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ग्रंथ पाठ

कल्पनामण्डितिका · अध्याय 32

32.2

। + .. क्रमेण स्वस्थिभ् ऊत् ओ .. .. .. + + + + + + + + .. + + + + + .. ..ं .ओ + ॥।
कल्प्म् : इद्प् स्ह्त् 21।45
126र्4 ॥। प्रहारेण स चोरो निष्प्रा .. ॥।
5 _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ ^ _ ^ _ ^ पया शरणागमनं च ^ _ _ _ _ _ ^ _ _ _ 1 _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ ^ _ ^
व्1 _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ समभविष्यम् 2 एतत् तस्य ^ _ ^ _ ^ ^ ^ _ _ _ ^ _ _ ^ _ _ _ _ ^ ^ _ ^ _ ^ ^ ^ _ _ _
2 ^ _ _ ^ _ _ _ _ ^ ^ _ ^ _ ^ ^ ^ _ _ _ ^ भंते मुनौ सूक्ष् म् अं हेतुम् अ _ ^ _ ^ ^ ^ _ _ _ ^ _ _ ^ _ 3 ॥।
कल्प्म् : इद्प् स्ह्त् 21।46
127र्1 ॥। .. शत्रुर् भदन्तेन चीव र् . + ॥। + + + + + + + + ।

32.3

। .. द् अशनिन् निवारयति घोर्. ॥। + + + .. सुहृत् प्रा .. ।

32.4

। .. हंति ननु प्रियं कुरु त् ए + ॥। .. विहते सस्यं क्षेत्रे ।

32.5

। + सो हि देवदत्तस्य + + ॥। + .. लं न बभूवोत्. ।

मूल पाठ: Kalpanāmaṇḍitikā · Edition: Heinrich Lüders: Bruchstücke der Kalpanāmaṇḍitikā des Kumāralāta. Leipzig 1926 (Kleinere Sanskrit-Texte, 2) [= repr. in: Monographien zur indischen Archäologie, Kunst und Philologie, 1: Steiner Verlag Wiesbaden 1979, pp. 113-375]. = KalpM · Data entry Klaus Wille · GRETIL (Göttingen) · CC BY-NC-SA 4.0

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