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अघोरकष्टोद्धारणस्तोत्रम् · अध्याय 1

श्रीपाद श्रीवल्लभ त्वं सदैव। श्री दत्तास्मान पाहि देवाधीदेव॥
भावग्राह्य क्लेशहारिन सुकीर्ते। घोरात्कष्टादुद्धरास्मान्नमस्ते॥
त्वं नो माता त्वं पिताप्तो दिपस्त्वं। त्रातायोगक्षेमकृसद्गुरुस्त्वम॥
त्वं सर्वस्वं नो प्रभो विश्वमूर्ते। घोरात्कष्टादुद्धरास्मान्नमस्ते॥
पापं तापं व्याधीमाधींच दैन्यम। भीतिं क्लेशं त्वं हराऽशुत्व दैन्यम॥
त्रातारंनो वीक्ष इशास्त जूर्ते। घोरात्कष्टादुद्धरास्मान्नमस्ते॥
नान्यस्त्राता नापि दाता न भर्ता। त्वत्तो देवं त्वं शरण्योकहर्ता।
कुर्वात्रेयानुग्रहं पुर्णराते। घोरात्कष्टादुद्धरास्मान्नमस्ते॥
धर्मेप्रीतिं सन्मतिं देवभक्तिं। सत्संगाप्तिं देहि भुक्तिं च मुक्तिं
भावासक्तिंचाखिलानन्दमूर्ते। घोरात्कष्टादुद्धरास्मान्नमस्ते॥
श्लोकपंचकमेतद्यो लोकमंगलवर्धनम।
प्रपठेन्नियतो भक्त्या स श्रीदत्तप्रियोभवेत॥
॥इति श्रीमत्वासुदेवानंदसरस्वतिविरचितं अघोरकष्टोद्धारणस्तोत्रम सम्पूर्णम॥

मूल पाठ: aghorakaṣṭoddhāraṇastotram · Sanskrit Wikisource contributors · Sanskrit Wikisource · CC BY-SA 4.0

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