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ENहिગુ
ग्रंथ पाठ

कल्पनामण्डितिका · अध्याय 14

14.2

। .. वितुम् न शक्नो .इ + ॥।
व्1 ॥। पृष्टस् तेन चोक्तं + ।

14.3

। त् क् अश्चिन् मांसम् आनये त् ।

14.3

। + कोपकुपितः प्रा ह ॥।
कल्प्म् : इद्प् स्ह्त् 21।15
36र्1 ॥। य द्य् अद्य्. _ _ _ न् नेच्छसि हन्तुं घृणा ^ _ _ त्वा राजा _ _ _ _ _ _ _ _ ^ _ _ _ 3
2 _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ अह न्य् अहनि हत्व् आ सूतास् तुभ्यं दास्यन्त्य् उपे त्य सिं हासनग ताय 4 _ _ _ _ _ _ _ _ _
3 _ ^ _ ^ _ _ _ _ _ _ _ _ _ .य् असकृत् संधूक्षितक्रोधः 5 यदि तावत् .. _ _ _ _ _ _ ^ _ ^ _ _ _ _ _ _
व्1 _ _ _ _ _ _ _ ^ _ _ _ 6 _ ^ म् इव वध्यपानं वनम् इव कुसुमोज्ज् व् अलं सशा _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ ^ _ _ _ 7 _ _ ^ _ _
2 ^ ^ _ ^ _ _ _ _ ^ _ _ ^ ^ _ ^ दोषान् ऐश् वर्य वह्नेर् अविचार्य दोषान् गुणां ^ _ पश्यति बा ^ _ _ 8 _ _ ^ _ _ ^ ^ _ ^ _ _ _ _ ^ _ _
3 ^ ^ _ ^ _ _ _ _ ^ _ _ ^ ^ _ दिदुः _ _ _ ^ _ यन् मरणेन माल् आम् 9 _ लंबचि _ ^ ^ _ ^ _ _ _ _ ^ _ _ ^ ^ _ ^
कल्प्म् : इद्प् स्ह्त् 21।16
37र्1 - - - - रथाश्वा ^ ^ _ ^ _ ङ्गा भारा ^ _ _ व्यस्. _ ^ _ _ 10 _ _ ^ _ _ ^ ^ _ ^ _ _ यद् यच् च राजा ^ ^ _ ^ _ _ _ _ ^ _ _ ^ ^ _ ^ _ _ _ _
2 प्रविश्येव गरप्र _ नम् 11 विस्रंभशुन्ये हृदि _ ^ _ _ _ _ ^ _ _ ^ ^ _ ^ _ _ उद्विग्नबुद्धेर् विषये ^ _ _ _ _ ^ _ _ ^ ^ _ ^ _ _ 12
3 बडिशम् इवामिषसहितन् धाराम् इव च क्षु रस्य _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ त् सुखम् असुखानुब न्ध् . _ 13 _ _ _ _ _ _ ^
व्1 म् आत्मनः पश्यसि त्वम् अकृतात्मन् तस्मा च् च्युतस्य परतो न ^ _ _ _ ^ _ _ _ 14 ^ _ व ह्न् इ ज्वालाशतनिचित .. _ ^ ^ ^ _ ^ _ _ _ _ _ ^ ^ ^ ^ ^ _
2 वत्स्यति भवान् तदा राज्यैश्वर्यं तव किम् अनु _ _ ^ ^ ^ _ ^ _ _ _ _ _ ^ ^ ^ म् अपवर्गे कुरु मतिम् 15 + + + + + + + + + + + + + + + + +
3 .इ .. .. .. .इ .. .. .. + + .. .. .इनिवृ .. .इ + .. .. .. .. + + + + + + + + + + + + + + + .आम् अवलोकय्. + + + + + + + + + + + + + + + + + + + + +
कल्प्म् : इद्प् स्ह्त् 21।17
39र्2 ॥। ती र्थ्यसंघानाम् भूयः श्र्. ।

14.3

। र्षिणा तु यत् स ..ं .. .. ॥।
व्1 ॥। ^ _ श्रमेणानपराधि पीड्यते 8 ॥।
कल्प्म् : इद्प् स्ह्त् 21।18
40र्1 ^ _ न् उज्झति 9 स _ नो मत एव शाक्यमुनिना स्. _ ^ _ _ ^ _ _ _ _ ^ ^ _ ^ _ ^ ^ ^ _ _ _ ^ _ _ ^ _ म् किन् तैः कायपरिश्रमैर् अपफलै
2 र् उ ग्रैस् तपोविस्तरैर् दुष्पुत्रा इव ये फलं ^ ^ ^ _ _ _ ^ _ _ ^ _ 10 _ _ _ ^ ^ _ ^ _ ^ ^ ^ सः कण्वादयस् तापसा हेतुस् तत्र द
3 _ ^ _ ^ ^ ^ _ _ _ ^ _ .ओग _ _ _ _ ^ ^ _ ^ _ ^ ^ ^ _ _ _ ^ _ _ ^ _
व्1 _ _ _ ^ ^ _ ^ _ ^ ^ ^ _ च् छेते फल्. _ .छ्. _ 11 _ _ _ ^ ^ _ ^ _ ^ ^ ^ _ _ _ ^ _ _ ^ _ स त्यक्षांतिशमप्रदाननियमज्ञानानि सं
2 से वते सत्यादेस् स गणात् सुखानि लभते _ _ ^ _ _ ^ _ _ _ _ ^ ^ _ ^ _ ^ ^ ^ _ _ _ ^ _ _ ^ नम् 12 यदा हिंस्रो जन्तुर् भय
3 म् इ ह परेषां जनयति च्युतायां हिंसायां भवति ^ ^ _ _ ^ ^ ^ _ ^ _ _ _ _ _ ^ ^ ^
कल्प्म् : इद्प् स्ह्त् 21।19
41र्1 ^ ^ _ _ ^ ^ ^ _ ^ _ _ श् चाद्रोहे भवति विदितो धार्मिक इति 13 रसैर् इष्टैस् तृप्तो ^ ^ ^ ^ ^ _ _ ^ ^ नरो न तद्धेतोः क्. _ ज् ज् अ न् अ य् अ त् इ
2 ^ _ _ ^ ^ ^ _ ^ _ _ क्षुत्क्षामो भवति न तद् अप्य् अण्व् अपि सुखं परेषाम् आधत्ते न भवति तपो ऽतः सुखफलम् 14 भवेद् एतन् मैत्राम् अनुसरति यो
3 _ ^ ^ ^ _ ^ _ _ _ _ _ ^ ^ ^ फलम् अस्यास्ति विपुलं तपस् तद्वन् न स्यात् परसुखकरं स्याच् च फलवन् न चैवं
व्1 _ _ _ ^ ^ ^ ^ ^ _ _ ^ ^ ^ _ 15 वाक्काययोर् अशुभकर्मनिदानम् उग्रम् एवं च यः प्रतिघम् आपतितं जहाति तान् केवलश्रमकरैर् व्विफलैस् तपोभि
2 _ _ ^ _ ^ ^ ^ _ ^ ^ _ म् अमूढः 16 तूष्णीं भवन्तु खलु तीर्थ्यगणा जिनो हि स्वं वादम् अप्रतिसमं भुवि नानदीति व्यालम्बकेसरसटस्. .. .इ _
3 ^ _ _ _ _ ^ _ ^ ^ ^ _ ^ ^ .आ नदन्तीति 17 ॥ ॥ -
कल्प्म् : इद्प् स्ह्त् 21।20
42र्1 + चित्ताधीनत्व्. ॥। श् चित्तदमम् एवोपदिशन्ति प्राज्ञास् तद्यथानुश्रूयते शाकले किल पंचतपास् तप्यते स्म भिक्ष् उ णी च तं देशम् आगता ॥।
2 + स् व् इन् न लला टः ॥। कुक्षिवक्षणवक्षाः शुष्ककण्ठौष्ठपृष्ठनिष्ठीवः कनककपिलाभिर् अ.इं ज्व् आला भ् इ र् इ .. + + + + + + .इ .. .इ .. ॥।
3 + + + + + + ॥। .. तपेन .. .. .आ .. .इ .. .. .. च्. .आ .. कु तपेन प् र् आवृतः कुतप + + + + + + + + + + + + + + + ॥।
व्1 + + + + + + ॥। .इतम् अन्यस्मि ं स् त् आ पय् इ तव्य् ए ऽन् यत् ताप्यत इत्य् अथ तेन पंचातपिकेन परम .र्. + + + + + + + + + + + + + + + + + + +
2 भि क्षुणी कथया मास ॥ यस्य क्षोभाद् एष भ्रुकुटीविक्षेपदारुणतराक्षः मां वदसि दुष्टमुण्डेत्य् एतत् संताप्यत् आं चि त्तम् 1 अस्मिं हि सो ^ _ _ _ _
3 _ ते भविष्यति ^ _ _ धूर्ये हि सारथिर् इह प्रहरति न स्यन्दनं तुदति 2 यो ह्य् अप्रताप्य चित्तं कायं तापयति
कल्प्म् : इद्प् स्ह्त् 21।21
43र्1 _ ^ _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ ^ _ _ _ 3 _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ ^ _ . चतुर्भिर् इह पटुना च भ्. ^ _ _ _ _
2 तिवि _ ^ _ _ _ 4 _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ ^ _ ^ _ _ _ _ _ _ _ _ द्ध्. क्लिश्नासि परप्रणेयम् इमम् 5 क्षेप्ता _ _ _ _
3 व .. इ ^ _ _ ^ _ ^ _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ _ ^ _ _ _ 6 स्था नासनप्रसरणादिशरीरकर्म
व्1 य _ ^ _ ^ ^ ^ _ ^ ^ _ _ _ _ ^ _ ^ ^ ^ _ ^ ^ _ ^ _ _ _ _ ^ _ ^ ^ ^ काष्ठनिभो हि कायः 7 पुण्यं भवेद् यदि कडेब र _ ^ _ _ _ _
2 भवे ^ ^ ^ _ ^ ^ _ ^ _ _ _ _ ^ _ ^ ^ ^ _ ^ ^ _ ^ _ _ _ _ ^ _ ^ ^ ^ _ ह्. कृतं फलं स्यात् 8 स्वच्छन्दत ^ ^ ^ _ ^ ^ _ ^ _ _
3 .इ _ .इ _ ^ ^ ^ _ ^ ^ _ ^ _ _ _ _ ^ _ ^ ^ ^ _ ^ ^ _ लम् अस्ति
कल्प्म् : इद्प् स्ह्त् 21।22
44र्1 _ _ ^ _ ^ ^ ^ _ ^ ^ _ ^ _ _ 9 _ _ ^ _ ^ ^ नम् आरभते शरीरं संतापन ^ ^ ^ _ ^ ^ _ ^ _ _ अ ङ्गावपाटनसमर्जनवृत्त्. _ _ _ _ ^
2 _ ^ ^ ^ _ ^ ^ _ ^ _ _ 10 _ _ ^ _ ^ ^ इति प्रपरीक्ष्य तेषां नेष् ट् अं ^ _ ^ ^ ^ _ ^ ^ _ ^ _ _ न स्यात् फलं स हि तप ^ ^ _ ^ _ _
3 _ _ ^ _ ^ ^ ^ _ ^ ^ _ ^ _ _ 11 _ _ ^ _ ^ ^ शरीरपरि ^ _ _ _ _ ^ _ ^ ^ ^ _ ^ ^ _ ^ _ क्ताः
व्1 _ _ ^ _ ^ ^ ^ _ ^ ^ _ ^ _ _ _ _ ^ _ ^ ^ ^ _ ^ रकस्य _ ह्. 12 _ _ ^ _ ^ ^ ^ .य् अथ लोभजस्य किं _ ^ _ ^ ^ ^
2 _ ^ ^ _ ^ _ _ _ _ ^ _ ^ ^ ^ _ ^ ^ _ ^ जस्य स्वर्गप्रियस्य न ^ _ ^ ^ _ ^ _ .त्. 13 किं ब्राह्मणाभ्रम ^ _ ^ ^ _ ^
3 _ _ _ _ ^ _ ^ ^ ^ _ ^ ^ _ ^ _ _ _ _ ^ सत्यवचनादिर् उदाहृतो ऽन्यस्. _ _ ^ _ ^ ^ ^ _ ^ ^ _ ^ बोधम् 14 भया
कल्प्म् : इद्प् स्ह्त् 21।23
45र्1 .इ .. स्. इ .. ॥।
2 ननु स्वा .. ॥।
3 मना .. .. .. ॥।
व्1 बुद्धश्. व्य्. ॥।
2 शिरसा प् र् अ ॥।
3 वाक्यामृत्. ॥।
कल्प्म् : इद्प् स्ह्त् 21।24
46र्1 _ _ य इव क्. श्. _ _ _ _ _ मुनिर् अयम् एकपदे वसादितः 17 ॥ ॥ मांसपेश्. .. ॥।
2 सु वस्तुनि किल भिक्षुणा जीर्णगृहे कुड्यान्तर्गतो निधिर् उपलक्षितस् तेन स ॥।
3 + + + .. .. .ओ .. .. इति । स उवाच । य .ए .इ ..+ .. + + .. .. + .इ .. + + ॥।
व्1 + + + + + + .. ह । ॥ च् इ र् आत् प्र्. .ऋत्. _ _ _ _ _ _ _ ^ _ ^ _ _ _ _ _ ^ _ _ _ _ _ _ _ ^ _ ^ _ 1 _ _ _ _ ^ _ _ _ _ _ _ _ ^
2 _ ^ ते अनर्थेनार्थसंज्ञेन तेन मे किं प्रयोजनम् 2 धार्यते पूतिकायो ऽय् अं _ _ _ _ ^ _ ^ _ _ _ _ _ ^ _ _ _ _ _ _ _ ^ _ ^
3 _ 3 दित् सु स् .. न्. ^ .आ _ _ _ _ नुक्रोश एव वा अल्पेच्छतायां यत्नेन मान् निगृह्य कि म् _ ^ _ 4 _ _ _ _ ^ _ _ _ _ _
कल्प्म् : इद्प् स्ह्त् 21।25
47र्1 _ _ ^ _ ^ _ _ _ _ _ ^ _ _ _ लभत् ए व्य् आ कुलेन्द्रियः 5 महेच्छः संकल्पव्र ^ ^ ^ ^ _ _ ^ ^ ^ _ ^ _ _ _ _ _ ^ ^ ^ ^ ^ _ _ ^ ^ ^ _
2 ^ _ _ _ _ _ ^ ^ ^ ^ पशान्तिं न लभते जनस् त्व् अल्पेच्छो यः सततम् इह तस्यो ^ ^ ^ _ 6 ।

मूल पाठ: Kalpanāmaṇḍitikā · Edition: Heinrich Lüders: Bruchstücke der Kalpanāmaṇḍitikā des Kumāralāta. Leipzig 1926 (Kleinere Sanskrit-Texte, 2) [= repr. in: Monographien zur indischen Archäologie, Kunst und Philologie, 1: Steiner Verlag Wiesbaden 1979, pp. 113-375]. = KalpM · Data entry Klaus Wille · GRETIL (Göttingen) · CC BY-NC-SA 4.0

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