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व्याकरणमहाभाष्य · भाग 621640

(प्_3,2.120) क_इइ,122.5-10 रो_इइइ,278 {5।10} क्रियायाः अत्र असमाप्तिः विवक्षिता .
(प्_3,2.120) क_इइ,122.5-10 रो_इइइ,278 {6।10} एषः नाम न्याय्यः वर्तमानः कालः यत्र क्रियायाः असमाप्तिः भवत् .
(प्_3,2.120) क_इइ,122.5-10 रो_इइइ,278 {7।10} तत्र वर्तमाने लट् इति एव सिद्धम् .
(प्_3,2.120) क_इइ,122.5-10 रो_इइइ,278 {8।10} यदि वर्तमाने लट् इति एव लट् भवति शतृशानचौ अपि प्राप्नुतः .
(प्_3,2.120) क_इइ,122.5-10 रो_इइइ,278 {9।10} इष्येते शतृशानचौ : ननु माम् कुर्वन्तम् पश्य .
(प्_3,2.120) क_इइ,122.5-10 रो_इइइ,278 {10।10} ननु माम् कुर्वाणम् पश्य इति .
(प्_3,2.122) क_इइ,122.12-22 रो_इइइ,278-279 {1।30} हशश्वद्भ्याम् पुरा .
(प्_3,2.122) क_इइ,122.12-22 रो_इइइ,278-279 {2।30} हशश्वल्लक्षणात् पुरालक्षणः भवति विप्रतिषेधेन .
(प्_3,2.122) क_इइ,122.12-22 रो_इइइ,278-279 {3।30} हशश्वल्लक्षणस्य अवकाशः .
(प्_3,2.122) क_इइ,122.12-22 रो_इइइ,278-279 {4।30} इति ह अकरोत् .
(प्_3,2.122) क_इइ,122.12-22 रो_इइइ,278-279 {5।30} इह ह चकार .
(प्_3,2.122) क_इइ,122.12-22 रो_इइइ,278-279 {6।30} शश्वत् अकरोत् .
(प्_3,2.122) क_इइ,122.12-22 रो_इइइ,278-279 {7।30} शश्वत् चकार .
(प्_3,2.122) क_इइ,122.12-22 रो_इइइ,278-279 {8।30} पुरालक्षणस्य अवकाशः .
(प्_3,2.122) क_इइ,122.12-22 रो_इइइ,278-279 {9।30} रथेन अयम् पुरा याति .
(प्_3,2.122) क_इइ,122.12-22 रो_इइइ,278-279 {10।30} रथेन अयम् पुरा अयासीत् .
(प्_3,2.122) क_इइ,122.12-22 रो_इइइ,278-279 {11।30} इह उभयम् प्राप्नोति .
(प्_3,2.122) क_इइ,122.12-22 रो_इइइ,278-279 {12।30} रथेन ह शश्वत् पुरा याति .
(प्_3,2.122) क_इइ,122.12-22 रो_इइइ,278-279 {13।30} रथेन ह शश्वत् पुरा अयासीत् .
(प्_3,2.122) क_इइ,122.12-22 रो_इइइ,278-279 {14।30} पुरालक्षणः भवति विप्रतिषेधेन .
(प्_3,2.122) क_इइ,122.12-22 रो_इइइ,278-279 {15।30} स्मः सर्वेभ्यः विप्रतिषेधेन .
(प्_3,2.122) क_इइ,122.12-22 रो_इइइ,278-279 {16।30} स्मलक्षणः सर्वेभ्यः भवति विप्रतिषेधेन .
(प्_3,2.122) क_इइ,122.12-22 रो_इइइ,278-279 {17।30} हशश्वल्लक्षणात् पुरालक्षणात् च .
(प्_3,2.122) क_इइ,122.12-22 रो_इइइ,278-279 {18।30} हशश्वल्लक्षणस्य अवकाशः .
(प्_3,2.122) क_इइ,122.12-22 रो_इइइ,278-279 {19।30} इति ह अकरोत् .
(प्_3,2.122) क_इइ,122.12-22 रो_इइइ,278-279 {20।30} इह ह चकार .
(प्_3,2.122) क_इइ,122.12-22 रो_इइइ,278-279 {21।30} शश्वत् अकरोत् .
(प्_3,2.122) क_इइ,122.12-22 रो_इइइ,278-279 {22।30} शश्वत् चकार .
(प्_3,2.122) क_इइ,122.12-22 रो_इइइ,278-279 {23।30} पुरालक्षणस्य अवकाशः .
(प्_3,2.122) क_इइ,122.12-22 रो_इइइ,278-279 {24।30} रथेन अयम् पुरा याति .
(प्_3,2.122) क_इइ,122.12-22 रो_इइइ,278-279 {25।30} रथेन अयम् पुरा अयासीत् .
(प्_3,2.122) क_इइ,122.12-22 रो_इइइ,278-279 {26।30} स्मलक्षणस्य अवकाशः .
(प्_3,2.122) क_इइ,122.12-22 रो_इइइ,278-279 {27।30} धर्मेण स्म कुरवः युध्यन्ते .
(प्_3,2.122) क_इइ,122.12-22 रो_इइइ,278-279 {28।30} इह सर्वम् प्राप्नोति .
(प्_3,2.122) क_इइ,122.12-22 रो_इइइ,278-279 {29।30} न ह स्म वै पुरा शश्वत् अपरशुवृक्णम् दहति .
(प्_3,2.122) क_इइ,122.12-22 रो_इइइ,278-279 {30।30} स्मलक्षणः लट् भवति विप्रतिषेधेन .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {1।60} प्रवृत्तस्य अविरामे शिष्या भवन्ती अवर्तमानत्वात् .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {2।60} प्रवृत्तस्य अविरामे शिष्या भवन्ती .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {3।60} इह अधीमहे .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {4।60} इह वसामः .

(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {5।60} इह पुष्यमित्रम् याजयामः .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {6।60} किम् पुनः कारणम् न सिध्यति .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {7।60} अवर्तमानत्वात् .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {8।60} नित्यप्रवृत्ते च कालाविभागात् .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {9।60} नित्यप्रवृत्ते च शासितव्या भवन्ती .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {10।60} तिष्ठन्ति पर्वताः .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {11।60} स्रवन्ति नद्यः इति .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {12।60} किम् पुनः कारणम् न सिध्यति .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {13।60} कालाविभागात् .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {14।60} इह भूतभविष्यत्प्रतिद्वन्द्वः वर्तमानः कालः .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {15।60} न च अत्र भूतभविष्यन्तौ कालौ स्तः .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {16।60} न्याय्या तु आरम्भानपवर्गात् .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {17।60} न्याय्या तु एषा वर्तमानकालता .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {18।60} कुतः .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {19।60} आरम्भानपवर्गात् .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {20।60} आरम्भः अत्र अनपवृक्तः .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {21।60} एषः नाम् न्याय्यः वर्तमानः कालः यत्र आरम्भः अनपवृक्तः .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {22।60} अस्ति च मुक्तसंशये विरामः .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {23।60} यम् खलु अपि भवान् मुक्तसंशयम् वर्तमानम् कालम् न्याय्यम् मन्यते भुङ्क्ते देवदत्तः इति तेन एतत् तुल्यम् .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {24।60} सः अपि हि अवश्यम् भुञ्जानः हसति वा जल्पति वा पानीयम् वा पिबति .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {25।60} यदि अत्र युक्ता वर्तमानकालता दृश्यते इह अपि युक्ता दृश्यताम् .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {26।60} सन्ति च कालविभागाः .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {27।60} सन्ति खलु अपि कालविभागाः .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {28।60} तिष्ठन्ति पर्वताः .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {29।60} स्थास्यन्ति पर्वताः .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {30।60} तस्थुः पर्वताः .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {31।60} किम् शक्यन्ते एते शब्दाः प्रयोक्तुम् इति अतः सन्ति कालविभागाः .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {32।60} न अवश्यम् प्रयोगात् एव .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {33।60} इह भूतभविष्यद्वर्तमानानाम् राज्ञाम् याः क्रियाः ताः तिष्ठतेः अधिकरणम् .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {34।60} इह तावत् तिष्ठन्ति पर्वताः इति .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {35।60} सम्प्रति ये राजानः तेषाम् याः क्रियाः तासु वर्तमानासु .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {36।60} स्थास्यन्ति पर्वताः इति .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {37।60} इतः उत्तरम् ये राजानः भविष्यन्ति तेषाम् याः क्रियाः तासु भविष्यन्तीषु .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {38।60} तस्थुः पर्वताः इति .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {39।60} ये राजानः बभूवुः तेषाम् याः क्रियाः तासु व्भूतासु .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {40।60} अपरः आह : न अस्ति वर्तमानः कालः इति .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {41।60} अपि च अत्र श्लोकान् उदाहरन्ति : न वर्तते चक्रम् .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {42।60} इषुः न पात्यते .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {43।60} न स्यन्दन्ते सरितः सागराय .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {44।60} कूटस्थः अयम् लोकः न विचेष्टा अस्ति .

(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {45।60} यः हि एवम् पश्यति सः अपि अनन्धः .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {46।60} मीमांसकः मन्यमानः युवा मेधाविसम्मतः काकम् स्म इह अनुपृच्छति : किम् ते पतितलक्षणम् .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {47।60} अनागते न पतसि अतिक्रान्ते च काक न .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {48।60} यदि सम्प्रति पतसि सर्वः लोकः पतति अयम् .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {49।60} हिमवान् अपि गच्छति .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {50।60} अनागतम् अतिक्रान्तम् वर्तमानम् इति त्रयम् .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {51।60} सर्वत्र गतिः न अस्ति .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {52।60} गच्छति इति किम् उच्यते .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {53।60} क्रियाप्रवृत्तौ यः हेतुः तदर्थम् यत् विचेष्टितम् तत् समीक्ष्य प्रयुञ्जीत गच्छति इति अविचारयन् .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {54।60} अप्रः आह .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {55।60} अस्ति वर्तमानः कालः इति .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {56।60} आदित्यगतिवत् न उपलभ्यते .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {57।60} अपि च अत्र श्लोकम् उदाहरन्ति .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {58।60} बिसस्य वालाः इव दह्यमानाः न लक्ष्यते विकृतिः सन्निपाते .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {59।60} अस्ति इति ताम् वेदयन्ते त्रिभभावाः .
(प्_3,2.123) क_इइ,123.2-124.13 रो_इइइ,279-285 {60।60} सूक्ष्मः हि भावः अनुमितेन गम्यः .
(प्_3,2.124.1) क_इइ,125.2-20 रो_इइइ,286-288 {1।27} लस्य अप्रथमासमानाधिकरणेन अयोगात् अदेशानुपपत्तिः यथा अन्यत्र .
(प्_3,2.124.1) क_इइ,125.2-20 रो_इइइ,286-288 {2।27} लस्य अप्रथमासमानाधिकरणेन अयोगात् अदेशयोः नुपपत्तिः यथा अन्यत्र .
(प्_3,2.124.1) क_इइ,125.2-20 रो_इइइ,286-288 {3।27} तत् यथा अन्यत्र अपि लस्य अप्रथमासमानाधिकरणेन योगः न भवति .
(प्_3,2.124.1) क_इइ,125.2-20 रो_इइइ,286-288 {4।27} क्व अन्यत्र .
(प्_3,2.124.1) क_इइ,125.2-20 रो_इइइ,286-288 {5।27} लङि .
(प्_3,2.124.1) क_इइ,125.2-20 रो_इइइ,286-288 {6।27} अपचत् ओदनम् देवदत्तः इति .
(प्_3,2.124.1) क_इइ,125.2-20 रो_इइइ,286-288 {7।27} योगः इति चेत् अन्यत्र अपि योगः स्यात् .
(प्_3,2.124.1) क_इइ,125.2-20 रो_इइइ,286-288 {8।27} अथ मतम् एतत् भवति योगः इति अन्यत्र अपि योगः स्यात् .
(प्_3,2.124.1) क_इइ,125.2-20 रो_इइइ,286-288 {9।27} क्व अन्यत्र .
(प्_3,2.124.1) क_इइ,125.2-20 रो_इइइ,286-288 {10।27} लङि .
(प्_3,2.124.1) क_इइ,125.2-20 रो_इइइ,286-288 {11।27} अपचत् ओदनम् देवदत्तः इति .
(प्_3,2.124.1) क_इइ,125.2-20 रो_इइइ,286-288 {12।27} न क्व चित् योगः इति कृत्वा अतः सर्वत्र योगेन भवितव्यम् क्व चित् अयोगः इति कृत्वा सर्वत्र अयोगेन .
(प्_3,2.124.1) क_इइ,125.2-20 रो_इइइ,286-288 {13।27} तत् यथा .
(प्_3,2.124.1) क_इइ,125.2-20 रो_इइइ,286-288 {14।27} समानम् ईहमानानाम् च अधीयानानाम् च के चित् अर्थैः युज्यन्ते अपरे न .
(प्_3,2.124.1) क_इइ,125.2-20 रो_इइइ,286-288 {15।27} न च इदानीम् कः चित् अर्थवान् इति अतः सर्वैः अर्थवद्भिः शक्यम् भवितुम् कः चित् अनर्थकः इति सर्वैः अनर्थकैः .
(प्_3,2.124.1) क_इइ,125.2-20 रो_इइइ,286-288 {16।27} तत्र किम् अस्माभिः शक्यम् कर्तुम् .
(प्_3,2.124.1) क_इइ,125.2-20 रो_इइइ,286-288 {17।27} यत् लोटः अप्रथमासमानाधिकरणेन योगः भवति लङः न स्वाभाविकम् एतत् .
(प्_3,2.124.1) क_इइ,125.2-20 रो_इइइ,286-288 {18।27} अथ वा आदेशे सामानाधिकरण्यम् दृष्ट्वा अनुमानात् गन्तव्यम् प्रकृतेः अपि सामानाधिकरण्यम् भवति इति .
(प्_3,2.124.1) क_इइ,125.2-20 रो_इइइ,286-288 {19।27} तत् यथा धूमम् दृष्ट्वा अग्निः अत्र इति गम्यते त्रिविष्टब्धकम् दृष्ट्वा परिव्राजकः इति .
(प्_3,2.124.1) क_इइ,125.2-20 रो_इइइ,286-288 {20।27} विषमः उपन्यासः .
(प्_3,2.124.1) क_इइ,125.2-20 रो_इइइ,286-288 {21।27} प्रत्यक्षः तेन अग्निधूमयोः अभिसम्बन्धः कृतः भवति त्रिविष्टब्धकपरिव्राजकयोः च .
(प्_3,2.124.1) क_इइ,125.2-20 रो_इइइ,286-288 {22।27} सः तद्विदेशस्थम् अपि दृष्ट्वा जानाति अग्निः अत्र परिव्राजकः अत्र इति .
(प्_3,2.124.1) क_इइ,125.2-20 रो_इइइ,286-288 {23।27} भवति वै प्रत्यक्षात् अपि अनुमानबलीयस्त्वम् .
(प्_3,2.124.1) क_इइ,125.2-20 रो_इइइ,286-288 {24।27} तत् यथा अलातचक्रम् प्रत्यक्षम् दृश्यते अनुमानात् च गम्यते न एतत् अस्ति इति .

(प्_3,2.124.1) क_इइ,125.2-20 रो_इइइ,286-288 {25।27} कस्य चित् खलु अपि सकृत् कृतः अभिसम्बन्धः अत्यन्ताय कृतः भवति .
(प्_3,2.124.1) क_इइ,125.2-20 रो_इइइ,286-288 {26।27} तत् यथा वृक्षपर्णयोः अयम् वृक्षः इदम् पर्णम् इति .
(प्_3,2.124.1) क_इइ,125.2-20 रो_इइइ,286-288 {27।27} सः तद्विदेशस्थम् अपि दृष्ट्वा जानाति वृक्षस्य इदम् पर्णम् इति .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {1।80} किम् पुनः अयम् पर्युदासः : यत् अन्यत् प्रथमासमानाधिकरणात् इति , आहोस्वित् प्रसज्यप्रतिषेधः : प्रथमासमानाधिकरणे न इति .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {2।80} कः च अत्र विशेषः .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {3।80} लटः शतृशानचौ अप्रथमासमानाधिकरणे इति चेत् प्रत्ययोत्तरपदयोः उपसङ्ख्यानम् .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {4।80} लटः शतृशानचौ अप्रथमासमानाधिकरणे इति चेत् प्रत्ययोत्तरपदयोः उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {5।80} कौर्वतः पाचतः कुर्वद्भक्तिः पचद्भक्तिः कुर्वाणभक्तिः पचमानभक्तिः .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {6।80} अस्तु तर्हि प्रसज्यप्रतिषेधः .प्रथमासमानाधिकरणे न इति .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {7।80} प्रसज्यप्रतिषेधेउत्तरपदे आदेशानुपपत्तिः .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {8।80} प्रसज्यप्रतिषेधेउत्तरपदे आदेशयोः अनुपपत्तिः .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {9।80} कुर्वती च असौ भक्तिः च कुर्वद्भक्तिः पचभक्तिः कुर्वाणभक्तिः पचमानभक्तिः इति .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {10।80} ये च अपि एते समानाधिकरणवृत्तयः तद्धिताः तत्र च शतृशानचौ न प्राप्नुतः .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {11।80} कुर्वत्तरः पचत्तरः कुर्वाणतरः पचमानतरः कुर्वद्रूपः पचद्रूपः कुर्वाणरूपः पचमानरूपः कुर्वत्कल्पः पचत्कल्पः कुर्वाणकल्पः पचमानकल्पः इति .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {12।80} सिद्धम् तु प्रत्ययोत्तरपदयोः च इति वचनात् .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {13।80} सिद्धम् एतत् .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {14।80} कथम् .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {15।80} प्रत्ययोत्तरपदयोः च शतृशानचौ भवतः इति वक्तव्यम् .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {16।80} तत्र प्रत्ययस्य आदेशनिमित्तत्वात् अप्रसिद्धिः .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {17।80} तत्र प्रत्ययस्य आदेशनिमित्तत्वात् अप्रसिद्धिः .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {18।80} आदेशनिमित्तः प्रत्ययः प्रत्ययनिमित्तः च आदेशः .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {19।80} तत् एतत् इतरेतराश्रयम् भवति .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {20।80} इतरेतराश्रयाणि च न प्रक्ल्पन्ते .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {21।80} उत्तरपदस्य च सुबन्तनिमित्तत्वात् शतृशानचोः अप्रसिद्धिः .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {22।80} उत्तरपदस्य च सुबन्तनिमित्तत्वात् शतृशानचोः अप्रसिद्धिः .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {23।80} उत्तरपदनिमित्तः सुप् सुबन्तनिमित्तम् च उत्तरपदम् .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {24।80} तत् एतत् इतरेतराश्रयम् भवति .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {25।80} इतरेतराश्रयाणि च न प्रक्ल्पन्ते .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {26।80} न वा लकारस्य कृत्त्वात् प्रातिपदिकत्वम् तदाश्रयम् प्रत्ययविधानम् .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {27।80} न वा एषः दोषः .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {28।80} किम् कारणम् .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {29।80} लकारस्य कृत्त्वात् प्रातिपदिकत्वम् .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {30।80} लकारः कृत् कृत् प्रातिपदिकम् इति प्रातिपदिकसञ्ज्ञा .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {31।80} तदाश्रयम् प्रत्ययविधानम् .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {32।80} प्रातिपदिकाश्रया स्वाद्युत्पत्तिः भविष्यति .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {33।80} तिङादेशात् सुबुत्पत्तिः . तिङादेशः क्रियताम् सुबुत्पत्तिः इति परत्वात् सुबुत्पत्तिः भविष्यति .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {34।80} तस्मात् उत्तरपदप्रसिद्धिः .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {35।80} तस्मात् उत्तरपदम् प्रसिद्धम् .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {36।80} उत्तरपदे प्रसिद्धे उत्तरपदे इति शतृशानचौ भविष्यतः .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {37।80} इह अपि तर्हि तिङादेशात् सुबुत्पत्तिः स्यात् पचति पठति इति .

(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {38।80} अस्ति अत्र विशेषः .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {39।80} नित्यः अत्र तिङादेशः .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {40।80} उत्पन्ने अपि सुपि प्राप्नोति अनुत्पन्ने अपि प्राप्नोति .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {41।80} नित्यत्वात् तिङादेशे कृते सुबुत्पत्तिः न भविष्यति .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {42।80} इह अपि तर्हि नित्यत्वात् तिङादेशः स्यात् कुर्वद्भक्तिः पचद्भक्तिः पचमानभक्तिः इति .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {43।80} अस्ति अत्र विशेषः .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {44।80} शतृशानचौ तिङपवादौ तौ च निमित्तवन्तौ .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {45।80} न च अपवादविषये उत्सर्गः अभिनिविशते .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {46।80} पूर्वम् हि अपवादाः अभिनिविशन्ते पश्चात् उत्सर्गः .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {47।80} प्रकल्प्य वा अपवादविषयम् ततः उत्सर्गः अभिनिविशते .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {48।80} न तावत् अत्र कदा चित् तिङ् भवति .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {49।80} अपवादौ शतृशानचौ प्रतीक्षते .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {50।80} तत् एतत् क्व सिद्धम् भवति .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {51।80} यत्र सामान्यात् उत्पत्तिः .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {52।80} यत्र हि विशेषात् अतः इञ् इति इतरेतराश्रयम् एव तत्र भवति .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {53।80} वीक्षमाणस्य अपत्यम् वैक्षमाणिः इति .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {54।80} इह च शतृशानचौ प्राप्नुतः .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {55।80} पचतितराम् जल्पतितराम् पचतिरूपम् जल्पतिरूपम् पचतिकल्पम् जल्पतिकल्पम् पचति पठति इति .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {56।80} तत् एतत् कथम् कृत्वा सिद्धम् भवति .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {57।80} शतृशानचौ यदि लटः वा .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {58।80} यदि शतृशानचौ यदि लटः वा भवतः व्यवस्थितविभाषा च .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {59।80} तेन इह च भविष्यतः कौर्वतः पाचतः कुर्वद्भक्तिः पचद्भक्तिः पचमानभक्तिः कुर्वत्तरः पचत्तरः पचमानतरः कुर्वद्रूपः पचद्रूपः पचमानरूपः कुर्वत्कल्पः पचत्कल्पः पचमानकल्पः पचन् पठन् इति च लटः शतृशानचौ .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {60।80} इह च न भविष्यतः पचतितराम् जल्पतितराम् पचतिरूपम् जल्पतिरूपम् पचतिकल्पम् जल्पतिकल्पम् पचति पठति इति च लटः शतृशानचौ .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {61।80} तत् तर्हि वावचनम् कर्तव्यम् .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {62।80} न कर्तव्यम् .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {63।80} प्रकृतम् अनुवर्तते .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {64।80} क्व प्रकृतम् .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {65।80} नन्वोः विभाषा इति .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {66।80} यदि तत् अनुवर्तते वर्तमाने लट इति लट् अपि विभाषा प्राप्नोति .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {67।80} सम्बन्धम् अनुवर्तिष्यते .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {68।80} नन्वोः विभाषा .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {69।80} पुरि लुङ् च अस्मे विभाषा .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {70।80} वर्तमाने लट् पुरि लुङ् च अस्मे विभाषा .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {71।80} लटः शतृशानचौ विभाषा .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {72।80} पुरि लुङ् च अस्मे इति निवृत्तम् .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {73।80} न तर्हि इदानीम् अप्रथमासमानाधिकरणे इति वक्तव्यम् .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {74।80} वक्तव्यम् च .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {75।80} किम् प्रयोजनम् .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {76।80} नित्याऋथम् .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {77।80} अप्रथमासमानाधिकरणे नित्यौ यथा स्याताम् .

(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {78।80} क्व तर्हि इदानीम् विभाषा .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {79।80} प्रथमासमानाधिकरणे .
(प्_3,2.124.2) क_इइ,125.21-127.24 रो_इइइ,292 {80।80} पचन् पचति पचमानः पचते इति .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {1।49} लक्षणहेत्वोः क्रियायाः गुणे उपसङ्ख्यानम् .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {2।49} लक्षणहेत्वोः क्रियायाः गुणे उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {3।49} तिष्ठन् मूत्रयति .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {4।49} गच्छन् भक्षयति .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {5।49} कर्तुः च लक्षणयोः पर्यायेण अचयोगे .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {6।49} कर्तुः च लक्षणयोः पर्यायेण अचयोगे उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {7।49} यः अधीयानः आस्ते सः देवदत्त्तः .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {8।49} यः आसीनः अधीते सः देवदत्तः .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {9।49} अचयोगे इति किमर्थम् .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {10।49} यः आस्ते च अधीते च सः चैत्रः .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {11।49} तत्त्वान्वाख्याने च .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {12।49} तत्त्वान्वाख्याने च उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {13।49} शयाना वर्धते दूर्वा .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {14।49} आसीनम् वर्धते बिसम् इति .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {15।49} सदादयः च बहुलम् .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {16।49} सदादयः च बहुलम् इति वक्तव्यम् .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {17।49} सन् ब्राह्मणः अस्ति ब्राह्मणः .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {18।49} विद्यते ब्राह्मणः विद्यमानः ब्राह्मणः इति .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {19।49} इङ्जुहोत्योः वावचनम् .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {20।49} इङ्जुहोत्योः वा इति वक्तव्यम् .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {21।49} अधीते अधीयानः .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {22।49} जुहोति जुह्वत् .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {23।49} माङि आक्रोशे . माङि आक्रोशे इति वक्तव्यम् .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {24।49} मा पचन् .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {25।49} मा पचमानः .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {26।49} तत् तर्हि वक्तव्यम् .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {27।49} न वक्तव्यम् .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {28।49} लक्षणहेत्वोः क्रियायाः इति एव सिद्धम् .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {29।49} इह तावत् तिष्ठन् मूत्रयति इति .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {30।49} तिष्ठतिक्रिया मूत्रयतिक्रियायाः लक्षणम् .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {31।49} गच्छन् भक्षयति इति .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {32।49} गच्छतिक्रिया भक्षयतिक्रियायाः लक्षणम् .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {33।49} यः अधीयानः आस्ते सः देवदत्त्तः इति .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {34।49} अध्ययनक्रिया आसनक्रियायाः लक्षणम् .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {35।49} यः आसीनः अधीते सः देवदत्तः इति .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {36।49} आसिक्रिया अध्ययनक्रियायाः लक्षणम् .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {37।49} इदम् तर्हि प्रयोजनम् .

(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {38।49} अचयोगे इति वक्ष्यामि इति .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {39।49} इह मा भूत् .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {40।49} यः आस्ते च अधीते च सः चैत्रः इति .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {41।49} एतत् अपि न अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {42।49} न एतत् क्रियायाः लक्षणम् .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {43।49} किम् तर्हि .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {44।49} कर्तृलक्षणम् एतत् .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {45।49} शयाना वर्धते दूर्वा इति .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {46।49} शेतिक्रिया वृद्धिक्रियायाः लक्षणम् .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {47।49} आसीनम् वर्धते बिसम् इति .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {48।49} आसिक्रिया वृद्धिक्रियायाः लक्षणम् .
(प्_3,2.126) क_इइ,127.26-128.23 रो_इइइ,292-294 {49।49} सदादयः च बहुलम् इङ्जुहोत्योः वा माङि आक्रोशे इति वक्तव्यम् एव.
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {1।50} तौग्रहणम् किमर्थम् .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {2।50} शतृशानचौ प्रतिनिर्दिश्येते .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {3।50} न एतत् अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {4।50} प्रकृतौ शतृशानचौ अनुवर्तिष्येते .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {5।50} क्व प्रकृतौ .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {6।50} लटः शतृसानचौ अप्रथमासमानाधिकरणे इति .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {7।50} अतः उत्तरम् पठति .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {8।50} तौ सत् इति वचनम् असंसर्गार्थम् टौ ग्रहणम् क्रियते असंसर्गार्थम् .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {9।50} असंसक्तयोः एतैः विशेषैः शतृशानचोः सञ्ज्ञा यथा स्यात् .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {10।50} ननु च एते विशेषाः निवर्तेरन् .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {11।50} यदि अपि एते विशेषाः निवर्तन्ते अयम् तु खलु वर्तमानः कालः अवश्यम् उत्तरार्थः अनुवर्त्यः .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {12।50} तस्मिन् अनुवर्तमाने वर्तमानकालविहितयोः एव शतृशानचोः सत्स्ञ्ज्ञा स्यात् .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {13।50} भूतभविष्यकालविहितयोः न स्यात् .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {14।50} किम् पुनः भूतभविष्यकालविहितयोः सत्स्ञ्ज्ञावचने प्रयोजनम् .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {15।50} पूरणगुणसुहितसत् इति .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {16।50} ब्राह्मणस्य पक्ष्यन् .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {17।50} ब्राह्मणस्य पक्ष्यमाणः .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {18।50} अथ क्रियमाणे अपि तौग्रहणे कथम् एव असंसक्तयोः एतैः विशेषैः सञ्ज्ञा लभ्या .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {19।50} लभ्या इति आह .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {20।50} कथम् .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {21।50} तौ इति शब्दतः सत् इति योगे क्रियमाणे तौ ग्रहणम् योगाङ्गम् जायते .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {22।50} सति च योगाङ्गे योगविभागः करिष्यते .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {23।50} तौ .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {24।50} तौ एतौ शतृशानचौ धातुमात्रात् परस्य प्रत्ययस्य भवतः .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {25।50} ततः सत् .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {26।50} सत्स्ञ्ज्ञौ भवतौ शतृशानचौ .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {27।50} इह अपि तर्हि प्राप्नुतः .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {28।50} कारकः हारकः इति .

(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {29।50} अवधारणम् लृटि विधानम् .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {30।50} लृतः सत् वा इति एतत् नियमार्थम् भविष्यति .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {31।50} लृटः एव धातुमात्रात् परस्य न अन्यस्य इति .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {32।50} कैमर्थ्यक्यात् नियमः भवति .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {33।50} विधेयम् न अस्ति इति कृत्वा .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {34।50} इह च अस्ति विधेयम् .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {35।50} किम् .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {36।50} नित्यौ शतृशानचौ प्राप्तौ .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {37।50} तौ विभाषा विधेयौ .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {38।50} तत्र अपूर्वः विधिः अस्तु नियमः अस्तु इति अपूर्वः एव विधिः भविष्यति न नियमः .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {39।50} योगविभागतः च विहितम् सत् .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {40।50} एवम् तर्हि योगविभागः करिष्यते .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {41।50} लृटः सत् .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {42।50} लृटः सत्सञ्ज्ञौ भवतः .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {43।50} किमर्थम् इदम् .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {44।50} नियमार्थम् .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {45।50} लृटः एव धातुमात्रात् परस्य न अन्यस्य इति .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {46।50} ततः वा .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {47।50} वा च लृटः शतृशानचौ सत्सञ्ज्ञौ भवतः .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {48।50} तत्र अयम् अपि अर्थः .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {49।50} सद्विधिः नित्यम् अप्रथमासमानाधिकरणे इति वक्ष्यति .
(प्_3,2.127.1) क_इइ,128.25-129.23 रो_इइइ,294-296 {50।50} तत् न वक्तव्यम् भवति .
(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {1।37} अथ यौ एतौ उत्तरौ शतानौ किम् एतौ लादेशौ आहोस्वित् अलादेशौ .
(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {2।37} कः च अत्र विशेषः .
(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {3।37} उत्तरयोः लादेशे वावचनम् .
(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {4।37} उत्तरयोः लादेशे वा इति वक्तव्यम् .
(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {5।37} पवमानः यजमानः .
(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {6।37} पवते यजते इति अपि यथा स्यात् .
(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {7।37} साधनाभिधानम् .
(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {8।37} साधनाभिधानम् च प्राप्नोति .
(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {9।37} लः कर्मणि च भावे च अकर्मकेभ्यः इति भावकर्मणोः अपि प्राप्नुतः .
(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {10।37} स्वरः .
(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {11।37} स्वरः च साध्यः .
(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {12।37} कति इह पवमानाः .
(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {13।37} अदुपदेशात् लसार्वधातुकम् अनुदात्तम् भवति इति एषः स्वरः प्राप्नोति .
(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {14।37} उपग्रहप्रतिषेधः च .
(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {15।37} उपग्रहस्य च प्रतिषेधः वक्तव्यः .
(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {16।37} कति इह निघ्नानाः .
(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {17।37} तङानौ आत्मनेपदम् इति आत्मनेपदसञ्ज्ञा प्राप्नोति .
(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {18।37} स्ताम् तर्हि अलादेशौ .

(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {19।37} अलादेशे षष्ठीप्रतिषेधः .
(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {20।37} अलादेशे षष्ठीप्रतिषेधः वक्तव्यः .
(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {21।37} सोमम् पवमानः .
(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {22।37} नडम् आघ्नानः .
(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {23।37} अधीयन् पारायणम् .
(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {24।37} लप्रयोगे न इति प्रतिषेधः न प्राप्नोति .
(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {25।37} मा भूत् एवम् .
(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {26।37} तृन् इति एव भविष्यति .
(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {27।37} कथम् .
(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {28।37} तृन् इति न इदम् प्रत्ययग्रहणम् .
(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {29।37} किम् तर्हि .
(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {30।37} प्रत्याहारग्रहणम् .
(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {31।37} क्व सन्निविष्टाणाम् प्रत्याहारः .
(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {32।37} लटः शतृ इति अतः आरभ्य आ तृनः नकारात् .
(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {33।37} यदि प्रत्याहारग्रहणम् चौरस्य द्विषन् वृषलस्य द्विषन् अत्र अपि प्राप्नोति .
(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {34।37} द्विषः शतुः वावचनम् .
(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {35।37} द्विषः शतुः वा इति वक्तव्यम् .
(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {36।37} तत् च अवश्यम् वक्तव्यम् प्रत्ययग्रहणे सति प्रतिषेधार्थम् .
(प्_3,2.127.2) क_इइ,129.24-130.19 रो_इइइ,296-297 {37।37} तत् एव प्रत्याहारग्रहणे सति विध्यर्थम् भविष्यति.
(प्_3,2.135) क_इइ,130.21-131.13 रो_इइइ,298-300 {1।30} तृन्विधौ ऋत्विक्षु च अनुपसर्गस्य .
(प्_3,2.135) क_इइ,130.21-131.13 रो_इइइ,298-300 {2।30} तृन्विधौ ऋत्विक्षु च अनुपसर्गस्य इति वक्तव्यम् .
(प्_3,2.135) क_इइ,130.21-131.13 रो_इइइ,298-300 {3।30} होता पोता .
(प्_3,2.135) क_इइ,130.21-131.13 रो_इइइ,298-300 {4।30} अनुपसर्गस्य इति किमर्थम् .
(प्_3,2.135) क_इइ,130.21-131.13 रो_इइइ,298-300 {5।30} प्रशास्ता प्रतिहर्ता .
(प्_3,2.135) क_इइ,130.21-131.13 रो_इइइ,298-300 {6।30} नयतेः षुक् च .
(प्_3,2.135) क_इइ,130.21-131.13 रो_इइइ,298-300 {7।30} नयतेः षुक् वक्तव्यः .
(प्_3,2.135) क_इइ,130.21-131.13 रो_इइइ,298-300 {8।30} तृन् च प्रत्ययः वक्तव्यञ्. नेष्टा .
(प्_3,2.135) क_इइ,130.21-131.13 रो_इइइ,298-300 {9।30} न वा धात्वन्यत्वात् . न वा वक्तव्यम् .
(प्_3,2.135) क_इइ,130.21-131.13 रो_इइइ,298-300 {10।30} किम् कारणम् .
(प्_3,2.135) क_इइ,130.21-131.13 रो_इइइ,298-300 {11।30} धात्वन्यत्वात् .
(प्_3,2.135) क_इइ,130.21-131.13 रो_इइइ,298-300 {12।30} धात्वन्तरम् नेषतिः .
(प्_3,2.135) क_इइ,130.21-131.13 रो_इइइ,298-300 {13।30} कथम् ज्ञायते .
(प्_3,2.135) क_इइ,130.21-131.13 रो_इइइ,298-300 {14।30} नेषतु नेष्टात् इति दर्शनात् .
(प्_3,2.135) क_इइ,130.21-131.13 रो_इइइ,298-300 {15।30} नेषतु नेष्टात् इति प्रयोगः दृश्यते .
(प्_3,2.135) क_इइ,130.21-131.13 रो_इइइ,298-300 {16।30} इन्द्रः नः तेन नेषतु .
(प्_3,2.135) क_इइ,130.21-131.13 रो_इइइ,298-300 {17।30} गाः वः नेष्टात् .
(प्_3,2.135) क_इइ,130.21-131.13 रो_इइइ,298-300 {18।30} त्विषेः देवतायाम् अकारः च उपधायाः अनिट्वम् च .
(प्_3,2.135) क_इइ,130.21-131.13 रो_इइइ,298-300 {19।30} त्विषेः देवतायाम् तृन् वक्तव्यः अकारः च उपधायाः अनिट्वम् च इति .
(प्_3,2.135) क_इइ,130.21-131.13 रो_इइइ,298-300 {20।30} त्वष्टा .
(प्_3,2.135) क_इइ,130.21-131.13 रो_इइइ,298-300 {21।30} किम् पुनः इदम् त्विषेः एव अनिट्वम् .

(प्_3,2.135) क_इइ,130.21-131.13 रो_इइइ,298-300 {22।30} न इति आह .
(प्_3,2.135) क_इइ,130.21-131.13 रो_इइइ,298-300 {23।30} यत् च अनुक्रान्तम् यत् च अनुक्रंस्यते सर्वस्य एषः शेषः अनिट्वम् इति .
(प्_3,2.135) क_इइ,130.21-131.13 रो_इइइ,298-300 {24।30} क्षदेः च युक्ते .
(प्_3,2.135) क_इइ,130.21-131.13 रो_इइइ,298-300 {25।30} क्षदेः च युक्ते तृन् वक्तव्यः .
(प्_3,2.135) क_इइ,130.21-131.13 रो_इइइ,298-300 {26।30} क्षत्ता .
(प्_3,2.135) क_इइ,130.21-131.13 रो_इइइ,298-300 {27।30} छन्दसि तृच् च .
(प्_3,2.135) क_इइ,130.21-131.13 रो_इइइ,298-300 {28।30} छन्दसि तृच् च तृन् च वक्तव्यः .
(प्_3,2.135) क_इइ,130.21-131.13 रो_इइइ,298-300 {29।30} क्षत्तृभ्यः सङ्ग्रहीतृभ्यः .
(प्_3,2.135) क_इइ,130.21-131.13 रो_इइइ,298-300 {30।30} क्षत्तृभ्यः सङ्ग्रहीतृभ्यः .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {1।52} स्नोः कित्त्वे स्थः ईकार्प्रतिषेधः .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {2।52} स्नोः कित्त्वे स्थः ईकार्प्रतिषेधः वक्तव्यः .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {3।52} स्थास्नुः इति .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {4।52} घुमास्थागापाजहातिसाम् हलि इति ईत्त्वम् प्राप्नोति .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {5।52} एवम् तर्हि न कित् करिष्यते .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {6।52} अकिति गुणप्रतिषेधः .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {7।52} यदि अकित् गुणप्रतिषेधः वक्तव्यः .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {8।52} जिष्णुः इति .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {9।52} भुवः इट्प्रतिषेधः च .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {10।52} भुवः इट्प्रतिषेधः च वक्तव्यः .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {11।52} किम् च अन्यत् .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {12।52} गुणप्रतिषेधः च .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {13।52} भूष्णुः इति .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {14।52} अस्तु तर्हि कित्. ननु च उक्तम् स्नोः कित्त्वे स्थः ईकार्प्रतिषेधः वक्तव्यः इति .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {15।52} न एषः दोषः .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {16।52} स्थादंशिभ्याम् स्नुः छन्दसि .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {17।52} स्थादंशिभ्याम् स्नुः छन्दसि वक्तव्यः .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {18।52} स्थास्नु जङ्गमम् .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {19।52} दङ्क्ष्णवः पशवः इति .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {20।52} सः इदानीम् स्थः अविशेषेण विधास्यते .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {21।52} सूत्रम् तर्हि भिद्यते .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {22।52} यथान्यासम् अस्तु. ननु च उक्तम् स्नोः कित्त्वे स्थः ईकार्प्रतिषेधः वक्तव्यः इति .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {23।52} एवम् तर्हि गित् करिष्यते .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {24।52} स्थोः गित्त्वात् न स्थः ईकारः .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {25।52} स्थोः गित्त्वात् स्थः ईकारः न भविष्यति .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {26।52} किम् कारणम् .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {27।52} क्ङितोः ईत्त्वशासनात् .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {28।52} क्ङितोः ईत्त्वम् शिष्यते .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {29।52} इह तर्हि जिष्णुः इति गुणः प्राप्नोति .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {30।52} गुणाभावः त्रिषु स्मार्यः .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {31।52} गुणाभावः त्रिषु स्मर्तव्यः .

(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {32।52} गिति किति ङिति इति .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {33।52} तत् गकारग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {34।52} न कर्तव्यम् .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {35।52} क्रियते न्यासे एव .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {36।52} ककारे गकारः चर्त्वभूतः निर्दिश्यते .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {37।52} क्क्ङिति च इति .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {38।52} इह तर्हि भूष्णुः इति श्र्युकः किति इति इट्प्रतिषेधः न प्राप्नोति .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {39।52} श्र्युको अनिट्त्वम् गकोः इतोः .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {40।52} श्र्युकः अनिट्त्वम् गकारककारयोः इति वक्तव्यम् .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {41।52} तत् गकारग्रहणम् कर्तव्यम् .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {42।52} न कर्तव्यम् .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {43।52} क्रियते न्यासः एव .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {44।52} ककारे गकारः चर्त्वभूतः निर्दिश्यते .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {45।52} श्र्युकः क्किति इति .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {46।52} यदि एवम् चर्त्वस्य असिद्धत्वात् हशि इति उत्त्वम् प्राप्नोति .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {47।52} सौत्रः निर्देशः .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {48।52} अथ वा असंहितया निर्देशः करिष्यते .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {49।52} श्र्युकः क्किति इति .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {50।52} स्थोः गित्त्वात् न स्थः ईकारः क्ङितोः ईत्त्वशासनात् .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {51।52} गुणाभावः त्रिषु स्मार्यः .
(प्_3,2.139) क_इइ,131.15-132.20 रो_इइइ,299-300 {52।52} श्र्युको अनिट्त्वम् गकोः इतोः .
(प्_3,2.141) क_इइ,132.22-133.4 रो_इइइ,301 {1।13} घिनण् अयम् वक्तव्यः .
(प्_3,2.141) क_इइ,132.22-133.4 रो_इइइ,301 {2।13} घिनुणि हि सति शमिनौ शमिनः तमिनौ तमिनः उगिदचाम् सर्वनामस्थाने अधातोः इति नुम् प्रसज्येत .
(प्_3,2.141) क_इइ,132.22-133.4 रो_इइइ,301 {3।13} न एषः दोषः .
(प्_3,2.141) क_इइ,132.22-133.4 रो_इइइ,301 {4।13} झल्ग्रहणम् तत्र चोदयिष्यति .
(प्_3,2.141) क_इइ,132.22-133.4 रो_इइइ,301 {5।13} इह तर्हि : शमिनितरा शमिनीतरा तमिनितरा तमिनीतरा : उगितः घादिषु नद्याः अन्यतरस्याम् ह्रस्वः भवति इति अन्यरतस्याम् ह्रस्वत्वम् प्रसज्येत .
(प्_3,2.141) क_इइ,132.22-133.4 रो_इइइ,301 {6।13} इष्यते एव ह्रस्वत्वम् .
(प्_3,2.141) क_इइ,132.22-133.4 रो_इइइ,301 {7।13} घिनुण् अकर्मकाणाम् .
(प्_3,2.141) क_इइ,132.22-133.4 रो_इइइ,301 {8।13} घिनुण् अकर्मकाणाम् इति वक्तव्यम् .
(प्_3,2.141) क_इइ,132.22-133.4 रो_इइइ,301 {9।13} इह मा भूत् .
(प्_3,2.141) क_इइ,132.22-133.4 रो_इइइ,301 {10।13} सम्पृणक्ति शाकम् इति .
(प्_3,2.141) क_इइ,132.22-133.4 रो_इइइ,301 {11।13} उक्तम् वा .
(प्_3,2.141) क_इइ,132.22-133.4 रो_इइइ,301 {12।13} किम् उक्तम् .
(प्_3,2.141) क_इइ,132.22-133.4 रो_इइइ,301 {13।13} अनभिधानात् इति .
(प्_3,2.146) क_इइ,133.7-19 रो_इइइ,301-302 {1।19} किमर्थम् निन्दादिभ्यः वुञ् विधीयते न ण्वुला एव सिद्धम् .
(प्_3,2.146) क_इइ,133.7-19 रो_इइइ,301-302 {2।19} न हि अस्ति विशेषः निन्दादिभ्यः ण्वुलः वा वुञः वा .
(प्_3,2.146) क_इइ,133.7-19 रो_इइइ,301-302 {3।19} तत् एव रूपम् सः एव स्वरः .
(प्_3,2.146) क_इइ,133.7-19 रो_इइइ,301-302 {4।19} वुञ्म् अनेकाचः .
(प्_3,2.146) क_इइ,133.7-19 रो_इइइ,301-302 {5।19} वुञ्म् अनेकाचः प्रयोजयन्ति .
(प्_3,2.146) क_इइ,133.7-19 रो_इइइ,301-302 {6।19} असूयकः .

(प्_3,2.146) क_इइ,133.7-19 रो_इइइ,301-302 {7।19} अथ ये अत्र एकाचः पठ्यन्ते तेषाम् ग्रहणम् किमर्थम् न तेषाम् ण्वुला एव सिद्धम् .
(प्_3,2.146) क_इइ,133.7-19 रो_इइइ,301-302 {8।19} न सिध्यति .
(प्_3,2.146) क_इइ,133.7-19 रो_इइइ,301-302 {9।19} अयम् तच्छीलादिषु तृन् विधीयते .
(प्_3,2.146) क_इइ,133.7-19 रो_इइइ,301-302 {10।19} सः विशेषविहितः सामान्यविहितम् ण्वुलम् बाधेत .
(प्_3,2.146) क_इइ,133.7-19 रो_इइइ,301-302 {11।19} वासरूपन्यायेन ण्वुल् अपि भविष्यति .
(प्_3,2.146) क_इइ,133.7-19 रो_इइइ,301-302 {12।19} अतः उत्तरम् पठति .
(प्_3,2.146) क_इइ,133.7-19 रो_इइइ,301-302 {13।19} निन्दादिभ्यः वुञ्वचनम् अन्येभ्यः ण्वुलः प्रतिषेधार्थम् .
(प्_3,2.146) क_इइ,133.7-19 रो_इइइ,301-302 {14।19} निन्दादिभ्यः वुञ्वचनम् क्रियते ज्ञापकार्थम् .
(प्_3,2.146) क_इइ,133.7-19 रो_इइइ,301-302 {15।19} किम् ज्ञाप्यम् .
(प्_3,2.146) क_इइ,133.7-19 रो_इइइ,301-302 {16।19} एतत् ज्ञापयति आचार्यः तच्छीलादिषु वासरूपन्यायेन अन्येभ्यः ण्वुल् न भवति इति .
(प्_3,2.146) क_इइ,133.7-19 रो_इइइ,301-302 {17।19} तृजादिप्रतिषेधाऋथम् वा .
(प्_3,2.146) क_इइ,133.7-19 रो_इइइ,301-302 {18।19} अथ वा एतत् ज्ञापयति आचार्यः .
(प्_3,2.146) क_इइ,133.7-19 रो_इइइ,301-302 {19।19} तच्छीलादिषु सर्वे एव तृजासयः वासरूपेण न भवन्ति इति .
(प्_3,2.150) क_इइ,133.21-134.9 रो_इइइ,302-303 {1।18} पदिग्रहणम् अनर्थकम् अनुदात्तेतः च हलादेः इति सिद्धत्वात् .
(प्_3,2.150) क_इइ,133.21-134.9 रो_इइइ,302-303 {2।18} पदिग्रहणम् अनर्थकम् .
(प्_3,2.150) क_इइ,133.21-134.9 रो_इइइ,302-303 {3।18} किम् कारणम् .
(प्_3,2.150) क_इइ,133.21-134.9 रो_इइइ,302-303 {4।18} अनुदात्तेतः च हलादेः इति एव अत्र युच् सिद्धः .
(प्_3,2.150) क_इइ,133.21-134.9 रो_इइइ,302-303 {5।18} न सिध्यति .
(प्_3,2.150) क_इइ,133.21-134.9 रो_इइइ,302-303 {6।18} अयम् पदेः उकञ् विधीयते लषपदपद्स्थाभूवृषहनकमगमशॄभ्यः उकञ् इति .
(प्_3,2.150) क_इइ,133.21-134.9 रो_इइइ,302-303 {7।18} सः विशेषविहितः सामान्यविहितम् युचम् बाधेत .
(प्_3,2.150) क_इइ,133.21-134.9 रो_इइइ,302-303 {8।18} वासरूपन्यायेन युच् अपि भविष्यति .
(प्_3,2.150) क_इइ,133.21-134.9 रो_इइइ,302-303 {9।18} असरूपनिवृत्त्यर्थम् तु .
(प्_3,2.150) क_इइ,133.21-134.9 रो_इइइ,302-303 {10।18} असरूपनिवृत्त्यर्थम् तर्हि पदिग्रहणम् क्रियते .
(प्_3,2.150) क_इइ,133.21-134.9 रो_इइइ,302-303 {11।18} एतत् ज्ञापयति आचार्यः ताच्छीलिकेषु ताच्छिलिकाः वासरूपेण न भवन्ति इति .
(प्_3,2.150) क_इइ,133.21-134.9 रो_इइइ,302-303 {12।18} यदि एतत् ज्ञाप्यते दूददीपदीक्षः च इति दीपग्रहणम् अनर्थकम् .
(प्_3,2.150) क_इइ,133.21-134.9 रो_इइइ,302-303 {13।18} अयम् दीपेः रः विधीयते .
(प्_3,2.150) क_इइ,133.21-134.9 रो_इइइ,302-303 {14।18} नमिकम्पिस्म्यजसहिंसदीपः रः इति .
(प्_3,2.150) क_इइ,133.21-134.9 रो_इइइ,302-303 {15।18} सः विशेषविहितः सामान्यविहितम् युचम् बाधिष्यते .
(प्_3,2.150) क_इइ,133.21-134.9 रो_इइइ,302-303 {16।18} एवम् तर्हि सिद्धे सति यत् दीपग्रहणम् करोति तत् ज्ञापयति आचार्यः भवति युचः रेण समावेशः इति .
(प्_3,2.150) क_इइ,133.21-134.9 रो_इइइ,302-303 {17।18} किम् एतस्य ज्ञापने प्रयोजनम् .
(प्_3,2.150) क_इइ,133.21-134.9 रो_इइइ,302-303 {18।18} कम्रा कन्या कमना कन्या इति एतत् सिद्धम् भवति .
(प्_3,2.158) क_इइ,134.11-16 रो_इइइ,303-304 {1।10} किमर्थम् आलुच् उच्यते न लुश् एव उच्येत .
(प्_3,2.158) क_इइ,134.11-16 रो_इइइ,303-304 {2।10} का रूपसिद्धिः : स्पृहयालुः गृहयालुः .
(प्_3,2.158) क_इइ,134.11-16 रो_इइइ,303-304 {3।10} शपि कृते अतः दीर्घः यञि इति दीर्घत्वम् भविष्यति .
(प्_3,2.158) क_इइ,134.11-16 रो_इइइ,303-304 {4।10} एवम् तर्हि सिद्धे सति यत् आलुचम् शास्ति तत् ज्ञापयति आचार्यः अन्येभ्यः अपि अयम् भवति इति .
(प्_3,2.158) क_इइ,134.11-16 रो_इइइ,303-304 {5।10} किम् एतस्य ज्ञापने प्रयोजनम् .
(प्_3,2.158) क_इइ,134.11-16 रो_इइइ,303-304 {6।10} आलुचि शीङ्ग्रहणम् चोदयिष्यति .
(प्_3,2.158) क_इइ,134.11-16 रो_इइइ,303-304 {7।10} तत् न कर्तव्यम् भवति .
(प्_3,2.158) क_इइ,134.11-16 रो_इइइ,303-304 {8।10} आलुचि शीङ्ग्रहणम् .
(प्_3,2.158) क_इइ,134.11-16 रो_इइइ,303-304 {9।10} आलुचि शीङ्ग्रहणम् कर्तव्यम् .

(प्_3,2.158) क_इइ,134.11-16 रो_इइइ,303-304 {10।10} शयालुः .
(प्_3,2.171) क_इइ,134.18-135.12 रो_इइइ,304-305 {1।35} किमर्थम् किकिनोः कित्त्वम् उच्यते न असंयोगात् लिट् कित् इति एव सिद्धम् .
(प्_3,2.171) क_इइ,134.18-135.12 रो_इइइ,304-305 {2।35} किकिनोः कित्त्वम् ॠकारगुणप्रतिषेधाऋथम् .
(प्_3,2.171) क_इइ,134.18-135.12 रो_इइइ,304-305 {3।35} किकिनोः कित्त्वम् क्रियते ॠकारगुणप्रतिषेधाऋथम् .
(प्_3,2.171) क_इइ,134.18-135.12 रो_इइइ,304-305 {4।35} अयम् ॠकारारान्तानाम् लिटि गुणः प्रतिषेधविषये आरभ्यते ऋच्छत्यॄत्राम् इति .
(प्_3,2.171) क_इइ,134.18-135.12 रो_इइइ,304-305 {5।35} सः यथा इह भवति आतस्तरतुः अतस्तरुः इति एवम् इह अपि प्रसज्येत मित्रावरुणौ ततुरिः दूरे हि अध्वा जगुरिः इति .
(प्_3,2.171) क_इइ,134.18-135.12 रो_इइइ,304-305 {6।35} सः पुनः कित्त्वे बाध्यते .
(प्_3,2.171) क_इइ,134.18-135.12 रो_इइइ,304-305 {7।35} उत्सर्गः छन्दसि सदादिभ्यः दर्शनात् .
(प्_3,2.171) क_इइ,134.18-135.12 रो_इइइ,304-305 {8।35} उत्सर्गः छन्दसि किकिनौ वक्तव्यौ .
(प्_3,2.171) क_इइ,134.18-135.12 रो_इइइ,304-305 {9।35} किम् प्रयोजनम् .
(प्_3,2.171) क_इइ,134.18-135.12 रो_इइइ,304-305 {10।35} सदादिभ्यः दर्शनात् .
(प्_3,2.171) क_इइ,134.18-135.12 रो_इइइ,304-305 {11।35} सदादिभ्यः हि किकिनौ दृश्येते .
(प्_3,2.171) क_इइ,134.18-135.12 रो_इइइ,304-305 {12।35} सदिमनिरमिनमिविचीनाम् सेदिः मेनिः रेमिः .
(प्_3,2.171) क_इइ,134.18-135.12 रो_इइइ,304-305 {13।35} नेमिः चक्रम् इव अभवत् .
(प्_3,2.171) क_इइ,134.18-135.12 रो_इइइ,304-305 {14।35} विविचिम् रत्नधातमम् .
(प्_3,2.171) क_इइ,134.18-135.12 रो_इइइ,304-305 {15।35} भाषायाम् धाञ्कृसृजनिनिमिभ्यः . भाषायाम् धाञ्कृसृजनिनिमिभ्यः किकिनौ वक्तव्यौ .
(प्_3,2.171) क_इइ,134.18-135.12 रो_इइइ,304-305 {16।35} धाञ् .
(प्_3,2.171) क_इइ,134.18-135.12 रो_इइइ,304-305 {17।35} दधिः .
(प्_3,2.171) क_इइ,134.18-135.12 रो_इइइ,304-305 {18।35} धाञ् .
(प्_3,2.171) क_इइ,134.18-135.12 रो_इइइ,304-305 {19।35} कृ .
(प्_3,2.171) क_इइ,134.18-135.12 रो_इइइ,304-305 {20।35} चक्रिः .
(प्_3,2.171) क_इइ,134.18-135.12 रो_इइइ,304-305 {21।35} कृ .
(प्_3,2.171) क_इइ,134.18-135.12 रो_इइइ,304-305 {22।35} सृ .
(प्_3,2.171) क_इइ,134.18-135.12 रो_इइइ,304-305 {23।35} सस्रिः .
(प्_3,2.171) क_इइ,134.18-135.12 रो_इइइ,304-305 {24।35} सृ .
(प्_3,2.171) क_इइ,134.18-135.12 रो_इइइ,304-305 {25।35} जनि .
(प्_3,2.171) क_इइ,134.18-135.12 रो_इइइ,304-305 {26।35} जज्ञिः .
(प्_3,2.171) क_इइ,134.18-135.12 रो_इइइ,304-305 {27।35} जनि .
(प्_3,2.171) क_इइ,134.18-135.12 रो_इइइ,304-305 {28।35} नमि .
(प्_3,2.171) क_इइ,134.18-135.12 रो_इइइ,304-305 {29।35} नेमिः .
(प्_3,2.171) क_इइ,134.18-135.12 रो_इइइ,304-305 {30।35} सासहिवावहिचाचलिपापतीनाम् निपातनम् .
(प्_3,2.171) क_इइ,134.18-135.12 रो_इइइ,304-305 {31।35} सासहिवावहिचाचलिपापतीनाम् निपातनम् कर्तव्यम् .
(प्_3,2.171) क_इइ,134.18-135.12 रो_इइइ,304-305 {32।35} वृषा सहमानम् सासहिः .
(प्_3,2.171) क_इइ,134.18-135.12 रो_इइइ,304-305 {33।35} वावहिः चाचलिः पापतिः .
(प्_3,2.171) क_इइ,134.18-135.12 रो_इइइ,304-305 {34।35} अपरः आह : सहिवहिचलिपतिभ्यः यङन्तेभ्यः किकिनौ वक्तव्यौ .
(प्_3,2.171) क_इइ,134.18-135.12 रो_इइइ,304-305 {35।35} एतानि एव उदाहरणानि .
(प्_3,2.174) क_इइ,135.14 रो_इइइ,305 {1।2} भियः क्रुकन् अपि वक्तव्यः .
(प्_3,2.174) क_इइ,135.14 रो_इइइ,305 {2।2} भीरुकः .
(प्_3,2.178.1) क_इइ,135.16-136.4 रो_इइइ,305-306 {1।20} किमर्थम् इदम् उच्यते न क्विप् अन्येभ्यः अपि दृश्यते इति एव सिद्धम् .
(प्_3,2.178.1) क_इइ,135.16-136.4 रो_इइइ,305-306 {2।20} क्विब्विधिः अनुपपदार्थः .

(प्_3,2.178.1) क_इइ,135.16-136.4 रो_इइइ,305-306 {3।20} अनुपपदार्थः अयम् आरम्भः .
(प्_3,2.178.1) क_इइ,135.16-136.4 रो_इइइ,305-306 {4।20} पचेः पक् .
(प्_3,2.178.1) क_इइ,135.16-136.4 रो_इइइ,305-306 {5।20} भिदेः भित् .
(प्_3,2.178.1) क_इइ,135.16-136.4 रो_इइइ,305-306 {6।20} छिदेः छित् .
(प्_3,2.178.1) क_इइ,135.16-136.4 रो_इइइ,305-306 {7।20} अथ यः अत्र सोपसर्गः तस्य ग्रहणम् किमर्थम् न तेन एव सिद्धम् .
(प्_3,2.178.1) क_इइ,135.16-136.4 रो_इइइ,305-306 {8।20} न सिध्यति .
(प्_3,2.178.1) क_इइ,135.16-136.4 रो_इइइ,305-306 {9।20} इह के चित् आ क्वेः इति सूत्रम् पठन्ति के चित् प्राक् क्वेः इति .
(प्_3,2.178.1) क_इइ,135.16-136.4 रो_इइइ,305-306 {10।20} तत्र ये आ क्वेः इति पठन्ति तैः क्विप् अपि आक्षिप्तः भवति .
(प्_3,2.178.1) क_इइ,135.16-136.4 रो_इइइ,305-306 {11।20} तत्र तच्छीलादिषु अर्थेषु किव्प् यथा स्यात् .
(प्_3,2.178.1) क_इइ,135.16-136.4 रो_इइइ,305-306 {12।20} न एतत् अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_3,2.178.1) क_इइ,135.16-136.4 रो_इइइ,305-306 {13।20} यः एव असौ अविशेषविहितः सः तच्छीलादिषु भविष्यति अन्यत्र च .
(प्_3,2.178.1) क_इइ,135.16-136.4 रो_इइइ,305-306 {14।20} न सिध्यति .
(प्_3,2.178.1) क_इइ,135.16-136.4 रो_इइइ,305-306 {15।20} अयम् तच्छीलादिषु तृन् विधीयते .
(प्_3,2.178.1) क_इइ,135.16-136.4 रो_इइइ,305-306 {16।20} सः विशेषविहितः सामान्यविहितम् ण्वुलम् बाधेत .
(प्_3,2.178.1) क_इइ,135.16-136.4 रो_इइइ,305-306 {17।20} वासरूपन्यायेन ण्वुल् अपि भविष्यति .
(प्_3,2.178.1) क_इइ,135.16-136.4 रो_इइइ,305-306 {18।20} न सिध्यति .
(प्_3,2.178.1) क_इइ,135.16-136.4 रो_इइइ,305-306 {19।20} इदानीम् एव हि उक्तम् तच्छीलादिषु वर्थेषु वासरूपेण तृजादयः न भवन्ति इति .
(प्_3,2.178.1) क_इइ,135.16-136.4 रो_इइइ,305-306 {20।20} क्विप् च अपि तृजादिः .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {1।49} वचिप्रच्छ्यायतस्तुकटप्रुजुश्रीणाम् दीर्घः च .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {2।49} वचिप्रच्छ्यायतस्तुकटप्रुजुश्रीणाम् दीर्घत्वम् च वक्तव्यम् क्विप् च .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {3।49} वचि .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {4।49} वाक् .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {5।49} वचि .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {6।49} प्रच्छि .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {7।49} शब्दप्राट् प्रच्छि .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {8।49} आयतस्तु .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {9।49} आयतस्तूः .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {10।49} आयतस्तु .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {11।49} कटप्रु .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {12।49} कटप्रूः .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {13।49} कटप्रु .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {14।49} जु .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {15।49} जूः .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {16।49} जु .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {17।49} श्रि .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {18।49} श्रीः .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {19।49} अपरः आह : वचिप्रच्छ्योः असम्प्रसारणम् च इति वक्तव्यम् .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {20।49} तत् तर्हि वक्तव्यम् .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {21।49} न वक्तव्यम् .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {22।49} दीर्घवचनसामर्थ्यात् सम्प्रसारणम् न भविष्यति .

(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {23।49} इदम् इह सम्प्रधार्यम् .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {24।49} दीर्घत्वम् क्रियताम् सम्प्रसारणम् इति .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {25।49} किम् अत्र कर्तव्यम् .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {26।49} परत्वात् सम्प्रसारणम् .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {27।49} अन्तरङ्गम् दीर्घत्वम् .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {28।49} का अन्तरङ्गता .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {29।49} प्रत्ययोत्पत्तिसन्नियोगेन दीर्घत्वम् उच्यते उत्पन्ने प्रत्यये सम्प्रसारणम् .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {30।49} तत्र अन्तरङ्गत्वात् दीर्घत्वे कृते सम्प्रसारणम् .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {31।49} प्रसारणपरपूर्वत्वे कृते कार्यकृतत्वात् पुनः दीर्घत्वम् न स्यात् .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {32।49} तस्मात् सुष्ठु उच्यते दीर्घवचनसामर्थ्यात् सम्प्रसारणम् न भविष्यति इति .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {33।49} द्युतिगमिजुहोतीनाम् द्वे च .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {34।49} द्युतिगमिजुहोतीनाम् द्वे च इति वक्तव्यम् .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {35।49} दिद्युत्. द्युति .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {36।49} गमि .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {37।49} जगत् .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {38।49} गमि .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {39।49} जुहोति .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {40।49} जुहोतेः दीर्घः च .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {41।49} जुहूः .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {42।49} दृणातेः ह्रस्वः च द्वे च क्विप् च इति वक्तव्यम् .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {43।49} ददृत् .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {44।49} जुहूः जुहोतेः ह्वयतेः वा .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {45।49} ददृत् दृणातेः दीर्यतेः वा .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {46।49} जूः ज्वरतेः जीर्यतेः वा .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {47।49} धायतेः सम्प्रसारणम् च .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {48।49} धायतेः सम्प्रसारणम् च क्विप् च वक्तव्यः .
(प्_3,2.178.2) क_इइ,136.4-20 रो_इइइ,306-307 {49।49} धीः ध्यायतेः वा दधातेः वा .
(प्_3,2.180) क_इइ,136.21-137.2 रो_इइइ,307-308 {1।11} डुप्रकरणे मितद्र्वादिभ्यः उपसङ्ख्यानम् धातुविधितुक्प्रतिषेधार्थम् .
(प्_3,2.180) क_इइ,136.21-137.2 रो_इइइ,307-308 {2।11} डुप्रकरणे मितद्र्वादिभ्यः उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_3,2.180) क_इइ,136.21-137.2 रो_इइइ,307-308 {3।11} किम् प्रयोजनम् .
(प्_3,2.180) क_इइ,136.21-137.2 रो_इइइ,307-308 {4।11} धातुविधितुक्प्रतिषेधार्थम् .
(प्_3,2.180) क_इइ,136.21-137.2 रो_इइइ,307-308 {5।11} धातुविधेः तुकः च प्रतिषेधः यथा स्यात् .
(प्_3,2.180) क_इइ,136.21-137.2 रो_इइइ,307-308 {6।11} मित्रद्रुः मितद्रू मितद्रवः .
(प्_3,2.180) क_इइ,136.21-137.2 रो_इइइ,307-308 {7।11} अचि श्नुधातुभ्रुवाम् इति उवङादेशः मा भूत् .
(प्_3,2.180) क_इइ,136.21-137.2 रो_इइइ,307-308 {8।11} इह च मितद्र्वा मितद्र्वे न ऊङ्धात्वोः इति प्रतिषेधः मा भूत् .
(प्_3,2.180) क_इइ,136.21-137.2 रो_इइइ,307-308 {9।11} तुग्विधिः .
(प्_3,2.180) क_इइ,136.21-137.2 रो_इइइ,307-308 {10।11} मितद्रुः .
(प्_3,2.180) क_इइ,136.21-137.2 रो_इइइ,307-308 {11।11} ह्रस्वस्य पिति कृति तुक् भवति इति तुक् मा भूत् .
(प्_3,2.188) क_इइ,137.4-8 रो_इइइ,308 {1।3} शीलितः रक्षितः क्षान्तः आक्रुष्टः जुष्टः इति अपि रुष्टः च रुषितः च उभौ अभिव्याहृतः इति अपि हृष्टतुष्टौ तथा कान्तः तथा उभौ संयोतोद्यतौ .
(प्_3,2.188) क_इइ,137.4-8 रो_इइइ,308 {2।3} कष्टम् भविष्यति इति आहुः .

(प्_3,2.188) क_इइ,137.4-8 रो_इइइ,308 {3।3} अमृताः पूर्ववत् स्मृताः . न म्रियन्ते अमृताः .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {1।40} भविष्यति इति अनद्यतने उपसङ्ख्यानम् .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {2।40} भविष्यति इति अनद्यतने उपसङ्ख्यानम् कर्तव्यम् .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {3।40} श्वः ग्रामम् गमी .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {4।40} किम् पुनः कारणम् न सिध्यति .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {5।40} लृटा अयम् निर्देशः कृइयते .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {6।40} लृट् च अनद्यतने लुटा बाध्यते .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {7।40} तेन लृटः एव विषये एते प्रत्ययाः स्युः .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {8।40} लुटः विषये न स्युः .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {9।40} इतरेतराश्रयम् च .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {10।40} इतरेतराश्रयम् च भवति .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {11।40} का इतरेतराश्रयता .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {12।40} भविष्यत्कालेन शब्देन निर्देशः क्रियते .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {13।40} निर्देशोत्तरकालम् च भ्भविष्यत्कालता .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {14।40} तत् एतत् इतरेतराश्रयम् भवति .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {15।40} इतरेतराश्रयाणि च न प्रकल्पन्ते .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {16।40} उक्तम् वा .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {17।40} किम् उक्तम् .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {18।40} एकम् तावत् उक्तम् न वा अपवादस्य निमित्ताभावात् अनद्यतने हि तयोः विधानम् इति .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {19।40} अपरम् अपि उक्तम् अव्ययनिर्देशात् सिद्धम् इति. अव्ययवता शब्देन निर्देशः करिष्यते .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {20।40} अवर्तमाने अभूते इति .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {21।40} सः तर्हि अव्ययवता शब्देन निर्देशः कर्तव्यः .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {22।40} न कर्तव्यः .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {23।40} अव्ययम् एषः भविष्यतिशब्दः न एषा भवतेः लृट् .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {24।40} कथम् अव्ययत्वम् .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {25।40} विभक्तिस्वरप्रतिरूपकाः च निपाताः भवन्ति इति निपातसञ्ज्ञा .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {26।40} निपातम् अव्ययम् इति अवययसञ्ज्ञा .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {27।40} अथ अपि भवतेः लृट् एवम् अपि अवययम् एव .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {28।40} कथम् न व्येति इति अव्ययम् .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {29।40} क्व पुनः न व्येति .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {30।40} एतौ कालविशेषौ भूतवर्तमानौ .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {31।40} स्वभावतः भविष्यति एव वर्तते .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {32।40} यदि तत्रि न व्येति इति अव्ययम् .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {33।40} न वा तद्विधानस्य अन्यत्र अभावात् .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {34।40} न वा भविष्यदाधिकारेण अर्थः .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {35।40} किम् कारणम् .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {36।40} तद्विधानस्य अन्यत्र अभावात् .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {37।40} ये अपि एते इतः उत्तरम् प्रत्ययाः शिष्यन्ते एते अपि एतौ कालविशेषौ न वियन्ति भूतवर्तमानौ .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {38।40} स्वभावतः एव ते भविष्यति एव वर्तन्ते .
(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {39।40} अतः उत्तरम् पठति .

(प्_3,3.3) क_इइ,139.2-21 रो_इइइ,312-313 {40।40} भविष्यदधिकारस्य प्रयोजनम् यावत् पचति पुरा पचति इति अनपशब्दत्वाय .
(प्_3,3.4) क_इइ,139.23-140.4 रो_इइइ,314 {1।14} यावत्पुरादिषु लड्विधिः लुटः पूर्वविप्रतिषिद्धम् . यावत्पुरादिषु लड्विधिः भवति लुटः पूर्वविप्रतिषेधेन .
(प्_3,3.4) क_इइ,139.23-140.4 रो_इइइ,314 {2।14} यावत्पुरानिपातयोः लट् भवति इति अस्य अवकाशः .
(प्_3,3.4) क_इइ,139.23-140.4 रो_इइइ,314 {3।14} यावत् भुङ्क्ते .
(प्_3,3.4) क_इइ,139.23-140.4 रो_इइइ,314 {4।14} पुरा भुङ्क्ते .
(प्_3,3.4) क_इइ,139.23-140.4 रो_इइइ,314 {5।14} लुटः अवकाशः .
(प्_3,3.4) क_इइ,139.23-140.4 रो_इइइ,314 {6।14} श्वः कर्ता .
(प्_3,3.4) क_इइ,139.23-140.4 रो_इइइ,314 {7।14} श्वः अध्येता .
(प्_3,3.4) क_इइ,139.23-140.4 रो_इइइ,314 {8।14} इह उभयम् प्राप्नोति .
(प्_3,3.4) क_इइ,139.23-140.4 रो_इइइ,314 {9।14} यावत् श्वः भुङ्क्ते .
(प्_3,3.4) क_इइ,139.23-140.4 रो_इइइ,314 {10।14} पुरा श्वः भुङ्क्ते .
(प्_3,3.4) क_इइ,139.23-140.4 रो_इइइ,314 {11।14} लट् भवति विप्रतिषेधेन .
(प्_3,3.4) क_इइ,139.23-140.4 रो_इइइ,314 {12।14} सः तर्हि पूर्वविप्रतिषेधः वक्तव्यः .
(प्_3,3.4) क_इइ,139.23-140.4 रो_इइइ,314 {13।14} न वक्तव्यः .
(प्_3,3.4) क_इइ,139.23-140.4 रो_इइइ,314 {14।14} अनद्यतने लुट् इति अत्र यावत्पुरानिपातयोः लट् इति अनुवर्तिष्यते .
(प्_3,3.7) क_इइ,140.6-8 रो_इइइ,314 {1।4} किमर्थम् इदम् उच्यते न लिप्स्यमानसिद्धिः अपि लिप्सा एव तत्र किंवृत्ते लिप्सायाम् इति एव सिद्धम् .
(प्_3,3.7) क_इइ,140.6-8 रो_इइइ,314 {2।4} अकिंवृत्तार्थः अयम् आरम्भः .
(प्_3,3.7) क_इइ,140.6-8 रो_इइइ,314 {3।4} यः भवताम् ओदनम् ददाति सः स्वर्गम् लोकम् गच्छति .
(प्_3,3.7) क_इइ,140.6-8 रो_इइइ,314 {4।4} यः भवताम् ओदनम् दास्यति सः स्वर्गम् लोकम् गमिष्यति .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {1।45} किमर्थम् क्रियायाम् उपपदे क्रियार्थायाम् ण्वुल् विधीयते न अविशेषेण विहितः ण्वुल् सः क्रियायाम् उपपदे क्रियार्थायाम् अन्यत्र च भविष्यति .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {2।45} ण्वुलि सकर्मकग्रहणम् चोदितम् .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {3।45} अकरमकार्थः अयम् आरम्भः .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {4।45} आसकः व्रजति .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {5।45} शायकः व्रजति .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {6।45} प्रत्याख्यातम् तत् न वा धातुमात्रात् दर्शनात् ण्वुलः इति .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {7।45} एवम् तर्हि तृजादिषु वर्तमानकालोपादानम् चोदितम् .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {8।45} अवर्तमानकालार्थः अयम् आरम्भः .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {9।45} तत् अपि प्रत्याख्यातम् न वा कालमात्रे दर्शनात् अन्येषाम् इति .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {10।45} इदम् तर्हि प्रयोजनम्. अकेनोः भविष्यदाधम्र्ण्ययोः इति अत्र षष्ठ्याः प्रतिषेधः उक्तः .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {11।45} सः यथा स्यात् .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {12।45} एतत् अपि न अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {13।45} यः एव असौ अविशेषविहितः सः यदा भविष्यति भविष्यति तदा अस्य प्रतिषेधः भविष्यति .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {14।45} एवम् तर्हि भविष्यदधिकारविहितस्य प्रतिषेधः यथा स्यात् .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {15।45} इह मा भूत् : अङ्ग यजताम् .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {16।45} लप्स्यन्ते अस्य याजकाः .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {17।45} ये एनम् याजययिष्यन्ति इति .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {18।45} न एषः भविष्यत्कालः .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {19।45} कः तर्हि .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {20।45} भूतकालः .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {21।45} कथम् तर्हि भविष्यत्कालता गम्यते .

(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {22।45} धातुसम्बन्धे प्रत्ययाः इति .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {23।45} यः तर्हि न धातुसम्बन्धः .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {24।45} इमे अस्य याजकाः .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {25।45} इमे अस्य लावकाः इति .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {26।45} एषः अपि भूतकालः .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {27।45} कथम् तर्हि भविष्यत्कालता गम्यते .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {28।45} सम्बन्धात् .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {29।45} सः च तावत् तैः अयाजितः भवति .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {30।45} तस्य च तावत् तैः यवाः अलूनाः भवन्ति .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {31।45} उच्यते च .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {32।45} इदम् तर्हि प्रयोजनम् .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {33।45} अयम् क्रियायाम् उपप्दे क्रियार्थायाम् तुमुन् विधीयते .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {34।45} सः विशेषविहितः सामान्यविहितम् ण्वुलम् बाधेत .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {35।45} एतत् अपि न अस्ति प्रयोजनम् .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {36।45} भावे तुमुन् विधीयते कर्तरि ण्वुल् .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {37।45} तत्र कः प्रसङ्गः यत् भावे विहितः तुमुन् कर्तरि विहितम् ण्वुलम् बाधेत .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {38।45} लृट् तर्हि बाधेत .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {39।45} वासरूपेण भविष्यति .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {40।45} अतः उत्तरम् पठति .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {41।45} ण्वुलः क्रियार्थोपपदस्य पुनर्विधानम् तृजादिप्रतिषेधार्थम् .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {42।45} ण्वुलः क्रियार्थोपपदस्य पुनर्विधानम् क्रियते ज्ञापकार्थम् .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {43।45} किम् ज्ञाप्यम् .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {44।45} एतत् ज्ञापयति आचार्यः क्रियायाम् उपपदे क्रियार्थायाम् वासरूपेण तृजादयः न भवन्ति इति .
(प्_3,3.10) क_इइ,140.10-141.6 रो_इइइ,314-316 {45।45} ण्वुल् अपि तृजादिः .
(प्_3,3.11) क_इइ,141.8-20 रो_इइइ,316-317 {1।17} किमर्थम् इदम् उच्यते न अविशेषेण भावे प्रत्ययाः ये विहिताः ते क्रियायाम् उपपदे क्रियार्थायाम् अन्यत्र च भविष्यन्ति .
(प्_3,3.11) क_इइ,141.8-20 रो_इइइ,316-317 {2।17} भाववचनानाम् यथाविहितानाम् प्रतिपदविध्यर्थम् .
(प्_3,3.11) क_इइ,141.8-20 रो_इइइ,316-317 {3।17} भाववचनानाम् यथाविहितानाम् प्रतिपदविध्यर्थः अयम् आरम्भः .
(प्_3,3.11) क_इइ,141.8-20 रो_इइइ,316-317 {4।17} इदानीम् एव हि उक्तम् क्रियायाम् उपप्दे क्रियार्थायाम् वासरूपेण तृजादयः न भवन्ति इति .
(प्_3,3.11) क_इइ,141.8-20 रो_इइइ,316-317 {5।17} भाववचनाः च अपि तृजादयः .
(प्_3,3.11) क_इइ,141.8-20 रो_इइइ,316-317 {6।17} अस्ति प्रयोजनम् एतत् .
(प्_3,3.11) क_इइ,141.8-20 रो_इइइ,316-317 {7।17} किम् तर्हि इति .
(प्_3,3.11) क_इइ,141.8-20 रो_इइइ,316-317 {8।17} यथाविहिताः इति तु वक्तव्यम् .
(प्_3,3.11) क_इइ,141.8-20 रो_इइइ,316-317 {9।17} किम् प्रयोजनम् .
(प्_3,3.11) क_इइ,141.8-20 रो_इइइ,316-317 {10।17} इह याभ्यः प्रकृतिभ्यः येन विशेषेण भावे प्रत्ययाः विहिताः ताभ्यः प्रकृतिभ्यः तेन एव विशेषेण क्रियायाम् उपप्दे क्रियार्थायाम् यथा स्युः .
(प्_3,3.11) क_इइ,141.8-20 रो_इइइ,316-317 {11।17} व्यतिकरः मा भूत् इति .
(प्_3,3.11) क_इइ,141.8-20 रो_इइइ,316-317 {12।17} तत् तर्हि वक्तव्यम् .
(प्_3,3.11) क_इइ,141.8-20 रो_इइइ,316-317 {13।17} न वक्तव्यम् .
(प्_3,3.11) क_इइ,141.8-20 रो_इइइ,316-317 {14।17} इह भावे प्रत्ययाः भवन्ति इति इयट सिद्धम् .
(प्_3,3.11) क_इइ,141.8-20 रो_इइइ,316-317 {15।17} सः अयम् एवम् सिद्धे सति यत् वचनग्रहणम् करोति तस्य एतत् प्रयोजनम् वाचकाः यथा स्युः इति .
(प्_3,3.11) क_इइ,141.8-20 रो_इइइ,316-317 {16।17} यदि च याभ्यः प्रकृतिभ्यः येन विशेषेण भावे प्रत्ययाः विहिताः ताभ्यः प्रकृतिभ्यः तेन एव विशेषेण क्रियायाम् उपप्दे क्रियार्थायाम् भवन्ति ततः अमी वाचकाः कृताः स्युः .

(प्_3,3.11) क_इइ,141.8-20 रो_इइइ,316-317 {17।17} अथ हि प्रकृतिमात्रात् वा स्युः प्रत्ययमात्रम् वा स्यात् न अमीवाचकाः कृताः स्युः .
(प्_3,3.12) क_इइ,141.22-142.13 रो_इइइ,317-318 {1।29} किमर्थम् इदम् उच्यते न अविशेषेण कर्मणि अण् विहितः सः क्रियायाम् उपपदे क्रियार्थायाम् अन्यत्र च भविष्यति .
(प्_3,3.12) क_इइ,141.22-142.13 रो_इइइ,317-318 {2।29} अणः पुनर्वचनम् अपवादविषये अनिवृत्त्यर्थम् .
(प्_3,3.12) क_इइ,141.22-142.13 रो_इइइ,317-318 {3।29} अणः पुनर्वचनम् क्रियते अपवादविषये अनिवृत्तिः यथा स्यात् .
(प्_3,3.12) क_इइ,141.22-142.13 रो_इइइ,317-318 {4।29} गोदायः व्रजति .
(प्_3,3.12) क_इइ,141.22-142.13 रो_इइइ,317-318 {5।29} कम्बलदायः व्रजति इति .
(प्_3,3.12) क_इइ,141.22-142.13 रो_इइइ,317-318 {6।29} किम् उच्यते अपवादविषये अनिवृत्तिः यथा स्यात् इति न पुनः उत्सर्गविषये प्रतिपदविध्यर्थम् स्यात् .
(प्_3,3.12) क_इइ,141.22-142.13 रो_इइइ,317-318 {7।29} इदानीम् एव हि उक्तम् क्रियायाम् उपप्दे क्रियार्थायाम् वासरूपेण तृजादयः न भवन्ति इति .
(प्_3,3.12) क_इइ,141.22-142.13 रो_इइइ,317-318 {8।29} अण् च अपि तृजादिः .
(प्_3,3.12) क_इइ,141.22-142.13 रो_इइइ,317-318 {9।29} एवम् तर्हि उभयम् अनेन क्रियते .
(प्_3,3.12) क_इइ,141.22-142.13 रो_इइइ,317-318 {10।29} अपवादविषये चानिवृत्तिः उत्सर्गविषये प्रतिपदविधानम् .
(प्_3,3.12) क_इइ,141.22-142.13 रो_इइइ,317-318 {11।29} कथम् पुनः एकेन यत्नेन उभयम् लभ्यम् .
(प्_3,3.12) क_इइ,141.22-142.13 रो_इइइ,317-318 {12।29} लभ्यम् इति आह .
(प्_3,3.12) क_इइ,141.22-142.13 रो_इइइ,317-318 {13।29} कथम् .
(प्_3,3.12) क_इइ,141.22-142.13 रो_इइइ,317-318 {14।29} कर्मग्रहणसामर्थ्यात् .
(प्_3,3.12) क_इइ,141.22-142.13 रो_इइइ,317-318 {15।29} कथम् पुनः अन्तरेण कर्मग्रहणम् कर्मणि अण् लभ्यः .
(प्_3,3.12) क_इइ,141.22-142.13 रो_इइइ,317-318 {16।29} वचनग्रहणम् प्रकृतम् अनुवर्तते .
(प्_3,3.12) क_इइ,141.22-142.13 रो_इइइ,317-318 {17।29} अस्ति प्रयोजनम् एतत् .
(प्_3,3.12) क_इइ,141.22-142.13 रो_इइइ,317-318 {18।29} किम् तर्हि इति .
(प्_3,3.12) क_इइ,141.22-142.13 रो_इइइ,317-318 {19।29} अपर्यायेण इति तु वक्तव्यम् .
(प्_3,3.12) क_इइ,141.22-142.13 रो_इइइ,317-318 {20।29} कदा चित् हि कर्मणि स्यात् कदा चित् क्रियायाम् उपपदे क्रियार्थायाम् इति .
(प्_3,3.12) क_इइ,141.22-142.13 रो_इइइ,317-318 {21।29} तत् तर्हि वक्तव्यम् .
(प्_3,3.12) क_इइ,141.22-142.13 रो_इइइ,317-318 {22।29} न वक्तव्यम् .
(प्_3,3.12) क_इइ,141.22-142.13 रो_इइइ,317-318 {23।29} चेन सन्नियोगः करिष्यते .
(प्_3,3.12) क_इइ,141.22-142.13 रो_इइइ,317-318 {24।29} अण् कर्मणि च .
(प्_3,3.12) क_इइ,141.22-142.13 रो_इइइ,317-318 {25।29} किम् च अन्यत् .
(प्_3,3.12) क_इइ,141.22-142.13 रो_इइइ,317-318 {26।29} क्रियायाम् उपपदे क्रियार्थायाम् इति .
(प्_3,3.12) क_इइ,141.22-142.13 रो_इइइ,317-318 {27।29} एवम् अपि प्रत्येकम् उपपदसञ्ज्ञा न प्राप्नोति .
(प्_3,3.12) क_इइ,141.22-142.13 रो_इइइ,317-318 {28।29} चेन एव सन्नियोगः करिष्यते .
(प्_3,3.12) क_इइ,141.22-142.13 रो_इइइ,317-318 {29।29} प्रत्येकम् वाक्यपरिसमाप्तिः दृष्टा इति प्रत्येकम् उपपदसञ्ज्ञ भविष्यति .
(प्_3,3.13) क_इइ,142.15-143.5 रो_इइइ,318-319 {1।33} शेषवचनम् किमर्थम् .
(प्_3,3.13) क_इइ,142.15-143.5 रो_इइइ,318-319 {2।33} लृटि शेषवचनम् क्रियायाम् प्रतिपदविध्यर्थम् . लृटि शेषवचनम् क्रियते क्रियायाम् प्रतिपदविध्यर्थम् .
(प्_3,3.13) क_इइ,142.15-143.5 रो_इइइ,318-319 {3।33} प्रतिपदविधिः यथा स्यात् .
(प्_3,3.13) क_इइ,142.15-143.5 रो_इइइ,318-319 {4।33} अविशेषेण विधाने लृटः अभावः प्रतिषिद्धत्वात् .
(प्_3,3.13) क_इइ,142.15-143.5 रो_इइइ,318-319 {5।33} अविशेषेण विधाने लृटः अभावः स्यात् .
(प्_3,3.13) क_इइ,142.15-143.5 रो_इइइ,318-319 {6।33} करिष्यामि इति व्रजति .
(प्_3,3.13) क_इइ,142.15-143.5 रो_इइइ,318-319 {7।33} हरिष्यामि इति व्रजति इति .
(प्_3,3.13) क_इइ,142.15-143.5 रो_इइइ,318-319 {8।33} किम् कारणम् .
(प्_3,3.13) क_इइ,142.15-143.5 रो_इइइ,318-319 {9।33} प्रतिषिद्धत्वात् .
(प्_3,3.13) क_इइ,142.15-143.5 रो_इइइ,318-319 {10।33} इदानीम् एव हि उक्तम् क्रियायाम् उपपदे क्रियार्थायाम् वासरूपेण तृजादयः न भवन्ति इति .

(प्_3,3.13) क_इइ,142.15-143.5 रो_इइइ,318-319 {11।33} लृट् च अपि तृजादिः .
(प्_3,3.13) क_इइ,142.15-143.5 रो_इइइ,318-319 {12।33} अस्ति प्रयोजनम् एतत् .
(प्_3,3.13) क_इइ,142.15-143.5 रो_इइइ,318-319 {13।33} किम् तर्हि इति .
(प्_3,3.13) क_इइ,142.15-143.5 रो_इइइ,318-319 {14।33} साधीयः तु खलु शेषग्रहणेन क्रियार्थोपपदात् लृट् निर्भज्यते .
(प्_3,3.13) क_इइ,142.15-143.5 रो_इइइ,318-319 {15।33} किम् कारणम् .
(प्_3,3.13) क_इइ,142.15-143.5 रो_इइइ,318-319 {16।33} अक्रियार्थोपपदत्वात् .
(प्_3,3.13) क_इइ,142.15-143.5 रो_इइइ,318-319 {17।33} शेषे इति उच्यते .
(प्_3,3.13) क_इइ,142.15-143.5 रो_इइइ,318-319 {18।33} शेषः च कः .
(प्_3,3.13) क_इइ,142.15-143.5 रो_इइइ,318-319 {19।33} यत् अन्यत् क्रियायाः क्रियार्थायाः .
(प्_3,3.13) क_इइ,142.15-143.5 रो_इइइ,318-319 {20।33} एवम् तर्हि लृटि शेषवचनम् क्रियायाम् प्रतिपदविध्यर्थम् .
(प्_3,3.13) क_इइ,142.15-143.5 रो_इइइ,318-319 {21।33} लृटि शेषवचनम् क्रियते क्रियायाम् प्रतिपदविधिः यथा स्यात् .
(प्_3,3.13) क_इइ,142.15-143.5 रो_इइइ,318-319 {22।33} लृट् शेषे च .
(प्_3,3.13) क_इइ,142.15-143.5 रो_इइइ,318-319 {23।33} करिष्यति हरिष्यति इति .
(प्_3,3.13) क_इइ,142.15-143.5 रो_इइइ,318-319 {24।33} क्व च .
(प्_3,3.13) क_इइ,142.15-143.5 रो_इइइ,318-319 {25।33} क्रियायाम् उपपदे क्रियार्थायाम् इति .
(प्_3,3.13) क_इइ,142.15-143.5 रो_इइइ,318-319 {26।33} सः तर्हि चकारः कर्तव्यः .
(प्_3,3.13) क_इइ,142.15-143.5 रो_इइइ,318-319 {27।33} न कर्तव्यः .
(प्_3,3.13) क_इइ,142.15-143.5 रो_इइइ,318-319 {28।33} इह लृट् भवति इति इयता सिद्धम् .
(प्_3,3.13) क_इइ,142.15-143.5 रो_इइइ,318-319 {29।33} सः अयम् एवम् सिद्धे सति यत् शेषग्रहणम् करोति तस्य एतत् प्रयोजनम् योगाङ्गम् यथा उपजायेत .
(प्_3,3.13) क_इइ,142.15-143.5 रो_इइइ,318-319 {30।33} सति च योगाङ्गे योगविभागः करिष्यते .
(प्_3,3.13) क_इइ,142.15-143.5 रो_इइइ,318-319 {31।33} लृट् भवति क्रियायाम् उपपदे क्रियार्थायाम् इति .
(प्_3,3.13) क_इइ,142.15-143.5 रो_इइइ,318-319 {32।33} ततः शेषे .
(प्_3,3.13) क_इइ,142.15-143.5 रो_इइइ,318-319 {33।33} शेषे च लृट् भवति इति .
(प्_3,3.14) क_इइ,143.7-10 रो_इइइ,320 {1।8} सद्विधिः नित्यम् अप्रथमासमानाधिकरणे .
(प्_3,3.14) क_इइ,143.7-10 रो_इइइ,320 {2।8} सद्विधिः अप्रथमासमानाधिकरणे नित्यम् इति वक्तव्यम् .
(प्_3,3.14) क_इइ,143.7-10 रो_इइइ,320 {3।8} पक्ष्यन्तम् पश्य .
(प्_3,3.14) क_इइ,143.7-10 रो_इइइ,320 {4।8} पक्ष्यमाणम् पश्य .
(प्_3,3.14) क_इइ,143.7-10 रो_इइइ,320 {5।8} क्व तर्हि इदानीम् विभाषा .
(प्_3,3.14) क_इइ,143.7-10 रो_इइइ,320 {6।8} प्रथमासमानाधिकरणे .
(प्_3,3.14) क_इइ,143.7-10 रो_इइइ,320 {7।8} पाक्ष्यन् पक्ष्यति .
(प्_3,3.14) क_इइ,143.7-10 रो_इइइ,320 {8।8} पक्ष्यमाणः पक्ष्यते .
(प्_3,3.15.1) क_इइ,143.12-16 रो_इइइ,320 {1।11} योगविभागः कर्तव्यः .
(प्_3,3.15.1) क_इइ,143.12-16 रो_इइइ,320 {2।11} अनद्यतने लृटः सत्स्ञ्ज्ञौ भवतः .
(प्_3,3.15.1) क_इइ,143.12-16 रो_इइइ,320 {3।11} श्वः अग्नीन् आध्यास्यमानेन .
(प्_3,3.15.1) क_इइ,143.12-16 रो_इइइ,320 {4।11} श्वः सोमेन यक्ष्यमाणेन .
(प्_3,3.15.1) क_इइ,143.12-16 रो_इइइ,320 {5।11} ततः लुट् .
(प्_3,3.15.1) क_इइ,143.12-16 रो_इइइ,320 {6।11} लुट् भवति अनद्यतने .
(प्_3,3.15.1) क_इइ,143.12-16 रो_इइइ,320 {7।11} श्वः कर्ता .
(प्_3,3.15.1) क_इइ,143.12-16 रो_इइइ,320 {8।11} श्वः अध्येता .
(प्_3,3.15.1) क_इइ,143.12-16 रो_इइइ,320 {9।11} केन विहितस्य अनद्यतने लृटः सत्सञ्ज्ञौ उच्येते .

मूल पाठ: Vyākaraṇamahābhāṣya · Edition: Franz Kielhorn (Bombay 1880-1885), revised by K.V. Abhyankar (Poona 1972-1996). · Data entry George Cardona · GRETIL (Göttingen) · CC BY-NC-SA 4.0

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