नृसिंहसरस्वत्यष्टकम् · अध्याय 1
इन्दुकोटीतेज करूणासिंधु भक्तवत्सलम नंदनात्रिसुनूदत्तमिन्दिराक्षश्रीगुरूम्
गंधमाल्याक्षतादिवृंददेववंदितम वंदयामि नारसिंह सरस्वतीश पाहि माम्
मायापाशंधकारछायादूर भास्करम आयताक्ष पाहि श्रियावल्लभेशनायकम्।
सेव्यभक्तवृंद वरद भूयो भूयो नमाम्यहम वंदयामि नारसिंह सरस्वतीश पाहि माम्
चित्तजादिवर्गषटकमत्तवारणांकुशम् तत्वसार शोभितात्म दत्त श्रियावल्लभम्।
....................................... वंदयामि नारसिंह सरस्वतीश पाहि माम्
व्योमतेजवायूआपभूमीकर्तुमिश्वरम काम क्रोध मोहरहित सोमसूर्यलोचनम्।
कामितार्थदातृभक्त कामधेनूश्रीगुरुम वंदयामि नारसिंह सरस्वतीश पाहि माम्
पुन्डरीकाअयताक्ष कुंदलेंदुतेजसम चंड दुरितखंदनार्थ दंडधारिश्रीगुरुम्।
मण्डलीक मौली मार्तंडभासिताननम वंदयामि नारसिंह सरस्वतीश पाहि माम्
वेदशास्त्रस्तुत्यपाद आदिमूर्तीश्रीगुरुम नादबिंदूकलातीत-कल्पपादसेव्ययम्।
सेव्यभक्तवृंदवरद भूयो भूयो नमाम्यहम वंदयामि नारसिंह सरस्वतीश पाहि माम्
अष्टयोगतत्वनिष्ठ तुष्टज्ञानवारिधीम कृष्णावेणीतीरवासपंचनदी सेवनम्।
कष्टदैन्यदूरीभक्ततुष्ट काम्यदायकम वंदयामि नारसिंह सरस्वतीश पाहि माम्
नारसिंह सरस्वती नाम अष्टमौक्तीकम हारकृत शारदेन गंगाधराआत्मजम्।
धारणीक देवदीक्ष गुरुमूर्ती तोषितम वंदयामि नारसिंह सरस्वतीश पाहि माम्
परमात्मानंदश्रिया पुत्रपौत्रदायकम नारसिंहसरस्वतीय अष्टकं च यः पठेत।
घोर संसारसिंधू तारणाख्य साधनम सारज्ञानदीर्घाअयुरारोग्यादिसंपदम्।
चारुवर्ग काम्यलाभ वारंवारयज्जपेत।
इति श्री गुरुचरित्रांतर्गत श्रीनरसिंहसरस्वतीअष्टकसंपूर्णम्।
मूल पाठ: nṛsiṃhasarasvatyaṣṭakam · Sanskrit Wikisource contributors · Sanskrit Wikisource · CC BY-SA 4.0