइइ,225.7-11 रो_इव्,782-783 {9।9} निर्दिश्यमानस्य आदेशाः भवन्ति इति एवम् न भविष्यति .
(प्_6,4.143) क_इइइ,225.13-16 रो_इव्,783 {1।7} अभस्य उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_6,4.143) क_इइइ,225.13-16 रो_इव्,783 {2।7} इह अपि यथा स्यात् : उपसरजः , मन्दुरजः इति .
(प्_6,4.143) क_इइइ,225.13-16 रो_इव्,783 {3।7} तत् तर्हि वक्तव्यम् .
(प्_6,4.143) क_इइइ,225.13-16 रो_इव्,783 {4।7} न वक्तव्यम् .
(प्_6,4.143) क_इइइ,225.13-16 रो_इव्,783 {5।7} कथम् उपसरजः , मन्दुरजः इति .
(प्_6,4.143) क_इइइ,225.13-16 रो_इव्,783 {6।7} डिति अभस्य अपि अनुबन्धकरणसामर्थ्यात् .
(प्_6,4.143) क_इइइ,225.13-16 रो_इव्,783 {7।7} अभस्य अपि अनुबन्धकरणसामर्थ्यात् भविष्यति .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {1।53} नकारन्तस्य टिलोपे सब्रह्मचारिपीठसर्पिकलापिकुथुमितैतिलिजाजलिलाङ्गलिशिलालिशिखण्डिसूकरस्द्मसुपर्वणाम् उपसङ्ख्यानम् .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {2।53} नकारन्तस्य टिलोपे सब्रह्मचारिन् पीठसर्पिन् कलापिन् कुथुमिन् तैतिलिन् जाजलिन् लाङ्गलिन् शिलालिन् शिखण्डिन् सूकरस्द्मन् सुपर्वन् इति एतेषाम् उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {3।53} सब्रह्मचारिन् .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {4।53} साब्रह्मचाराः .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {5।53} सब्रह्मचारिन् .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {6।53} पीठसर्पिन् .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {7।53} पैठसर्पाः .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {8।53} पीठसर्पिन् .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {9।53} कलापिन् .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {10।53} कालपाः .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {11।53} कलापिन् .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {12।53} कुथुमिन् .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {13।53} कौथुमाः .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {14।53} कुथुमिन् .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {15।53} तैतिलिन् .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {16।53} तैतिलाः .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {17।53} तैतिलिन् .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {18।53} जाजलिन् .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {19।53} जाजलाः .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {20।53} जाजलिन् .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {21।53} लाङ्गलिन् .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {22।53} लाङ्गलाः .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {23।53} लाङ्गलिन् .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {24।53} शिलालिन् .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {25।53} शैलालाः .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {26।53} शिलालिन् .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {27।53} शिखण्डिन् .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {28।53} शैखण्डाः .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {29।53} शिखण्डिन् .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {30।53} सूकरस्द्मन् .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {31।53} सौकरसद्माः .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {32।53} सूकरस्द्मन् .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {33।53} सुपर्वन् .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {34।53} सौपर्वाः .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {35।53} सुपर्वन् .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {36।53} चर्मणः कोशे .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {37।53} चर्मणः कोशे उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {38।53} चार्मः कोशः .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {39।53} आस्मनः विकारे .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {40।53} आस्मनः विकारे उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {41।53} अश्मनः विकारः आश्मः .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {42।53} शुनः सङ्कोचे .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {43।53} शौनः सङ्कोचः .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {44।53} अव्ययानाम् च . अव्ययानाम् च उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {45।53} किम् प्रयोजनम् .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {46।53} सायम्प्रतिकाद्यर्थम् . सायम्प्रातिकः पौनःपुनिकः .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {47।53} शाश्वतिके प्रतिषेधः वक्तव्यः .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {48।53} न वक्तव्यः .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {49।53} निपातनात् एतत् सिद्धम् .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {50।53} किम् निपातनम् .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {51।53} येषाम् च विरोधः शाश्वतिकः इति .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {52।53} एवम् तर्हि शाश्वते प्रतिषेधः वक्तव्यः .
(प्_6,4.144) क_इइइ,225.18-226.18 रो_इव्,783-785 {53।53} शाश्वतम् .
(प्_6,4.148.1) क_इइइ,226.20-25 रो_इव्,785-786 {1।14} इवर्णान्तस्य इति किम् उदाहरणम् .
(प्_6,4.148.1) क_इइइ,226.20-25 रो_इव्,785-786 {2।14} हे दाक्षि दाक्ष्या दाकॄयः .
(प्_6,4.148.1) क_इइइ,226.20-25 रो_इव्,785-786 {3।14} हे दाक्षि इति .
(प्_6,4.148.1) क_इइइ,226.20-25 रो_इव्,785-786 {4।14} यदि लोपः न स्यात् परस्य ह्रस्वत्वे कृते सवर्णदीर्घत्वम् प्रस्ज्येत .
(प्_6,4.148.1) क_इइइ,226.20-25 रो_इव्,785-786 {5।14} दाक्ष्या इति .
(प्_6,4.148.1) क_इइइ,226.20-25 रो_इव्,785-786 {6।14} यदि लोपः न स्यात् परस्य यणादेशे कृते पूर्वस्य श्रवणम् प्रसज्येत .
(प्_6,4.148.1) क_इइइ,226.20-25 रो_इव्,785-786 {7।14} दाक्षेयः इति .
(प्_6,4.148.1) क_इइइ,226.20-25 रो_इव्,785-786 {8।14} यदि लोपः न स्यात् परस्य लोपे कृते पूर्वस्य श्रवणम् प्रसज्येत .
(प्_6,4.148.1) क_इइइ,226.20-25 रो_इव्,785-786 {9।14} न एतानि सन्ति प्रयोजनानि .
(प्_6,4.148.1) क_इइइ,226.20-25 रो_इव्,785-786 {10।14} सवर्णदीर्घत्वेन अपि एतानि सिद्धानि .
(प्_6,4.148.1) क_इइइ,226.20-25 रो_इव्,785-786 {11।14} इदम् तर्हि .
(प्_6,4.148.1) क_इइइ,226.20-25 रो_इव्,785-786 {12।14} अतिसखेः आगच्छति .
(प्_6,4.148.1) क_इइइ,226.20-25 रो_इव्,785-786 {13।14} अतिसखेः स्वम् .
(प्_6,4.148.1) क_इइइ,226.20-25 रो_इव्,785-786 {14।14} यदि लोपः न स्यात् उपसर्जनह्रस्वत्वे कृते असखि इति प्रतिषेधः प्रसज्येत .
(प्_6,4.148.2) क_इइइ,227.1-19 रो_इव्,787-788 {1।31} यस्य ईत्यादौ श्याम् प्रतिषेधः .
(प्_6,4.148.2) क_इइइ,227.1-19 रो_इव्,787-788 {2।31} यस्य ईत्यादौ श्याम् प्रतिषेधः वक्तव्यः .
(प्_6,4.148.2) क_इइइ,227.1-19 रो_इव्,787-788 {3।31} काण्डे कुड्ये .
(प्_6,4.148.2) क_इइइ,227.1-19 रो_इव्,787-788 {4।31} सौर्ये नाम हिमवतः शृङ्गे .
(प्_6,4.148.2) क_इइइ,227.1-19 रो_इव्,787-788 {5।31} सः तर्हि प्रतिषेधः वक्तव्यः .
(प्_6,4.148.2) क_इइइ,227.1-19 रो_इव्,787-788 {6।31} न वक्तव्यः .
(प्_6,4.148.2) क_इइइ,227.1-19 रो_इव्,787-788 {7।31} इह श्याम् इति अपि प्रकृतम् न इति अपि .
(प्_6,4.148.2) क_इइइ,227.1-19 रो_इव्,787-788 {8।31} तत्र अभिसम्बन्धमात्रम् कर्तव्यम् : यस्य ईत्यादौ लोपः भवति श्याम् न .
(प्_6,4.148.2) क_इइइ,227.1-19 रो_इव्,787-788 {9।31} इयङुवङ्भ्याम् लोपः विप्रतिषेधेन .
(प्_6,4.148.2) क_इइइ,227.1-19 रो_इव्,787-788 {10।31} इयङुवङ्भ्याम् लोपः भवति विप्रतिषेधेन .
(प्_6,4.148.2) क_इइइ,227.1-19 रो_इव्,787-788 {11।31} इयङुवङोः अवकाशः श्रियौ श्रियः , भ्रुवौ भ्रुवः .
(प्_6,4.148.2) क_इइइ,227.1-19 रो_इव्,787-788 {12।31} लोपस्य अवकाशः कामण्डलेयः , माद्रबाहेयः .
(प्_6,4.148.2) क_इइइ,227.1-19 रो_इव्,787-788 {13।31} इह उभयम् प्राप्नोति : वत्सप्रेयः , लैखाभ्रेयः .
(प्_6,4.148.2) क_इइइ,227.1-19 रो_इव्,787-788 {14।31} लोपः भवति विप्रतिषेधेन .
(प्_6,4.148.2) क_इइइ,227.1-19 रो_इव्,787-788 {15।31} गुणवृद्धी च . गुणवृद्धी च इयङुवङ्भ्याम् भवतः विप्रतिषेधेन .
(प्_6,4.148.2) क_इइइ,227.1-19 रो_इव्,787-788 {16।31} गुणवृद्ध्योः अवकाशः : चेता गौः .
(प्_6,4.148.2) क_इइइ,227.1-19 रो_इव्,787-788 {17।31} इयङुवङोः सः एव .
(प्_6,4.148.2) क_इइइ,227.1-19 रो_इव्,787-788 {18।31} इह उभयम् प्राप्नोति : चयनम् , चायकः , लवनम् , लावकः .
(प्_6,4.148.2) क_इइइ,227.1-19 रो_इव्,787-788 {19।31} गुणवृद्धी भवतः विप्रतिषेधेन .
(प्_6,4.148.2) क_इइइ,227.1-19 रो_इव्,787-788 {20।31} न वा इयङुवङादेशस्य अन्यविषये वचनात् .
(प्_6,4.148.2) क_इइइ,227.1-19 रो_इव्,787-788 {21।31} न वा अर्थः विप्रतिषेधेन .
(प्_6,4.148.2) क_इइइ,227.1-19 रो_इव्,787-788 {22।31} किम् कारणम् .
(प्_6,4.148.2) क_इइइ,227.1-19 रो_इव्,787-788 {23।31} इयङुवङादेशस्य अन्यविषये वचनात् .
(प्_6,4.148.2) क_इइइ,227.1-19 रो_इव्,787-788 {24।31} इयङुवङादेशः अन्यविषये आरभ्यते .
(प्_6,4.148.2) क_इइइ,227.1-19 रो_इव्,787-788 {25।31} किंविषये .
(प्_6,4.148.2) क_इइइ,227.1-19 रो_इव्,787-788 {26।31} यणादिविषये .
(प्_6,4.148.2) क_इइइ,227.1-19 रो_इव्,787-788 {27।31} सः यथा यणादेशम् बाधते एवम् गुणवृद्धी बाधेत .
(प्_6,4.148.2) क_इइइ,227.1-19 रो_इव्,787-788 {28।31} तस्मात् तत्र गुणवृद्धिविषये प्रतिषेधः .
(प्_6,4.148.2) क_इइइ,227.1-19 रो_इव्,787-788 {29।31} तस्मात् तत्र गुणवृद्धिविषये प्रतिषेधः वक्तव्यः .
(प्_6,4.148.2) क_इइइ,227.1-19 रो_इव्,787-788 {30।31} न वक्तव्यः .
(प्_6,4.148.2) क_इइइ,227.1-19 रो_इव्,787-788 {31।31} मध्ये अपवादाः पूर्वान् विधीन् बाधन्ते इति एवम् इयङुवङादेशः यणादेशम् बाधिष्यते गुणवृद्धी न बाधिष्यते .
(प्_6,4.149.1) क_इइइ,227.21-228.12 रो_इव्,788-789 {1।32} सूर्यादीनाम् अणन्ते अप्रसिद्धिः अङ्गान्यत्वात् .
(प्_6,4.149.1) क_इइइ,227.21-228.12 रो_इव्,788-789 {2।32} सूर्यादीनाम् अणन्ते अप्रसिद्धिः .
(प्_6,4.149.1) क_इइइ,227.21-228.12 रो_इव्,788-789 {3।32} सौरी बलाका .
(प्_6,4.149.1) क_इइइ,227.21-228.12 रो_इव्,788-789 {4।32} किम् कारणम् .
(प्_6,4.149.1) क_इइइ,227.21-228.12 रो_इव्,788-789 {5।32} अङ्गान्यत्वात् .
(प्_6,4.149.1) क_इइइ,227.21-228.12 रो_इव्,788-789 {6।32} अणन्तम् एतत् अङ्गम् अन्यत् भवति .
(प्_6,4.149.1) क_इइइ,227.21-228.12 रो_इव्,788-789 {7।32} लोपे कृते न अङ्गान्यत्वम् .
(प्_6,4.149.1) क_इइइ,227.21-228.12 रो_इव्,788-789 {8।32} स्थानिवद्भावात् अङ्गान्यत्वम् भवति .
(प्_6,4.149.1) क_इइइ,227.21-228.12 रो_इव्,788-789 {9।32} सिद्धम् तु स्थानिवत्प्रतिषेधात् .
(प्_6,4.149.1) क_इइइ,227.21-228.12 रो_इव्,788-789 {10।32} सिद्धम् एतत् .
(प्_6,4.149.1) क_इइइ,227.21-228.12 रो_इव्,788-789 {11।32} कथम् .
(प्_6,4.149.1) क_इइइ,227.21-228.12 रो_इव्,788-789 {12।32} स्थानिवत्प्रतिषेधात् .
(प्_6,4.149.1) क_इइइ,227.21-228.12 रो_इव्,788-789 {13।32} प्रतिषिध्यते अत्र स्थानिवद्भावः यलोपविधिम् प्रति न स्थानिवत् भवति इति .
(प्_6,4.149.1) क_इइइ,227.21-228.12 रो_इव्,788-789 {14।32} एवम् अपि न सिध्यति .
(प्_6,4.149.1) क_इइइ,227.21-228.12 रो_इव्,788-789 {15।32} किम् कारणम् .
(प्_6,4.149.1) क_इइइ,227.21-228.12 रो_इव्,788-789 {16।32} शब्दान्यत्वात् .
(प्_6,4.149.1) क_इइइ,227.21-228.12 रो_इव्,788-789 {17।32} अन्यः हि शूर्यशब्दः अन्यः सौर्यशब्दः .
(प्_6,4.149.1) क_इइइ,227.21-228.12 रो_इव्,788-789 {18।32} न एषः दोषः .
(प्_6,4.149.1) क_इइइ,227.21-228.12 रो_इव्,788-789 {19।32} एकदेशविकृतम् अनन्यवत् भवति इति भविष्यति .
(प्_6,4.149.1) क_इइइ,227.21-228.12 रो_इव्,788-789 {20।32} उपधाग्रहणानर्थक्यम् च .
(प्_6,4.149.1) क_इइइ,227.21-228.12 रो_इव्,788-789 {21।32} स्थानिवद्भावे च इदानीम् प्रतिषिद्धे उपधाग्रहणम् अनर्थकम् .
(प्_6,4.149.1) क_इइइ,227.21-228.12 रो_इव्,788-789 {22।32} किम् कारणम् .
(प्_6,4.149.1) क_इइइ,227.21-228.12 रो_इव्,788-789 {23।32} अन्त्यः एव हि सूर्यादीनाम् यकारः .
(प्_6,4.149.1) क_इइइ,227.21-228.12 रो_इव्,788-789 {24।32} किम् यातम् एतत् भवति .
(प्_6,4.149.1) क_इइइ,227.21-228.12 रो_इव्,788-789 {25।32} सुष्ठु च यातम् साधु च यातम् यदि प्राक् भात् असिद्धत्वम् .
(प्_6,4.149.1) क_इइइ,227.21-228.12 रो_इव्,788-789 {26।32} अथ हि सह तेन असिद्धत्वम् असिद्धत्वात् लोपस्य न अन्त्यः यकारः भवति .
(प्_6,4.149.1) क_इइइ,227.21-228.12 रो_इव्,788-789 {27।32} यदि अपि सह तेन असिद्धत्वम् एवम् अपि न दोषः .
(प्_6,4.149.1) क_इइइ,227.21-228.12 रो_इव्,788-789 {28।32} न एवम् विज्ञायते सूर्यादीनाम् अङ्गानाम् यकारलोपः इति .
(प्_6,4.149.1) क_इइइ,227.21-228.12 रो_इव्,788-789 {29।32} कथम् तर्हि .
(प्_6,4.149.1) क_इइइ,227.21-228.12 रो_इव्,788-789 {30।32} अङ्गस्य यलोपः भवति सः चेत् सूर्यादीनाम् यकारः इति .
(प्_6,4.149.1) क_इइइ,227.21-228.12 रो_इव्,788-789 {31।32} एवम् अपि सूर्यचरी , अत्र प्राप्नोति .
(प्_6,4.149.1) क_इइइ,227.21-228.12 रो_इव्,788-789 {32।32} तस्मात् उपधाग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_6,4.149.2) क_इइइ,228.13-229.5 रो_इव्,789-791 {1।21} विषयपरिगणनम् च .
(प्_6,4.149.2) क_इइइ,228.13-229.5 रो_इव्,789-791 {2।21} विषयपरिगणनम् च कर्तव्यम् .
(प्_6,4.149.2) क_इइइ,228.13-229.5 रो_इव्,789-791 {3।21} सूर्यमत्स्ययोः ङ्याम् .
(प्_6,4.149.2) क_इइइ,228.13-229.5 रो_इव्,789-791 {4।21} सूर्यमत्स्ययोः ङ्याम् इति वक्तव्यम् .
(प्_6,4.149.2) क_इइइ,228.13-229.5 रो_इव्,789-791 {5।21} सौरी मत्सी .
(प्_6,4.149.2) क_इइइ,228.13-229.5 रो_इव्,789-791 {6।21} सूर्यागस्त्ययोः छे च .
(प्_6,4.149.2) क_इइइ,228.13-229.5 रो_इव्,789-791 {7।21} सूर्यागस्त्ययोः छे च ङ्याम् च इति वक्तव्यम् .
(प्_6,4.149.2) क_इइइ,228.13-229.5 रो_इव्,789-791 {8।21} सौरी सौरीयः , आगस्ती , आगस्तीयः .
(प्_6,4.149.2) क_इइइ,228.13-229.5 रो_इव्,789-791 {9।21} तिष्यपुष्ययोः नक्षत्राणि .
(प्_6,4.149.2) क_इइइ,228.13-229.5 रो_इव्,789-791 {10।21} तिष्यपुष्ययोः नक्षत्राणि लोपः वक्तव्यः : तैषम् , पौषम् .
(प्_6,4.149.2) क_इइइ,228.13-229.5 रो_इव्,789-791 {11।21} अन्तिकस्य तसि कादिलोपः आद्युदात्तत्वम् च .
(प्_6,4.149.2) क_इइइ,228.13-229.5 रो_इव्,789-791 {12।21} अन्तिकस्य तसि कादिलोपः वक्तव्यः आद्युदात्तत्वम् च वक्तव्यम् .
(प्_6,4.149.2) क_इइइ,228.13-229.5 रो_इव्,789-791 {13।21} अन्तितः न दूरात् .
(प्_6,4.149.2) क_इइइ,228.13-229.5 रो_इव्,789-791 {14।21} तमे तादेः च .
(प्_6,4.149.2) क_इइइ,228.13-229.5 रो_इव्,789-791 {15।21} तमे तादेः च कादेः च लोपः वक्तव्यः .
(प्_6,4.149.2) क_इइइ,228.13-229.5 रो_इव्,789-791 {16।21} अग्ने त्वम् नः अन्तमः .
(प्_6,4.149.2) क_इइइ,228.13-229.5 रो_इव्,789-791 {17।21} अन्तितमः अवरोहति .
(प्_6,4.149.2) क_इइइ,228.13-229.5 रो_इव्,789-791 {18।21} तसि इति एषः न वक्तव्यः .
(प्_6,4.149.2) क_इइइ,228.13-229.5 रो_इव्,789-791 {19।21} दृष्टः दाशतये अपि हि घौ लोपः अन्तिषत् इति यत्र . अन्तिषत् .
(प्_6,4.149.2) क_इइइ,228.13-229.5 रो_इव्,789-791 {20।21} तथा अघौ ये अन्त्यथर्वसु .
(प्_6,4.149.2) क_इइइ,228.13-229.5 रो_इव्,789-791 {21।21} अन्ति ये च दूरके .
(प्_6,4.153) क_इइइ,229.7-14 रो_इव्,791-793 {1।13} छग्रहणम् शक्यम् अकर्तुम् .
(प्_6,4.153) क_इइइ,229.7-14 रो_इव्,791-793 {2।13} इह कस्मात् न भवति बिल्वकेभ्यः .
(प्_6,4.153) क_इइइ,229.7-14 रो_इव्,791-793 {3।13} भस्य इति वर्तते .
(प्_6,4.153) क_इइइ,229.7-14 रो_इव्,791-793 {4।13} एवम् अपि बिल्वकाय , अत्र प्राप्नोति .
(प्_6,4.153) क_इइइ,229.7-14 रो_इव्,791-793 {5।13} तद्धितस्य इति वर्तते .
(प्_6,4.153) क_इइइ,229.7-14 रो_इव्,791-793 {6।13} एवम् अपि बिल्वकस्य विकारः अवयवः वा बैल्वकः , अत्र प्राप्नोति .
(प्_6,4.153) क_इइइ,229.7-14 रो_इव्,791-793 {7।13} तद्धिते तद्धितस्य इति वर्तते .
(प्_6,4.153) क_इइइ,229.7-14 रो_इव्,791-793 {8।13} एवम् अपि बिल्वकीयायाम् भवः बैल्वकः , बैल्वकस्य किम् चित् बैल्वकीयम् , अत्र प्राप्नोति .
(प्_6,4.153) क_इइइ,229.7-14 रो_इव्,791-793 {9।13} न सः बिल्वकात् .
(प्_6,4.153) क_इइइ,229.7-14 रो_इव्,791-793 {10।13} बिल्वकादिभ्यः यः विहितः इति उच्यते न च असौ बिल्वकशब्दात् विहितः .
(प्_6,4.153) क_इइइ,229.7-14 रो_इव्,791-793 {11।13} किम् तर्हि बिल्वकीयशब्दात् .
(प्_6,4.153) क_इइइ,229.7-14 रो_इव्,791-793 {12।13} एवम् तर्हि सिद्धे सति यत् छग्रहणम् करोति तत् ज्ञापयति आचार्यः भवति एषा परिभाषा : सन्नियोगशिष्टानाम् अन्यतराभावे उभयोः अभावः इति .
(प्_6,4.153) क_इइइ,229.7-14 रो_इव्,791-793 {13।13} तस्मात् छग्रहणम् कर्तव्यम् छस्य एव लुक् यथा स्यात् कुकः मा भूत् इति .
(प्_6,4.154) क_इइइ,229.16-23 रो_इव्,793 {1।15} तुः सर्वस्य लोपः वक्तव्यः अन्त्यस्य लोपः मा भूत् इति .
(प्_6,4.154) क_इइइ,229.16-23 रो_इव्,793 {2।15} सः तर्हि वक्तव्यः .
(प्_6,4.154) क_इइइ,229.16-23 रो_इव्,793 {3।15} न वक्तव्यः . तुः सर्वलोपविज्ञानम् अन्त्यस्य वचनानर्थक्यात् .
(प्_6,4.154) क_इइइ,229.16-23 रो_इव्,793 {4।15} तुः सर्वलोपः विज्ञायते .
(प्_6,4.154) क_इइइ,229.16-23 रो_इव्,793 {5।15} कुतः .
(प्_6,4.154) क_इइइ,229.16-23 रो_इव्,793 {6।15} अन्त्यस्य वचनानर्थक्यात् .
(प्_6,4.154) क_इइइ,229.16-23 रो_इव्,793 {7।15} अन्त्यस्य लोपवचने प्रयोजनम् न अस्ति इति कृत्वा सर्वस्य भविष्यति .
(प्_6,4.154) क_इइइ,229.16-23 रो_इव्,793 {8।15} अथ वा लुक् प्रकृतः .
(प्_6,4.154) क_इइइ,229.16-23 रो_इव्,793 {9।15} सः अनुवर्तिष्यते .
(प्_6,4.154) क_इइइ,229.16-23 रो_इव्,793 {10।15} अशक्यः लुक् अनुवर्तयितुम् .
(प्_6,4.154) क_इइइ,229.16-23 रो_इव्,793 {11।15} किम् कारणम् .
मूल पाठ: Vyākaraṇamahābhāṣya · Edition: Franz Kielhorn (Bombay 1880-1885), revised by K.V. Abhyankar (Poona 1972-1996). · Data entry George Cardona · GRETIL (Göttingen) · CC BY-NC-SA 4.0