व्याकरणमहाभाष्य · भाग 781800
(प्_5,4.30) क_इइ,433.22-435.3 रो_इव्,257-259 {74।88} समानि .
(प्_5,4.30) क_इइ,433.22-435.3 रो_इव्,257-259 {75।88} उ ईवते उ लोकम् .
(प्_5,4.30) क_इइ,433.22-435.3 रो_इव्,257-259 {76।88} यः ईवते ब्रह्मणे .
(प्_5,4.30) क_इइ,433.22-435.3 रो_इव्,257-259 {77।88} यः इयते .
(प्_5,4.30) क_इइ,433.22-435.3 रो_इव्,257-259 {78।88} नवस्य नूत्नप्तनखाः च .
(प्_5,4.30) क_इइ,433.22-435.3 रो_इव्,257-259 {79।88} नवस्य नू इति अयम् आदेशः वक्तव्यः त्नप्तनखाः च प्रत्ययाः वक्तव्याः .
(प्_5,4.30) क_इइ,433.22-435.3 रो_इव्,257-259 {80।88} नूत्नम् .
(प्_5,4.30) क_इइ,433.22-435.3 रो_इव्,257-259 {81।88} नूतनम् .
(प्_5,4.30) क_इइ,433.22-435.3 रो_इव्,257-259 {82।88} नवीनम् .
(प्_5,4.30) क_इइ,433.22-435.3 रो_इव्,257-259 {83।88} नः च पुराणे प्रात् .
(प्_5,4.30) क_इइ,433.22-435.3 रो_इव्,257-259 {84।88} नः च पुराणे प्रात् वक्तव्यः त्नप्तनखाः च प्रत्ययाः वक्तव्याः .
(प्_5,4.30) क_इइ,433.22-435.3 रो_इव्,257-259 {85।88} प्रणम् .
(प्_5,4.30) क_इइ,433.22-435.3 रो_इव्,257-259 {86।88} प्रत्नम् .
(प्_5,4.30) क_इइ,433.22-435.3 रो_इव्,257-259 {87।88} प्रतनम् .
(प्_5,4.30) क_इइ,433.22-435.3 रो_इव्,257-259 {88।88} प्रीणम् .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {1।51} तत् इति अनेन किम् प्रतिनिर्दिश्यते .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {2।51} वाक् एव .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {3।51} यत् एव वाचा व्यवहिर्यते तत् कर्मणा क्रियते .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {4।51} अण्प्रकरणे कुलालवरुडनिषादचण्डालामित्रेभ्यः छन्दसि .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {5।51} अण्प्रकरणे कुलालवरुडनिषादचण्डालामित्रेभ्यः छन्दसि उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {6।51} कौलालः .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {7।51} वाऋउडः .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {8।51} नैषादः .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {9।51} चाण्डालः .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {10।51} आमित्रः .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {11।51} भागरूपनामभ्यः धेयः .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {12।51} भागरूपनामभ्यः धेयः वक्तव्यः .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {13।51} भागधेयम् .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {14।51} रूपधेयम् .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {15।51} नामधेयम् .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {16।51} मित्रात् छन्दसि .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {17।51} मित्रात् छन्दसि धेयः वक्तव्यः .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {18।51} मित्रधेये यतस्व .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {19।51} अण् अमित्रात् च .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {20।51} अण् अमित्रात् च इति वक्तव्यम् .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {21।51} मैत्रः .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {22।51} आमित्रः .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {23।51} सान्नाय्यानुजावरानुषूकचातुष्प्राश्यराक्षोघ्नवैयातवैकृतवारिवस्कृताग्रायणाग्रहायणसान्तपनानि निपात्न्यन्ते .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {24।51} सान्नाय्यम् .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {25।51} आनुजावरः .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {26।51} आनुषूकः .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {27।51} चातुष्प्राश्यः .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {28।51} राक्षोघ्नः .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {29।51} वैयातः .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {30।51} वैकृतः .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {31।51} वारिवस्कृतः .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {32।51} आग्रायणः .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {33।51} आग्रहायणः .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {34।51} सान्तपनः .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {35।51} अग्नीध्रसाधारणात् अञ् .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {36।51} अग्नीध्रसाधारणात् अञ् वक्तव्यः .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {37।51} आग्नीध्रम् .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {38।51} साधारणम् .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {39।51} अयवसमरुद्भ्याम् छन्दसि .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {40।51} अयवसमरुद्भ्याम् छन्दसि अञ् वक्तव्यः .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {41।51} आयवसे वर्धन्ते .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {42।51} मारुतम् शर्धः .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {43।51} नवसूरमर्तयविष्ठेभ्यः यत् .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {44।51} नवसूरमर्तयविष्ठेभ्यः यत् वक्तव्यः .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {45।51} नव्यः .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {46।51} सूर्यः .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {47।51} मर्त्यः .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {48।51} यविष्थ्यः .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {49।51} क्षेमात् यः .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {50।51} क्षेमात् यः वक्तव्यः .
(प्_5,4.36) क_इइ,435.5-436.4 रो_इव्,259-260 {51।51} क्षेम्यः तिष्ठन् प्रतरणः सुवीरः .
(प्_5,4.42) क_इइ,436.6-9 रो_इव्,260-261 {1।7} बह्वल्पार्थात् मङ्गलवचनम् [र्: मङ्गलामङ्गलवचनम्] . बह्वल्पार्थात् मङ्गलवचनम् [मङ्गलामङ्गलवचनम् ] कर्तव्यम् .
(प्_5,4.42) क_इइ,436.6-9 रो_इव्,260-261 {2।7} बहुशः देहि .
(प्_5,4.42) क_इइ,436.6-9 रो_इव्,260-261 {3।7} अनिष्टेषु श्राद्धादिषु मा भूत् .
(प्_5,4.42) क_इइ,436.6-9 रो_इव्,260-261 {4।7} इष्टेषु प्राशित्रादिषु यथा स्यात् .
(प्_5,4.42) क_इइ,436.6-9 रो_इव्,260-261 {5।7} अल्पशः देहि .
(प्_5,4.42) क_इइ,436.6-9 रो_इव्,260-261 {6।7} इष्टेषु प्राशित्रादिषु मा भूत् .
(प्_5,4.42) क_इइ,436.6-9 रो_इव्,260-261 {7।7} अनिष्टेषु श्राद्धादिषु यथा स्यात् .
(प्_5,4.44) क_इइ,436.11-12 रो_इव्, 261 {1।5} तसिप्रकरणे आद्यादिभ्यः उपसङ्ख्यानम् .
(प्_5,4.44) क_इइ,436.11-12 रो_इव्, 261 {2।5} तसिप्रकरणे आद्यादिभ्यः उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_5,4.44) क_इइ,436.11-12 रो_इव्, 261 {3।5} आदितः .
(प्_5,4.44) क_इइ,436.11-12 रो_इव्, 261 {4।5} मध्यतः .
(प्_5,4.44) क_इइ,436.11-12 रो_इव्, 261 {5।5} अन्ततः .
(प्_5,4.50) क_इइ,436.14-437.3 रो_इव्,261-262 {1।21} च्विविधौ अभूततद्भावग्रहणम् .
(प्_5,4.50) क_इइ,436.14-437.3 रो_इव्,261-262 {2।21} च्विविधौ अभूततद्भावग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_5,4.50) क_इइ,436.14-437.3 रो_इव्,261-262 {3।21} इह मा भूत् .
(प्_5,4.50) क_इइ,436.14-437.3 रो_इव्,261-262 {4।21} सम्पद्यन्ते यवाः .
(प्_5,4.50) क_इइ,436.14-437.3 रो_इव्,261-262 {5।21} सम्पद्यन्ते शालयः इति .
(प्_5,4.50) क_इइ,436.14-437.3 रो_इव्,261-262 {6।21} अथ क्रियमाणे अपि वा अभूततद्भावग्रहणे इह कस्मात् न भवति .
(प्_5,4.50) क_इइ,436.14-437.3 रो_इव्,261-262 {7।21} सम्पद्यन्ते अस्मिन् क्षेत्र शालयः इति .
(प्_5,4.50) क_इइ,436.14-437.3 रो_इव्,261-262 {8।21} प्रकृतिविवक्षाग्रहणम् च .
(प्_5,4.50) क_इइ,436.14-437.3 रो_इव्,261-262 {9।21} प्रकृतिविवक्षाग्रहणम् च कर्तव्यम् .
(प्_5,4.50) क_इइ,436.14-437.3 रो_इव्,261-262 {10।21} समीपादिभ्यः उपसङ्ख्यानम् .
(प्_5,4.50) क_इइ,436.14-437.3 रो_इव्,261-262 {11।21} समीपादिभ्यः उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_5,4.50) क_इइ,436.14-437.3 रो_इव्,261-262 {12।21} समीपी भवति .
(प्_5,4.50) क_इइ,436.14-437.3 रो_इव्,261-262 {13।21} अभ्याशी भवति .
(प्_5,4.50) क_इइ,436.14-437.3 रो_इव्,261-262 {14।21} अन्तिकी भवति .
(प्_5,4.50) क_इइ,436.14-437.3 रो_इव्,261-262 {15।21} किम् पुनः कारणम् न सिध्यति .
(प्_5,4.50) क_इइ,436.14-437.3 रो_इव्,261-262 {16।21} न हि असमीपम् समीपम् भवति .
(प्_5,4.50) क_इइ,436.14-437.3 रो_इव्,261-262 {17।21} किम् तर्हि .
(प्_5,4.50) क_इइ,436.14-437.3 रो_इव्,261-262 {18।21} असमीपस्थम् समीपस्थम् भवति .
(प्_5,4.50) क_इइ,436.14-437.3 रो_इव्,261-262 {19।21} तत् तर्हि वक्तव्यम् .
(प्_5,4.50) क_इइ,436.14-437.3 रो_इव्,261-262 {20।21} न वक्तव्यम् .
(प्_5,4.50) क_इइ,436.14-437.3 रो_इव्,261-262 {21।21} तात्स्थ्यात् ताच्छब्द्यम् भविष्यति .
(प्_5,4.57) क_इइ,437.5-12 रो_इव्,262-263 {1।17} किमर्थः चकारः .
(प्_5,4.57) क_इइ,437.5-12 रो_इव्,262-263 {2।17} स्वरार्थः .
(प्_5,4.57) क_इइ,437.5-12 रो_इव्,262-263 {3।17} चितः अन्तः उदात्तत्ः भवति इति उदात्तत्वम् यथा स्यात् .
(प्_5,4.57) क_इइ,437.5-12 रो_इव्,262-263 {4।17} न एतत् अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_5,4.57) क_इइ,437.5-12 रो_इव्,262-263 {5।17} एकाच् अयम् .
(प्_5,4.57) क_इइ,437.5-12 रो_इव्,262-263 {6।17} तत्र न अर्थः स्वरार्थेन चकारेण अनुबन्धेन .
(प्_5,4.57) क_इइ,437.5-12 रो_इव्,262-263 {7।17} प्रत्ययस्वरेण एव सिद्धम् .
(प्_5,4.57) क_इइ,437.5-12 रो_इव्,262-263 {8।17} अतः उत्तरम् पठति .
(प्_5,4.57) क_इइ,437.5-12 रो_इव्,262-263 {9।17} डाचि चित्करणम् विशेषणार्थम् .
(प्_5,4.57) क_इइ,437.5-12 रो_इव्,262-263 {10।17} डाचि चित्करणम् क्रियते विशेषणार्थम् .
(प्_5,4.57) क_इइ,437.5-12 रो_इव्,262-263 {11।17} क्व विशेषणाऋथेन अर्थः .
(प्_5,4.57) क_इइ,437.5-12 रो_इव्,262-263 {12।17} लोहितादिडाज्भ्यः क्यष् इति .
(प्_5,4.57) क_इइ,437.5-12 रो_इव्,262-263 {13।17} डा इति हि उच्यमाने इडा अतः अपि प्रसज्येत .
(प्_5,4.57) क_इइ,437.5-12 रो_इव्,262-263 {14।17} अर्थवद्ग्रहणे न अनर्थकस्य इति एवम् एतस्य न भविष्यति .
(प्_5,4.57) क_इइ,437.5-12 रो_इव्,262-263 {15।17} इह तर्हि प्राप्नोति .
(प्_5,4.57) क_इइ,437.5-12 रो_इव्,262-263 {16।17} नाभा पृथिव्याः निहितः दविद्युतत् .
(प्_5,4.57) क_इइ,437.5-12 रो_इव्,262-263 {17।17} तस्मात् चकारः कर्तव्यः .
(प्_5,4.67) क_इइ,437.14 रो_इव्,263 {1।2} भद्रात् च इति वक्तव्यम् .
(प्_5,4.67) क_इइ,437.14 रो_इव्,263 {2।2} भद्रा करोति .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {1।70} अन्तग्रहणम् किमर्थम् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {2।70} अन्तः यथा स्यात् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {3।70} न एअतत् अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {4।70} प्रत्यय्परत्वेन अपि एतत् सिद्धम् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {5।70} इदम् तर्हि प्रयोजनम् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {6।70} तद्ग्रहणेन ग्रहणम् यथा स्यात् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {7।70} कानि पुनः तद्ग्रहणस्य प्रयोजनानि .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {8।70} प्रयोजनम् अव्ययीभावद्विगुद्वन्द्वतत्पुरुषबहुव्रीहिसञ्ज्ञाः .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {9।70} अव्ययीभावः प्रयोजनम् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {10।70} प्रतिराजम् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {11।70} उपराजम् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {12।70} अव्ययीभावः च समासः नपुंसकलिङ्गः भवति इति नपुंसकलिङ्गता यथा स्यात् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {13।70} न एतत् अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {14।70} लिङ्गम् अशिष्यम् लोकाश्रयत्वात् लिङ्गस्य .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {15।70} इदम् तर्हि प्रयोजनम् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {16।70} न अव्ययीभावात् अतः अम् तु अपञ्चम्याः इति एषः विधिः यथा स्यात् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {17।70} अव्ययीभाव .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {18।70} द्विगु .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {19।70} द्विगुसञ्ज्ञा च प्रयोजनम् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {20।70} पञ्चगवम् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {21।70} दशगवम् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {22।70} द्विगुः च समासः नपुंसकलिङ्गः भवति इति नपुंसकलिङ्गता यथा स्यात् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {23।70} न एतत् अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {24।70} लिङ्गम् अशिष्यम् लोकाश्रयत्वात् लिङ्गस्य .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {25।70} इदम् तर्हि प्रयोजनम् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {26।70} द्विपुरी .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {27।70} त्रिपुरी .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {28।70} द्विगोः अकारान्तात् इति ईकारः यथा स्यात् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {29।70} एतत् अपि न अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {30।70} पुरशब्दः अयम् अकारान्तः .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {31।70} तेन समासः भविष्यति .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {32।70} आतः च अकारान्तः इति आह .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {33।70} क्षेमे सुभिक्षे कृतसञ्चयानि पुराणि विनयन्ति कोपम् इति .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {34।70} इदम् तर्हि प्रयोजनम् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {35।70} द्विधुरी त्रिधुरी .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {36।70} द्विगोः अकारान्तात् इति ङीप् यथा स्यात् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {37।70} द्विगु .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {38।70} द्वन्द्व .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {39।70} द्वन्द्वसञ्ज्ञा च प्रयोजनम् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {40।70} वाक्त्वचम् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {41।70} स्रक्त्वचम् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {42।70} द्वन्द्वः च समासः नपुंसकलिङ्गः भवति इति नपुंसकलिङ्गता यथा स्यात् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {43।70} न एतत् अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {44।70} लिङ्गम् अशिष्यम् लोकाश्रयत्वात् लिङ्गस्य .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {45।70} इदम् तर्हि प्रयोजनम् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {46।70} इदम् तर्हि प्रयोजनम् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {47।70} कोशः च निषत् च कोशनिषदम् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {48।70} कोशनिषदिनी .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {49।70} द्वन्द्वोपतापगर्ह्यात् प्राणिस्थात् इनिः इति इनिः यथा स्यात् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {50।70} द्वन्द्व .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {51।70} तत्पुरुष .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {52।70} तत्पुरुषसञ्ज्ञा च प्रयोजनम् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {53।70} परमधुरा उत्तमधुरा .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {54।70} परवत् लिङ्गम् द्वन्द्वतत्पुरुषयोः इति परवल्लिङ्गता यथा स्यात् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {55।70} न एतत् अस्ति प्रय्जोनम् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {56।70} उत्तरपदार्थप्रधानः तत्पुरुषः .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {57।70} इदम् तर्हि प्रयोजनम् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {58।70} अर्धधुरा .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {59।70} एतत् अपि न अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {60।70} लिङ्गम् अशिष्यम् लोकाश्रयत्वात् लिङ्गस्य .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {61।70} इदम् तर्हि प्रयोजनम् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {62।70} इदम् तर्हि .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {63।70} निर्धुरः .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {64।70} अव्ययम् तत्पुरुषे प्रकृतिस्वरम् भवति इति एषः स्वरः यथा स्यात् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {65।70} तत्पुरुष .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {66।70} बहुव्रीहि .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {67।70} बहुव्रीहिसञ्ज्ञा च प्रयोजनम् .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {68।70} उच्चधुरः .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {69।70} नीचधुरः .
(प्_5,4.68) क_इइ,437.16-438.21 रो_इव्,263-265 {70।70} बहुव्रीहौ प्रकृत्या पूर्वपदम् भवति इति एषः स्वरः यथा स्यात् .
(प्_5,4.69.1) क_इइ,438.23-26 रो_इव्,265 {1।8} इदम् विप्रतिषिद्धम् .
(प्_5,4.69.1) क_इइ,438.23-26 रो_इव्,265 {2।8} कः प्रतिषेधः .
(प्_5,4.69.1) क_इइ,438.23-26 रो_इव्,265 {3।8} परिगणिताभ्यः प्रकृतिभ्यः समासान्तः विधीयते न च तत्र का चित् पूजनान्ता प्रकृतिः निर्दिश्यते .
(प्_5,4.69.1) क_इइ,438.23-26 रो_इव्,265 {4।8} न एतत् विप्रतिषिद्धम् .
(प्_5,4.69.1) क_इइ,438.23-26 रो_इव्,265 {5।8} न एवम् विज्ञायते .
(प्_5,4.69.1) क_इइ,438.23-26 रो_इव्,265 {6।8} याभ्यः प्रकृतिभ्यः समासान्तः विधीयते न चेत् ताः पूजनान्ताः भवन्ति इति .
(प्_5,4.69.1) क_इइ,438.23-26 रो_इव्,265 {7।8} कथम् तर्हि .
(प्_5,4.69.1) क_इइ,438.23-26 रो_इव्,265 {8।8} न चेत् ताः पूजनात् पराः भवन्ति इति .
(प्_5,4.69.2) क_इइ,439.1-5 रो_इव्,265 {1।12} पूजायाम् स्वतिग्रहणम् .
(प्_5,4.69.2) क_इइ,439.1-5 रो_इव्,265 {2।12} पूजायाम् स्वतिग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_5,4.69.2) क_इइ,439.1-5 रो_इव्,265 {3।12} सुराजा .
(प्_5,4.69.2) क_इइ,439.1-5 रो_इव्,265 {4।12} अतिराजा .
(प्_5,4.69.2) क_इइ,439.1-5 रो_इव्,265 {5।12} क्व मा भूत् .
(प्_5,4.69.2) क_इइ,439.1-5 रो_इव्,265 {6।12} परमगवः .
(प्_5,4.69.2) क_इइ,439.1-5 रो_इव्,265 {7।12} उत्तमगवः .
(प्_5,4.69.2) क_इइ,439.1-5 रो_इव्,265 {8।12} प्राग्बहुव्रीहिग्रहणम् च .
(प्_5,4.69.2) क_इइ,439.1-5 रो_इव्,265 {9।12} प्राग्बहुव्रीहिग्रहणम् च कर्तव्यम् .
(प्_5,4.69.2) क_इइ,439.1-5 रो_इव्,265 {10।12} इह मा भूत् .
(प्_5,4.69.2) क_इइ,439.1-5 रो_इव्,265 {11।12} स्वक्षः .
(प्_5,4.69.2) क_इइ,439.1-5 रो_इव्,265 {12।12} अत्यक्षः इति .
(प्_5,4.70) क_इइ,439.7-8 रो_इव्,266 {1।5} क्षेपे इति किमर्थम् .
(प्_5,4.70) क_इइ,439.7-8 रो_इव्,266 {2।5} कस्य राजा किंराजा .
(प्_5,4.70) क_इइ,439.7-8 रो_इव्,266 {3।5} क्षेपे इति शक्यम् अकर्तुम् .
(प्_5,4.70) क_इइ,439.7-8 रो_इव्,266 {4।5} कस्मात् न भवति कस्य राजा किंराजा इति .
(प्_5,4.70) क_इइ,439.7-8 रो_इव्,266 {5।5} लक्षणप्रतिपदोक्तयोः प्रतिपदोक्तस्य एव इति .
(प्_5,4.73) क_इइ,439.10-17 रो_इव्,266 {1।17} डच्प्रकरणे सङ्ख्यायाः तत्पुरुषस्य उपसङ्ख्यानम् निस्त्रिंशाद्यर्थम् .
(प्_5,4.73) क_इइ,439.10-17 रो_इव्,266 {2।17} डच्प्रकरणे सङ्ख्यायाः तत्पुरुषस्य उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_5,4.73) क_इइ,439.10-17 रो_इव्,266 {3।17} किम् प्रयोजनम् .
(प्_5,4.73) क_इइ,439.10-17 रो_इव्,266 {4।17} निस्त्रिंशाद्यर्थम् .
(प्_5,4.73) क_इइ,439.10-17 रो_इव्,266 {5।17} निस्त्रिंशानि वर्षाणि .
(प्_5,4.73) क_इइ,439.10-17 रो_इव्,266 {6।17} निश्चत्वारिंशानि वर्षाणि .
(प्_5,4.73) क_इइ,439.10-17 रो_इव्,266 {7।17} अन्यत्र अधिकलोपात् .
(प्_5,4.73) क_इइ,439.10-17 रो_इव्,266 {8।17} अन्यत्र अधिकलोपात् इति वक्तव्यम् .
(प्_5,4.73) क_इइ,439.10-17 रो_इव्,266 {9।17} इह मा भूत् .
(प्_5,4.73) क_इइ,439.10-17 रो_इव्,266 {10।17} एकाधिका विंशतिः एकविंशतिः .
(प्_5,4.73) क_इइ,439.10-17 रो_इव्,266 {11।17} द्व्यधिका विंशतिः द्वाविंशतिः .
(प्_5,4.73) क_इइ,439.10-17 रो_इव्,266 {12।17} अव्ययादेः इति वक्तव्यम् .
(प्_5,4.73) क_इइ,439.10-17 रो_इव्,266 {13।17} इह मा भूत् .
(प्_5,4.73) क_इइ,439.10-17 रो_इव्,266 {14।17} गोत्रिंशत् .
(प्_5,4.73) क_इइ,439.10-17 रो_इव्,266 {15।17} गोचत्वारिंशत् इति .
(प्_5,4.73) क_इइ,439.10-17 रो_इव्,266 {16।17} तत् तर्हि वक्तव्यम् .
(प्_5,4.73) क_इइ,439.10-17 रो_इव्,266 {17।17} यदि अपि एतत् उच्यते अथ वा एतर्हि अन्यत्र अधिकलोपात् इति एतत् न क्रियते .
(प्_5,4.74) क_इइ,439.19-440.5 रो_इव्,266-267 {1।15} अनक्षे इति कथम् इदम् विज्ञायते .
(प्_5,4.74) क_इइ,439.19-440.5 रो_इव्,266-267 {2।15} न चेत् अक्षधूरन्तः समासः इति आहोस्वित् न चेत् अक्षः समासार्थः इति .
(प्_5,4.74) क_इइ,439.19-440.5 रो_इव्,266-267 {3।15} किम् च अतः .
(प्_5,4.74) क_इइ,439.19-440.5 रो_इव्,266-267 {4।15} यदि विज्ञायते न चेत् अक्षधूरन्तः समासः इति सिद्धम् अक्षस्य धूः अक्षधूः इति .
(प्_5,4.74) क_इइ,439.19-440.5 रो_इव्,266-267 {5।15} इदम् तु न सिध्यति .
(प्_5,4.74) क_इइ,439.19-440.5 रो_इव्,266-267 {6।15} दृढधूः अयम् अक्षः .
(प्_5,4.74) क_इइ,439.19-440.5 रो_इव्,266-267 {7।15} अस्तु तर्हि न चेत् अक्षः समासार्थः इति .
(प्_5,4.74) क_इइ,439.19-440.5 रो_इव्,266-267 {8।15} सिद्धम् दृढधूः अक्षः इति .
(प्_5,4.74) क_इइ,439.19-440.5 रो_इव्,266-267 {9।15} इदम् तु न सिध्यति .
(प्_5,4.74) क_इइ,439.19-440.5 रो_इव्,266-267 {10।15} अक्षस्य धूः अक्षधूः इति .
(प्_5,4.74) क_इइ,439.19-440.5 रो_इव्,266-267 {11।15} एवम् तर्हि न एवम् विज्ञायते न चेत् अक्षधूरन्तः समासः इति न अपि न चेत् अक्षः समासार्थः इति .
(प्_5,4.74) क_इइ,439.19-440.5 रो_इव्,266-267 {12।15} कथम् तर्हि .
(प्_5,4.74) क_इइ,439.19-440.5 रो_इव्,266-267 {13।15} न चेत् अक्षस्य धूः इति .
(प्_5,4.74) क_इइ,439.19-440.5 रो_इव्,266-267 {14।15} एवम् च कृत्वा न अपि न चेत् अक्षधूरन्तः समासः इति विज्ञायते न अपि न चेत् अक्षः समासार्थः इति .
(प्_5,4.74) क_इइ,439.19-440.5 रो_इव्,266-267 {15।15} अथ च उभयोः न भवति .
(प्_5,4.76) क_इइ,440.7-8 रो_इव्,267 {1।6} अदर्शनात् इति उच्यते .
(प्_5,4.76) क_इइ,440.7-8 रो_इव्,267 {2।6} तत्र इदम् न सिध्यति .
(प्_5,4.76) क_इइ,440.7-8 रो_इव्,267 {3।6} कवराक्षम् .
(प्_5,4.76) क_इइ,440.7-8 रो_इव्,267 {4।6} अदर्शनात् इति शक्यम् अकर्तुम् .
(प्_5,4.76) क_इइ,440.7-8 रो_इव्,267 {5।6} कथम् ब्राह्मणक्षि क्षत्रियाक्षि .
(प्_5,4.76) क_इइ,440.7-8 रो_इव्,267 {6।6} अप्राण्यङ्गात् इति वक्तव्यम् .
(प्_5,4.77) क_इइ,440.13-23 रो_इव्,268 {1।28} आद्याः त्रयः बहुव्रीहयः .
(प्_5,4.77) क_इइ,440.13-23 रो_इव्,268 {2।28} अद्रष्टा चतुर्णाम् अचतुरः .
(प्_5,4.77) क_इइ,440.13-23 रो_इव्,268 {3।28} विद्रष्टा चतुर्णाम् विचतुरः .
(प्_5,4.77) क_इइ,440.13-23 रो_इव्,268 {4।28} सुद्रष्टा चतुर्णाम् सुचतुरः .
(प्_5,4.77) क_इइ,440.13-23 रो_इव्,268 {5।28} ततः परे एकादश द्वन्द्वाः .
(प्_5,4.77) क_इइ,440.13-23 रो_इव्,268 {6।28} स्त्रीपुंस धेन्वनडुह ऋक्साम वाङ्मनस अक्षिभ्रुव दारगव ऊर्वष्ठीव पदष्ठीव नक्तन्दिव रात्रिन्दिव अहर्दिव .
(प्_5,4.77) क_इइ,440.13-23 रो_इव्,268 {7।28} ततः अव्ययीभावः .
(प्_5,4.77) क_इइ,440.13-23 रो_इव्,268 {8।28} सह रजसा सरजसम् .
(प्_5,4.77) क_इइ,440.13-23 रो_इव्,268 {9।28} ततः तत्पुरुषः .
(प्_5,4.77) क_इइ,440.13-23 रो_इव्,268 {10।28} निश्रितम् श्रेयः निःश्रेयसम् .
(प्_5,4.77) क_इइ,440.13-23 रो_इव्,268 {11।28} ततः षष्ठीसमासः .
(प्_5,4.77) क_इइ,440.13-23 रो_इव्,268 {12।28} पुरुषस्य आयुः पुरुषायुषम् .
(प्_5,4.77) क_इइ,440.13-23 रो_इव्,268 {13।28} ततः द्विगू .
(प्_5,4.77) क_इइ,440.13-23 रो_इव्,268 {14।28} द्वे आयुषी द्व्यायुषम् .
(प्_5,4.77) क_इइ,440.13-23 रो_इव्,268 {15।28} त्रीणि आयूंषि त्र्यायुषम् .
(प्_5,4.77) क_इइ,440.13-23 रो_इव्,268 {16।28} ततः द्वन्द्वः .
(प्_5,4.77) क_इइ,440.13-23 रो_इव्,268 {17।28} ऋक् च यजुः च र्ग्यजुषम् .
(प्_5,4.77) क_इइ,440.13-23 रो_इव्,268 {18।28} जातादयः उक्षान्ताः समानाधिकरणाः .
(प्_5,4.77) क_इइ,440.13-23 रो_इव्,268 {19।28} जातः उक्षा जातोक्षः .
(प्_5,4.77) क_इइ,440.13-23 रो_इव्,268 {20।28} महान् उक्षा महोक्षः .
(प्_5,4.77) क_इइ,440.13-23 रो_इव्,268 {21।28} वृद्धः उक्षा वृद्धोक्षः .
(प्_5,4.77) क_इइ,440.13-23 रो_इव्,268 {22।28} ततः अव्ययीभावः .
(प्_5,4.77) क_इइ,440.13-23 रो_इव्,268 {23।28} शुनः समीपम् उपशुनम् .
(प्_5,4.77) क_इइ,440.13-23 रो_इव्,268 {24।28} ततः सप्तमीसमासः गोष्ठे श्वा गोष्ठश्वः .
(प्_5,4.77) क_इइ,440.13-23 रो_इव्,268 {25।28} चतुरः अच्प्रकरणे त्र्युपाभ्याम् उपसङ्ख्यानम् .
(प्_5,4.77) क_इइ,440.13-23 रो_इव्,268 {26।28} चतुरः अच्प्रकरणे त्र्युपाभ्याम् उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_5,4.77) क_इइ,440.13-23 रो_इव्,268 {27।28} त्रिचतुराः .
(प्_5,4.77) क_इइ,440.13-23 रो_इव्,268 {28।28} उपचतुराः .
(प्_5,4.78) क_इइ,441.2 रो_इव्,268 {1।3} पल्यराजभ्याम् च इति वक्तव्यम् .
(प्_5,4.78) क_इइ,441.2 रो_इव्,268 {2।3} पल्यवर्चसम् .
(प्_5,4.78) क_इइ,441.2 रो_इव्,268 {3।3} राजवर्चसम् .
(प्_5,4.87) क_इइ,441.4-6 रो_इव्,268 {1।5} अहर्ग्रहणम् द्वन्द्वार्थम् .
(प्_5,4.87) क_इइ,441.4-6 रो_इव्,268 {2।5} अहर्ग्रहणम् द्वन्द्वार्थम् द्रष्टव्यम् .
(प्_5,4.87) क_इइ,441.4-6 रो_इव्,268 {3।5} किम् उच्यते द्वन्द्वार्थम् इति न पुनः तत्पुरुषार्थम् अपि स्यात् .
(प्_5,4.87) क_इइ,441.4-6 रो_इव्,268 {4।5} तत्पुरुषाभावात् .
(प्_5,4.87) क_इइ,441.4-6 रो_इव्,268 {5।5} न हि रात्र्यन्तः अहरादिः तत्पुरुषः अस्ति .
(प्_5,4.88) क_इइ,441.8-10 रो_इव्,269 {1।5} अह्नः अह्नवचनानर्थक्यम् च अह्नः टखोः नियमवचनात् .
(प्_5,4.88) क_इइ,441.8-10 रो_इव्,269 {2।5} अह्नः अह्नवचनम् अनर्थकम् .
(प्_5,4.88) क_इइ,441.8-10 रो_इव्,269 {3।5} किम् कारणम् .
(प्_5,4.88) क_इइ,441.8-10 रो_इव्,269 {4।5} अह्नः टखोः नियमवचनात् .
(प्_5,4.88) क_इइ,441.8-10 रो_इव्,269 {5।5} अह्नः टखोः एव इति एतत् नियमार्थम् भविष्यति .
(प्_5,4.103) क_इइ,441.12-13 रो_इव्,268 {1।5} अनसन्तात् नपुंसकात् छन्दसि वा इति वक्तव्यम् .
(प्_5,4.103) क_इइ,441.12-13 रो_इव्,268 {2।5} ब्रह्मसामम् .
(प्_5,4.103) क_इइ,441.12-13 रो_इव्,268 {3।5} ब्रह्मसाम .
(प्_5,4.103) क_इइ,441.12-13 रो_इव्,268 {4।5} देवच्छन्दसम् .
(प्_5,4.103) क_इइ,441.12-13 रो_इव्,268 {5।5} देवच्छन्दः .
(प्_5,4.113) क_इइ,441.15-442.3 रो_इव्,269-270 {1।9} किमर्थम् षच् प्रत्ययान्तरम् विधीयते न टच् प्रकृतः सः अनुवर्तिष्यते .
(प्_5,4.113) क_इइ,441.15-442.3 रो_इव्,269-270 {2।9} अतः उत्तरम् पठति .
(प्_5,4.113) क_इइ,441.15-442.3 रो_इव्,269-270 {3।9} षचि प्रत्ययान्तरकरणम् अनन्तोदात्तार्थम् .
(प्_5,4.113) क_इइ,441.15-442.3 रो_इव्,269-270 {4।9} षचि प्रत्ययान्तरम् क्रियते .
(प्_5,4.113) क_इइ,441.15-442.3 रो_इव्,269-270 {5।9} किम् प्रयोजनम् .
(प्_5,4.113) क_इइ,441.15-442.3 रो_इव्,269-270 {6।9} अनन्तोदात्तार्थम् .
(प्_5,4.113) क_इइ,441.15-442.3 रो_इव्,269-270 {7।9} अनन्तोदात्ताः प्रयोजयन्ति .
(प्_5,4.113) क_इइ,441.15-442.3 रो_इव्,269-270 {8।9} चक्रसक्थम् .
(प्_5,4.113) क_इइ,441.15-442.3 रो_इव्,269-270 {9।9} चक्रसक्थी .
(प्_5,4.115) क_इइ,442.5-7 रो_इव्,270 {1।6} किमर्थम् मूर्ध्नः ष प्रत्ययान्तरम् विधीयते न षच् प्रकृतः सः अनुवर्तिष्यते .
(प्_5,4.115) क_इइ,442.5-7 रो_इव्,270 {2।6} मूर्ध्नः च षवचनम् .
(प्_5,4.115) क_इइ,442.5-7 रो_इव्,270 {3।6} किम् .
(प्_5,4.115) क_इइ,442.5-7 रो_इव्,270 {4।6} अनन्तोदात्तार्थम् इति एव .
(प्_5,4.115) क_इइ,442.5-7 रो_इव्,270 {5।6} द्विमूर्धः .
(प्_5,4.115) क_इइ,442.5-7 रो_इव्,270 {6।6} त्रिमूर्धः .
(प्_5,4.116) क_इइ,442.9-20 रो_इव्,271 {1।22} अपि प्रधानपूरणीग्रहणम् .
(प्_5,4.116) क_इइ,442.9-20 रो_इव्,271 {2।22} अपि प्रधानपूरणीग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_5,4.116) क_इइ,442.9-20 रो_इव्,271 {3।22} प्रधानम् या पूरणी इति वक्तव्यम् .
(प्_5,4.116) क_इइ,442.9-20 रो_इव्,271 {4।22} इह मा भूत् .
(प्_5,4.116) क_इइ,442.9-20 रो_इव्,271 {5।22} कल्याणी पञ्चमी अस्य पक्षस्य कल्याणपञ्चमीकः पक्षः .
(प्_5,4.116) क_इइ,442.9-20 रो_इव्,271 {6।22} अथ इह कथम् भवितव्यम् .
(प्_5,4.116) क_इइ,442.9-20 रो_इव्,271 {7।22} कल्याणी पञ्चमी असाम् रात्रीणाम् इति .
(प्_5,4.116) क_इइ,442.9-20 रो_इव्,271 {8।22} कल्याणीपञ्चमाः रात्रयः इति भवितव्यम् .
(प्_5,4.116) क_इइ,442.9-20 रो_इव्,271 {9।22} रत्रयः अत्र प्रधानम् .
(प्_5,4.116) क_इइ,442.9-20 रो_इव्,271 {10।22} नेतुः नक्षत्रे उपसङ्ख्यानम् .
(प्_5,4.116) क_इइ,442.9-20 रो_इव्,271 {11।22} नेतुः नक्षत्रे उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_5,4.116) क_इइ,442.9-20 रो_इव्,271 {12।22} पुष्यनेत्राः .
(प्_5,4.116) क_इइ,442.9-20 रो_इव्,271 {13।22} मृगनेत्राः .
(प्_5,4.116) क_इइ,442.9-20 रो_इव्,271 {14।22} छन्दसि च .
(प्_5,4.116) क_इइ,442.9-20 रो_इव्,271 {15।22} छन्दसि च नेतुः उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_5,4.116) क_इइ,442.9-20 रो_इव्,271 {16।22} बृहस्पतिनेत्राः .
(प्_5,4.116) क_इइ,442.9-20 रो_इव्,271 {17।22} सोमनेत्राः .
(प्_5,4.116) क_इइ,442.9-20 रो_इव्,271 {18।22} मासात् भृतिप्रत्ययपूर्वपदात् ठज्विधिः .
(प्_5,4.116) क_इइ,442.9-20 रो_इव्,271 {19।22} मासात् भृतिप्रत्ययपूर्वपदात् ठच् विधेयः .
(प्_5,4.116) क_इइ,442.9-20 रो_इव्,271 {20।22} पञ्चकमासिकः .
(प्_5,4.116) क_इइ,442.9-20 रो_इव्,271 {21।22} षट्कमासिकः .
(प्_5,4.116) क_इइ,442.9-20 रो_इव्,271 {22।22} दशकमासिकः .
(प्_5,4.118) क_इइ,443.2-3 रो_इव्,272 {1।5} खरखुराभ्याम् च नस् वक्तव्यः .
(प्_5,4.118) क_इइ,443.2-3 रो_इव्,272 {2।5} खरणाः .
(प्_5,4.118) क_इइ,443.2-3 रो_इव्,272 {3।5} खुरणाः .
(प्_5,4.118) क_इइ,443.2-3 रो_इव्,272 {4।5} शितिनाः अर्चनाः अहिनाः इति नैगमाः .
(प्_5,4.118) क_इइ,443.2-3 रो_इव्,272 {5।5} शितिनाः अर्चनाः अहिनाः .
(प्_5,4.119) क_इइ,443.5 रो_इव्,272 {1।2} वेः ग्रः वक्तव्यः .
(प्_5,4.119) क_इइ,443.5 रो_इव्,272 {2।2} विग्रः .
(प्_5,4.131) क_इइ,443.7-8 रो_इव्,272 {1।3} ऊधसः अनङि स्त्रीग्रहणम् .
(प्_5,4.131) क_इइ,443.7-8 रो_इव्,272 {2।3} ऊधसः अनङि स्त्रीग्रहणम् कर्तव्यम् इह मा भूत् .
(प्_5,4.131) क_इइ,443.7-8 रो_इव्,272 {3।3} महोधाः पर्जन्यः इति .
(प्_5,4.135) क_इइ,443.10-13 रो_इव्,272-273 {1।6} गन्धस्य इत्त्वे तदेकान्तग्रहणम् .
(प्_5,4.135) क_इइ,443.10-13 रो_इव्,272-273 {2।6} गन्धस्य इत्त्वे तदेकान्तग्रहणम् कर्तव्यम् इह मा भूत् .
(प्_5,4.135) क_इइ,443.10-13 रो_इव्,272-273 {3।6} शोभनाः गन्धाः अस्य सुगन्धः आपणिकः इति .
(प्_5,4.135) क_इइ,443.10-13 रो_इव्,272-273 {4।6} अथ अनुलिप्ते कथम् भवितव्यम् .
(प्_5,4.135) क_इइ,443.10-13 रो_इव्,272-273 {5।6} यदि तावत् यत् अनुगतम् तत् अभिसमीक्षितम् सुगन्धिः इति भवितव्यम् .
(प्_5,4.135) क_इइ,443.10-13 रो_इव्,272-273 {6।6} अथ यत् प्रविशीर्णम् सुगन्धः इति भवितव्यम् .
(प्_5,4.154) क_इइ,443.14-444.11 रो_इव्,273-275 {1।29} शेषात् इति उच्यते .
(प्_5,4.154) क_इइ,443.14-444.11 रो_इव्,273-275 {2।29} कः शेषः नाम .
(प्_5,4.154) क_इइ,443.14-444.11 रो_इव्,273-275 {3।29} याभ्यः प्रकृतिभ्यः समासान्तः नि विधीयते सः शेषः .
(प्_5,4.154) क_इइ,443.14-444.11 रो_इव्,273-275 {4।29} किमर्थम् पुनः शेषग्रहणम् क्रियते .
(प्_5,4.154) क_इइ,443.14-444.11 रो_इव्,273-275 {5।29} याभ्यः प्रकृतिभ्यः समासान्तः विधीयते ताभ्यः मा भूत् इति .
(प्_5,4.154) क_इइ,443.14-444.11 रो_इव्,273-275 {6।29} न एतत् अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_5,4.154) क_इइ,443.14-444.11 रो_इव्,273-275 {7।29} ये प्रतिपदम् विधीयन्ते ते तत्र बाधकाः भविष्यन्ति .
(प्_5,4.154) क_इइ,443.14-444.11 रो_इव्,273-275 {8।29} अनवकाशाः हि विधयः बाधकाः भवन्ति सावकाशाः च समासान्ताः .
(प्_5,4.154) क_इइ,443.14-444.11 रो_इव्,273-275 {9।29} कः अवकाशः .
(प्_5,4.154) क_इइ,443.14-444.11 रो_इव्,273-275 {10।29} विभाषा कप् .
(प्_5,4.154) क_इइ,443.14-444.11 रो_इव्,273-275 {11।29} यदा न कप् सः अवकाशः .
(प्_5,4.154) क_इइ,443.14-444.11 रो_इव्,273-275 {12।29} कपः प्रसङ्गे उभयम् प्राप्नोति .
(प्_5,4.154) क_इइ,443.14-444.11 रो_इव्,273-275 {13।29} परत्वात् कप् प्राप्नोति .
(प्_5,4.154) क_इइ,443.14-444.11 रो_इव्,273-275 {14।29} तस्मात् शेषग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_5,4.154) क_इइ,443.14-444.11 रो_इव्,273-275 {15।29} किम् पुनः इदम् शेषग्रहणम् कबपेक्षम् यस्मात् बहुव्रीहेः कप् इति आहोस्वित् समासान्तापेक्षम् यस्मात् बहुव्रीहेः समासान्तः न विहितः इति .
(प्_5,4.154) क_इइ,443.14-444.11 रो_इव्,273-275 {16।29} किम् च अतः .
(प्_5,4.154) क_इइ,443.14-444.11 रो_इव्,273-275 {17।29} यदि विज्ञायते कबपेक्षम् अनृचः बह्वृचः इति अत्र अपि प्राप्नोति .
(प्_5,4.154) क_इइ,443.14-444.11 रो_इव्,273-275 {18।29} अथ समासान्तापेक्षम् अनृक्कम् बह्वृक्कम् सूक्तम् इति न सिध्यति .
(प्_5,4.154) क_इइ,443.14-444.11 रो_इव्,273-275 {19।29} अस्तु कबपेक्षम् .
(प्_5,4.154) क_इइ,443.14-444.11 रो_इव्,273-275 {20।29} कथम् अनृचः बह्वृचः इति .
(प्_5,4.154) क_इइ,443.14-444.11 रो_इव्,273-275 {21।29} विशेषे एतत् वक्तव्यम् .
(प्_5,4.154) क_इइ,443.14-444.11 रो_इव्,273-275 {22।29} अनृचः माणवे बह्वृचः चरणशाखायाम् इति .
(प्_5,4.154) क_इइ,443.14-444.11 रो_इव्,273-275 {23।29} इदम् तर्हि ऊधसः अनङि स्त्रीग्रहणम् चोदितम् .
(प्_5,4.154) क_इइ,443.14-444.11 रो_इव्,273-275 {24।29} तस्मिन् क्रियमाणे अपि प्राप्नोति .
(प्_5,4.154) क_इइ,443.14-444.11 रो_इव्,273-275 {25।29} एवम् तर्हि न एव कबपेक्षम् शेषग्रहणम् न अपि समासान्तापेक्षम् .
(प्_5,4.154) क_इइ,443.14-444.11 रो_इव्,273-275 {26।29} किम् तर्हि अनन्तरः यः बहुव्रीह्यधिकारः सः अपेक्ष्यते .
(प्_5,4.154) क_इइ,443.14-444.11 रो_इव्,273-275 {27।29} अनन्तरे बहुव्रीह्यधिकारे यस्मात् बहुव्रीहेः समासान्तः न विहितः इति .
(प्_5,4.154) क_इइ,443.14-444.11 रो_इव्,273-275 {28।29} कथम् अनृचः बह्वृचः इति .
(प्_5,4.154) क_इइ,443.14-444.11 रो_इव्,273-275 {29।29} वक्तव्यम् एव अनृचः माणवे बह्वृचः चरणशाखायाम् इति .
(प्_5,4.156) क_इइ,444.13-17 रो_इव्,275-276 {1।6} ईयसः उपसर्जनदीर्घत्वम् च .
(प्_5,4.156) क_इइ,444.13-17 रो_इव्,275-276 {2।6} ईयसः उपसर्जनदीर्घत्वम् च वक्तव्यम् .
(प्_5,4.156) क_इइ,444.13-17 रो_इव्,275-276 {3।6} बह्व्यः श्रेयस्यः अस्य बहुश्रेयसी .
(प्_5,4.156) क_इइ,444.13-17 रो_इव्,275-276 {4।6} विद्यमानश्रेयसी .
(प्_5,4.156) क_इइ,444.13-17 रो_इव्,275-276 {5।6} पुंवद्वचनात् सिद्धम् .
(प्_5,4.156) क_इइ,444.13-17 रो_इव्,275-276 {6।6} पुंवद्भावः अत्र भवति ईयसः बहुव्रीहौ पुंवद्वचनम् इति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {1।130} एकाचः इति किम् अयम् बहुव्रीहिः .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {2।130} एकः अच् अस्मिन् सः एकाच् .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {3।130} एकाचः इति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {4।130} आहोस्वित् तत्पुरुषः अयम् समानाधिकरणः .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {5।130} एकः अच् एकाच् .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {6।130} एकाचः .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {7।130} किम् च अतः .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {8।130} यदि बहुव्रीहिः सिद्धम् पपाच पपाठ .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {9।130} इयाय .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {10।130} आर इति न सिध्यति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {11।130} अथ तत्पुरुषः समानाधिकरणः सिद्धम् इयाय .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {12।130} आर इति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {13।130} पपाच पपाठ इति न सिध्यति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {14।130} अतः उत्तरम् पठति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {15।130} एकाचः द्वे प्रथमस्य इति बहुव्रीहिनिर्देशः .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {16।130} एकाचः द्वे प्रथमस्य इति बहुव्रीहिनिर्देशः अयम् .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {17।130} एकवर्णेषु कथम् .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {18।130} एकवर्णेषु व्यपदेशिवद्वचनात् .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {19।130} व्यपदेशिवत् एकस्मिन् कार्यम् भवति इति वक्तव्यम् .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {20।130} एवम् एकवर्णेषु द्विर्वचनम् भविष्यति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {21।130} एकाचः द्वे भवतः इति उच्यते .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {22।130} तत्र न ज्ञायते कस्य एकाचः द्वे भवतः इति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {23।130} वक्ष्यति लिटि धातोः अनभ्यासस्य इति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {24।130} तेन धातोः एकाचः इति विज्ञायते .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {25।130} यदि धातोः एकाचः सिद्धम् पपाच पपाठ .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {26।130} जजागार पुपुत्रीयिषति इति न सिध्यति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {27।130} धातोः इति न एषा एकाच्समानाधिकरणा षष्ठी .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {28।130} धातोः एकाचः इति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {29।130} किम् तर्हि अवयवयोगा एषा षष्ठी .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {30।130} धातोः यः एकाच् अवयवः इति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {31।130} अवयवयोगा एषा षष्ठी इति चेत् सिद्धम् जजागार पुपुत्रीयिषति इति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {32।130} पपाच पपाठ इति न सिध्यति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {33।130} एषः अपि व्यपदेशिवद्भावेन धातोः एकाच् अवयवः भवति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {34।130} एकाचः द्वे प्रथमस्य इति उच्यते .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {35।130} तेन यत्र एव प्रथमः च अप्रथमः च तत्र द्विर्वचनम् स्यात् .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {36।130} जजागार पुपुत्रीयिषति इति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {37।130} पपाच पपाठ इति अत्र न स्यात् .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {38।130} प्रथमत्वे च .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {39।130} प्रथमत्वे च किम् .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {40।130} व्यपदेशिवद्वचनात् सिद्धम् इति एव .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {41।130} सः तर्हि व्यपदेशिवद्भावः वक्तव्यः .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {42।130} न वक्तव्यः .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {43।130} उक्तम् वा .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {44।130} किम् उक्तम् .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {45।130} तत्र व्यपदेशिवद्वचनम् .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {46।130} एकाचः द्वे प्रथमार्थम् .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {47।130} षत्वे च आदेशसम्प्रत्ययार्थम् .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {48।130} अवचनात् लोकविज्ञानात् सिद्धम् इति एव .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {49।130} योगविभागः वा .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {50।130} अथ वा योगविभागः करिष्यते .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {51।130} एकाचः द्वे भवतः .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {52।130} किमर्थः योगविभागः .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {53।130} एकाज्मात्रस्य द्विर्वचनार्थः .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {54।130} एकाज्मात्रय्त द्विर्वचनम् यथा स्यात् .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {55।130} इयाय पपाच .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {56।130} ततः प्रथमस्य .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {57।130} प्रथमस्य एकाचः द्वे भवतः .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {58।130} इदम् इदानीम् किमर्थम् .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {59।130} नियमाऋथम् .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {60।130} यत्र प्रथमः च अप्रथमः च अस्ति तत्र प्रथमस्य एकाचः द्विर्वचनम् यथा स्यात् .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {61।130} अप्रथमस्य मा भूत् .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {62।130} जजागार पुपुत्रीयिषति इति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {63।130} एकाचः अवयवैकाच्त्वात् अवयवानाम् द्विर्वचनप्रसङ्गः .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {64।130} एकाचः अवयवैकाच्त्वात् अवयवानाम् द्विर्वचनम् प्राप्नोति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {65।130} नेनिजति इति अत्र निज्शब्दः अपि एकाच् इज्शब्दः अपि एकाच् इकारः अपि एकाच् निशब्दः अपि .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {66।130} तत्र निज्शब्दस्य द्विर्वचने रूपम् सिद्धम् दोषाः च न सन्ति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {67।130} इज्शब्दस्य द्विर्वचने रूपम् न सिध्यति दोषाः च न सन्ति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {68।130} इकारस्य द्विर्वचने रूपम् न सिधति दोषाः च न सन्ति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {69।130} निशब्दस्य द्विर्वचने रूपम् सिद्धम् दोषाः तु सन्ति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {70।130} तत्र कः दोषः .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {71।130} तत्र जुस्भाववचनम् .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {72।130} तत्र जुस्भावः वक्तव्यः .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {73।130} अनेनिजुः .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {74।130} पर्यवेविषुः .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {75।130} अभ्यस्तात् झेः जुस्भावः भवति इति जुस्भावः न प्राप्नोति जकारेणव्यवधानात् .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {76।130} स्वरः च .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {77।130} स्वरः च न सिध्यति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {78।130} नेनिजति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {79।130} यत् परिवेविषति इति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {80।130} अभ्यस्तानाम् आदिः उदात्तः भवति अजादौ लसार्वधातुके इति एषः स्वरः न प्राप्नोति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {81।130} अद्भावः च .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {82।130} अद्भावः च न सिध्यति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {83।130} नेनिजति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {84।130} परिवेविषति इति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {85।130} अभ्यस्तात् इति अद्भावः न प्राप्नोति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {86।130} नुम्प्रतिषेधः च .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {87।130} नुम्प्रतिषेधः च न सिध्यति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {88।130} नेनिजत् .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {89।130} परिवेविषत् .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {90।130} न अभ्यास्तात् शतुः इत् नुम्प्रतिषेधः न प्राप्नोति जकारेणव्यवधानात् .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {91।130} शास्त्रहानिः च .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {92।130} शास्त्रहानिः च भवति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {93।130} समुदायैकाचः शास्त्रम् हीयते .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {94।130} सिद्धम् तु तत्समुदायैकाच्त्वात् शास्त्राहानेः .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {95।130} सिद्धम् एतत् .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {96।130} कथम् .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {97।130} तत्समुदायैकाच्त्वात् .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {98।130} किम् इदम् तत्समुदायैकाच्त्वात् इति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {99।130} तस्य समुदायः तत्समुदायः .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {100।130} एकाज्भावः एकाच्त्वम् .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {101।130} तत्समुदायस्य एकाच्त्वम् तत्समुदायैकाच्त्वम् .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {102।130} तत्समुदायैकाच्त्वात् .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {103।130} तत्समुदायैकाचः द्विर्वचनम् भविष्यति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {104।130} कुतः .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {105।130} शास्त्राहानेः .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {106।130} एवम् हि शास्त्रम् अहीनम् भवति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {107।130} ननु च समुदायैकाचः द्विर्वचने क्रियमाणे अपि अवयवैकाचः शास्त्रम् हीयते .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {108।130} न हीयते .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {109।130} किम् कारणम् .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {110।130} अवयवात्मकत्वात् समुदायस्य .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {111।130} अवयवात्मकः समुदायः .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {112।130} अभ्यन्तरः हि समुदाये अवयवः .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {113।130} तत् यथा वृक्षः प्रचलन् सहावयवैः प्रचलति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {114।130} तत्र बहुव्रीहिनिर्देशे अनच्कस्य द्विर्वचनम् अन्यपदार्थत्वात् .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {115।130} तत्र बहुव्रीहिनिर्देशे अनच्कस्य द्विर्वचनम् प्राप्नोति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {116।130} आटतुः .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {117।130} आटुः .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {118।130} किम् कारणम् .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {119।130} अन्यपदार्थत्वात् बहुव्रीहेः .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {120।130} अन्यपदार्थे बहुव्रीहिः वर्तते .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {121।130} तेन यत् अन्यत् अचः तस्य द्विर्वचनम् स्यात् .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {122।130} तत् यथा चित्रगुः आनीयताम् इति उक्ते यस्य ताः गावः सन्ति सः आनीयते न गावः .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {123।130} सिद्धम् तु तद्गुणसंविज्ञानात् पाणिनेः यथा लोके .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {124।130} सिद्धम् एतत् .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {125।130} कथम् .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {126।130} तद्गुणसंविज्ञानात् भगवतः पाणिनेः आचार्यस्य यथा लोके .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {127।130} लोके शुक्लवाससम् आनय .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {128।130} लोहितोष्णीषाः प्रचरन्ति इति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {129।130} तद्गुणः आनीयते तद्गुणाः च प्रचरन्ति .
(प्_6,1.1.1) क_इइइ,1.1-3.23 रो_इव्,279-287 {130।130} एवम् इह अपि .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {1।87} अथ यस्य द्विर्वचनम् आरभ्यते किम् तस्य स्थाने भवति आहोस्वित् द्विःप्रयोगः इति .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {2।87} कः च अत्र विशेषः .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {3।87} स्थाने द्विर्वचने णिलोपवचनम् समुदायादेशत्वात् .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {4।87} स्थाने द्विर्वचने णिलोपः वक्तव्यः .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {5।87} आटिटत् .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {6।87} आशिशत् .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {7।87} किम् कारणम् .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {8।87} समुदायादेशत्वात् .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {9।87} समुदायस्य समुदायः आदेशः .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {10।87} तत्र सम्प्रमुग्धत्वात् प्रकृतिप्रत्ययसमुदायस्य नष्टः णिः भवति इति णेः अनिटि इति णिलोपः न प्राप्नोति .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {11।87} इदम् इह सम्प्रधार्यम् .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {12।87} द्विर्वचनम् क्रियताम् णिलोपः इति किम् अत्र कर्तव्यम् .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {13।87} परत्वात् णिलोपः .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {14।87} नित्यम् द्विर्वचनम् .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {15।87} कृते अपि णिलोपे प्राप्नोति अकृते अपि .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {16।87} द्विर्वचनम् अपि नित्यम् .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {17।87} अन्यस्य कृते णिलोपे प्राप्नोति अन्यस्य अकृते .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {18।87} शब्दान्तरस्य च प्राप्नुवन् विधिः अनित्यः भवति .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {19।87} नित्यम् एव द्विर्वचनम् .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {20।87} कथम् .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {21।87} रूपस्य स्थानिवत्वात् .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {22।87} यत् च सन्यङन्तस्य द्विर्वचने .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {23।87} यत् च सन्यङन्तस्य द्विर्वचने चोद्यम् तत् इह अपि चोद्यम् .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {24।87} किम् पुनः तत् .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {25।87} सन्यङन्तस्य चेत् अशेः सनि अनिटः .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {26।87} दीर्घकुत्वप्रसारणषत्वम् अधिकस्य द्विर्वचनात् .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {27।87} आबृध्योः च अभ्यस्तविप्रतिषेधः .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {28।87} सङाश्रये च समुदायस्य समुदायादेशत्वात् झलाश्रये च अव्यपदेशः आमिश्रत्वात् इति .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {29।87} अस्तु तर्हि द्विःप्रयोगः द्विर्वचनम् .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {30।87} द्विःप्रयोगः इति चेत् णकारषकारादेशादेः एत्त्ववचनम् लिटि .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {31।87} द्विःप्रयोगः इति चेत् णकारषकारादेशादेः एत्त्वम् लिटि वक्तव्यम् .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {32।87} नेमतुः .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {33।87} नेमुः .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {34।87} सेहे .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {35।87} सेहाते .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {36।87} सहिरे .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {37।87} अनादेशादेः इति प्रतिषेधः प्राप्नोति .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {38।87} स्थाने पुनः द्विर्वचने सति समुदायस्य समुदायः आदेशः .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {39।87} तत्र सम्प्रमुग्धत्वात् प्रकृतिप्रत्ययस्य नष्टः सः आदेशादिः भवति .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {40।87} द्विःप्रयोगे अपि द्विर्वचने सति न दोषः .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {41।87} वक्ष्यति तत्र लिड्ग्रहणस्य प्रयोजनम् .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {42।87} लिटि यः आदेशादिः तदादेः न इति .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {43।87} इड्वचनम् च यङ्लोपे .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {44।87} इट् च यङ्लोपे वक्तव्यः .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {45।87} बेभिदिता .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {46।87} बेभिदितुम् .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {47।87} एकाचः उपदेशे अनुदात्तात् इति इट्प्रतिषेधः प्राप्नोति .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {48।87} स्थाने पुनः द्विर्वचने सति समुदायस्य समुदायः आदेशः .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {49।87} तत्र सम्प्रमुग्धत्वात् प्रकृतिप्रत्ययस्य नष्टः सः भवति यः एकाच् उपदेशे अनुदात्तः .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {50।87} द्विःप्रयोगे अपि द्विर्वचने सति न दोषः .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {51।87} एकाज्ग्रहणेन अङ्गम् विशेषयिष्यामः .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {52।87} एकाचः अङ्गात् इति .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {53।87} ननु च एकैकम् अत्र अङ्गम् .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {54।87} समुदाये या वाक्यपरिसमाप्तिः तस्य अङ्गसञ्ज्ञा भविष्यति .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {55।87} कुतः एतत् .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {56।87} शास्त्राहानेः .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {57।87} एवम् हि शास्त्रम् अहीनम् भवति . इड्दीर्घप्रतिषेधः च .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {58।87} इटः दीर्घत्वस्य च प्रतिषेधः वक्तव्यः .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {59।87} जरीगृहिता .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {60।87} जरीगृहितुम् .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {61।87} ग्रहः अलिटि दीर्घः इति दीर्घत्वम् प्राप्नोति .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {62।87} स्थाने पुनः द्विर्वचने समुदायस्य समुदायः आदेशः .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {63।87} तत्र सम्प्रमुग्धत्वात् प्रकृतिप्रत्ययस्य नष्टः ग्रहिः .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {64।87} द्विःप्रयोगे अपि द्विर्वचने न दोषः .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {65।87} ग्रहिणा अङ्गम् विशेषयिष्यामः .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {66।87} ग्रहेः अङ्गात् इति .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {67।87} ननु च एकैकम् अत्र अङ्गम् .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {68।87} समुदाये या वाक्यपरिसमाप्तिः तस्य अङ्गसञ्ज्ञा भविष्यति .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {69।87} कुतः एतत् .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {70।87} शास्त्राहानेः .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {71।87} एवम् हि शास्त्रम् अहीनम् भवति . पदादिविधिप्रतिषेधः च .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {72।87} पदादिलक्षण विधेः प्रतिषेधः वक्तव्यः .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {73।87} सिषेच .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {74।87} सुष्वाप .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {75।87} सात्पदाद्योः इति षत्वप्रतिषेधः प्राप्नोति .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {76।87} स्थाने पुनः द्विर्वचने सति समुदायस्य समुदायः आदेशः .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {77।87} तत्र सम्प्रमुग्धत्वात् प्रकृतिप्रत्ययस्य नष्टः सः पदादिः भवति .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {78।87} द्विःप्रयोगे च अपि द्विर्वचने न दोषः .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {79।87} सुप्तिङ्भ्याम् पदम् विशेषयिष्यामः .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {80।87} यस्मात् सुप्तिङ्विधिः तदादि सुबन्तम् तिङन्तम् च .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {81।87} ननु च एकैकस्मात् [अपि अत्र (र्)] सुप्तिङ्विधिः .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {82।87} समुदाये या वाक्यपरिसमाप्तिः तया पदसञ्ज्ञा भविष्यति .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {83।87} कुतः एतत् .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {84।87} शास्त्राहानेः .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {85।87} एवम् हि शास्त्रम् अहीनम् भवति . तौ एव सुप्तिङौ ततः परौ सा एव च प्रकृतिः आद्या .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {86।87} आदिग्रहणम् प्रकृतम् .
(प्_6,1.1.2) क_इइइ,3.24-5.19 रो_इव्,287-293 {87।87} समुदायपदत्वम् एतेन .
(प्_6,1.2.1) क_इइइ,5.21-24 रो_इव्,294 {1।10} द्वितीयस्य इति अवचनम् अजादेः इति कर्मधारयात् पञ्चमी .
(प्_6,1.2.1) क_इइइ,5.21-24 रो_इव्,294 {2।10} द्वितीयस्य इति शक्यम् अवक्तुम् .
(प्_6,1.2.1) क_इइइ,5.21-24 रो_इव्,294 {3।10} कथम् .
(प्_6,1.2.1) क_इइइ,5.21-24 रो_इव्,294 {4।10} अजादेः इति न एषा बहुव्रीहेः षष्ठी .
(प्_6,1.2.1) क_इइइ,5.21-24 रो_इव्,294 {5।10} अच् आदिः यस्य सः अयम् अजादिः .
(प्_6,1.2.1) क_इइइ,5.21-24 रो_इव्,294 {6।10} अजादेः .
(प्_6,1.2.1) क_इइइ,5.21-24 रो_इव्,294 {7।10} किम् तर्हि कर्मधारयात् पञ्चमी .
(प्_6,1.2.1) क_इइइ,5.21-24 रो_इव्,294 {8।10} अच् आदिः अजादिः .
(प्_6,1.2.1) क_इइइ,5.21-24 रो_इव्,294 {9।10} अजादेः परस्य इति .
(प्_6,1.2.1) क_इइइ,5.21-24 रो_इव्,294 {10।10} तत्र अन्तरेण द्वितीयग्रहणम् द्वितीयस्य एव भविष्यति .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {1।99} द्वितीयद्विर्वचने प्रथमनिवृत्तिः प्राप्तत्वात् .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {2।99} द्वितीयद्विर्वचने प्रथमस्य निवृत्तिः वक्तव्या .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {3।99} अटिटिषति .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {4।99} अशिशिषति इति .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {5।99} किम् कारणम् .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {6।99} प्राप्तत्वात् .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {7।99} प्राप्नोति एकाचः द्वे प्रथमस्य इति .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {8।99} ननु च द्वितीयद्विर्वचनम् प्रथमद्विर्वचनम् बाधिष्यते .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {9।99} कथम् अन्यस्य उच्यमानस्य बाधकम् स्यात् .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {10।99} असति खलु अपि सम्भवे बाधनम् भवति अस्ति च सम्भवः यत् उभयम् स्यात् .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {11।99} न वा प्रथमविज्ञाने हि द्वितीयाप्राप्तिः अद्वितीयत्वात् .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {12।99} न वा वक्तव्यम् .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {13।99} किम् कारणम् .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {14।99} प्रथमविज्ञाने हि सति द्वितीयस्य अप्राप्तिः स्यात् .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {15।99} किम् कारणम् .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {16।99} अद्वितीयत्वात् .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {17।99} न हि इदानीम् प्रथमद्विर्वचने कृते द्वितीयः द्वितीयः भवति .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {18।99} कः तर्हि .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {19।99} तृतीयः .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {20।99} तत् यथा द्वयोः आसीनयोः तृतीये उपजाते न द्वितीयः द्वितीयः भवति .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {21।99} कः तर्हि .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {22।99} तृतीयः .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {23।99} न हि किम् चित् उच्यते अकृते द्विर्वचने यः द्वितीयः तस्य भवितव्यम् इति .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {24।99} किम् तर्हि कृते द्विर्वचने यः द्वितीयः तस्य भविष्यति .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {25।99} अनारम्भसमम् एवम् स्यात् .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {26।99} अटेः प्रथमस्य द्विर्वचनम् स्यात् .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {27।99} हलादिशेषः .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {28।99} द्वितीयस्य द्विर्वचनम् .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {29।99} हलादिशेषः .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {30।99} त्रयाणाम् अकाराणाम् पररूपत्वे अटिषति इति एवम् रूपम् स्यात् .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {31।99} न अनारम्भसमम् .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {32।99} अटेः प्रथमस्य द्विर्वचनम् .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {33।99} हलादिशेषः .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {34।99} इत्त्वम् .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {35।99} द्वितीयस्य द्विर्वचनम् .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {36।99} हलादिशेषः .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {37।99} इत्त्वम् ड्वयोः इकारयोः सवर्णदीर्घत्वम् .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {38।99} अभ्यासस्य असवर्णे इति इयङादेशः .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {39।99} इयटिषति इति एतत् रूपम् यथा स्यात् .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {40।99} ओणेः च उवणिषति इति .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {41।99} न अनिष्टार्था शास्त्रप्रवृत्तिः भवितुम् अर्हति .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {42।99} यथा वा आदिविकारे अलः अन्त्यविकाराभावः .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {43।99} यथा वा आदिविविधौ अलः अन्त्यविधिः न भवति एवम् द्वितीयद्विर्वचने प्रथमद्विर्वचनम् न भविष्यति .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {44।99} विषमः उपन्यासः .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {45।99} न अप्राप्ते अलः अन्त्यविधौ आदिविधिः आरभ्यते .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {46।99} सः तस्य बाधकः भविष्यति .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {47।99} इदम् अपि एवञ्जातीयकम् .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {48।99} न अप्राप्ते प्रथमद्विर्वचने द्वितीयद्विर्वचनमारभ्यते .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {49।99} तत् बाधकम् भविष्यति .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {50।99} यत् अपि उच्यते असति खलु अपि सम्भवे बाधनम् भवति अस्ति च सम्भवः यत् उभयम् स्यात् इति .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {51।99} न एतत् अस्ति .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {52।99} सति अपि सम्भवे बाधनम् भवति .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {53।99} तत् यथा दधि ब्राह्मणेभ्यः दीयताम् तक्रम् कौण्डिन्याय इति .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {54।99} सति अपि दधिदानस्य सम्भवे तक्रदानम् निवर्तकम् भवति .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {55।99} एवम् इह अपि सति अपि सम्भवे प्रथमद्विर्वचनस्य द्वितीयद्विर्वचनम् बाधिष्यते .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {56।99} तत्र पूर्वस्य अचः निवृत्तौ व्यञ्जनस्य अनिवृत्तिः वक्तव्या .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {57।99} अटिटिषति इति .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {58।99} यथा एव अचः निवृत्तिः भवति एवम् व्यञ्जनस्य अपि प्राप्नोति .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {59।99} तत्र पूर्वस्य अचः निवृत्तौ व्यञ्जनानिवृत्तिः अशासनात् पूर्वस्य .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {60।99} तत्र पूर्वस्य अचः निवृत्तौ व्यञ्जनस्य अनिवृत्तिः सिद्धा .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {61।99} कुतः .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {62।99} अशासनात् पूर्वस्य .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {63।99} न इह वयम् पूर्वस्य प्रतिषेधम् शिष्मः .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {64।99} किम् तर्हि द्वितीयस्य द्विर्वचनम् आरभामहे .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {65।99} व्यञ्जनानि पुनः नटभार्यवत् भवन्ति .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {66।99} तत् यथा .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {67।99} नटानाम् स्त्रियः रङ्गम् गताः यः यः पृच्छति कस्य यूयम् कस्य यूयम् इति तम् तम् तव तव इति आहुः .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {68।99} एवम् व्यञ्जनानि यस्य यस्य अचः कार्यम् उच्यते तम् तम् भजन्ते .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {69।99} न्द्रादिप्रतिषेधात् च .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {70।99} यत् अयम् न न्द्राः संयोगादयः इति प्रतिषेधम् शास्ति तत् ज्ञापयति आचार्यः पूर्वनिवृत्तौ व्यञ्जनस्य अनिवृत्तिः इति .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {71।99} तत्र द्वितीयाभावे प्रथमाद्विर्वचनम् प्रतिषिद्धत्वात् .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {72।99} तत्र द्वितीयस्य एकाचः अभावे प्रथमस्य द्विर्वचनम् न प्राप्नोति .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {73।99} आटतुः .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {74।99} आटुः .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {75।99} किम् कारणम् .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {76।99} प्रतिषिद्धत्वात् .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {77।99} अजादेः द्वितीयस्य इति प्रतिषेधात् .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {78।99} न एष दोषः .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {79।99} सति तस्मिन् प्रतिषेधः .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {80।99} सति द्वितीयद्विर्वचने प्रथमस्य प्रतिषेधः .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {81।99} सति तस्मिन् प्रतिषेधः इति चेत् हलादिशेषे दोषः .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {82।99} सति तस्मिन् प्रतिषेधः इति चेत् हलादिशेषे दोषः भवति .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {83।99} हलादिशेषे सति आद्ये हलि अनाद्यस्य लोपः स्यात् .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {84।99} इह एव स्यात् .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {85।99} पपाच .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {86।99} पपाठ इति .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {87।99} इह न स्यात् .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {88।99} आटतुः .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {89।99} आटुः इति .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {90।99} लोकवत् हलादिशेषे .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {91।99} लोकवत् हलादिशेषे सिद्धम् .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {92।99} तत् यथा लोके ईश्वरः आज्ञापयति ग्रामात् ग्रामात् मनुष्याः आनीयन्ताम् प्रागाङ्गम् ग्रामेभ्यः ब्राह्मणाः आनीयन्ताम् इति .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {93।99} येषु तत्र ग्रामेषु ब्राह्मणाः न सन्ति न तर्हि इदानीम् ततः अन्यस्य आनयनम् भवति .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {94।99} यथा तत्र क्व चित् अपि ब्राह्मणस्य सत्ता (र्: सर्वत्र) अब्राह्मणस्य निवर्त्तिका भवति एवम् इह अपि क्व चित् अपि हल् आद्यः सन् सर्वस्य अनाद्यस्य हलः निवर्तकः भवति .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {95।99} क्व चित् अन्यत्र लोपः इति चेत् द्विर्वचनम् .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {96।99} क्व चित् अन्यत्र लोपः इति चेत् द्विर्वचनम् अपि एवम् प्राप्नोति .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {97।99} क्व चित् अपि द्वितीयः सन् सर्वस्य प्रथमस्य निवर्तकः स्यात् .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {98।99} तस्मात् अस्तु सति तस्मिन् प्रतिषेधः इति एव. ननु च उक्तम् सति तस्मिन् प्रतिषेधः इति चेत् हलादिशेषे दोषः इति .
(प्_6,1.2.2) क_इइइ,6.1-8.7 रो_इव्,294-301 {99।99} प्रतिविधास्यते हलादिशेषे .
(प्_6,1.3) क_इइइ,8.9-22 रो_इव्,301-302 {1।22} किमर्थम् इदम् उच्यते .
(प्_6,1.3) क_इइइ,8.9-22 रो_इव्,301-302 {2।22} न्द्रादेः द्विर्वचनप्रसङ्गः तत्र न्द्राणाम् प्रतिषेधः .
(प्_6,1.3) क_इइइ,8.9-22 रो_इव्,301-302 {3।22} न्द्रादेः एकाचः द्विर्वचनम् प्राप्नोति .
(प्_6,1.3) क_इइइ,8.9-22 रो_इव्,301-302 {4।22} तत्र न्द्राणाम् संयोगादीनाम् प्रतिषेधः उच्यते .
(प्_6,1.3) क_इइइ,8.9-22 रो_इव्,301-302 {5।22} ईर्ष्यतेः तृतीयस्य .
(प्_6,1.3) क_इइइ,8.9-22 रो_इव्,301-302 {6।22} ईर्ष्यतेः तृतीयस्य द्वे भवतः इति वक्तव्यम् .
(प्_6,1.3) क_इइइ,8.9-22 रो_इव्,301-302 {7।22} के चित् तावत् आहुः एकाचः इति .
(प्_6,1.3) क_इइइ,8.9-22 रो_इव्,301-302 {8।22} ईर्ष्यिषिषति .
(प्_6,1.3) क_इइइ,8.9-22 रो_इव्,301-302 {9।22} अपरः आह :व्यञ्जनस्य इति : ईर्ष्यियिषति .
(प्_6,1.3) क_इइइ,8.9-22 रो_इव्,301-302 {10।22} कण्ड्वादीनाम् च .
(प्_6,1.3) क_इइइ,8.9-22 रो_इव्,301-302 {11।22} कण्ड्वादीनाम् च तृतीयस्य द्वे भवतः इति वक्तव्यम् .
(प्_6,1.3) क_इइइ,8.9-22 रो_इव्,301-302 {12।22} कण्डूयियिषति .
(प्_6,1.3) क_इइइ,8.9-22 रो_इव्,301-302 {13।22} असूयियिषति .
(प्_6,1.3) क_इइइ,8.9-22 रो_इव्,301-302 {14।22} वा नामधातूनाम् .
(प्_6,1.3) क_इइइ,8.9-22 रो_इव्,301-302 {15।22} वा नामधातूनाम् तृतीयस्य द्वे भवतः इति वक्तव्यम् .
(प्_6,1.3) क_इइइ,8.9-22 रो_इव्,301-302 {16।22} अश्वीयियिषति .
(प्_6,1.3) क_इइइ,8.9-22 रो_इव्,301-302 {17।22} अशिश्वीयिषति .
(प्_6,1.3) क_इइइ,8.9-22 रो_इव्,301-302 {18।22} अपरः आह यथेष्टम् वा .
(प्_6,1.3) क_इइइ,8.9-22 रो_इव्,301-302 {19।22} यथेष्टम् वा नामधातूनाम् इति .
(प्_6,1.3) क_इइइ,8.9-22 रो_इव्,301-302 {20।22} पुपुत्रीयिषति .
(प्_6,1.3) क_इइइ,8.9-22 रो_इव्,301-302 {21।22} पुतित्रीयिषति .
(प्_6,1.3) क_इइइ,8.9-22 रो_इव्,301-302 {22।22} पुत्रीयियिषति .
(प्_6,1.4) क_इइइ,9.2-7 रो_इव्,302 {1।16} पूर्वः अभ्यासः इति उच्यते .
(प्_6,1.4) क_इइइ,9.2-7 रो_इव्,302 {2।16} कस्य पूर्वः अभ्याससञ्ज्ञः भवति .
(प्_6,1.4) क_इइइ,9.2-7 रो_इव्,302 {3।16} द्वे इति वर्तते .
(प्_6,1.4) क_इइइ,9.2-7 रो_इव्,302 {4।16} द्वयोः इति वक्तव्यम् .
(प्_6,1.4) क_इइइ,9.2-7 रो_इव्,302 {5।16} सः तर्हि तथा निर्देशः कर्तव्यः .
(प्_6,1.4) क_इइइ,9.2-7 रो_इव्,302 {6।16} न कर्तव्यः .
(प्_6,1.4) क_इइइ,9.2-7 रो_इव्,302 {7।16} अर्थात् विभक्तिविपरिणामः भविष्यति .
(प्_6,1.4) क_इइइ,9.2-7 रो_इव्,302 {8।16} तत् यथा .
(प्_6,1.4) क_इइइ,9.2-7 रो_इव्,302 {9।16} उच्चानि देवदत्तस्य गृहाणि .
(प्_6,1.4) क_इइइ,9.2-7 रो_इव्,302 {10।16} आमन्त्रयस्व एनम् .
(प्_6,1.4) क_इइइ,9.2-7 रो_इव्,302 {11।16} देवदत्तम् इति गम्यते .
(प्_6,1.4) क_इइइ,9.2-7 रो_इव्,302 {12।16} देवदत्तस्य गावः अश्वाः हिरण्यम् इति .
(प्_6,1.4) क_इइइ,9.2-7 रो_इव्,302 {13।16} आढ्यः वैधवेयः .
(प्_6,1.4) क_इइइ,9.2-7 रो_इव्,302 {14।16} देवदत्तः इति गम्यते .
(प्_6,1.4) क_इइइ,9.2-7 रो_इव्,302 {15।16} पुरस्तात् षष्ठीनिर्दिष्टम् सत् अर्थात् द्वितीयानिर्दिष्टम् प्रथमानिर्दिष्टम् च भवति .
(प्_6,1.4) क_इइइ,9.2-7 रो_इव्,302 {16।16} एवम् इह अपि पुरस्तात् प्रथमानिर्दिष्टम् सत् अर्थात् षष्ठीनिर्दिष्टम् भविष्यति .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {1।97} अ भ्यस्तसञ्ज्ञायाम् सहवचनम् .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {2।97} अभ्यस्तसञ्ज्ञायाम् सहग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {3।97} किम् प्रयोजनम् .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {4।97} आद्युदात्तत्वे पृथगप्रसङ्गार्थम् .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {5।97} आद्युदात्तत्वम् सह भूतयोः यथा स्यात् .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {6।97} एकैकस्य मा भूत् इति .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {7।97} यस्मिन् एव अभ्यस्तकार्ये अदोषः तत् एव पठितम् अनुदात्तम् पदम् एकवर्जम् इति .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {8।97} न अस्ति यौगपद्येन सम्भवः .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {9।97} पर्यायः तर्हि प्रसज्येत .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {10।97} पर्यायः च .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {11।97} पूर्वस्य तावत् परेण रूपेण व्यवहितत्वात् न भविष्यति .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {12।97} परस्य तर्हि स्यात् .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {13।97} तत्र आचार्यप्रवृत्तिः ज्ञापयति न परस्य भवति इति यत् अयम् बिभेत्यादीनाम् पिति प्रत्ययात् पूर्वम् उदात्तम् भवति इति आह .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {14।97} एवम् व्यवधानात् न पूर्वस्य ज्ञापकात् न परस्य उच्यते च इदम् अभ्यस्तानाम् आदिः उदात्तः भवति इति .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {15।97} तत्र सः एव दोषः पर्यायः प्रसज्येत .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {16।97} तस्मात् सहग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {17।97} न कर्तव्यम् .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {18।97} उभेग्रहणम् क्रियते .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {19।97} तत् सहार्थम् विज्ञास्यते .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {20।97} अस्ति अन्यत् उभेग्रहणस्य प्रयोजनम् .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {21।97} किम् .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {22।97} उभेग्रहणम् सञ्ज्ञिनिर्देशार्थम् .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {23।97} अन्तरेण अपि उभेग्रहणम् प्रकॢप्तः सञ्ज्ञिनिर्देशः .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {24।97} कथम् .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {25।97} द्वे इति वर्तते .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {26।97} इदम् तर्हि प्रयोजनम् .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {27।97} यत्र उभे शब्दरूपे श्रूयेते तत्र अभ्यस्तसञ्ज्ञा यथा स्यात् .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {28।97} इह मा भूत् : ईर्त्सन्ति , ईप्सन्ति , ईर्त्सन् , ईप्सन् , ऐर्त्सन् , ऐप्सन् .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {29।97} किम् च स्यात् .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {30।97} अद्भावः नुम्प्रतिषेधः जुस्भावः इति एते विधयः प्रसज्येरन् .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {31।97} अद्भावे तावत् न दोषः .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {32।97} सप्तमे योगविभागः करिष्यते .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {33।97} इदम् अस्ति : अत् अभ्यस्तात् .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {34।97} ततः आत्मनेपदेषु .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {35।97} आत्मनेपदेषु च अत् भवति .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {36।97} अनतः इति उभयोः शेषः .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {37।97} यत् अपि उच्यते नुम्प्रतिषेधः इति एकादेशे कृते व्यपवर्गाभावात् न भविष्यति .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {38।97} इदम् इह सम्प्रधार्यम् .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {39।97} नुम्प्रतिषेधः क्रियताम् एकादेशः इति .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {40।97} किम् अत्र कर्तव्यम् .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {41।97} परत्वात् नुम्प्रतिषेधः .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {42।97} नित्यः एकादेशः .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {43।97} कृते अपि नुम्प्रतिषेधे प्राप्नोति अकृते अपि .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {44।97} एकादेशः अपि नित्यः .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {45।97} अन्यस्य कृते नुम्प्रतिषेधे प्राप्नोति अन्यस्य अकृते .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {46।97} शब्दान्तरस्य च प्राप्नुवन् विधिः अनित्यः भवति .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {47।97} अन्तरङ्गः तर्हि एकादेशः .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {48।97} का अन्तरङ्गता .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {49।97} वर्णौ आश्रित्य एकादेशः .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {50।97} विधिविषये नुम्प्रतिषेधः विधिः च नुमः सर्वनामस्थाने प्राक् तु सर्वनामस्थानोत्पत्तेः एकादेशः .
(प्_6,1.5) क_इइइ,9.9-11.3 रो_इव्,302-307 {51।97} तत्र नित्यत्वात् च अन्तरङ्गत्वात् च एकादेशः .
मूल पाठ: Vyākaraṇamahābhāṣya · Edition: Franz Kielhorn (Bombay 1880-1885), revised by K.V. Abhyankar (Poona 1972-1996). · Data entry George Cardona · GRETIL (Göttingen) · CC BY-NC-SA 4.0