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ग्रंथ पाठ

कल्पनामण्डितिका · अध्याय 46

46.2

। तन् मोक् ष् अबीजम् अहम् अस्य ^ _ ^ _ _ _ _ ^ _ ^ ^ ^ _ ^ ^ _ ^ _ _ः अध्याशयेन खल् उ बुद्धनम ^ _ _ _ _ ^
व्1 _ ^ ^ ^ _ ^ ^ _ स्य्. द्. त्. 10 ततो भगवता + + + ॥। .. कवैराग्यम् अवाप्तवान् । किम् इदम् उप् अनीतम् . ।

46.3

। कुश लमूलम् अमृतफलं भवति किम्. + + + ॥। यत इति प्रामोद्यम् उत्पादय । भिक्षू + + + ।

46.4

। + + भगवंतं प्रव्रजितम् अनुप्रव्रजि ताः ॥। + तथ् आगतस्य प्रभावम् अवेक्ष्य येषां + + + ।

46.5

। + + .. लं येन प्रत्येकबुद्धवि + ॥। + + + न्वागत इति 3 नगरोपमे व + + + + ।

46.5

। + + + बु द्धिर् उत्पन्ना यदि भगवान् अ + ॥। + + + यंति तद् व् अयम् अपि बुद्धत्वायो + + + + ॥।
कल्प्म् : इद्प् स्ह्त् 21।65
183र्1 _ _ ^ _ ^ ^ ^ _ ^ ^ _ ^ _ _ _ _ ^ _ ^ क नकाद्रिर् इवावसिक्तः 7 अपरो ऽब्र वीत् + + ॥। + .. + + प्र्. + + +
2 ॥। + ऊ चुर् अयं स हीनप्रतिज्ञः शा क्यपुत्रः ॥। त् यज्य तद् अतिदुष्कर्. ..
3 + + + + + + + + + भ् ओ वाद्य्. _ ^ _ _ _ _ _ _ _ ^ _ ^ _ त् स्थितैर् एव तु वक्तव्य _ _ _ _ ^ _ ^ _ 9 ॥। पु नर् भगवान् उपसस र्प
4 तथा तथा हि ॥ उत्तस्थुस् तं समालोक्य पूर्णचन्द्रा ^ _ ^ _ _ _ _ _ म् इवालोक्य सागरस्य ^ _ ^ _ 10 _ _ _ _ ^ _ _ _ _ _ _ बुद्धतेजसा महार
5 ज्जुभिर्. _ _ ध्वजो _ _ ^ _ ^ _ 11 य _ _ _ ^ _ _ _ _ _ .ए _ ^ _ ^ या _ _ _ _ ^ _ _ _ _ _ _ _ ^ _ ^ _ 12 क ल्पेष्व् अनेकेषु
व्1 निहत्य मानं _ .मा ^ _ _ प्रणत्. न्. रु .य्.ः बुद्ध ^ _ _ ^ ^ _ ^ _ _ कः श् अ क्नुय् आ त् स्थ् आ तुम् अगौ रवेण 13 _ _ ^ _ _ ^ ^ _ ^ _ _ _ _ ^ शाक् य् अर् षभम् आव्रज न् तम्
2 यदा नता चोन्नमते च भूमिः शैलाश् च नेमे तृणव ^ _ _ 14 ॥। पंच कास् त्वरितम् उत्थाय + + ॥। ज ग्राह कश्चित् पात्रम् अप
3 + + + + + + + + + + + + पा .आ .. .. .आ .ओ + + + ॥। + + पादोदकप्रतिग्रहम् उपा .. ॥। _ _ ^ _ ^ ^ ^ म् आपतितन् निरीक्ष्य तं .ए
4 ^ _ ^ ^ ^ _ ^ ^ _ ^ _ _ _ _ ^ _ ^ ^ ^ _ ^ ^ _ न् निरीक्ष्य मौनव्रतासिन इव .. ^ _ ^ _ _ 15 ॥। र्षीच् च्य् उ ता बतेमे .ए +
5 ॥। + .. तस् थु र् नामवादेन तु भगवन्तं ॥। + + + .. .इ + + + +
कल्प्म् : इद्प् स्ह्त् 21।66
184र्1 वन् कारुण्याद् उवाच ॥ मा कार्षुर् उद्धृतमले मय् इ पूर्ववृत्तिम् अभ्यर्च _ ^ ^ ^ चावगमं लभद्ध्वम् नि _ ^ _ ^ ^ ^ _ ^ ^ _ ^ _ _ _ _ ^ _ ^ ^ ^ _
2 य नमंति सन्तः 16 कामं स्तोत्रैर् नास्ति प्रीतिर् न च परुषव चनक थनैर् भवत्य् अरतिर् मम श्रो _ _ _ _ _ _ _ ^ ^ ^ ^ ^ ^ ^ ^ ^ ^ _ ^ _ . अ
3 नुकंपया मोहक्रोधस्नेहाद्येषु व्रतविधिषु विधिवद् इ ^ _ ^ _ ष्व् अखिलेषु _ _ _ _ _ _ _ _ _ ^ ^ ^ ^ ^ ^ ^ ^ ^ ^ _ ^ _
4 स्वयम् उद्यतम् 17 एवम् उक्ताः पंचका भगवतो बोधिम् असंभावयंत ऊचुः ॥ स्थिते ^ ^ ^ _ ^ _ ^ ^ ^ _ ^ _ _ ^ _ ^ _ ^ ^ ^ _ ^
व्1 लग्नहृदयः कथं भोत्स्यसे प्लवेन महता न शक्त इह यः प्रतर्तुन् नदीं स तं प्लवम् अपास्य पर्वतशि _ ^ _ _ ^ _ 18 ॥।
2 पंचका इत्य् अवेत्य अन्तद्वयवर्जितां मध्यमां प्रतिपदम् उपदिदिक्षु .ऐ + + + + .. वेक्षमाणो ऽब्र वीत् _ _ _ _ ^ _ _ _ _ _ _ _ ^ _ ^ _ _ _ _
3 धारणं कार्यं जीवन् हि ज्ञानम् आर्च्छति 19 प्रायश् चैवाशनादीनां लंभा _ _ ^ तान् विना तस्माद् अधिगम _ _ _ _ _ _ ^ _ ^ _ 20 _ _ _ _ ^ _ _ _ _ _
4 वंति श रीरिणा म् तथैव भिन् न शीलान् आं न भव् ए ज् ज्ञानसंभवः 2 1 _ _ _ णांश्. शीलं _ _ _ .आ शील्. _ ^ _ _ _ _ _ ^ _ _ _ _ _ _ _ ^ _ ^ _ 22
कल्प्म् : इद्प् स्ह्त् 21।67
185र्1 _ _ _ _ ^ _ _ _ _ .ण्. .ऋ .ध्. च्. स्. ^ _ त्य _ _ _ शतादीनां मृ. _ _ _ ^ एव च 23 अ _ _ _ ^ _ _ _ _ _ _ _ समाश्रितः _ _ _ _ ^ _ _ _
2 _ _ _ _ ^ _ ^ _ 24 परीक्षकानां स _ _ उभ योर् द्दोषद र् श ना त् _ _ _ _ ^ _ _ _ _ _ _ _ ^ _ ^ याः 25 कामं गेध्. म्. _ ^ _ ^ ^ ^ _ _ _
3 ^ _ _ ^ _ मार्गस्याग्निनिदाघ _ ^ ^ युताव् अंतौ प्रपन्नो ^ _ _ _ _ ^ ^ _ ^ _ ^ ^ ^ _ _ _ ^ _ _ ^ _ _ _ _ ^ ^
4 _ ^ _ ^ ^ ^ _ _ _ ^ _ _ स् थ् इतः 26 अथायुष्म तः कौ ण्डिन्यस्य ज्ञानवध्य ।

46.3

। + न कृतो मोक्षस् त ॥।
व्1 ॥। + + चिकि त् स् अक् . ॥। + .. च्छंति तथा चित्तचि .. ॥।
2 _ _ ^ _ ^ ^ ^ _ ^ ममध्यवासं चोत्सृज्य ना ^ ^ ^ रोष्णम् इहोपसे व्य _ _ ^ _ ^ ^ ^ _ ^ ^ _ ^ _ _ _ _ ^ _ ^ _ ^ ^ ^ _ ^ ^ _ ^ _ _ ।

46.5

। । ॥ पानप्रावरणाश न् औ षध विधौ शय्यासने चा ^ _ _ _ _ ^ ^ _ ^ _ ^ ^ ^ _ _ _ ^ _ _ ^ _ _ _ _ ^ ^ _ ^ _
4 ^ ^ ^ _ _ _ ^ _ _ ^ _ प्राज्ञो युक्तिवशाद् इहाग् न् इ ^ ^ _ दाहक्रियां _ .इ _ ॥। ज्ञयाभ् इ व् इ नीतश् च .. ।

मूल पाठ: Kalpanāmaṇḍitikā · Edition: Heinrich Lüders: Bruchstücke der Kalpanāmaṇḍitikā des Kumāralāta. Leipzig 1926 (Kleinere Sanskrit-Texte, 2) [= repr. in: Monographien zur indischen Archäologie, Kunst und Philologie, 1: Steiner Verlag Wiesbaden 1979, pp. 113-375]. = KalpM · Data entry Klaus Wille · GRETIL (Göttingen) · CC BY-NC-SA 4.0

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