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ग्रंथ पाठ

शिव पुराण · श्लोक 7.13-2

7.13-2.7.1,13.1

ऋषय ऊचुः
भवता कथिता सृष्टिर्भवस्य परमात्मनः

7.13-2.7.1,13.1

चतुर्मुखमुखात्तस्य संशयो नः प्रजायते

7.13-2.7.1,13.2

देवश्रेष्ठो विरूपाक्षो दीप्तश्शूलधरो हरः

7.13-2.7.1,13.2

कालात्मा भगवान् रुद्रः कपर्दी नीललोहितः

7.13-2.7.1,13.3

सब्रह्मकमिमं लोकं सविष्णुमपि पावकम्

7.13-2.7.1,13.3

यः संहरति संक्रुद्धो युगांते समुपस्थिते

7.13-2.7.1,13.4

यस्य ब्रह्मा च विष्णुश्च प्रणामं कुरुतो भयात्

7.13-2.7.1,13.4

लोकसंकोचकस्यास्य यस्य तौ वशवर्तिनौ

7.13-2.7.1,13.5

यो ऽयं देवः स्वकादंगाद्ब्रह्मविष्णू पुरासृजत्

7.13-2.7.1,13.5

स एव हि तयोर्नित्यं योगक्षेमकरः प्रभुः

7.13-2.7.1,13.6

स कथं भगवान् रुद्र आदिदेवः पुरातनः

7.13-2.7.1,13.6

पुत्रत्वमगमच्छंभुर्ब्रह्मणो ऽव्यक्तजन्मनः

7.13-2.7.1,13.7

प्रजापतिश्च विष्णुश्च रुद्रस्यैतौ परस्परम्

7.13-2.7.1,13.7

सृष्टौ परस्परस्यांगादिति प्रागपि शुश्रुम

7.13-2.7.1,13.8

कथं पुनरशेषाणां भूतानां हेतुभूतयोः

7.13-2.7.1,13.8

गुणप्रधानभावेन प्रादुर्भावः परस्परात्

7.13-2.7.1,13.9

नापृष्टं भवता किंचिन्नाश्रुतं च कथंचन

7.13-2.7.1,13.9

भगवच्छिष्यभूतेन भवता सकलं स्मृतम्

7.13-2.7.1,13.10

तत्त्वं वद यथा ब्रह्मा मुनीनामवदद्विभुः

7.13-2.7.1,13.10

वयं श्रद्धालवस्तात श्रोतुमीश्वरसद्यशः

7.13-2.7.1,13.11

वायुरुवाच
स्थाने पृष्टमिदं विप्रा भवद्भिः प्रश्नकोविदैः

7.13-2.7.1,13.11

इदमेव पुरा पृष्टो मम प्राह पितामहः

7.13-2.7.1,13.12

तदहं सम्प्रवक्ष्यामि यथा रुद्रसमुद्भवः

7.13-2.7.1,13.12

यथा च पुनरुत्पत्तिर्ब्रह्मविष्ण्वोः परस्परम्

7.13-2.7.1,13.13

त्रयस्ते कारणात्मानो जतास्साक्षान्महेश्वरात्

7.13-2.7.1,13.13

चराचरस्य विश्वस्य सर्गस्थित्यंतहेतवः

7.13-2.7.1,13.14

परमैश्वर्यसंयुक्ताः परमेश्वरभाविताः

7.13-2.7.1,13.14

तच्छक्त्याधिष्ठिता नित्यं तत्कार्यकरणक्षमाः

7.13-2.7.1,13.15

पित्रा नियमिताः पूर्वं त्रयोपि त्रिषु कर्मसु

7.13-2.7.1,13.15

ब्रह्मा सर्गे हरिस्त्राणे रुद्रः संहरणे तथा

7.13-2.7.1,13.16

तथाप्यन्योन्यमात्सर्यादन्योन्यातिशयाशिनः

7.13-2.7.1,13.16

तपसा तोषयित्वा स्वं पितरं परमेश्वरम्

7.13-2.7.1,13.17

लब्ध्वा सर्वात्मना तस्य प्रसादात्परमेष्ठिनः

7.13-2.7.1,13.17

ब्रह्मनारायणौ पूर्वं रुद्रः कल्पान्तरे ऽसृजत्

7.13-2.7.1,13.18

कल्पान्तरे पुनर्ब्रह्मा रुद्रविष्णू जगन्मयः

7.13-2.7.1,13.18

विष्णुश्च भगवान्रुद्रं ब्रह्माणमसृजत्पुनः

7.13-2.7.1,13.19

नारायणं पुनर्ब्रह्मा ब्रह्माणमसृजत्पुनः

7.13-2.7.1,13.19

एवं कल्पेषु कल्पेषु ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः

7.13-2.7.1,13.20

परस्परेण जायंते परस्परहितैषिणः

7.13-2.7.1,13.20

तत्तत्कल्पान्तवृत्तान्तमधिकृत्य महर्षिभिः

7.13-2.7.1,13.21

प्रभावः कथ्यते तेषां परस्परसमुद्भवात्

7.13-2.7.1,13.21

शृणु तेषां कथां चित्रां पुण्यां पापप्रमोचिनीम्

7.13-2.7.1,13.22

कल्पे तत्पुरुषे वृत्तां ब्रह्मणः परमेष्ठिनः

7.13-2.7.1,13.22

पुरा नारायणो नाम कल्पे वै मेघवाहने

7.13-2.7.1,13.23

दिव्यं वर्षसहस्रं तु मेघो भूत्वावहद्धराम्

7.13-2.7.1,13.23

तस्य भावं समालक्ष्य विष्णोर्विश्वजगद्गुरुः

7.13-2.7.1,13.24

सर्वस्सर्वात्मभावेन प्रददौ शक्तिमव्ययाम्

7.13-2.7.1,13.24

शक्तिं लब्ध्वा तु सर्वात्मा शिवात्सर्वेश्वरात्तदा

7.13-2.7.1,13.25

ससर्ज भगावन् विष्णुर्विश्वं विश्वसृजा सह

7.13-2.7.1,13.25

विष्णोस्तद्वैभवं दृष्ट्वा सृष्टस्तेन पितामहः

7.13-2.7.1,13.26

ईर्ष्यया परया ग्रस्तः प्रहसन्निदमब्रवीत्

7.13-2.7.1,13.26

गच्छ विष्णो मया ज्ञातं तव सर्गस्य कारणम्

7.13-2.7.1,13.26

आवयोरधिकश्चास्ति स रुद्रो नात्र संशयः

7.13-2.7.1,13.27

तस्य देवाधिदेवस्य प्रसादात्परमेष्ठिनः

7.13-2.7.1,13.27

स्रष्टा त्वं भगवानाद्यः पालकः परमार्थतः

7.13-2.7.1,13.28

अहं च तपसाराध्य रुद्रं त्रिदशनायकम्

7.13-2.7.1,13.28

त्वया सह जगत्सर्वं स्रक्ष्याम्यत्र न संशयः

7.13-2.7.1,13.29

एवं विष्णुमुपालभ्य भगवानब्जसम्भवः

7.13-2.7.1,13.29

एवं विज्ञापयामास तपसा प्राप्य शंकरम्

7.13-2.7.1,13.30

भगवन् देवदेवेश विश्वेश्वर महेश्वर

7.13-2.7.1,13.30

तव वामांगजो विष्णुर्दक्षिणांगभवो ह्यहम्

7.13-2.7.1,13.31

मया सह जगत्सर्वं तथाप्यसृजदच्युतः

7.13-2.7.1,13.31

स मत्सरादुपालब्धस्त्वदाश्रयबलान्मया

7.13-2.7.1,13.32

मद्भावान्नाधिकस्तेति भावस्त्वयि महेश्वरे

7.13-2.7.1,13.32

त्वत्त एव समुत्पत्तिरावयोस्सदृशी यतः

7.13-2.7.1,13.33

तस्य भक्त्या यथापूर्वं प्रसादं कृतवानसि

7.13-2.7.1,13.33

तथा ममापि तत्सर्वं दातुमर्हसि शंकर

7.13-2.7.1,13.34

इति विज्ञापितस्तेन भगवान् भगनेत्रहा

7.13-2.7.1,13.34

न्यायेन वै ददौ सर्वं तस्यापि स घृणानिधिः

7.13-2.7.1,13.35

लब्ध्वैवमीश्वरादेव ब्रह्मा सर्वात्मतां क्षणात्

7.13-2.7.1,13.35

त्वरमाणोथ संगम्य ददर्श पुरुषोत्तमम्

7.13-2.7.1,13.36

क्षीरार्णवालये शुभ्रे विमाने सूर्यसंनिभे

7.13-2.7.1,13.36

हेमरत्नान्विते दिव्ये मनसा तेन निर्मिते

7.13-2.7.1,13.37

अनंतभोगशय्यायां शयानं पंकजेक्षणम्

7.13-2.7.1,13.37

चतुर्भुजमुदारांगं सर्वाभरणभूषितम्

7.13-2.7.1,13.38

शंखचक्रधरं सौम्यं चन्द्रबिंबसमाननम्

7.13-2.7.1,13.38

श्रीवत्सवक्षसं देवं प्रसन्नमधुरस्मितम्

7.13-2.7.1,13.39

धरामृदुकरांभोजस्पर्शरक्तपदांबुजम्

7.13-2.7.1,13.39

क्षीरार्णवामृतमिव शयानं योगनिद्रया

7.13-2.7.1,13.40

तमसा कालरुद्राख्यं रजसा कनकांडजम्

7.13-2.7.1,13.40

सत्त्वेन सर्वगं विष्णुं निर्गुणत्वे महेश्वरम्

7.13-2.7.1,13.41

तं दृष्ट्वा पुरुषं ब्रह्मा प्रगल्भमिदमब्रवीत्

7.13-2.7.1,13.41

ग्रसामि त्वामहं विष्णो त्वमात्मानं यथा पुरा

7.13-2.7.1,13.42

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा प्रतिबुद्ध्य पितामहम्

7.13-2.7.1,13.42

उदैक्षत महाबाहुस्स्मितमीषच्चकार च

7.13-2.7.1,13.43

तस्मिन्नवसरे विष्णुर्ग्रस्तस्तेन महात्मना

7.13-2.7.1,13.43

सृष्टश्च ब्रह्मणा सद्यो भ्रुवोर्मध्यादयत्नतः

7.13-2.7.1,13.44

तस्मिन्नवसरे साक्षाद्भगवानिन्दुभूषणः

7.13-2.7.1,13.44

शक्तिं तयोरपि द्रष्टुमरूपो रूपमास्थितः

7.13-2.7.1,13.45

प्रसादमतुलं कर्तुं पुरा दत्तवरस्तयोः

7.13-2.7.1,13.45

आगच्छत्तत्र यत्रेमौ ब्रह्मनारायणौ स्थितौ

7.13-2.7.1,13.46

अथ तुष्टुवतुर्देवं प्रीतौ भीतौ च कौतुकात्

7.13-2.7.1,13.46

प्रणेमतुश्च बहुशो बहुमानेन दूरतः

7.13-2.7.1,13.47

भवोपि भगवानेतावनुगृह्य पिनाकधृक्

7.13-2.7.1,13.47

सादरं पश्यतोरेव तयोरंतरधीयत

इति श्रीशिवमहापुराणे सप्तम्यां वायवीयसंहितायां पूर्वखण्डे ब्रह्मविष्णुसृष्टिकथनं नाम त्रयोदशो ऽध्यायः

मूल पाठ: śivapurāṇam · Sanskrit Wikisource contributors · Sanskrit Wikisource · CC BY-SA 4.0

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