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ग्रंथ पाठ

कल्पनामण्डितिका · अध्याय 17

17.2

। .. यते ऽल्पेच्छता योगा + + ॥।
व्1 ॥। पाणिर् गृह्णीष्व् एति प्रसारितो _ ^ _ ^ _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ ^ _ _ _ 10
2 _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ ^ _ ^ _ _ _ _ नेनैतद् वचनं जितं भवत् इ _ ^ _ _ _ 11
3 ॥। _ _ _ ^ ^ _ ^ संस्तवतया शीलादिभि र् व्व्. ^ _ _ _ _ ^ ^ _ ^ _ ^ ^ ^ _ _ _ ^ _ _ ^ _ _ _ _ ^ ^ _ ^
कल्प्म् : इद्प् स्ह्त् 21।27
49र्1 त् खलु सुखं तत् स ^ _ _ ^ _ _ _ _ ^ ^ _ ^ _ ^ ^ ^ _ _ _ ^ _ यास्यत् इ 13 नि _ _ _ ^ _ _ ^ ^ ^ ^ ^ ^ _ _ ^ _ _ ^ _ _ _ _ _ _ ^ _ _ ^ ^
2 णधननिधिच्छाद _ _ ^ _ _ _ _ _ _ ^ _ _ ^ ^ .. जणमतेर् ग् आ त्रविश्राम _ _ _ _ _ _ ^ _ _ ^ ^ ^ ^ ^ ^ _ _ ^ _ _ ^ _ _ 14
3 + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + .. .इ ॥ ॥ + + ॥।
व्1 ॥। + + + + + + ॥। .. स्. त्. च्. + + + ॥।
2 यद् इ स न्तुष्ट् इ प् अरमं धनं ॥। हं दरिद्रो ऽभिमतस् तव । .. ॥।
3 दरिद् र् अं पण्डिता .. ॥। र् अपि लोकदरिद्र्. + + + .. ॥।
कल्प्म् : इद्प् स्ह्त् 21।28; च्f. दिव्य् 384
71र्1 ॥। न्याय्यम् इतः श्. + ।

17.3

। रासारे .. ।

17.4

। म्भे ऽवभ ।

मूल पाठ: Kalpanāmaṇḍitikā · Edition: Heinrich Lüders: Bruchstücke der Kalpanāmaṇḍitikā des Kumāralāta. Leipzig 1926 (Kleinere Sanskrit-Texte, 2) [= repr. in: Monographien zur indischen Archäologie, Kunst und Philologie, 1: Steiner Verlag Wiesbaden 1979, pp. 113-375]. = KalpM · Data entry Klaus Wille · GRETIL (Göttingen) · CC BY-NC-SA 4.0

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